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Friday, 15 February 2013

बदबू आ रही है मनमोहन सरकार से ...


बात शुरू कहां से करूं ये ही समझ नहीं पा रहा हूं। जब बात होती है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की और लोग उन्हें ईमानदार बताते हैं तो सच कहूं, मुझे तो गुस्सा आता है। सरकार कैसी है ये चर्चा तो बाद में करुंगा पर ये बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि आखिर मनमोहन सिंह देश के बारे में कब सोचेंगे ? कब तक कुर्सी से चिपके रह कर देश को गर्त में जाते अंधों की तरह देखते रहेंगे। अब देश ने देख लिया कि वो बीमार ही नहीं अपंग प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं। उनकी कोई सुनता नहीं, उन्हें ही सबकी सुनना उनकी मजबूरी है। मेरा मानना है कि कम से कम वो सोनिया और राहुल से तो ज्यादा दिमाग रखते ही हैं, लेकिन बेचारे करें क्या ! 10 जनपथ के रहमोंकरम पर कब तक 10 जनपथ की रखवाली करते रहेंगे? ये बात मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं आज भी कहूंगा कि आज जो हालात हैं, उससे तो यही लगता है कि केंद्र सरकार चोरों की जमात है और प्रधानमंत्री चोरों की जमात के सरदार हैं। प्रधानमंत्री जी कभी सोने के पहले एक बार सोचिएगा जरूर कि देश आपकी अगुवाई में किस हद तक गर्त में जा चुका है, फिर अगर दो पैसे का ईमान बचा हो तो देश से माफी मांगिए और प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़कर घर जाइए।

मनमोहन सिंह की जो तस्वीर सामने आ रही है, उससे ये भी साफ हो जाता है कि वो नौकरशाह कैसे रहे होंगे ? वैसे तो उनके बारे में कई बातें आम जनता के बीच में है कि वो अच्छी पोस्टिंग के लिए कैसे नेताओं के पैरों में गिरे रहते थे। तमाम ऊंचे पदों पर पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत दरबार बाजी की है, चाहे वो समय स्व. प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का रहा हो या फिर प्रणव मुखर्जी के वित्तमंत्री रहने के दौरान ऊंची कुर्सी के लिए मनमोहन सिंह की बेचैनी रही हो। नौकरशाह रहे मनमोहन सिंह को हमेशा अच्छी कुर्सी का लालच बना रहा है, कुर्सी उनकी एक ऐसी कमजोरी है जिसके लिए वो देश की मान मर्यादा को भी ताख पर रख सकते हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि आखिर अब मनमोहन सिंह का मकसद क्या है ? सरकार चला नहीं पा रहे हैं, उनकी अगुवाई में देश कमजोर हो रहा है, आधे से अधिक मंत्री भ्रष्ट साबित हो चुके हैं, प्रधानमंत्री होते हुए आपकी पार्टी में भी दो पैसे की पूछ नहीं है। नौ साल से प्रधानमंत्री हैं, फिर भी ऐसा कुछ नहीं कर पाए जिससे देश के किसी भी हिस्से से चुनाव जीत सकें। आप ही नहीं पूरा देश जानता है कि आप अपनी काबिलियत पर प्रधानमंत्री बिल्कुल नहीं है, आप प्रधानमंत्री है सोनिया गांधी के रहमोकरम पर, राहुल के कृपा पर और सीबीआई की वजह से। वरना आप एक दिन प्रधानमंत्री नहीं रह सकते।

वैसे कांग्रेसी आपको ईमानदार बताते हैं, निकम्मे हैं जो ऐसा कहते हैं। कोल ब्लाक आवंटन में प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका पर उंगली उठी। गलत ढंग से कोल ब्लाक का आवंटन हुआ और देश को हजारों करोड का नुकसान हुआ। टूजी के मामले में भले ए राजा ने जेल काटा हो, लेकिन मेरा मानना है कि अगर ए राजा को साल भर जेल में रहना पड़ा है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दो साल के लिए जेल भेजा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री से एक सवाल है, क्या ये सही नहीं है कि यूपीए दो में आप ए राजा और टीआर बालू को मंत्री नहीं बनाना चाहते थे। लेकिन बालू को मंत्रिमंडल में ना लेने के लिए करुणानिधि राजी हो गए, पर राजा के मामले में आप की एक नहीं चली और आपने ये जानते हुए कि राजा बेईमान है,  इसके बाद भी उसे मंत्री बनाया और लूटने के लिए टेलीकम्यूनिकेशन विभाग का मंत्रालय भी आपको मजबूरी में देना पड़ा। मतलब साफ है कि आपने देश का सौदा किया। मनमोहन जी कभी आपको लगता है कि ऐसे ही आप चोरों के सरदार कब तक बने रहेंगे?

वैसे सब भूल गए होंगे, इसलिए एक बार याद दिलाना जरूरी है। आपके राज में सीमा पर मारे गए लोगों के परिवार के लिए प्रस्तावित आदर्श सोसायटी में कैसे बंदरबाट हुई। कामनवेल्थ गेम में तो आपकी सरकार, दिल्ली की सरकार और कांग्रेसी नेता सुरेश कलमाणी सबका असली चेहरा सामने आ गया। प्रधानमंत्री जी थोरियम घोटाला तो अभी जनता की नजर में ठीक से आया ही नहीं है, वरना पता चल जाए कि आपकी सरकार पर कितनी और कैसी पकड़ है। मन में एक सवाल है वो आपसे पूछना चाहता हूं। मैं देखता हूं कि कई बार अगर मेरी वजह से आफिस का कोई काम लेट हा जाए या फिर उसमें कोई गडबड़ी हो जाए तो सच कहूं खाना पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता, कई दिन तक नींद उड़ी रहती है। आपको कभी ऐसा लगा कि आपकी अगुवाई में देश की जितनी दुर्दशा हो रही है,  दुनिया भर में देश की साख को बट्टा लग रहा है, कभी लगा कि अब बहुत हो गया, मुझसे देश नहीं संभल रहा है, चमचागिरी करके किसी सरकारी विभाग में एक कुर्सी का काम निपटाया जा सकता है, पर देश की जिम्मेदारी नहीं निभाई जा सकती। अंदर का इंशान कभी आपसे सवाल नहीं करता है प्रधानमंत्री जी ?

