Wednesday, 16 July 2014

मोदी बताएं : टनल में क्यों फंसी ट्रेन ?

श्री शक्ति एक्सप्रेस के पहले ही सफर में उधरपुर - कटरा रेल लाइन ने संकेत दे दिया है कि वो अभी रेल यात्रा के लिए पूरी तरह फिट नहीं है। श्री शक्ति एक्सप्रेस बीती रात जैसे ही टनल के भीतर घुसी, पटरी पर फिसलन की वजह से ट्रेन आगे नहीं बढ़ सकी और टनल के भीतर ही फंस गई। ट्रेन को टनल से निकालने के लिए इंजन के ड्राईवर ने काफी मशक्कत की, लेकिन वो कामयाब नहीं हो पाया। आधी रात को इसकी जानकारी जैसे ही उत्तर रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों को हुई, सब के होश उड़ गए। बहरहाल कोशिश शुरू हो गई कि कैसे ट्रेन को टनल से बाहर निकाला जाए। आनन फानन में फैसला किया गया कि एक और इंजन  वहां भेजकर ट्रेन में पीछे से धक्का लगाया जाए, हो सकता है कि दो इंजन के जरिए इस ट्रेन को आगे बढ़ाया जा सके। बहरहाल रेलवे की कोशिश कामयाब रही और ट्रेन को किसी तरह टनल से बाहर कर लिया गया। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि  क्या इस ट्रैक पर आगे ट्रेन का संचालन जारी रखा जाए, या फिर इसे रोका जाए !  बहरहाल रेलवे की किरकिरी न हो, इसलिए मीडिया को जानकारी दी गई कि  इंजन में खराबी की वजह से ट्रेन टनल मे लगभग दो घंटे फंसी रही, जबकि सच ये नहीं है, रेल अफसर अपनी नाकामी छिपा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी मंत्रियों को कहते रहते हैं कि वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें और महत्वपूर्ण फैसलों में सोशल मीडिया के सकारात्मक राय को उसमें शामिल करें। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी खुद इसे लेकर लापरवाह हैं। वो अभी से अफसरों के हाथ की कठपुतली बनते जा रहे हैं, खासतौर पर अगर रेलमंत्रालय की बात करूं, तो ये बात सौ फीसदी सच साबित होती है। आपको पता होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब ऊधमपुर से कटरा रेल लाइन की शुरुआत करने वाले थे, उसके पहले ही मैने आगाह कर दिया था कि ये रेल लाइन खतरनाक है, इस पर जल्दबाजी में ट्रेन का संचालन नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इस रेल पटरी के शुरू हो जाने से रोजाना ट्रेनों की आवाजाही भी शुरू हो जाएगी, इसमें हजारों यात्री सफर करेंगे, इसलिए उनकी जान को जोखिम में नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि मोदी ने इन बातों पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया और वाहवाही लूटने के लिए रेल अफसरों के इशारे पर कटरा रेलवे स्टेशन पहुंच गए और ट्रेनों की आवाजाही शुरू करने के लिए हरी झंड़ी दिखा दी।

मैं प्रधानमंत्री को एक बार फिर बताना चाहता हूं कि इस रेल पटरी पर जल्दबाजी  में ट्रेनों की आवाजाही शुरू करना खतरे से खाली नहीं है, ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट इसे खतरनाक बता  रही है। इसी साल जनवरी में रेल अफसर ने रेल पटरी का सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि कम से कम दो तीन मानसून तक इस पटरी पर ट्रेनों का संचालन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। मानसून में इस ट्रैक का पूरी तरह परीक्षण होना चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि टनल में अचानक  बड़ी मात्रा में पानी भर जाए, जिससे बीच में ट्रेनों की आवाजाही रोकनी पड़े। इतना  ही नहीं टनल नंबर 20 में तकनीकि खामियों की वजह से सेफ्टी कमिश्नर ने 27 से 29 जनवरी तक निरीक्षण किया, लेकिन एनओसी नहीं दिया।अंदर की खबर है कि काफी दबाव के बाद रफ्तार नियंत्रण कर ट्रेन चलाने की अनुमति दी है। टनल नंबर 18 में काफी दिक्कतहै। बताया गया है कि इस टनल में 100 लीटर पानी प्रति सेकेंड भर जाता है। ये वही टनल है, जिसकी वजह से अभी तक यहां ट्रेनों का संचालन नहीं हो पा रहा था। पानी का रास्ता बदलने के लिए फिलहाल कुछ समय पहले 22 करोड का टेंडर दे दिया गया, काम हुआ या नहीं, कोई बताने को तैयार नहीं। एक विदेशी कंपनी को कंसल्टैंसी के लिए 50 करोड रूपये दिए गए। उसने जो सुझाव दिया वो नहीं माना गया। इस कंसल्टैंसी कंपनी से कहा गया कि वो सेफ्टी सर्टिफिकेट दे, जिसे देने से उसने इनकार कर दिया।

