Wednesday, 12 June 2013

आड़वाणी की नहीं मानीं, आड़वाणी मान गए !

ज की सबसे बड़ी खबर ! भारतीय जनता पार्टी के तमाम अहम पदों से इस्तीफा देने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की कोई बात नहीं मानी गई, लेकिन वो मान गए। देश को हैरानी इस बात पर हुई कि जब आडवाणी ने इस्तीफा दिया, उस समय वो देश के सामने नहीं आए और जब आज वो मान गए,  फिर भी जनता के सामने नहीं आए। पार्टी और पार्टी के नेताओं पर तमाम गंभीर आरोप लगाने वाले आडवाणी के साथ क्या " डील " हुई ? पार्टी की ओर से इसकी अधिकारिक जानकारी भले ही ना दी गई हो, लेकिन सियासी गलियारे की चर्चा के मुताबिक आडवाणी चाहते हैं कि अगर आम चुनाव में एनडीए को बहुमत मिलता है तो छह महीने के लिए ही सही लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाए। चूंकि आडवाणी खुद संघ के स्वयं सेवक हैं, इसलिए उन्हें पता है कि संघ के साथ मिलकर पार्टी में जो फैसला एक बार हो जाता है, उसे वापस नहीं जा सकता। यही वजह है कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति के अध्यक्ष पद से वापस करने की कोई मांग नहीं रखी। हां पार्टी और संघ के सख्त रुख को भांपकर आडवाणी को ये डर जरूर सता रहा था कि कहीं वो राजनीति गुमनामी में ना खो जाएं, इसलिए उन्होंने 24 घंटे के भीतर ही समर्पण करना बेहतर समझा। अब पार्टी में एक तपके का मानना है कि कोई भी नेता कितना ही बड़ा क्यों ना हो, अगर वो अनुशासनहीनता करता है तो क्या उसे पार्टी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाना चाहिए ? आडवाणी ने अपने इस्तीफे का पत्र सार्वजनिक किया, उससे क्या पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आई है, ऐसे में क्यों ना आडवाणी प्रकरण को पार्टी की अनुशासन समिति को सौंप दिया जाए ?

कहा जा रहा है कि आडवाणी ने  अपने इस्तीफे की एक दिन पहले ही पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इस बारे में बता भी दिया था। चर्चा है कि उन्होंने इस्तीफा न देने के लिए पार्टी के सामने अपनी शर्ते भी रखीं थीं। उनकी पहली शर्त यही बताई जा रही है कि आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए उन्हें पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाए। आडवाणी को मालूम है कि अब उनकी पार्टी में पहले जैसी बात नहीं रही है, इसलिए उन्होंने अपना रुख थोड़ा नरम रखा और कहाकि अगर एनडीए सत्ता में आती है तो उन्हें कम से कम छह महीने के लिए प्रधानमंत्री बनने का मौका दिया जाए। सूत्र बताते हैं कि आडवाणी ने साफ किया था कि वो कई दशक से पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता रहे है, इसलिए पीएम के पद पर पहला हक उन्हीं का बनता है। वो यहां तक तैयार रहे कि अगर पार्टी किसी दूसरे नेता को आगे करना चाहती है तो वो छह महीने बाद खुद ही प्रधानमंत्री पद उसके लिए खाली कर देंगे। बता रहे हैं कि आडवाणी इतना झुकने को तैयार रहे, लेकिन पार्टी और संघ ने उनकी शर्तों को बिल्कुल भी भाव नहीं दिया। इसके बाद उनके सामने इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। हालांकि आडवाणी भी अच्छी तरह जानते हैं कि अब उनकी जगह पार्टी में नहीं बस पोस्टर में रह गई है। 

हां एक बात और । ये सही है कि आडवाणी नरेन्द्र मोदी को प्रचार समिति  का अध्यक्ष बनाए जाने के बिल्कुल खिलाफ थे। गोवा कार्यकारिणी की बैठक के ऐन वक्त पर उन्होंने मोदी के मामले में अपनी बात रखी और कहाकि मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष ना बनाकर संयोजक  बनाया जाए। बताया जा रहा है कि जब उन्हें बताया गया कि गोवा में नरेन्द्र मोदी को एक निर्णायक भूमिका सौंपी ही जाएगी, इस पर  अंतिम फैसला हो चुका है, तब आडवाणी ने अपनी बीमारी का आखिरी इलाज बताया कि अगर किसी वजह से मोदी को अध्यक्ष बनाया भी जाता  है तो उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वो हर छोटे बड़े फैसले मेरी सहमति से लेगें। सरकारी शब्दों में कहें तो इसका मतलब मोदी को आडवाणी के मातहत रहना होगा और उन्हें ही रिपोर्ट करना होगा। आडवाणी की इस शर्त के पीछे मंशा ये थी कि इससे जनता में संदेश जाएगा कि चुनावी  रणनीति के असली सूत्रधार आडवाणी ही है। बताया जा रहा है कि ये जानकारी जब संघ को दी गई तो वहां से साफ किया गया कि वो गोवा में अपना फैसला करें, दिल्ली से बात बंद कर दें। इशारा साफ था कि आडवाणी गोवा आएं या ना आएं जो फैसला हो चुका है, उसका ऐलान किया जाए। मतलब नरेन्द्र मोदी को प्रचार की कमान पूरी तरह से सौंप दी जाए। संघ का सख्त रुख देखकर फिर पार्टी नेताओं ने आडवाणी से बातचीत बंद कर दी और मोदी के नाम का ऐलान कर दिया गया।

जरूरी बात ! आडवाणी ने इस्तीफे में आरोप लगाया है कि अब पार्टी के नेता ना देश के लिए काम कर रहे हैं और ना ही पार्टी के हित में बल्कि वो निजी स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं। आडवाणी जी ये आरोप तो आप पर भी लागू होता है। आपके  इस्तीफे पर ध्यान दें तो उसके मुताबिक तो आप महज पार्टी के सांगठनिक पदों से त्यागपत्र दे रहे हैं,  लेकिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता अपने पास रखी है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के जिन सिद्धांतों की बात आप कर रहे हैं, अगर बीजेपी वाकई उन पर नहीं चल रही हैं तो आपने ऐसी सिद्धांतविहिन पार्टी की प्राथमिक सदस्यता क्यों नहीं छोड़ी ? क्या ये सच नहीं है कि पार्टी की सदस्यता अपने पास बरकरार रखने के पीछे भी आपकी भविष्य की राजनीति छिपी है। आप आज भी एनडीए के चेयरमैन हैं,  और ये पद आपके पास तभी तक रह सकता है, जब तक आप बीजेपी के सदस्य हैं। क्योकि बीजेपी एनडीए में सबसे बड़ा घटक दल है, लिहाजा एनडीए का चेयरमैन बीजेपी का ही चुना जाना है। आडवाणी जी क्यों इतनी लंबी - लंबी छोड़ रहे थे। अच्छा सबको पता है कि एक  जमाने मे आप ही मोदी के सबसे बड़े शुभचिंतक थे। हालाकि गोधरा के लिए मैं भी काफी हद तक ये मानता हूं कि मोदी प्रशासन वहां फेल रहा है , लेकिन गोधरा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तो उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे, तब आपने ही उन्हें बनाए रखने की वकालत की थी। उसका कर्ज भी मोदी ने उतारा और आपको गुजरात से लोकसभा चुनाव लड़ाकर दिल्ली भेजा। आज जब मोदी कद बढ़ा तो आपको इतनी तकलीफ हुई।

