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Tuesday, 6 June 2017

स्वच्छता सर्वे या बिहार की मेरिट लिस्ट !

स्वच्छता रिपोर्ट के कवर पेज से इंदौर गायब ! 
सच्चाई ये है कि अगर भारत सरकार की स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट की बारीकी से निष्पक्ष जांच कराई जाए तो  ये बिहार की मेरिट लिस्ट से कम नहीं निकलने वाली है। मुझे ये कहने में भी कत्तई हिचक  नहीं है कि जिस तरह बिहार में जांच के बा
द मेरिट में आए छात्र और उस स्कूल के प्राचार्य को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है , ठीक उसी तरह अगर इस स्वच्छता रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच हो जाए तो ना सिर्फ इंदौर की हकीकत सामने आएगी, बल्कि यहां भी कई अफसरों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। दो साल इंदौर में रहा हूं, इसलिए ना सिर्फ यहां की सफाई से वाकिफ हूं बल्कि अफसरों की फितरत को भी भली भांति समझता हूं।

जान लीजिए लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन यहां से  सांसद है, इसलिए इंदौर के सामले  में सभी राजनीतिक दल खामोश रहते हैं। ताई का ना सिर्फ इंदौर बल्कि देश भर में एक अलग  सम्मान है। केंद्र सरकार की जो भी योजना होती है, सभी में इंदौर का नाम शामिल हो जाता है ,जबकि यहां तैनात ज्यादातर अफसर नाकाबिल है, लेकिन अपनी मार्केटिंग और जी हजूरी अच्छी कर लेते हैं। यहा हर उस अफसर को मुख्यमंत्री की ताकत मिलती है जो यहां के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय का विरोधी है । खैर अभी बात सिर्फ सफाई की ।
इंदौर शहर को खान नदी दो हिस्सों मे बांटती है। गंदगी से अटी पड़ी ये नदी अब नाला बन चुकी है । इसके दोनों ओर भारी गंदगी है और इसके आप पास रहना मुश्किल है। जो इलाका साफ सुथरा दिखाई भी दे रहा था, मसलन विजयनगर, स्कील 54 वगैरह । यहां निगम अफसरों ने सड़क पर फूहड तरीके से टाँयलेट बनवा दिए है और उस पर गांव गिरांव की तरह लिखा है मूत्रालय । जैसा टाँयलेट इंदौर निगम ने बनवाया है वो टाँयलेट यूपी के गांव में बने टायलेट से भी घटिया है। चूंकि ताई की वजह से इंदौर को ना सिर्फ स्मार्ट सिटी स्कीम में शामिल किया गया बल्कि पहले 20 स्मार्ट सिटी में शामिल किए जाने से केंद्र सरकार से करोडों रुपये साफ सफाई के लिए मिल गए । अब अनाप शनाप पैसे मिल रहे हैं और अधिकारी मौज ले रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी  का गोंडा शहर सबसे गंदा है, मैं हैरान हूं कि भारत सरकार को ये रिपोर्ट जारी करने में शर्म भी महसूस नहीं हुई । अरे पता तो करते गोंडा को साफ सफाई के लिए कितना पैसा दिया गया है । इंदौर में तो माहौल बनाने के लिए एक दिन में अफसरों ने 10 लाख रुपये के गुब्बारे हवा में उ़डा दिए, गोडा मे सफाई के लिए साल में 10 लाख नहीं मिले  होंगे । इस रिपोर्ट में  स्वच्छता का जो क्राइट  है, वो भी दोषपूर्ण है।

कुल 2000 अंको में शहरों को नंबर दिए गए हैं । इसमें 900 अंक स्थानीय निकायों के डाक्यूमेंटेशन का है, जबकि सिटीजन फीडबैक पर 600 और निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए महज 500 अंक है। अब अगर डाक्यूमेंटेशन में इँदौर को   875 अंक मिलते हैं और गोंडा को सिर्फ 52 तो इसमें शहर या शहरियों की क्या गलती है ? जिन अफसरों ने डाक्यूमेंटेशन ठीक नहीं किया, उन्हें अब तक  निलंबित हो जाना चाहिए था। इसी तरह  सिटीजन फीडबैक को ले लें , इसके 600 अंकों में से इंदौर को मिले हैं 467 और गोंडा के खाते में आए 192 अंक । यहां ये जानना जरूरी है कि इंदौर की आबादी गोंडा के मुकाबले चार गुना है, इंदौर संपन्न शहर है, ज्यादातर लोग मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, जबकि गोंडा एक पिछडा शहर है। बता चुका हू कि इँदौर मे माहौल बनाने के लिए सिर्फ एक दिन में 10 लाख गुब्बारे हवा मे उडाए गए। अच्छा इसके बाद भी अंबिकापुर ने 501 अंक हासिल कर इंदौर को दूसरे नंबर पर धकेल दिया है। सबसे महत्वपूर्ण निष्पक्ष आब्जर्वेशन का है, जो  सिर्फ 500  अंकों का है। इसमें इंदौर को 435 अंक मिले हैं, जबकि कई दूसरे शहरों को इंदौर से अधिक अंक मिले हैं।