अब नया घोटाला ! देश की मीडिया और विपक्ष साल भर से चीख रहा है कि हेलीकाप्टर की खरीद में बड़ा घोटाला हुआ है। बीजेपी नेता ने तो इस घोटाले को संसद मे भी उठाया। सरकार की ओर से जवाब आया सब ठीक है। अब इटली की जिस कंपनी ने हेलीकाप्टर की सप्लाई की उसी का सीईओ जेल भेज दिया गया। उस पर आरोप ये है कि इस सौदे के लिए उसने भारत के अधिकारियों को घूस दिया। अब ये हमारे ही देश में हो सकता है कि जिसने घूस दिया वो बेचारा तो जेल पहुंच गया, लेकिन भारत में जिसने घूस लिया उसके बारे में अभी कोई अता पता ही नहीं है। शिकायतें हुई, आरोप लगे, अखबारों में खबरें छपीं, संसद में सवाल पूछा गया पर अपने मनमोहन सिंह मौन रहे। मुझे लगता है कि मनमोहन सिंह जांच करा लेते, लेकिन इसमे इटली का नाम देखकर उनके पसीने छूट गए। इसलिए खामोश रहे, अब क्या करें, अब तो बोलने लायक ही नहीं रहे।

थोड़ा इस मामले को समझ भी लीजिए । अगस्टा वेस्टलैंड कम्पनी से भारत सरकार ने 12 वीआईपी हेलीकाप्टर खरीदने की डील पर हस्ताक्षर किये थे। मामले की शुरुवात 2000 से हुई थी। कहा तो ये जा रहा है कि हेलीकाप्टर की कीमत इतनी अधिक थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे खरीदने से इनकार कर दिया। लेकिन भारत भला कैसे पीछे रहता। सच कहूं तो शक भी तभी हुआ कि जो हेलीकाप्टर मंहगे होने की वजह से अमेरिका खरीदने से इनकार कर सकता है, भला भारत उसे खरीदने की हिम्मत कैसे जुटा सकता है? एक बार तो ऐसा भी लगा कि निर्माता कंपनी इटली की है, इटली का नाम आते ही हमारे कांग्रेसी नेताओं के पसीने छूट जाते हैं, कहीं इसी वजह से तो आर्डर नहीं दिए गए ? लेकिन बाद मे पता चला कि ये सौदा तो एनडीए की सरकार में हुआ था, बस इस सरकार में तो दलाली ली गई है।

खैर बड़ी बड़ी बातें छोडिए। प्रधानमंत्री जी मैं एक काम के लिए तो आपका शुक्रिया जरूर अदा करना चाहूंगा कि आपने कम से कम गांधी परिवार से बदला तो ले लिया। उन्होंने अगर आपका शोषण किया तो आपने भी देश को ऐसी जगह पहुंचा दिया जहां से ना देश अपने पैर पर आसानी से खड़ा हो सकता है और ना ही कांग्रेस अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है। आपने देश और कांग्रेस दोनों को लंगड़ा यानि अपाहिज बना दिया। आपको गांधी परिवार ने अगर अपनी उंगली पर नचाया तो आपने भी ऐसा कर दिखाया कि अब कांग्रेस का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता, मसलन कांग्रेस की अब वो स्थिति नहीं रहेगी कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन सकें। चलिए कोई बात नहीं, कुछ तो देशहित में आपने काम किया ही है।

Saturday, 17 November 2012

राहुल गांधी बोले तो पोंsपोंs पोंपोंs..पोंsss


राजनीति में पूरी तरह फेल राहुल गांधी का कद जिस तरह कांग्रेस बढ़ा रही है, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस को काम पर नहीं चमत्कार पर यकीन है, उसे लगता है कि चुनाव  में अभी डेढ साल बाकी है, तब तक कहां लोगों को सरकार की चोरी-चकारी याद रहेगी। ये सोचते हैं कि देशवासी राहुल गांधी का चेहरा देखेंगे और कांग्रेस के हक में वोट करेंगे। अगर सरकार को काम पर थोड़ा भी यकीन होता तो पार्टी सबसे पहले केंद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के धब्बे को धोने का प्रयास करती। मुझे ये कहने में कत्तई संकोच नहीं है केंद्र की मौजूदा सरकार आजाद हिंदुस्तान की सबसे भ्रष्ट सरकार है। बात यहीं खत्म नहीं होती, मैं ये भी कह सकता हूं कि अब तक देश के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उनमें मनमोहन सिह सबसे घटिया, घिनौने, असफल और मजबूर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। सच तो ये है कि मनमोहन सिंह आज तक खुद ही स्वीकार ही नहीं कर पाए हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें तो लगता है कि सोनियां गांधी ने उनको प्रधानमंत्री का कुछ काम सौंपा है, जिसे वो निभा रहे हैं। यही वजह है कि मनमोहन सिंह देश के प्रति नही 10 जनपथ के प्रति ज्यादा वफादार है। अगर मुझे इस सरकार की समीक्षा करनी हो तो मैं सौ बार एक ही बात दुहराऊंगा कि ये हैं "अलीबाबा 40 चोर" ।

आज कुछ खरी-खरी बात करने का मन है। क्या कांग्रेस के नेता देश को इस बात का जवाब दे सकते हैं कि अगर प्रणव मुखर्जी देश के राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार रहे तो वो  प्रधानमंत्री के लिए सोनिया गांधी की पसंद क्यों नहीं बन पाए ? दरअसल सच्चाई ये है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. पीवी नरसिंहराव जब देश का नेतृत्व कर रहे थे तो 7 रेसकोर्स यानि प्रधानमंत्री निवास ही कांग्रेस नेताओं का मक्का, मदीना था। स्व राव ने कभी 10 जनपथ को उभरने का मौका ही नहीं दिया। इसकी मुख्य वजह उनमें नेतृत्व की क्षमता थी वो राजनीति के अच्छे खिलाड़ियों में शुमार थे। खुद चुनाव लड़ते थे और उनकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जाता  था। वो बखूबी जानते थे कि प्रधानमंत्री आवास की क्या गरिमा है और इस गरिमा को कैसे बरकरार रखा जा सकता है।  स्व. प्रधानमंत्री को पता था कि अगर देश में एक मजबूत सरकार चलानी है तो सत्ता का केंद्र प्रधानमंत्री आवास ही होना चाहिए। अगर देश का प्रधानमंत्री पूरे दिन 10 जनपथ पर ही मत्था टेकता रहा तो सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट ( उनके दोनों बच्चों ) का विश्वास तो जीता जा सकता है, पर देश का विश्वास हासिल करना मुश्किल होगा।

स्व. प्रधानमंत्री राव की सख्त तेवर से 10 जनपथ काफी समय तक एक चाहरदीवारी  मे कैद रहा। लेकिन बाद में बदले सियासी घटनाक्रम की वजह से पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथ में आई। अब गांधी परिवार सतर्क हो गया। मुझे लगता है कि राव की चाल देखकर ही सोनिया गांधी ने तय कर लिया कि अब आगे से किसी मजबूत नेता को प्रधानमंत्री बनाने की गल्ती नहीं  दुहराई जाएगी। यही वजह है कि पार्टी और सरकार दोनो के संकटमोचक रहे वरिष्ठ नेता प्रणव  मुखर्जी की योग्यता का उपहास उड़ाते हुए उन्हें कभी प्रधानमंत्री बनाने के बारे में नहीं सोचा गया। सोनिया गांधी को पता है कि मनमोहन सिंह कम से कम ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जो 7 रेसकोर्स में रहते हुए भी 10 जनपथ के प्रति ज्यादा वफादार होंगे। अगर मनमोहन सिंह को ये लगता है कि वो बहुत ज्यादा पढ़े लिखे हैं, अच्छे नौकरशाह रहे है इसलिए प्रधानमंत्री बने हैं तो ये उनकी गलतफहमी हैं। वैसे भी मेरा तो यही मानना है कि वो प्रधानमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के केयर टेकर हैं, यानि राहुल गांधी के तैयार होने तक वो ये कामकाज देख रहे हैं। केयर टेकर को कभी ये अधिकार नहीं होता कि वो खुद से कोई निर्णय करे।