वैसे अनुशासनहीनता और पार्टी को विवादों में खड़ा करने का सवाल हो तो आडवाणी भी पीछे नहीं रहे हैं। 2005 में पाकिस्तान की यात्रा के दौरान मुहम्मद अली जिन्ना को 'सेकुलर' कहे जाने के कारण उन्हें पार्टी और संघ के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं उन्हें भाजपा अध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा। दो दिन पहले जिस नीतिन गड़करी में आपका इतना विश्वास दिखाई दिया, 26 मई, 2012 को इन्हीं नितिन गडकरी को दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनाने की बात चली तो ये नाराज हो गए और मुंबई में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद रैली में हिस्सा नहीं लिया। तीन सितंबर, 2012 को आपने अपने ब्लाग में लिखा कि इस बात की पूरी संभावना है कि अगला प्रधानमंत्री गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई होगा। क्या इससे पार्टी की छवि पर असर नहीं पड़ा। नौ मार्च, 2013 पार्टी की कार्यकारिणी में भाषण देते हुए आडवाणी ने कहा पिछले कुछ वर्षो में मुझे यह महसूस करके निराशा हुई है कि जनता का मूड सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ है, लेकिन वह भाजपा से भी बहुत उत्साहित नहीं है। मतलब क्या समझा जाए। इतना ही नहीं 12 मई, 2013 कर्नाटक में हार के बाद अपने ब्लाग में आडवाणी ने लिखा कि अगर भाजपा जीतती तो आश्चर्य होता ! ताजा मामला अब जबकि लोकसभा का चुनाव करीब है, पार्टी को मजबूत दिखाना चाहिए, तब वो गोवा कार्यकारिणी की बैठक में नाराज होकर नहीं गए।

मैं बीजेपी की तमाम नीतियों और उसकी विचारधाराओं से सहमत ना होने के बाद भी ये जरूर कहना चाहता हूं कि आज केंद्र की सरकार खासतौर पर कांग्रेस से जनता बुरी तरह त्रस्त है। वो  एक बदलाव चाहती है। आज देश की जरूरत महज सत्ता परिवर्तन की नहीं है, देश अपना चरित्र बदलने को तैयार बैठा है। मुझे नहीं लगता कि अब देश की जनता केंद्र में कमजोर सरकार  बर्दास्त करने का जोखिम लेने को तैयार है।  जनता भी नई सोच के साथ आगे बढ़ना चाहती है। ये कहना कि मोदी को नेता बनाया गया तो एनडीए छिटक जाएगा। इस मामले में सबसे ज्यादा बातें जेडीयू और शिवसेना को लेकर हो रही है। ईमानदारी की बात तो ये है कि आज बिहार में जेडीयू का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। लोकसभा के उपचुनाव में करारी हार ने जेडीयू की बिहार में राजनैतिक हैसियत बता दी है। रही बात शिवसेना की तो वहां पार्टी को लगता है कि शिवसेना के बजाए अगर वो मनसे यानि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ( राज ठाकरे) से गठबंधन करती है तो ज्यादा फायदे में रहेगी। ऐसे में एनडीए को भी सच्चाई से मुंह छिपाने की जरूरत नहीं है। सच तो ये है कि आज आडवाणी ने आगामी लोकसभा के चुनाव का मुद्दा ही बदल दिया है। बहरहाल आडवाणी के इस्तीफे के बाद हुए घटनाक्रम से जेडीयू को भी समझ लेना चाहिए कि बीजेपी मोदी को ही आगे रखकर चुनाव के  मैदान में उतरेगी। अगर उसे मंजूर है तो एनडीए में रहे, वरना उसे अभी रास्ता तलाशना चाहिए। लेकिन सब जानते हैं कि नीतिश कुमार कुर्सी छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते, लिहाजा वो यूं ही गीदड़ भभकी देते रहेंगे।

आखिर में आडवाणी जी से दो बातें दो टूक कहना चाहता हूं। आडवाणी जी आपने उस दिन इस्तीफा क्यों नहीं दिया जब आपके ना चाहते हुए भी नेता विपक्ष का पद छीना गया ? अपने घर से कितनी बार आप संघ मुख्यालय भी तलब किए गए। मेरा तो मानना  है कि आपके साथ अन्याय तो उस दिन हुआ था। इसके बाद तो पार्टी ने आप पर भरोसा किया और आप पीएम इन वेटिंग रहें। आपकी अगुवाई में चुनाव लड़ा गया, आप मनमोहन सिंह से मुकाबला नहीं कर पाए। आज तो आप नौजवानों के नब्ज को पहचानिए। देखिए आप ने मोदी को प्रचार समिति के अध्यक्ष बनने में रुकावट डालने की कोशिश की, देश का नौजवान आपके घर के सामने जमा होकर प्रदर्शन करने लगा। आप इसी तरह अपनी जिद्द पर अड़े रहते तो शायद आज के बाद आप देश के किसी भी हिस्से में जाते आपको ऐसे ही विरोध का सामना करना पड़ता। आपने ये भी देखा कि आपके इस्तीफे की खबर को मीडिया ने हाथोहाथ लिया, लेकिन आपके समर्थन में देश के किसी भी हिस्से मे दो आदमी सड़क पर नहीं निकले। यहां तक की आपके निर्वाचन क्षेत्र गांधीनगर में भी नहीं। क्या ये आपके लिए काफी नहीं है कि आप देश की मंशा को समझें ? मेरा तो मानना है कि आज मोदी ने जो जगह बना ली है, उनका विरोध करके आप कहीं से भी चुनाव नहीं जीत सकते हैं। आपको चुनाव सुषमा स्वराज, वैकैया नायडू, मुरली मनोहर जोशी, अनंत कुमार या फिर एनडीए संयोजक शरद यादव कत्तई नहीं जिता सकते। बहरहाल आपने 24 घंटे के भीतर ही पार्टी की बात मानी, मुझे लगता है कि इस्तीफा  देकर आपने अपने जीवन की जो सबसे बड़ी राजनीतिक भूल की थी, उसे उतनी जल्दी ही सुधार कर अच्छा किया। अब  आप मीडिया के सामने आएं और ऐसा संदेश दें, जिससे लगे कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है।



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Monday, 3 June 2013

मोदी से इसलिए नाराज हैं आडवाणी !