साफ है कि भारत सरकार ने पूरी तरह गलत तथ्यों पर आधारित रिजल्ट घोषित किया था, यही वजह है कि कल यानि 5 जून को जनता का  धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए प्रणाम इंदौर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में लाखों रूपये पानी की तरह बहाए गए। भगवान को ये मंजूर नहीं था और उन्होंने अपना रौद्र रूप दिखाया, आंधी तूफान में सारे पांडाल उडा दिए , वीआईपी भी मुश्किल से यहां से निकल पाए । मैं चुनौती देता हूं कि अगर कोई निष्पक्ष टीम  इंदौर का निरीक्षण करेगी तो ना सिर्फ यहां की हकीकत सामने आएगी, बल्कि बेईमान अफसरों को भी  जेल  जाना होगा ।

भगवान को मंजूर नहीं झूठ  !














इंदौर की असल तस्वीर !

इंदौर की असल तस्वीर !

इंदौर की असल तस्वीर !



Monday, 12 October 2015

इंदौर : जल्लाद से कम नहीं अफसर और डाक्टर !

रात के दो बज रहे हैं, कुछ देर पहले ही आफिस से आया हूं, नींद नहीं आ रही है, लेकिन मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं, वजह !  इंदौर में एक ऐसा हादसा जिसने कम से कम मुझे तो बुरी तरह झकझोर कर रख ही दिया है। पूरी घटना की चर्चा करूं,  इसके पहले आपका इतना जानना जरूरी है कि एक गरीब सड़क दुर्घटना में घायल हो गया, जब वो अस्पताल पहुंचा तो यहां डाक्टर इस घायल मजदूर के इलाज में कम उसके अंगदान करने पर ज्यादा रूचि लेते रहे।  इतना ही नहीं पर्दे के पीछे शहर में तैनात एक बड़ा हुक्मरान लगातार प्रगति पूछता रहा कि परिवार के लोग अंगदान खासतौर पर लिवर दान के लिए तैयार हुए या नहीं ? काफी मान मनौव्वल करके आखिर में परिवार को अंगदान के लिए डाक्टरों ने तैयार कर ही लिया और इस मरीज को " ब्रेनडेड " बताकर इसका लिवर, दोनों किडनी, दोनों आंखे और स्किन निकाल ली। इसके बाद इस परिवार के साथ जो हुआ उससे अफसर, अस्पताल और डाक्टरों की हैवानियत सामने आती है। परिवार को शव सौंपने के लिए पहले इलाज का बिल चुकाने का दबाव बनाया गया, 17 हजार जमा कराने के बाद ही शव दिया गया। अस्पताल से एंबुलेंस के जरिए ये शव जब मरीज के  गांव पहुंचा तो ड्राईवर शव उतारने के पहले किराए के 2800 रुपये वसूल लिए, तब लगता है कि मध्यप्रदेश में वो सब भी होता है जो यूपी और बिहार के अफसर भी करने के पहले सौ बार सोचते हैं। सच तो ये कि इन डाक्टरों और अफसरों को जल्लाद कहूं तो भी गलत नहीं है।


चलिए अब सीधे मुद्दे पर बात करते हैं। इंदौर से लगभग 150 किलोमीटर दूर खरगोन में सोमवार 5 अक्टूबर को सड़क दुर्घटना में एक मजदूर घायल हो गया, लोगों ने उसे वहां के जिला सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया। डाक्टर ने प्राथमिक चिकित्सा के बाद परिवार से कहाकि अस्पताल की सीटी स्कैन मशीन खराब है, आप बाहर से सीटी स्कैन करा लें । ये सुनकर परिवार के लोग एक दूसरे की ओर देखने लगे, क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं था कि वो बाहर से सीटी स्कैन करा सकें। इस पर डाक्टर ने घायल मजदूर को ये कहकर इंदौर रैफर कर दिया कि यहां सुविधाएं नहीं है। परेशान परिजन रात करीब नौ बजे घायल मजदूर को वहां से लेकर इंदौर के लिए निकल जाते हैं।