बहरहाल मनमोहन सिंह की अगुवाई में भ्रष्ट मंत्रियों की खूब चांदी है। ज्यादातर मंत्रियों ने ठीक ठाक खजाना भर लिया है। कई मंत्रियों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के लिए अच्छा होता कि मनमोहन सिंह ने आठ साल खूब मजे कर लिए, अब उन्हीं के हाथ से आरोपी और दागी  मंत्रियों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखाती। इससे पार्टी अपनी खोई प्रतिष्ठा कुछ हद तक हासिल करने में कामयाब होती। लेकिन पार्टी ने इस काम को कभी तवज्जो ही नहीं दिया। उसे आज भी चमत्कार पर भरोसा है। पार्टी को लगता है कि राहुल गांधी को आगे  करके चुनाव लड़ा जाएगा तो देश की जनता भ्रष्टाचार को भूल जाएगी। जबकि मेरा मानना  है कि राहुल गांधी बोले तो सिर्फ पोंs पोंs, पोंपोंss पोंssss भर  हैं। इससे ज्यादा उनकी आज कोई राजनीतिक  पहचान नहीं है।

आप सब जानते हैं कि किसी को तरक्की देने का सामान्य नियम है उसका परफारमेंस। लेकिन राहुल गांधी के मामले में इस नियम को नजरअंदाज कर दिया गया। अगर राहुल गांधी की समीक्षा की जाए तो उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु के चुनाव भी कांग्रेस ने राहुल गांधी को आगे रख कर लड़ा था। लेकिन यहां का परिणाम क्या रहा ? सब जानते हैं। एक के बाद एक चुनाव में फेल हुए राहुल गांधी को अब 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन को बनी समिति की अगुवाई सौंपी गई है। अमूल बेबी राहुल गांधी क्या कर पाएंगे, ये तो आगे देखा जाएगा। लेकिन मैं अगर कहूं कि राहुल का ही नहीं बल्कि गांधी परिवार का जादू  खत्म हो चुका है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। अब देखिए ना यूपी के विधानसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी जहां से सोनिया और राहुल सांसद हैं, वहां भी पार्टी का प्रदर्शन  निराशाजनक रहा है। जो नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता का भरोसा खो चुका हो वो भला  देश की जनता का भरोसा कैसे जीत सकता है।

मुझे हैरानी होती है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री बताते हैं। इसकी  ठोस वजह भी है। आपको याद होगा कि सोनिया गांधी अस्वस्थ होने पर इलाज के लिए महीने भर से ज्यादा समय के लिए विदेश गई हुई थीं। उनकी अनुपस्थिति मे एक टीम बनाई गई,  जिसमें राहुल गांधी भी शामिल थे। इस टीम को जिम्मेदारी दी गई थी कि वो  महत्वपूर्ण विषयों पर फैसला लेगी। इसी दौरान अन्ना का आंदोलन चल रहा था और केंद्र सरकार घुटनों पर थी। सरकार के सामने अन्ना के अनशन को समाप्त कराने की गंभीर चुनौती थी। 12 दिन से ज्यादा हो गए थे अन्ना के अनशन को, डाक्टर सलाह दे रहे थे कि अनशन खत्म होना चाहिए, क्योंकि अन्ना कि तवियत बिगड़ रही है। देश की जनता भी गुस्से से उबल रही थी। हम कह सकते हैं कि देश के सामने गंभीर चुनौती थी, लेकिन अमूल बेबी राहुल गांधी पूरे घटनाक्रम से ही गायब रहे।

अक्सर देखा गया है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर गांधी परिवार पलायन कर जाता है। कोई भी खुल कर सामने नहीं आता है। हां अच्छा-अच्छा गप और कड़ुवा कड़ुवा थू करने में इस परिवार का कोई जवाब नहीं। बहरहाल मेरा मानना है कि राहुल को देश की जिम्मेदारी देने से पहले उन्हें  एक परिवार  की जिम्मेदारी दी जाए, देखा जाना चाहिए कि वो एक खुशहाल परिवार चला पाते हैं  या नहीं, उसके बाद तो काफी वक्त है, देश की भी जिम्मेदारी संभाल लें। क्योकि देशवासियों का अनुभव बहुत खराब रहा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ गेम, आदर्श सोसायटी, कोयला ब्लाक आवंटन जैसे तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों पर गांधी परिवार की चुप्पी आज तक किसी के भी समझ मे नहीं आई।

राहुल ने विदर्भ की कलावती का मामला उठाकर संसद और देश में खूब वाहवाही लूटी। बेचारी वही कलावती दिल्ली आई और राहुल से मिलना चाही तो उसे मिलने का वक्त नहीं मिला। राहुल ने दलितों के यहां भोजन किया और उनकी टूटी चारपाई पर रात भी गुजार दी। लेकिन कभी  किसी दलित को अपने घर भोजन कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। बहरहाल राहुल आपके प्रमोशन पर मैं भी आपको मुबारकबाद देता हूं, इस उम्मीद से कि अब आप दिखावटी और खबर बनने वाले कामों से दूर रह कर कुछ तो ऐसा करेंगे, जिससे देश के लोग राहत महसूस कर सकें। वैसे आपकी परीक्षा तो इसी हफ्ते हो जाएगी, संसद का सत्र शुरू होने वाला है, एफडीआई के मसले पर सरकार और विपक्ष आमने सामने है, अब ये मत कह  दीजिएगा कि ये एफडीआई क्या है ? संसद का पिछला सत्र विपक्ष के हंगामे की वजह से एक दिन भी नहीं चल पाया, देखते हैं आप क्या कुछ हस्तक्षेप करते हैं, जिससे ये सत्र सुचारू रूप से चल सके। अब ऐसा मत  कीजिएगा कि सत्र के दौरान छुट्टी लेकर कहीं घूमने निकल जाएं !

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Wednesday, 14 November 2012

आसान नहीं है "आम आदमी" बनना !


सोच रहा था कि दीपावली का दिन है, किसी का दिल नहीं दुखाऊंगा, लेकिन बात जब देश की हो तो संवेदना पर सच्चाई बहुत भारी पड़ जाती है। हकीकत ये है कि जब कोई खास आदमी आम बनने के लिए मुहिम चलाता है तो उससे साजिश की बू आती ही है। जहां तक मेरी जानकारी है आम आदमी वो है जो सुबह दो रोटी अपने गमछे में बांध कर मजदूरी के लिए घर से निकलता है और अगर उसे दिन भर में कोई काम नहीं मिलता है तो उसके घर शाम का चूल्हा नहीं जलता। लेकिन अरविंद केजरीवाल वो आम आदमी हैं जिन्होंने अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, फिर भी घर में दोनों वक्त की रोटी इत्मीनान से बन रही है। अगर देश का आम आदमी कुछ किए बगैर अरविंद जैसे मौज में रह सकता है , तो हमें किसी खुशहाली की जरूरत नहीं है, बस डेढ़ रुपये की टोपी से काम चल जाएगा। दरअसल केजरीवाल को पता है कि उन्हें कोई आम आदमी तो मानने से रहा, इसीलिए उन्हें आम आदमी लिखी टोपी पहननी पड़ती हैं। सच्चाई ये है कि अरविंद केजरीवाल टोपी पहनते नहीं है बल्कि देश की जनता को पहनाते हैं। आज कल उनके निशाने पर उद्योगपति हैं, हों भी क्यों ना, बिना उद्योगपतियों की मदद के कोई राजनीतिक पार्टी चलती है क्या ? लेकिन इसका जो तरीका केजरीवाल ने अपनाया है, मुझे तो नहीं लगता कि उससे उनका काम बनने वाला है, उल्टे जहां से आर्थिक मदद हो रही है, कहीं वो भी बंद ना हो जाए ? आप सबको पता ही है कि समाज सेवा से हटकर राजनीति करने पर इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने केजरीवाल की संस्था पब्लिक कॉज रिसर्च फाऊंडेशन को दी जा रही आर्थिक मदद को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है।