वृक्षारोपण का कार्य चल रहा था।
नेता आए, पेड़ लगाए,
पानी दिया, खाद दिया।
जाते-जाते भाषण झाड़ गए।
गाड़ना आम का पेड़ था,
पर वो बबूल गाड़ गए।



ऐसा ही कुछ किया भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने। एक जमाना था जब यही आडवाड़ी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करते नहीं थकते थे, लेकिन जब से बीजेपी में प्रधानमंत्री के भावी उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम सामने आया है, केवल आडवाणी ही नहीं बल्कि उनकी लाँबी के दूसरे नेता भी मोदी से चिढ़ने लगे हैं। जबकि सच्चाई ये है कि आज की तारीख में बीजेपी के किसी भी नेता का राजनैतिक कद मोदी के मुकाबले अब बहुत छोटा है। इतना ही नहीं किसी दूसरे नेता की इतनी हैसियत भी नहीं है कि वो मोदी का खुला विरोध कर सके। ऐसे में जो लोग मोदी के बढ़ते कद से परेशान हैं या उनसे चिढ़ते हैं, उनकी खी़झ निकालते का एक ही तरीका है कि नरेन्द्र मोदी की तुलना वो राष्ट्रीय नेताओं से ना करके छोटे-मोटे मुख्यमंत्रियों से करने लगें। कुछ ऐसी ही घटिया चाल चली लालकृष्ण आडवाणी ने। उन्होंने मोदी को नीचा दिखाने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जमकर तारीफ की। इतना ही नहीं आडवाणी ने चौहान की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कर डाली।


दो दिन पहले बीजेपी के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी ग्वालियर में थे। मौका तो था नगर-ग्राम केंद्रों के पालकों और संयोजकों के सम्मेलन के समापन का। जहां आडवाणी को इनका मार्गदर्शन करना था। लेकिन  आडवाणी को ना जाने क्या सूझा, उन्होंने इस मंच का इस्तेमाल नरेन्द्र मोदी को आइना दिखाने के लिए किया। पूरे भाषण को अगर ध्यान से सुना जाए तो बीजेपी के मंच से आडवाणी ने मोदी को वो सब कहा  जो आमतौर पर कांग्रेस के नेता कहा करते हैं। अंतर बस इतना था कि कांग्रेसी सामने से हमला करते हैं, लेकिन आडवाणी ने इशारों में और पीछे से हमला किया। उन्होंने वाजपेयी के तमाम कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहाकि वाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और उन्नयन, परमाणु परीक्षण, किसान क्रेडिट कार्ड से लेकर अनेक योजनाएं शुरू कीं, लेकिन हमेशा वे नम्र रहे और अहंकार से दूर रहे। अटल जी के काम की तारीफ से मुझे लगता है कि किसी को कोई गुरेज नहीं, लेकिन अंतिम लाइन में उन्होंने पुछल्ला जोड़ दिया कि वो हमेशा नम्र रहे और अहंकार से दूर रहे। ये निशाना नरेन्द्र मोदी पर था, क्योंकि कांग्रेसी उन्हें अंहकारी मानते हैं। बात यहीं खत्म नहीं हुई, उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तुलना भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से की और कहाकि वाजपेयी की तरह ही शिवराज नम्र है और अहंकार से दूर हैं।


अच्छा इतनी बात कह कर अगर आडवाणी ने अपना मुंह बंद रखा होता तो भी गनीमत थी। लेकिन वो रुके नहीं और मोदी को हलका करने में अपनी ताकत झोंकते रहे। उन्होंने कहाकि गुजरात तो पहले से ही विकसित और संपन्न राज्य रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश की गिनता बीमारू राज्य के रूप में होती है, जिसे शिवराज चौहान ने स्वस्थ राज्य बना दिया। आडवाणी की बातों से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो ना सिर्फ शिवराज की जमकर तारीफ कर रहे हैं, बल्कि नरेन्द्र मोदी के विकास पर सवाल भी खड़ा कर रहे हैं, साथ उन्हें अंहकारी भी मानते हैं। सच तो ये है कि आडवाणी के इस बदले रूख से वहां मौजूद भाजपाई भी हैरान थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर आडवाणी जी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता, राज्य के मुख्यमंत्री के लिए ऐसी तल्ख टिप्पणी क्यों कर रहे हैं ?  जाहिर है राजनीति की जो थोड़ी भी समझ रखते हैं, वो तो यही समझेंगे कि अब पार्टी में आडवाणी पीएम के उम्मीदवार नहीं रहे, एक स्वर से लोग प्रधानमंत्री के लिए नरेद्र मोदी का नाम ले रहे हैं, इसलिए उनकी नाजाजगी जाहिर है। लेकिन आडवाणी अपनी नाराजगी को इस तरह सार्वजनिक मंच से जाहिर करेंगे, ये देखकर लोग हैरान थे।


आडवाणी के बयान के बाद बवाल होना ही था और हुआ भी। मीडिया ने आडवाणी के बयान का अर्थ निकाला और कहाकि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। जिन बातों की चर्चा अभी तक अंदरखाने होती थी, अब खुलेआम होने लगी। पहले भी माना जा रहा था कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किए जाने को लेकर पार्टी में दो राय है। अब ये बात सामने भी आ गई है। हालांकि मीडिया तो चाहता ही था कि आडवाणी की बातों का मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जवाब दें। उनके घर और दफ्तर में इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरे तन गए, लेकिन मोदी ने कोई जवाब नहीं दिया। वरना मोदी की जो छवि है वो किसी की बात का उधार नहीं रखते, सीधे कैमरे पर या फिर ट्विटर के जरिए अपनी बात रख ही देते हैं। बताया जा रहा है कि विवाद से बचने के लिए पार्टी के कुछ नेताओं ने उनसे बात की और कहाकि वो संयम बरतें, आडवाणी की बात से जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई की जाएगी। मोदी चुप रहे, उन्होंने इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।


