Saturday, 29 September 2012

धोनी : क्रिकेट का कलंक ...

मैदान में पानी ना मंगवाया तो  धोनी नहीं
तना सख्त शब्द मैं यूं ही इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं, इसकी ठोस वजह है। आपको पता है कि अब देश में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, जब हम सचिन को भगवान कहते हैं, तो क्रिकेट को अपना धर्म भी मानते हैं। मुझे आपका तो पता नहीं, पर मैं अपने धर्म के साथ किसी को खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दे सकता। आपको पता होगा कि सरकार में भी जब कोई बड़ा मसला होता है तो कोई मंत्री उस पर अकेले फैसला नहीं लेता है। उसके लिए जीओएम यानि ग्रुप आफ मिनिस्टर का गठन किया जाता है। यहां उस मुद्दे पर चर्चा के बाद फैसला लिया जाता है। लेकिन धोनी ? कितना भी बड़ा फैसला हो, तुरंत ले लेगे।

देश की 121 करोड़ की आबादी जो क्रिकेट को धर्म की तरह मानती है और उससे प्यार करती है। यहां होने वाले हर फैसले से हम सब प्रभावित होते हैं। क्योंकि क्रिकेट से हमारी भावना जुड़ी हुई है। यही वजह है कि न्यूज चैनल भी मैच के कई दिन पहले से लेकर बाद तक हर पहलू की समीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में एक अब बड़ा सवाल ये है कि टीम के कप्तान के पास कितना अधिकार होना चाहिए ? क्या उसकी पसंद नापसंद के आधार पर देश की टीम चुनी जानी चाहिए ? अगर एक आदमी को किसी खिलाड़ी की सूरत पसंद नहीं है तो उसे बाहर बैठा दिया जाना चाहिए ? क्या धोनी को इतना अधिकार दे दिया जाना चाहिए कि वो ओपनर बल्लेबाज को 12 खिलाड़ी बनाकर उससे मैदान में पानी को बोतल और तौलिए मंगवाए। फिर अगर आपने एक आदमी को इतना अधिकार दे दिया है और उसका फैसला गलत साबित होता है तो उसके लिए क्या कोई सजा का प्रावधान किया गया है ? मुझे तो लगता है कि उसके लिए सख्त सजा भी होनी चाहिए।

मैं ही नहीं पूरा देश जानता है कि ओपनर बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग और महेन्द्र सिंह धोनी के बीच कुछ अनबन है। अनबन की वजह कोई ज्यादा बड़ी नहीं है। बस सहवाग ने एक इंटरव्यू में ये कह दिया कि धोनी की अगुवाई में जितने मैच जीते गए हैं उसका पूरा क्रेडिट कप्तान को मिले, इसमें बुराई नहीं है, लेकिन ये टीम अफर्ट है, खिलाड़ियों के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब इसमें सहवाग ने ऐसा क्या कह दिया कि धोनी उससे इस कदर नाराज हो जाएं कि सहवाग का कैरियर खत्म करने का संकल्प ले लें। सच ये है कि धोनी की मनमानी की वजह से अब टीम बर्बाद हो रही है। धोनी टीम में खेल से कहीं ज्यादा गुटबाजी को हवा दे रहे हैं।

धोनी को कौन समझाए कि आईपीएल और वर्ल्ड कप में बहुत अंतर है। आईपीएल में आप जिसे चाहें उसे प्लेइंग 11 रखे, जिसे चाहें 12 वां खिलाड़ी बनाकर उससे मैदान में पानी मंगवाएं। बताइये हर बड़े मैच के पहले अभ्यास सत्र का आयोजन किया जाता हैं। क्या अभ्यास सत्र के दौरान हमने वीरेंद्र सहवाग के विकल्प के बारे में विचार किया था ? अगर वीरेंद्र सहवाग को चोट ही लग जाती है तो गौतम गंभीर के साथ ओपनिंग कौन करेगा ? मैं समझता हूं बिल्कुल विचार नहीं किया गया। अव वहां एक मैच में वीरेंद्र सहवाग का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा तो उसे 12 वां खिलाड़ी बना दिया और इरफान पठान से ओपनिंग करा रहे हैं। पहले मैच में तो इरफान आठ ही रन बना पाए। खैर अच्छा ये हुआ कि 12 बाल यानि दो ओवर ही खराब किया।

कल आस्ट्रेलिया के साथ मैच की हार में एक बड़ी वजह इरफान पठान ही रहा। बताइये बीस ओवर के मैच में 11 ओवर तक इरफान पठान मैदान में रहा और महज 30 रन बना पाए। बाद में जो खिलाड़ी आए, उन पर रन बनाने का इतना दबाव हो गया कि वो जल्दी जल्दी विकेट गवां बैठे। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं कि इरफान ने सबसे ज्यादा रन बनाया तो आप गलत हैं। दरअसल आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी जानबूझ कर इरफान पठान को आउट नहीं कर रहे थे। उन्हें लगा कि इसका मैदान पर रहना ही ज्यादा बढिया है। खेल पा नहीं रहा है और गेंद भी बर्बाद कर रहा है। जब दसवें ओवर के बाद इरफान ने थोड़ा हिम्मत कर गेंद को बाउंड्रीलाइन के बाहर किया तो आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने उसे आउट कर पवैलियन भेज दिया। आपको पता है कि सहवाग को ये कहकर धोनी ने बाहर बैठाया कि ओपनिग इरफान से करा लेगें और सहवाग के स्थान पर एक गेंदबाज को टीम में जगह दी जाएगी। 20 ओवर के मैच में गेंदबाज के रुप में जहीर खान, इऱफान पठान, आर अश्विन, हरभजन सिंह और पीयूष चावला यानि कुल पांच गेंदबाज मैदान में उतारे गए। हालत क्या हुई, सब पिटते रहे और धोनी को रोहित शर्मा, विराट कोहली और युवराज सिंह से भी गेंदबादी करानी पड़ी।