मैं फिर जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि रेलवे के अधिकारी रेलमंत्री और प्रधानमंत्री को पूरी तरह गुमराह कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि रेलमंत्री रेलवे को जानने समझने वालों की एक एक्सपर्ट टीम बनाएं और हर बड़े फैसले को लागू करने के पहले एक्सपर्ट की राय जरूर ले। रेल अफसरों के बड़बोलेपन की वजह से ही रेलमंत्री सदानंद गौड़ा की रेल हादसे के मामले में सार्वजनिक रूप से किरकिरी हो चुकी है, जब गौड़ा ने रेल अधिकारियों के कहने पर मीडिया में बयान दिया कि ट्रेन हादसे की वजह नक्सली हैं, उन्होंने बंद का आह्वान किया था और रेल पटरी के साथ छेड़छाड़ की, इसी वजह से हादसा हुआ। इसके थोड़ी ही देर बाद गृह मंत्रालय ने रेलमंत्री की बात को खारिज कर दिया। बाद में रेलमंत्री ने अपनी बात बदली और कहाकि पूरे मामले की जांच हो रही है, उसके बाद ही दुर्घटना की असल वजह पता चलेगी। लेकिन ये बात पूरी तरह सच है कि अगर रेलमंत्री थोड़ा भी ढीले पड़े तो ये अफसर मनमानी करने से पीछे हटने वाले नहीं है।

यही वजह है कि जिस अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में रेल पटरी को खतरनाक बताया, उसे तत्काल उत्तर रेलवे से स्थानांतरित कर दिया गया। वजह साफ है कि रेल अधिकारियों का मानना है कि वैष्णों देवी मां के धाम कटरा से अगर मोदी को ट्रेन को हरी झंडी दिखाने  का अवसर मिला तो वो मंत्रालय पर नरम रहेंगे और अफसरों पर उनका भरोसा बढ़ेगा, लेकिन प्रधानमंत्री और रेलमंत्री से सच्चाई को छिपाकर इन अफसरों ने एक ऐसे रेलमार्ग पर आनन फानन में ट्रेनों का संचालन शुरू करा दिया, जो यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से काफी खतरनाक है। ये अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री को धोखा दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, ट्रेनों  के संचालन की शुरुआत आप कर चुके हैं, अभी भी समय है इस रेल मार्ग की नए सिरे से पूरी जांच पड़ताल आप स्वयं कराएं। ब्राजील से वापस आएं तो 7 आरसीआर जाने के पहले सीधे रेल मंत्रालय पहुंचे और उन सभी अफसरों को सामने बैठाएं, जिन्हें इस रेल मार्ग को जल्दबाजी में शुरू करने की हडबड़ी थी। ये जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि रेल अधिकारियों ने अपने ही महकमें के एक वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट को खारिज कर ट्रेनों का संचालन शुरू कराया और पहले ही दिन श्री शक्ति एक्सप्रेस टनल मे फंस गई। जांच जरूरी है।  




Wednesday, 9 July 2014

रेल बजट में नहीं दिखा 56 इंच का सीना !

भारतीय रेल आत्मनिर्भर होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमारी मदद करें ! भारतीय रेल अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है, इसलिए हे विदेशियों आप हमें सहारा दें ! आप हमारी मदद करेंगे... तो हम आत्मनिर्भर बनेंगे, आप मदद नहीं करेंगे तो भला हम आत्मनिर्भर कैसे होंगे ? आप  हमें सहारा देंगे तो हम अपने पैरों पर खड़े होंगे... आप सहारा नहीं देंगे तो हम अपने पैरों पर कैसे खड़े होंगे ? सच बताऊ... 56 इंच के सीने का दम भरने वाले नरेन्द्र मोदी से ऐसे रेल बजट की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। ईमानदारी से एक बात बताना चाहता हूं, मुझे इस सरकार के रेल बजट का बेसब्री से इंतजार था, मैं बजट के जरिए मोदी के विजन को जानना और समझना चाहता था, मैं देखना चाहता था कि 56 इंच का सीना रखने वाला नेता कहीं बजट में विदेशियों के आगे गिडगिड़ाता हुआ तो नजर नहीं आ रहा है, पर ऐसा ही हुआ। रेल बजट में देश के स्वाभिमान के साथ समझौता हुआ है, बजट में बातें तो बड़ी - बड़ी की गई हैं, पर इसके लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर कोई बात नहीं की गई है। हर मसले का हल पीपीपी मतलब पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप को बताया जा रहा है, आसान भाषा  में बताऊं तो इस बजट में भारतीय रेल पूरी तरह विदेशियों के हाथ की कठपुतली नजर आ रही है।

