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Saturday, 3 November 2012

हिमांचल प्रदेश : बंदर हैं धूमल के दुश्मन नंबर 1


हिमांचल प्रदेश में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की कुर्सी बंदरों की वजह से जा सकती है। सप्ताह भर हिमांचल प्रदेश के कई शहरों की खाक छानने के बाद मुझे लगता है कि इस बार यहां हो रहे विधान सभा चुनाव में बीजेपी की सरकार को सबसे बड़ी चुनौती लगभग पांच लाख बंदरों से मिल रही है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये बंदर किसी चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकते हैं ? चलिए मैं बताता हूं कि इन बंदरों से हिमांचल प्रदेश को कितना नुकसान हो रहा है। बताया गया कि राज्य में हर साल बंदर खेती और बागवानी को पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेकिन इस गंभीर समस्या का कोई हल धूमल  सरकार नहीं कर पाई। बंदरों के निर्यात पर केंद्र सरकार ने 1978 में प्रतिबंध लगा दिया था, इससे हिमाचल प्रदेश में बंदरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

मैंने अपने भ्रमण के दौरान देखा कि आज पहाड़ अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। हरे भरे पहाड़ों पर सीमेंट कंक्रीट का जाल बिछता जा रहा है। हालत ये है कि पहाड़ों पर फलदार पौधे न के बराबर रह गए हैं और जंगल का दायरा भी सिमटता जा रहा है। यही वजह है कि बंदरों के साथ-साथ फसल उजाड़ने वाले अन्य जानवर अब आबादी वाले इलाकों की तरफ घुसपैठ कर रहे हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिमांचल में कुल 3,243 पंचायतों में से 2,301 पंचायतों के किसान बंदरों की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। प्रदेश में खेती बचाओ संघर्ष समिति ने जब सभी पंचायतों से आंकड़ा जुटाया तो पता चला कि बंदर और जंगली जानवर हर साल फसलों व बागों में फलों को बर्बाद कर किसानों को पांच सौ करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा रहे हैं।

हिमांचल में बंदरों की संख्या में भी तेजी से बढोत्तरी हो रही है। बताते हैं कि 2004 में बंदरों की संख्या लगभग साढ़े तीन लाख थी, जो अब पांच लाख से ऊपर हो गई है। बंदरों को जंगल में रोकने के लिए जरूरी है कि पहाड़ों पर अच्छी मात्रा में फलदार पेड़ लगाए जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। अब पहाड़ों पर चीड़ के पेड़ ही ज्यादा दिखाई देते हैं। इससे बंदर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। देश के कई राज्यों में किसान भूमि अधिग्रहण की समस्या से परेशान हैं तो कहीं बाढ़-सूखे के कारण नष्ट हो रही खेती से। कई जगह तो किसान कर्ज के कारण आत्महत्या तक कर रहे हैं, तो कुछ उपज का वाजिब दाम न मिलने से दुखी हैं। लेकिन हिमांचल में किसानों के लिए बंदर गंभीर संकट बन गए हैं। शिमला, सिरमौर और सोलन जिले के कई गांवों में किसान खेती छोड़ शहर जाकर मजदूरी करने को मजबूर हैं। बंदरों की वजह से कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें कुछ लोगों की मौत भी हो चुकी है।

अच्छा ये समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि पंचायत चुनावों में बंदर और जंगली जानवरों का आतंक भी चुनावी मुद्दा बना हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान किसानों ने भाजपा और कांग्रेस से इस मसले का समाधान निकालने का आश्वासन मांगा। इस पर दोनों दलों ने इस समस्या को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया। वैसे मुख्यमंत्री धूमल ने तो बंदरों को सीमित संख्या में मारने की इजाजत भी दी, लेकिन पशु प्रेमी संगठनों के विरोध के बाद अब मामला न्यायालय में लंबित है। फिलहाल बंदरों व जंगली जानवरों को जान से मारने पर रोक लगी हुई है। आइये एक आंकड़े पर नजर डालते हैं। यहां बताया गया कि बंदरों से पांच सौ करोड़ रुपये का नुकसान तो केवल फसलों का ही है। अगर इनसे होने वाले सभी तरह के नुकसान जोड़े जाएं तो यह आंकड़ा दो हजार करोड़ रुपये तक जा पहुंच जाता है। पांच लाख प्रभावित किसान परिवार यदि साल में दो सौ दिन अन्य कार्य छोड़कर केवल फसलों की ही रखवाली में जुटे रहते हैं, तो मनरेगा की एक दिन की दिहाड़ी 130 रुपये के हिसाब से यह आंकड़ा 1300 करोड़ रुपये के करीब होता है।