आज बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोर्चा संभाला। और नेताओं की तरह उन्होंने साफ कर दिया कि आडवाणी की बात मीडिया ने गलत अर्थ निकाला। उन्होंने फिर दोहराया कि नरेद्र मोदी पार्टी के वरिष्ठ और पार्टी के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। खुद को किसी तरह के विवाद में ना डालते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी साफ किया कि आडवाणी ने सिर्फ उनकी नहीं सभी मुख्यमंत्रियों की तारीफ की। उन्होंने नरेन्द्र मोदी को अपने से वरिष्ठ नेता बताया और कहाकि वो पार्टी में तीसरी पंक्ति के नेता हैं। बहरहाल पार्टी को हुए नुकसान की भरपाई की जा रही है, लेकिन इतना तो तय है कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं की एक-एक टिप्पणी पर कई दिन चर्चा चलेगी। ये चर्चा सिर्फ बीजेपी में ही नहीं होगी, आने वाले समय में कांग्रेस के नेता भी इसे उदाहरण बनाएंगे।


वैसे सच्चाई ये है कि बीजेपी में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम बहुत आगे बढ़ चुका है। अब मोदी के नाम को सामने करना बीजेपी की मजबूरी हो जाएगी। अगर होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले पार्टी ने मोदी के नाम का खुलासा नहीं किया तो आने वाले समय में बीजेपी एक बार फिर हाशिए पर चली जाएगी। सच तो ये हैं कि पार्टी में मोदी जैसी लोकप्रियता और राजनैतिक हैसियत वाला दूसरा नेता नहीं है। आडवाणी भी नहीं। दूसरे दलों की मुश्किल ही ये है कि अगर नरेन्द्र मोदी के नाम को बीजेपी ने आगे बढाया तो फिर बीजेपी को रोकना मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि पार्टी का ही एक तपका एनडीए के सहयोगी दलों से हाथ मिलाकर मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहा है। सच बताऊं तो ऐसे हालात तब पैदा होते हैं, जब नेतृत्व कमजोर हाथो में होता है। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अगर आज मैं बीजेपी का अध्यक्ष होता तो लालकृष्ण आडवाणी को दो विकल्प देता। पहला वो अपने वक्तव्य को वापस लेते हुए माफी मांगे, दूसरा माफी नहीं मांगते हैं तो पार्टी से बाहर जाएं। बीजेपी ने अगर अब सख्त फैसला लेना शुरू नहीं किया तो पार्टी को और बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं। 








Wednesday, 29 May 2013

क्रिकेट यानि सेक्स और सट्टेबाजी !

भारतीय क्रिकेट बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। अब क्रिकेट के साथ ही क्रिकेटर्स की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है। हालत ये है कि भारतीय टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी पर भी सट्टेबाजी की छीटें पहुंचनी शुरू हो गई हैं। मुंबई पुलिस की जांच से अब जो जानकारी निकल कर बाहर आ रही है, उसके आधार पर मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि चेन्नई सुपर किग्स के मालिक गुरुनाथ मयप्पन ही नहीं बल्कि कप्तान धोनी भी कहीं ना कहीं इस सट्टेबाजी में शामिल रहे हैं। जब कुछ लोग जेंटिलमैन खेल की आड़ में "धंधा" कर रहे हों तो  सरकार को ही सख्त कदम उठाने के लिए आगे आना होगा। मेरा मानना है कि देश में सभी तरह के क्रिकेट पर फिलहाल एक साल के लिए तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए। दुनिया को सख्त संदेश देने के लिए चैंपियंस ट्राफी खेलने लंदन गई टीम को बिना देरी किए वापस बुला लेना चाहिए। इतना ही नहीं देश में क्रिकेट मैच के प्रसारण पर भी रोक होनी चाहिए। क्रिकेटरों के विज्ञापन टीवी पर दिखाने पर सख्ती से पाबंदी लगाई जानी चाहिए। क्रिकेट की आड़ में सट्टेबाजी और " सेक्स रैकेट " चलाने के आरोप में बीसीसीआई को बर्खास्त कर इस पर तत्काल प्रभाव से सरकार को अपने नियंत्रण में लेना चाहिए।

हालांकि मैं इस मत का हूं कि खेल में राजनीतिज्ञों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्रिकेट समेत सभी तरह के खेलों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक सख्त कानून ये भी होना चाहिए कि जो लोग भी खेल से जुड़ी किसी भी संस्था में शामिल हैं, वो लोकसभा, राज्य सभा, विधानसभा या फिर विधान परिषद कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकते। खेल से जुड़ी जितनी भी संस्थाएं है, सभी संस्थाओं में सिर्फ खिलाडियों को ही चुनाव लड़ने की छूट होनी चाहिए। खैर राजनीतिज्ञों से तो बाद में निपट लिया जाएगा, अभी तो क्रिकेट को बचाना है। मुझे सबसे बड़ी शिकायत केंद्र की सरकार से है। जानवर की चमड़ी से बना एक आदमी अगर तमाम गंदगी उजागर हो जाने के बाद यही चिल्लाता रहे कि वो इस्तीफा नहीं देगा तो क्या पूरा देश यूं ही देखता रहेगा ? आज बीसीसीआई धनवान है, ये सही है। लेकिन ये भी सही है कि ये देशवासियों का पैसा है, हम सब क्रिकेट शौक से देखते हैं, टिकट खरीदते हैं, टीवी पर देखते हैं। क्रिकेट देखने की वजह से ही टीवी पर विज्ञापन मिलते हैं। लेकिन अब पता चल रहा है कि खेल का नतीजा मैदान पर तय नहीं होता, बल्कि पांच सितारा होटल में नतीजे तय होते हैं। जाहिर है ये देशवासियों के साथ विश्वासघात है। क्या ये पर्याप्त कारण नहीं है कि बीसीसीआई और आईपीएल मैनेजमेंट को बर्खास्त कर इनके बैंक खाते सीज किए जाएं। श्रीनिवासन का दामाद जो चेन्नई सुपर किंग्स का मालिक है, वो सट्टेबाजी तो कर ही रहा है, उसके पास लड़कियों को भेजा जा रहा है। क्या ये कारण पर्याप्त नहीं है कि चेन्नई की टीम को आईपीएल से बर्खास्त कर दिया जाए ?


