Wednesday, 14 November 2012

आसान नहीं है "आम आदमी" बनना !


सोच रहा था कि दीपावली का दिन है, किसी का दिल नहीं दुखाऊंगा, लेकिन बात जब देश की हो तो संवेदना पर सच्चाई बहुत भारी पड़ जाती है। हकीकत ये है कि जब कोई खास आदमी आम बनने के लिए मुहिम चलाता है तो उससे साजिश की बू आती ही है। जहां तक मेरी जानकारी है आम आदमी वो है जो सुबह दो रोटी अपने गमछे में बांध कर मजदूरी के लिए घर से निकलता है और अगर उसे दिन भर में कोई काम नहीं मिलता है तो उसके घर शाम का चूल्हा नहीं जलता। लेकिन अरविंद केजरीवाल वो आम आदमी हैं जिन्होंने अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, फिर भी घर में दोनों वक्त की रोटी इत्मीनान से बन रही है। अगर देश का आम आदमी कुछ किए बगैर अरविंद जैसे मौज में रह सकता है , तो हमें किसी खुशहाली की जरूरत नहीं है, बस डेढ़ रुपये की टोपी से काम चल जाएगा। दरअसल केजरीवाल को पता है कि उन्हें कोई आम आदमी तो मानने से रहा, इसीलिए उन्हें आम आदमी लिखी टोपी पहननी पड़ती हैं। सच्चाई ये है कि अरविंद केजरीवाल टोपी पहनते नहीं है बल्कि देश की जनता को पहनाते हैं। आज कल उनके निशाने पर उद्योगपति हैं, हों भी क्यों ना, बिना उद्योगपतियों की मदद के कोई राजनीतिक पार्टी चलती है क्या ? लेकिन इसका जो तरीका केजरीवाल ने अपनाया है, मुझे तो नहीं लगता कि उससे उनका काम बनने वाला है, उल्टे जहां से आर्थिक मदद हो रही है, कहीं वो भी बंद ना हो जाए ? आप सबको पता ही है कि समाज सेवा से हटकर राजनीति करने पर इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने केजरीवाल की संस्था पब्लिक कॉज रिसर्च फाऊंडेशन को दी जा रही आर्थिक मदद को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है।

केजरीवाल साहब दुनिया भर से जवाब और हिसाब मांगते हैं। वैसे हिसाब तो आज नहीं कल आपको भी देना ही होगा कि आखिर ये पैसे कहां से आ रहे हैं जिससे पूरी टीम हवा में उड़ रही है। लेकिन इसके पहले मैं कुछ सवाल पूछना चाहता हूं। तीन दिन पहले कुछ उद्योगपतियों के विदेशी बैंक खाते को लेकर केजरीवाल ने मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, नरेश गोयल समेत कुछ और लोगों के नाम लिए और कहा कि इनके विदेशी खातों में करोड़ो रुपये जमा हैं। इस बात पर ध्यान देना जरूरी है,  केजरीवाल ने ऐलान किया कि ये सभी जानकारी उन्हें किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस के ही एक बड़े नेता ने दी है। अब मेरा सवाल है केजरीवाल साहब ऐसा नहीं लग रहा है कि कांग्रेस के किसी नेता ने आपको इस्तेमाल किया है ? आपने ये जानने की कोशिश की कि जो नेता आपको ये जानकारी मुहैया करा रहा है आखिर उसमें उसका क्या स्वार्थ है ? उस नेता से आपने ये जानने की कोशिश की कि उसने इस मामले में कभी पार्टी फोरम पर बात की या नहीं ? अच्छा जो बात ये नेता कह रहा है वो सही ही है इसकी क्या गारंटी है ? दरअसल चाहे कांग्रेस हो या फिर बीजेपी सभी जगह कुछ लोग नाराज होते ही है, क्योंकि सभी की इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसी तरह नौकरशाही में भी तमाम अफसर मलाईदार पोस्टिंग चाहतें हैं, जिनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती है वो सरकार के बजाए केजरीवाल को रिपोर्ट करते हैं। खैर मैं ये कहूं कि पार्टी, सरकार से नाराज नेताओं और नौकरशाहों की अगुवाई केजरीवाल कर रहे हैं तो गलत नहीं होगा।

महत्वपूर्ण सवाल ये है कि केजरीवाल ने ये तो बताया कि अंबानी समेत तमाम लोगों के विदेशों में खाते हैं और उसमें सौ करोड़ या सवा सौ करोड़ जमा है। लेकिन मैं केजरीवाल से जानना चाहता हूं कि इसमें गलत क्या है ? मतलब क्या मुकेश अंबानी ने गलत जानकारी देकर विदेश में खाता खुलवा लिया है ? या उसमें  जो 100 करोड़ रुपये जमा हैं वो गलत है ? केजरीवाल अंबानी से क्या जानना चाहते हैं। ये कि अंबानी के पास सौ करोड़ रुपये कहां से आया ? इसी तरह दूसरे जो भी नाम उन्होंने लिए हैं, ये तो बताया कि उनके विदेशी खाते में करोड़ो रुपये जमा है, लेकिन ये नहीं बता रहे हैं कि इसमें एकाउंट खुलवाना गलत है या फिर जो पैसा उसमें जमा है वो गलत है। आधी अधूरी जानकारी का ही नतीजा है कि मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी की कंपनी की ओर से एक बयान जारी कर केजरीवाल के आरोपों को खारिज कर दिया गया और साफ किया गया है कि अंबानी या फिर उनकी केपनी का दुनिया के किसी भी देश में गैरकानूनी बैंक खाता नहीं है। दोनों की ओर से ये भी कहा गया है कि एचएसबीसी बैंक की जनेवा शाखा में तो कोई एकाउंट भी नहीं है। अंबानी बंधुओं की ओर से आरोपों को खारिज कर दिए जाने के बाद केजरीवाल ने चुप्पी साध ली है। केजरीवाल साहब आपको पता है ना कि आप जो बोलते हैं तो मीडिया उसका सीधा प्रसारण करता है, ऐसे ही दो चार बार हल्के बयान और दे दिए तो सभी आपको गंभीरता से लेना ही बंद कर देंगे।