आप सब जानते हैं कि हिमांचल में विधानसभा चुनावों के मतदान के लिए उल्टी गिनती शुरू हो गई है। आज चुनाव प्रचार भी खत्म हो गया। दिल्ली में बैठकर नेता मंहगाई, भ्रष्टाचार की चर्चा कर रहे हैं। सच बताऊं तो हिमांचल के चुनाव में ये मुद्दे बेमानी हैं। अगर आपको याद हो तो एक बार दिल्ली में विधान सभा चुनाव में दिल्लीवासियों ने महज प्याज के मंहगा होने से सरकार पलट दी थी। कुछ इसी तरह की समस्या हिमांचल में धूमल सरकार के लिए बंदर बन गए हैं। यही वजह है कि अब राजनीतिक दलों की जुबान से केंद्रीय मुद्दे हटने लगे हैं, चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में एक बार फिर बंदरों का मुद्दा गरमा गया है। बीजेपी के सांसद अनुराग ठाकुर तो धर्मशाला और आसपास खुलेआम कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने शिमला से बंदरों को लाकर धर्मशाला और आसपास के इलाके में छोड़ दिया। वैसे धूमल सरकार ने सत्ता में आने के बाद बंदरों की आबादी को बढने से रोकने के लिए बड़ी संख्या में बदरों की नसबंदी कराई। दरअसल बंदरों के मामले में सख्त कार्रवाई करने से सरकार भी पीछे हट जाती है, क्योंकि ये मामला न्यायालय में लंबित है।

सच बताऊं तो जब मैं पिछले हफ्ते हिमांचल के लिए  निकल रहा था तो मुझे लगा था कि हिमांचल में कांग्रेस वापसी नहीं कर पाएगी। वजह उसके तमाम केंद्रीय मंत्री भ्रष्टाचार में शामिल पाए गए हैं। मंहगाई बेलगाम हो चुकी है। गैस सिलेंडर भी चुनावी मुद्दा बनेगा। इतना ही नहीं हिमांचल में कांग्रेस की चुनावी बागडोर थामे वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। ऐसे में कांग्रेस तो मुकाबले से बाहर ही होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। कांग्रेस यहां बीजेपी को ना सिर्फ कड़ी टक्कर दे रही है, बल्कि ये कहूं कि धूमल को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है तो गलत नहीं होगा। आपको बता दूं हिमांचल में ना कोई सलमान खुर्शीद की चर्चा कर रहा है, ना राबर्ड वाड्रा की और ना ही नितिन गड़करी की। यहां चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बंदर है और यहां के लोगों का मानना है कि बंदरों को काबू करने में धूमल सरकार फेल रही है। ऐसे में अगर 20 दिसंबर को हिमांचल में कांग्रेस दीपावली मनाती नजर आए तो कम से कम मुझे तो हैरानी नहीं होगी। 

मित्रों, हिमांचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के सिलसिले में पूरे सप्ताह भर वहां था। चुनावी  भागदौड़ की वजह से मैं आप सबके ब्लाग पर भी नहीं आ सका। आज ही वापस आया तो सबसे पहले मैने आपको वहां के चुनावी माहौल पर कुछ जानकारी देने की कोशिश की। इस दौरान हिमांचल के धर्मशाला शहर में ब्लागर भाई केवल राम जी से छोटी पर सुखद मुलाकात हुई। खैर अब कोशिश होगी कि गुजरात रवाना होने से पहले आप सबके ब्लाग पर जरूर पहुंच सकूं।




दोस्तों, 
टीवी की दुनिया यानि छोटे पर्दे की बात आप सब तक पहुंचाने के लिए भी मैं प्रयासरत हूं। यहां आपको खबरिया चैनलों के बारे में तो जानकारी मिलेगी ही, साथ ही साथ कोशिश है कि मनोरंजक चैनलों पर भी कुछ बात की जाए। इसके लिए ही है मेरा नया ब्लाग यानि  TV स्टेशन ।  मुझे आपका इंतजार है यहां । http://tvstationlive.blogspot.in/




Tuesday, 6 March 2012

ये है जंगल का राजा बंदर ....