रही बात भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की। क्रिकेट प्रेमी धोनी की इज्जत करते रहे हैं, वजह ये कि एक छोटे से शहर से निकल कर धोनी ने ना सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि देश के लिए दो विश्वकप भी जीता। आज मेरी नजर में धोनी और उनके प्रदेश झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोड़ा में कोई अंतर नहीं है। अंतर सिर्फ ये है कि एक जेल के अंदर है दूसरा जेल के रास्ते में। वजह ये कि चेन्नई सुपर किंग के मालिक गुरुनाथ मयप्पन ने पुलिस को जो बयान दिया है, उसमें कहा गया है कि सट्टेबाजी के लिए वो धोनी से सलाह-मशविरा करके पैसा लगाता था। अच्छा धोनी की पत्नी खुद स्टेडियम में सट्टेबाज बिंदु दारा सिंह के साथ दिखाई दीं। क्या ये वजह पर्याप्त नहीं है कि सट्टेबाजी में धोनी की भूमिका की अच्छी तरह जांच हो। चैंपियंस ट्राफी के लिए लंदन रवाना होने से पहले मंगलवार को शाम धोनी पत्रकारों के सामने जिस तरह गूंगे बने हुए थे, उससे तो यही लगा कि वो मीडिया के सामने नहीं बल्कि पुलिस के सामने बैठे हैं। धोनी को देखने से कोई भी आदमी यही कहेगा कि कुछ तो गड़बड़ जरूर है। वैसे भी आज तक इस बात का जवाब नहीं आ पाया है कि धोनी पत्नी साक्षी सट्टेबाद बिंदु दारा सिंह के साथ क्यों मैच देख रहीं थी ? मुझे लगता है कि जांच शुरू करने के पहले धोनी को कप्तानी से हटाया जाना जरूरी है, क्योंकि वो श्रीनिवासन की कंपनी इंडिया सीमेंट में वाइस प्रेसीडेंट हैं। जाहिर है उनका वहां से आर्थिक हित जुड़ा है, ऐसे में श्रीनिवासन और गुरुनाथ मयप्पन के खिलाफ वो कुछ नहीं बोल सकते।

श्रीनिवासन के अड़ियल रूख से तो ऐसा लग रहा है जैसे ये बीसीसीआई के अध्यक्ष ना होकर क्रिकेट इंडिया के अध्यक्ष हैं, इनके ऊपर देश का कोई कानून लागू ही नहीं होता है। क्रिकेट इनकी खुद की और दामाद की प्रापर्टी है। किसी की कुछ सुनने को ये राजी ही नहीं हैं। इतना बड़ा खुलासा हो गया कि खिलाड़ी सट्टेबाजी में शामिल हैं, चेन्नई सुपर किंग का मालिक सट्टेबाजी कर रहा है । यही नहीं इस बात का भी खुलासा हो गया कि खिलाड़ी, टीम के मालिक और अंपायर देह व्यापार में शामिल हैं। उन्हें बकायदा कालगर्ल मुहैय्या कराई जा रही हैं। होटल के सीसीटीवी कैमरे में सब कुछ कैद हो चुका है। ये पाकिस्तानी अंपायर तो पहले भी कालगर्ल के साथ पकड़ा जा चुका है। इसके बाद भी उसे इस बार आईपीएल में बुलाया गया। आखिर इस मामले में किसकी जवाबदेही है? पुलिस की जांच में जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं, उससे साफ होता जा रहा है कि आईपीएल की आड़ में दूसरा ही धंधा फल फूल रहा है। इस घिनौनी करतूतों के सामने आने के बाद भी अगर श्रीनिवासन कहते हैं कि वो साफ सुथरे हैं, फिर तो अब पुलिस कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं बचा है। मुझे लगता है कि पुलिस को छापा मारकर बीसीसीआई के दफ्तर पर भी तालाबंदी करनी चाहिए।

एक बात जो सबसे ज्यादा हैरान करती है वो ये कि इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी बीसीसीआई में शामिल राजनेताओं को कुछ गलत नहीं लग रहा है। चाल,चरित्र और चेहरे की बात करने वाली पार्टी बीजेपी ने तो अपने मुंह पर कालिख ही पुतवा ली है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे चल रहे हैं। लेकिन अभी तक बिल्कुल खामोश हैं। जब सबसे पड़ा नेता ही चुप है तो अरुण जेटली, अनुराग ठाकुर और दूसरे नेताओं से भला क्या उम्मीद की जा सकती है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, कल तक सभी चुप थे, लेकिन लगता है कि राजीव शुक्ला की वजह से पार्टी की हो रही छीछालेदर को अब हाईकमान ने नोटिस किया है। इसके बाद राजीव शुक्ला ने सीधे-सीधे श्रीनिवासन का इस्तीफा तो नहीं मांगा, लेकिन इतना जरूर कहा कि जब तक जांच चल रही है, तब तक वो दूर हो जाएं। इसके पहले कल नैतिकता के आधार पर ज्योतिर्रादित्य सिंधिया ने जरूर मुंह खोला और श्रीनिवासन का इस्तीफा मांगा। मामला बढता देख आज खेलमंत्री ने भी नैतिकता की दुहाई देते हुए श्रीनिवासन के इस्तीफे की मांग की। अब एक-एक कर लोग इशारे-इशारे में अपनी बात कह रहे हैं। इसी क्रम में एनसीपी नेता शरद पवार ने भी उन्हें हट जाने की सलाह दी है। लेकिन हद कर दी श्रीनिवासन ने... कह रहे हैं कि मेरे खिलाफ कोई मामला नहीं है, फिर मैं क्यों इस्तीफा दूं ? हाहाहाहहा । अभी दामाद ने कम गुल खिलाया है क्या ? या ये इंतजार कर रहे हैं कि परिवार के दूसरे सदस्य भी इस धंधे के लपेटे में आएं तो आप हटेंगे। 

सच कहूं तो पैसे ने सबका मुंह बंद कर रखा है। मेरा सवाल तो पुराने नामचीन क्रिकेटरों से भी है। पूर्व कप्तान कपिल देव, सुनिल गावस्कर, नवजोत सिंह सिद्दू, श्रीकांत, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, अनिल कुंबले, जगावल श्रीनाथ इन लोगों की एक आवाज है। क्यों नहीं खुल कर सामने आते। इन सब को शोहरत इसी क्रिकेट ने दी है, आज क्रिकेट की ही ऐसी तैसी की जा रही है। देश भर के क्रिकेट प्रेमियों को अभी भी खिलाड़ियों से उम्मीदें है, इसीलिए मांग हो रही है कि बीसीसीआई की जिम्मेदारी पूर्व खिलाड़ियों की दी जाए। लेकिन पूरे दिन टीवी पर बकर-बकर करने वाले खिलाड़ी भी आज गांधी जी के बंदर बने बैठे हैं। सचिन को तो लोग क्रिकेट का भगवान कहते हैं, क्या भगवान को आज कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है, या अपने भगवान भी मजबूर हैं। वैसे हम सब जानते हैं कि क्रिकेट में फिक्सिंग कोई नई बात नहीं है। साल 2000 में दिल्ली पुलिस ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोन्ये पर भारत के खिलाफ वनडे मैच में फिक्सिंग कराने का आरोप लगाया। हर्शेल गिब्स, पीटर स्ट्राइडम और निकी बोए पर भी उंगलियां उठी थीं। क्रोन्ये ने तो स्वीकार किया कि उन्होंने भारत में खेले गए एक दिवसीय सीरीज के दौरान अहम सूचनाएं 10 से 15 हजार डॉलर में बेचीं थीं।

