Friday, 27 April 2018
Sunday, 2 July 2017
हिंदी ब्लागिंग के कलंक !
कल से ही सोच रहा हूं कि कम से कम अंतर्रराष्ट्रीय हिंदी ब्लागिंग दिवस पर कुछ तो लिखा जाए, मित्र भी लगातार याद दिला रहे हैं, पूछ रहे हैं कहां गायब है, इन दिनों दिखाई नहीं दे रहे , न ही ब्लाग पर पहले की तरह सक्रिय है । मैने भी महसूस किया कि तीन चार सालों में ही ब्लागिंग में एक अच्छा खासा परिवार बन गया था, उन दिनों हफ्ते दो हफ्ते में ब्लागर मित्रों से बात न हो तो कुछ खालीपन सा महससू होता था, पर बीच में अपनी व्यस्तता, इसके अलावा ब्लागिंग के प्रति कुछ ब्लागरों के नकारात्मक रवैये से मन खिन्न हुआ और यहां से थोड़ी दूरी बन गई । वैसे एक बात बताऊं ये सच है कि काफी समय से ब्लाग पर सक्रिय नही रहा, लेकिन ऐसा भी नहीं रहा कि मैने आप लोगों को पढ़ा नहीं । आप सब जानते हैं कि इन दिनों ज्यादातर ब्लागर अपने नए लेख का लिंक ट्विटर या फेसबुक पर जरूर शेयर करते है, इससे आसानी से उनके ब्लाग तक पहुंचा जा सकता है, हां ये अलग बात है कि मोबाइल पर पढने से कमेंट करनें में जरूर असुविधा होती
है।
अब बात शुरू ही हो गई है तो पुरानी बात याद करना भी जरूरी है । आपको पता है कि हिंदी ब्लागिंग के दुश्मन कोई और नहीं कुछ हिंदी के ही अल्प जानकार ब्लागर रहे हैं । वो खुद ही ब्लागिंग के शिरोमणि बन बैठे और यहां अपनी नकली सरकार चलाने लगे। इतना ही नहीं वो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का सम्मान समारोह भी आयोजित करने लग गए । हैरानी तब हुई जब मैने देखा कि इस सम्मान समारोह के आयोजन के नाम पर धनउगाही शुरू हो गई । बेचारे नए ब्लागर जो इस आभासी दुनिया की हकीकत को नहीं जानते थे, वो इनके जालसाजी में फंस गए। पहले तो इन तथाकथित ब्लागिंग शिरोमणियों ने उन ब्लागरों को छांटना शुरू किया जिन्हें आसानी से जाल में फंसाया जा सकता है, इन नामों की सूची तैयार करने के बाद साजिश के तहत एक माहौल बनाया जाता था कि सम्मान के लिए विजेताओं के नाम जल्दी घोषित किए जाएंगे। यही बातें ब्लागिंग शिरोमणि के चेले चापड भी अपने ब्लाग पर लिख कर पूरा जाल बिछाया करते थे। बाद में सम्मान के लिए कुछ लोगों के नाम का बहुत ही धूमधाम ऐलान किया जाता था । मजेदार बात तो ये है कि इस सम्मान सूची में कई ऐसे ब्लागर की जिक्र होता था, जिसके ब्लाग पर एक भी लेख नहीं होते थे । मुझे याद है कि एक बार मैने सवाल उठाया कि सम्मान के लिए जिन लोगों के नाम तय किए गए है, आखिर उसकी क्राइट एरिया क्या है ? इस सवाल पर ब्लागिग जगत में तूफान मच गया, लेकिन किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। ऐसे में हमें हिंदी ब्लागिंग के कलंक को पहचानना होगा ।
सम्मान की सूची में महिलाओं खासतौर पर ऐसी महिलाओं को शामिल किया जाता था जो घरेलू हुआ करती थीं, और इस आभासी दुनिया के मुहाने पर खड़ी होती थी । इन्हें तरह तरह के लालच दिए जाते थे, बेचारी महिलाएं इन ढोगी ब्लागरों का दुपट्टा ओढने के चक्कर मे अपना दुपट्टा घर छोड़ आती थी। तीन चार साल तो ये बाजार खूब चला, लेकिन महिलाएँ उतना मूर्ख नहीं जितना इन्हें समझा जा रहा था। कुछ समय बीता तो इस सम्मान समारोह के खिलाफ कई महिला ब्लागर ही मुखर हो गईं। अच्छा एक बात और मजेदार होती थी, ब्लागरों में भी कुछ गुंडे ब्लागर है, जिन्हें खेल बिगाडने में महारत हासिल है। ऐसे ब्लागरों को साधने के लिए ब्लाग शिरोमणि पहले ही जाल बिछा लेते थे। उन्हें कुछ ऐसा साहित्यिक सम्मान देने का ऐलान किया जाता था जो सम्मान पद्मश्री टाइप लगता था। इन्हें बताया जाता था कि उन्हें कोई धनराशि नहीं देनी है, सिर्फ समारोह में शामिल होने की सहमति भर दे दें। उनके लिए आने जाने का किराया ही नहीं होटल खाना पानी सब फ्री रहेगा। इसके अलावा उनका आसन भी मंच पर रहेगा। ये बेचारे इसी में खुश हो जाते थे। अच्छा ऐसा भी नहीं है कि ये बातें मैं आज याद कर रहा हूं, जी नहीं ! पहले भी लोगों को इस दुकान के बारे में आगाह करता रहा हूं, लेकिन होता ये था कि ब्लागर शिरोमणि के चंपू मुझे गाली गलौज करते थे, कुछ लोग मेरा भी समर्थन करते थे । कुछ लोग फोन करके के सलाह देते थे कि इन नंगों के मुंह लगने से क्या फायदा ? यहां सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।
बहरहाल आज अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागिंग दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं देना महज औपचारिकता होगी। मुझे लगता है कि कुछ नहीं तो आत्ममंथन करना जरूरी है । हम सभी ब्लागरों को सोचना होगा कि हमने इस ब्लागिंग के सफर की शुरुआत कहां से की थी और आज कहां पहुंचे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं जाना कहां हैं, ये तय किए बगैर ही सफर की शुरुआत कर दी और चले जा रहे हैं, मंजिल का कोई अता पता ही नहीं। फिलहाल मित्रों की सलाह को मानते हुए एक बार फिर ब्लाग पर वापसी कर रहा हूं, कोशिश होगी कि यहां नियमित रहूं। आधा सच के साथ ही मेरे दो अन्य ब्लाग रोजनामचा और TV स्टेशन को भी अपने जेहन में याद रखें। प्लीज ।
महेन्द्र श्रीवास्तव
है।
अब बात शुरू ही हो गई है तो पुरानी बात याद करना भी जरूरी है । आपको पता है कि हिंदी ब्लागिंग के दुश्मन कोई और नहीं कुछ हिंदी के ही अल्प जानकार ब्लागर रहे हैं । वो खुद ही ब्लागिंग के शिरोमणि बन बैठे और यहां अपनी नकली सरकार चलाने लगे। इतना ही नहीं वो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का सम्मान समारोह भी आयोजित करने लग गए । हैरानी तब हुई जब मैने देखा कि इस सम्मान समारोह के आयोजन के नाम पर धनउगाही शुरू हो गई । बेचारे नए ब्लागर जो इस आभासी दुनिया की हकीकत को नहीं जानते थे, वो इनके जालसाजी में फंस गए। पहले तो इन तथाकथित ब्लागिंग शिरोमणियों ने उन ब्लागरों को छांटना शुरू किया जिन्हें आसानी से जाल में फंसाया जा सकता है, इन नामों की सूची तैयार करने के बाद साजिश के तहत एक माहौल बनाया जाता था कि सम्मान के लिए विजेताओं के नाम जल्दी घोषित किए जाएंगे। यही बातें ब्लागिंग शिरोमणि के चेले चापड भी अपने ब्लाग पर लिख कर पूरा जाल बिछाया करते थे। बाद में सम्मान के लिए कुछ लोगों के नाम का बहुत ही धूमधाम ऐलान किया जाता था । मजेदार बात तो ये है कि इस सम्मान सूची में कई ऐसे ब्लागर की जिक्र होता था, जिसके ब्लाग पर एक भी लेख नहीं होते थे । मुझे याद है कि एक बार मैने सवाल उठाया कि सम्मान के लिए जिन लोगों के नाम तय किए गए है, आखिर उसकी क्राइट एरिया क्या है ? इस सवाल पर ब्लागिग जगत में तूफान मच गया, लेकिन किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। ऐसे में हमें हिंदी ब्लागिंग के कलंक को पहचानना होगा ।
सम्मान की सूची में महिलाओं खासतौर पर ऐसी महिलाओं को शामिल किया जाता था जो घरेलू हुआ करती थीं, और इस आभासी दुनिया के मुहाने पर खड़ी होती थी । इन्हें तरह तरह के लालच दिए जाते थे, बेचारी महिलाएं इन ढोगी ब्लागरों का दुपट्टा ओढने के चक्कर मे अपना दुपट्टा घर छोड़ आती थी। तीन चार साल तो ये बाजार खूब चला, लेकिन महिलाएँ उतना मूर्ख नहीं जितना इन्हें समझा जा रहा था। कुछ समय बीता तो इस सम्मान समारोह के खिलाफ कई महिला ब्लागर ही मुखर हो गईं। अच्छा एक बात और मजेदार होती थी, ब्लागरों में भी कुछ गुंडे ब्लागर है, जिन्हें खेल बिगाडने में महारत हासिल है। ऐसे ब्लागरों को साधने के लिए ब्लाग शिरोमणि पहले ही जाल बिछा लेते थे। उन्हें कुछ ऐसा साहित्यिक सम्मान देने का ऐलान किया जाता था जो सम्मान पद्मश्री टाइप लगता था। इन्हें बताया जाता था कि उन्हें कोई धनराशि नहीं देनी है, सिर्फ समारोह में शामिल होने की सहमति भर दे दें। उनके लिए आने जाने का किराया ही नहीं होटल खाना पानी सब फ्री रहेगा। इसके अलावा उनका आसन भी मंच पर रहेगा। ये बेचारे इसी में खुश हो जाते थे। अच्छा ऐसा भी नहीं है कि ये बातें मैं आज याद कर रहा हूं, जी नहीं ! पहले भी लोगों को इस दुकान के बारे में आगाह करता रहा हूं, लेकिन होता ये था कि ब्लागर शिरोमणि के चंपू मुझे गाली गलौज करते थे, कुछ लोग मेरा भी समर्थन करते थे । कुछ लोग फोन करके के सलाह देते थे कि इन नंगों के मुंह लगने से क्या फायदा ? यहां सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।
बहरहाल आज अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागिंग दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं देना महज औपचारिकता होगी। मुझे लगता है कि कुछ नहीं तो आत्ममंथन करना जरूरी है । हम सभी ब्लागरों को सोचना होगा कि हमने इस ब्लागिंग के सफर की शुरुआत कहां से की थी और आज कहां पहुंचे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं जाना कहां हैं, ये तय किए बगैर ही सफर की शुरुआत कर दी और चले जा रहे हैं, मंजिल का कोई अता पता ही नहीं। फिलहाल मित्रों की सलाह को मानते हुए एक बार फिर ब्लाग पर वापसी कर रहा हूं, कोशिश होगी कि यहां नियमित रहूं। आधा सच के साथ ही मेरे दो अन्य ब्लाग रोजनामचा और TV स्टेशन को भी अपने जेहन में याद रखें। प्लीज ।महेन्द्र श्रीवास्तव
Wednesday, 14 June 2017
राष्ट्रपति चुनाव के बाद "शिव" राज का फैसला !
एक लाइन की खबर ये है कि राष्ट्रपति के चुनाव के बाद मध्यप्रदेश सरकार में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना काफी बढ़ गई है। इस मसले पर बाकी बातें बाद में लेकिन बता दूं कि मूर्खाना हरकतों से हमेशा सुर्खियों में रहने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर चर्चा में हैं । दूसरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को मंदसौर जाने पर रोक लगाने वाले सीएम खुद वहां पहुंच गए और फुल ड्रामा किया । पहले तो जाते ही कुर्सी के बजाए वो जमीन पर बैठ गए , बाद में तथाकथित मृतक किसान के चार साल के बेटे को गोद मे बैठाया उसके पिता से आत्मीयता दिखाते हुए उनके दुख में खुद को शामिल बताया । सच्चाई ये है कि अब सूबे की जनता ही नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व का शिवराज से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है, उनकी सरकार पर बेईमानी के कई गंभीर आरोप है, इन गंभीर आरोपों में कई के तार उनके परिवार - रिश्तेदारों से भी जुड़े हुए हैं। लिहाजा अब शिवराज की पूरी कोशिश यही हैं कि वो क्या करें, जिससे अगले साल होने वाला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाए, जबकि पार्टी आलाकमान पूरी तरह बदलाव का मन बना चुका है।
सूबे के हालात को नियंत्रित करने में पूरी तरह फेल रहे शिवराज कर क्या रहे हैं ये वो खुद ही नहीं जानते । सवाल ये है कि पुलिस की गोली में छह किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है, इस पूरे मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं और ये जांच शुरू भी हो गई है। सब ने देखा कि सड़कों पर उपद्रवियों ने सैकडों वाहनों में आग लगाई। पुलिस पर पथराव किया,कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर पुलिस ने सख्त कार्रवाई यानि गोली न चलाई होती तो कई पुलिस वाले भी मारे जाते। खुद मुख्यमंत्री ने कहाकि किसानों के आंदोलन के नाम पर विपक्ष और उपद्रवी तत्वों ने हालात बिगाड़े। अगर ऐसा है तो फिर सरकारी खजाने को क्यों लुटाया जा रहा है। जो लोग मारे गए हैं वो सड़क पर खेती करने नहीं उतरे थे, वो हिंसा भडका रहे थे, ऐसे लोगों की मौत पर सूबे की सरकार आँसू क्यों बहा रही है ये भी जांच का विषय हो सकता है।
अब देखिए जब राज्य में आग लगी है, जब मुख्यमंत्री को लगातार कानून व्यवस्था पर नजर रखनी चाहिए, सख्त फैसले लेने चाहिए , अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ मीटिंग कर शांति बहाली की रणनीति पर काम करना चाहिए, कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लगातार हालात की समीक्षा की जानी चाहिए, उस समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पत्नी के साथ फाइव स्टार उपवास पर बैठ गए। 24 घंटे के उपवास के लिए सरकारी खजाने से करोडो रुपये पानी की तरह बहा दिए, समझ में अभी तक नहीं आया कि आखिर इससे हल क्या निकला। उपवास से किसे पिघलाना चाहते थे। सच तो ये है चौहान साहब आपको किसान, किसानी और उनके गुस्से का अँदाजा ही नहीं था। आप पूरी तरह फेल रहे हैं , इसलिए नैतिक रूप से आपको सरकार में रहने का हक नहीं है। वैसे राष्ट्रपति चुनाव के बाद आप की कुर्सी पर खतरा है।
Tuesday, 6 June 2017
स्वच्छता सर्वे या बिहार की मेरिट लिस्ट !
![]() |
| स्वच्छता रिपोर्ट के कवर पेज से इंदौर गायब ! |
द मेरिट में आए छात्र और उस स्कूल के प्राचार्य को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है , ठीक उसी तरह अगर इस स्वच्छता रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच हो जाए तो ना सिर्फ इंदौर की हकीकत सामने आएगी, बल्कि यहां भी कई अफसरों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। दो साल इंदौर में रहा हूं, इसलिए ना सिर्फ यहां की सफाई से वाकिफ हूं बल्कि अफसरों की फितरत को भी भली भांति समझता हूं।
जान लीजिए लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन यहां से सांसद है, इसलिए इंदौर के सामले में सभी राजनीतिक दल खामोश रहते हैं। ताई का ना सिर्फ इंदौर बल्कि देश भर में एक अलग सम्मान है। केंद्र सरकार की जो भी योजना होती है, सभी में इंदौर का नाम शामिल हो जाता है ,जबकि यहां तैनात ज्यादातर अफसर नाकाबिल है, लेकिन अपनी मार्केटिंग और जी हजूरी अच्छी कर लेते हैं। यहा हर उस अफसर को मुख्यमंत्री की ताकत मिलती है जो यहां के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय का विरोधी है । खैर अभी बात सिर्फ सफाई की ।
इंदौर शहर को खान नदी दो हिस्सों मे बांटती है। गंदगी से अटी पड़ी ये नदी अब नाला बन चुकी है । इसके दोनों ओर भारी गंदगी है और इसके आप पास रहना मुश्किल है। जो इलाका साफ सुथरा दिखाई भी दे रहा था, मसलन विजयनगर, स्कील 54 वगैरह । यहां निगम अफसरों ने सड़क पर फूहड तरीके से टाँयलेट बनवा दिए है और उस पर गांव गिरांव की तरह लिखा है मूत्रालय । जैसा टाँयलेट इंदौर निगम ने बनवाया है वो टाँयलेट यूपी के गांव में बने टायलेट से भी घटिया है। चूंकि ताई की वजह से इंदौर को ना सिर्फ स्मार्ट सिटी स्कीम में शामिल किया गया बल्कि पहले 20 स्मार्ट सिटी में शामिल किए जाने से केंद्र सरकार से करोडों रुपये साफ सफाई के लिए मिल गए । अब अनाप शनाप पैसे मिल रहे हैं और अधिकारी मौज ले रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी का गोंडा शहर सबसे गंदा है, मैं हैरान हूं कि भारत सरकार को ये रिपोर्ट जारी करने में शर्म भी महसूस नहीं हुई । अरे पता तो करते गोंडा को साफ सफाई के लिए कितना पैसा दिया गया है । इंदौर में तो माहौल बनाने के लिए एक दिन में अफसरों ने 10 लाख रुपये के गुब्बारे हवा में उ़डा दिए, गोडा मे सफाई के लिए साल में 10 लाख नहीं मिले होंगे । इस रिपोर्ट में स्वच्छता का जो क्राइट है, वो भी दोषपूर्ण है।
कुल 2000 अंको में शहरों को नंबर दिए गए हैं । इसमें 900 अंक स्थानीय निकायों के डाक्यूमेंटेशन का है, जबकि सिटीजन फीडबैक पर 600 और निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए महज 500 अंक है। अब अगर डाक्यूमेंटेशन में इँदौर को 875 अंक मिलते हैं और गोंडा को सिर्फ 52 तो इसमें शहर या शहरियों की क्या गलती है ? जिन अफसरों ने डाक्यूमेंटेशन ठीक नहीं किया, उन्हें अब तक निलंबित हो जाना चाहिए था। इसी तरह सिटीजन फीडबैक को ले लें , इसके 600 अंकों में से इंदौर को मिले हैं 467 और गोंडा के खाते में आए 192 अंक । यहां ये जानना जरूरी है कि इंदौर की आबादी गोंडा के मुकाबले चार गुना है, इंदौर संपन्न शहर है, ज्यादातर लोग मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, जबकि गोंडा एक पिछडा शहर है। बता चुका हू कि इँदौर मे माहौल बनाने के लिए सिर्फ एक दिन में 10 लाख गुब्बारे हवा मे उडाए गए। अच्छा इसके बाद भी अंबिकापुर ने 501 अंक हासिल कर इंदौर को दूसरे नंबर पर धकेल दिया है। सबसे महत्वपूर्ण निष्पक्ष आब्जर्वेशन का है, जो सिर्फ 500 अंकों का है। इसमें इंदौर को 435 अंक मिले हैं, जबकि कई दूसरे शहरों को इंदौर से अधिक अंक मिले हैं।
साफ है कि भारत सरकार ने पूरी तरह गलत तथ्यों पर आधारित रिजल्ट घोषित किया था, यही वजह है कि कल यानि 5 जून को जनता का धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए प्रणाम इंदौर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में लाखों रूपये पानी की तरह बहाए गए। भगवान को ये मंजूर नहीं था और उन्होंने अपना रौद्र रूप दिखाया, आंधी तूफान में सारे पांडाल उडा दिए , वीआईपी भी मुश्किल से यहां से निकल पाए । मैं चुनौती देता हूं कि अगर कोई निष्पक्ष टीम इंदौर का निरीक्षण करेगी तो ना सिर्फ यहां की हकीकत सामने आएगी, बल्कि बेईमान अफसरों को भी जेल जाना होगा ।
![]() |
| भगवान को मंजूर नहीं झूठ ! |
![]() |
| इंदौर की असल तस्वीर ! |
![]() |
| इंदौर की असल तस्वीर ! |
![]() |
| इंदौर की असल तस्वीर ! |
Monday, 8 February 2016
निदा फाजली : हम तुम्हें मरने ना देंगे !
सच कहूं तो निदा फाजली की शायरी बड़ी सरलता के साथ अपनी बात कह जाती है। वह जमाने के शायर या यूं कहूं कि वो आम आदमी की रहनुमाई करने वाले इकलौते शायर थे। कबीर ने जिस रहस्यवाद और फक्कड़पन का तानाबाना बुना, निदा उसी परंपरा में खड़े नजर आते हैं। हा ये जरूर है कि दुनियावी रिश्तों में भी वे समरस हो जाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, लेकिन उनके अंतर्मन में कोई ऐसी लहर उठती रही है कि वह फिर अपनी राह पर आगे बढ जाते हैं। फिर लगने लगता है कि भले वह कहें कि
"अपनी मर्जी से कहां, अपने सफर के हम हैं,
हवाओं का रुख जिधर है उधर के हम हैं "
हवाओं का रुख जिधर है उधर के हम हैं "
वैसे करीब से महसूस करने पर वे मतवाले ही लगते हैं। जिंदगी को अपनी तरह से जीने वाले। जिंदगी को जिस तरह जी लिया, उसी से वह अनगिनत मोती समेट लाए हैं। निदा यानी आवाज। उनका पुकारना कई तरह से सुना जाता है। कभी स्कूल जाते हुए बच्चों को देखकर, कभी मां की अनुभूतियों को याद कर,कभी अपनों की तलाश करते हुए उनकी भावुकता पन्नों पर उतर आती है। वह कबीर की परंपरा से भी इसलिए जुड़ जाते हैं कि वह कह सकते हैं,
"सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर।"
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर।"
न जाने उनसे कितनी बार सुना गया...