सिडनी ( आस्ट्रेलिया ) रेडियो ने अपने हिंदी बुलेटिन में रेल बजट पर कार्यक्रम रखा था, जिसमें उन्होंने इस बजट के बारे में मुझसे बातें की। पहला सवाल पूछा गया कि पहले के रेल बजट से ये बजट किस मायने में अलग है ? मैं समझ गया कि विदेशों में भी लोग यही देखना चाहता हैं कि 56 इंच का सीना रखने वाले प्रधानमंत्री का पहला बजट किस दिशा में जा रहा है। सच बता रहा हूं, मैं जब भी विदेशी चैनल या रेडियो या अन्य किसी भी प्रचार माध्यम से जुड़ता हूं तो मेरी पूरी कोशिश होती है कि ऐसी बात ना कहूं जिससे विदेशों में देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। लेकिन इस सवाल के बाद मैंने दिमाग पर बहुत जोर डाला कि नया कुछ बता दूं..। कसम से, इस बजट में तो एक बात भी नई नहीं है, अलबत्ता मैं ये कहूं कि पुराने रेल मंत्रियों के बजट में मामूली फेरबदल करके इसे पेश किया गया है तो कहना गलत नहीं होगा। चूंकि जनता पुरानी बातों को बहुत जल्दी भूल जाती है, और उसे मामूली बात भी नई नजर आती है। मैं बताना चाहता हूं कि बजट में जिस " बुलेट ट्रेन " की बात को बहुत अहमियत दी गई है। इसकी असल सच्चाई भी जानना आप के  लिए बहुत जरूरी है।

बात उस समय की है, जब रेलवे की हालत बहुत पुख्ता थी, उस समय रेलमंत्री स्व. माधवराव सिंधिया थे, वो बड़ा सोचते थे। सबसे पहले देश में बुलेट ट्रेन का सपना उन्होंने ही देखा था। लेकिन इस मामले में काम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद देश में एनडीए की सरकार आई, वो पुराने ढर्रे पर चलती रही, लेकिन मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए एक की सरकार में रेलमंत्री रहे लालू यादव ने देश को एक बार फिर बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया। सपना ही नहीं बल्कि उन्होंने ही पहली बार  रेल बजट में बुलेट ट्रेन का ऐलान किया और दिल्ली से पटना के अलावा मुंबई से अहमदाबाद के लिए बुलेट ट्रेन की फिजिविलिटी सर्वै शुरू कराया। बड़ा काम था, इसलिए विदेशी एजेंसियों को सर्वे के लिए हायर किया गया। सर्वे पर करोडों रुपये खर्च किए गए। खैर सच ये है कि रेल मंत्रालय ने बुलेट ट्रेन के लिए कुछ काम जरूर शुरू कर दिया था, पर यूपीए 2 में लालू के पास गिनती के सांसद रह गए, इसलिए रेल महकमा ममता बनर्जी के खाते में चला गया। ममता रेलमंत्री बनीं, पर उनकी निगाह बंगाल की कुर्सी पर थी, इसलिए रेलवे के लिए कुछ बड़ा काम नहीं कर पाईं। बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाया, पर यात्री किराये में बढोत्तरी करने पर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। सच बताऊं त्रिवेदी, मुकुल राय और पवन बंसल के बारे मे चर्चा करना, सही मायने में समय खराब करना है।