असल कहानी यहां से शुरू होती है। तीन घंटे के रास्ते में परिवार के लोग इंदौर में रहने वाले अपने एक दूर के रिश्तेदार से बात करते हैं, जो एक साधारण सी नौकरी करता है। अंदरखाने इनकी क्या बातचीत होती है ये यही लोग बता सकते हैं, लेकिन हैरानी इस बात की हुई रात १२ बजे जब ये मरीज को लेकर इंदौर पहुंचते हैं तो वो यहां के सरकारी अस्पताल नहीं जाते, बल्कि सीधे एक प्राईवेट पांच सितारा अस्पताल में मरीज को ले जाते हैं। जबकि इस अस्पताल में मरीज को बाद में अंदर किया जाता है, पहले हजारों रुपये अंदर किए जाते हैं। अस्तपाल इस मामले में काफी बदनाम भी है, ज्यादातर लोग यहां से असंतुष्ट होकर ही जाते हैं। खैर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि जिस परिवार के पास तीन घंटे पहले सीटी स्कैन कराने के पैसे नहीं थे, अचानक ऐसी कौन सी लाटरी लगी कि वो इस लुटेरे साँरी पांच सितारा अस्पताल में आ गए। खैर यहां उनका रिश्तेदार इंतजार कर रहा था, उसने तुरंत 10 हजार रुपये जमा किए और घायल मजदूर को अस्पताल वालो ने अंदर कर लिया।


परिवार के लोगों को रात भर नहीं पता चला कि उसके मरीज का क्या हाल है, क्या इलाज चल रहा है, मरीज कोई रिस्पांड दे भी रहा है या नहीं। कुछ भी परिवार के लोगों से चर्चा नहीं हुई, हां एक दो बार ये जरूर कहा गया कि इलाज चल रहा है। अरे भाई अस्पताल है तो इलाज तो होगा ही ना, ये क्या बात हुई ? अब सुबह हो चुकी थी यानि मंगलवार का दिन और सुबह के लगभग साढे सात ही बजे होंगे कि दिल्ली से दो डाक्टर इंदौर आ गए । इन डाक्टरों ने मजदूर के परिवार को बुलाया और बात शुरू की। जानते हैं क्या बात चीत की गई ?  बात ये कि कम उम्मीद है कि आपका मरीज ठीक हो, अगर ऐसा है तो आप लिवर दान कर दीजिए,  किसी की जान बच जाएगी। वेवजह इंतजार करना ठीक नहीं है। सुबह साढे सात बजे ये बात शुरू हुई और हर घंटे दो घंटे पर यही बात दुहराई जाने लगी। मंगलवार को शाम होते होते अस्पताल के भी डाक्टर अंगदान पर जोर देने लगे। शर्मनाक ये कि लिवर लेने के लिए इंदौर का एक बडा हुक्मरान भी अस्पताल पहुंच गया, पर उन्होंने मरीजों से सीधे बात नहीं की,  डाक्टरों के जरिए ही दबाव बनाते रहे। बहरहाल जो कुछ भी हुआ हो अगले दिन सुबह ही शहर में हलचल तेज हो गई । इस पांच सितारा अस्पताल से एयरपोर्ट तक " ग्रीन कांरीडोर " घोषित कर दिया गया । ग्रीन काँरीडोर मतलब एंबुलेंस निकले तो हर वाहन को रोक दिया जाए।


ग्रीन कारीडोर की खबर शहर में फैलते ही मीडिया सक्रिय हुई तो पता चला कि एक घायल मजदूर को डाक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया है और अब उस मजदूर के परिवार की इच्छानुसार उसका अंगदान किया जाना है। मजदूर का लिवर दिल्ली जा रहा है, जबकि किडनी और आँख, स्किन इंदौर में इस्तेमाल किया जाएगा। यहां एक बात बताना जरूरी है, चमत्कार को मेडिकल साइंस भी पूरी तरह नकारता नहीं है, उसे भी लगता है कि कई बार चमत्कार होते हैं और ऐसे मरीज ठीक हो जाते हैं जिनकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं होती है। अब देखिए यहां तो रात में मरीज भर्ती हुआ और सुबह ही डाक्टर उसका लिवर और किडनी आंख सब मांगने लगे। इसके आगे का सच सुनेंगे तो डाक्टरों और अफसर पर थूकने लगेंगे। बताया तो ये भी जा रहा है कि कुछ दिन पहले एक एक्सीडेंट हुआ था, उसके घायल का भी लिवर लेने का विचार हो रहा था, लेकिन मरीज दगा दे गया और उसने समय से पहले ही दम तोड़ दिया, इसलिए इस बार डाक्टर कोई रिश्क नहीं लेना चाहते थे।