एक मजेदार बात और बताता हूं, केजरीवाल ने सरकार पर आरोप लगाया कि फ्रांस की सरकार ने भारत सरकार को कुल 700 नामों की सूची दी थी, लेकिन भारत सरकार ने महज सौ सवा सौ लोगों के यहां ही छापे मारे। बाकी रसूखदार लोगों को महज नोटिस भेज कर खानापूरी कर दी। केजरीवाल साहब पहले तो मैं आपको एक बात बता दूं कि जिनके भी विदेशों में खाते हैं वो सभी रसूखदार ही हैं, वहां कोई टोपी लगाकर आम आदमी नहीं पहुंच सकता। दूसरी बात ये कि भारत सरकार ने तो फिर भी 700 लोगों में सवा सौ लोगों के यहां छापेमारी की, लेकिन आपने तो सिर्फ आठ दस लोगों के ही नाम लिए। जब कांग्रेसी नेता ने आपको सूची मुहैया करा दी तो आप किस दबाव में हैं कि सारे नामों का खुलासा नहीं कर रहे है। अच्छा अगर आपके पास पूरी सूची नहीं है तो आप किस आधार पर सात सौ लोगों की बातें कर रहे हैं। अच्छा आठ दस नामों का जिक्र करने के बाद आप वित्त मंत्री से सवाल पूछ रहे हैं कि जो नाम आपने लिए हैं, वो फ्रांस की सूची में  हैं या नहीं ? ये बात तो हास्यास्पद है ना कि पहले तो आप किसी का नाम उछाल दो, फिर सरकार से पूछो कि ये नाम उसमें शामिल है या नहीं।

 वैसे मुकेश अंबानी व्यस्त रहते हैं, उनका दुनिया भर में कारोबार फैला है। अगर अंबानी की जगह मैं होता तो आपको इसी बात के लिए कोर्ट में लाता कि मेरे नाम पर सिर्फ सौ करोड़ रुपये की बात कर रहे हैं जबकि हमारी एक कंपनी की डायरेक्टर अनु टंडन के खाते में सवा सौ करोड़ बता रहे हैं। अंबानी के लिए सौ करोड़ रुपये आखिर क्या मायने रखता है। सच कहूं तो मैं इसी बात के लिए मानहानि का मुकदमा दायर करता। केजरीवाल साहब क्या आप बता सकते हैं कि आपने कुछ गिने चुने लोगों का ही नाम क्यों लिया ? आप तो ईमानदारी की बड़ी बड़ी बातें करते हैं, फिर आप या तो सभी का नाम लेते या फिर किसी का ना लेते।  केजरीवाल ने जेट एयरवेज के नरेश गोयल का भी नाम लिया कि उनके खाते में 80 करोड़ रुपये जमा हैं। वहां से सफाई आई है कि स्विस बैंक की किसी भी शाखा में उनका कोई एकाउंट नहीं है, विदेशी बैंक में जो एकाउंट हैं, उनके बारे में आयकर विभाग को जानकारी दी गई है। केजरीवाल जी आप तो आयकर महकमें के अधिकारी रहे हैं, आपको ये बात तो पता ही होगी कि अगर किसी उद्योगपति का देश विदेश में कारोबार फैला है तो वहां भी बैंक में खाते खुलवा सकता है। जब तक ये साबित ना हो कि बैंक खाता गलत जानकारी के आधार पर खुलवाया गया है या इसमें जमा राशि ब्लैक मनी है, तब तक किसी का नाम लेना मेरी समझ से तो पूरी तरह गलत है। अच्छा भाई केजरीवाल को अंबानी परिवार से ऐसी खुंदस कि उन्होंने अंबानी की मां श्रीमती कोकिला धीरूभाई अंबानी का नाम भी लिया, कहा कि उनका भी खाता है, लेकिन इस खाते में कोई रकम नहीं है। अरे भाई वो स्व. धीरूभाई अंबानी की पत्नी है, सबको पता है कि उनका कारोबार दुनिया भर में फैला है, ऐसे में एकाउंट होना कौन सा अपराध है। इसी तरह यशोवर्धन विड़ला के बैंक एकाउंट का जिक्र कर कहा गया है कि उसमें कोई पैसा नहीं है।