अब मैं जानना चाहता हूं कि धोनी किस बात के कप्तान है ? वहां कई दिन बिता चुके हैं। उन्हें हर मैदान का रुख पता होना चाहिए है, उन्हें मालूम होना चाहिए कि किस मैदान पर उनका कौन सा गेंदबाज कामयाब हो सकता है। अगर इतने दिन में आप ये भी नहीं पता कर पाए तो मेरी एक सलाह है। जिस तरह आपने वीरेंद्र सहवाग को बाहर बैठा दिया है, क्यों ना आपको भी नान प्लेइंग कप्तान बना दिया जाए ? आपको बाहर बैठाने की ठोस वजह भी है। जब हर गेंदबाज पिट रहा है, तो विकेट के पीछे आपकी जरूरत क्या है ? 20 ओवर यानि कुल 120 गेंद में कितनी गेंद विकेट के पीछे आप रोकते हो ? इससे बेहतर है कि नान प्लेइंग कप्तान रहो। बताइये हमारे टाप बल्लेबाज पवैलियन में मौजूद हैं और ओपनिग के लिए इरफान पठान मैदान में हैं, ये तो किसी सुलझे हुए कप्तान का फैसला नहीं हो सकता। ऐसा फैसला मेरी नजर में मूर्ख कप्तान ही कर सकता है।

दरअसल धोनी इस समय सेफ जोन में है। उसे पता है कि आईपीएल में जिस टीम से वो जुडा है, उसके मालिक की क्रिकेट वर्ल्ड में तूती बोलती है। उसके रहते इसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दो दिन पहले सहवाग की पैरवी करने पर वरिष्ठ खिलाड़ी मोहिन्दर अमरनाथ को बीसीसीआई ने पैदल कर दिया। यानि उनकी चयन समिति से छुट्टी कर दी गई। इसके पहले आपको पता है कि धोनी के व्यवहार से खून के आंसू रो कर सीनियर खिलाड़ी वीवीएस लक्ष्मण ने क्रिकेट को ही अलविदा कह दिया। धोनी को लगता होगा कि ये उनकी जीत है, पर ये जीत नहीं है। देश के लोग पूरी टीम को प्यार करते हैं, फिर वीरेंद्र सहवाग जैसे खिलाड़ी हमेशा नहीं निकलते। ये खिलाड़ी हमारे देश के धरोहर हैं। इनके साथ अभद्रता कोई भी करे, क्रिकेट प्रेमी उसे माफ नहीं कर सकते।

धोनी फिर समझाने की कोशिश कर रहा हूं। आप विश्वकप के मैच खेल रहे हो। ऐसे फैसले से खुद को दूर रखो, जिससे स्वदेश वापसी पर जवाब ना दे सको। एयरपोर्ट से भी चोर रास्ते से निकलना पड़े। जिन लोगों के बल पर आप बेलगाम हो रहे हैं, वो आपको टीम में जगह दे सकते हैं, देश की जनता के दिलों में नहीं। अगर देश की जनता के दिलों पर राज करना है तो व्यक्तिगत खुंदस को दूर करके देश के लिए खेलो। अब गल्ती की गुंजाइस खत्म हो चुकी है। अगर विश्वकप की चुनौती में बने रहना है तो टीम को एक रख कर अच्छा प्रदर्शन करना होगा। ऐसा ना हो कि विश्वकप तो हाथ से जाए ही और लोग आपकी कप्तानी को मूर्खों का दर्जा दे दें। मुझे लगता है कि देशवासियों की भावना समझ गए होगे।


एक जरूरी सूचना :-

मित्रों आपको पता है कि मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुडा हूं। दिल्ली में रहने के दौरान सियासी गलियारे में जो कुछ होता है, वो तो मैं सबके सामने बेबाकी से रखता ही रहता हूं और उस पर आपका स्नेह भी मुझे मिलता है। मुझे लगता है कि आप में से बहुत सारे लोग टीवी न्यूज तो देखते होंगे, लेकिन इसकी बारीकियां नहीं समझ पाते होगें। मैने तय किया है कि अब आपको मैं टीवी फ्रैंडली बनाऊं। मसलन टीवी के बारे में आपकी जानकारी दुरुस्त करुं, गुण दोष के आधार पर बताऊं कि क्या हो रहा है, जबकि होना क्या चाहिए। इसके लिए मैने  एक नया ब्लाग बनाया है, जिसका नाम है TV स्टेशन ...। इसका URL है।   http://tvstationlive.blogspot.inमुझे उम्मीद है कि मुझे इस नए ब्लाग पर भी आपका स्नेह यूं ही मिता रहेगा।   


Monday, 24 September 2012

अन्ना को दो करोड़ देने की हुई थी पेशकश !