जब तक डाक्टरों के हाथ लिवर नहीं लगा था, तब तक तो परिवार वालों को तरह तरह के लालच दिए जा रहे थे। मरीज के भाई से कहा गया कि उसके अंधे बेटे को निशुल्क आँख लगा दी जाएगी, वो देखने लगेगा। ऐसे ही ना जाने क्या क्या दिलासा दिलाया गया, लेकिन जैसे ही लिवर लेकर डाक्टरों ने दिल्ली के लिए उडान भरी, यहां घंटो से डेरा डाले रहा अफसर सबसे पहले खिसक गया। अब अस्पताल ने परिवार वालों को शव दिए जाने के पहले इलाज का पैसा देने को कहा। बहरहाल उनका जो रिश्तेदार इँदौर में मौजूद था उसने कुछ इंतजाम कर  17 हजार रुपये जमा किए। तब जाकर बाँडी दी गई, लेकिन गांव पहुंचने पर शव को उतारने से पहले ड्राईवर अड गया और उसने 2800 रुपये ऐंठ लिए।


दो दिन बाद मीडिया में जब ये खबर आई कि अस्पताल ने अंगदान करने वाले के परिवार से ऐसा बर्ताव किया तो पहले अस्पताल प्रबंधन की ओर से कहा गया कि बिल तो सवा लाख के करीब था लेकिन सिर्फ  27 हजार ही लिया गया है, लेकिन मामला तूल पकड रहा था, इसे देखकर फिर अखबार के दफ्तरों को फोन कर कहा गया कि जो पैसा लिया गया है वो वापस कर दिया जाएगा। एक दिन खबर छपी तो इंदौर से भोपाल तक डाक्टर, अफसर और नेताओं सभी के पसीने छूट गए। तुरंत एक अफसर मजदूर के गांव पहुंचा और रेडक्रास सोसाइटी की तरफ से अंगदान करने वाले परिवार को एक लाख रुपये का चेक दे आया। अगले दिन मुख्यमंत्री ने भी पांच लाख रुपये की घोषणा कर दी । मेरी समझ में नहीं आया कि ये सहायता है या फिर सौदा ?

बहरहाल अब मजदूर की मौत हो चुकी है, उसका अंतिम संस्कार भी हो चुका है, पर ये सवाल अभी भी बना हुआ है कि आखिर दिल्ली में किस बड़े आदमी को लिवर देने के लिए मजदूर की जान बचाने की कोशिश तक नहीं हुई और लिवर निकालने की डाक्टरों ने जल्दबाजी की। इंदौर के हुक्मरान ने तो नियम कायदे को भी ताख पर रख दिया और प्राईवेट अस्पताल के ओटी में पोस्टमार्टम करने के लिए सरकारी डाक्टरों को बुला लिया, जबकि नियमानुसार पोस्टमार्टम प्राईवेट अस्पताल में हो ही नहीं सकता। इससे भी लगता है कि कोई बडे नेता का रिश्तेदार होगा जिसे लिवर की जरूरत थी या फिर पैसे वाला। बहरहाल अब तड़के साढे तीन बजने वाले हैं, मन यही कह रहा है कि इँदौर का ये अफसर कहीं वाकई कातिल तो नहीं है ?


नोट :  मित्रों दिल को दहला देने वाली इस घटना ने मेरी तो नींद उड़ा दी है,  कहना सिर्फ इतना है कि ये वाकया हर आदमी तक पहुंचना चाहिए, जिससे मध्यप्रदेश और यहां के हुक्मरानों का असली चेहरा लोगों तक पहुंच सके । प्लीज ...




Tuesday, 29 September 2015

इंदौर: कभी पी नहीं, फिर भी कर रहे शराब की बुराई !