इसीलिए मन में सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल साबित क्या करना चाह रहे थे ? जिन लोगों के देश विदेश में कारोबार हैं, उनका दुनिया के किसी भी देश मे एकाउंट होना कैसे गलत हो सकता है ? जब तक ये साबित ना हो कि इन खातों में भारी रकम है और ये रकम आयकर विभाग की जानकारी में नहीं है। जब तक केजरीवाल के पास इस आशय का पुख्ता सबूत ना हो, तब वो भला किसी उद्योगपति का नाम कैसे उछाल सकते हैं ? लेकिन नहीं केजरीवाल पर देश का कोई कानून लागू ही नहीं होता। ये संसद का अपमान कर सकते हैं, ये न्यायालय को धता बता सकते हैं। ये देश के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानते, ये किसी   पर भी कीचड़ उछाल सकते हैं, लेकिन अपने साथियों की गंदगी इन्हें दिखाई नहीं देती, उन्हें डेढ़ रुपये की टोपी पहना कर ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे देते हैं। अब केजरीवाल पर तो ईमानदारी का ठप्पा लगा है,  इसलिए वो कुछ भी कर सकते हैं, उन पर कोई सवाल खड़ा नहीं कर सकता। सोशल साइट पर उनके  पेड कार्यकर्ता मौजूद हैं, जिनका काम है, केजरीवाल के क्रियाकलापों की चर्चा करने वालों को दिग्गी के खानदान का बताकर गंभीर विषय से लोगों का ध्यान हटाना।

वैसे सच्चाई तो कुछ और ही है। दरअसल जब तक अरविंद सामाजिक आंदोलन चला रहे थे, इन्हें तमाम उद्योगपति करोड़ों का चंदा दे रहे थे। लेकिन जब इन्होंने समाज सेवा के बजाए राजनीति करना शुरू कर दिया तो उद्योगपतियों ने चंदा देने से इनकार कर दिया। इस क्रम में इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने भी साफ कर दिया कि उन्होंने केजरीवाल को राजनैतिक गतिविधियों के लिए कोई चंदा नहीं दिया। दो महीने पहले अरविंद की ओर से आर्थिक मदद के लिए आवेदन किया गया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। हम सब  जानते हैं कि राजनीतिक पार्टी चलाना आसान नहीं है। मुझे लगता है कि इसीलिए केजरीवाल एक साजिश के तहत उद्योगपतियों को निशाना बना रहे हैं, जिससे वो उनकी पार्टी को भी मोटा माल दे। अरविंद के एनजीओ को विदेशी मदद मिलती है, लेकिन वो इस पैसे का इस्तेमाल राजनीति में नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें देश से बड़ी आर्थिक मदद जरूरी है।

अब देखिए टीम अन्ना की अहम सदस्य किरण बेदी ने साफ कर दिया कि अरविंद केजरीवाल इंडिया अंगेस्ट करप्सन (आईएसी) के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकते। ये संगठन अन्ना के पास है। केजरीवाल कह रहे हैं कि जब उनका राजनीतिक दल अस्तित्व में आ जाएगा, तब इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। सबको पता है कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन के खाते में मोटा मालहै, जब तक इसका वारा न्यारा ना हो जाए, भला इसे कैसे छोड़ सकते हैं। अन्ना साफ कर चुके हैं कि उनके नाम का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, लेकिन जनाब केजरीवाल कहते हैं कि अन्ना उनके गुरु हैं, वो उनके दिल में बसते हैं, भला कैसे उन्हें भूल सकते हैं। दरअसल सच्चाई ये है कि केजरीवाल राजनीति में भी अन्ना के नाम का सौदा करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अन्ना एक ऐसा चेहरा है, जो देश में ईमानदारी का प्रतीक बन चुका है, ऐसे में इस चेहरे के बिना उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसलिए वो अन्ना के लाख मना करने के बाद भी उनके नाम का मोह नहीं त्याग पा  रहे हैं।
बहरहाल अरविंद केजरीवाल दुनिया में अकेले शख्स होगें, जिन्हें ये बताना पड़ता है कि वो आम आदमी हैं। इसके लिए उन्हें अंग्रेजी पैट शर्ट पर गांधी की टोपी लगानी पड़ती है। अब देखिए इसके बाद भी लोग उन्हें आम आदमी नहीं मानते। लिहाजा बेचारे को आम आदमी साबित करने के लिए टोपी पर लिखवाना पड़ गया कि वो आम आदमी है। वैसे केजरीवाल साहब फटी कमीज हवाई चप्पल पहन कर अगर आम आदमी बना जा सकता तो, राहुल गांधी को दलितों के घर का भोजन और उनकी टूटी चारपाई पर रात ना बितानी पड़ती। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आप देश के प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं, पर आम आदमी कभी नहीं बन सकते, इसके लिए आप चाहे कितना ही ड्रामा क्यों ना कर लें।   








Wednesday, 7 November 2012

लादेन ने बनाया ओबामा को राष्ट्रपति !

मैं अमेरिका की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता हूं, खासतौर पर उसकी विदेश और आर्थिक नीतियों का तो मैं सख्त विरोधी हूं। इसके बाद भी मैं अमेरिकियों की देश के प्रति समर्पण और उनकी राष्ट्रभावना का कायल हूं। भारत में मतों की गणना होती है तो राजनीतिक दलों के कुछ चंपू ही मतगणना के स्थान पर मौजूद होते हैं, ऐसा लगता है कि यहां आम आदमी को पूरी चुनावी प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं है। भारत में पूर्वाह्नन 11.30 के करीब जब टीवी पर खबर आई की ओबामा ने जीत के लिए जरूरी इलेक्टोरल वोट 270 का आंकड़ा प्राप्त कर लिया है, उसी समय हम सब ने देखा कि अमेरिका के किसी एक शहर में नहीं बल्कि पूरा अमेरिका सड़कों पर आ गया। आपको पता होना चाहिए कि जब यहां दिन के 12 बज रहे थे तो वहां रात का लगभग 2 बजा था। ये जानकार तो और भी हैरानी होगी कि शिकागो में इतनी ज्यादा ठंड है कि वहां तापमान माइनस में चल रहा है। इसके बाद भी अमेरिकियों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