बहरहाल मैने आज तक पत्रकारिता में किसी स्तर पर कभी भी समझौता नहीं किया, लिहाजा सिडनी रेडियो पर मैने साफ - साफ पूरी बातें ईमानदारी से कहीं। दूसरा सवाल हाईस्पीड़ ट्रेन के बारे में पूछा गया। मैं हैरान रह गया कि क्या देश कि असल तस्वीर विदेशियों को भी पता है। सही मायने में हाई स्पीड ट्रेन के मामले में मोदी सरकार जनता को बेवकूफ बना रही है। हमारे यहां रेल पटरी की ये हालत अब नहीं रह गई है कि इस पर 100 किलो मीटर प्रतिघंटा से अधिक रफ्तार से कोई ट्रेन चलाई जा सके। मोदी के मंत्री वाहवाही लूटने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं, जो महत्वाकांक्षी रेलमंत्री लालू यादव ने भी नहीं किया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली से लखनऊ के बीच एक एसी स्पेशल ट्रेन चलती थी, जो सप्ताह मे तीन दिन एसी स्पेशल के नाम से जानी  जाती थी और तीन दिन यही ट्रेन दुरांतो के नाम से चल रही थी। जनता को मूर्ख समझने वाले रेलमंत्री सदानंद गौड़ा ने इस ट्रेन का नाम बदल कर राजधानी एक्सप्रेस कर दिया और लगभग 400 रुपये प्रति टिकट किराया बढ़ा दिया। इस ट्रेन का कोई स्टापेज कम नहीं हुआ, रफ्तार नहीं बढ़ी, यहां तक की जो बोगी पुरानी ट्रेन में चल  रही थी वही गंदगी से भरी बोगी भी इस राजधानी में इस्तेमाल हो रही है। अच्छा  ज्यादा पैसा ले रहे हो तो कम से कम इसे साफ सुथरे प्लेटफार्म से गुजारो, जिससे इस ट्रेन पर सफर करने वालों को वीआईपी होने का आभास हो,  पर ये भी नहीं। दिल्ली से ये ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 9 से छूटती है, जबकि लखनऊ में इसे प्लेटफार्म नंबर दो या पांच पर लिया जाता है। मुझे लगा था कि लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह इस पर आपत्ति करेंगे, लेकिन वो भी  खामोश हैं। यात्रियों की जेब काटी जा रही है, किसी से कोई मतलब नहीं है।

रेलवे की बातें करूं तो मेरी बात कभी खत्म ही नहीं होगी। पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप  (पीपीपी) पर नई सरकार को भी बहुत भरोसा है। उसे लगता है कि पीपीपी के तहत तमाम बड़े काम वो करा सकती है। मैं मोदी साहब को बताना चाहता हूं कि पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ने देश के कुछ चुनिंदा रेलवे स्टेशन को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए पीपीपी के तहत इंटरनेशनल टेंडर निकाला था। आपको हैरानी होगी कि किसी भी विदेशी निवेशक  ने इस काम को करने में अपन रुचि  नहीं दिखाई। जानते हैं क्यों ? क्योंकि रेलवे  ने अपनी विश्वसनीयता ही खो दी है। कोई भी विदेशी निवेशक रेलवे में पैसा लगाने से घबराता है। उसे लगता है कि  जिस देश में मामूली किराया बढ़ाने पर रेलमंत्री की छुट्टी हो जाती है, वहां कोई विदेशी निवेशक पैसा लगाने का रिस्क कैसे ले सकता है ? आपको पता है ना कि देश में रेलवे का किसी से कंपटीशन नहीं है, अकेली इतनी बड़ी संस्था है। आप सोचें कि कोई व्यक्ति अकेले किसी रेस में हिस्सा ले, फिर भी वो फर्स्ट ना आकर सेकेंड रहे तो आसानी से उसकी क्षमता को समझा जा सकता है। भारतीय रेल की हालत भी कुछ ऐसी ही है, अकेले दौड़ रही है, फिर भी दूसरे नंबर पर है।

मेरा मानना है कि रेलवे की तरक्की तब तक नहीं हो सकती, जब तक रेलमंत्री इसके  जरिए अपनी और पार्टी की राजनीति का हित देखते रहेंगे! वैसे तो जब दो सप्ताह के बाद संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला हो तो नैतिकता का तकाजा यही था कि रेलयात्री किराए में पिछले रास्ते से बढोत्तरी ना की जाए, रेल बजट में ही इसका प्रावधान किया जाए। पर यहां भी 56 इँच का सीना का दावा करने वाले मोदी जी का सीना 26 इंच का हो गया, क्योंकि उन्हें लगा कि बजट में  किराया बढाया तो देश में बहुत किरकिरी होगी, इसलिए बजट के पहले ही किराया बढ़ा दो.. बजट में फीलगुड लाने के लिए बुलेट ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात कर जनता को बेवकूफ बनाने में आसानी होगी। सच कहूं तो मोदी भी ऐसा करेंगे, मुझे भरोसा नहीं था। अब देखिए ना पुराने रेलमंत्रियों की तरह सदानंद गौडा ने भी पचासों नई ट्रेन का ऐलान कर दिया, ये जाने बगैर कि पुराने रेलमंत्रियों ने जिन ट्रेनों का ऐलान किया है, उसमें से सैकड़ों ट्रेन अभी पटरी पर नहीं आई है। रेलवे  की क्षमता अब ऐसी  नहीं है कि किसी भी रुट पर नई ट्रेन का संचालन हो सके, लेकिन लोगों को खुश करने के लिए तमाम ट्रेनों का ऐलान किया गया, इसमें ज्यादातर ऐसी ट्रेन हैं, जो सप्ताह में एक दिन चलेगी।