"जादू टोना रोज का, बच्चों का व्यवहार,
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार। "
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान,
अल्ला तेरे एक को इतना ब़ड़ा मकान।"
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार। "
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान,
अल्ला तेरे एक को इतना ब़ड़ा मकान।"
निदा आवाज देते हैं तो उसे गौर से सुना जाता है। उन्हें जब भी पाया, गहरी आत्मीयता से भरा हुआ पाया। जो उनसे छूटा, उसे उन्होंने अपनी जतन से जोड़ी हुई दुनिया से पाने की कोशिश की। जब भी मन भीगा, कोई पंक्ति निकल आई। वह न तो पूरी तरह सूफी हैं, न पूरी तरह सांसारिक। मगर गूढ़ा खूब है। जीवन की संवेदनाओं को उन्होंने ऐसे शब्द दिए हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ा और सुना जाता है। जीवन को देखने का उनका तजुर्बा वाकई अलग है, तभी वह कह पाए हैं,
"सीधा साधा डाकिया जादू करे महान,
एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान।"
एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान।"
साहित्य की धूनी रमाने वाले तमाम साथी उनकी खूब चर्चा किया करते है, हालाकि निदा साहब काफी दिलचस्प व्यक्ति थे, जिनसे मिलना शुकून देने वाला होता है । उनके करीबी बताते हैं कि उनकी महफिलों का मतलब है किस्से, चर्चे, साहित्य की बातें, कुछ गॉसिप, चुहुलबाजी, सामयिक विषयों पर चर्चाएं, राजनीति की भी बातें और घर में ही मशीन पर बनते सोडा के साथ कांच के सुंदर गिलासों में भरती शराब, उनकी खुद की तैयार की हुई कोई नानवेज डिश और रोटी बनाने की मशक्कत से बचने के लिए पास की ब्रेकरी से मंगाए हुए पाव। उनके घर में निंदा रस की भी गुंजाइश रहती थी। इसकी चपेट में कवि, समीक्षक, साहित्यकार फिल्म जगत और अखबारी लोग ही आते थे। या फिर कथित सांप्रदायिक आचरण वाले लोगों पर उनका गुस्सा बरसता था। गीत संगीत साथ-साथ चलता और जब उनकी इच्छा हो तो राजनीति पर भी बातें हो जाती थीं।
निदाजी का जीवन, दुनिया को देखने, समझने की तहजीब देता है। लोगों तक पहुंचने के लिए वे आवरण नहीं बनाते, लेकिन थोड़ी-सी परख हो तो निदा समझ में आने लगते हैं। सुना है शायरी-गजल लिखने के लिए शायद ही कभी वह अपना खास मिजा़ज बनाते हों। कब लिखते हैं, पता नहीं चलता । जब भी कुछ नया लेकर आते, उस दिन कुछ देर की संगत के बाद उसे धीरे-धीरे तर्ज में यार दोस्तों को सुनाने लगते। लोग वाह ! वाह ! ही करते। दूसरों को भी खूब सुनते हैं। युवाओं की कविता-कहानी, गीत,गजल को वह बहुत दिलचस्पी से सुनते थे। निदा जी के चले जाने की खबर वाकई पीडादायक है, लेकिन एक कलमकार यही कह सकता है कि निदाजी .. हम तुम्हें मरने ना देंगे, जब तलक जिंदा कलम है।
Sunday, 18 October 2015
औकात है तो हमारा " प्यार " वापस दो !
देश के जाने माने शायर मुनव्वर राना का असली चेहरा आज सामने आया। इस उम्र में इतनी घटिया एक्टिंग एक राष्ट्रीय चैनल पर करते हुए उन्हें देखा तो एक बार खुद पर भरोसा नहीं हुआ। लेकिन चैनल ने भी अपनी टीआरपी को और मजबूत करने का ठोस प्लान बना रखा था, लिहाजा मुनव्वर राना का वो घटिया कृत्य बार बार दिखाता रहा। राना का फूहड़ ड्रामा देखकर एक बार तो ये भी भ्रम हुआ कि मैं टीवी का टाँक शो देख रहा हूं या फिर कलर्स चैनल का रियलिटी शो बिग बाँस देख रहा हूं। वैसे नफरत की राजनीति करने वाले राना अगर बिग बाँस के घर के लिए परफेक्ट हैं !
आइये अब पूरा मसला बता दे, रविवार के दिन आमतौर पर न्यूज चैनलों के पास करने को ज्यादा कुछ होता नहीं है। उन्हें कुछ सनसनी टाइप चीजों की जरूरत होती है। इसके लिए आज ABP न्यूज चैनल पर राजनीतिज्ञों के साथ साहित्यकारों को बैठाया गया और साहित्य अकादमी पुरस्कारों के वापस करने पर बहस शुरू हुई। सच ये हैं कि देश की जनता आज तक ये नहीं समझ पाई कि साहित्यकार अचानक सम्मान वापस क्यों कर रहे हैं। सोशल साइट पर तो भले ही बात मजाक में कही जा रही हो लेकिन कुछ हद तक सही भी लगती है। " शायद साहित्यकारों ने अपना ही लिखा दोबारा पढ़ लिया और उन्हें शर्म आ रही है कि ऐसी लेखनी पर तो वाकई अवार्ड नहीं बनता, चलो वापस कर दें " । मुझे तो हंसी इस बात पर आ रही है कि साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापसी के बाद पता चल रहा है कि इन्हें भी मिल चुका है ये अवार्ड ।
चलिए अब सीधे मुनव्वर राना से बात करते हैं । जनाब आप तो कमाल के आदमी हैं, अवार्ड में मिले रुपये का चेक और मोमेंटो हमेशा साथ झोले में रख कर चलते हैं। आप तो टीवी शो पर एक बहस मे हिस्सा लेने आए थे, यहीं आपने चेक और मोमेंटो एंकर को थमा दिया। मै जानता हूं आपको खबरों और उसकी सुर्खियों में बने रहने का सलीका पता है। राना साहब ये सब संयोग तो बिल्कुल नहीं हो सकता । मैं तो दावे के साथ कह सकता हूं कि या तो आपने चैनल के साथ समझौता किया कि हम यहां अवार्ड वापस करेंगे और आपको उसके बाद पूरा शो इसी पर दिखाना है या फिर रायबरेली की उस पार्टी इशारे पर नाच रहे हैं जिसकी आप चरण वंदना करते नहीं थकते हैं। वैसे राना साहब आपके ही किसी शायर की दो लाइन याद आ रही है ....
कौन सी बात कब कहां और कैसे कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है ।
शायर की ये बेसिक बात भी आप भूल गए राना जी। न्यूज रूम कैमरा देख इतना भावुक हो गए कि आपने देश की इज्जत को ही दांव पर लगा दिया । चलिए मैं देखता हूं कि आप कितने अमीर हैं और हमारे कितने अवार्ड वापस करते हैं। अगर है आप में दम और औकात तो आपको सुनने के लिए देर रात तक मुशायरे में बैठे रहने वाला समय हमें वापस कीजिए। है औकात तो देशवासियों से मिली तालियां वापस कीजिए, है इतनी हैसियत तो हमारी वाहवाही भी वापस कीजिए। इतना ही नहीं अगर आपके पूरे खानदान की औकात हो तो देशवासियों ने जो प्यार आपको दिया है वो वापस कीजिए। राना जी राजनीति घटिया खेल है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन आप उसी घटिया राजनीति के शुरू से हिस्सा रहे हैं।
टीवी पर एंकर कमजोर थी, शो का प्रोड्यूसर भी शायद आपके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखता था। वरना तो उसी ABP न्यूज चैनल पर आपका असली रूप दिखा और सुना भी सकता था। लोगों को भी आपकी असलियत का पता तो चलता । आप को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी कितनी प्रिय हैं ये तो सबको पता होना ही चाहिए ।
सोनियां गांधी के चरणों में मुनव्वर राना की भेंट । पढ़ तो लीजिए ही उनकी भावनाओं को, लेकिन संभव हो तो यूट्यूब पर जाकर इसे राना साहब की आवाज में सुनें भी, देखिए कितना दर्द है उनके भीतर ...
एक बेनाम सी चाहत के लिए आयी थी,
आप लोंगों से मोहब्बत के लिए आयी थी,
मैं बड़े बूढों की खिदमत के लिए आयी थी,
कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी ?
शिज्रा-ए-रंग-व-गुल-व-बू नहीं देखा जाता,
शक की नज़रों से बहु को नहीं देखा जाता !
रुखसती होते ही माँ बाप का घर भूल गयी,
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गयी,
घर को जाती हुयी हर राहगुज़र भूल गयी,
में वह चिड़िया हूँ जो अपना ही शजर भूल गयी,
में तो जिस देश में आयी थी वही याद रहा,
होके बेवा भी मुझे सिर्फ पति याद रहा !
नफरतों ने मेरे चेहरे से उजाला छीना,
जो मेरे पास था वह चाहने वाला छीना,
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना,
मुझ से गिरजा भी लिया मेरा शिवाला छीना,
अब यह तकदीर तो बदली भी नहीं जा सकती,
में वो बेवा हूँ जो इटली भी नहीं जा सकती !
अपने घर में यह बहुत देर कहाँ रहती है,
लेके तकदीर जहाँ जाये वहां रहती है,
घर वही होता है औरत का जहाँ रहती है,
मेरे दरवाज़े पे लिख दो यहाँ माँ रहती है,
सब मेरे बाग़ के बुलबुल की तरह लगते है,
सारे बच्चे मुझे 'राहुल' की तरह लगते हैं !
हर दुखे दिल से मोहब्बत है बहु का ज़िम्मा,
घर की इज्ज़त की हिफाज़त है बहु का ज़िम्मा,
घर के सब लोंगों की खिदमत है बहु का ज़िम्मा,
नौजवानी की इबादत है बहु का ज़िम्मा आयी,
बाहर से मगर सब की चहीती बनकर,
वह बहु है जो रहे साथ में बेटी बनकर !
राना साहब आपकी हैसियत नहीं है देश से मिले सम्मान को वापस करने की। आपको देश से माफी मांगनी चाहिए । वरना देश आपको कभी माफ नहीं करेगा।
आइये अब पूरा मसला बता दे, रविवार के दिन आमतौर पर न्यूज चैनलों के पास करने को ज्यादा कुछ होता नहीं है। उन्हें कुछ सनसनी टाइप चीजों की जरूरत होती है। इसके लिए आज ABP न्यूज चैनल पर राजनीतिज्ञों के साथ साहित्यकारों को बैठाया गया और साहित्य अकादमी पुरस्कारों के वापस करने पर बहस शुरू हुई। सच ये हैं कि देश की जनता आज तक ये नहीं समझ पाई कि साहित्यकार अचानक सम्मान वापस क्यों कर रहे हैं। सोशल साइट पर तो भले ही बात मजाक में कही जा रही हो लेकिन कुछ हद तक सही भी लगती है। " शायद साहित्यकारों ने अपना ही लिखा दोबारा पढ़ लिया और उन्हें शर्म आ रही है कि ऐसी लेखनी पर तो वाकई अवार्ड नहीं बनता, चलो वापस कर दें " । मुझे तो हंसी इस बात पर आ रही है कि साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापसी के बाद पता चल रहा है कि इन्हें भी मिल चुका है ये अवार्ड ।
चलिए अब सीधे मुनव्वर राना से बात करते हैं । जनाब आप तो कमाल के आदमी हैं, अवार्ड में मिले रुपये का चेक और मोमेंटो हमेशा साथ झोले में रख कर चलते हैं। आप तो टीवी शो पर एक बहस मे हिस्सा लेने आए थे, यहीं आपने चेक और मोमेंटो एंकर को थमा दिया। मै जानता हूं आपको खबरों और उसकी सुर्खियों में बने रहने का सलीका पता है। राना साहब ये सब संयोग तो बिल्कुल नहीं हो सकता । मैं तो दावे के साथ कह सकता हूं कि या तो आपने चैनल के साथ समझौता किया कि हम यहां अवार्ड वापस करेंगे और आपको उसके बाद पूरा शो इसी पर दिखाना है या फिर रायबरेली की उस पार्टी इशारे पर नाच रहे हैं जिसकी आप चरण वंदना करते नहीं थकते हैं। वैसे राना साहब आपके ही किसी शायर की दो लाइन याद आ रही है ....
कौन सी बात कब कहां और कैसे कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है ।
शायर की ये बेसिक बात भी आप भूल गए राना जी। न्यूज रूम कैमरा देख इतना भावुक हो गए कि आपने देश की इज्जत को ही दांव पर लगा दिया । चलिए मैं देखता हूं कि आप कितने अमीर हैं और हमारे कितने अवार्ड वापस करते हैं। अगर है आप में दम और औकात तो आपको सुनने के लिए देर रात तक मुशायरे में बैठे रहने वाला समय हमें वापस कीजिए। है औकात तो देशवासियों से मिली तालियां वापस कीजिए, है इतनी हैसियत तो हमारी वाहवाही भी वापस कीजिए। इतना ही नहीं अगर आपके पूरे खानदान की औकात हो तो देशवासियों ने जो प्यार आपको दिया है वो वापस कीजिए। राना जी राजनीति घटिया खेल है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन आप उसी घटिया राजनीति के शुरू से हिस्सा रहे हैं।
टीवी पर एंकर कमजोर थी, शो का प्रोड्यूसर भी शायद आपके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखता था। वरना तो उसी ABP न्यूज चैनल पर आपका असली रूप दिखा और सुना भी सकता था। लोगों को भी आपकी असलियत का पता तो चलता । आप को कांग्रेस नेता सोनिया गांधी कितनी प्रिय हैं ये तो सबको पता होना ही चाहिए ।
सोनियां गांधी के चरणों में मुनव्वर राना की भेंट । पढ़ तो लीजिए ही उनकी भावनाओं को, लेकिन संभव हो तो यूट्यूब पर जाकर इसे राना साहब की आवाज में सुनें भी, देखिए कितना दर्द है उनके भीतर ...
एक बेनाम सी चाहत के लिए आयी थी,
आप लोंगों से मोहब्बत के लिए आयी थी,
मैं बड़े बूढों की खिदमत के लिए आयी थी,
कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी ?
शिज्रा-ए-रंग-व-गुल-व-बू नहीं देखा जाता,
शक की नज़रों से बहु को नहीं देखा जाता !
रुखसती होते ही माँ बाप का घर भूल गयी,
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गयी,
घर को जाती हुयी हर राहगुज़र भूल गयी,
में वह चिड़िया हूँ जो अपना ही शजर भूल गयी,
में तो जिस देश में आयी थी वही याद रहा,
होके बेवा भी मुझे सिर्फ पति याद रहा !
नफरतों ने मेरे चेहरे से उजाला छीना,
जो मेरे पास था वह चाहने वाला छीना,
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना,
मुझ से गिरजा भी लिया मेरा शिवाला छीना,
अब यह तकदीर तो बदली भी नहीं जा सकती,
में वो बेवा हूँ जो इटली भी नहीं जा सकती !
अपने घर में यह बहुत देर कहाँ रहती है,
लेके तकदीर जहाँ जाये वहां रहती है,
घर वही होता है औरत का जहाँ रहती है,
मेरे दरवाज़े पे लिख दो यहाँ माँ रहती है,
सब मेरे बाग़ के बुलबुल की तरह लगते है,
सारे बच्चे मुझे 'राहुल' की तरह लगते हैं !
हर दुखे दिल से मोहब्बत है बहु का ज़िम्मा,
घर की इज्ज़त की हिफाज़त है बहु का ज़िम्मा,
घर के सब लोंगों की खिदमत है बहु का ज़िम्मा,
नौजवानी की इबादत है बहु का ज़िम्मा आयी,
बाहर से मगर सब की चहीती बनकर,
वह बहु है जो रहे साथ में बेटी बनकर !
राना साहब आपकी हैसियत नहीं है देश से मिले सम्मान को वापस करने की। आपको देश से माफी मांगनी चाहिए । वरना देश आपको कभी माफ नहीं करेगा।
Monday, 12 October 2015
इंदौर : जल्लाद से कम नहीं अफसर और डाक्टर !
रात के दो बज रहे हैं, कुछ देर पहले ही आफिस से आया हूं, नींद नहीं आ रही है, लेकिन मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं, वजह ! इंदौर में एक ऐसा हादसा जिसने कम से कम मुझे तो बुरी तरह झकझोर कर रख ही दिया है। पूरी घटना की चर्चा करूं, इसके पहले आपका इतना जानना जरूरी है कि एक गरीब सड़क दुर्घटना में घायल हो गया, जब वो अस्पताल पहुंचा तो यहां डाक्टर इस घायल मजदूर के इलाज में कम उसके अंगदान करने पर ज्यादा रूचि लेते रहे। इतना ही नहीं पर्दे के पीछे शहर में तैनात एक बड़ा हुक्मरान लगातार प्रगति पूछता रहा कि परिवार के लोग अंगदान खासतौर पर लिवर दान के लिए तैयार हुए या नहीं ? काफी मान मनौव्वल करके आखिर में परिवार को अंगदान के लिए डाक्टरों ने तैयार कर ही लिया और इस मरीज को " ब्रेनडेड " बताकर इसका लिवर, दोनों किडनी, दोनों आंखे और स्किन निकाल ली। इसके बाद इस परिवार के साथ जो हुआ उससे अफसर, अस्पताल और डाक्टरों की हैवानियत सामने आती है। परिवार को शव सौंपने के लिए पहले इलाज का बिल चुकाने का दबाव बनाया गया, 17 हजार जमा कराने के बाद ही शव दिया गया। अस्पताल से एंबुलेंस के जरिए ये शव जब मरीज के गांव पहुंचा तो ड्राईवर शव उतारने के पहले किराए के 2800 रुपये वसूल लिए, तब लगता है कि मध्यप्रदेश में वो सब भी होता है जो यूपी और बिहार के अफसर भी करने के पहले सौ बार सोचते हैं। सच तो ये कि इन डाक्टरों और अफसरों को जल्लाद कहूं तो भी गलत नहीं है।
चलिए अब सीधे मुद्दे पर बात करते हैं। इंदौर से लगभग 150 किलोमीटर दूर खरगोन में सोमवार 5 अक्टूबर को सड़क दुर्घटना में एक मजदूर घायल हो गया, लोगों ने उसे वहां के जिला सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया। डाक्टर ने प्राथमिक चिकित्सा के बाद परिवार से कहाकि अस्पताल की सीटी स्कैन मशीन खराब है, आप बाहर से सीटी स्कैन करा लें । ये सुनकर परिवार के लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे, क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं था कि वो बाहर से सीटी स्कैन करा सकें। इस पर डाक्टर ने घायल मजदूर को ये कहकर इंदौर रैफर कर दिया कि यहां सुविधाएं नहीं है। परेशान परिजन रात करीब नौ बजे घायल मजदूर को वहां से लेकर इंदौर के लिए निकल जाते हैं।
असल कहानी यहां से शुरू होती है। तीन घंटे के रास्ते में परिवार के लोग इंदौर में रहने वाले अपने एक दूर के रिश्तेदार से बात करते हैं, जो एक साधारण सी नौकरी करता है। अंदरखाने इनकी क्या बातचीत होती है ये यही लोग बता सकते हैं, लेकिन हैरानी इस बात की हुई रात १२ बजे जब ये मरीज को लेकर इंदौर पहुंचते हैं तो वो यहां के सरकारी अस्पताल नहीं जाते, बल्कि सीधे एक प्राईवेट पांच सितारा अस्पताल में मरीज को ले जाते हैं। जबकि इस अस्पताल में मरीज को बाद में अंदर किया जाता है, पहले हजारों रुपये अंदर किए जाते हैं। अस्तपाल इस मामले में काफी बदनाम भी है, ज्यादातर लोग यहां से असंतुष्ट होकर ही जाते हैं। खैर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि जिस परिवार के पास तीन घंटे पहले सीटी स्कैन कराने के पैसे नहीं थे, अचानक ऐसी कौन सी लाटरी लगी कि वो इस लुटेरे साँरी पांच सितारा अस्पताल में आ गए। खैर यहां उनका रिश्तेदार इंतजार कर रहा था, उसने तुरंत 10 हजार रुपये जमा किए और घायल मजदूर को अस्पताल वालो ने अंदर कर लिया।
परिवार के लोगों को रात भर नहीं पता चला कि उसके मरीज का क्या हाल है, क्या इलाज चल रहा है, मरीज कोई रिस्पांड दे भी रहा है या नहीं। कुछ भी परिवार के लोगों से चर्चा नहीं हुई, हां एक दो बार ये जरूर कहा गया कि इलाज चल रहा है। अरे भाई अस्पताल है तो इलाज तो होगा ही ना, ये क्या बात हुई ? अब सुबह हो चुकी थी यानि मंगलवार का दिन और सुबह के लगभग साढे सात ही बजे होंगे कि दिल्ली से दो डाक्टर इंदौर आ गए । इन डाक्टरों ने मजदूर के परिवार को बुलाया और बात शुरू की। जानते हैं क्या बात चीत की गई ? बात ये कि कम उम्मीद है कि आपका मरीज ठीक हो, अगर ऐसा है तो आप लिवर दान कर दीजिए, किसी की जान बच जाएगी। वेवजह इंतजार करना ठीक नहीं है। सुबह साढे सात बजे ये बात शुरू हुई और हर घंटे दो घंटे पर यही बात दुहराई जाने लगी। मंगलवार को शाम होते होते अस्पताल के भी डाक्टर अंगदान पर जोर देने लगे। शर्मनाक ये कि लिवर लेने के लिए इंदौर का एक बडा हुक्मरान भी अस्पताल पहुंच गया, पर उन्होंने मरीजों से सीधे बात नहीं की, डाक्टरों के जरिए ही दबाव बनाते रहे। बहरहाल जो कुछ भी हुआ हो अगले दिन सुबह ही शहर में हलचल तेज हो गई । इस पांच सितारा अस्पताल से एयरपोर्ट तक " ग्रीन कांरीडोर " घोषित कर दिया गया । ग्रीन काँरीडोर मतलब एंबुलेंस निकले तो हर वाहन को रोक दिया जाए।
ग्रीन कारीडोर की खबर शहर में फैलते ही मीडिया सक्रिय हुई तो पता चला कि एक घायल मजदूर को डाक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया है और अब उस मजदूर के परिवार की इच्छानुसार उसका अंगदान किया जाना है। मजदूर का लिवर दिल्ली जा रहा है, जबकि किडनी और आँख, स्किन इंदौर में इस्तेमाल किया जाएगा। यहां एक बात बताना जरूरी है, चमत्कार को मेडिकल साइंस भी पूरी तरह नकारता नहीं है, उसे भी लगता है कि कई बार चमत्कार होते हैं और ऐसे मरीज ठीक हो जाते हैं जिनकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं होती है। अब देखिए यहां तो रात में मरीज भर्ती हुआ और सुबह ही डाक्टर उसका लिवर और किडनी आंख सब मांगने लगे। इसके आगे का सच सुनेंगे तो डाक्टरों और अफसर पर थूकने लगेंगे। बताया तो ये भी जा रहा है कि कुछ दिन पहले एक एक्सीडेंट हुआ था, उसके घायल का भी लिवर लेने का विचार हो रहा था, लेकिन मरीज दगा दे गया और उसने समय से पहले ही दम तोड़ दिया, इसलिए इस बार डाक्टर कोई रिश्क नहीं लेना चाहते थे।
जब तक डाक्टरों के हाथ लिवर नहीं लगा था, तब तक तो परिवार वालों को तरह तरह के लालच दिए जा रहे थे। मरीज के भाई से कहा गया कि उसके अंधे बेटे को निशुल्क आँख लगा दी जाएगी, वो देखने लगेगा। ऐसे ही ना जाने क्या क्या दिलासा दिलाया गया, लेकिन जैसे ही लिवर लेकर डाक्टरों ने दिल्ली के लिए उडान भरी, यहां घंटो से डेरा डाले रहा अफसर सबसे पहले खिसक गया। अब अस्पताल ने परिवार वालों को शव दिए जाने के पहले इलाज का पैसा देने को कहा। बहरहाल उनका जो रिश्तेदार इँदौर में मौजूद था उसने कुछ इंतजाम कर 17 हजार रुपये जमा किए। तब जाकर बाँडी दी गई, लेकिन गांव पहुंचने पर शव को उतारने से पहले ड्राईवर अड गया और उसने 2800 रुपये ऐंठ लिए।
दो दिन बाद मीडिया में जब ये खबर आई कि अस्पताल ने अंगदान करने वाले के परिवार से ऐसा बर्ताव किया तो पहले अस्पताल प्रबंधन की ओर से कहा गया कि बिल तो सवा लाख के करीब था लेकिन सिर्फ 27 हजार ही लिया गया है, लेकिन मामला तूल पकड रहा था, इसे देखकर फिर अखबार के दफ्तरों को फोन कर कहा गया कि जो पैसा लिया गया है वो वापस कर दिया जाएगा। एक दिन खबर छपी तो इंदौर से भोपाल तक डाक्टर, अफसर और नेताओं सभी के पसीने छूट गए। तुरंत एक अफसर मजदूर के गांव पहुंचा और रेडक्रास सोसाइटी की तरफ से अंगदान करने वाले परिवार को एक लाख रुपये का चेक दे आया। अगले दिन मुख्यमंत्री ने भी पांच लाख रुपये की घोषणा कर दी । मेरी समझ में नहीं आया कि ये सहायता है या फिर सौदा ?