आजकल इंदौर में हूं, बड़ा सात्विक शहर है, मैं भी आज सुबह ही शहर के राजा यानि " खजराना गणेश " जी के दर्शन करके आया हूं। अभी यहां गणेश उत्सव चल रहा था, आज ही खत्म हुआ है, कहते हैं कि गणेश उत्सव के दौरान घर-घर गणेश जी विराजते हैं, इसलिए इस दौरान शराब वगैरह नहीं पीना चाहिए। रविवार को दोपहर १२.०६ बजे गणेश जी का विसर्जन होते ही श्राद्ध शुरू हो गया, अब शराब तो श्राद्ध में भी नहीं पी जाती और श्राद्ध खत्म होते ही नवरात्र की शुरुआत। अब मित्रों ऐसे तो नहीं चल सकता ना। एक बात बताऊँ, इंदौर में हर आदमी शराब का विरोधी है, कुछ दिन पहले सूबे की सरकार ने शराब की दुकानों के बंद होने का समय रात ११ से बढ़ाकर ११.३० कर दिया, इस बात पर शहर में बवाल हो गया, इसके खिलाफ अखबार के पन्ने रंग गए, कोर्ट में जनहित याचिका लग गई। मैने भी सोचा ये क्या हो गया है सूबे के मुख्यमंत्री को ... बेवजह बैठे बिठाए विवादों को जन्म दे दिया। खैर इंदौर के बारे में ये बताना भी जरूरी है कि शहर में जहां मैं रहता हूं, उसके करीब में ही कई नेशनल बैंक की शाखाएं हैं और इससे बिल्कुल लगी हुई व्हिस्की की एक बड़ी दुकान है, लेकिन यहां सुबह बैंक से पहले व्हिस्की की दुकान खुल जाती है और बैंक मे कस्टमर हों या ना हों शराब की दुकान पर रौनक जरूर रहती है। इंदौर में हर समाज के लोग शराब पीते तो हैं, लेकिन दुकान से खुद शराब खरीदने से डरते हैं, वजह ये कि कोई देख ना ले। इसलिए यहां ज्यादातर शराब की दुकानों के आस पास कुछ लड़के खड़े मिल जाएंगे जो शराब की दुकान से दूर खड़ी कारों में शराब पहुंचा देते हैं।

ये तो रही शराब की दुकानों की बात ! थोड़ी चर्चा नानवेज की भी जरूरी है। बात पुरानी है, मैं यहां अपने पारिवारिक मित्र के साथ एक दिन कारोबार पर था । ( नया शहर है, शायद कारोबार ना समझे, इसलिए बताना जरूरी है, कारोबार बोले तो कार में बार ) हम लोगों ने अपनी कार शहर के जाने माने नानवेज ठेले ( गुरुद्वारे के पास ) पर रोकी, मैं थोड़ा खुश भी हुआ कि बिल्कुल भीड़ नहीं है,  तुरंत नानवेज मिल जाएगा। यहां पर खासतौर पर चिकन फ्राई और फिश फ्राई ज्यादा टेस्टी है। ठेलेवाले को आर्डर देने के काफी देर बाद तक जब उसने हमें फिश और चिकन नहीं दिया तो मैं कार से उतरा और पूछा कि तुम्हारे पास एक भी ग्राहक नहीं है और इतनी देर हो गई, अभी तक हमें नहीं दिया। दुकानदार ने बड़े ही मासूमियत से कहा " बाबू जी आस पास २०० मीटर तक की दूरी पर जितनी भी गाड़िया खड़ी हैं, सभी के आर्डर हैं, इन सभी गाडियों में लोग ड्रिंक्स ले रहे हैं, ठेले के पास गाड़ी इसलिए खड़ी नहीं करते कि कोई देख ना ले, ज्यादातर लोग यहां चोरी से नानवेज खाते हैं। आपके आर्डर में थोड़ा समय और लगेगा। "  मेरा माथा ठनका, खुद से सवाल किया,  क्या है ये शहर, होता सब है लेकिन चोरी से ।

अच्छा खास बात ये कि नानवेज और शराब की बुराई करने में वो लोग शामिल हैं जिनको इसका दो पैसे का अनुभव नहीं है । इन लोगों ने न कभी शराब पर पैसे खर्च किए और ना ही लाइन में लगकर मटन की शाप से मांस खरीदा। ऐसे लोग जब शराब और नानवेज की बुराई करते हैं तो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पीड़ा होती है। मुझे नानवेज का बचपन से और ड्रिंक्स का पिछले २५ साल का पर्याप्त अनुभव है और मैं पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि कुछ बातों का ख्याल भर रख लिया जाए तो ये दारू आपके लिए दवा बन जाती है और कई गंभीर बीमारियों के बीच में पत्थर की तरह खड़ी हो जाती है। जो नहीं जानते वो कुछ भी कहें, लेकिन रिसर्च में आई कुछ जानकारी आप से शेयर करना चाहता हूं, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में व्हिस्की की बिक्री में काफी बढ़ोत्तरी हुई हैं । सच ये है कि अल्कोहल में भी लोगों का फेवरेट ब्रांड व्हिस्की बनता जा रहा है। आप हंसेंगे या फिर इसे जोक समझेगें, लेकिन सही ये है कि व्हिस्की के कई फायदे भी हैं।