जी अन्ना !  मैंने भी दो करोड़ ही कहा

न्ना को दो करोड़ रूपये देने की पेशकश अरविंद केजरीवाल ने की थी, लेकिन अन्ना ने ये पैसे लेने से इनकार कर दिया। आज की ये सबसे बड़ी खबर है। लेकिन इस खबर को न्यूज चैनलों ने अपनी  हेडलाइंस में शामिल नहीं किया। दो एक  चैनल ने इस खबर को दिखाया  भी, तो बस कोरम पूरा करने के लिए, मतलब इसे अंडरप्ले कर दिया। हालांकि अब इस पर  कुमार विश्वास की ओर से सफाई आई है कि ये रकम अन्ना को घूस की पेशकश नहीं थी, बल्कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई शुरू की गई है, उसे संचालित करने के लिए जनता ने चंदा दिया था। चूंकि इस पैसे को लेकर केजरीवाल  पर  तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे थे, लिहाजा  इंडिया अगेस्ट करप्सन के खाते से इस रकम का चेक अन्ना को देने के लिेए रालेगन सिद्धि भेजा गया था। बताया  जा रहा है कि केजरीवाल चाहते थे कि इस रकम की देख रेख अन्ना करें, लेकिन अन्ना ने चेक लेने से इनकार कर दिया और कहाकि ये सब काम आप लोग ही करें।

हंसी आ रही है ना। कितनी बड़ी-बड़ी बातें ये लोग किया करते थे। देश में ऐसा माहौल बना दिया था कि जैसे इस टीम के साथ जो लोग नहीं है, वो सभी भ्रष्ट हैं। देश में एक मात्र ईमानदार ये लोग ही हैं  या फिर ये जिन्हें  सर्टिफिकेट दें वो ईमानदार है। अगर आपने मेरे लेख को  पढ़े हैं तो आपको ध्यान होगा कि मैं एक बात पर बार बार जोर  दिया करता हूं। मेरा पक्का विश्वास है कि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। और आंदोलन की शुरुआत से ही टीम के भीतर से जो खबरे बाहर आ रहीं थी, उसमें पैसे की हेरा फेरी को लेकर तरह तरह की चर्चा होने लगी थी। हो सकता है कि हमारी और आपकी सोच में अंतर हो, लेकिन मैं आज भी इसी मत का हूं कि जिसे आप सब आंदोलन कहते हैं, मेरा मानना है कि ये शुरू से आंदोलन के रुप में खड़ा ही नहीं हो पाया। दरअसल ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का तमाशा भर रहा।

कुछ मीडिया के विद्वान इस आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई बता रहे थे। मैं बहुत हैरान था कि आखिर ऐसा क्या है इस आंदोलन में कि इसे आजादी की दूसरी लड़ाई कहा जाए। कुछ ने तो इस आंदोलन की तुलना जे पी आंदोलन से भी की। जब इसकी तुलना जेपी आंदोलन से होने लगी तो फिर सवाल खड़ा हुआ कि मीडिया इस आंदोलन को क्यों इतना बड़ा बना रही है ? मेरा आज भी मानना है कि जेपी आंदोलन व्यवस्था के खिलाफ एक  संपूर्ण आंदोलन था। ये आंदोलन विदेशी पैसों से खड़ा किया जा रहा था, जिसमें कदम कदम पर पैसे बहाए जा रहे थे। लोगों को पूड़ी सब्जी हलुवा खिलाकर किसी तरह रोका जा रहा था। दिल्ली वालों के लिए शाम का पिकनिक स्पाट बन हुआ था रामलीला मैदान। मीडिया भी इस भीड़ में अपनी टीआरपी तलाश रही थी।

खैर ये बातें मैं आपको पहले भी बता चुका हूं। मैं आज की घटना पर वापस लौटता हूं। अच्छा चलिए आपसे ही एक सवाल पूछता हूं। जब आपको पता चला कि केजरीवाल दो करोड  रुपये का चेक लेकर रालेगन सिद्धि गए और अन्ना को इसे देने का प्रयास किया। ये सुनकर आपके मन में पहली प्रतिक्रिया क्या हुई ? मैं बताता हूं, आप भी मेरी तरह हैरान हुए होंगे कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। लेकिन मैं जो बातें अब कहने जा रहा हूं उस पर जरा ध्यान दीजिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की अगुवाई में आंदोलन चल रहा हो, देश भर में लोग मैं अन्ना हूं की टोपी पहन रहे हों और उन्हें ही दो करोड़ रुपये की पेशकश की जाए और ये पेशकश कोई सामान्य आदमी नहीं खुद अरविंद कर रहे हों तो आप इसका मतलब आसानी से निकाल सकते हैं। मतलब ये कि अरविंद कितने दबाव में होगें कि उन्होंने अन्ना को पैसे देने का फैसला कर लिया। ये जानते हुए कि अन्ना पैसे स्वीकार नहीं कर सकते। उनके कई उदाहरण सामने है, जहां उन्हें पुरस्कार में लाखों रुपये मिले तो उन्होंने उसे गांव के विकास कार्यों में लगा दिया या फिर जरूरतमंदों को दान कर दिया। वैसे ये भी  कहा जा रहा है कि अरविंद  ने ये जानबूझ कर किया, क्योंकि वो जानते ही थे कि अन्ना पैसे लेगें नहीं, लेकिन पेशकश कर दिए जाने से उन्हें लगेगा कि अगर उनके मन में गडबड़ी करने की मंशा होती तो ये पेशकश भला क्यों करते ?