केजरीवाल साहब दुनिया भर से जवाब और हिसाब मांगते हैं। वैसे हिसाब तो आज नहीं कल आपको भी देना ही होगा कि आखिर ये पैसे कहां से आ रहे हैं जिससे पूरी टीम हवा में उड़ रही है। लेकिन इसके पहले मैं कुछ सवाल पूछना चाहता हूं। तीन दिन पहले कुछ उद्योगपतियों के विदेशी बैंक खाते को लेकर केजरीवाल ने मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, नरेश गोयल समेत कुछ और लोगों के नाम लिए और कहा कि इनके विदेशी खातों में करोड़ो रुपये जमा हैं। इस बात पर ध्यान देना जरूरी है,  केजरीवाल ने ऐलान किया कि ये सभी जानकारी उन्हें किसी और ने नहीं बल्कि कांग्रेस के ही एक बड़े नेता ने दी है। अब मेरा सवाल है केजरीवाल साहब ऐसा नहीं लग रहा है कि कांग्रेस के किसी नेता ने आपको इस्तेमाल किया है ? आपने ये जानने की कोशिश की कि जो नेता आपको ये जानकारी मुहैया करा रहा है आखिर उसमें उसका क्या स्वार्थ है ? उस नेता से आपने ये जानने की कोशिश की कि उसने इस मामले में कभी पार्टी फोरम पर बात की या नहीं ? अच्छा जो बात ये नेता कह रहा है वो सही ही है इसकी क्या गारंटी है ? दरअसल चाहे कांग्रेस हो या फिर बीजेपी सभी जगह कुछ लोग नाराज होते ही है, क्योंकि सभी की इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसी तरह नौकरशाही में भी तमाम अफसर मलाईदार पोस्टिंग चाहतें हैं, जिनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती है वो सरकार के बजाए केजरीवाल को रिपोर्ट करते हैं। खैर मैं ये कहूं कि पार्टी, सरकार से नाराज नेताओं और नौकरशाहों की अगुवाई केजरीवाल कर रहे हैं तो गलत नहीं होगा।

महत्वपूर्ण सवाल ये है कि केजरीवाल ने ये तो बताया कि अंबानी समेत तमाम लोगों के विदेशों में खाते हैं और उसमें सौ करोड़ या सवा सौ करोड़ जमा है। लेकिन मैं केजरीवाल से जानना चाहता हूं कि इसमें गलत क्या है ? मतलब क्या मुकेश अंबानी ने गलत जानकारी देकर विदेश में खाता खुलवा लिया है ? या उसमें  जो 100 करोड़ रुपये जमा हैं वो गलत है ? केजरीवाल अंबानी से क्या जानना चाहते हैं। ये कि अंबानी के पास सौ करोड़ रुपये कहां से आया ? इसी तरह दूसरे जो भी नाम उन्होंने लिए हैं, ये तो बताया कि उनके विदेशी खाते में करोड़ो रुपये जमा है, लेकिन ये नहीं बता रहे हैं कि इसमें एकाउंट खुलवाना गलत है या फिर जो पैसा उसमें जमा है वो गलत है। आधी अधूरी जानकारी का ही नतीजा है कि मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी की कंपनी की ओर से एक बयान जारी कर केजरीवाल के आरोपों को खारिज कर दिया गया और साफ किया गया है कि अंबानी या फिर उनकी केपनी का दुनिया के किसी भी देश में गैरकानूनी बैंक खाता नहीं है। दोनों की ओर से ये भी कहा गया है कि एचएसबीसी बैंक की जनेवा शाखा में तो कोई एकाउंट भी नहीं है। अंबानी बंधुओं की ओर से आरोपों को खारिज कर दिए जाने के बाद केजरीवाल ने चुप्पी साध ली है। केजरीवाल साहब आपको पता है ना कि आप जो बोलते हैं तो मीडिया उसका सीधा प्रसारण करता है, ऐसे ही दो चार बार हल्के बयान और दे दिए तो सभी आपको गंभीरता से लेना ही बंद कर देंगे।

एक मजेदार बात और बताता हूं, केजरीवाल ने सरकार पर आरोप लगाया कि फ्रांस की सरकार ने भारत सरकार को कुल 700 नामों की सूची दी थी, लेकिन भारत सरकार ने महज सौ सवा सौ लोगों के यहां ही छापे मारे। बाकी रसूखदार लोगों को महज नोटिस भेज कर खानापूरी कर दी। केजरीवाल साहब पहले तो मैं आपको एक बात बता दूं कि जिनके भी विदेशों में खाते हैं वो सभी रसूखदार ही हैं, वहां कोई टोपी लगाकर आम आदमी नहीं पहुंच सकता। दूसरी बात ये कि भारत सरकार ने तो फिर भी 700 लोगों में सवा सौ लोगों के यहां छापेमारी की, लेकिन आपने तो सिर्फ आठ दस लोगों के ही नाम लिए। जब कांग्रेसी नेता ने आपको सूची मुहैया करा दी तो आप किस दबाव में हैं कि सारे नामों का खुलासा नहीं कर रहे है। अच्छा अगर आपके पास पूरी सूची नहीं है तो आप किस आधार पर सात सौ लोगों की बातें कर रहे हैं। अच्छा आठ दस नामों का जिक्र करने के बाद आप वित्त मंत्री से सवाल पूछ रहे हैं कि जो नाम आपने लिए हैं, वो फ्रांस की सूची में  हैं या नहीं ? ये बात तो हास्यास्पद है ना कि पहले तो आप किसी का नाम उछाल दो, फिर सरकार से पूछो कि ये नाम उसमें शामिल है या नहीं।