पहली बार लगा कि ये रेलमंत्री सेफ्टी और सिक्योरिटी में अंतर नहीं समझते। संसद में ताली बजे, इसलिए महिलाओं की सुरक्षा के लिए चार हजार महिला आरपीएफ कांस्टेबिल की भर्ती की बात तो रेलमंत्री ने की, लेकिन सेफ्टी ( संरक्षा ) से जुडे 1.60 लाख खाली पड़े पदों पर भर्ती कब होगी, इस पर वो खामोश रहे। ढेर सारी नईं ट्रेन, हाई स्पीड ट्रेन की बात भी उन्होंने इस बजट में की, लेकिन ट्रेन में किसी व्यक्ति को कैसे आसानी से टिकट मिल जाएगा, कैसे उसे रिजर्वेशन मिलेगा, इस पर वो खामोश रहे। मोदी और रेलमंत्री लगातार दावा करते हैं रेलवे को राजनीति से अलग रखा  जाएगा  और कोई भी फैसला राजनीति से प्रभावित नहीं होगा। प्रधानमंत्री जी मैं पूछना चाहता हूं कि जब सभी श्रेणी का यात्री किराया 14 प्रतिशत बढ़ाया गया तो इसका विरोध देश भर में हुआ। लेकिन रेलमंत्री ने मुंबई का बढ़ा किराया वापस ले लिया। वजह साफ है कि वहां सात आठ महीने में ही विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में जब रेलमंत्री कहते हैं  कि रेलवे से राजनीति नहीं होगी तो लगता है कि देशवासियों को मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं।

एक सवाल पूछता हूं, बजट में जिस तरह की बातें की जा रही हैं, उससे क्या ये सवाल पैदा नहीं होता कि  संसद में रेल का अलग से बजट रखने का मतलब क्या है ? पहले एक रुपये किराया बढ़ता था तो देश में हाय तौबा मच  जाती थी,  यहां दूसरे रास्ते से सैकडों रुपये किराया बढ़ा दिया जाता है और कोई चूं चां  तक  नहीं करता है। ट्रेन का नाम बदल कर जनता की जेब काट ली जा रही है। अगर यही सब किया जाना है तो मुझे लगता है कि रेल बजट रेलवे के लिए एक सालाना जलसा से ज्यादा कुछ नहीं है।  बहरहाल रेल बजट ने तो लोगों को  निराश किया है, अगर आम बजट में भी लोगों को कोई राहत ना मिली और रेल बजट की तरह  इसमें भी  लफ्फाजी की गई तो मोदी की किरकिरी ही होगी। किरकिरी इस मायने में कि वो संख्या बल के आधार पर संसद में भले ही जीत हासिल कर लें, लेकिन जनता के दिलों से वो पूरी तरह उतर जाएंगे। एक बात कहूं मोदी जी प्लीज मुझे मुंगेरी लाल के हसीन सपने मत दिखाइये, मेरे सपनों पर राजनीति मत कीजिए। तकलीफ होती है। विदेशी चैनल पर मुझे देश की असल तस्वीर रखने में आज बहुत कष्ट हुआ।





Thursday, 3 July 2014

हाई स्पीड ट्रेन के नाम पर धोखा !

ई सरकार को रेल अधिकारी लगातार मूर्ख बना रहे हैं, इसकी मुख्य वजह कमजोर रेलमंत्री है। संभवत: वो रेल अफसरों की चापलूसी को समझ नहीं पा रहे हैं, इसी वजह से उन्हें अधिकारी गुमराह कर रहे हैं ।

एक ओर रेल अधिकारी प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यात्रियों की सुरक्षा की अनदेखी कर  कटरा तक ट्रेन चलाने जा रहे हैं, जबकि रेलवे के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने निरीक्षण रिपोर्ट में साफ कहा है कि जल्दबाजी में ट्रेन चलाना खतरनाक होगा, दूसरी ओर " सेमी हाईस्पीड ट्रेन " के नाम पर रेलवे को एक बार फिर करोडों का चूना लगाने की तैयारी है।

याद कीजिए 15 फरवरी 2006 तत्कालीन रेलमंत्री लालू यादव ने दिल्ली से आगरा के बीच 150 किलोमीटर की रफ्तार से शताब्दी ट्रेन चलाने का दावा करते हुए नई दिल्ली स्टेशन से शताब्दी ट्रेन को हरी झंडी भी दिखाई थी।

दरअसल रेल अफसरों ने लालू को समझाया कि दिल्ली भोपाल शताब्दी ट्रेन को आगरा तक 150 किलोमीटर की स्पीड से चलाते हैं। इस काम के लिए उस समय भी रेल की पटरी पर लगभग 20 करोड रुपये से ज्यादा खर्च भी किए गए।

आप जानकर हैरान होंगे रेल मंत्रालय ने उस दौरान भी यही दावा किया था कि दिल्ली से आगरा 195 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ 90 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