बहरहाल अब धीरे धीरे एक एक चेहरे नकाब उतरने वाला है। ये बात अब लगभग साबित हो गई है कि इस टीम के भीतर पैसे को लेकर विवाद शुरू से रहा है। टीम के भीतर जिसने भी अरविंद पर उंगली  उठाई, उसे यहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन किरन बेदी से अनबन अरविंद केजरीवाल को भारी पड़ गई। दरअसल अरविंद अपनी सारी बातें अन्ना से मनवा लिया करते थे। इसकी एक मुख्य वजह अन्ना के करीबी यानि पीए सुरेश पढारे हैं। ये कहने की बात है कि सुरेश अन्ना के पीए थे, सच्चाई ये है कि वो अन्ना की हर छोटी बड़ी जानकारी अरविंद को दिया करते थे। अरविंद भी पढारे को इन सबके लिए  अलग से खुश रखते थे। कहा जा रहा है कि सुरेश इस पक्ष में नहीं था कि अन्ना अभी अरविंद का साथ छोड़े, वो  चाहते थे कि अन्ना यहीं बनें रहें।

जानकार बताते हैं कि सुरेश ने अपनी राय भी अन्ना को बता दी थी, लेकिन अन्ना ने सुरेश को डांट दिया था कि तुम इस मामले में ज्यादा आगे आगे मत बोला करो। अरविंद की जरूरत से ज्यादा पैरवी करने को लेकर अन्ना सुरेश से पहले ही नाराज चल रहे थे। इस बीच अन्ना और रामदेव की मुलाकात जिसके बारे में गिने चुने लोगों को जानकारी थी, वो मीडिया तक कैसे पहुंची ? इसे लेकर भी सुरेश की भूमिका पर उंगली उठ रही है। हालाकि सच ये है कि इस बार अन्ना के साथ सुरेश यहां नहीं आए थे,लेकिन उनकी  सभी से बातचीत है, इसलिए अन्ना का मुवमेंट उन्हें आसानी से पता रहता है। बताते हैं कि अन्ना को शक है कि सुरेश ने ही ये जानकारी अरविंद को दी और अरविंद ने ये जानकारी  मीडिया से शेयर की। बहरहाल सुरेश की गतिविधियां पूरी तरह संदिग्ध थीं, यही वजह है कि अन्ना ने सुरेश पढारे की अपने यहां से छुट्टी कर दी।

सुरेश पढारे के बारे में भी आपको बताता चलूं। दरअसल सुरेश पहले ठेकेदारी करता था। गांव के स्कूल का काम  सुरेश ही कर रहा था, लेकिन वो रेत के गोरखधंधे में फंस गया। इस पर ग्रामसभा की बैठक में सुरेश के खिलाफ प्रस्ताव पास हो गया और उससे सभी काम छीन लिए गए। चूंकि ग्राम सभा जो फैसला करती है, उसे नीचा दिखाने की अन्ना कोशिश करते हैं। यही वजह है कि सुरेश के खिलाफ जब ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास कर  दिया तो अन्ना ने उसे अपने से जोड़ लिया। हालाकि प्रस्ताव पास होने के दौरान खुद अन्ना भी वहां मौजूद थे। सुरेश को साथ  रखने  के कारण गांव में अन्ना पर भी उंगली उठती रही है।   
    
इसी तरह अन्ना के गांव में एक भ्रष्ट्राचार विरोधी जन आंदोलन न्यास नामक संस्था है। इसकी अगुवाई अन्ना ही करते हैं। कहा जा रहा है कि अगर ईमानदारी से इस संगठन की जांच हो जाए, तो यहां काम करने वाले तमाम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का एक खास अड्डा है ये दफ्तर। यहां एक साहब हैं, उनके पास बहुत थोड़ी से जमीन है, उनकी मासिक पगार भी महज पांच हजार है, लेकिन उनका रहन सहन देखिए तो आप हैरान हो जाएगे। हाथ में 70 हजार रुपये के मोबाइल पर लगातार वो उंगली फेरते रहते हैं। हालत ये है कि इस आफिस के बारे में खुद रालेगनसिद्दि के लोग तरह तरह की टिप्पणी करते रहते हैं। अब अन्ना के आंदोलन का नया पता यही दफ्तर है।