 वैसे मुकेश अंबानी व्यस्त रहते हैं, उनका दुनिया भर में कारोबार फैला है। अगर अंबानी की जगह मैं होता तो आपको इसी बात के लिए कोर्ट में लाता कि मेरे नाम पर सिर्फ सौ करोड़ रुपये की बात कर रहे हैं जबकि हमारी एक कंपनी की डायरेक्टर अनु टंडन के खाते में सवा सौ करोड़ बता रहे हैं। अंबानी के लिए सौ करोड़ रुपये आखिर क्या मायने रखता है। सच कहूं तो मैं इसी बात के लिए मानहानि का मुकदमा दायर करता। केजरीवाल साहब क्या आप बता सकते हैं कि आपने कुछ गिने चुने लोगों का ही नाम क्यों लिया ? आप तो ईमानदारी की बड़ी बड़ी बातें करते हैं, फिर आप या तो सभी का नाम लेते या फिर किसी का ना लेते।  केजरीवाल ने जेट एयरवेज के नरेश गोयल का भी नाम लिया कि उनके खाते में 80 करोड़ रुपये जमा हैं। वहां से सफाई आई है कि स्विस बैंक की किसी भी शाखा में उनका कोई एकाउंट नहीं है, विदेशी बैंक में जो एकाउंट हैं, उनके बारे में आयकर विभाग को जानकारी दी गई है। केजरीवाल जी आप तो आयकर महकमें के अधिकारी रहे हैं, आपको ये बात तो पता ही होगी कि अगर किसी उद्योगपति का देश विदेश में कारोबार फैला है तो वहां भी बैंक में खाते खुलवा सकता है। जब तक ये साबित ना हो कि बैंक खाता गलत जानकारी के आधार पर खुलवाया गया है या इसमें जमा राशि ब्लैक मनी है, तब तक किसी का नाम लेना मेरी समझ से तो पूरी तरह गलत है। अच्छा भाई केजरीवाल को अंबानी परिवार से ऐसी खुंदस कि उन्होंने अंबानी की मां श्रीमती कोकिला धीरूभाई अंबानी का नाम भी लिया, कहा कि उनका भी खाता है, लेकिन इस खाते में कोई रकम नहीं है। अरे भाई वो स्व. धीरूभाई अंबानी की पत्नी है, सबको पता है कि उनका कारोबार दुनिया भर में फैला है, ऐसे में एकाउंट होना कौन सा अपराध है। इसी तरह यशोवर्धन विड़ला के बैंक एकाउंट का जिक्र कर कहा गया है कि उसमें कोई पैसा नहीं है।


इसीलिए मन में सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल साबित क्या करना चाह रहे थे ? जिन लोगों के देश विदेश में कारोबार हैं, उनका दुनिया के किसी भी देश मे एकाउंट होना कैसे गलत हो सकता है ? जब तक ये साबित ना हो कि इन खातों में भारी रकम है और ये रकम आयकर विभाग की जानकारी में नहीं है। जब तक केजरीवाल के पास इस आशय का पुख्ता सबूत ना हो, तब वो भला किसी उद्योगपति का नाम कैसे उछाल सकते हैं ? लेकिन नहीं केजरीवाल पर देश का कोई कानून लागू ही नहीं होता। ये संसद का अपमान कर सकते हैं, ये न्यायालय को धता बता सकते हैं। ये देश के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री नहीं मानते, ये किसी   पर भी कीचड़ उछाल सकते हैं, लेकिन अपने साथियों की गंदगी इन्हें दिखाई नहीं देती, उन्हें डेढ़ रुपये की टोपी पहना कर ईमानदारी का प्रमाणपत्र दे देते हैं। अब केजरीवाल पर तो ईमानदारी का ठप्पा लगा है,  इसलिए वो कुछ भी कर सकते हैं, उन पर कोई सवाल खड़ा नहीं कर सकता। सोशल साइट पर उनके  पेड कार्यकर्ता मौजूद हैं, जिनका काम है, केजरीवाल के क्रियाकलापों की चर्चा करने वालों को दिग्गी के खानदान का बताकर गंभीर विषय से लोगों का ध्यान हटाना।

वैसे सच्चाई तो कुछ और ही है। दरअसल जब तक अरविंद सामाजिक आंदोलन चला रहे थे, इन्हें तमाम उद्योगपति करोड़ों का चंदा दे रहे थे। लेकिन जब इन्होंने समाज सेवा के बजाए राजनीति करना शुरू कर दिया तो उद्योगपतियों ने चंदा देने से इनकार कर दिया। इस क्रम में इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने भी साफ कर दिया कि उन्होंने केजरीवाल को राजनैतिक गतिविधियों के लिए कोई चंदा नहीं दिया। दो महीने पहले अरविंद की ओर से आर्थिक मदद के लिए आवेदन किया गया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। हम सब  जानते हैं कि राजनीतिक पार्टी चलाना आसान नहीं है। मुझे लगता है कि इसीलिए केजरीवाल एक साजिश के तहत उद्योगपतियों को निशाना बना रहे हैं, जिससे वो उनकी पार्टी को भी मोटा माल दे। अरविंद के एनजीओ को विदेशी मदद मिलती है, लेकिन वो इस पैसे का इस्तेमाल राजनीति में नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें देश से बड़ी आर्थिक मदद जरूरी है।

अब देखिए टीम अन्ना की अहम सदस्य किरण बेदी ने साफ कर दिया कि अरविंद केजरीवाल इंडिया अंगेस्ट करप्सन (आईएसी) के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकते। ये संगठन अन्ना के पास है। केजरीवाल कह रहे हैं कि जब उनका राजनीतिक दल अस्तित्व में आ जाएगा, तब इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। सबको पता है कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन के खाते में मोटा मालहै, जब तक इसका वारा न्यारा ना हो जाए, भला इसे कैसे छोड़ सकते हैं। अन्ना साफ कर चुके हैं कि उनके नाम का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, लेकिन जनाब केजरीवाल कहते हैं कि अन्ना उनके गुरु हैं, वो उनके दिल में बसते हैं, भला कैसे उन्हें भूल सकते हैं। दरअसल सच्चाई ये है कि केजरीवाल राजनीति में भी अन्ना के नाम का सौदा करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि अन्ना एक ऐसा चेहरा है, जो देश में ईमानदारी का प्रतीक बन चुका है, ऐसे में इस चेहरे के बिना उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसलिए वो अन्ना के लाख मना करने के बाद भी उनके नाम का मोह नहीं त्याग पा  रहे हैं।
बहरहाल अरविंद केजरीवाल दुनिया में अकेले शख्स होगें, जिन्हें ये बताना पड़ता है कि वो आम आदमी हैं। इसके लिए उन्हें अंग्रेजी पैट शर्ट पर गांधी की टोपी लगानी पड़ती है। अब देखिए इसके बाद भी लोग उन्हें आम आदमी नहीं मानते। लिहाजा बेचारे को आम आदमी साबित करने के लिए टोपी पर लिखवाना पड़ गया कि वो आम आदमी है। वैसे केजरीवाल साहब फटी कमीज हवाई चप्पल पहन कर अगर आम आदमी बना जा सकता तो, राहुल गांधी को दलितों के घर का भोजन और उनकी टूटी चारपाई पर रात ना बितानी पड़ती। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आप देश के प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं, पर आम आदमी कभी नहीं बन सकते, इसके लिए आप चाहे कितना ही ड्रामा क्यों ना कर लें।   