याद कीजिए इसी साल यानि 2000 में ही मनोज प्रभाकर ने कपिल देव पर आरोप लगाया कि उन्होंने ही 1994 में श्रीलंका में खेले गए मुकाबले में पाकिस्तान के खिलाफ खराब प्रदर्शन करने को कहा था। इसी साल जुलाई में आयकर विभाग ने कपिल देव, अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, नयन मोंगिया और निखिल चोपड़ा के घरों पर छापे मारे। अक्टूबर में क्रोन्ये पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया। नवंबर में अजहरुद्दीन को फिक्सिंग का दोषी पाया गया जबकि अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर, अजय शर्मा और भारतीय टीम के पूर्व फीजियो अली ईरानी के संबंध सट्टेबाजों से होने की पुष्टि की गई। दिसंबर में अजहरुद्दीन पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया।


चलते-चलते
मेरा एक मित्र क्रिकेट का बहुत बड़ा प्रशंसक है। उससे आज फोन पर बात हो रही थी, बोला श्रीवास्तव जी आप लिखते रहो क्रिकेट के गोरखधंधे के खिलाफ, लेकिन कुछ नहीं होने वाला। हां इस खुलासे से लोगों को एक सुविधा जरूर हो गई है। अभी तक लोग मुंबई जाते थे, अगर उन्हें कालगर्ल या माँडल की जरूरत होती थी, तो बेवजह इधर उधर भटकते थे। अब सबको पता हो गया कि ये सुविधा विंदु दारा सिंह के यहां उपलब्ध है। सीधे फोन करेंगे और उनका काम हो जाएगा। विंदू का भी धंधा अब चमक जाएगा।



Saturday, 25 May 2013

IPL ने क्रिकेट को " कोठा " बनाया !


क्या कहूं, एक हफ्ते से देश की सारी समस्याएं पीछे छूट गई हैं, हर तरफ सिर्फ एक ही चर्चा है, वो है क्रिकेट की। अच्छा क्रिकेट की भी चर्चा हो तो एक बार ठीक है, लेकिन यहां चर्चा हो रही है आईपीएल 6 की, वैसे इसकी चर्चा में भी कोई बुराई नहीं है। पर अब इस चर्चा में खेल कहीं शामिल ही नहीं है। आईपीएल का आँरेंज और पर्पल कैप किसके पास है और अभी इस कैप के लिए किसकी चुनौती कारगर हो सकती है, इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है। आपको पता होगा कि कम से कम 16-16 मैच तो सभी टीमों ने खेले ही हैं, इस दौरान खिलाड़ियों ने बहुत सी अच्छी बाल फैंकी है और बहुत शानदार शाट्स भी लगाए हैं। लेकिन किसी को इससे कुछ लेना-देना नहीं है। जानते हैं आज चर्चा क्या हो रही है ? चर्चा हो रही है क्रिकेट में सट्टेबाजी की, चर्चा हो रही है क्रिकेट में लड़कियों के इस्तेमाल की, चर्चा हो रही है मैंच के बाद रात में होने वाली रंगीन पार्टियों की, चर्चा हो रही है नो बाल फेंकने लिए कालगर्ल के इस्तेमाल की,  चर्चा हो रही है क्रिकेट में अंडरवर्ल्ड के कनेक्शन की। हालत ये है कि क्रिकेट की खबरें जो न्यूज चैनलों पर "खेल के बुलेटिन" में हुआ करती थीं, आज ये खबरें चैनलों के " क्राइम शो " में चल रही हैं। इस खेल में आज जितनी बात खेल और खिलाड़ियों की नहीं हो रही है, उससे कहीं ज्यादा बातें चीयर गर्ल, कालगर्ल, मांडल्स, अभिनेत्रियों और रात में होने वाली रंगीन पार्टियों में पांच से दस ग्राम कपड़े पहन कर खिलाडियों के इर्द-गिर्द मंडराने वाली लड़कियों की हो रही है। आसान शब्दों में कहूं तो सच्चाई ये है कि इस आईपीएल ने क्रिकेट को कोठा बना दिया है।

देखिए आपको अगर इस खेल में होने वाले "असली खेल" को समझना है तो थोड़ा सावधानी और धैर्य से इस पूरे लेख को आराम से पढ़ना होगा। वजह इसमें किरदार बहुत सारे हैं। कुछ किरदार ऐसे हैं, जिनके बारे में चर्चा करना जरूरी है। बगैर कोई भूमिका के सबसे पहले मैं   बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन की बात करता हूं। अध्यक्ष के साथ ही ये चेन्नई सुपर किंग के मालिक भी हैं। इन पर बहुत ही गंभीर आरोप हैं, लेकिन बीसीसीआई इतनी पावरफुल बाँडी है कि इनका कोई कुछ नहीं कर सकता। इनके दामाद टीम के सीईओ की हैसियत रखते थे। मुंबई पुलिस की जांच में पाया गया है कि ये खुद ही सट्टेबाजी भी करते थे और अपनी ही टीम की रणनीति अभिनेता बिंदू दारा सिंह के जरिए सट्टेबाजों से साझा करते थे। अब गिरफ्तार हो चुके हैं। दामाद गुरुनाथ मयप्पन के गिरफ्तार हो जाने के बाद नैतिकता के आधार पर श्रीनिवासन को अध्यक्ष पद से हट जाना चाहिए था, लेकिन वो अड़े हैं कि इस्तीफा नहीं दूंगा। आईपीएल में एक नियम है कि अगर कोई फ्रैंचाइजी अनैतिक कार्य में शामिल पाया जाता है तो उसकी टीम को ब्लैक लिस्टेड कर दिया जाएगा। अब जिस टीम का सीईओ सट्टेबाजी कर रहा है, उस टीम को क्यों नहीं अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए ? अब तक तो इस टीम को अयोग्य घोषित कर आईपीएल से बाहर कर दिया जाना चाहिए था।

मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर श्रीनिवासन की चमड़ी कितनी मोटी है। कुछ दिन पहले जब राजस्थान रायल्स के तीन खिलाड़ी श्रीसंत के साथ दो अन्य पकड़े गए, तब इसी बीसीसीआई ने फ्रैंचाइजी के मालिकों पर दबाव बनाया गया को वो खुद उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराएं। राजस्थान रायल्स ने मजबूर होकर रिपोर्ट दर्ज कराया और उन खिलाड़ियों से करार भी तोड़ दिया। मेरा सवाल है श्रीनिवासन साहब आपने अपने दामाद के खिलाफ पुलिस में अभी तक रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज कराया ? आप फंस ना जाएं इसलिए अपने सट्टेबाज दामाद को अब ये बता रहे हैं कि वो तो सिर्फ टीम में एक मानद सदस्य है। उसका टीम प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं है, वैसे एक बात तो आपने सही कहा कि उसका टीम से कोई लेना देना तो नहीं था, उसका लेना देना आईपीएल की आड़ में कालगर्ल और माडल्स को रिसार्ट में बुलाना था, सट्टेबाजी कराना था, दलाली का काम था। एक नजर में ये दामाद वाकई कितना घिनौना दिखाई दे रहा है।