खैर आप बस इंतजार कीजिए हर वो  बात जल्दी ही सामने आ जाएगी, जो मैं आपको पहले ही बताता रहा हूं। अन्ना प्रधानमंत्री पर उंगली उठाते हैं कि ये कैसे प्रधानमंत्री हैं  कि इनके नीचे सब  चोरी करने में लगे रहते हैं और उन्हें खबर तक नहीं होती। अब तो  प्रधानमंत्री  भी ये दावा कर सकते हैं कि अन्ना जी आपकी टीम में भी राजा, कलमाणी, जायसवाल, व्यापारी सब तो हैं। आप कैसे अपनी टीम को ईमानदारी का सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं। बहरहाल अभी दो करोड़ रुपये का मामला ठंडा नहीं  पड़ा है। सब  अरविंद  से इस मामले में सफाई चाहते हैं, अब सफाई देने के लिए अरविंद अपने साथियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं। बहरहाल वो सफाई  भले दे दें, लेकिन अब जनता में वो भरोसा हासिल करना आसान नहीं है।    

Friday, 21 September 2012

आवश्यकता है एक " पोस्टर ब्वाय " की !


 देश के हालात और देश में चलने वाली हर गतिविधियों पर मैने हमेशा ही अपनी बेबाक राय रखी है। कभी इस बात की चिंता नहीं की कि कोई मुझे क्या बता रहा है। हालांकि मैं देख रहा हूं कि लोग मुझे जाने बगैर ही मेरी तस्वीर बनाने लगे। इसमें किसी ने मुझे दिग्गी के खानदान का बताया,   किसी ने संघी कहा, तो कुछ ने वामपंथी का ठप्पा लगा दिया। हां बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं आप ! कुछ ने पागल तक करार दे दिया। खैर मेरे बारे में कौन क्या राय रखता है, मेरे लिए ये कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। मेरे लिए महत्वपूर्ण ये है कि मैं जो देख रहा हूं, या मेरी जो समझ है, उसे ईमानदारी के साथ आपके सामने रख रहा हूं या नहीं। यही वजह है कि अगर आप  इस आंदोलन के बारे में  मेरे ब्लाग पर लिखे लेख को पढ़ें तो आप खुद मानने को मजबूर हो जाएंगे कि जो बातें मैने कहीं है, वही आगे चल कर वो सच साबित हुई है। अब आप इसे सही समझें या गलत,या फिर मुझे पागल बताते रहें। वैसे भी  मेरा मानना रहा है कि

इन्हीं बिगड़े दिमागों में घनी खुशियों के लच्छे  हैं,
हमें पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं।

अच्छा इसके पहले की मैं बात-बात में एक जरूरी बात बताना भूल जाऊं, पहले आप सबको एक महत्वपूर्ण विज्ञापन के बारे में बता दूं। वैसे तो ये विज्ञापन मुझे ब्लाग पर प्रकाशित करने के लिए भेजा गया है, पर जिन लोगों ने भेजा है वो  बेचारे नई-नई पार्टी बनाने की कवायद कर रहे हैं। इसलिए सोचा कि विज्ञापन के बजाए इसे खबर बनाकर ही छाप देता हूं, क्यों इनसे पैसे लिए जाएं। दरअसल अन्ना के अचानक साथ छोड़ देने से बाकी टीम को एक चेहरे की जरूरत है,  इस टीम के शुभचिंतक भी बताते हैं कि यहां दिमाग तो बहुत लोगों के पास है, पर चेहरा बिकाऊ नहीं है। इसलिए थोड़ा बिकाऊ चेहरा चाहिए, जिसे देखकर देश की जनता को लुभाया जा सके।

आवश्यकता है "पोस्टर ब्वाय" की

उम्र 75 के पार होनी चाहिए। शिक्षा प्राइमरी से ज्यादा नहीं। अंग्रेजी का ज्ञान शून्य होना चाहिए, हिन्दी पढ़ना नहीं बस समझना जरूरी  है। विशेष योग्यता कम से कम 15 से 20 दिन भूखे रहने की आदत होनी चाहिए। दूसरों के काम का श्रेय लेने की क्षमता होनी चाहिए। पूर्व सैनिक को प्राथमिकता दी जाएगी। अगर बाकी मानक पर उम्मीदवार खरा उतरा तो उसे उम्र में पांच साल की छूट यानि 80 साल का भी हो तो चलेगा। वेतन उसकी आवश्यकतानुसार, चयन हो जाने पर इलाज मुफ्त सुविधा। हां जब तक वो "पोस्टर ब्वाय" रहेगा उसे अकेले कहीं जाने आने की छूट नहीं होगी। मंदिर ( तथाकथित) में रहना होगा, लेकिन वहां मूर्ति किसकी रखी जाएगी, ये अधिकार प्रबंधन का होगा। शर्तें. चयन हो जाने के बाद घर के किसी सदस्य और मित्र से संपर्क नहीं रख सकेगें। उसका असली नाम जो भी हो, उससे कोई  मतलब नहीं रहेगा। प्रबंधन जो नाम तय करेगा, पोस्टर ब्वाय उसी  नाम से जाना जाएगा। किसी भी शर्त को तोड़ने पर उसे देह त्याग करना होगा।