व्हिस्की से वजन नहीं बढता : आमतौर पर नासमझ लोग बीयर पीते हैं, जबकि कई साऱी मिक्स ड्रिंक्स पीने से बेहतर है कि लो कैलोरी वाली व्हिस्की पी जाए। जानकारों की माने तो व्हिस्की में कार्बोहाइड्रेट का पर्याप्त श्रोत पाया जाता है, इसके एक पैग में सिर्फ ५ केलोरी होती है, जिससे मोटापा नहीं नहीं बढ़ता है और ये आपके पाचन को भी दुरुस्त रखती है।


ह्दय के स्वास्थ के लिए फायदेमंद : डार्क बीयर और वाइन के अलावा व्हिस्की भी ऐसा पदार्थ है जो कि ह्रदय के लिए काफी फायदेमंद है, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर व्हिस्की हार्ट अटैक के खतरे को कम करती है, इतना ही नहीं ये गुड कॉलेस्ट्रॉल को भी बढ़ाता है।

कैंसर से लड़ने में मदद : व्हिस्की में एलाजिक एसिड, एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ये शरीर में कैंसर से लड़ने की क्षमता बढ़ती है, इतना ही नहीं, व्हिस्की केंसरे के मरीजों को होने वाली  कीमोथेरेपी के प्रभाव को भी कम करता है।

दिमाग की सेहत को रखती है तंदरूस्त : कई रिसर्च अब ये बात साबित कर चुकी हैं कि व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से अल्जाइमर बीमारी और डिमेन्शिया के खतरे को कम किया जा सकता है, इथेनोल की अच्छी मात्रा होने के कारण ये दिमाग के न्यूरॉन्स को सक्रिय रखने में मदद करता है, इससे याददाश्त ठीक रहती है।

स्ट्रोक के खतरे को करती है कम : क्योंकि ये बैड कॉलेस्ट्रॉल को कम करता है इस वजह से स्ट्रोक का खतरा भी कम हो जाता है, व्हिस्की धमनियों में खून क्लॉट होने से रोकने में मदद करती है, जिससे दिल के दौरे का खतरा काफी कम हो जाता है।

तनाव को करता है कम : ये तो सभी जानते हैं तनाव ना सिर्फ शरीर को बीमार करता है बल्कि इससे मेंटल हेल्थ भी प्रभावित होती है, ऐसे में व्हिस्की की एक सीमित मात्रा लेने से तनाव दूर होता है और नर्व्स को आराम मिलता है.

मधुमेह के रोगियों के लिए भी फायदेमंद : व्हिस्की में शुगर की मात्रा कम होती है ऐसे में ये उन लोगों के लिए परफेक्ट ड्रिंक हो सकती है जो डायबिटीज के शिकार है, यहां याद रखना होगा कि रम जरूर शूगर को बढाता है। रम और व्हिस्की में अंतर करना जरूरी है।

चलते- चलते

दो दिन पहले इंदौर में बकरीद पर हुई नमाज के बाद अपनी तकरीर में शहर काजी ने कहाकि कुछ स्थानों पर मुश्लिम महिलाएं नशे का सेवन कर रही हैं, उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। हालाकि नशा करना ठीक नहीं है, ये बात सौ प्रतिशत सही है, पर मुझे पता नहीं क्यों लगता है कि अब मुश्लिम महिलाएं भी देश की मुख्यधारा से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं।



Thursday, 12 January 2012

बात खत्म नहीं हुई, फ्लाइट का समय हो गया ...