बहरहाल अब मजदूर की मौत हो चुकी है, उसका अंतिम संस्कार भी हो चुका है, पर ये सवाल अभी भी बना हुआ है कि आखिर दिल्ली में किस बड़े आदमी को लिवर देने के लिए मजदूर की जान बचाने की कोशिश तक नहीं हुई और लिवर निकालने की डाक्टरों ने जल्दबाजी की। इंदौर के हुक्मरान ने तो नियम कायदे को भी ताख पर रख दिया और प्राईवेट अस्पताल के ओटी में पोस्टमार्टम करने के लिए सरकारी डाक्टरों को बुला लिया, जबकि नियमानुसार पोस्टमार्टम प्राईवेट अस्पताल में हो ही नहीं सकता। इससे भी लगता है कि कोई बडे नेता का रिश्तेदार होगा जिसे लिवर की जरूरत थी या फिर पैसे वाला। बहरहाल अब तड़के साढे तीन बजने वाले हैं, मन यही कह रहा है कि इँदौर का ये अफसर कहीं वाकई कातिल तो नहीं है ?
नोट : मित्रों दिल को दहला देने वाली इस घटना ने मेरी तो नींद उड़ा दी है, कहना सिर्फ इतना है कि ये वाकया हर आदमी तक पहुंचना चाहिए, जिससे मध्यप्रदेश और यहां के हुक्मरानों का असली चेहरा लोगों तक पहुंच सके । प्लीज ...
चलिए अब सीधे मुद्दे पर बात करते हैं। इंदौर से लगभग 150 किलोमीटर दूर खरगोन में सोमवार 5 अक्टूबर को सड़क दुर्घटना में एक मजदूर घायल हो गया, लोगों ने उसे वहां के जिला सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया। डाक्टर ने प्राथमिक चिकित्सा के बाद परिवार से कहाकि अस्पताल की सीटी स्कैन मशीन खराब है, आप बाहर से सीटी स्कैन करा लें । ये सुनकर परिवार के लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे, क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं था कि वो बाहर से सीटी स्कैन करा सकें। इस पर डाक्टर ने घायल मजदूर को ये कहकर इंदौर रैफर कर दिया कि यहां सुविधाएं नहीं है। परेशान परिजन रात करीब नौ बजे घायल मजदूर को वहां से लेकर इंदौर के लिए निकल जाते हैं।
असल कहानी यहां से शुरू होती है। तीन घंटे के रास्ते में परिवार के लोग इंदौर में रहने वाले अपने एक दूर के रिश्तेदार से बात करते हैं, जो एक साधारण सी नौकरी करता है। अंदरखाने इनकी क्या बातचीत होती है ये यही लोग बता सकते हैं, लेकिन हैरानी इस बात की हुई रात १२ बजे जब ये मरीज को लेकर इंदौर पहुंचते हैं तो वो यहां के सरकारी अस्पताल नहीं जाते, बल्कि सीधे एक प्राईवेट पांच सितारा अस्पताल में मरीज को ले जाते हैं। जबकि इस अस्पताल में मरीज को बाद में अंदर किया जाता है, पहले हजारों रुपये अंदर किए जाते हैं। अस्तपाल इस मामले में काफी बदनाम भी है, ज्यादातर लोग यहां से असंतुष्ट होकर ही जाते हैं। खैर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि जिस परिवार के पास तीन घंटे पहले सीटी स्कैन कराने के पैसे नहीं थे, अचानक ऐसी कौन सी लाटरी लगी कि वो इस लुटेरे साँरी पांच सितारा अस्पताल में आ गए। खैर यहां उनका रिश्तेदार इंतजार कर रहा था, उसने तुरंत 10 हजार रुपये जमा किए और घायल मजदूर को अस्पताल वालो ने अंदर कर लिया।
परिवार के लोगों को रात भर नहीं पता चला कि उसके मरीज का क्या हाल है, क्या इलाज चल रहा है, मरीज कोई रिस्पांड दे भी रहा है या नहीं। कुछ भी परिवार के लोगों से चर्चा नहीं हुई, हां एक दो बार ये जरूर कहा गया कि इलाज चल रहा है। अरे भाई अस्पताल है तो इलाज तो होगा ही ना, ये क्या बात हुई ? अब सुबह हो चुकी थी यानि मंगलवार का दिन और सुबह के लगभग साढे सात ही बजे होंगे कि दिल्ली से दो डाक्टर इंदौर आ गए । इन डाक्टरों ने मजदूर के परिवार को बुलाया और बात शुरू की। जानते हैं क्या बात चीत की गई ? बात ये कि कम उम्मीद है कि आपका मरीज ठीक हो, अगर ऐसा है तो आप लिवर दान कर दीजिए, किसी की जान बच जाएगी। वेवजह इंतजार करना ठीक नहीं है। सुबह साढे सात बजे ये बात शुरू हुई और हर घंटे दो घंटे पर यही बात दुहराई जाने लगी। मंगलवार को शाम होते होते अस्पताल के भी डाक्टर अंगदान पर जोर देने लगे। शर्मनाक ये कि लिवर लेने के लिए इंदौर का एक बडा हुक्मरान भी अस्पताल पहुंच गया, पर उन्होंने मरीजों से सीधे बात नहीं की, डाक्टरों के जरिए ही दबाव बनाते रहे। बहरहाल जो कुछ भी हुआ हो अगले दिन सुबह ही शहर में हलचल तेज हो गई । इस पांच सितारा अस्पताल से एयरपोर्ट तक " ग्रीन कांरीडोर " घोषित कर दिया गया । ग्रीन काँरीडोर मतलब एंबुलेंस निकले तो हर वाहन को रोक दिया जाए।
ग्रीन कारीडोर की खबर शहर में फैलते ही मीडिया सक्रिय हुई तो पता चला कि एक घायल मजदूर को डाक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया है और अब उस मजदूर के परिवार की इच्छानुसार उसका अंगदान किया जाना है। मजदूर का लिवर दिल्ली जा रहा है, जबकि किडनी और आँख, स्किन इंदौर में इस्तेमाल किया जाएगा। यहां एक बात बताना जरूरी है, चमत्कार को मेडिकल साइंस भी पूरी तरह नकारता नहीं है, उसे भी लगता है कि कई बार चमत्कार होते हैं और ऐसे मरीज ठीक हो जाते हैं जिनकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं होती है। अब देखिए यहां तो रात में मरीज भर्ती हुआ और सुबह ही डाक्टर उसका लिवर और किडनी आंख सब मांगने लगे। इसके आगे का सच सुनेंगे तो डाक्टरों और अफसर पर थूकने लगेंगे। बताया तो ये भी जा रहा है कि कुछ दिन पहले एक एक्सीडेंट हुआ था, उसके घायल का भी लिवर लेने का विचार हो रहा था, लेकिन मरीज दगा दे गया और उसने समय से पहले ही दम तोड़ दिया, इसलिए इस बार डाक्टर कोई रिश्क नहीं लेना चाहते थे।
जब तक डाक्टरों के हाथ लिवर नहीं लगा था, तब तक तो परिवार वालों को तरह तरह के लालच दिए जा रहे थे। मरीज के भाई से कहा गया कि उसके अंधे बेटे को निशुल्क आँख लगा दी जाएगी, वो देखने लगेगा। ऐसे ही ना जाने क्या क्या दिलासा दिलाया गया, लेकिन जैसे ही लिवर लेकर डाक्टरों ने दिल्ली के लिए उडान भरी, यहां घंटो से डेरा डाले रहा अफसर सबसे पहले खिसक गया। अब अस्पताल ने परिवार वालों को शव दिए जाने के पहले इलाज का पैसा देने को कहा। बहरहाल उनका जो रिश्तेदार इँदौर में मौजूद था उसने कुछ इंतजाम कर 17 हजार रुपये जमा किए। तब जाकर बाँडी दी गई, लेकिन गांव पहुंचने पर शव को उतारने से पहले ड्राईवर अड गया और उसने 2800 रुपये ऐंठ लिए।
दो दिन बाद मीडिया में जब ये खबर आई कि अस्पताल ने अंगदान करने वाले के परिवार से ऐसा बर्ताव किया तो पहले अस्पताल प्रबंधन की ओर से कहा गया कि बिल तो सवा लाख के करीब था लेकिन सिर्फ 27 हजार ही लिया गया है, लेकिन मामला तूल पकड रहा था, इसे देखकर फिर अखबार के दफ्तरों को फोन कर कहा गया कि जो पैसा लिया गया है वो वापस कर दिया जाएगा। एक दिन खबर छपी तो इंदौर से भोपाल तक डाक्टर, अफसर और नेताओं सभी के पसीने छूट गए। तुरंत एक अफसर मजदूर के गांव पहुंचा और रेडक्रास सोसाइटी की तरफ से अंगदान करने वाले परिवार को एक लाख रुपये का चेक दे आया। अगले दिन मुख्यमंत्री ने भी पांच लाख रुपये की घोषणा कर दी । मेरी समझ में नहीं आया कि ये सहायता है या फिर सौदा ?
बहरहाल अब मजदूर की मौत हो चुकी है, उसका अंतिम संस्कार भी हो चुका है, पर ये सवाल अभी भी बना हुआ है कि आखिर दिल्ली में किस बड़े आदमी को लिवर देने के लिए मजदूर की जान बचाने की कोशिश तक नहीं हुई और लिवर निकालने की डाक्टरों ने जल्दबाजी की। इंदौर के हुक्मरान ने तो नियम कायदे को भी ताख पर रख दिया और प्राईवेट अस्पताल के ओटी में पोस्टमार्टम करने के लिए सरकारी डाक्टरों को बुला लिया, जबकि नियमानुसार पोस्टमार्टम प्राईवेट अस्पताल में हो ही नहीं सकता। इससे भी लगता है कि कोई बडे नेता का रिश्तेदार होगा जिसे लिवर की जरूरत थी या फिर पैसे वाला। बहरहाल अब तड़के साढे तीन बजने वाले हैं, मन यही कह रहा है कि इँदौर का ये अफसर कहीं वाकई कातिल तो नहीं है ?
नोट : मित्रों दिल को दहला देने वाली इस घटना ने मेरी तो नींद उड़ा दी है, कहना सिर्फ इतना है कि ये वाकया हर आदमी तक पहुंचना चाहिए, जिससे मध्यप्रदेश और यहां के हुक्मरानों का असली चेहरा लोगों तक पहुंच सके । प्लीज ...
Tuesday, 29 September 2015
इंदौर: कभी पी नहीं, फिर भी कर रहे शराब की बुराई !
आजकल इंदौर में हूं, बड़ा सात्विक शहर है, मैं भी आज सुबह ही शहर के राजा यानि " खजराना गणेश " जी के दर्शन करके आया हूं। अभी यहां गणेश उत्सव चल रहा था, आज ही खत्म हुआ है, कहते हैं कि गणेश उत्सव के दौरान घर-घर गणेश जी विराजते हैं, इसलिए इस दौरान शराब वगैरह नहीं पीना चाहिए। रविवार को दोपहर १२.०६ बजे गणेश जी का विसर्जन होते ही श्राद्ध शुरू हो गया, अब शराब तो श्राद्ध में भी नहीं पी जाती और श्राद्ध खत्म होते ही नवरात्र की शुरुआत। अब मित्रों ऐसे तो नहीं चल सकता ना। एक बात बताऊँ, इंदौर में हर आदमी शराब का विरोधी है, कुछ दिन पहले सूबे की सरकार ने शराब की दुकानों के बंद होने का समय रात ११ से बढ़ाकर ११.३० कर दिया, इस बात पर शहर में बवाल हो गया, इसके खिलाफ अखबार के पन्ने रंग गए, कोर्ट में जनहित याचिका लग गई। मैने भी सोचा ये क्या हो गया है सूबे के मुख्यमंत्री को ... बेवजह बैठे बिठाए विवादों को जन्म दे दिया। खैर इंदौर के बारे में ये बताना भी जरूरी है कि शहर में जहां मैं रहता हूं, उसके करीब में ही कई नेशनल बैंक की शाखाएं हैं और इससे बिल्कुल लगी हुई व्हिस्की की एक बड़ी दुकान है, लेकिन यहां सुबह बैंक से पहले व्हिस्की की दुकान खुल जाती है और बैंक मे कस्टमर हों या ना हों शराब की दुकान पर रौनक जरूर रहती है। इंदौर में हर समाज के लोग शराब पीते तो हैं, लेकिन दुकान से खुद शराब खरीदने से डरते हैं, वजह ये कि कोई देख ना ले। इसलिए यहां ज्यादातर शराब की दुकानों के आस पास कुछ लड़के खड़े मिल जाएंगे जो शराब की दुकान से दूर खड़ी कारों में शराब पहुंचा देते हैं।
ये तो रही शराब की दुकानों की बात ! थोड़ी चर्चा नानवेज की भी जरूरी है। बात पुरानी है, मैं यहां अपने पारिवारिक मित्र के साथ एक दिन कारोबार पर था । ( नया शहर है, शायद कारोबार ना समझे, इसलिए बताना जरूरी है, कारोबार बोले तो कार में बार ) हम लोगों ने अपनी कार शहर के जाने माने नानवेज ठेले ( गुरुद्वारे के पास ) पर रोकी, मैं थोड़ा खुश भी हुआ कि बिल्कुल भीड़ नहीं है, तुरंत नानवेज मिल जाएगा। यहां पर खासतौर पर चिकन फ्राई और फिश फ्राई ज्यादा टेस्टी है। ठेलेवाले को आर्डर देने के काफी देर बाद तक जब उसने हमें फिश और चिकन नहीं दिया तो मैं कार से उतरा और पूछा कि तुम्हारे पास एक भी ग्राहक नहीं है और इतनी देर हो गई, अभी तक हमें नहीं दिया। दुकानदार ने बड़े ही मासूमियत से कहा " बाबू जी आस पास २०० मीटर तक की दूरी पर जितनी भी गाड़िया खड़ी हैं, सभी के आर्डर हैं, इन सभी गाडियों में लोग ड्रिंक्स ले रहे हैं, ठेले के पास गाड़ी इसलिए खड़ी नहीं करते कि कोई देख ना ले, ज्यादातर लोग यहां चोरी से नानवेज खाते हैं। आपके आर्डर में थोड़ा समय और लगेगा। " मेरा माथा ठनका, खुद से सवाल किया, क्या है ये शहर, होता सब है लेकिन चोरी से ।
अच्छा खास बात ये कि नानवेज और शराब की बुराई करने में वो लोग शामिल हैं जिनको इसका दो पैसे का अनुभव नहीं है । इन लोगों ने न कभी शराब पर पैसे खर्च किए और ना ही लाइन में लगकर मटन की शाप से मांस खरीदा। ऐसे लोग जब शराब और नानवेज की बुराई करते हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पीड़ा होती है। मुझे नानवेज का बचपन से और ड्रिंक्स का पिछले २५ साल का पर्याप्त अनुभव है और मैं पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि कुछ बातों का ख्याल भर रख लिया जाए तो ये दारू आपके लिए दवा बन जाती है और कई गंभीर बीमारियों के बीच में पत्थर की तरह खड़ी हो जाती है। जो नहीं जानते वो कुछ भी कहें, लेकिन रिसर्च में आई कुछ जानकारी आप से शेयर करना चाहता हूं, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में व्हिस्की की बिक्री में काफी बढ़ोत्तरी हुई हैं । सच ये है कि अल्कोहल में भी लोगों का फेवरेट ब्रांड व्हिस्की बनता जा रहा है। आप हंसेंगे या फिर इसे जोक समझेगें, लेकिन सही ये है कि व्हिस्की के कई फायदे भी हैं।
व्हिस्की से वजन नहीं बढता : आमतौर पर नासमझ लोग बीयर पीते हैं, जबकि कई साऱी मिक्स ड्रिंक्स पीने से बेहतर है कि लो कैलोरी वाली व्हिस्की पी जाए। जानकारों की माने तो व्हिस्की में कार्बोहाइड्रेट का पर्याप्त श्रोत पाया जाता है, इसके एक पैग में सिर्फ ५ केलोरी होती है, जिससे मोटापा नहीं नहीं बढ़ता है और ये आपके पाचन को भी दुरुस्त रखती है।
ह्दय के स्वास्थ के लिए फायदेमंद : डार्क बीयर और वाइन के अलावा व्हिस्की भी ऐसा पदार्थ है जो कि ह्रदय के लिए काफी फायदेमंद है, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर व्हिस्की हार्ट अटैक के खतरे को कम करती है, इतना ही नहीं ये गुड कॉलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाता है।
कैंसर से लड़ने में मदद : व्हिस्की में एलाजिक एसिड, एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ये शरीर में कैंसर से लड़ने की क्षमता बढ़ती है, इतना ही नहीं, व्हिस्की केंसरे के मरीजों को होने वाली कीमोथेरेपी के प्रभाव को भी कम करता है।
दिमाग की सेहत को रखती है तंदरूस्त : कई रिसर्च अब ये बात साबित कर चुकी हैं कि व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से अल्जाइमर बीमारी और डिमेन्शिया के खतरे को कम किया जा सकता है, इथेनोल की अच्छी मात्रा होने के कारण ये दिमाग के न्यूरॉन्स को सक्रिय रखने में मदद करता है, इससे याददाश्त ठीक रहती है।
स्ट्रोक के खतरे को करती है कम : क्योंकि ये बैड कॉलेस्ट्रॉल को कम करता है इस वजह से स्ट्रोक का खतरा भी कम हो जाता है, व्हिस्की धमनियों में खून क्लॉट होने से रोकने में मदद करती है, जिससे दिल के दौरे का खतरा काफी कम हो जाता है।
तनाव को करता है कम : ये तो सभी जानते हैं तनाव ना सिर्फ शरीर को बीमार करता है बल्कि इससे मेंटल हेल्थ भी प्रभावित होती है, ऐसे में व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से तनाव दूर होता है और नर्व्स को आराम मिलता है.