ये विज्ञापन मेरी आंखो के सामने आया तो सच बताऊं मैं भी हैरान रह गया। मैने जानने की कोशिश की आखिर एक " पोस्टर ब्वाय "  के लिए इतनी शर्तों की क्या जरूरत है ? ऐसा भी नहीं कि उसे बहुत ज्यादा वेतन भत्ता दे रहे हों कि इतनी सावधानी बरतने की जरूरत है। बहरहाल जो बातें  पता चलीं वो तो हैरान करने वाली थीं। पता चला कि इसके पहले जिसे पोस्टर ब्वाय की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसके कम पढ़े लिखे होने के ये सब फायदा उठा रहे थे। मसलन जब इनकी  मीटिंग होती थी और लोगों को लगता था कि इस बात की जानकारी अन्ना को नही होनी चाहिए , तो ये अंग्रेजी में बातें करने लगते थे। जब तक ये अंग्रेजी में बातें करते थे, बेचारे अन्ना इधर उधर सबके मुंह ताकते रहते थे। फिर जो फाइलें तैयार होती वो अंग्रेजी में या फिर हिंदी में। बेचारे अन्ना को दोनों भाषा पढ़ने में दिक्कत होती थी। बहरहाल अन्ना की ये दिक्कत बाकी लोगों को ये शूट करती थी। लेकिन अन्ना भी दुनिया देख चुके हैं,  वो अपनी तीसरी आंख से बहुत कुछ देख सुन लेते थे। इसलिए अब नए पोस्टर ब्वाय के एजूकेशन में कटौती की गई है। क्योंकि अन्ना के सातवीं क्लास तक पढ़ाई की जानकारी लोगों को है, उसके बाद की नहीं। इसीलिए नए पोस्टर ब्वाय को सिर्फ पांचवीं तक पढ़ाई की छूट होगी।

मैं देख रहा हूं कि विज्ञापन में हर बात पर बारीकी से ध्यान दिया गया है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यही थी ना कि बेचारे 15 से 20 दिन तक बिना खाए रह जाते हैं। बताइये 80 साल का बूढा बिना खाए मंच पर लेटा रहता था, और उसके मंच के सामने भीड़ लगातार बनी रहे,  इसके लिए लंगर चलता था। यहां देशी घी की पूड़ी सब्जी और हलुवा लगातार बनाए जा रहे थे। मैं  देखता था कि सुबह  नाश्ते  और शाम को स्नैक्स के दौरान यहां भीड़ बेकाबू  हो जाया करती थी। लेकिन बेचारे अन्ना इतने लोगों को सामने खाता पीता देखने के बाद भी कभी ये नहीं कहा कि अब उनसे भूखा नहीं रहा जा रहा है। फौजी रहे हैं ना तो उनकी भूख तो तिरंगे को ही देखकर खत्म हो जाया करती थी। बहरहाल अब राजनीतिज्ञों की बात छोड़ दीजिए, क्योंकि लालू यादव सरीखे नेता ने तो उनके अनशन की ईमानदारी पर ही उंगली उठा दी थी। अब दूध से जला छांछ भी फूंक फूंक पर पीता  है। इसलिए कुछ और सावधानी बरती जा रही है। मसलन अन्ना जब दिल्ली में रहते थे तो दिल्ली की भाषा बोलते थे, यहां से बाहर जाते ही वो दिल की भाषा बोलने लगते। ये बात भी लोगों को बिल्कुल हजम नहीं हो रही थी।  लिहाजा नए पोस्टर ब्वाय को अनुबंध तक यहीं के मंदिर में रहना होगा,  यहां वो आराधना किसकी करेगा, ये भी टीम बताएगी। खास बात ये कि उसका असली नाम सबको नहीं पता होना चाहिए। देखा था ना, पहली पर कांग्रेस प्रवक्ता ने नाम क्या लिया, बवाल खड़ा हो गया। खैर देखिए भाई अगर ऐसा कोई आदमी आपकी  नजर में हो तो प्लीज मदद कर दीजिए दिल्ली की।

देश में कई बार सोशल साइट्स के दुरुपयोग की बात उठती है, या फिर इस पर अंकुश लगाने  की बात होती है तो ऐसी कोशिशों का विरोध करने में मैं भी आपके साथ मजबूती से खड़ा रहने वालों में हूं, कभी इसकी स्वायत्तता का विरोधी नहीं रहा।  पर आज जब कुछ पढ़े लिखे लोगों को देखा कि वो एक साजिश के तहत अन्ना के खिलाफ माहौल बना रहे हैं, तो मन दुखी हुआ। फिर ना जाने क्यों लगने लगा कि अभी हम उस काबिल नहीं हुए हैं कि हमें आजाद छोड़ दिया जाए, एक लक्ष्मण रेखा जरूरी  है। अब देखिए अन्ना विरोधी वाल पर लंपू चंपू टाइप के लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं। अच्छा आलोचना हो तो कोई खास बात नहीं, आलोचना होनी चाहिए, लेकिन यहां उन्हें अपमानित किया जा रहा है। जो लोग कल तक उनके नाम की टोपी अपने सिर पर रख कर गर्व कर रहे थे, आज उसी टोपी को पैरों तले रौंद रहे हैं। खैर ये सब किसके इशारे पर और किसके लिए किया जा रहा है, ये बातें किसी से छिपी नहीं है। टीम में  दूसरी तरफ  जो लोग हैं वो तकनीक फ्रैंडली हैं। तभी तो उन्होंने सप्ताह भर में  ही देश की नब्ज टटोल ली कि उन्हें राजनीतिक  दल बनाने का देश की जनता आदेश सुना रही है। देश की चुनाव प्रक्रिया को ये गलत बताते हैं और अपने सर्वे जिसकी कोई विश्वसनीयत नहीं है, उसे देश का फरमान कहते हैं। एक कड़ी बात कह दूं, जितनी फर्जी ये सिविल सोसायटी थी, उससे ज्यादा फर्जी इनका सर्वे है।