मेरे कुछ मित्र अमेरिका में हैं, उनसे चुनाव को लेकर कुछ बातें हो रही थी। मैने जानना चाहा कि आखिर ऐसा क्या रहा बराक ओबामा में कि उन्हें दोबारा जीत मिली। जीत भी ऐसी जिसकी उम्मीद बहुत कम बताई जा रही थी। मैने इस बात का खासतौर पर जिक्र किया कि पिछले दो तीन सालों में मंदी की वजह से अमेरिका में नौकरी कम हुई है। ओबामा प्रशासन के प्रति वहां युवाओं में गुस्सा भी है। इन सबके बाद भी जीत और वो भी ऐतिहासिक जीत मिली। मित्र ने कहा कि भारत और अमेरिका में यही बुनियादी अंतर है। यहां लोगों के लिए देश पहले है वो खुद बाद में हैं। बराक ओबामा की सबसे बड़ी कामयाबी यही रही है कि उन्होंने पाकिस्तान में छिपे आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को उसी के ठिकाने पर जाकर मार गिराया। ओसामा को मार गिराने के बाद अमेरिका में ओबामा का कद और उनकी उपलब्धियों का ग्राफ बिल्कुल ऊपर पहुंच गया। जिस दिन ओसामा को अमेरिकी फौज ने मारा, उस दिन सिर्फ अमेरिकी प्रशासन ने नहीं बल्कि पूरा देश जश्न में डूबा था। सच तो ये है ओबामा की दूसरी जीत पर उसी दिन अमेरिकियों ने मुहर लगा दी।

मित्र की बात सुनकर मैं कुछ देऱ खामोश रह गया। अमेरिका और अपने नेताओं को एक तराजू पर तौलने लगा। सच बताऊं शर्म आने लगी अपने नेताओं का चरित्र देख कर। बताइये अमेरिका ने देश पर हमला करने वाले ओसामा बिन लादेन को दूसरे देश में जाकर मार गिराया और हम... । संसद पर हमले के मास्टर मांइंड अफजल गुरू को फांसी की सजा सुना दिए जाने के भी कई साल बीत जाने के बाद उसे सूली पर नहीं लटका पाए। वजह कुछ और नहीं, बस एक तपके का वोट हासिल करने के लिए। क्या हमारे नेता देश की सत्ता को देश से बड़ा मानते है ? अब इन्हें कौन समझाए कि सत्ता तभी आपके हाथ में होगी जब देश होगा, जब देश ही टूट जाएगा तो सत्ता कहां रहेगी। मित्र ने बताया ओसामा को मारने के लिए कई सौ करोड़ रुपये अमेरिका ने खर्च किए। मैं देख रहा हूं कि मुंबई पर हमले के आरोपी अजमल कसाब की सुरक्षा पर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार कई करोड़ रुपये अब तक खर्च कर चुकी है।

देश के नेताओं के इसी घिनौने चरित्र की वजह से उनमें देश की जनता से डर बना रहता है। आप कल्पना कीजिए अमेरिका में कई लाख लोगों के बीच नव निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा बिना किसी सुरक्षा के तड़के 3.30 बजे उनके बीच में आ गए। वो भी पूरे परिवार के साथ। यहां तो दिन में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इस तरह सार्वजनिक सभा को संबोधित नहीं कर सकते। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ऐसा कौन सा बड़ा काम कर दिया है, जिससे कहा जाए कि देश की जनता उनसे नाराज होगी, जो उन पर हमला कर सकती है। ओबामा को तो फिर भी सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि उन्होंने खुंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मिरा गिराया है। ऐसे में तमाम आतंकी संगठन ओबामा से नाराज हो सकते है। फिर भी ओबामा पूरे कान्फीडेंस के साथ जनता के बीच रात के अंधेरे में मौजूद रहे। खैर अपने तो प्रधानमंत्री को लालकिले से भी भाषण देना होता है तो वो बुलेट प्रूफ केबिन में खड़े होते हैं और आम जनता तो उनसे कोसों दूर बैठती है। बेचारे प्रधानमंत्री बुलेट प्रूफ कार, बुलेट प्रूफ जैकेट और बुलेट प्रूफ केबिन इसी में कैद रह जाते हैं।

अमेरिका और हमारे बीच कामकाज के तरीकों को लेकर भी अंतर है। आतंकवाद का शिकार अमेरिका हुआ तो उसने ये देखना शुरू किया कि इसकी जड़ कहा हैं। जड़ को खत्म करना है, बिना जड़ को खत्म किए आतंकवाद को खत्म नहीं किया जा सकता। उसने देखा कि आतंक की जड़ पाकिस्तान में है, तो उसने वहां चढ़कर ओसामा बिन लादेन का खात्मा किया। हम क्या करते हैं ? जड़ में तो पानी डालते हैं, और अपनों को खुद सुरक्षित रहने की सलाह देते हैं। अगर हम भी अफजल गुरु और कसाब को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका देते तो दुनिया भर के आतंकियों में संदेश जाता कि भारत जाओगे तो मारे भी जा सकते हो। पता नहीं, पर हो सकता है कि किसी मंत्री के परिवार का कोई आतंकी संगठन अपहरण कर लें और उसके  एवज में कसाब को चार्टर प्लेन से पाकिस्तान छोड़ने को देश मजबूर हो जाए। आने वाले समय में ऐसा कुछ हो तो कम से कम मुझे तो कोई हैरानी नहीं होगी।