मधुमेह के रोगियों के लिए भी फायदेमंद : व्हिस्की में शुगर की मात्रा कम होती है ऐसे में ये उन लोगों के लिए परफेक्ट ड्रिंक हो सकती है जो डायबिटीज के शिकार है, यहां याद रखना होगा कि रम जरूर शूगर को बढाता है। रम और व्हिस्की में अंतर करना जरूरी है।
चलते- चलते
दो दिन पहले इंदौर में बकरीद पर हुई नमाज के बाद अपनी तकरीर में शहर काजी ने कहाकि कुछ स्थानों पर मुश्लिम महिलाएं नशे का सेवन कर रही हैं, उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। हालाकि नशा करना ठीक नहीं है, ये बात सौ प्रतिशत सही है, पर मुझे पता नहीं क्यों लगता है कि अब मुश्लिम महिलाएं भी देश की मुख्यधारा से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं।
ये तो रही शराब की दुकानों की बात ! थोड़ी चर्चा नानवेज की भी जरूरी है। बात पुरानी है, मैं यहां अपने पारिवारिक मित्र के साथ एक दिन कारोबार पर था । ( नया शहर है, शायद कारोबार ना समझे, इसलिए बताना जरूरी है, कारोबार बोले तो कार में बार ) हम लोगों ने अपनी कार शहर के जाने माने नानवेज ठेले ( गुरुद्वारे के पास ) पर रोकी, मैं थोड़ा खुश भी हुआ कि बिल्कुल भीड़ नहीं है, तुरंत नानवेज मिल जाएगा। यहां पर खासतौर पर चिकन फ्राई और फिश फ्राई ज्यादा टेस्टी है। ठेलेवाले को आर्डर देने के काफी देर बाद तक जब उसने हमें फिश और चिकन नहीं दिया तो मैं कार से उतरा और पूछा कि तुम्हारे पास एक भी ग्राहक नहीं है और इतनी देर हो गई, अभी तक हमें नहीं दिया। दुकानदार ने बड़े ही मासूमियत से कहा " बाबू जी आस पास २०० मीटर तक की दूरी पर जितनी भी गाड़िया खड़ी हैं, सभी के आर्डर हैं, इन सभी गाडियों में लोग ड्रिंक्स ले रहे हैं, ठेले के पास गाड़ी इसलिए खड़ी नहीं करते कि कोई देख ना ले, ज्यादातर लोग यहां चोरी से नानवेज खाते हैं। आपके आर्डर में थोड़ा समय और लगेगा। " मेरा माथा ठनका, खुद से सवाल किया, क्या है ये शहर, होता सब है लेकिन चोरी से ।
अच्छा खास बात ये कि नानवेज और शराब की बुराई करने में वो लोग शामिल हैं जिनको इसका दो पैसे का अनुभव नहीं है । इन लोगों ने न कभी शराब पर पैसे खर्च किए और ना ही लाइन में लगकर मटन की शाप से मांस खरीदा। ऐसे लोग जब शराब और नानवेज की बुराई करते हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पीड़ा होती है। मुझे नानवेज का बचपन से और ड्रिंक्स का पिछले २५ साल का पर्याप्त अनुभव है और मैं पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि कुछ बातों का ख्याल भर रख लिया जाए तो ये दारू आपके लिए दवा बन जाती है और कई गंभीर बीमारियों के बीच में पत्थर की तरह खड़ी हो जाती है। जो नहीं जानते वो कुछ भी कहें, लेकिन रिसर्च में आई कुछ जानकारी आप से शेयर करना चाहता हूं, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में व्हिस्की की बिक्री में काफी बढ़ोत्तरी हुई हैं । सच ये है कि अल्कोहल में भी लोगों का फेवरेट ब्रांड व्हिस्की बनता जा रहा है। आप हंसेंगे या फिर इसे जोक समझेगें, लेकिन सही ये है कि व्हिस्की के कई फायदे भी हैं।
व्हिस्की से वजन नहीं बढता : आमतौर पर नासमझ लोग बीयर पीते हैं, जबकि कई साऱी मिक्स ड्रिंक्स पीने से बेहतर है कि लो कैलोरी वाली व्हिस्की पी जाए। जानकारों की माने तो व्हिस्की में कार्बोहाइड्रेट का पर्याप्त श्रोत पाया जाता है, इसके एक पैग में सिर्फ ५ केलोरी होती है, जिससे मोटापा नहीं नहीं बढ़ता है और ये आपके पाचन को भी दुरुस्त रखती है।
ह्दय के स्वास्थ के लिए फायदेमंद : डार्क बीयर और वाइन के अलावा व्हिस्की भी ऐसा पदार्थ है जो कि ह्रदय के लिए काफी फायदेमंद है, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर व्हिस्की हार्ट अटैक के खतरे को कम करती है, इतना ही नहीं ये गुड कॉलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाता है।
कैंसर से लड़ने में मदद : व्हिस्की में एलाजिक एसिड, एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ये शरीर में कैंसर से लड़ने की क्षमता बढ़ती है, इतना ही नहीं, व्हिस्की केंसरे के मरीजों को होने वाली कीमोथेरेपी के प्रभाव को भी कम करता है।
दिमाग की सेहत को रखती है तंदरूस्त : कई रिसर्च अब ये बात साबित कर चुकी हैं कि व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से अल्जाइमर बीमारी और डिमेन्शिया के खतरे को कम किया जा सकता है, इथेनोल की अच्छी मात्रा होने के कारण ये दिमाग के न्यूरॉन्स को सक्रिय रखने में मदद करता है, इससे याददाश्त ठीक रहती है।
स्ट्रोक के खतरे को करती है कम : क्योंकि ये बैड कॉलेस्ट्रॉल को कम करता है इस वजह से स्ट्रोक का खतरा भी कम हो जाता है, व्हिस्की धमनियों में खून क्लॉट होने से रोकने में मदद करती है, जिससे दिल के दौरे का खतरा काफी कम हो जाता है।
तनाव को करता है कम : ये तो सभी जानते हैं तनाव ना सिर्फ शरीर को बीमार करता है बल्कि इससे मेंटल हेल्थ भी प्रभावित होती है, ऐसे में व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से तनाव दूर होता है और नर्व्स को आराम मिलता है.
मधुमेह के रोगियों के लिए भी फायदेमंद : व्हिस्की में शुगर की मात्रा कम होती है ऐसे में ये उन लोगों के लिए परफेक्ट ड्रिंक हो सकती है जो डायबिटीज के शिकार है, यहां याद रखना होगा कि रम जरूर शूगर को बढाता है। रम और व्हिस्की में अंतर करना जरूरी है।
चलते- चलते
दो दिन पहले इंदौर में बकरीद पर हुई नमाज के बाद अपनी तकरीर में शहर काजी ने कहाकि कुछ स्थानों पर मुश्लिम महिलाएं नशे का सेवन कर रही हैं, उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। हालाकि नशा करना ठीक नहीं है, ये बात सौ प्रतिशत सही है, पर मुझे पता नहीं क्यों लगता है कि अब मुश्लिम महिलाएं भी देश की मुख्यधारा से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं।
Sunday, 9 August 2015
UP : कम से कम भ्रष्टाचार में तो ईमानदारी हो
माननीय अखिलेश यादव जी
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ
विषय : भ्रष्टाचार को ईमानदारी से लागू करने के संबंध में
महोदय,
मैं आपसे ऐसी कोई मांग नहीं करना चाहता जो संभव न हो, मै ये भी नहीं चाहता कि आप दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह भ्रष्टाचार पर बड़ी बड़ी बातें करें और फिर भ्रष्टाचारियों को खुद ही संरक्षण दें। अखिलेश जी मेरी मांग बहुत ही व्यवहारिक है और इसे लागू करने से सरकार की आमदनी तो बढेगी ही, प्रदेश के लोगों का सरकार पर भरोसा भी बढेगा। खास बात ये है कि इस योजना को लागू करने से सरकार पर किसी तरह का अतिरिक्त बोझ भी नहीं बढ़ने वाला है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इससे जनता की शिकायतें भी कम हो जाएंगी। बस सर भ्रष्टाचार को ईमानदारी से लागू कर दीजिए।
कैसे करना है ? चलिए ये भी मैं बताता हूं। केंद्र सरकार की तर्ज पर कीजिए। केंद्र सरकार रेलवे में " तत्काल टिकट " के नाम पर अतिरिक्त पैसे वसूल रही है ना ! एक ही क्लास, एक ही ट्रेन, एक ही डिब्बे में आमने सामने बैठे यात्री अलग - अलग किराया देकर आराम से सफर करते हैं ना ! आज तक किसी ने इसकी शिकायत की ? ये वो सरकारी भ्रष्टाचार है जो लीगल है। अब तो रेलवे ने प्रीमियम ट्रेन के नाम पर और अधिक पैसे वसूलने की तैयारी कर ली ।
केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय का उदाहरण ले लीजिए, पासपोर्ट बनवाने की फीस है १५०० रुपये, लेकिन आपको तत्काल ये सुविधा चाहिए तो दो हजार रुपये अतिरिक्त देने पर ये काम भी आसानी से हो जाता है। आपको तय समय के भीतर पासपोर्ट मिल जाता है। ये भी तो भ्रष्टाचार का काउंटर ही है मुख्यमंत्री जी।
एक और उदाहरण देता हूं ! भारतीय डाक तार विभाग ने क्या किया ? एक ही वजन और दूरी के पत्र को निर्धारित स्थान पर पहुंचाने का अलग अलग कीमत वसूल रहा है। इसे नाम दिया गया है स्पीड पोस्ट ! धडल्ले से सरकार काउंटर खोलकर जनता को बेशर्मी से चूना लगा रही है।
अखिलेश जी, आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप भी सूबे में भ्रष्टाचार का काउंटर खोल दीजिए, अतिरिक्त पैसे वसूलना शुरू कीजिए, लेकिन इसके लिए बकायदा काउंटर खुलवा दीजिए। आज उत्तर प्रदेश में कोई भी काम बिना पैसे के नहीं हो रहा है। हर छोटे छोटे काम के लिए पैसे दिए जा रहे हैं, फिर भी मुख्यमंत्री जी काम नहीं हो रहा है।
उदाहरण के लिए आपको बताऊं...
मै खुद अपनी बेटी के लर्निंग लाइसेंस के लिए जुलाई १५ में लखनऊ के आरटीओ आफिस गया और नियम के तहत लर्निंग लाइसेंस बनवाने के लिए पूरा दिन लगाया। कई कतार में लगा, सारे अभिलेख चेक कराए, आफिस में फोटो खिंच गए, लेकिन जब टेस्ट हुआ तो जो बेटी हाईस्कूल और इंटर में प्रथम श्रेणी में पास है, वो इस परीक्षा में फेल हो गई। आरटीओ आफिस से एक पत्र थमाया गया कि १५ दिन में दोबारा टेस्ट दीजिए।
मुख्यमंत्री जी आपको पता है सुबह ११ बजे से शाम को पांच बजे तक आरटीओ आफिस में जुटे रहने के बाद सिर्फ फेल का रिजल्ट ही मेरे हाथ लगा। वापस लौट रहा था तो एक दलाल ने टोका, भाई साहब अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। पांच सौ रुपये मैने दिए और पांच छह दिन बाद जुलाई में ही मेरे पास लर्निंग लाइसेंस आ गया। मुख्यमंत्री जी मै आपको फेल का लेटर और लाइसेंस दोनों दिखा सकता हूं।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। एक बार जब लर्निंग लाइसेंस बन गया तो लगा कि अब छह महीने के भीतर स्थाई लाइसेंस बनवाने में कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन बेटी दौड़ भाग करती रही और स्थाई लाइसेंस नहीं बन पाया। नजीता ये हुआ कि जनवरी के बाद लर्निंग लाइसेंस के छह महीने पूरे हो गए और स्थाई नहीं बन पाया। अब बताया गया कि फिर से लर्निंग लाइसेंस बनवाना होगा।
मुख्यमंत्री जी अगले लाइसेंस के लिए ७०० रुपये दलाल को दे आया हूं, १० दिन बीत गए, लेकिन अभी तक लाइसेंस नहीं आया है। आप से प्रार्थना है कि इस भ्रष्टाचार को ईमानदारी से लागू कर दें, तत्काल लाइसेंस जैसी व्यवस्था कर दें, क्योंकि आपके राज में ९५ फीसदी लाइसेंस दलालों के जरिए ही बनते हैं। लाइन में लगने वालों को साजिश के तहत टेस्ट में फेल कर दिया जाता है।
हम रेलवे में तत्काल टिकट लेते हैं, मुझे कोई दिक्कत नहीं है, जिन्हें जल्दी पासपोर्ट लेना होता है वो अधिक पैसे देकर पासपोर्ट बनवाते हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, अधिक पैसे देकर स्पीड पोस्ट से डाक भेजते हैं, हमें कोई दिक्कत नहीं है। प्लीज आप " सुविधा शुल्क " काउंटर की व्यवस्था कर दें, इससे कम से कम हमें अधिक पैसे देने पर सरकार की ओर से एक रसीद और भरोसा तो मिलेगा ना कि हमारा काम हो जाएगा। दलाल को पैसे भी देते हैं और भरोसा के साथ गारंटी भी नहीं कि काम हो ही जाएगा।
मुझे उम्मीद है कि मेरी बात पर ध्यान देंगे और जल्दी ही ऐसी व्यवस्था जरूर करेंगे, जिससे प्रदेश में ईमानदारी से भ्रष्टाचार को लागू किया जा सके।
आपका
महेन्द्र श्रीवास्तव
९८७१०९६६२६
लखनऊ
Thursday, 26 February 2015
रेल बजट : डरपोक नजर आए प्रभु !
रेल बजट से सिर्फ निराशा ही नहीं हुई बल्कि इस बजट ने रेलवे बोर्ड के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं ! बजट पर बात करूंगा, लेकिन पहले रेलवे बोर्ड की प्रासंगिकता पर बात करना जरूरी हो गया है। इस बजट को सुनने के बाद मन में जो पहला सवाल है वो ये कि रेलवे बोर्ड की आखिर जरूरत क्या है ? जर्नलिज्म से जुड़े होने की वजह से मेरा 15 - 20 साल से रेलवे और बोर्ड के तमाम अफसरों से संपर्क रहा है, इसलिए रेलवे के सिस्टम को बखूबी समझता हूं। बोर्ड में मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरों की जबर्दस्त खेमेबंदी है। दोनों गुट की कोशिश रहती है कि बोर्ड में उनकी तूती बोलती रहे, इसके लिए ये बहुत नीचे तक गिर जाते हैं। खैर इस मसले पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी, आज मैं ये जानना चाहता हूं कि रेलवे बोर्ड के पास ना कोई प्लानिंग है ना कोई विजन है और ना ही कोई सिस्टम है, ऐसे में रेलवे को इस हाथी ( रेलवे बोर्ड ) की जरूरत क्यों है ? ये इंजीनियर ट्रेन को पटरी से उतार देगें, वरना मेरा तो यही मानना है कि बोर्ड का प्रबंधन इंजीनियरों से लेकर IAS को सौंप दिया जाना चाहिए, क्योंकि मुझे लगता है कि योजना, बजट, अनुशासन ये सब एक इंजीनियर के मुकाबले IAS बेहतर कर सकता है।
आइये बजट पर चर्चा करते हैं। रेलमंत्री सुरेश प्रभु पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट है, इसलिए वो गुणा भाग में माहिर हैं। उनकी ये महानता बजट में दिखाई दी और उन्होंने सबसे बड़ा झूठ ये कहाकि आज रेलवे का आँपरेशन रेसियो 88.5 है। मतलब रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए 88.50 रुपये खर्च करता है। सच्चाई ये है कि रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए करीब 113 रुपये खर्च करती है। वैसे प्रभु आपकी लीला अपंरपार है, आपने कहा कि अभी तक लोग 60 दिन पहले का ही रिजर्वेशन करा सकते थे, जिसे बढ़ाकर 120 दिन कर दिया गया है। मतलब लगभग पांच हजार करोड रूपये बिना सफर कराए ही एडवांस में रेलवे के खाते में जमा हो जाएंगे । यात्रियों की इस रकम पर बैंक तो रेलवे को ब्याज देगा, लेकिन टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो रेलवे यात्री को पूरा पैसा तक वापस नहीं करेगी, वो कैंसिलेशन चार्ज वसूलेगी। फिर चार महीने बाद क्या होगा ये साधारण यात्री तो नहीं जानता, ये तो प्रभु आपको ही पता हो सकता है।
प्रभु आपका ये ऐलान कि ट्रेनों और प्लेटफार्म पर विज्ञापन के जरिए रेलवे आय का स्रोत बढाएगी, ये बात तो समझ में आती है। लेकिन आप का ये ऐलान गले नहीं उतरा कि कंपनियों के नाम पर स्टेशन और ट्रेन का नाम रखकर बड़ी रकम वसूल की जाएगी। मुझे याद है कि पूर्व रेलमंत्री स्व. कमलापति त्रिपाठी ने एक बार रेल के अफसरों को इसीलिए लताड लगाई थी कि वो ट्रेनों का नाम ठीक तरह से नहीं रखते थे। पहले ट्रेन का नाम होता था, बाम्बे मेल, तूफान मेल, कालका मेल आदि आदि। स्व. त्रिपाठी ने कहाकि ट्रेन के नाम सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पहचान के आधार पर रखे जाएं। उनके समय में जो भी ट्रेनें चलीं उनका नाम बहुत सोच समझ कर रखा जाता था, जैसे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, त्रिवेणी एक्सप्रेस, गंगा गोमती एक्सप्रेस, हिमगिरी एक्सप्रेस इत्यादि। लेकिन प्रभु आपके ऐलान के बाद तो लगता है कि ट्रेनों का नाम होगा एमडीएच चिकन मसाला एक्सप्रेस, कुरकुरे एक्सप्रेस, पेप्सी मेल, सहारा एक्सप्रेस, जाँकी अंडरवियर सुपरफास्ट ट्रेन, तुफान बीडी मेल, बेगपाईपर सुपर फास्ट ! ये सब क्या है प्रभू ?