चलते चलते आखिरी बात और। मीडिया में एक बात बहुत तेजी से  चलाई  जा रही है। अन्ना और रामदेव गुपचुप मिले। मेरा सवाल है ? क्या अन्ना  और रामदेव पहली बार मिले हैं। क्या कभी  अन्ना ने या रामदेव ने इस बात से इनकार किया था कि उन  दोनों में आपस में रिश्ते  नहीं है। आपको याद दिला दूं दोनों ने एक साझा प्रेस कान्फ्रेंस में ये बात कहा था कि दोनों  एक दूसरे के आंदोलन में मदद करेंगे। हां बीच के कुछ लोग जरूर ये कोशिश करते रहे कि  इन्हें  अलग अलग ही रहने दिया जाए। अगर ये दोनों एक हो गए तो बाकी  लोगों की कोई पूछ नहीं रह जाएगी। अच्छा फिर इस मुलाकात की जिस तरह से हवा बनाई गई जैसे अन्ना  बाबा रामदेव  ने बल्कि किसी आतंकवादी से मिल  रहे हैं और मिलाने वाला कोई बड़े गिरोह का सरगना है। खैर ये अध्याय बंद हो गया है। हमें  भी  इस बात का दुख है कि एक महत्वपूर्ण आंदोलन कुछ लोगों  की अतिमहत्वाकांक्षा के आगे दम तोड़ दिया। लिखना बहुत कुछ चाहता हूं, पर अब स्वास्थ इजाजत नहीं दे रहा है। सुबह कहीं पढ़ रहा था कि ईश्वर या तो स्वास्थ दे या फिर शरण दे।  आगे फिर...

Wednesday, 19 September 2012

अब अर्थशास्त्री पीएम को "अर्थ " का सहारा !


दिल्ली में मेरी और मनमोहन सिंह दोनों की हालत पतली है। मैं तो खैर दवा ले रहा हूं, जल्दी दुरुस्त  हो जाऊंगा, लेकिन मनमोहन सिंह को सामान्य होने में टाइम लग सकता है। आज तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया, हालांकि ये फैसला आसान नहीं था, उन्हें अपने नेताओं को एकजुट करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। वैसे  सच बताऊं दो एक दिन में टीएमसी में टूट की खबर मिले तो इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं है।

आपको पता है कि कोयले की कालिख में इस बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नहीं  बच पाए। संसद का पूरा सत्र शोर शराबे की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने इस  बार सीधे प्रधानमंत्री को निशाने पर लिया और उनका इस्तीफा मांगा। अब प्रधानमंत्री और सरकार पर हमला होता देख कांग्रेस ने तुरुप चाल चली और आर्थिक सुधार के नाम पर देश में रिटेल में एफडीआई को मंजूरी, डीजल की कीमत बढ़ाई गई और रसोई गैस में सब्सिडी समाप्त करने का ऐलान कर बहस की दिशा ही बदल दी।

यूपीए सरकार को लगातार परेशान करने वाली ममता बनर्जी की साख भी इस बार दांव पर लगी हुई थी। राष्ट्रपति के चुनाव में पहले उन्होंने  प्रणव  मुखर्जी के विरोध का फैसला  किया, बाद  में उन्होंने उनका साथ दिया। जब भी पेट्रोल की कीमतें बढीं ममता ने  उसका  विरोध किया, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। ममता हमेशा कहती रहीं सरकार आम आदमी के हितों की अनदेखी कर रही है। इन सबके बाद भी वो सरकार में बनी रहीं। इससे जनता में ये संदेश जा रहा था कि वो सिर्फ गीदड भभकी देती हैं। ममता को इस छवि से अलग होना था, लिहाजा इस बार उन्होंने सरकार समर्थन वापस लेने और अपने मंत्रियों के इस्तीफे का ऐलान कर दिया।

खैर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीति  की ए बी सी भले ना जानते हों, पर उन्हें अपने "अर्थ" और अंकगणित पर पूरा भरोसा है। उन्हें पता है कि अंकगणित को अपने पक्ष में करने के लिए कैसे अर्थ का इस्तेमाल किया जाता है। देश की राजनीति में मनमोहन सिंह पहले प्रधानमंत्री हैं जिन पर सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त का आरोप लगा है। यहां तक की संसद में पहली बार सांसदों ने पैसे लहराए और कहा कि ये पैसा उन्हें सरकार को बचाने के लिए दिए गए हैं। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि इन आरोपों में बिल्कुल भी सच्चाई ना हो, खैर मामला अभी विचाराधीन है।