अच्छा अमेरिका में सरकार और विपक्ष हमारे जैसा नहीं है। बराक ओबामा ने जीत के बाद सबसे पहले अपने प्रतिद्वंद्धी मिंट रोमनी को फोन किया और उनसे देश के विकास में सहयोग देने की अपील की। हमारे यहां नेता सरकार में आते ही सबसे पहले विपक्षी नेताओं के फोन टेप कराने के आदेश देते हैं। उन्हें लगता है कि देश के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष ही है। पूरे कार्यकाल इसी में बीत जाता है कि वो विपक्ष से किसी मोर्चे पर हारे तो नहीं। संसद जहां देश के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनानी चाहिए, वो शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बन जाता है। सरकार कोशिश करती है कि संसद चले, विपक्ष संसद ठप करने में लगा रहता है। संसद पूरे सत्र ठप रहती है, सरकार में होते हुए भी एक दिन संसद न चल पाने पर सरकार शर्मिंदा नहीं होती, वो  इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार बताकर सब कुछ भूल जाती  है।

बहरहाल बराक ओबामा दूसरी बार राष्ट्रपति जरूर बन गए हैं, लेकिन सब कुछ तो उनके लिए भी अच्छा नहीं है। क्योंकि जहां तक वोट पर्सेंटेज का सवाल है तो दोनों उम्मीदवारों को बरारबर 49 फीसदी के करीब वोट मिले हैं। यानी मिट रोमनी ज्यादा पीछे नहीं हैं, बल्कि ओबामा को पिछली बार के मुकाबले करीब चार फीसदी वोट का नुकसान हुआ है। पिछले बार उन्हें 52.9 फीसदी वोट मिले थे। लेकिन मिट रोमनी ने हार स्वीकार कर ली है, उन्होंने बराक ओबामा को बधाई दी और कहा, 'अमेरिका ने किसी और को अपना नेता चुना है। मैं राष्ट्रपति और अमेरिका के लिए प्रार्थना करूंगा। मै जितनी प्रशंसा ओबामा की कर रहा हूं, उससे कहीं ज्यादा रोमानी की भी करता हूं कि उन्होने भी देश की तरक्की की कामना की।

प्रधानमंत्री जी मैं आपसे एक आग्रह कर रहा हूं। रहने दीजिए आप, देश के लिए कुछ मत कीजिए। आपका जितना समय बचा है, उसमें सिर्फ इतना काम कर लीजिए, जिससे देश की जनता के बीच आप अकेले बिना डर भय के आ जा सकें। आप कहीं भी बिना सुरक्षा के सार्वजनिक सभा कर सकें। इसके लिए कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं है, देशवासियों का दिल जीतने की बात है। समस्याएं तो अमेरिका में भी हैं, आतंकी हमला तो अमेरिका पर भी हुआ, लेकिन दोबारा नहीं हुआ। वहां लोगों को अपनी सरकार पर भरोसा है, ये भरोसा आप भी दे सकते हैं क्या ? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आप ये भरोसा देश को नहीं दे सकते, जब आप लाल किले से इतनी सुरक्षा में देश को संबोधित करते हैं, उस समय भी आपको बुलेट प्रूफ केबिन की जरूरत पड़ती है। इससे तो अच्छा है कि आप घर मे बैठ कर टीवी पर राष्ट्र के नाम संदेश दे दें। कम से कम सुरक्षाकर्मियों को शर्मिंदा तो नहीं होना पडेगा।

 

Tuesday, 6 November 2012

संघ का हीरो बोले तो दाउद के गड़करी

लेख पढ़ने से पहले आइये थोड़ा हंस लेते हैं। पहले हंस लेना इसलिए जरूरी है कि बाद में चाल चरित्र और चेहरे का दावा  करने वाली पार्टी की करतूतें आपको रुलाएंगी। गंभीर आरोप लगने के बाद बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गड़करी के पक्ष में देश के जाने माने सीए, वित्तीय सलाहकार एस एन गुरुमूर्ति ने बीजेपी नेताओं के सामने एक प्रजेंटेशन दिया, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने सारे कागजात देख लिए हैं और गड़करी बिल्कुल निर्दोष हैं। गुरुमूर्ति की क्लीन चिट् के बाद पार्टी नेताओं ने गड़करी को बेदाग घोषित कर उनके पीछे कदमताल करने का निर्णय ले लिया। ऐसा करें भी क्यों ना क्योंकि हरियाणा सरकार ने भी तो राबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट दे दिया है। आप जानते ही है इंडिया अगेंस्ट करप्सन ने भी अपने दो सदस्यों प्रशांत भूषण और अंजलि के खिलाफ लगे आरोपों की जांच अपने लोकपाल को सौंप दिया है। वाह भाई वाह ! ये बढिया है, अपना अभियुक्त, अपने जांच अधिकारी,  अपनी रिपोर्ट, अपना जज। फिर क्या बाकी है, अब अपनी पुलिस और जेल भी बना लीजिए। हाहाहाहहाहा 


कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने वाली बीजेपी को अब अपना घर बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है, क्योंकि इस बार आरोप किसी और पर नहीं बल्कि पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी पर लगा है। भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में फंसे गड़करी की सफाई से पहले ही कोई संतुष्ट नहीं था, अब गड़करी नए विवादों में घिर गए हैं। उनका मानना है कि स्वामी विवेकानंद और माफिया डान दाउद इब्राहिम में ज्यादा फर्क नहीं है, क्योंकि दोनों का आईक्यू (बौद्धिक स्तर) समान है। बस फर्क ये है कि स्वामी ने अपने आईक्यू का इस्तेमाल सकारात्मक कार्यों में किया, जबकि दाऊद ने अपराध की दुनिया में दिमाग लगाया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की इस बात से देश भर में गुस्सा है। वैसे ऐसा नहीं है कि बदजुबान गड़करी पहली बार अपनी बातों से फंसे है, बल्कि वो अकसर सार्वजनिक मंच से हल्की और निम्नस्तरीय बात करके पार्टी की किरकिरी कराते रहे हैं। बहरहाल मुश्किल में फंसे गड़करी कुर्सी बचाने के लिए पार्टी नेताओं के यहां चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सच ये है कि उन्हें कहीं से भी सकारात्मक जवाब नहीं मिल रहा। वैसे तो संघ ये दिखाने की कोशिश कर रहा है कि इस मसले से उसका कोई सरोकार नहीं है, लेकिन संघ को लग रहा है कि अगर नितिन हटाया गया तो निश्चित ही संघ की भी किरकिरी होगी।

मेरा पहले दिन से ही ये मानना रहा है कि नितिन गड़करी का आईक्यू (बौद्धिक स्तर) अभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के काबिल नही हैं। अगर मुझे तय करना हो तो मैं उन्हें जितना सुन और समझ पाया हूं, उसके आधार पर तो मै गडकरी को किसी सूबे का भी अध्यक्ष ना बनने दूं। बहरहाल संघ से करीबी संबंधों के कारण उन्हें पद मिल गया, लेकिन नितिन इस पद के काबिल अपना कद नहीं बढ़ा पाए। सार्वजनिक मंचों से शुरू से ही ऐसी बातें करते रहे जो राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के अध्यक्ष के गरिमा के अनुरूप नहीं था। पिछले दिनों कांग्रेस के एक महासचिव को उन्होंने "चिल्लर नेता" कहा। इसे लेकर भी नितिन गड़करी की काफी छिछालेदर हुई थी। गडकरी कभी अपने वक्तव्य और व्यवहार से ये साबित ही नहीं कर पाए उनमें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की काबिलयत है। कोई भी अध्यक्ष हो, उसे इस बात का तो ज्ञान होना ही चाहिए कि संघ एक बार उन्हें जोर लगाकर अध्यक्ष बना तो सकता है, पर अध्यक्ष का काम तो उसे ही करना होगा। नितिन गड़करी अपने पहले कार्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए, जिससे लगे कि संघ ने उन्हें अध्यक्ष बनाकर कुछ भी गलत नहीं किया। हां नितिन ने एक काम जरूर बखूबी किया है, वो ये कि कुछ भी परफार्म किए बगैर अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल अपने नाम करने का रास्ता साफ कर लिया। बहरहाल अब तो हालत ये है कि वो अपना पहला कार्यकाल ही पूरा कर पाएं यही बहुत है, दूसरा कार्यकाल मिलना तो मुश्किल ही है।

वैसे भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद गडकरी भले कहें कि वो किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हैं, लेकिन मेरा तो यही मानना है कि नैतिकता की दुहाई देने वाले गडकरी को अब पार्टी का अध्यक्ष पद तुरंत छोड़ देना चाहिए। वैसे भी अब पार्टी के भीतर भी उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी है। अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना है तो उसे गड़करी को ना सिर्फ अध्यक्ष पद बल्कि जांच होने तक पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाना ही होगा। अध्यक्ष पद जाता देख गड़करी काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं। मंगलवार को पूरे दिन वो नेताओं के घर चक्कर काटते दिखाई दिए। राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष होने के बाद भी बेचारे अपने पक्ष मे समर्थन जुटाते फिर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली से उनके घर जाकर मुलाकात की। अंदरखाने क्या बात हुई ये तो पार्टी के नेता जाने, लेकिन मुंह लटकाए जिस तरह गडकरी नेताओं के घर जाते हैं और वैसे ही वापस लौटते हैं, इससे तो लगता है कि सबकुछ सामान्य नहीं है। इस बीच सियासी गलियारे में खबर उड़ी कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी हिमांचल के वरिष्ठ बीजेपी नेता शांता कुमार का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाना चाहते हैं। बीजेपी खेमें में पूरे दिन जिस तरह का घटनाक्रम दिखाई दे रहा था, उससे तो लगा कि अब किसी भी वक्त गड़करी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ सकते हैं। लेकिन दोपहर तीन बजे के बाद उनके लिए कुछ राहत भरी खबर आई। चर्चा तो ये है कि संघ ने पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं से बात कर हालात को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई। इसी दौरान पार्टी नेता सुषमा स्वराज ने ट्विट किया कि वो गड़करी के साथ हैं।   