वैसे तो ये उनके घर की बात है, इसका जिक्र नहीं होना चाहिए, लेकिन जब श्रीनिवासन का बेटा अश्विन खुलेआम अपने पिता पर गंभीर आरोप लगा रहा है तो दो लाइन की चर्चा मै भी कर लेता हूं। कहा जा रहा है बीसीसीआई अध्यक्ष अपने बेटे से इसलिए नाराज हैं, क्योंकि कि वो समलैंगिक है। यानि मर्दों के साथ सोता है। बेटे का आरोप है कि इससे नाराज उसके पिता ने उसे अपने गुर्गों से पिटवाया भी। लेकिन बेटा चीख-चीख कर कह रहा है कि यह उसका निजी मामला है, इस पर उसके पिता नाराज क्यों हैं? हालांकि अब श्रीनिवासन इसका क्या जवाब देगें। वैसे मुझे लगता है कि बाप जो कुछ जमा करता है वो अपने बेटों के लिए ही तो करता है। अब आईपीएल से इतनी चीयर गर्ल, कालगर्ल, माडल्स, अभिनेत्रियों के अलावा हजारों लड़कियां जुड़ी हैं और बेटा है कि वो मर्दों के साथ सो रहा है, गुस्सा आना तो स्वाभाविक है। खैर बाप, बेटे और दामाद का असली चेहरा सबके सामने है। बेहतर तो यही था कि श्रीनिवासन को खुद बीसीसीआई अध्यक्ष का पद छोड़कर अलग हो जाते। लेकिन ये इतना आसान नहीं है, अगर श्रीनिवासन और मनयप्पा जाते हैं तो उनकी टीम भी तो जाएगी। इसलिए मुझे तो लगता है कि श्रीनिवासन अंतिम दम तक कुर्सी नहीं छोड़ने वाले हैं।

अब बात क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी की। धोनी आईपीएल में ही नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं और क्रिकेटप्रेमियों को उनसे बहुत प्यार है। हो भी क्यों ना ,धोनी की अगुवाई में टीम ने दो-दो वर्ल्ड कप जीते हैं। लेकिन सट्टेबाजी में उनकी ही टीम के तथाकथित सीईओ दामाद मनयपत्ता का नाम सामने आया है, जो धोनी के बहुत अच्छे मित्र हैं। कई दफा प्लेइंग 11 तय करने में या फिर टीम की रणनीति बनाने के दौरान भी ये दामाद मौजूद रहता है। ऐसे में आसानी समझा जा सकता है कि जो आदमी सट्टेबाजी में पैसा लगा रहा है तो वो पैसा डुबोने के लिए नहीं, बल्कि कमाने के लिए लगा रहा है। ऐसे में इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता कि वो टीम के भीतर की रणनीति भी सट्टेबाजों के साथ शेयर ना करता हो। धोनी की बात यहीं खत्म नहीं हो रही है। उनकी पत्नी साक्षी धोनी और बिंदू दारा सिंह की करीबी पर भी सवाल उठ रहे हैं। वैसे तो स्टेडियम के वीवीआईपी स्टैंड में आमंत्रित मेहमान यहां कहीं भी बैठकर मैच देख सकता है, लेकिन सट्टेबाजी में पुलिस के हत्थे चढ़े बिन्दुदारा सिंह ने कहा है कि उन्हें अपने पास बैठने के लिए साक्षी ने खुद बुलाया था। बिंदु सट्टेबाजी कर रहा है और साक्षी धोनी की पत्नी है, जाहिर है कि उसे भी बहुत सी चीजें पता होंगी। अब साक्षी और बिंदु की मित्रता में सट्टेबाजी शामिल नहीं है, इसे भरोसे के साथ कैसे कहा जा सकता है। जाहिर हर आदमी यही कहेगा कि इसकी भी जांच होनी चाहिए। वैसे धोनी की पत्नी का नाम एक जगह और आया है। स्पाँट फिक्सिंग में गिरफ्तार श्रीसंत ने जिस लड़की को मंहगा फोन गिफ्ट किया है, वो लड़की कोई और नहीं बल्कि साक्षी की दोस्त है और उसकी श्रीसंत से मुलाकात भी साक्षी ने ही कराई थी। इसलिए इस साक्षी कनेक्शन को भी खंगालने की जरूरत है।

वैसे अब ये मामला पुलिस के हाथ में है, धीरे-धीरे सबकुछ खुलेगा ही। लेकिन मैं तो यही कहूंगा कि आईपीएल ने इस खेल की ऐसी तैसी कर दी। क्रिकेट की चर्चा अब खेल कम नंगई, टुच्चई, गाली देने, मारपीट, थप्पड़ मारने, रात रंगीली करने, मैच के पहले-मैच के बाद सेक्स, अर्धनग्न औरतों के साथ शराब पीकर चिपकने, सोने, सट्टा लगाने, मैच फिक्सिंग, गलत तरीकों से पैसा कमाने, ड्रग्स लेने, बार डांसरों से नाम जुड़ने जैसी कारगुजारियों के चलते ज्यादा चर्चा हो रही है। पुलिस की जांच में जो बात सामने आई है, उसे सुनकर हैरानी होती है, नो बाल फैंकने के लिए कैसे एक गेंदबाज लड़की की मांग कर रहा है। कह रहा है नो रिपीट, मतलब उसे आज नई चाहिए। क्या है ये ? श्रीनिवासन साहब और राजीव शुक्ला जी देश में ये कौन सा क्रिकेट आपने शुरू कर दिया है। बात पिछले सीजन की है आईपीएल की नंगई, टुच्चई की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आईपीएल की एक टीम के विदेशी खिलाड़ी ल्यूक ने दारु पी और फिर लगे एक एनआरआई महिला से चिपकने। उससे गंदी-गंदी हरकतें करने । जबरदस्ती बेडरुम में घूस गए और अश्लील हरकतें करने की कोशिश की। लड़की के दोस्त ने रोका तो उसे इतना पीटा कि वो बेचारा आईसीयू में पहुंच गया। मारपीट में ल्यूक को भी चोटें आईं। क्रिकेटर ल्यूक की गंदी हरकत से जो क्रिकेट शर्मसार हुआ, क्रिकेट के करोडो़ फैन्स आहत हुए उसे लेकर भी बीसीसीआई अध्यक्ष बिल्कुल चुप हैं। ठीक वैसे ही जैसे अपने बेटे के मर्दों के साथ सेक्स करने यानि समलैंगिक होने पर अपने पिता से हुए विवाद को सड़कों पर लाने पर चुप है।