रेलवे टाइम टेबिल के हिसाब से ये शताब्दी ट्रेन सुबह 6 बजे नई दिल्ली से रवाना होती है और सुबह 8.06 बजे आगरा पहुंचती है। मतलब साफ है कि कई करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शताब्दी ट्रेन आज तक 150 किलोमीटर की रफ्तार से नहीं चल सकी।

अब आठ साल बाद फिर रेल अधिकारियों ने " मोटा माल "  बनाने का रास्ता खोज निकाला है। इसी रेल पटरी पर " सेमी हाईस्पीड " ट्रेन चलाने के लिए ट्रायल रन किया जा रहा है, ये ट्रेन 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलेगी और 90 मिनट में आगरा पहुंचेगी ।

अब रेल अफसरों से ये पूछने वाला कोई नहीं है कि क्या शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलो मीटर की रफ्तार से चल रही है ? अगर चल रही है तो इसे आगरा पहुंचने में 2.06 घंटे क्यों लगते हैं ? नहीं चल रही है तो 2006 में करोड़ों रुपये खर्च हुए, उसका जिम्मेदार कौन है ?

अच्छा एक बात रेल अफसरों से ये भी पूछना चाहता हूं कि जिस ट्रैक पर 150 किलो मीटर की रफ्तार से एक ट्रेन चल रही थी, उस पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से एक और ट्रेन चलाने में आठ साल लग गए ?

मैं जानना चाहता हूं कि 150 की रफ्तार को अपग्रेड कर 160 किलोमीटर करने के लिए क्या क्या काम किया गया ? इस पर कितना पैसा खर्च हुआ ? अब रेल मंत्रालय का कौन सा अफसर गारंटी देगा कि दिल्ली से आगरा के बीच इस खास ट्रेन की स्पीड 160 किलोमीटर रहेगी ही ?

बहरहाल मेरा पुख्ता दावा है कि इस पूरे रेल खंड पर 160 किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन को चलाना अभी संभव नहीं है। इस रेल खंड में 45 से 50 किलोमीटर ही ऐसी दूरी है जहां 160 की स्पीड  से ट्रेन चल सकती है।

चूंकि रेल के इतिहास में पहली बार इतना अधिक किराया बढ़ाया गया है, इसलिए रेल मंत्रालय " फेस सेविंग " के लिए लुभावनी घोषणाएं करने में लगा है। रेलमंत्री अनुभवहीन है, वो मंत्री की नहीं बोर्ड के चेयरमैन की भाषा बोल रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी,

प्लीज
रेल मंत्रालय से ये जरूर पूछा जाना चाहिए कि लालू यादव ने जिस शताब्दी को 150 किलो मीटर रफ्तार से चलाने के लिए 8 साल पहले हरी झंडी दिखाई थी, उसकी असल रफ्तार क्या है ? रेल मंत्रालय पर अगर सख्ती नहीं की गई तो ये यूं ही सरकार को मूर्ख बनाते रहेंगे।



Thursday, 15 May 2014

UPA : दस साल दस गल्तियां !

क्जिट पोल के नतीजों से कांग्रेस बुरी तरह घबराई तो है, इसके बाद भी पार्टी आत्ममंथन करने को तैयार नहीं है। पार्टी आत्ममंथन करने के बजाए नेतृत्व को बचाने में लगी है। मसलन पार्टी चाहती है कि किसी तरह हार का ठीकरा सरकार पर यानि मनमोहन सिंह पर फोडा जाए। चुनाव की जिम्मेदारी संभाल रहे राहुल गांधी पर किसी तरह की आँच ना आने दी जाए। बहरहाल पार्टी का अपना नजरिया है, लेकिन यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में दस बड़ी गल्तियों पर नजर डालें तो हम कह सकते हैं सरकार हर मोर्चे पर फेल रही है। कमजोर नेतृत्व, निर्णय लेने में देरी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। आइये एक नजर डालते हैं कि दस साल में दस वो गलती जिसकी वजह से पार्टी को ये दिन देखने पड़ रहे हैं।

मनमोनह सिंह को प्रधानमंत्री बनाना 

कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के  रूप में चुना। दरअसल  2004 में जब सोनिया गांधी को लगा कि उनके प्रधानमंत्री बनने से देश भर में बवाल हो सकता है तो उन्होंने ब्यूरोक्रेट रहे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया, जबकि पार्टी में तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद थे, जो इस पद के काबिल भी थे, पर सोनिया को शायद वफादार की तलाश रही। मनमोहन सिंह एक विचारक और विद्वान माने जाते हैं, सिंह को उनके परिश्रम, कार्य के प्रति बौद्धिक सोच और विनम्र व्यवहार के कारण अधिक सम्मान दिया जाता है, लेकिन बतौर एक कुशल राजनीतिज्ञ उन्‍हें कोई सहजता से स्‍वीकार नहीं करता। यही वजह है कि उन पर कमजोर प्रधानमंत्री होने का आरोप लगा।