Tuesday, 6 November 2012

संघ का हीरो बोले तो दाउद के गड़करी

लेख पढ़ने से पहले आइये थोड़ा हंस लेते हैं। पहले हंस लेना इसलिए जरूरी है कि बाद में चाल चरित्र और चेहरे का दावा  करने वाली पार्टी की करतूतें आपको रुलाएंगी। गंभीर आरोप लगने के बाद बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गड़करी के पक्ष में देश के जाने माने सीए, वित्तीय सलाहकार एस एन गुरुमूर्ति ने बीजेपी नेताओं के सामने एक प्रजेंटेशन दिया, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने सारे कागजात देख लिए हैं और गड़करी बिल्कुल निर्दोष हैं। गुरुमूर्ति की क्लीन चिट् के बाद पार्टी नेताओं ने गड़करी को बेदाग घोषित कर उनके पीछे कदमताल करने का निर्णय ले लिया। ऐसा करें भी क्यों ना क्योंकि हरियाणा सरकार ने भी तो राबर्ट वाड्रा को क्लीन चिट दे दिया है। आप जानते ही है इंडिया अगेंस्ट करप्सन ने भी अपने दो सदस्यों प्रशांत भूषण और अंजलि के खिलाफ लगे आरोपों की जांच अपने लोकपाल को सौंप दिया है। वाह भाई वाह ! ये बढिया है, अपना अभियुक्त, अपने जांच अधिकारी,  अपनी रिपोर्ट, अपना जज। फिर क्या बाकी है, अब अपनी पुलिस और जेल भी बना लीजिए। हाहाहाहहाहा 


कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने वाली बीजेपी को अब अपना घर बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है, क्योंकि इस बार आरोप किसी और पर नहीं बल्कि पार्टी अध्यक्ष नितिन गड़करी पर लगा है। भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में फंसे गड़करी की सफाई से पहले ही कोई संतुष्ट नहीं था, अब गड़करी नए विवादों में घिर गए हैं। उनका मानना है कि स्वामी विवेकानंद और माफिया डान दाउद इब्राहिम में ज्यादा फर्क नहीं है, क्योंकि दोनों का आईक्यू (बौद्धिक स्तर) समान है। बस फर्क ये है कि स्वामी ने अपने आईक्यू का इस्तेमाल सकारात्मक कार्यों में किया, जबकि दाऊद ने अपराध की दुनिया में दिमाग लगाया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की इस बात से देश भर में गुस्सा है। वैसे ऐसा नहीं है कि बदजुबान गड़करी पहली बार अपनी बातों से फंसे है, बल्कि वो अकसर सार्वजनिक मंच से हल्की और निम्नस्तरीय बात करके पार्टी की किरकिरी कराते रहे हैं। बहरहाल मुश्किल में फंसे गड़करी कुर्सी बचाने के लिए पार्टी नेताओं के यहां चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सच ये है कि उन्हें कहीं से भी सकारात्मक जवाब नहीं मिल रहा। वैसे तो संघ ये दिखाने की कोशिश कर रहा है कि इस मसले से उसका कोई सरोकार नहीं है, लेकिन संघ को लग रहा है कि अगर नितिन हटाया गया तो निश्चित ही संघ की भी किरकिरी होगी।

मेरा पहले दिन से ही ये मानना रहा है कि नितिन गड़करी का आईक्यू (बौद्धिक स्तर) अभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के काबिल नही हैं। अगर मुझे तय करना हो तो मैं उन्हें जितना सुन और समझ पाया हूं, उसके आधार पर तो मै गडकरी को किसी सूबे का भी अध्यक्ष ना बनने दूं। बहरहाल संघ से करीबी संबंधों के कारण उन्हें पद मिल गया, लेकिन नितिन इस पद के काबिल अपना कद नहीं बढ़ा पाए। सार्वजनिक मंचों से शुरू से ही ऐसी बातें करते रहे जो राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के अध्यक्ष के गरिमा के अनुरूप नहीं था। पिछले दिनों कांग्रेस के एक महासचिव को उन्होंने "चिल्लर नेता" कहा। इसे लेकर भी नितिन गड़करी की काफी छिछालेदर हुई थी। गडकरी कभी अपने वक्तव्य और व्यवहार से ये साबित ही नहीं कर पाए उनमें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की काबिलयत है। कोई भी अध्यक्ष हो, उसे इस बात का तो ज्ञान होना ही चाहिए कि संघ एक बार उन्हें जोर लगाकर अध्यक्ष बना तो सकता है, पर अध्यक्ष का काम तो उसे ही करना होगा। नितिन गड़करी अपने पहले कार्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं कर पाए, जिससे लगे कि संघ ने उन्हें अध्यक्ष बनाकर कुछ भी गलत नहीं किया। हां नितिन ने एक काम जरूर बखूबी किया है, वो ये कि कुछ भी परफार्म किए बगैर अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल अपने नाम करने का रास्ता साफ कर लिया। बहरहाल अब तो हालत ये है कि वो अपना पहला कार्यकाल ही पूरा कर पाएं यही बहुत है, दूसरा कार्यकाल मिलना तो मुश्किल ही है।

वैसे भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद गडकरी भले कहें कि वो किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हैं, लेकिन मेरा तो यही मानना है कि नैतिकता की दुहाई देने वाले गडकरी को अब पार्टी का अध्यक्ष पद तुरंत छोड़ देना चाहिए। वैसे भी अब पार्टी के भीतर भी उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी है। अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना है तो उसे गड़करी को ना सिर्फ अध्यक्ष पद बल्कि जांच होने तक पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाना ही होगा। अध्यक्ष पद जाता देख गड़करी काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं। मंगलवार को पूरे दिन वो नेताओं के घर चक्कर काटते दिखाई दिए। राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष होने के बाद भी बेचारे अपने पक्ष मे समर्थन जुटाते फिर रहे हैं। उन्होंने लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली से उनके घर जाकर मुलाकात की। अंदरखाने क्या बात हुई ये तो पार्टी के नेता जाने, लेकिन मुंह लटकाए जिस तरह गडकरी नेताओं के घर जाते हैं और वैसे ही वापस लौटते हैं, इससे तो लगता है कि सबकुछ सामान्य नहीं है। इस बीच सियासी गलियारे में खबर उड़ी कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी हिमांचल के वरिष्ठ बीजेपी नेता शांता कुमार का नाम अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाना चाहते हैं। बीजेपी खेमें में पूरे दिन जिस तरह का घटनाक्रम दिखाई दे रहा था, उससे तो लगा कि अब किसी भी वक्त गड़करी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ सकते हैं। लेकिन दोपहर तीन बजे के बाद उनके लिए कुछ राहत भरी खबर आई। चर्चा तो ये है कि संघ ने पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं से बात कर हालात को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई। इसी दौरान पार्टी नेता सुषमा स्वराज ने ट्विट किया कि वो गड़करी के साथ हैं।   