वैसे प्रभु एक बात बताऊं, पूर्व रेलमंत्री लालू यादव को आज मैं वाकई याद कर रहा हूं। लालू का मैं बड़ा आलोचक रहा हूं, लेकिन आपके बजट के बाद इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि लालू बजट पर मेहनत करते थे और उनके बजट में रेलवे के मुनाफे के साथ दूरदर्शिता दिखाई देती थी। लालू ने रेलवे बोर्ड के इंजीनियरों पर आंख मूंद कर कभी भरोसा नहीं किया, वो अपने साथ बिहार कैडर के कुछ आईएएस अफसरों को अपना OSD बनाकर बोर्ड में बैठा दिया था। नतीजा ये हुआ कि बिगडैल इंजीनियरों पर लगाम कसा जा सका। सच कहूं प्रभु आपका बजट तो मैं अभी तक यही नहीं समझ पा रहा हूं कि ये है किसके लिए ? इसे ना यात्रियों का बजट कह सकते है, ना रेल कर्मचारियों का बजट कह सकते हैं और ना ही व्यापारियों का बजट कह सकते हैं। संसद में आपने साफ-साफ बता दिया कि दिल्ली मुंबई राजधानी की औसत गति सिर्फ 79 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि दूसरी राजधानी की औसत गति तो 55 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटा ही है। इसलिए प्रभु जी आपने ऐलान किया कि आप कुल 9 रेलमार्ग पर गति सीमा बढ़ाएंगे। पता नहीं आपको याद है या नहीं, लेकिन ये काम लालू यादव ने शुरू किया था, उन्होंने सबसे पहले दिल्ली से आगरा तक भोपाल शताब्दी को 150 किलोमीटर की रफ्तार से चलाने की कोशिश की। कई साल काम चला, रेलवे ने 180 करोड रुपये ज्यादा पटरियों को अपग्रेड करने पर खर्च भी किया। लेकिन आज भी भोपाल शताब्दी की औसत गति 110 - 120 किलोमीटर ही है। मुझे लगता है कि बोर्ड के इंजीनियरों ने मोटा माल बनाने के लिए पुरानी पटरी को अपग्रेड करने का तरीका तलाशा है।
साफ-सफाई तो खैर जितना भी हो कम है, इस पर आपने ध्यान दिया है अच्छी बात है। लेकिन फिर मुझे कहना पड़ रहा है कि बोगी में बायो टायलेट की शुरुआत पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ना सिर्फ अपने बजट में कर चुके है, बल्कि उनके समय में ही आईआरडीएसओ ने एक बोगी तैयार कर दिल्ली में इसका प्रदर्शन भी किया था। इस दौरान लालू के साथ कैबिनेट मंत्री रहीं अंबिका सोनी भी मौजूद थीं। आपने कहाकि मेक इन इंडिया के तहत इंजन, बोगी, पहिए देश में बनाए जाएंगे। प्रभु देश में तो आज भी ये तीनों चीजें बन रही हैं, हां जरूरत के मुताबिक उत्पादन नही कर पा रहे हैं। सफर के दौरान यूज एंड थ्रो बेडरोल की बात नई जरूर है, बहरहाल इसका इंतजार रहेगा। ये अच्छा प्रयास है।
प्रभु आपके एक ऐलान से तो मेरा पूरा परिवार हंसते हंसते थक गया। आपने कहाकि चार महीने पहले आप ट्रेन का टिकट ले सकते हैं और टिकट लेने के दौरान ही मनचाहे खाने का आर्डर भी IRCTC के जरिए आँनलाइन ही कर सकते है। पहला तो ये कि जहां लोग सुबह नाश्ते के बाद सोचते हों कि लंच में क्या खाया जाए, वहां आप चार महीने पहले खाने के आर्डर को मनचाहा खाना बता रहे हैं। चलिए ये तो कोई खास नहीं.. लेकिन एक वाकया बताता हूं। दिल्ली से गोवा जा रहा था, ट्रेन को दोपहर एक बजे भोपाल पहुंचना था, एक मित्र ने कहाकि भोपाल में वो खाना लेकर आएंगे ! ट्रेन 6 घंटे लेट हो गई और हम सभी बिस्किट खाकर भूख से जूझते रहे। ट्रेनों की लेट लतीफी के बीच अगर यात्री भोजन का इंतजार करता रहा तो उसका भगवान ही मालिक है।
जनरल कोच में मोबाइल चार्ज करने की सुविधा दे रहे हैं, लेकिन प्रभु कुछ ऐसा कीजिए कि सामान्य श्रेणी के कोच में यात्री आराम से सफर भर कर सके, तो भी चल जाएगा। स्टेशन पर फ्री वाईफाई भी गैरजरूरी बात लगती है, क्योंकि आज कल सभी के फोन पर नेट की सुविधा आमतौर पर होती ही है। सरकारी पैसे को बेवजह खर्च करने की जरूरत नहीं है। और हां प्रभु ये बताएं आपने एक भी नई ट्रेन का ऐलान नहीं किया ! मुझे तो ये बात समझ में ही नहीं आ रही है। आपको पता है कि लोगों को आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है, रेलवे आज भी डिमांड पूरी नहीं कर पा रही है ऐसे में नई ट्रेन का ऐलान होना ही चाहिए। मुझे पता है कि रेल रूट बिजी है, लेकिन जब आप कह रहे हैं कि ट्रेनों की स्पीड बढ़ाकर कुछ समय निकाला जाएगा, तो नई ट्रेन चलाई जा सकती है। इससे तो आपकी और बोर्ड अफसरों में इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। डिमांड पूरी करने के लिए ट्रेनों में बोगी बढ़ाने की बात कर रहे हैं, ज्यादातर ट्रेनो में 24 कोच लगाए जा रहे हैं, इससे ज्यादा कोच लगाने की क्षमता ही नहीं है। कई रेलवे स्टेशन पर तो 24 कोच की ही ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी नहीं हो पाती है, फिर और बोगी बढ़ाने की बात तो बेमानी लगती है।
आखिर में रेलवे के आय पर बात करना है। एक बार फिर बजट में पीपीपी की बात की गई है। प्रभु आपको पता है कि वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन के लिए पीपीपी के तहत देश विदेश से टेंडर आमंत्रित किए गए थे, लेकिन कोई भी आवेदन नहीं आया। दरअसल सच्चाई ये है कि भारतीय रेल पर किसी को भरोसा ही नहीं है। आपने सिर्फ पीठ थपथपाने के लिए रेल किराए में कोई बढोत्तरी नहीं की। मै तो आपके इस फैसले से पूरी तरह असहमत हूं। देश में रोजाना 2.30 करोड यात्री ट्रेन से सफर करते हैं। इसमें अकेले मुंबई में 85 लाख यात्री रोजाना लोकल ट्रेन से सफर करता है। अभी वहां तीन महीने का मासिक सीजन टिकट सिर्फ 15 दिन के किराए पर दिया जाता है। मासिक सीजन टिकट में बढोत्तरी की गुंजाइश थी, लेकिन आपने नहीं किया। इसी तरह अपर क्लास का किराया लगातार बढाया गया है लेकिन जनरल और स्लीपर क्लास में किराया नहीं बढ़ा है, इसलिए जरूरी है कि किराए को तर्कसंगत बनाया जाए। माल भाडा बढ़ाया तो.. लेकिन आपकी हिम्मत नहीं हुई कि बजट भाषण में इसे आप पढ सकें। मुझे बजट तो दिशाहीन लगा ही प्रभु आप डरपोक भी नजर आए।
चलते-चलते
रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अरुणेन्द्र कुमार टीवी बहस में इस रेल बजट को 10 में 11 नंबर दे रहे थे, मुझे लगता है कि उन्हें उम्मीद है कि बीजेपी सरकार रेलवे बोर्ड की किसी कमेटी का उन्हें चेयरमैन बना देगी !
Friday, 5 December 2014
आखिर कैमरे पर पकड़े गए केजरीवाल !
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल वैसे तो चप्पल पहनते हैं, दिखावे के लिए एक झरी हुई सी शर्ट पहनते हैं, कैमरे के सामने ट्रेन की सामान्य बोगी में सफर करते हैं, ड्रामेबाजी के लिए बदबूदार मफलर कान पर डाल लेते हैं और ठंड पडे तो कत्थई रंग का गंदा सा स्वेटर पहनते हैं, पर वही केजरीवाल जब हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में सफर करते पकड़े जाते हैं तो उनके चंगू-मंगू सफाई देते हैं कि आयोजकों ने टिकट उपलब्ध कराया था, इसलिए वो क्या कर सकते थे ? हाहाहा, क्या केजरीवाल साहब आप इतने ना समझ है । चलिए मैं बताता हूं क्या कर सकते थे ! बात पुरानी है, लेकिन जिक्र करना जरूरी है। आप पार्टी नेता आशुतोष भी इस बात के गवाह हैं। टीवी न्यूज चैनल IBN 7 में कार्य के दौरान चैनल का अवार्ड फंक्शन होना था । उस दौरान UPA की सरकार में ममता बनर्जी रेलमंत्री थीं। उन्हें आमंत्रित करने मैं उनके पास गया और कार्ड देते हुए आग्रह किया कि आपको इस आयोजन में जरूर आना है। ममता दीदी ने आग्रह को स्वीकार कर लिया और मुझे आश्वस्त किया कि वो जरूर पहुंचेंगी। उन्होंने मेरे सामने ही कार्ड अपने पीए को दिया और कहाकि प्रोग्राम में मुझे जाना है। मैने उस दौरान मैनेजिंग एडिटर रहे आशुतोष जी को बताया कि ममता बनर्जी से बात हो चुकी है और वो पहुंच रही हैं।
लेकिन शाम को जब मैं आफिस में था, अचानक उनका फोन आया और उन्होंने जो मुझसे कहा, कम से कम वो बात केजरीवाल को जानना बहुत जरूरी है। ममता जी ने कहाकि मैं आपके चैनल के आयोजन में आना चाहती हूं, उस दिन में मैं दिल्ली में हूं भी, लेकिन मजबूरी ये है कि " मैं कभी भी किसी पांच सितारा होटल में होने वाले आयोजन में नहीं जाती हूं और आपका आयोजन पांच सितारा होटल में है, इसलिए मुझे माफ कीजिए, मैं इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाऊंगी " पहले तो मुझे बुरा लगा कि वादा करने के बाद अब वो मना कर रही हैं, लेकिन सच कहूं उनका स्पष्ट बात कहना और सिद्धांतवादी होना मुझे अच्छा लगा।
इसलिए केजरीवाल जी ये कहना कि आयोजक ने टिकट उपलब्ध कराया तो ले लिया और बिजनेस क्लास में सफर कर लिया, ये ठीक नहीं है। इसका मतलब कोई बड़ा आदमी आपको कुछ आफर करेगा तो आप मना नहीं करेंगे ! फिर तो देश में आँफर देने वालों की कमी नहीं है। और हां वो बेचारे गरीब चाय वाले को गाली देते रहते हो, उन्हें भी तो अडानी ने चार्टर प्लेन का आफर कर दिया था, वो मना नहीं कर पाए, अब इसमें " चायवाले " की क्या गलती है ? आप उन्हें क्यों गरियाते रहते हो ? केजरीवाल साहब किसी पर उंगली उठाओ या किसी को बेईमान बताओ तो अपने तरफ भी देख लिया करो !
हां एक सवाल भी है : क्या आप पार्टी के चंदे का पैसा पार्टी के किसी नेता के पिता के खाते में ट्रांसफर हुआ है ? अगर हां तो उसका नाम क्या है ? पार्टी का पैसा पिता के खाते में ट्रांसफर करने की वजह क्या है ? क्या इस बात की जानकारी पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को दी गई हैं ? बाकी बातें बाद में ...
Sunday, 14 September 2014
हिंदी दिवस : ऊंचे लोग ऊंची पसंद !
जी हां, आज ये कहानी आपको एक बार फिर सुनाने का मन हो रहा है। जहां भी और जब हिंदी की बात होती है तो मैं ये किस्सा लोगों को जरूर सुनाता हूं। मतलब ऊंचे लोग ऊंची पसंद। मेरी तरह आपने भी महसूस किया होगा कि एयरपोर्ट पर लोग अपने घर या मित्रों से अच्छा खासा हिंदी में या फिर अपनी बोलचाल की भाषा में बात करते दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज में सवार होते हैं और जहाज जमीन छोड़ता है, इसके यात्री भी जमीन से कट जाते हैं और ऊंची-ऊंची छोड़ने लगते हैं। मुझे आज भी याद है साल भर पहले मैं एयर इंडिया की फ्लाइट में दिल्ली से गुवाहाटी जा रहा था। साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन कोट टाई में थे, मैं तो ज्यादातर जींस टी-शर्ट में रही रहता हूं। मैंने उन्हें कुछ देर पहले एयरपोर्ट पर अपने घर वालों से बात करते सुना था, बढिया हिंदी और राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे। लेकिन हवाई जहाज के भीतर कुछ अलग अंदाज में दिखाई दिए। सीट पर बैठते ही एयर होस्टेज को कई बार बुला कर तरह-तरह की डिमांड कर दी उन्होंने। खैर मुझे समझने में देर नहीं लगी कि ये टिपिकल केस है। बहरहाल थोड़ी देर बाद ही वो मेरी तरफ मुखातिब हो गए ।
Monday, 11 August 2014
कुपात्रों से वापस हो " भारत रत्न "
श्री नरेन्द्र मोदी जी
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
नई दिल्ली
विषय : देश के सबसे बड़े सम्मान " भारत रत्न " की गरिमा को बचाने के संबंध में !
महोदय,
देश में एक बार फिर " भारत रत्न " को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। टीवी चैनलों पर तमाम लोगों के नाम इस सम्मान के लिए जा रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर अब ये सम्मान मिलता कैसे है ? वो कौन लोग हैं जो सम्मान के लिए नाम तय करते हैं ? मैने पढ़ा है कि देश के पहले शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को जब भारत रत्न देने की बात हुई तो उन्होंने सम्मान लेने से साफ इनकार कर दिया और कहाकि जो लोग इसकी चयन समिति में रहे हों, उन्हें ये सम्मान हरगिज नहीं लेना चाहिए। बाद में कलाम साहब को ये सम्मान मरणोंपरांत 1992 में दिया गया। अब हालत ये है कि टीवी चैनलों पर भारत रत्न के लिए रोजाना एक नया नाम लिया जा रहा है, जाहिर कि उन सभी को ये सम्मान नहीं मिल सकता, ऐसे में जो लोग रह जाएंगे, उन्हें निश्चित रूप से ना सिर्फ पीड़ा होगी, बल्कि समाज में उनकी बेवजह किरकिरी भी होगी। इसलिए प्रधानमंत्री जी भारत रत्न जैसे गरिमापूर्ण सम्मान की रक्षा के लिए मीडिया में चल रहे अनर्गल प्रलाप को तुरंत बंद करने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री जी आपको पता है कि मीडिया ने कैसे क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बना दिया। सोचिए ये क्रिकेट का भगवान भला क्या होता है ? भगवान की मौजूदगी में देश की टीम तमाम मैच हारती रही ! सचिन शतकों के शतक के करीब पहुंचे तो मीडिया का एक तपका उन्हें भारत रत्न सचिन तेंदुलकर लिखने लगा। धीरे-धीरे मीडिया ने ऐसा दबाव बनाया कि केंद्र सरकार सचिन को भारत रत्न देने पर मजबूर हो गई। मजबूर इसलिए कह रहा हूं कि सरकार खेल के क्षेत्र में पहला भारत रत्न हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद्र को देना चाहती थी, लेकिन वो हिम्मत नहीं जुटा पाई। देश में लोकसभा का चुनाव होना था, इसलिए सरकार सचिन की अनदेखी कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए आनन-फानन में सचिन को भारत रत्न देने का एलान कर दिया गया। सचिन को भारत रत्न दिए जाने का मैं तो उस वक्त भी विरोधी था, आज भी हूं।
प्रधानमंत्री जी, सचिन को भारत रत्न देने का मैं विरोधी यूं ही नहीं हूं, उसकी वजह है। पहले तो खेल मंत्रालय क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को मान्यता ही नहीं देता है। इसके अलावा इस खेल में ईमानदारी नहीं है। देश विदेश के तमाम क्रिकेटर मैच फिक्सिंग, स्पाँट फिक्सिंग में पकड़े जा चुके हैं और उन्हें जेल भी हुई है। जब इस पूरे खेल में ही ईमानदारी नहीं है तो भला क्रिकेटर कैसे ईमानदार हो सकते हैं ? अब देखिए सचिन को भारत रत्न का सम्मान क्रिकेट में योगदान के लिए दिया गया, लेकिन यही सचिन आयकर से कुछ छूट मिल जाए, इसके लिए दावा किया कि उनका मुख्य पेशा क्रिकेट खेलना नहीं बल्कि एक्टिंग करना है। प्रधानमंत्री जी अब आप ही तय कीजिए क्या हमें ऐसे ही लोगों को भारत रत्न जैसा सम्मान देना चाहिए ? मेरा तो कहना है कि सचिन ने भारत रत्न सम्मान की गरिमा को गिराया है।
प्रधानमंत्री जी कांग्रेस इस सचिन के सहारे राजनीति करती रही, यही वजह है कि भारत रत्न देने के कुछ दिन बाद ही सचिन को राज्यसभा में मनोनीति कर दिया। अब उनकी लगातार गैरहाजिरी पर राज्यसभा में सवाल भी उठ रहे है। भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति को किसी उत्पाद का विज्ञापन करना चाहिए, या नहीं ! ये भी एक अहम सवाल है। मैं तो इसके भी खिलाफ हूं। प्रधानमंत्री जी, सच कहूं ! मुझे लगता है कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर भले किसी को भारत रत्न से ना नवाजा जाए, बल्कि जिन लोगों को अब तक भारत रत्न दिए गए हैं, वक्त आ गया है कि उनकी ईमानदारी से समीक्षा की जाए। हम जान सकें कि जिन्हें दिया गया है, क्या वो उसके वाकई हकदार हैं ? इसके लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाए, जो तीन महीने के भीतर सरकार को अपनी रिपोर्ट जरूर दे, और अपात्र लोगों से ये सम्मान वापस लिया जाए !
प्रधानमंत्री जी देश ये भी जानना चाहता है कि वो कौन सी वजह रही जिसके चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तो "भारत रत्न" नहीं मिल सका , लेकिन एक परिवार से पंडित जवाहर लाल नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सभी को ये सम्मान मिल गए। मेरे जैसे तमाम लोगों का विचार है कि आजादी की लड़ाई में गांधी के मुकाबले नेहरू का योगदान बहुत कम था, फिर भी गांधी जी ने उन्हे भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी कई दशकों तक भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के सूत्रधारों ने देश में राजतंत्र चलाया, विचारधारा के स्थान पर व्यक्ति पूजा को प्रतिष्ठित किया और लोकहितों की उपेक्षा की। कहा जाता है कि आसपास चाटुकारों को जोड़ कर स्वयं को देवदूत घोषित कराते रहे और स्वयं अपनी छवि पर मुग्ध होते रहे।
प्रधानमंत्री जी, देश में तमाम लोग देश की बहुत सी समस्याओं के लिये सीधे नेहरू को जिम्मेदार मानते है। जैसे लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध, भारत का विभाजन, कश्मीर की समस्या, चीन द्वारा भारत पर हमला, मुस्लिम तुष्टीकरण, भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन, भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना और हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने में देरी करना। देश की राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाए रखने में भी नेहरू का बड़ा हाथ रहा है। सच ये भी है कि गांधीवादी अर्थव्यवस्था की उन्होंने हत्या की और ग्रामीण भारत की अनदेखी भी उनके समय में हुई। नेता जी सुभाषचंद्र बोस का पता लगाने में भी उन पर लापरवाही और गंभीरता ना बरतने के आरोप हैं। इन सबके बाद भी पंडित जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया, और सब खामोश रहे !
प्रधानमंत्री जी, मैं देख रहा हूं कि मीडिया में एक बार फिर नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न दिए जाने की बात हो रही है। अच्छी बात है, नेता जी इसके हकदार है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि जब 1992 में नेताजी को भारत रत्न से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था, उस दौरान उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण पुरस्कार के मरणोपरान्त स्वरूप को लेकर प्रश्न उठा था। इसीलिए भारत सरकार ने यह सम्मान वापस ले लिया। देश में ये सम्मान वापस लिए जाने का एक मात्र उदाहरण है। मेरा सवाल है कि हालात तो आज भी वही बने हुए है, ऐसे में नेता जी का नाम फिर क्यों लिया जा रहा है ? प्रधानमंत्री जी मैं जानना चाहता हूं कि ये नाम सरकार की ओर से उठाया जा रहा है, या फिर मीडिया ने शुरू किया है ? ये साफ होना चाहिए और इस पर सरकार का पक्ष सामने आना चाहिए !
प्रधानमंत्री जी, नेता जी के अलावा मीडिया में इन दिनों पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को भारत रत्न दिए जाने की चर्चा हो रही है। मेरा मानना है कि श्री वाजपेयी जी का कद इतना बड़ा है कि उनके नाम पर पर उंगली उठाने की हैसियत वाला आदमी आज किसी पार्टी में नहीं है, रही बात कांशीराम की तो ये राजनीति इतनी बिगड़ चुकी है कि वोट के लालची नेताओं की इतनी औकात ही नहीं है कि कोई खिलाफ में मुंह खोल सके। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कांशीराम ने दलितों को एकजुट कर उनके हक को लेकर इनमें जो जागरूकता पैदा की वो आसान काम नहीं था।
प्रधानमंत्री जी आज मीडिया बहुत चालाक है, वो मूर्खता भी करती है तो इस हद तक करती है कि उसकी मूर्खता भी सच के करीब लगने लगती है। अब देखिए भारत रत्न के लिए नियम या परंपरा कहें कि एक साल में तीन लोगों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है। लेकिन मीडिया को लगता है कि कहीं उसकी बात गलत साबित ना हो जाए, लिहाजा वो हर संभावना पर काम करती है। अब देखिए दो नाम मीडिया ने ऐसे जोड़ दिए, जिससे लगता है कि हां इन्हें भी मिल सकता है। पहला नाम वो, जिसे आपने गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बनाया, मतलब बिग बी अमिताभ बच्चन और दूसरा नाम वो जहां से आपने चुनाव लड़ा और पर्चा दाखिल करने से पहले जिस मूर्ति का आपने माल्यार्पण किया, मतलब स्व. महामना मदन मोहन मालवीय जी। ये दोनों नाम ऐसे हैं, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है।
खैर प्रधानमंत्री जी , आप इतने व्यस्त हैं कि आपको इतना समय कहां है कि आप लोगों के पत्र पढ़ सकें। लेकिन एक गुजारिश है, कुछ ऐसा कीजिए, जिससे हम सब को लगे कि वाकई हम देश में आजादी का जश्न मना रहे हैं, ऐसा ना लगे कि परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इसलिए पात्रों को भले ही इस बार भारत रत्न ना दें लेकिन कुछ ऐसा करें कि एक भी कुपात्र के पास भारत रत्न ना रहे, उससे वापस लेने का ऐलान जरूर करें।
आपका
भारतीय नागरिक
Wednesday, 16 July 2014
मोदी बताएं : टनल में क्यों फंसी ट्रेन ?