भ्रष्टाचार और मंहगाई रोकने में फेल

यूपीए सरकार में एक से बढ़कर एक भ्रष्टाचार का खुलासा होता रहा, लेकिन प्रधानमंत्री किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम रहे। यहां तक की कोल ब्लाक आवंटन के मामले में खुद प्रधानमंत्री कार्यालय तक की भूमिका पर उंगली उठी। इसी तरह मंहगाई को लेकर जनता परेशान थी, राहत के नाम पर बस ऐसे बयान सरकार और पार्टी की ओर से आते रहे, जिसने जले पर नमक छि़ड़कने का काम किया। आम जनता महंगाई का कोई तोड़ तलाशने के लिए कहती तो दिग्‍गज मंत्री यह कहकर अपना पल्‍ला झाड़ लेते कि आखिर हम क्‍या करें, हमारे पास कोई अलादीन का चिराग तो है नहीं। कांग्रेसी सांसद राज बब्‍बर ने एक बयान दिया कि आपको 12 रुपये में भरपेट भोजन मिल सकता है, इससे पार्टी की काफी किरकिरी  हुई।

अन्ना आंदोलन से निपटने में नाकाम

एक ओर सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे, दूसरी ओर जनलोकपाल को लेकर अन्ना का दिल्ली में अनशन चल रहा था। सरकार इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाई और ये आंदोलन देश भर में फैलता रहा। सरकार आंदोलन की गंभीरता को समझने में चूक गई, ऐसा सरकार के मंत्री भी मानते हैं। अभी अन्ना आंदोलन की आग बुझी भी नहीं थी कि निर्भया मामले से सरकार बुरी तरह घिर गई। देश भर में दिल्ली और यूपीए सरकार की थू थू होने लगी। जनता सरकार से अपना हिसाब चुकता करना चाहती थी, इसी क्रम में पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की बुरी तरह हार हुई, अब लोकसभा में भी पार्टी हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। अगर इन दोनों आंदोलन के प्रति सरकार संवेदनशील होती तो शायद इतने बुरे दिन देखने को ना मिलता ।

देश की भावनाओं को समझने में चूक 

यूपीए सरकार के तमाम मंत्री पर आरोप लगता रहा है कि वो देश की भावनाओं का आदर नहीं करते हैं। कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पर सरकार का रवैया दुत्कारने वाला रहा है। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने तो हद ही कर दी, इस मामले में उन्होंने संसद में ऐसा बयान दिया कि जिससे जनता और देश दोनों शर्मसार हो गए। एंटनी ने पाकिस्तान का बचाव करते हुए कहाकि पुंछ में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने हुए लोगों ने की, जबकि रक्षा मंत्रालय ने साफ कहा था कि हमलावरों के साथ पाक सैनिक भी थे। उस समय पाक को दोषमुक्‍त बताने वाले इस बयान पर जमकर हंगामा हुआ था। इसके अलावा निर्भया कांड में यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी की चुप्पी से भी सरकार और पार्टी के प्रति गलत संदेश गया।

काँमनवेल्थ गेम ने डुबोई लुटिया

मैं समझता हूं कि एशियन गेम के बाद काँमनवेल्थ खेलों का आयोजन देश में खेलों का सबसे बड़ा आयोजन था, लेकिन ये आयोजन लूट का आयोजन बनकर रह गया। इसमें खेलों की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी खेल के आयोजन मे हुए घोटाले की हुई। यहां तक की कांग्रेस के दिग्गज नेता को जेल तक की हवा खानी पड़ी। आखिरी समय में जिस तरह से पीएमओ ने इस आयोजन की खुद माँनिटरिंग शुरू की, अगर पहले ही ऐसा कुछ किया गया होता तो विश्वसनीयता बनी रहती।  इसके अलावा 2 जी घोटाले  ने तो सरकार के मुंह पर कालिख ही पोत दी, जिसमें महज 45 मिनट में देश को 1.76 लाख  करोड का चूना लगा।