दरअसल ये मुश्किल गड़करी ने खुद खड़ी की है। सब को पता है कि गड़करी किसानों की जमीन हथियाने के आरोपों से पहले ही घिरे थे, इसी बीच एक और विवाद उनके नाम जुड़ गया। ये आरोप भी हल्का फुल्का नहीं है। अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया कि उनकी कंपनी को घाटे से उबारने के लिए आईआरबी कंपनी ने 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। आपको हैरानी होगी कि ये वही कंपनी है जिसे महाराष्ट्र में तमाम कार्यों का ठेका दिया गया, और ये ठेके उस समय दिए गए, जब गडकरी वहां के लोकनिर्माण मंत्री थे। आरोप तो ये भी है कि लोन में दिए गए पैसे का स्रोत भी साफ नहीं है। इस खुलासे के बाद बीजेपी नेताओं की बोलती बंद है। आरोप है कि 16 अन्य कंपनियों के एक समूह का गडकरी की कंपनी में शेयर हैं। लेकिन इन 16 कंपनियों के जो डायरेक्टर हैं, उनके नाम का खुलासा होने से गड़करी का असली चेहरा जनता के सामने आ गया है। आपको हैरानी होगी कि उनका ड्राइवर जिसका नाम मनोहर पानसे, गडकरी का एकाउंटेंट पांडुरंग झेडे, उनके बेटे का दोस्त श्रीपाद कोतवाली वाले और निशांत विजय अग्निहोत्री ये सभी इन विवादित कंपनियों के डायरेक्टर हैं। ताजा जानकारी के अनुसार गड़करी के नियंत्रण वाली पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड 64 करोड़ रुपये के घाटे में चल रही थी । 30 मार्च 2010 को आइडियल रोड बिल्डर्स यानी आईआरबी ग्रुप की फर्म ग्लोबल सेफ्टी विजन ने उसे 164 करोड़ रुपये लोन दिया। आईआरबी ग्रुप को 1995 से 1999 के बीच महाराष्ट्र में तमाम सरकारी ठेके दिए गए। उस दौरान गडकरी ही लोक निर्माण मंत्री थे। आईआरबी ने पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के तमाम शेयर भी खरीदे। मसला वही सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का लगता है।

गड़करी पर भ्रष्टाचार का ये गंभीर मामला है। इस मामले में अभी तक कोई संतोषजनक जवाब वो नहीं दे सके हैं। इस बीच उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों से देश का ध्यान भटकाने के लिए स्वामी विवेकानंद की तुलना माफिया डान दाउद इब्राहिम से की तो पूरे देश में उनके खिलाफ और माहौल बन गया। पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य महेश जेठमलानी ने तो उनके इस्तीफे की मांग को लेकर कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता रामकृष्ण जेठमलानी खुल कर विरोध करते हुए सामने आए, उन्होंने भी गड़करी का इस्तीफा मांगा। इसी बीच पार्टी नेता जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा की मुलाकात को लेकर सियासी गलियारे में चर्चा होने लगी कि पार्टी में गड़करी का विरोध बढ़ता जा रहा है। ऐसे में गड़करी का जाना तय है। इस बीच पत्रकारों को मैसेज मिला कि शाम 7 बजे पार्टी की कोरग्रुप की बैठक होगी। इस बैठक में गडकरी के मामले में चर्चा की जाएगी। बहरहाल कोर ग्रुप तो महज दिखावा है, अंदर की बात ये है कि संघ ने पार्टी नेताओं पर अपना डंडा घुमा दिया है और साफ कर दिया है कि मीडिया में बेवजह की बयानबाजी बंद हो। पार्टी नेता एक साथ मीडिया के सामने आएं और गड़करी के समर्थन का ऐलान करें। बहरहाल संघ के दबाव में गडकरी की कुर्सी भले बच जाए, लेकिन अब बीजेपी कम से कम सिर उठाकर अपने चाल चरित्र और चेहरे की दुहाई तो नहीं ही दे पाएगी। मैं तो यही कहूंगा चोर चोर मौसेरे भाई।

Wednesday, 24 October 2012

बीजेपी को नए अध्यक्ष की तलाश !


बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गड़करी अब भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिर गए हैं। गडकरी भले कहें कि वो किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हैं, लेकिन नैतिकता की दुहाई देने वाले गडकरी को अब पार्टी का अध्यक्ष पद तुरंत छोड़ देना चाहिए । वैसे तो संघ चाहता था कि गड़करी को पार्टी के अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल भी दिया जाए, इसके लिए रास्ता भी बना दिया गया, लेकिन जिस तरह से नितिन के ऊपर गंभीर आरोप लगे हैं, उससे उन्हें दूसरी बार अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा। संघ भी अब इतनी आसानी से उन्हें दूसरा कार्यकाल देने को तैयार नहीं होगा। अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस के भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना है तो उसे गड़करी को ना सिर्फ अध्यक्ष पद बल्कि जांच  होने तक पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाना ही होगा। जानकार  तो यहां तक  कह रहे हैं कि पार्टी में नए अध्यक्ष की तलाश भी शुरू हो गई है।

एक-एक कर आजकल नेताओं का असली चेहरा जनता के सामने आने लगा है। बीजेपी  अध्यक्ष किसानों की जमीन हथियाने के आरोपों से पहले ही घिरे थे, इसी बीच अब एक और विवाद उनके नाम जुड़ गया है। ये आरोप हल्का फुल्का नहीं है, बल्कि एक अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया है कि उनकी कंपनी को घाटे से उबारने के लिए आईआरबी कंपनी ने 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। आपको हैरानी होगी कि ये वही कंपनी है जिसे महाराष्ट्र में तमाम कार्यों का ठेका दिया गया, और ये ठेके उस समय दिए गए, जब गडकरी वहां के लोकनिर्माण मंत्री थे। आरोप तो ये भी है कि लोन में दिए गए पैसे का स्रोत भी साफ नहीं है।

इस खुलासे के बाद बीजेपी नेताओं की बोलती बंद है। आरोप है कि 16 अन्य कंपनियों के एक समूह के गडकरी की कंपनी में शेयर हैं। लेकिन इन 16 कंपनियों के जो डायरेक्टर हैं, उनके नाम का खुलासा होने से गड़करी का असली चेहरा जनता के सामने आ गया है। आपको हैरानी होगी कि उनका ड्राइवर जिसका नाम मनोहर पानसे, गडकरी का एकाउंटेंट पांडुरंग झेडे, उनके बेटे का दोस्त श्रीपाद कोतवाली वाले और निशांत विजय अग्निहोत्री ये सभी इन विवादित कंपनियों के डायरेक्टर हैं। ताजा जानकारी के अनुसार गड़करी के नियंत्रण वाली पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड 64 करोड़ रुपये के घाटे में चल रही थी । 30 मार्च 2010 को आइडियल रोड बिल्डर्स यानी आईआरबी ग्रुप की फर्म ग्लोबल सेफ्टी विजन ने उसे 164 करोड़ रुपये लोन दिया। आईआरबी ग्रुप को 1995 से 1999 के बीच महाराष्ट्र में तमाम सरकारी ठेके दिए गए। उस दौरान गडकरी ही लोक निर्माण मंत्री थे। आईआरबी ने पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के तमाम शेयर भी खरीदे। मसला वही सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का लगता है।