श्री शक्ति एक्सप्रेस के पहले ही सफर में उधरपुर - कटरा रेल लाइन ने संकेत दे दिया है कि वो अभी रेल यात्रा के लिए पूरी तरह फिट नहीं है। श्री शक्ति एक्सप्रेस बीती रात जैसे ही टनल के भीतर घुसी, पटरी पर फिसलन की वजह से ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकी और टनल के भीतर ही फंस गई। ट्रेन को टनल से निकालने के लिए इंजन के ड्राईवर ने काफी मशक्कत की, लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाया। आधी रात को इसकी जानकारी जैसे ही उत्तर रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को हुई, सब के होश उड़ गए। बहरहाल कोशिश शुरू हो गई कि कैसे ट्रेन को टनल से बाहर निकाला जाए। आनन फानन में फैसला किया गया कि एक और इंजन वहां भेजकर ट्रेन में पीछे से धक्का लगाया जाए, हो सकता है कि दो इंजन के जरिए इस ट्रेन को आगे बढ़ाया जा सके। बहरहाल रेलवे की कोशिश कामयाब रही और ट्रेन को किसी तरह टनल से बाहर कर लिया गया। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इस ट्रैक पर आगे ट्रेन का संचालन जारी रखा जाए, या फिर इसे रोका जाए ! बहरहाल रेलवे की किरकिरी न हो, इसलिए मीडिया को जानकारी दी गई कि इंजन में खराबी की वजह से ट्रेन टनल मे लगभग दो घंटे फंसी रही, जबकि सच ये नहीं है, रेल अफसर अपनी नाकामी छिपा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी मंत्रियों को कहते रहते हैं कि वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और महत्वपूर्ण फैसलों में सोशल मीडिया के सकारात्मक राय को उसमें शामिल करें। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी खुद इसे लेकर लापरवाह हैं। वो अभी से अफसरों के हाथ की कठपुतली बनते जा रहे हैं, खासतौर पर अगर रेलमंत्रालय की बात करूं, तो ये बात सौ फीसदी सच साबित होती है। आपको पता होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब ऊधमपुर से कटरा रेल लाइन की शुरुआत करने वाले थे, उसके पहले ही मैने आगाह कर दिया था कि ये रेल लाइन खतरनाक है, इस पर जल्दबाजी में ट्रेन का संचालन नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इस रेल पटरी के शुरू हो जाने से रोजाना ट्रेनों की आवाजाही भी शुरू हो जाएगी, इसमें हजारों यात्री सफर करेंगे, इसलिए उनकी जान को जोखिम में नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि मोदी ने इन बातों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया और वाहवाही लूटने के लिए रेल अफसरों के इशारे पर कटरा रेलवे स्टेशन पहुंच गए और ट्रेनों की आवाजाही शुरू करने के लिए हरी झंड़ी दिखा दी।
मैं प्रधानमंत्री को एक बार फिर बताना चाहता हूं कि इस रेल पटरी पर जल्दबाजी में ट्रेनों की आवाजाही शुरू करना खतरे से खाली नहीं है, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट इसे खतरनाक बता रही है। इसी साल जनवरी में रेल अफसर ने रेल पटरी का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि कम से कम दो तीन मानसून तक इस पटरी पर ट्रेनों का संचालन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। मानसून में इस ट्रैक का पूरी तरह परीक्षण होना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि टनल में अचानक बड़ी मात्रा में पानी भर जाए, जिससे बीच में ट्रेनों की आवाजाही रोकनी पड़े। इतना ही नहीं टनल नंबर 20 में तकनीकि खामियों की वजह से सेफ्टी कमिश्नर ने 27 से 29 जनवरी तक निरीक्षण किया, लेकिन एनओसी नहीं दिया।अंदर की खबर है कि काफी दबाव के बाद रफ्तार नियंत्रण कर ट्रेन चलाने की अनुमति दी है। टनल नंबर 18 में काफी दिक्कतहै। बताया गया है कि इस टनल में 100 लीटर पानी प्रति सेकेंड भर जाता है। ये वही टनल है, जिसकी वजह से अभी तक यहां ट्रेनों का संचालन नहीं हो पा रहा था। पानी का रास्ता बदलने के लिए फिलहाल कुछ समय पहले 22 करोड का टेंडर दे दिया गया, काम हुआ या नहीं, कोई बताने को तैयार नहीं। एक विदेशी कंपनी को कंसल्टैंसी के लिए 50 करोड रूपये दिए गए। उसने जो सुझाव दिया वो नहीं माना गया। इस कंसल्टैंसी कंपनी से कहा गया कि वो सेफ्टी सर्टिफिकेट दे, जिसे देने से उसने इनकार कर दिया।
मैं फिर जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि रेलवे के अधिकारी रेलमंत्री और प्रधानमंत्री को पूरी तरह गुमराह कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि रेलमंत्री रेलवे को जानने समझने वालों की एक एक्सपर्ट टीम बनाएं और हर बड़े फैसले को लागू करने के पहले एक्सपर्ट की राय जरूर ले। रेल अफसरों के बड़बोलेपन की वजह से ही रेलमंत्री सदानंद गौड़ा की रेल हादसे के मामले में सार्वजनिक रूप से किरकिरी हो चुकी है, जब गौड़ा ने रेल अधिकारियों के कहने पर मीडिया में बयान दिया कि ट्रेन हादसे की वजह नक्सली हैं, उन्होंने बंद का आह्वान किया था और रेल पटरी के साथ छेड़छाड़ की, इसी वजह से हादसा हुआ। इसके थोड़ी ही देर बाद गृह मंत्रालय ने रेलमंत्री की बात को खारिज कर दिया। बाद में रेलमंत्री ने अपनी बात बदली और कहाकि पूरे मामले की जांच हो रही है, उसके बाद ही दुर्घटना की असल वजह पता चलेगी। लेकिन ये बात पूरी तरह सच है कि अगर रेलमंत्री थोड़ा भी ढीले पड़े तो ये अफसर मनमानी करने से पीछे हटने वाले नहीं है।
यही वजह है कि जिस अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में रेल पटरी को खतरनाक बताया, उसे तत्काल उत्तर रेलवे से स्थानांतरित कर दिया गया। वजह साफ है कि रेल अधिकारियों का मानना है कि वैष्णों देवी मां के धाम कटरा से अगर मोदी को ट्रेन को हरी झंडी दिखाने का अवसर मिला तो वो मंत्रालय पर नरम रहेंगे और अफसरों पर उनका भरोसा बढ़ेगा, लेकिन प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से सच्चाई को छिपाकर इन अफसरों ने एक ऐसे रेलमार्ग पर आनन फानन में ट्रेनों का संचालन शुरू करा दिया, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से काफी खतरनाक है। ये अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को धोखा दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी, ट्रेनों के संचालन की शुरुआत आप कर चुके हैं, अभी भी समय है इस रेल मार्ग की नए सिरे से पूरी जांच पड़ताल आप स्वयं कराएं। ब्राजील से वापस आएं तो 7 आरसीआर जाने के पहले सीधे रेल मंत्रालय पहुंचे और उन सभी अफसरों को सामने बैठाएं, जिन्हें इस रेल मार्ग को जल्दबाजी में शुरू करने की हडबड़ी थी। ये जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि रेल अधिकारियों ने अपने ही महकमें के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट को खारिज कर ट्रेनों का संचालन शुरू कराया और पहले ही दिन श्री शक्ति एक्सप्रेस टनल मे फंस गई। जांच जरूरी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी मंत्रियों को कहते रहते हैं कि वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और महत्वपूर्ण फैसलों में सोशल मीडिया के सकारात्मक राय को उसमें शामिल करें। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी खुद इसे लेकर लापरवाह हैं। वो अभी से अफसरों के हाथ की कठपुतली बनते जा रहे हैं, खासतौर पर अगर रेलमंत्रालय की बात करूं, तो ये बात सौ फीसदी सच साबित होती है। आपको पता होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब ऊधमपुर से कटरा रेल लाइन की शुरुआत करने वाले थे, उसके पहले ही मैने आगाह कर दिया था कि ये रेल लाइन खतरनाक है, इस पर जल्दबाजी में ट्रेन का संचालन नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इस रेल पटरी के शुरू हो जाने से रोजाना ट्रेनों की आवाजाही भी शुरू हो जाएगी, इसमें हजारों यात्री सफर करेंगे, इसलिए उनकी जान को जोखिम में नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि मोदी ने इन बातों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया और वाहवाही लूटने के लिए रेल अफसरों के इशारे पर कटरा रेलवे स्टेशन पहुंच गए और ट्रेनों की आवाजाही शुरू करने के लिए हरी झंड़ी दिखा दी।
मैं प्रधानमंत्री को एक बार फिर बताना चाहता हूं कि इस रेल पटरी पर जल्दबाजी में ट्रेनों की आवाजाही शुरू करना खतरे से खाली नहीं है, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट इसे खतरनाक बता रही है। इसी साल जनवरी में रेल अफसर ने रेल पटरी का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि कम से कम दो तीन मानसून तक इस पटरी पर ट्रेनों का संचालन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। मानसून में इस ट्रैक का पूरी तरह परीक्षण होना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि टनल में अचानक बड़ी मात्रा में पानी भर जाए, जिससे बीच में ट्रेनों की आवाजाही रोकनी पड़े। इतना ही नहीं टनल नंबर 20 में तकनीकि खामियों की वजह से सेफ्टी कमिश्नर ने 27 से 29 जनवरी तक निरीक्षण किया, लेकिन एनओसी नहीं दिया।अंदर की खबर है कि काफी दबाव के बाद रफ्तार नियंत्रण कर ट्रेन चलाने की अनुमति दी है। टनल नंबर 18 में काफी दिक्कतहै। बताया गया है कि इस टनल में 100 लीटर पानी प्रति सेकेंड भर जाता है। ये वही टनल है, जिसकी वजह से अभी तक यहां ट्रेनों का संचालन नहीं हो पा रहा था। पानी का रास्ता बदलने के लिए फिलहाल कुछ समय पहले 22 करोड का टेंडर दे दिया गया, काम हुआ या नहीं, कोई बताने को तैयार नहीं। एक विदेशी कंपनी को कंसल्टैंसी के लिए 50 करोड रूपये दिए गए। उसने जो सुझाव दिया वो नहीं माना गया। इस कंसल्टैंसी कंपनी से कहा गया कि वो सेफ्टी सर्टिफिकेट दे, जिसे देने से उसने इनकार कर दिया।
मैं फिर जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि रेलवे के अधिकारी रेलमंत्री और प्रधानमंत्री को पूरी तरह गुमराह कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि रेलमंत्री रेलवे को जानने समझने वालों की एक एक्सपर्ट टीम बनाएं और हर बड़े फैसले को लागू करने के पहले एक्सपर्ट की राय जरूर ले। रेल अफसरों के बड़बोलेपन की वजह से ही रेलमंत्री सदानंद गौड़ा की रेल हादसे के मामले में सार्वजनिक रूप से किरकिरी हो चुकी है, जब गौड़ा ने रेल अधिकारियों के कहने पर मीडिया में बयान दिया कि ट्रेन हादसे की वजह नक्सली हैं, उन्होंने बंद का आह्वान किया था और रेल पटरी के साथ छेड़छाड़ की, इसी वजह से हादसा हुआ। इसके थोड़ी ही देर बाद गृह मंत्रालय ने रेलमंत्री की बात को खारिज कर दिया। बाद में रेलमंत्री ने अपनी बात बदली और कहाकि पूरे मामले की जांच हो रही है, उसके बाद ही दुर्घटना की असल वजह पता चलेगी। लेकिन ये बात पूरी तरह सच है कि अगर रेलमंत्री थोड़ा भी ढीले पड़े तो ये अफसर मनमानी करने से पीछे हटने वाले नहीं है।
यही वजह है कि जिस अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में रेल पटरी को खतरनाक बताया, उसे तत्काल उत्तर रेलवे से स्थानांतरित कर दिया गया। वजह साफ है कि रेल अधिकारियों का मानना है कि वैष्णों देवी मां के धाम कटरा से अगर मोदी को ट्रेन को हरी झंडी दिखाने का अवसर मिला तो वो मंत्रालय पर नरम रहेंगे और अफसरों पर उनका भरोसा बढ़ेगा, लेकिन प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से सच्चाई को छिपाकर इन अफसरों ने एक ऐसे रेलमार्ग पर आनन फानन में ट्रेनों का संचालन शुरू करा दिया, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से काफी खतरनाक है। ये अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को धोखा दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी, ट्रेनों के संचालन की शुरुआत आप कर चुके हैं, अभी भी समय है इस रेल मार्ग की नए सिरे से पूरी जांच पड़ताल आप स्वयं कराएं। ब्राजील से वापस आएं तो 7 आरसीआर जाने के पहले सीधे रेल मंत्रालय पहुंचे और उन सभी अफसरों को सामने बैठाएं, जिन्हें इस रेल मार्ग को जल्दबाजी में शुरू करने की हडबड़ी थी। ये जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि रेल अधिकारियों ने अपने ही महकमें के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट को खारिज कर ट्रेनों का संचालन शुरू कराया और पहले ही दिन श्री शक्ति एक्सप्रेस टनल मे फंस गई। जांच जरूरी है।
Wednesday, 9 July 2014
रेल बजट में नहीं दिखा 56 इंच का सीना !
भारतीय रेल आत्मनिर्भर होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमारी मदद करें ! भारतीय रेल अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमें सहारा दें ! आप हमारी मदद करेंगे... तो हम आत्मनिर्भर बनेंगे, आप मदद नहीं करेंगे तो भला हम आत्मनिर्भर कैसे होंगे ? आप हमें सहारा देंगे तो हम अपने पैरों पर खड़े होंगे... आप सहारा नहीं देंगे तो हम अपने पैरों पर कैसे खड़े होंगे ? सच बताऊ... 56 इंच के सीने का दम भरने वाले नरेन्द्र मोदी से ऐसे रेल बजट की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। ईमानदारी से एक बात बताना चाहता हूं, मुझे इस सरकार के रेल बजट का बेसब्री से इंतजार था, मैं बजट के जरिए मोदी के विजन को जानना और समझना चाहता था, मैं देखना चाहता था कि 56 इंच का सीना रखने वाला नेता कहीं बजट में विदेशियों के आगे गिडगिड़ाता हुआ तो नजर नहीं आ रहा है, पर ऐसा ही हुआ। रेल बजट में देश के स्वाभिमान के साथ समझौता हुआ है, बजट में बातें तो बड़ी - बड़ी की गई हैं, पर इसके लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर कोई बात नहीं की गई है। हर मसले का हल पीपीपी मतलब पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप को बताया जा रहा है, आसान भाषा में बताऊं तो इस बजट में भारतीय रेल पूरी तरह विदेशियों के हाथ की कठपुतली नजर आ रही है।
सिडनी ( आस्ट्रेलिया ) रेडियो ने अपने हिंदी बुलेटिन में रेल बजट पर कार्यक्रम रखा था, जिसमें उन्होंने इस बजट के बारे में मुझसे बातें की। पहला सवाल पूछा गया कि पहले के रेल बजट से ये बजट किस मायने में अलग है ? मैं समझ गया कि विदेशों में भी लोग यही देखना चाहता हैं कि 56 इंच का सीना रखने वाले प्रधानमंत्री का पहला बजट किस दिशा में जा रहा है। सच बता रहा हूं, मैं जब भी विदेशी चैनल या रेडियो या अन्य किसी भी प्रचार माध्यम से जुड़ता हूं तो मेरी पूरी कोशिश होती है कि ऐसी बात ना कहूं जिससे विदेशों में देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। लेकिन इस सवाल के बाद मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि नया कुछ बता दूं..। कसम से, इस बजट में तो एक बात भी नई नहीं है, अलबत्ता मैं ये कहूं कि पुराने रेल मंत्रियों के बजट में मामूली फेरबदल करके इसे पेश किया गया है तो कहना गलत नहीं होगा। चूंकि जनता पुरानी बातों को बहुत जल्दी भूल जाती है, और उसे मामूली बात भी नई नजर आती है। मैं बताना चाहता हूं कि बजट में जिस " बुलेट ट्रेन " की बात को बहुत अहमियत दी गई है। इसकी असल सच्चाई भी जानना आप के लिए बहुत जरूरी है।
बात उस समय की है, जब रेलवे की हालत बहुत पुख्ता थी, उस समय रेलमंत्री स्व. माधवराव सिंधिया थे, वो बड़ा सोचते थे। सबसे पहले देश में बुलेट ट्रेन का सपना उन्होंने ही देखा था। लेकिन इस मामले में काम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद देश में एनडीए की सरकार आई, वो पुराने ढर्रे पर चलती रही, लेकिन मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए एक की सरकार में रेलमंत्री रहे लालू यादव ने देश को एक बार फिर बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया। सपना ही नहीं बल्कि उन्होंने ही पहली बार रेल बजट में बुलेट ट्रेन का ऐलान किया और दिल्ली से पटना के अलावा मुंबई से अहमदाबाद के लिए बुलेट ट्रेन की फिजिविलिटी सर्वै शुरू कराया। बड़ा काम था, इसलिए विदेशी एजेंसियों को सर्वे के लिए हायर किया गया। सर्वे पर करोडों रुपये खर्च किए गए। खैर सच ये है कि रेल मंत्रालय ने बुलेट ट्रेन के लिए कुछ काम जरूर शुरू कर दिया था, पर यूपीए 2 में लालू के पास गिनती के सांसद रह गए, इसलिए रेल महकमा ममता बनर्जी के खाते में चला गया। ममता रेलमंत्री बनीं, पर उनकी निगाह बंगाल की कुर्सी पर थी, इसलिए रेलवे के लिए कुछ बड़ा काम नहीं कर पाईं। बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाया, पर यात्री किराये में बढोत्तरी करने पर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। सच बताऊं त्रिवेदी, मुकुल राय और पवन बंसल के बारे मे चर्चा करना, सही मायने में समय खराब करना है।
बहरहाल मैने आज तक पत्रकारिता में किसी स्तर पर कभी भी समझौता नहीं किया, लिहाजा सिडनी रेडियो पर मैने साफ - साफ पूरी बातें ईमानदारी से कहीं। दूसरा सवाल हाईस्पीड़ ट्रेन के बारे में पूछा गया। मैं हैरान रह गया कि क्या देश कि असल तस्वीर विदेशियों को भी पता है। सही मायने में हाई स्पीड ट्रेन के मामले में मोदी सरकार जनता को बेवकूफ बना रही है। हमारे यहां रेल पटरी की ये हालत अब नहीं रह गई है कि इस पर 100 किलो मीटर प्रतिघंटा से अधिक रफ्तार से कोई ट्रेन चलाई जा सके। मोदी के मंत्री वाहवाही लूटने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं, जो महत्वाकांक्षी रेलमंत्री लालू यादव ने भी नहीं किया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली से लखनऊ के बीच एक एसी स्पेशल ट्रेन चलती थी, जो सप्ताह मे तीन दिन एसी स्पेशल के नाम से जानी जाती थी और तीन दिन यही ट्रेन दुरांतो के नाम से चल रही थी। जनता को मूर्ख समझने वाले रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस ट्रेन का नाम बदल कर राजधानी एक्सप्रेस कर दिया और लगभग 400 रुपये प्रति टिकट किराया बढ़ा दिया। इस ट्रेन का कोई स्टापेज कम नहीं हुआ, रफ्तार नहीं बढ़ी, यहां तक की जो बोगी पुरानी ट्रेन में चल रही थी वही गंदगी से भरी बोगी भी इस राजधानी में इस्तेमाल हो रही है। अच्छा ज्यादा पैसा ले रहे हो तो कम से कम इसे साफ सुथरे प्लेटफार्म से गुजारो, जिससे इस ट्रेन पर सफर करने वालों को वीआईपी होने का आभास हो, पर ये भी नहीं। दिल्ली से ये ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 9 से छूटती है, जबकि लखनऊ में इसे प्लेटफार्म नंबर दो या पांच पर लिया जाता है। मुझे लगा था कि लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह इस पर आपत्ति करेंगे, लेकिन वो भी खामोश हैं। यात्रियों की जेब काटी जा रही है, किसी से कोई मतलब नहीं है।
रेलवे की बातें करूं तो मेरी बात कभी खत्म ही नहीं होगी। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) पर नई सरकार को भी बहुत भरोसा है। उसे लगता है कि पीपीपी के तहत तमाम बड़े काम वो करा सकती है। मैं मोदी साहब को बताना चाहता हूं कि पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ने देश के कुछ चुनिंदा रेलवे स्टेशन को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए पीपीपी के तहत इंटरनेशनल टेंडर निकाला था। आपको हैरानी होगी कि किसी भी विदेशी निवेशक ने इस काम को करने में अपन रुचि नहीं दिखाई। जानते हैं क्यों ? क्योंकि रेलवे ने अपनी विश्वसनीयता ही खो दी है। कोई भी विदेशी निवेशक रेलवे में पैसा लगाने से घबराता है। उसे लगता है कि जिस देश में मामूली किराया बढ़ाने पर रेलमंत्री की छुट्टी हो जाती है, वहां कोई विदेशी निवेशक पैसा लगाने का रिस्क कैसे ले सकता है ? आपको पता है ना कि देश में रेलवे का किसी से कंपटीशन नहीं है, अकेली इतनी बड़ी संस्था है। आप सोचें कि कोई व्यक्ति अकेले किसी रेस में हिस्सा ले, फिर भी वो फर्स्ट ना आकर सेकेंड रहे तो आसानी से उसकी क्षमता को समझा जा सकता है। भारतीय रेल की हालत भी कुछ ऐसी ही है, अकेले दौड़ रही है, फिर भी दूसरे नंबर पर है।