सरकार से टीएमसी का समर्थन वापस ले लेने के बाद अब सरकार की नजर मुलायम सिंह यादव और मायावती पर है। मुझे लग रहा है कि आज पहली बार न सिर्फ सरकार को बल्कि  समाजवादी पार्टी को भी पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह याद आ रहे होंगे। अगर वो  आज पार्टी में होते तो अब तक "सौदा" हो गया होता। उन्हें पता है कि कैसे सरकार गिराई और बचाई जाती है। ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि पिछली बार जब वामपंथियों  ने सरकार से समर्थन  वापस लिया था, उसके कुछ देर बाद ही अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव सरकार के साथ खड़े थे, जबकि  पहले खुद मुलायम सिंह भी न्यूक्लीयर डील के खिलाफ थे।  

खैर न्यूक्लीयर डील को आम जनता इतना नहीं समझ रही थी, लेकिन  डीजल, रसोई गैस और रिटेल में एफडीआई के असर को आम जनता  भी खूब समझती है। इसलिए मुलायम  के  लिए भी सरकार के साथ खड़े होना इतना आसान नहीं होगा। लेकिन ये राजनीति है, मुलायम सिंह और उनकी पार्टी इस मामले में हमेशा अविश्वसनीय रही है। वो किसी हद तक जा सकते हैं। अच्छा मुलायम को ये भी डर है कि कहीं ऐसा ना हो कि मायावती सरकार के पाले में खड़ी हो जाए  और जो मंत्री पद टीएमसी ने खाली किया है, उसे  वो अपने सांसदों से भर दें। मुलायम की कोशिश होगी कि वो सरकार के करीब आएं तो मायावती और दूर रहें।

बहरहाल देश  की राजनीति पर अमेरिका में भी काफी मंथन चल रहा है। सरकार को बचाने के लिए मुझे लगता है कि वहां आपात बैठकें जरूर चल रही होंगी, क्योंकि अमेरिकी  हितों  की पूर्ति जितना  मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हो सकता है, उतना  और किसी के रहने पर नहीं हो सकता। वैसे भी वहां राष्ट्रपति का चुनाव चल रहा है, इसीलिए तो यहां जल्दबाजी में एफडीआई को मंजूरी  दी गई थी, अगर सरकार रोलबैक करती है तो प्रधानमंत्री को अमेरिका की भी नाराजगी झेलनी पड़ सकती है, जो सरकार कभी नहीं चाहेगी। बहरहाल ममता ने भी  एक तरह से सरकार को दो दिन का वक्त दे दिया है, ऐसे में अब वालमार्ट की  भूमिका बढ़ गई है। सरकार के पक्ष में सख्या करने के लिए वालमार्ट अपने खजाने का ताला खोल देगा। अब देखना है कि वालमार्ट के खजाने में कितनी ताकत है।

अच्छा ऐसे समय में लालू  यादव जैसे लोगों की पूछ थोड़ा बढ़ जाती है। यूपीए एक में रेलमंत्री  रहे लालू को अगर कांग्रेस थोड़ा सा भी स्पेस दे तो  वो आज सरकार में सांख्यकी मंत्री बनने को तैयार हो जाएंगे। ममता के समर्थन वापसी के ऐलान से जहां सरकार सकते मे है, वहीं लालू अपनी कीमत बढ़ाने के लिए कह रहे हैं कि ये समर्थन वापसी का ड्रामा है। समर्थन शुक्रवार को क्यों वापस होगा, आज ही क्यों नहीं लिया। बहरहाल अभी तो सरकार  की  नजर समाजवादी पार्टी पर है, क्योंकि सरकार भी  जानती  है कि इन्हें "मैनेज"  करना सबसे ज्यादा आसान है।

चलिए कल को जोड़ तोड़ से ये सरकार भले बच जाए, लेकिन  इतना तो  साफ है अब इस सरकार की और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख दागदार हो गई है। ये तो पहले ही साफ  हो चुका है आजाद भारत में ये सरकार देश की सबसे भ्रष्ट सरकार रही है। जिसमें प्रधानमंत्री समेत एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर करप्सन के आरोप  हैं। कई मंत्री और नेता जेल तक जा चुके हैं।

आखिर में एक चुटकुला  सुनाते हैं। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कहा है कि वो सरकार से बात करेंगी। हाहाहहाहाहहाह। सोनिया जी लगता है वाकई आपकी तबियत ठीक नहीं है। रिटेल में एफडीआई,  डीजल और रसोई के दाम बढाने पर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। 20 सितंबर को भारत बंद है। यूपीए के सहयोगी और सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले इस बंद का समर्थन कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने खुद आपसे तीन दिन पहले बात कर पूरे मामले की जानकारी दी और आप आज कह रही हैं कि अब सरकार से बात करेंगी। अच्छा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब कोई बड़ा फैसला लेने के पहले आपसे बात नहीं करते हैं, यही कहना चाहती हैं ना आप। ऐसी बातें क्यों कर रही हैं, जिससे लोग आपके ही ऊपर हंसे.....