त्तर प्रदेश के नतीजे सामने आ गए हैं। नतीजों को लेकर कोई हैरानी नहीं है, क्योंकि ये तो पहले ही माना जा रहा था कि समाजवादी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में सामने आएगी और आई भी। हां ये सच है कि मैं भी ये अंदाज नहीं लगा पाया कि समाजवादी पार्टी इतनी बड़ी संख्या में सीटें जीत रही है। इस चुनाव में तरह तरह के नेता अपना किरदार निभा रहे थे। एक ऐसा राष्ट्रीय पार्टी के नेता का ऐसा भी किरदार था कि उसे बात बात पर गुस्सा आ जाता था।

मैं हैरान था कि यूपी की हालत खराब है, यहां जनता परेशान है,युवओं के हाथ में रोजगार नहीं है, किसानों को उनकी पैदावार का उचित दाम नहीं मिल रहा है, मंहगाई के चलते लोगों के घर में दोनों टाइम चूल्हे नहीं जल रहे हैं और चुनाव के दौरान लोगों के इस घाव पर मरहम लगाने के बजाए इस नेता को बात बात पर गुस्सा आ जाता है। मैं यूपी में 40 दिन तक लगातार घूमता रहा, लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि गुस्सा करके आखिर इस समस्या का समाधान कैसे निकल सकता है।

बार बार जब एक ही बात सुनता रहा तो मैने एक बुजुर्गवार से पूछा दादा क्या किसी समस्या का समाधान गुस्से से भी हो सकता है। उन्होंने कहा बिल्कुल नहीं। फिर मैने उन्हें इस नेता के बारे में उन्हें बताया कि इसे तो बात बात पर गुस्सा आता है। यहां की समस्याओं को देखकर ये कहता है कि मुझे तो भारतीय होने पर शर्म आती है। पहले तो बुजुर्गवार ने कहा कि बच्चा है, कोई बात नहीं, सुधर जाएगा। बाद में उन्होने एक कहानी सुनाई।

कहने लगे कि जंगल के राजा शेर से जानवर परेशान हो गए। बाद में सभी जानवरों ने फैसला किया कि इस बार चुनाव में जंगल के राजा को हराना है और हम अपना नेता किसी और को चुन लेते हैं। सभी जानवरों ने हां में सिर हिलाया और कहाकि ये ठीक है। हम सब एक हैं और अब अपना नया राजा चुन लेगें। लेकिन मुश्किल ये कि शेर के सामने चुनाव लड़ने की किसी की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। बहरहाल काफी विचार के बाद एक बंदर खड़ा  हुआ और बोला कि अगर आप सब साथ देने को तैयार हैं तो हम शेर के खिलाफ चुनाव लडे़गें। सभी ने हां में सिर हिलाया और बंदर चुनाव को तैयार हो गया। इतना ही नहीं वो चुनाव जीत भी गया।

बंदर राजा बन गया, खूब जश्न मना जंगल में। लेकिन एक दिन गजब हो गया। शेर ने एक बकरी के बच्चे को अपने पंजे में जकड़ लिया, घबराई बकरी तुरंत जंगल के राजा बंदर के पास पहुंची और कहा कि देखो शेर ने मेरे बच्चे को जकड़ रखा है और वो उसे खा जाएगा। बंदर तेजी से गुर्राया, ऐसा कैसे हो सकता है, मेरे राज में ये सब बिल्कुल नहीं चलेगा। बकरी बोली तुम चलो साथ और उसे छुड़ाओ। बंदर बोला हां हां क्यों नहीं। बंदर कूदता फांदता बकरी के साथ निकल पड़ा। बकरी ने उसे वो दिखाया कि उस पेड़ के नीचे देखो वहां शेर मेरे बच्चे को जकड़े बैठा है। बंदर दौड़कर गया और पेड पर चढ़ गया, कभी वो इस पेड पर कूदता, कभी दूसरे पेड़ पर, कभी यहां भागता, कभी वहां भागता। काफी देर तक वो ऐसे ही दौड़ भाग करता रहा, लेकिन बकरी का बच्चा यूं ही शेर के पंजे में जकड़ा रहा। बकरी नाराज हो गई, बोली अरे मेरे बच्चे को छुडाओगे भी या बस ऐसे ही कूदते फांदते रहोगे।

बंदर बोला देखो जी आपने मुझे राजा बनाया है, मैं तो आपके काम के लिए भागदौड़ करने से पीछे नहीं रहूंगा, अगर मेरी कोशिश में कोई कभी हो तो बताओ, अगर वो नहीं छोड़ रहा है तो मैं क्या कर सकता हूं, आखिर वो शेर है और मै हूं तो बंदर ही ना। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकता अब तुम्हारा बच्चा छूटे या ना छूटे। कुछ ऐसा ही किरदार निभाया यूपी के चुनाव में एक नेता ने। उसे भी बहुत गुस्सा आता रहा, लेकिन समस्या का समाधान नहीं था उसके पास। खैर नया नया मामला है सीखते सीखते सीखेगा ना।