मेरा मानना है कि रेलवे की तरक्की तब तक नहीं हो सकती, जब तक रेलमंत्री इसके जरिए अपनी और पार्टी की राजनीति का हित देखते रहेंगे! वैसे तो जब दो सप्ताह के बाद संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला हो तो नैतिकता का तकाजा यही था कि रेलयात्री किराए में पिछले रास्ते से बढोत्तरी ना की जाए, रेल बजट में ही इसका प्रावधान किया जाए। पर यहां भी 56 इँच का सीना का दावा करने वाले मोदी जी का सीना 26 इंच का हो गया, क्योंकि उन्हें लगा कि बजट में किराया बढाया तो देश में बहुत किरकिरी होगी, इसलिए बजट के पहले ही किराया बढ़ा दो.. बजट में फीलगुड लाने के लिए बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात कर जनता को बेवकूफ बनाने में आसानी होगी। सच कहूं तो मोदी भी ऐसा करेंगे, मुझे भरोसा नहीं था। अब देखिए ना पुराने रेलमंत्रियों की तरह सदानंद गौडा ने भी पचासों नई ट्रेन का ऐलान कर दिया, ये जाने बगैर कि पुराने रेलमंत्रियों ने जिन ट्रेनों का ऐलान किया है, उसमें से सैकड़ों ट्रेन अभी पटरी पर नहीं आई है। रेलवे की क्षमता अब ऐसी नहीं है कि किसी भी रुट पर नई ट्रेन का संचालन हो सके, लेकिन लोगों को खुश करने के लिए तमाम ट्रेनों का ऐलान किया गया, इसमें ज्यादातर ऐसी ट्रेन हैं, जो सप्ताह में एक दिन चलेगी।
पहली बार लगा कि ये रेलमंत्री सेफ्टी और सिक्योरिटी में अंतर नहीं समझते। संसद में ताली बजे, इसलिए महिलाओं की सुरक्षा के लिए चार हजार महिला आरपीएफ कांस्टेबिल की भर्ती की बात तो रेलमंत्री ने की, लेकिन सेफ्टी ( संरक्षा ) से जुडे 1.60 लाख खाली पड़े पदों पर भर्ती कब होगी, इस पर वो खामोश रहे। ढेर सारी नईं ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात भी उन्होंने इस बजट में की, लेकिन ट्रेन में किसी व्यक्ति को कैसे आसानी से टिकट मिल जाएगा, कैसे उसे रिजर्वेशन मिलेगा, इस पर वो खामोश रहे। मोदी और रेलमंत्री लगातार दावा करते हैं रेलवे को राजनीति से अलग रखा जाएगा और कोई भी फैसला राजनीति से प्रभावित नहीं होगा। प्रधानमंत्री जी मैं पूछना चाहता हूं कि जब सभी श्रेणी का यात्री किराया 14 प्रतिशत बढ़ाया गया तो इसका विरोध देश भर में हुआ। लेकिन रेलमंत्री ने मुंबई का बढ़ा किराया वापस ले लिया। वजह साफ है कि वहां सात आठ महीने में ही विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में जब रेलमंत्री कहते हैं कि रेलवे से राजनीति नहीं होगी तो लगता है कि देशवासियों को मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं।
एक सवाल पूछता हूं, बजट में जिस तरह की बातें की जा रही हैं, उससे क्या ये सवाल पैदा नहीं होता कि संसद में रेल का अलग से बजट रखने का मतलब क्या है ? पहले एक रुपये किराया बढ़ता था तो देश में हाय तौबा मच जाती थी, यहां दूसरे रास्ते से सैकडों रुपये किराया बढ़ा दिया जाता है और कोई चूं चां तक नहीं करता है। ट्रेन का नाम बदल कर जनता की जेब काट ली जा रही है। अगर यही सब किया जाना है तो मुझे लगता है कि रेल बजट रेलवे के लिए एक सालाना जलसा से ज्यादा कुछ नहीं है। बहरहाल रेल बजट ने तो लोगों को निराश किया है, अगर आम बजट में भी लोगों को कोई राहत ना मिली और रेल बजट की तरह इसमें भी लफ्फाजी की गई तो मोदी की किरकिरी ही होगी। किरकिरी इस मायने में कि वो संख्या बल के आधार पर संसद में भले ही जीत हासिल कर लें, लेकिन जनता के दिलों से वो पूरी तरह उतर जाएंगे। एक बात कहूं मोदी जी प्लीज मुझे मुंगेरी लाल के हसीन सपने मत दिखाइये, मेरे सपनों पर राजनीति मत कीजिए। तकलीफ होती है। विदेशी चैनल पर मुझे देश की असल तस्वीर रखने में आज बहुत कष्ट हुआ।
सिडनी ( आस्ट्रेलिया ) रेडियो ने अपने हिंदी बुलेटिन में रेल बजट पर कार्यक्रम रखा था, जिसमें उन्होंने इस बजट के बारे में मुझसे बातें की। पहला सवाल पूछा गया कि पहले के रेल बजट से ये बजट किस मायने में अलग है ? मैं समझ गया कि विदेशों में भी लोग यही देखना चाहता हैं कि 56 इंच का सीना रखने वाले प्रधानमंत्री का पहला बजट किस दिशा में जा रहा है। सच बता रहा हूं, मैं जब भी विदेशी चैनल या रेडियो या अन्य किसी भी प्रचार माध्यम से जुड़ता हूं तो मेरी पूरी कोशिश होती है कि ऐसी बात ना कहूं जिससे विदेशों में देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। लेकिन इस सवाल के बाद मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि नया कुछ बता दूं..। कसम से, इस बजट में तो एक बात भी नई नहीं है, अलबत्ता मैं ये कहूं कि पुराने रेल मंत्रियों के बजट में मामूली फेरबदल करके इसे पेश किया गया है तो कहना गलत नहीं होगा। चूंकि जनता पुरानी बातों को बहुत जल्दी भूल जाती है, और उसे मामूली बात भी नई नजर आती है। मैं बताना चाहता हूं कि बजट में जिस " बुलेट ट्रेन " की बात को बहुत अहमियत दी गई है। इसकी असल सच्चाई भी जानना आप के लिए बहुत जरूरी है।
बात उस समय की है, जब रेलवे की हालत बहुत पुख्ता थी, उस समय रेलमंत्री स्व. माधवराव सिंधिया थे, वो बड़ा सोचते थे। सबसे पहले देश में बुलेट ट्रेन का सपना उन्होंने ही देखा था। लेकिन इस मामले में काम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद देश में एनडीए की सरकार आई, वो पुराने ढर्रे पर चलती रही, लेकिन मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए एक की सरकार में रेलमंत्री रहे लालू यादव ने देश को एक बार फिर बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया। सपना ही नहीं बल्कि उन्होंने ही पहली बार रेल बजट में बुलेट ट्रेन का ऐलान किया और दिल्ली से पटना के अलावा मुंबई से अहमदाबाद के लिए बुलेट ट्रेन की फिजिविलिटी सर्वै शुरू कराया। बड़ा काम था, इसलिए विदेशी एजेंसियों को सर्वे के लिए हायर किया गया। सर्वे पर करोडों रुपये खर्च किए गए। खैर सच ये है कि रेल मंत्रालय ने बुलेट ट्रेन के लिए कुछ काम जरूर शुरू कर दिया था, पर यूपीए 2 में लालू के पास गिनती के सांसद रह गए, इसलिए रेल महकमा ममता बनर्जी के खाते में चला गया। ममता रेलमंत्री बनीं, पर उनकी निगाह बंगाल की कुर्सी पर थी, इसलिए रेलवे के लिए कुछ बड़ा काम नहीं कर पाईं। बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाया, पर यात्री किराये में बढोत्तरी करने पर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। सच बताऊं त्रिवेदी, मुकुल राय और पवन बंसल के बारे मे चर्चा करना, सही मायने में समय खराब करना है।
बहरहाल मैने आज तक पत्रकारिता में किसी स्तर पर कभी भी समझौता नहीं किया, लिहाजा सिडनी रेडियो पर मैने साफ - साफ पूरी बातें ईमानदारी से कहीं। दूसरा सवाल हाईस्पीड़ ट्रेन के बारे में पूछा गया। मैं हैरान रह गया कि क्या देश कि असल तस्वीर विदेशियों को भी पता है। सही मायने में हाई स्पीड ट्रेन के मामले में मोदी सरकार जनता को बेवकूफ बना रही है। हमारे यहां रेल पटरी की ये हालत अब नहीं रह गई है कि इस पर 100 किलो मीटर प्रतिघंटा से अधिक रफ्तार से कोई ट्रेन चलाई जा सके। मोदी के मंत्री वाहवाही लूटने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं, जो महत्वाकांक्षी रेलमंत्री लालू यादव ने भी नहीं किया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली से लखनऊ के बीच एक एसी स्पेशल ट्रेन चलती थी, जो सप्ताह मे तीन दिन एसी स्पेशल के नाम से जानी जाती थी और तीन दिन यही ट्रेन दुरांतो के नाम से चल रही थी। जनता को मूर्ख समझने वाले रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस ट्रेन का नाम बदल कर राजधानी एक्सप्रेस कर दिया और लगभग 400 रुपये प्रति टिकट किराया बढ़ा दिया। इस ट्रेन का कोई स्टापेज कम नहीं हुआ, रफ्तार नहीं बढ़ी, यहां तक की जो बोगी पुरानी ट्रेन में चल रही थी वही गंदगी से भरी बोगी भी इस राजधानी में इस्तेमाल हो रही है। अच्छा ज्यादा पैसा ले रहे हो तो कम से कम इसे साफ सुथरे प्लेटफार्म से गुजारो, जिससे इस ट्रेन पर सफर करने वालों को वीआईपी होने का आभास हो, पर ये भी नहीं। दिल्ली से ये ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 9 से छूटती है, जबकि लखनऊ में इसे प्लेटफार्म नंबर दो या पांच पर लिया जाता है। मुझे लगा था कि लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह इस पर आपत्ति करेंगे, लेकिन वो भी खामोश हैं। यात्रियों की जेब काटी जा रही है, किसी से कोई मतलब नहीं है।
रेलवे की बातें करूं तो मेरी बात कभी खत्म ही नहीं होगी। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) पर नई सरकार को भी बहुत भरोसा है। उसे लगता है कि पीपीपी के तहत तमाम बड़े काम वो करा सकती है। मैं मोदी साहब को बताना चाहता हूं कि पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ने देश के कुछ चुनिंदा रेलवे स्टेशन को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए पीपीपी के तहत इंटरनेशनल टेंडर निकाला था। आपको हैरानी होगी कि किसी भी विदेशी निवेशक ने इस काम को करने में अपन रुचि नहीं दिखाई। जानते हैं क्यों ? क्योंकि रेलवे ने अपनी विश्वसनीयता ही खो दी है। कोई भी विदेशी निवेशक रेलवे में पैसा लगाने से घबराता है। उसे लगता है कि जिस देश में मामूली किराया बढ़ाने पर रेलमंत्री की छुट्टी हो जाती है, वहां कोई विदेशी निवेशक पैसा लगाने का रिस्क कैसे ले सकता है ? आपको पता है ना कि देश में रेलवे का किसी से कंपटीशन नहीं है, अकेली इतनी बड़ी संस्था है। आप सोचें कि कोई व्यक्ति अकेले किसी रेस में हिस्सा ले, फिर भी वो फर्स्ट ना आकर सेकेंड रहे तो आसानी से उसकी क्षमता को समझा जा सकता है। भारतीय रेल की हालत भी कुछ ऐसी ही है, अकेले दौड़ रही है, फिर भी दूसरे नंबर पर है।
मेरा मानना है कि रेलवे की तरक्की तब तक नहीं हो सकती, जब तक रेलमंत्री इसके जरिए अपनी और पार्टी की राजनीति का हित देखते रहेंगे! वैसे तो जब दो सप्ताह के बाद संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला हो तो नैतिकता का तकाजा यही था कि रेलयात्री किराए में पिछले रास्ते से बढोत्तरी ना की जाए, रेल बजट में ही इसका प्रावधान किया जाए। पर यहां भी 56 इँच का सीना का दावा करने वाले मोदी जी का सीना 26 इंच का हो गया, क्योंकि उन्हें लगा कि बजट में किराया बढाया तो देश में बहुत किरकिरी होगी, इसलिए बजट के पहले ही किराया बढ़ा दो.. बजट में फीलगुड लाने के लिए बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात कर जनता को बेवकूफ बनाने में आसानी होगी। सच कहूं तो मोदी भी ऐसा करेंगे, मुझे भरोसा नहीं था। अब देखिए ना पुराने रेलमंत्रियों की तरह सदानंद गौडा ने भी पचासों नई ट्रेन का ऐलान कर दिया, ये जाने बगैर कि पुराने रेलमंत्रियों ने जिन ट्रेनों का ऐलान किया है, उसमें से सैकड़ों ट्रेन अभी पटरी पर नहीं आई है। रेलवे की क्षमता अब ऐसी नहीं है कि किसी भी रुट पर नई ट्रेन का संचालन हो सके, लेकिन लोगों को खुश करने के लिए तमाम ट्रेनों का ऐलान किया गया, इसमें ज्यादातर ऐसी ट्रेन हैं, जो सप्ताह में एक दिन चलेगी।
पहली बार लगा कि ये रेलमंत्री सेफ्टी और सिक्योरिटी में अंतर नहीं समझते। संसद में ताली बजे, इसलिए महिलाओं की सुरक्षा के लिए चार हजार महिला आरपीएफ कांस्टेबिल की भर्ती की बात तो रेलमंत्री ने की, लेकिन सेफ्टी ( संरक्षा ) से जुडे 1.60 लाख खाली पड़े पदों पर भर्ती कब होगी, इस पर वो खामोश रहे। ढेर सारी नईं ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात भी उन्होंने इस बजट में की, लेकिन ट्रेन में किसी व्यक्ति को कैसे आसानी से टिकट मिल जाएगा, कैसे उसे रिजर्वेशन मिलेगा, इस पर वो खामोश रहे। मोदी और रेलमंत्री लगातार दावा करते हैं रेलवे को राजनीति से अलग रखा जाएगा और कोई भी फैसला राजनीति से प्रभावित नहीं होगा। प्रधानमंत्री जी मैं पूछना चाहता हूं कि जब सभी श्रेणी का यात्री किराया 14 प्रतिशत बढ़ाया गया तो इसका विरोध देश भर में हुआ। लेकिन रेलमंत्री ने मुंबई का बढ़ा किराया वापस ले लिया। वजह साफ है कि वहां सात आठ महीने में ही विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में जब रेलमंत्री कहते हैं कि रेलवे से राजनीति नहीं होगी तो लगता है कि देशवासियों को मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं।
एक सवाल पूछता हूं, बजट में जिस तरह की बातें की जा रही हैं, उससे क्या ये सवाल पैदा नहीं होता कि संसद में रेल का अलग से बजट रखने का मतलब क्या है ? पहले एक रुपये किराया बढ़ता था तो देश में हाय तौबा मच जाती थी, यहां दूसरे रास्ते से सैकडों रुपये किराया बढ़ा दिया जाता है और कोई चूं चां तक नहीं करता है। ट्रेन का नाम बदल कर जनता की जेब काट ली जा रही है। अगर यही सब किया जाना है तो मुझे लगता है कि रेल बजट रेलवे के लिए एक सालाना जलसा से ज्यादा कुछ नहीं है। बहरहाल रेल बजट ने तो लोगों को निराश किया है, अगर आम बजट में भी लोगों को कोई राहत ना मिली और रेल बजट की तरह इसमें भी लफ्फाजी की गई तो मोदी की किरकिरी ही होगी। किरकिरी इस मायने में कि वो संख्या बल के आधार पर संसद में भले ही जीत हासिल कर लें, लेकिन जनता के दिलों से वो पूरी तरह उतर जाएंगे। एक बात कहूं मोदी जी प्लीज मुझे मुंगेरी लाल के हसीन सपने मत दिखाइये, मेरे सपनों पर राजनीति मत कीजिए। तकलीफ होती है। विदेशी चैनल पर मुझे देश की असल तस्वीर रखने में आज बहुत कष्ट हुआ।
Thursday, 3 July 2014
हाई स्पीड ट्रेन के नाम पर धोखा !
नई सरकार को रेल अधिकारी लगातार मूर्ख बना रहे हैं, इसकी मुख्य वजह कमजोर रेलमंत्री है। संभवत: वो रेल अफसरों की चापलूसी को समझ नहीं पा रहे हैं, इसी वजह से उन्हें अधिकारी गुमराह कर रहे हैं ।
एक ओर रेल अधिकारी प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यात्रियों की सुरक्षा की अनदेखी कर कटरा तक ट्रेन चलाने जा रहे हैं, जबकि रेलवे के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने निरीक्षण रिपोर्ट में साफ कहा है कि जल्दबाजी में ट्रेन चलाना खतरनाक होगा, दूसरी ओर " सेमी हाईस्पीड ट्रेन " के नाम पर रेलवे को एक बार फिर करोडों का चूना लगाने की तैयारी है।
याद कीजिए 15 फरवरी 2006 तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने दिल्ली से आगरा के बीच 150 किलोमीटर की रफ्तार से शताब्दी ट्रेन चलाने का दावा करते हुए नई दिल्ली स्टेशन से शताब्दी ट्रेन को हरी झंडी भी दिखाई थी।
दरअसल रेल अफसरों ने लालू को समझाया कि दिल्ली भोपाल शताब्दी ट्रेन को आगरा तक 150 किलोमीटर की स्पीड से चलाते हैं। इस काम के लिए उस समय भी रेल की पटरी पर लगभग 20 करोड रुपये से ज्यादा खर्च भी किए गए।
आप जानकर हैरान होंगे रेल मंत्रालय ने उस दौरान भी यही दावा किया था कि दिल्ली से आगरा 195 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 90 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
रेलवे टाइम टेबिल के हिसाब से ये शताब्दी ट्रेन सुबह 6 बजे नई दिल्ली से रवाना होती है और सुबह 8.06 बजे आगरा पहुंचती है। मतलब साफ है कि कई करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शताब्दी ट्रेन आज तक 150 किलोमीटर की रफ्तार से नहीं चल सकी।
अब आठ साल बाद फिर रेल अधिकारियों ने " मोटा माल " बनाने का रास्ता खोज निकाला है। इसी रेल पटरी पर " सेमी हाईस्पीड " ट्रेन चलाने के लिए ट्रायल रन किया जा रहा है, ये ट्रेन 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलेगी और 90 मिनट में आगरा पहुंचेगी ।
अब रेल अफसरों से ये पूछने वाला कोई नहीं है कि क्या शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलो मीटर की रफ्तार से चल रही है ? अगर चल रही है तो इसे आगरा पहुंचने में 2.06 घंटे क्यों लगते हैं ? नहीं चल रही है तो 2006 में करोड़ों रुपये खर्च हुए, उसका जिम्मेदार कौन है ?
अच्छा एक बात रेल अफसरों से ये भी पूछना चाहता हूं कि जिस ट्रैक पर 150 किलो मीटर की रफ्तार से एक ट्रेन चल रही थी, उस पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से एक और ट्रेन चलाने में आठ साल लग गए ?
मैं जानना चाहता हूं कि 150 की रफ्तार को अपग्रेड कर 160 किलोमीटर करने के लिए क्या क्या काम किया गया ? इस पर कितना पैसा खर्च हुआ ? अब रेल मंत्रालय का कौन सा अफसर गारंटी देगा कि दिल्ली से आगरा के बीच इस खास ट्रेन की स्पीड 160 किलोमीटर रहेगी ही ?
बहरहाल मेरा पुख्ता दावा है कि इस पूरे रेल खंड पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन को चलाना अभी संभव नहीं है। इस रेल खंड में 45 से 50 किलोमीटर ही ऐसी दूरी है जहां 160 की स्पीड से ट्रेन चल सकती है।
चूंकि रेल के इतिहास में पहली बार इतना अधिक किराया बढ़ाया गया है, इसलिए रेल मंत्रालय " फेस सेविंग " के लिए लुभावनी घोषणाएं करने में लगा है। रेलमंत्री अनुभवहीन है, वो मंत्री की नहीं बोर्ड के चेयरमैन की भाषा बोल रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी,
प्लीज
रेल मंत्रालय से ये जरूर पूछा जाना चाहिए कि लालू यादव ने जिस शताब्दी को 150 किलो मीटर रफ्तार से चलाने के लिए 8 साल पहले हरी झंडी दिखाई थी, उसकी असल रफ्तार क्या है ? रेल मंत्रालय पर अगर सख्ती नहीं की गई तो ये यूं ही सरकार को मूर्ख बनाते रहेंगे।
एक ओर रेल अधिकारी प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यात्रियों की सुरक्षा की अनदेखी कर कटरा तक ट्रेन चलाने जा रहे हैं, जबकि रेलवे के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने निरीक्षण रिपोर्ट में साफ कहा है कि जल्दबाजी में ट्रेन चलाना खतरनाक होगा, दूसरी ओर " सेमी हाईस्पीड ट्रेन " के नाम पर रेलवे को एक बार फिर करोडों का चूना लगाने की तैयारी है।
याद कीजिए 15 फरवरी 2006 तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने दिल्ली से आगरा के बीच 150 किलोमीटर की रफ्तार से शताब्दी ट्रेन चलाने का दावा करते हुए नई दिल्ली स्टेशन से शताब्दी ट्रेन को हरी झंडी भी दिखाई थी।
दरअसल रेल अफसरों ने लालू को समझाया कि दिल्ली भोपाल शताब्दी ट्रेन को आगरा तक 150 किलोमीटर की स्पीड से चलाते हैं। इस काम के लिए उस समय भी रेल की पटरी पर लगभग 20 करोड रुपये से ज्यादा खर्च भी किए गए।
आप जानकर हैरान होंगे रेल मंत्रालय ने उस दौरान भी यही दावा किया था कि दिल्ली से आगरा 195 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 90 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
रेलवे टाइम टेबिल के हिसाब से ये शताब्दी ट्रेन सुबह 6 बजे नई दिल्ली से रवाना होती है और सुबह 8.06 बजे आगरा पहुंचती है। मतलब साफ है कि कई करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शताब्दी ट्रेन आज तक 150 किलोमीटर की रफ्तार से नहीं चल सकी।
अब आठ साल बाद फिर रेल अधिकारियों ने " मोटा माल " बनाने का रास्ता खोज निकाला है। इसी रेल पटरी पर " सेमी हाईस्पीड " ट्रेन चलाने के लिए ट्रायल रन किया जा रहा है, ये ट्रेन 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलेगी और 90 मिनट में आगरा पहुंचेगी ।
अब रेल अफसरों से ये पूछने वाला कोई नहीं है कि क्या शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलो मीटर की रफ्तार से चल रही है ? अगर चल रही है तो इसे आगरा पहुंचने में 2.06 घंटे क्यों लगते हैं ? नहीं चल रही है तो 2006 में करोड़ों रुपये खर्च हुए, उसका जिम्मेदार कौन है ?