दरअसल ये मुश्किल गड़करी ने खुद खड़ी की है। सब को पता है कि गड़करी किसानों की जमीन हथियाने के आरोपों से पहले ही घिरे थे, इसी बीच एक और विवाद उनके नाम जुड़ गया। ये आरोप भी हल्का फुल्का नहीं है। अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया कि उनकी कंपनी को घाटे से उबारने के लिए आईआरबी कंपनी ने 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। आपको हैरानी होगी कि ये वही कंपनी है जिसे महाराष्ट्र में तमाम कार्यों का ठेका दिया गया, और ये ठेके उस समय दिए गए, जब गडकरी वहां के लोकनिर्माण मंत्री थे। आरोप तो ये भी है कि लोन में दिए गए पैसे का स्रोत भी साफ नहीं है। इस खुलासे के बाद बीजेपी नेताओं की बोलती बंद है। आरोप है कि 16 अन्य कंपनियों के एक समूह का गडकरी की कंपनी में शेयर हैं। लेकिन इन 16 कंपनियों के जो डायरेक्टर हैं, उनके नाम का खुलासा होने से गड़करी का असली चेहरा जनता के सामने आ गया है। आपको हैरानी होगी कि उनका ड्राइवर जिसका नाम मनोहर पानसे, गडकरी का एकाउंटेंट पांडुरंग झेडे, उनके बेटे का दोस्त श्रीपाद कोतवाली वाले और निशांत विजय अग्निहोत्री ये सभी इन विवादित कंपनियों के डायरेक्टर हैं। ताजा जानकारी के अनुसार गड़करी के नियंत्रण वाली पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड 64 करोड़ रुपये के घाटे में चल रही थी । 30 मार्च 2010 को आइडियल रोड बिल्डर्स यानी आईआरबी ग्रुप की फर्म ग्लोबल सेफ्टी विजन ने उसे 164 करोड़ रुपये लोन दिया। आईआरबी ग्रुप को 1995 से 1999 के बीच महाराष्ट्र में तमाम सरकारी ठेके दिए गए। उस दौरान गडकरी ही लोक निर्माण मंत्री थे। आईआरबी ने पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के तमाम शेयर भी खरीदे। मसला वही सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का लगता है।

गड़करी पर भ्रष्टाचार का ये गंभीर मामला है। इस मामले में अभी तक कोई संतोषजनक जवाब वो नहीं दे सके हैं। इस बीच उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों से देश का ध्यान भटकाने के लिए स्वामी विवेकानंद की तुलना माफिया डान दाउद इब्राहिम से की तो पूरे देश में उनके खिलाफ और माहौल बन गया। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य महेश जेठमलानी ने तो उनके इस्तीफे की मांग को लेकर कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता रामकृष्ण जेठमलानी खुल कर विरोध करते हुए सामने आए, उन्होंने भी गड़करी का इस्तीफा मांगा। इसी बीच पार्टी नेता जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा की मुलाकात को लेकर सियासी गलियारे में चर्चा होने लगी कि पार्टी में गड़करी का विरोध बढ़ता जा रहा है। ऐसे में गड़करी का जाना तय है। इस बीच पत्रकारों को मैसेज मिला कि शाम 7 बजे पार्टी की कोरग्रुप की बैठक होगी। इस बैठक में गडकरी के मामले में चर्चा की जाएगी। बहरहाल कोर ग्रुप तो महज दिखावा है, अंदर की बात ये है कि संघ ने पार्टी नेताओं पर अपना डंडा घुमा दिया है और साफ कर दिया है कि मीडिया में बेवजह की बयानबाजी बंद हो। पार्टी नेता एक साथ मीडिया के सामने आएं और गड़करी के समर्थन का ऐलान करें। बहरहाल संघ के दबाव में गडकरी की कुर्सी भले बच जाए, लेकिन अब बीजेपी कम से कम सिर उठाकर अपने चाल चरित्र और चेहरे की दुहाई तो नहीं ही दे पाएगी। मैं तो यही कहूंगा चोर चोर मौसेरे भाई।

Saturday, 3 November 2012

हिमांचल प्रदेश : बंदर हैं धूमल के दुश्मन नंबर 1


हिमांचल प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की कुर्सी बंदरों की वजह से जा सकती है। सप्ताह भर हिमांचल प्रदेश के कई शहरों की खाक छानने के बाद मुझे लगता है कि इस बार यहां हो रहे विधान सभा चुनाव में बीजेपी की सरकार को सबसे बड़ी चुनौती लगभग पांच लाख बंदरों से मिल रही है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये बंदर किसी चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकते हैं ? चलिए मैं बताता हूं कि इन बंदरों से हिमांचल प्रदेश को कितना नुकसान हो रहा है। बताया गया कि राज्य में हर साल बंदर खेती और बागवानी को पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन इस गंभीर समस्या का कोई हल धूमल  सरकार नहीं कर पाई। बंदरों के निर्यात पर केंद्र सरकार ने 1978 में प्रतिबंध लगा दिया था, इससे हिमाचल प्रदेश में बंदरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

मैंने अपने भ्रमण के दौरान देखा कि आज पहाड़ अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। हरे भरे पहाड़ों पर सीमेंट कंक्रीट का जाल बिछता जा रहा है। हालत ये है कि पहाड़ों पर फलदार पौधे न के बराबर रह गए हैं और जंगल का दायरा भी सिमटता जा रहा है। यही वजह है कि बंदरों के साथ-साथ फसल उजाड़ने वाले अन्य जानवर अब आबादी वाले इलाकों की तरफ घुसपैठ कर रहे हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिमांचल में कुल 3,243 पंचायतों में से 2,301 पंचायतों के किसान बंदरों की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। प्रदेश में खेती बचाओ संघर्ष समिति ने जब सभी पंचायतों से आंकड़ा जुटाया तो पता चला कि बंदर और जंगली जानवर हर साल फसलों व बागों में फलों को बर्बाद कर किसानों को पांच सौ करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हिमांचल में बंदरों की संख्या में भी तेजी से बढोत्तरी हो रही है। बताते हैं कि 2004 में बंदरों की संख्या लगभग साढ़े तीन लाख थी, जो अब पांच लाख से ऊपर हो गई है। बंदरों को जंगल में रोकने के लिए जरूरी है कि पहाड़ों पर अच्छी मात्रा में फलदार पेड़ लगाए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। अब पहाड़ों पर चीड़ के पेड़ ही ज्यादा दिखाई देते हैं। इससे बंदर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। देश के कई राज्यों में किसान भूमि अधिग्रहण की समस्या से परेशान हैं तो कहीं बाढ़-सूखे के कारण नष्ट हो रही खेती से। कई जगह तो किसान कर्ज के कारण आत्महत्या तक कर रहे हैं, तो कुछ उपज का वाजिब दाम न मिलने से दुखी हैं। लेकिन हिमांचल में किसानों के लिए बंदर गंभीर संकट बन गए हैं। शिमला, सिरमौर और सोलन जिले के कई गांवों में किसान खेती छोड़ शहर जाकर मजदूरी करने को मजबूर हैं। बंदरों की वजह से कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें कुछ लोगों की मौत भी हो चुकी है।