अच्छा इतना कुछ हो जाने के बाद भी बेशर्मी की हद ये है कि आईपीएल या बीसीसीआई का कोई भी पदाधिकारी ये मांग नहीं कर रहा है कि आईपीएल से देश में क्रिकेट का फायदा कम बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का नुकसान ज्यादा हो रहा है। बहुत ज्यादा गंदगी बढ़ती जा रही है। खिलाड़ियों में भी चरित्रहीनता बढ़ रही है। कहा तो ये भी जा रहा है कि बकायदा फ्रैंचाइजी और आयोजक ही जहां खिलाड़ी रुकते हैं, उसी होटल में लड़कियों के कमरे भी बुक करातें हैं। मसलन ऐसा नहीं है कि "कोठेबाजी" के इस धंधे के बारे में किसी को जानकारी नहीं है, बल्कि सच ये है कि यही लोग इस तरह की सुविधाएं मुहैय्या करा रहे हैं। स्व. दारासिंह का नाम हम सब कितने सम्मान से लेते हैं, अब जांच से ये बात सामने आई है कि उन्ही का बेटा बिंदु दारा सिंह भी खिलाड़ियों, सट्टेबाजों और धंधे से जुड़े अन्य लोगों को लड़की की सप्लाई करता रहा है। वैसे अब तो वाकई देश भी जानना चाहता है कि सभी क्रिकेटरों का असली चेहरा क्या है? दो चार लोग ही यहां निकम्मे हैं, या फिर ये गंदगी पूरी टीम में फैली हुई है।

इस खेल में अगर नेताओं और पुलिस की चर्चा न की जाए तो बात पूरी ही नहीं होगी। राजनीतिक दल के नेता आम जनता से जुड़े मुद्दे पर तो एक दूसरे पर कुत्तों की तरह भोंकते दिखाई देते हैं। उनके विरोध के तरीकों से तो लगता ही नहीं कि ये कभी आपस में मिलजुल  कर शांति से बैठते भी होंगे। लेकिन ये देखकर हैरान हो जाता हूं कि क्रिकेट के मुद्दे पर सब एक दूसरे का तलवा चाटने को तैयार रहते हैं। अब देखिए ना फिक्सिंग पर कानून बनाने की बात कहकर कैसे राजीव शुक्ला और अरुण जेटली एक दूसरे के कंधे पर हाथ डाले घूम रहे हैं। दरअसल क्रिकेट में तमाम नेताओं का इंट्रेस्ट जुड़ा हुआ है। मसलन कृषिमंत्री शरद पवार, रेलमंत्री सीपी जोशी, फारुख अब्दुल्ला, अरुण जेटली, राजीव शुक्ला, अनुराग सिंह समेत तमाम राजनेता क्रिकेट में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ये सब कभी क्रिकेट खेलते रहे हैं, इनमें क्रिकेटर तो कोई नहीं है। हां सब चक्कर बस "मोटे माल" का है।

आखिर में चर्चा पुलिस की। दरअसल आईपीएल अब इंडियन पुलिस लीग में बदल गया है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी भी इलाके में पुलिस की जानकारी के बगैर सट्टेबाजी हो ही नहीं सकती। पुलिस इन सबमें बराबर की भागीदार होती है। बल्कि जिस इलाके में सट्टेबाजी होती है, उस इलाके का थाना बहुत मंहगा होता है। यहां थानेदार की तैनाती के पैसे भी कुछ उसी हिसाब के होते हैं। मुझे तो पक्का यकीन है कि दिल्ली में बलात्कार की घटना के बाद जिस तरह से लोगों का गुस्सा पुलिस के खिलाफ था और लोग पुलिस कमिश्नर को हटाने की मांग कर रहे थे, बस जनता का ध्यान बांटने के लिए दिल्ली पुलिस ने ये तुरुप का चाल चला। सच कहूं तो दिल्ली पुलिस इस मामले में ज्यादा हाथ डालने वाली नहीं थी, उसने मुंबई से श्रीसंत को गिरफ्तार कर मीडिया का रुख मोड़ दिया था। उसका  मकसद पूरा हो गया था। आपको हैरानी होगी कि श्रीसंत को गिरफ्तार करने के बाद जब दिल्ली के पुलिस कमिश्नर मीडिया से मुखातिब थे, तो उन्होंने शातिराना अंदाज में ये बात कही भी कि आज आप लोग मेरा इस्तीफा नहीं मांग रहे हैं। मैं दिल्ली पुलिस से सवाल पूछना चाहता हूं कि अब वो किसे बचाने की कोशिश कर रही है कि अदालत को भी सही जानकारी नही दे रहे है, जिसकी वजह अदालत में उसे फटकार खानी पड़ी। ये जवाब तो दिल्ली पुलिस ही देगी।

बात मुंबई पुलिस की भी कर ली जाए। जब दिल्ली पुलिस ने श्रीसंत के साथ दो और खिलाड़ियों को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया और मुंबई पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगने दी, इस बात से मुंबई पुलिस ने आंखे तरेरनी शुरू कर दी। उसे लगा कि दिल्ली ने उसके साथ विश्वासघात किया है। बात इतनी बिगड़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का सहयोग करना ही बंद कर दिया। श्रीसंत मुंबई में जिस होटल में रुका था, वहां छापेमारी मुंबई पुलिस ने की और वहां से बरामद लैपटाप, फोन और अन्य सामान दिल्ली पुलिस के हवाले करने से ही इनकार कर दिया। अब मुंबई ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है, जिससे लोग मुंबई पुलिस पर उंगली ना उठा सकें। लोग ये ना कहें कि दूसरे राज्य की पुलिस मुंबई में अपराधियों को गिरफ्तार कर ले रही है और मुंबई पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। अब कोई बेवकूफ ही होगा जो ये कहेगा कि मुंबई पुलिस का सट्टेबाजों से कोई लेना देना नहीं है। वैसे जब मामला एक है, आईपीएल में मैच फिक्सिंग, स्पाँट फिक्सिंग, सट्टेबाजी तो इसकी जांच अलग-अलग पुलिस को क्यों करना चाहिए ? सभी  मामले सीबीआई को सौंप दिए जाएं, वो जांच कर लेगी। लेकिन इसके लिए दिल्ली और मुंबई दोनों ही पुलिस तैयार नहीं होगी। मामला क्रिकेट में सट्टेबाजी का नहीं मामला "मोटेमाल" का भी तो है।