अच्छा एक बात रेल अफसरों से ये भी पूछना चाहता हूं कि जिस ट्रैक पर 150 किलो मीटर की रफ्तार से एक ट्रेन चल रही थी, उस पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से एक और ट्रेन चलाने में आठ साल लग गए ?
मैं जानना चाहता हूं कि 150 की रफ्तार को अपग्रेड कर 160 किलोमीटर करने के लिए क्या क्या काम किया गया ? इस पर कितना पैसा खर्च हुआ ? अब रेल मंत्रालय का कौन सा अफसर गारंटी देगा कि दिल्ली से आगरा के बीच इस खास ट्रेन की स्पीड 160 किलोमीटर रहेगी ही ?
बहरहाल मेरा पुख्ता दावा है कि इस पूरे रेल खंड पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन को चलाना अभी संभव नहीं है। इस रेल खंड में 45 से 50 किलोमीटर ही ऐसी दूरी है जहां 160 की स्पीड से ट्रेन चल सकती है।
चूंकि रेल के इतिहास में पहली बार इतना अधिक किराया बढ़ाया गया है, इसलिए रेल मंत्रालय " फेस सेविंग " के लिए लुभावनी घोषणाएं करने में लगा है। रेलमंत्री अनुभवहीन है, वो मंत्री की नहीं बोर्ड के चेयरमैन की भाषा बोल रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी,
प्लीज
रेल मंत्रालय से ये जरूर पूछा जाना चाहिए कि लालू यादव ने जिस शताब्दी को 150 किलो मीटर रफ्तार से चलाने के लिए 8 साल पहले हरी झंडी दिखाई थी, उसकी असल रफ्तार क्या है ? रेल मंत्रालय पर अगर सख्ती नहीं की गई तो ये यूं ही सरकार को मूर्ख बनाते रहेंगे।
Thursday, 15 May 2014
UPA : दस साल दस गल्तियां !
एक्जिट पोल के नतीजों से कांग्रेस बुरी तरह घबराई तो है, इसके बाद भी पार्टी आत्ममंथन करने को तैयार नहीं है। पार्टी आत्ममंथन करने के बजाए नेतृत्व को बचाने में लगी है। मसलन पार्टी चाहती है कि किसी तरह हार का ठीकरा सरकार पर यानि मनमोहन सिंह पर फोडा जाए। चुनाव की जिम्मेदारी संभाल रहे राहुल गांधी पर किसी तरह की आँच ना आने दी जाए। बहरहाल पार्टी का अपना नजरिया है, लेकिन यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में दस बड़ी गल्तियों पर नजर डालें तो हम कह सकते हैं सरकार हर मोर्चे पर फेल रही है। कमजोर नेतृत्व, निर्णय लेने में देरी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। आइये एक नजर डालते हैं कि दस साल में दस वो गलती जिसकी वजह से पार्टी को ये दिन देखने पड़ रहे हैं।
मनमोनह सिंह को प्रधानमंत्री बनाना
कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में चुना। दरअसल 2004 में जब सोनिया गांधी को लगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने से देश भर में बवाल हो सकता है तो उन्होंने ब्यूरोक्रेट रहे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, जबकि पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे, जो इस पद के काबिल भी थे, पर सोनिया को शायद वफादार की तलाश रही। मनमोहन सिंह एक विचारक और विद्वान माने जाते हैं, सिंह को उनके परिश्रम, कार्य के प्रति बौद्धिक सोच और विनम्र व्यवहार के कारण अधिक सम्मान दिया जाता है, लेकिन बतौर एक कुशल राजनीतिज्ञ उन्हें कोई सहजता से स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि उन पर कमजोर प्रधानमंत्री होने का आरोप लगा।
भ्रष्टाचार और मंहगाई रोकने में फेल
यूपीए सरकार में एक से बढ़कर एक भ्रष्टाचार का खुलासा होता रहा, लेकिन प्रधानमंत्री किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रहे। यहां तक की कोल ब्लाक आवंटन के मामले में खुद प्रधानमंत्री कार्यालय तक की भूमिका पर उंगली उठी। इसी तरह मंहगाई को लेकर जनता परेशान थी, राहत के नाम पर बस ऐसे बयान सरकार और पार्टी की ओर से आते रहे, जिसने जले पर नमक छि़ड़कने का काम किया। आम जनता महंगाई का कोई तोड़ तलाशने के लिए कहती तो दिग्गज मंत्री यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते कि आखिर हम क्या करें, हमारे पास कोई अलादीन का चिराग तो है नहीं। कांग्रेसी सांसद राज बब्बर ने एक बयान दिया कि आपको 12 रुपये में भरपेट भोजन मिल सकता है, इससे पार्टी की काफी किरकिरी हुई।
अन्ना आंदोलन से निपटने में नाकाम
एक ओर सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे, दूसरी ओर जनलोकपाल को लेकर अन्ना का दिल्ली में अनशन चल रहा था। सरकार इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाई और ये आंदोलन देश भर में फैलता रहा। सरकार आंदोलन की गंभीरता को समझने में चूक गई, ऐसा सरकार के मंत्री भी मानते हैं। अभी अन्ना आंदोलन की आग बुझी भी नहीं थी कि निर्भया मामले से सरकार बुरी तरह घिर गई। देश भर में दिल्ली और यूपीए सरकार की थू थू होने लगी। जनता सरकार से अपना हिसाब चुकता करना चाहती थी, इसी क्रम में पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की बुरी तरह हार हुई, अब लोकसभा में भी पार्टी हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। अगर इन दोनों आंदोलन के प्रति सरकार संवेदनशील होती तो शायद इतने बुरे दिन देखने को ना मिलता ।
देश की भावनाओं को समझने में चूक
यूपीए सरकार के तमाम मंत्री पर आरोप लगता रहा है कि वो देश की भावनाओं का आदर नहीं करते हैं। कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पर सरकार का रवैया दुत्कारने वाला रहा है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने तो हद ही कर दी, इस मामले में उन्होंने संसद में ऐसा बयान दिया कि जिससे जनता और देश दोनों शर्मसार हो गए। एंटनी ने पाकिस्तान का बचाव करते हुए कहाकि पुंछ में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने हुए लोगों ने की, जबकि रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा था कि हमलावरों के साथ पाक सैनिक भी थे। उस समय पाक को दोषमुक्त बताने वाले इस बयान पर जमकर हंगामा हुआ था। इसके अलावा निर्भया कांड में यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी की चुप्पी से भी सरकार और पार्टी के प्रति गलत संदेश गया।
काँमनवेल्थ गेम ने डुबोई लुटिया
मैं समझता हूं कि एशियन गेम के बाद काँमनवेल्थ खेलों का आयोजन देश में खेलों का सबसे बड़ा आयोजन था, लेकिन ये आयोजन लूट का आयोजन बनकर रह गया। इसमें खेलों की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी खेल के आयोजन मे हुए घोटाले की हुई। यहां तक की कांग्रेस के दिग्गज नेता को जेल तक की हवा खानी पड़ी। आखिरी समय में जिस तरह से पीएमओ ने इस आयोजन की खुद माँनिटरिंग शुरू की, अगर पहले ही ऐसा कुछ किया गया होता तो विश्वसनीयता बनी रहती। इसके अलावा 2 जी घोटाले ने तो सरकार के मुंह पर कालिख ही पोत दी, जिसमें महज 45 मिनट में देश को 1.76 लाख करोड का चूना लगा।
मंत्रियों और नेताओं ने जनता से बनाई दूरी
ये तो कांग्रेस का हमेशा से चरित्र रहा है। उनके सांसद विधायक चुनाव जीतने के बाद जनता से संवाद खत्म कर लेते हैं। दोबारा क्षेत्र में वह तभी जाते हैं जब चुनाव आ जाता है। छोटे मोटे नेताओं की बात तो दूर इस बार जब सोनिया गांधी अमेठी पहुंची तो वहां के लोगों ने राहुल की शिकायत की और कहाकि राहुल चुनाव जीतने के बाद यहां उतना समय नहीं दिए, जितना देना चाहिए था। यही वजह कि अमेठी में जहां दूसरी पार्टियों के झंडे नहीं लगते थे, इस बार ना सिर्फ बीजेपी बल्कि आप पार्टी का भी झंडा देखने को मिला। राहुल की हालत इतनी पतली हो गई कि उन्हें मतदान वाले दिन अमेठी में घूमना पड़ा ।
सीबीआई को बनाया तोता
राजनीति को थोड़ा बहुत भी समझने वाले जानते हैं कि यूपीए की सरकार देश में 10 साल इसलिए चली कि उसके पास सीबीआई थी और सरकार ने उसे तोता बनाकर रखा था। मुलायम, मायावती, स्टालिन के स्वर जरा भी टेढ़े होते तो सीबीआई सक्रिय हो जाती थी, ये सब सीबीआई से बचने के लिए सरकार को समर्थन देते रहे। हालाँकि सरकार के काम काज का ये कई बार विरोध भी करते रहे, लेकिन समर्थन वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। राजनाथ सिंह भी समय समय पर इशरत जहां मुठभेड़ मामले की सीबीआई की जांच को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते रहे हैं, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा सरकार की चूलें हिलाने वाले अन्ना हजारे भी कांग्रेस पर सीबीआई दुरुपयोग के आरोप लगाते रहे हैं।
युवाओं को जोड़ने में राहुल नाकाम
युवाओं की बात सिर्फ राहुल के भाषण में हुआ करती थी, राहुल या फिर सरकार ने इन दस सालों में ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे युवाओं को सरकार पर भरोसा हो। सरकार और कांग्रेस नेताओं को पहले ही पता था कि इस पर 18 से 22 साल के लगभग 15 करोड़ ऐसे मतदाता हैं जो पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे हैं, इसके बाद भी सरकार ने कोई मजबूत ठोस प्लान युवाओं के लिए तैयार नहीं किया। केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालयों में लाखों पद रिक्त हैं, एक अभियान चलाकर इन्हें भरा जा सकता था, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। इस चुनाव में बेरोजगारी एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, ये बात यूपीए सरकार के घोषणा पत्र में तो था, लेकिन दस साल सरकार इस मसले पर सोती रही। यूपीए की हार की एक प्रमुख वजह बेरोजगारी भी है।
सोशल मीडिया और तकनीक से परहेज
यूपीए के फेल होने की एक ये भी खास वजह हो सकती है। नरेन्द्र मोदी जहां तकनीक के इस्तेमाल के मामले में अव्वल रहे, उन्होंने आक्रामक और हाईटेक प्रचार का सहारा लिया, वही राहुल गांधी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। सोशल नेटवर्किंग का भी पार्टी उतना इस्तेमाल नहीं कर पाई जितना बीजेपी या फिर आम आदमी पार्टी ने किया। कहा गया कि राहुल ने पांच सौ करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन मेरे हिसाब से तो प्रचार में वो केजरीवाल से भी पीछे रहे। राहुल ने एक दो चैनलों को इंटरव्यू दिया, लेकिन वो कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए, मात्र सरकारी योजनाओं पर उबाऊ तरीके से बात करते रहे। ऐसे में लोगों ने उनकी बात को खारिज कर दिया। प्रियंका गांधी नीच राजनीति का बयान देकर सोशल मीडिया के निशाने पर रहीं, इससे भी पार्टी को मुश्किल का सामना करना पड़ा।
कमजोर चुनावी रणनीति
सरकार हर मोर्चे पर फेल रही, उसके पास ऐसा कुछ नहीं था, जिसे गिना कर वो वोट हासिल कर सके। ऐसे में उन्हें चुनाव की रणनीति पर अधिक काम करने की जरूरत थी, लेकिन अनुभवहीन राहुल ऐसा कुछ करने में नाकाम रहे, वहीं पार्टी के नेता भी खुद भी अलग थलग रहे। ऐन चुनाव के वक्त तमाम नेताओं ने चुनाव लड़ने से इनकार किया, इससे भी पार्टी की किरकिरी हुई। दूसरी ओर बीजेपी की चुनावी रणनीति अव्वल दर्जे की रही, इसके अलावा मोदी ने जिस आक्रामक शैली में प्रचार किया, उससे कांग्रेस पूरी तरह बैकफुट पर रही।
मनमोनह सिंह को प्रधानमंत्री बनाना
कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में चुना। दरअसल 2004 में जब सोनिया गांधी को लगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने से देश भर में बवाल हो सकता है तो उन्होंने ब्यूरोक्रेट रहे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, जबकि पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे, जो इस पद के काबिल भी थे, पर सोनिया को शायद वफादार की तलाश रही। मनमोहन सिंह एक विचारक और विद्वान माने जाते हैं, सिंह को उनके परिश्रम, कार्य के प्रति बौद्धिक सोच और विनम्र व्यवहार के कारण अधिक सम्मान दिया जाता है, लेकिन बतौर एक कुशल राजनीतिज्ञ उन्हें कोई सहजता से स्वीकार नहीं करता। यही वजह है कि उन पर कमजोर प्रधानमंत्री होने का आरोप लगा।
भ्रष्टाचार और मंहगाई रोकने में फेल
यूपीए सरकार में एक से बढ़कर एक भ्रष्टाचार का खुलासा होता रहा, लेकिन प्रधानमंत्री किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रहे। यहां तक की कोल ब्लाक आवंटन के मामले में खुद प्रधानमंत्री कार्यालय तक की भूमिका पर उंगली उठी। इसी तरह मंहगाई को लेकर जनता परेशान थी, राहत के नाम पर बस ऐसे बयान सरकार और पार्टी की ओर से आते रहे, जिसने जले पर नमक छि़ड़कने का काम किया। आम जनता महंगाई का कोई तोड़ तलाशने के लिए कहती तो दिग्गज मंत्री यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते कि आखिर हम क्या करें, हमारे पास कोई अलादीन का चिराग तो है नहीं। कांग्रेसी सांसद राज बब्बर ने एक बयान दिया कि आपको 12 रुपये में भरपेट भोजन मिल सकता है, इससे पार्टी की काफी किरकिरी हुई।
अन्ना आंदोलन से निपटने में नाकाम
एक ओर सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे, दूसरी ओर जनलोकपाल को लेकर अन्ना का दिल्ली में अनशन चल रहा था। सरकार इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाई और ये आंदोलन देश भर में फैलता रहा। सरकार आंदोलन की गंभीरता को समझने में चूक गई, ऐसा सरकार के मंत्री भी मानते हैं। अभी अन्ना आंदोलन की आग बुझी भी नहीं थी कि निर्भया मामले से सरकार बुरी तरह घिर गई। देश भर में दिल्ली और यूपीए सरकार की थू थू होने लगी। जनता सरकार से अपना हिसाब चुकता करना चाहती थी, इसी क्रम में पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की बुरी तरह हार हुई, अब लोकसभा में भी पार्टी हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। अगर इन दोनों आंदोलन के प्रति सरकार संवेदनशील होती तो शायद इतने बुरे दिन देखने को ना मिलता ।
देश की भावनाओं को समझने में चूक
यूपीए सरकार के तमाम मंत्री पर आरोप लगता रहा है कि वो देश की भावनाओं का आदर नहीं करते हैं। कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पर सरकार का रवैया दुत्कारने वाला रहा है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने तो हद ही कर दी, इस मामले में उन्होंने संसद में ऐसा बयान दिया कि जिससे जनता और देश दोनों शर्मसार हो गए। एंटनी ने पाकिस्तान का बचाव करते हुए कहाकि पुंछ में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने हुए लोगों ने की, जबकि रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा था कि हमलावरों के साथ पाक सैनिक भी थे। उस समय पाक को दोषमुक्त बताने वाले इस बयान पर जमकर हंगामा हुआ था। इसके अलावा निर्भया कांड में यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी की चुप्पी से भी सरकार और पार्टी के प्रति गलत संदेश गया।
काँमनवेल्थ गेम ने डुबोई लुटिया
मैं समझता हूं कि एशियन गेम के बाद काँमनवेल्थ खेलों का आयोजन देश में खेलों का सबसे बड़ा आयोजन था, लेकिन ये आयोजन लूट का आयोजन बनकर रह गया। इसमें खेलों की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी खेल के आयोजन मे हुए घोटाले की हुई। यहां तक की कांग्रेस के दिग्गज नेता को जेल तक की हवा खानी पड़ी। आखिरी समय में जिस तरह से पीएमओ ने इस आयोजन की खुद माँनिटरिंग शुरू की, अगर पहले ही ऐसा कुछ किया गया होता तो विश्वसनीयता बनी रहती। इसके अलावा 2 जी घोटाले ने तो सरकार के मुंह पर कालिख ही पोत दी, जिसमें महज 45 मिनट में देश को 1.76 लाख करोड का चूना लगा।
मंत्रियों और नेताओं ने जनता से बनाई दूरी
ये तो कांग्रेस का हमेशा से चरित्र रहा है। उनके सांसद विधायक चुनाव जीतने के बाद जनता से संवाद खत्म कर लेते हैं। दोबारा क्षेत्र में वह तभी जाते हैं जब चुनाव आ जाता है। छोटे मोटे नेताओं की बात तो दूर इस बार जब सोनिया गांधी अमेठी पहुंची तो वहां के लोगों ने राहुल की शिकायत की और कहाकि राहुल चुनाव जीतने के बाद यहां उतना समय नहीं दिए, जितना देना चाहिए था। यही वजह कि अमेठी में जहां दूसरी पार्टियों के झंडे नहीं लगते थे, इस बार ना सिर्फ बीजेपी बल्कि आप पार्टी का भी झंडा देखने को मिला। राहुल की हालत इतनी पतली हो गई कि उन्हें मतदान वाले दिन अमेठी में घूमना पड़ा ।
सीबीआई को बनाया तोता
राजनीति को थोड़ा बहुत भी समझने वाले जानते हैं कि यूपीए की सरकार देश में 10 साल इसलिए चली कि उसके पास सीबीआई थी और सरकार ने उसे तोता बनाकर रखा था। मुलायम, मायावती, स्टालिन के स्वर जरा भी टेढ़े होते तो सीबीआई सक्रिय हो जाती थी, ये सब सीबीआई से बचने के लिए सरकार को समर्थन देते रहे। हालाँकि सरकार के काम काज का ये कई बार विरोध भी करते रहे, लेकिन समर्थन वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। राजनाथ सिंह भी समय समय पर इशरत जहां मुठभेड़ मामले की सीबीआई की जांच को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते रहे हैं, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजा सरकार की चूलें हिलाने वाले अन्ना हजारे भी कांग्रेस पर सीबीआई दुरुपयोग के आरोप लगाते रहे हैं।
युवाओं को जोड़ने में राहुल नाकाम
युवाओं की बात सिर्फ राहुल के भाषण में हुआ करती थी, राहुल या फिर सरकार ने इन दस सालों में ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे युवाओं को सरकार पर भरोसा हो। सरकार और कांग्रेस नेताओं को पहले ही पता था कि इस पर 18 से 22 साल के लगभग 15 करोड़ ऐसे मतदाता हैं जो पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे हैं, इसके बाद भी सरकार ने कोई मजबूत ठोस प्लान युवाओं के लिए तैयार नहीं किया। केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालयों में लाखों पद रिक्त हैं, एक अभियान चलाकर इन्हें भरा जा सकता था, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। इस चुनाव में बेरोजगारी एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, ये बात यूपीए सरकार के घोषणा पत्र में तो था, लेकिन दस साल सरकार इस मसले पर सोती रही। यूपीए की हार की एक प्रमुख वजह बेरोजगारी भी है।
सोशल मीडिया और तकनीक से परहेज
यूपीए के फेल होने की एक ये भी खास वजह हो सकती है। नरेन्द्र मोदी जहां तकनीक के इस्तेमाल के मामले में अव्वल रहे, उन्होंने आक्रामक और हाईटेक प्रचार का सहारा लिया, वही राहुल गांधी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। सोशल नेटवर्किंग का भी पार्टी उतना इस्तेमाल नहीं कर पाई जितना बीजेपी या फिर आम आदमी पार्टी ने किया। कहा गया कि राहुल ने पांच सौ करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन मेरे हिसाब से तो प्रचार में वो केजरीवाल से भी पीछे रहे। राहुल ने एक दो चैनलों को इंटरव्यू दिया, लेकिन वो कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए, मात्र सरकारी योजनाओं पर उबाऊ तरीके से बात करते रहे। ऐसे में लोगों ने उनकी बात को खारिज कर दिया। प्रियंका गांधी नीच राजनीति का बयान देकर सोशल मीडिया के निशाने पर रहीं, इससे भी पार्टी को मुश्किल का सामना करना पड़ा।
कमजोर चुनावी रणनीति
सरकार हर मोर्चे पर फेल रही, उसके पास ऐसा कुछ नहीं था, जिसे गिना कर वो वोट हासिल कर सके। ऐसे में उन्हें चुनाव की रणनीति पर अधिक काम करने की जरूरत थी, लेकिन अनुभवहीन राहुल ऐसा कुछ करने में नाकाम रहे, वहीं पार्टी के नेता भी खुद भी अलग थलग रहे। ऐन चुनाव के वक्त तमाम नेताओं ने चुनाव लड़ने से इनकार किया, इससे भी पार्टी की किरकिरी हुई। दूसरी ओर बीजेपी की चुनावी रणनीति अव्वल दर्जे की रही, इसके अलावा मोदी ने जिस आक्रामक शैली में प्रचार किया, उससे कांग्रेस पूरी तरह बैकफुट पर रही।
Subscribe to:
Posts (Atom)



