जी हां, यही सच है कि मेरी बातें खत्म नहीं हुई और फ्लाइट का समय हो गया। मुझे बेमन से अपनी बातचीत को बीच में रोक कर रश्मि प्रभा जी से बिदाई लेनी पड़ी। हां चलते चलते उन्होंने मेरे इस आग्रह को जरूर स्वीकार किया कि फरवरी में दिल्ली में होने वाले बुक फेयर में हिस्सा लेने आने पर वो घर जरूर आएंगी। दरअसल दो दिन पहले मुझे कुछ जरूरी काम से पुणे जाना पड़ा। मैने पहले ही तय कर लिया था कि पुणे जाऊंगा तो इस बार रश्मि जी से जरूर मुलाकात करुंगा। मैने दिल्ली से ही उन्हें बता दिया था कि मैं दो दिन के लिए पुणे आ रहा हूं, पहले दिन तो मैं थोड़ा व्यस्त हूं, लेकिन दूसरे दिन मेरे पास इतना वक्त जरूर होगा कि मैं आपसे मिल सकूं।
पुणे पहुंच कर पहले दिन मैने अपना काम निपटाया, जो कुछ बाकी रह गया, उसे अगले दिन पूरा करने के बाद मैं आ गया रश्मि जी के घर पुणे के विमान नगर। रश्मि जी के घर आने का जो समय मैने बताया था, मैं उससे दो घंटे पहले ही पहुंच गया। बताऊं यहां मुझे एक मिनट भी ऐसा नहीं लगा जैसे मैं इस घर में पहली बार आया हूं और नए लोगों के बीच में हूं। बाकी बातें तो मैं करुंगा लेकिन एक बात मैं आप सबसे बहुत ही ईमानदारी से कहना चाहता हूं कि इस ब्लाग परिवार में बहुत ही अपनापन, स्नेह और एक दूसरे के प्रति आदर है। आपको मालूम है कि पिछले दिनों मेरी मुलाकात बहुत ही पुराने ब्लागर आद.डा.रूपचंद्र शास्त्री जी से हुई थी। दरअसल ब्लाग परिवार में शामिल होने के बाद शास्त्री जी ही वो पहले शख्स थे, जिनसे मेरी आमने सामने मुलाकात हुई। उनसे मिलने के बाद मैने तय कर लिया कि मैं जहां कहीं भी जाऊंगा, अगर वहां कोई ब्लागर होगा तो मैं निश्चित ही उनसे मिलूंगा। अभी हफ्ते भर पहले की बात है, मैं इंदौर में था, वहां मेरी मुलाकात हुई ब्लागर श्रीमति कविता वर्मा जी से। मैं बहुत दिनों से उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर में मत्था टेकना चाहता था, मेरी ये इच्छा भी कविता जी ने पूरी करा दी। सच कहूं तो हम इस परिवार को "ब्लाग परिवार" कह कर इसकी गरिमा को कम करते हैं, इस परिवार के लिए कोई और उपयुक्त शब्द की हम सब को तलाश करनी होगी।
रश्मि जी के घर मैंने लगभग पांच घंटे बिताए। घर परिवार के हालचाल से शुरू हुआ बातों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। मैने अभी तक रश्मि जी की रचनाओं को पढा था, आज वो खुद सामने थीं, उन्हें पढ़ रहा था। मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि उनकी रचनाओं में जितनी संवेदनशीलता दिखाई देती है, वो यूं ही नहीं झलकती है। इसकी वजह है, और वो ये कि खुद रश्मि कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं। उनकी रचनाएं दिमाग से नहीं दिल से लिखी होती हैं। और जब कोई दिल से लिखता है तो जाहिर है कि वो रचनाकार अपनी रचनाओं के जरिए लोगों के दिलों में जगह बना लेता है, फिर लोगों के दिलों पर राज करता है। रश्मि जी ऐसी ही शख्सियत हैं। वो लेखकों में बडे छोटे का भेद नहीं करती हैं, दूसरे ब्लागरों की चर्चा करते हुए भी उनके प्रति पूरे सम्मान से बातें करती है। हां हो सकता है कि आपको उनकी ये बात अच्छी ना लगे, लेकिन सच यही है कि वो झूठी प्रशंसा नहीं कर पाती हैं। हालांकि उन्हें इस बात की तकलीफ भी है, बताती हैं कि कई बार मैं जब लोगों के ब्लाग पढती हूं तो सोचती हूं कि कमेंट कर दूं, लेकिन यहां दिल पर दिमाग भारी पड़ जाता है और कहता है कि ये ठीक नहीं है।