मंत्रियों और नेताओं ने जनता से बनाई दूरी 

ये तो कांग्रेस का हमेशा से चरित्र रहा है। उनके सांसद विधायक चुनाव जीतने के बाद जनता से संवाद खत्म कर लेते हैं। दोबारा क्षेत्र में वह तभी जाते हैं जब चुनाव आ जाता है। छोटे मोटे नेताओं की बात तो दूर इस बार जब सोनिया गांधी अमेठी पहुंची तो वहां के लोगों ने राहुल की शिकायत की और कहाकि राहुल चुनाव जीतने के बाद यहां उतना समय नहीं दिए, जितना देना चाहिए था। यही वजह कि अमेठी में जहां दूसरी पार्टियों के झंडे नहीं लगते थे, इस बार ना सिर्फ बीजेपी बल्कि आप पार्टी का भी झंडा देखने को मिला। राहुल की हालत इतनी पतली हो गई कि उन्हें मतदान वाले दिन अमेठी में घूमना पड़ा ।

सीबीआई को बनाया तोता 

राजनीति को थोड़ा बहुत भी समझने वाले जानते हैं कि यूपीए की सरकार देश में 10 साल इसलिए चली कि उसके पास सीबीआई थी और सरकार ने उसे तोता बनाकर रखा था। मुलायम, मायावती, स्टालिन के स्वर जरा भी टेढ़े होते तो सीबीआई सक्रिय हो जाती थी, ये सब सीबीआई से बचने के लिए सरकार को समर्थन देते रहे। हालाँकि सरकार के काम काज का ये कई बार विरोध भी करते रहे, लेकिन समर्थन वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। राजनाथ सिंह भी समय समय पर इशरत जहां मुठभेड़ मामले की सीबीआई की जांच को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते रहे हैं, वहीं भ्रष्‍टाचार के खिलाफ बिगुल बजा सरकार की चूलें हिलाने वाले अन्‍ना हजारे भी कांग्रेस पर सीबीआई दुरुपयोग के आरोप लगाते रहे हैं।

युवाओं को जोड़ने में राहुल नाकाम 

युवाओं की बात सिर्फ  राहुल  के भाषण में हुआ करती थी, राहुल या फिर सरकार ने इन दस सालों में ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे युवाओं को सरकार पर भरोसा हो। सरकार और कांग्रेस नेताओं को पहले ही पता था कि इस पर 18 से 22 साल  के लगभग 15 करोड़ ऐसे मतदाता हैं जो पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे हैं, इसके बाद भी सरकार ने कोई मजबूत ठोस प्लान युवाओं के लिए तैयार नहीं किया। केंद्र सरकार के तमाम मंत्रालयों में लाखों पद रिक्त हैं, एक अभियान चलाकर इन्हें भरा जा सकता था, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। इस चुनाव में बेरोजगारी एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, ये बात यूपीए सरकार के घोषणा पत्र में तो था, लेकिन दस साल सरकार इस मसले पर सोती रही। यूपीए की हार की एक प्रमुख वजह बेरोजगारी भी है।

सोशल मीडिया और तकनीक से परहेज

यूपीए के फेल होने की एक ये भी खास वजह हो सकती है। नरेन्द्र मोदी जहां तकनीक के इस्तेमाल के मामले में अव्वल रहे, उन्होंने आक्रामक और हाईटेक प्रचार का सहारा लिया, वही राहुल गांधी पुराने ढर्रे पर चलते रहे। सोशल नेटवर्किंग का भी पार्टी उतना इस्तेमाल नहीं कर पाई जितना बीजेपी या फिर आम आदमी पार्टी ने किया। कहा गया कि राहुल ने पांच सौ करोड़ रुपये खर्च किए हैं, लेकिन मेरे हिसाब से तो प्रचार में वो केजरीवाल से भी पीछे रहे। राहुल ने एक दो चैनलों को इंटरव्यू दिया, लेकिन वो कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए, मात्र सरकारी योजनाओं पर उबाऊ तरीके से बात करते रहे। ऐसे में लोगों ने उनकी बात को खारिज कर दिया। प्रियंका गांधी नीच राजनीति का बयान देकर सोशल मीडिया के निशाने पर रहीं, इससे भी पार्टी को मुश्किल का सामना करना पड़ा।

कमजोर चुनावी रणनीति 

सरकार हर  मोर्चे पर फेल रही, उसके पास ऐसा कुछ नहीं था, जिसे गिना कर वो वोट हासिल कर सके। ऐसे में उन्हें चुनाव की रणनीति पर अधिक काम करने की जरूरत थी,  लेकिन अनुभवहीन राहुल ऐसा कुछ करने में नाकाम रहे, वहीं पार्टी के नेता भी खुद भी अलग थलग रहे। ऐन चुनाव के वक्त तमाम नेताओं ने चुनाव लड़ने से इनकार किया, इससे भी पार्टी की किरकिरी हुई। दूसरी ओर बीजेपी की चुनावी रणनीति अव्वल दर्जे की रही, इसके अलावा मोदी ने जिस आक्रामक शैली में प्रचार किया, उससे कांग्रेस पूरी तरह बैकफुट पर रही।