अच्छा ये समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि पंचायत चुनावों में बंदर और जंगली जानवरों का आतंक भी चुनावी मुद्दा बना हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान किसानों ने भाजपा और कांग्रेस से इस मसले का समाधान निकालने का आश्वासन मांगा। इस पर दोनों दलों ने इस समस्या को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया। वैसे मुख्यमंत्री धूमल ने तो बंदरों को सीमित संख्या में मारने की इजाजत भी दी, लेकिन पशु प्रेमी संगठनों के विरोध के बाद अब मामला न्यायालय में लंबित है। फिलहाल बंदरों व जंगली जानवरों को जान से मारने पर रोक लगी हुई है। आइये एक आंकड़े पर नजर डालते हैं। यहां बताया गया कि बंदरों से पांच सौ करोड़ रुपये का नुकसान तो केवल फसलों का ही है। अगर इनसे होने वाले सभी तरह के नुकसान जोड़े जाएं तो यह आंकड़ा दो हजार करोड़ रुपये तक जा पहुंच जाता है। पांच लाख प्रभावित किसान परिवार यदि साल में दो सौ दिन अन्य कार्य छोड़कर केवल फसलों की ही रखवाली में जुटे रहते हैं, तो मनरेगा की एक दिन की दिहाड़ी 130 रुपये के हिसाब से यह आंकड़ा 1300 करोड़ रुपये के करीब होता है।

आप सब जानते हैं कि हिमांचल में विधानसभा चुनावों के मतदान के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है। आज चुनाव प्रचार भी खत्म हो गया। दिल्ली में बैठकर नेता मंहगाई, भ्रष्टाचार की चर्चा कर रहे हैं। सच बताऊं तो हिमांचल के चुनाव में ये मुद्दे बेमानी हैं। अगर आपको याद हो तो एक बार दिल्ली में विधान सभा चुनाव में दिल्लीवासियों ने महज प्याज के मंहगा होने से सरकार पलट दी थी। कुछ इसी तरह की समस्या हिमांचल में धूमल सरकार के लिए बंदर बन गए हैं। यही वजह है कि अब राजनीतिक दलों की जुबान से केंद्रीय मुद्दे हटने लगे हैं, चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में एक बार फिर बंदरों का मुद्दा गरमा गया है। बीजेपी के सांसद अनुराग ठाकुर तो धर्मशाला और आसपास खुलेआम कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने शिमला से बंदरों को लाकर धर्मशाला और आसपास के इलाके में छोड़ दिया। वैसे धूमल सरकार ने सत्ता में आने के बाद बंदरों की आबादी को बढने से रोकने के लिए बड़ी संख्या में बदरों की नसबंदी कराई। दरअसल बंदरों के मामले में सख्त कार्रवाई करने से सरकार भी पीछे हट जाती है, क्योंकि ये मामला न्यायालय में लंबित है।

सच बताऊं तो जब मैं पिछले हफ्ते हिमांचल के लिए  निकल रहा था तो मुझे लगा था कि हिमांचल में कांग्रेस वापसी नहीं कर पाएगी। वजह उसके तमाम केंद्रीय मंत्री भ्रष्टाचार में शामिल पाए गए हैं। मंहगाई बेलगाम हो चुकी है। गैस सिलेंडर भी चुनावी मुद्दा बनेगा। इतना ही नहीं हिमांचल में कांग्रेस की चुनावी बागडोर थामे वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। ऐसे में कांग्रेस तो मुकाबले से बाहर ही होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। कांग्रेस यहां बीजेपी को ना सिर्फ कड़ी टक्कर दे रही है, बल्कि ये कहूं कि धूमल को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है तो गलत नहीं होगा। आपको बता दूं हिमांचल में ना कोई सलमान खुर्शीद की चर्चा कर रहा है, ना राबर्ड वाड्रा की और ना ही नितिन गड़करी की। यहां चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बंदर है और यहां के लोगों का मानना है कि बंदरों को काबू करने में धूमल सरकार फेल रही है। ऐसे में अगर 20 दिसंबर को हिमांचल में कांग्रेस दीपावली मनाती नजर आए तो कम से कम मुझे तो हैरानी नहीं होगी। 

मित्रों, हिमांचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के सिलसिले में पूरे सप्ताह भर वहां था। चुनावी  भागदौड़ की वजह से मैं आप सबके ब्लाग पर भी नहीं आ सका। आज ही वापस आया तो सबसे पहले मैने आपको वहां के चुनावी माहौल पर कुछ जानकारी देने की कोशिश की। इस दौरान हिमांचल के धर्मशाला शहर में ब्लागर भाई केवल राम जी से छोटी पर सुखद मुलाकात हुई। खैर अब कोशिश होगी कि गुजरात रवाना होने से पहले आप सबके ब्लाग पर जरूर पहुंच सकूं।




दोस्तों, 
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