बातचीत में उन्होंने कई ब्लागर के नाम गिनाएं जिन्हें वो बहुत पसंद करती हैं। जिनकी रचनाएं उन्हें पसंद है, वो उनकी तारीफ करने में बिल्कुल कंजूसी नहीं करती हैं। देखिए मैं भी इसी समाज से जुडा आदमी हूं। दूसरों की तारीफ सुन सुन कर मैं थक गया, इतनी देर से रश्मि जी मेरी किसी रचना की तारीफ ही नहीं कर रहीं थीं। अरे भाई दूसरों की तारीफ के बीच मेरी भी होती तो चल जाता। मेरी तारीफ कैसे हो, मैं सोचने लगा। खैर ये सही बात है कि मैं दिल्ली का रहने वाला नहीं हूं, पर काफी समय से यहां रह रहूं तो थोडा असर तो है ना दिल्ली का। मतलब "देखो मौका लगाओ चौका"। चाय आ चुकी थी, इसकी चुस्कियों के बीच मैने कहा दीदी आपने मेरी कविताएं लगता है नहीं पढीं। बस इस सवाल का जवाब वो नहीं में दे गईं। हाहाहाहा फिर क्या था उनकी इतनी सी गल्ती काफी थी कि मैं अपनी दो एक रचनाएं उन्हें फटाफट सुना दूं, मैने ये इंतजार किए बिना की वो कुछ सुनना चाहती हैं या नहीं, तड़ से दो कविताएं उगल दी। अब उस समय तो उन्होंने "बहुत सुंदर" ही कहा था, सच में अच्छी लगी या नहीं उसको मापने का मेरे पास कोई पैमाना नहीं था, तो हमने भी मान लिया है कि उन्हें अच्छी लगी।
कुछ ब्लाग पर "बीररस"  के स्वभाव वाले लेख होते हैं। भाषा की मर्यादा को ध्यान में रखकर जब कोई बात की जाती है वो रचनाएं और लेख उन्हें पसंद हैं, पर तीखी भाषा और व्यक्ति को लक्ष्य कर लिखी गई बातें उन्हें बिल्कुल नागवार लगती है। ऐसे ब्लाग से भले दूरी बना लें, पर उनके मन में ब्लागर के प्रति कोई दुराव नहीं आता है, उनको लगता है कि कभी ना कभी तो ब्लागर सही रास्ते पर आ ही जाएगा। हां जी एक बात तो मैं भूलता ही जा रहा था कि ब्लागरों में खेमेंबंदी और कटुता के माहौल से वो मन ही मन बहुत दुखी हैं। कई बार जब किसी बात पर ब्लागर आमने सामने हो जाते हैं और ब्लाग पर ही वाद विवाद शुरू हो जाता है तो ये बात भी उनके लिए पीडा देने वाली होती है।
और हां अगर मैं लंच का जिक्र ना करुं तो बात पूरी ही नहीं हो पाएगी। मैं नानवेज का बहुत शौकीन हूं। मेरा देश में आना जाना लगा रहता है और बहुत सारी जगहों पर नानवेज का स्वाद ले चुका हूं, लेकिन रश्मि जी की रेशेपी लाजवाब थी। चिकेन का जो स्वाद मैने यहां लिया, उसकी तारीफ के लिए मेरे पास शब्दों का अभाव है। मैं तो रश्मि जी से ही आग्रह करुंगा कि वो अपने चिकेन की इस रेशेपी को खाने के किसी ब्लाग के साथ जरूर शेयर करें। खैर बातचीत का सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक मेरे मोबाइल पर मैसेज आया। मैने देखा ये मैसेज घर से मैडम का था, जो जानना चाह रहीं थी कि एयरपोर्ट पहुंच गए या नहीं। घड़ी देखा तो शाम के पांच बज चुके थे और 6.40 पर मेरी फ्लाइट थी। बस इसी एसएमएस के साथ बात चीत को विराम देना पडा़, वो भी इस वायदे के साथ दिल्ली बुक फेयर में आने के दौरान घर जरूर आएंगी। पांच घंटे से ज्यादा समय तक मैं यहां रहा, पर सही बताऊं बातें खत्म नहीं हुई, खैर ठीक भी है, ऐसे में अगली मुलाकात का इंतजार भी तो रहेगा ना।

चलते-चलते
जी आखिर में ये बताना भी जरूरी है कि मैं उत्तर प्रदेश के चुनाव में 20 जनवरी से 29 फरवरी तक लगभग 40 जिलों में सफर कर रहा हूं। मेरी यात्रा की शुरुआत तो उत्तराखंड में देहरादून से होगी, पर 23 जनवरी से यूपी में हूं। मित्रों मैं कोशिश करुंगा कि जहां कहीं भी मेरे ब्लागर मित्र हों उनके साथ एक चाय जरूर हो जाए। इसमें आपका भी सहयोग होना चाहिए।