गडकरी महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री थे तो आईआरबी को भारी मुनाफा हुआ और जब गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए तो उनकी घाटे की कंपनी को उबारने के लिए वही आईआरबी सामने आ गई। इसके बाद भी गडकरी दावा कर रहे हैं कि वे जांच के लिए तैयार हैं। वो ये भी कह रहे हैं कि 14 महीने पहले कंपनी के चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उनके पास अब कंपनी के केवल 310 शेयर हैं जिनकी कीमत महज 3100 रुपये है। सच तो ये है कि देश की जनता गोरखधंधे की बारीकियों में नहीं जाना चाहती। मोटी-मोटी बात लोगों के समझ में आती है। यानि गड़करी के घाटे वाली कंपनी को कोई भी 164 करोड़ रुपये लोन यूं ही तो देने वाला नहीं है, जाहिर उसने कुछ अपना फायदा देखा होगा। आईआरबी को जो फायदा हुआ है, अब वो भी सबके सामने है, यानि गड़करी के लोक निर्माण मंत्री रहते हुए उसे बहुत सारे कामों के ठेके मिले।

इस खुलासे के बाद गड़करी खेमा सफाई देने में जुट गया है। कहा जा रहा है कि वो  हर तरह की जांच का सामना करने को तैयार हैं। बीजेपी का ये भी दावा है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार है, अगर बीजेपी अध्यक्ष की कंपनी में कुछ भी गडबड़ है तो वो उसकी जांच करा लें। हालांकि राजनीतिक स्तर पर कुछ भी कहा जाए, पर अहम सवाल ये है कि पूर्ति ग्रुप को आईआरबी या ग्लोबल सेफ्टी विजन ने लोन किस मद से दिया। मसलन पैसे का स्रोत क्या है ? 2009 के रिकॉर्ड बताते हैं कि पूर्ति में निवेश करने वाली 16 कंपनियों में चार ही लोग ही घूम-घुमाकर डायरेक्टर के पद पर हैं। नितिन गडकरी के बेटे निखिल को 22 फरवरी 2011 को पूर्ति का एमडी बनाया गया था। ऐसे में ये कहना कहां तक ठीक है कि गडकरी का कंपनी से रिश्ता नाममात्र का है।

जब राजनीति के किसी पूर्णकालिक कार्यकर्ता की जगह कारोबारी दिमाग के लिए जाने जाने  वाले गडकरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था, तो आरएसएस की वजह से ही उन पर ज्यादा सवाल नहीं उठ पाए थे। इस बीच पार्टी में पहले ही एक खेमा नितिन को अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल दिए जाने के खिलाफ था, अब गड़करी के खिलाफ गंभीर आरोप लगने से उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बना हुआ है, अगर बीजेपी को 2014 में कांग्रेस को दिल्ली से उखाड़ फेंकना है, तो उसे ये साहस भी दिखाना होगा कि वो वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। इसके लिए कोई कितने बड़े पद पर क्यों ना हो, उसे बाहर का रास्ता दिखाने में कोई हिचक नहीं है।

अगर बात बीजेपी के अंदर चल रहे घटनाक्रम की करें, तो एक तपका चाहता है कि नितिन गड़करी को तत्काल अध्यक्ष पद से हटा दिया जाना चाहिए। इस समय हिमाचल के साथ ही गुजरात में भी विधान सभा के चुनाव चल रहे हैं। बीजेपी के लिए गुजरात बहुत ही अहम है। दोनों ही राज्यों में पार्टी अध्यक्ष को चुनाव प्रचार के लिए जाना है। अब सवाल उठता है कि गड़करी जब खुद गंभीर आरोपों का सामना कर रहे है तो वो सरकार के भ्रष्टाचार की बात भला कैसे कर सकते हैं। हिमाचल में कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह को कटघरे में खड़ा करना भी उनके लिए आसान नहीं होगा। इन हालातों में अगर नितिन गडकरी का दो एक दिन में त्यागपत्र हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।  पता चला है कि चुनावों को  देखते हुए इस मामले  में संघ पर भी जल्दी फैसला लेने का दबाव बढ़ रहा है। पार्टी और संघ के भीतर नए अध्यक्ष के मसले पर मथन भी शुरू हो चुका है। हालांकि अभी इस मामले में पार्टी का कोई भी नेता कुछ भी बोलने  को तैयार नहीं है।

वैसे भी बीजेपी में चाल, चरित्र और चेहरे की बात अब पुरानी हो गई। आप ये भी कह सकते हैं कि बात पुरानी नहीं बल्कि खत्म हो गई है। अगर कोई मुझसे पूछे कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है, तो मैं पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी को ही कटघरे में खड़ा करुंगा। आप हमारी बात से सहमत होंगे बीजेपी को मजबूत बनाने में इन्हीं दोनों नेताओं की मेहनत रही है, लेकिन ये पार्टी को संघ के चंगुल से बाहर नहीं निकाल पाए। यही वजह है कि आज पार्टी में ना अनुशासन है, ना मजबूती है ना ईमानदारी और ना ही पार्टी के प्रति समर्पण। देश जानता है कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन गड़करी संघ की पसंद है, सच कहूं तो उन्हें पार्टी पर थोपा गया है, क्योंकि वो पार्टी में बहुत जूनियर हैं। सच्चाई तो ये है कि उन्हें अध्यक्ष बनाया ही नहीं जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें दूसरा कार्यकाल दिए जाने का रास्ता बनाया दिया गया। बहरहाल अब उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं और अगर बीजेपी 2014 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहती है तो उसे गड़करी को बाहर करना ही होगा।


जरूरी सूचना :  मैने अपने  नए   ब्लाग  " TV स्टेशन " को नया लुक दिया है। जरा  एक नजर वहां भी जरूर डालिए।   http://tvstationlive.blogspot.in/   कैसा लगा ? अगर ये भी बताएंगे तो मुझे खुशी होगी।



Friday, 19 October 2012

चारो खाने चित "टीम केजरीवाल"

खुलासा सप्ताह मना रही टीम अरविंद केजरीवाल फिलहाल चारो खाने चित हो गई है। वजह और कुछ नहीं बल्कि केजरीवाल समेत उनके अहम सहयोगियों पर नेताओं से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप लगे हैं। हैरानी इस बात पर है कि खुद केजरीवाल की भूमिका पर भी उंगली उठी है। इसे ही कहते हैं " सिर मुड़ाते ही ओले पड़े "। अरे भाई कितने दिनों से एक ही बात समझा रहा हूं कि बेईमानी की बुनियाद पर कभी भी ईमानदारी की इमारत खड़ी नहीं हो सकती है। इसलिए पहले खुद को साफ सुथरा दिखना भर ही काफी नहीं है बल्कि अपने काले कारनामों को बंद कर जनता के बीच माफी मांगना होगा। अगर जनता माफ कर देती है, फिर आप दूसरों पर उंगली उठाने की कोशिश करें। बताइये अपना दामन साफ किए बगैर खुलासा सप्ताह मनाने लगे। अब केजरीवाल को भी जवाब देना होगा कि क्यों वो सब कुछ जानते हुए एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के मामले में खामोश रहे। उनके सहयोगी प्रशांत भूषण को कैसे हिमांचल में चाय बगान की वो जमीन आवंटित हो गई, जो नियम के तहत सामान्य व्यक्ति को नहीं हो सकती। महाराष्ट्र की अंजलि दमानिया ने कैसे खेती की जमीन लेकर बिल्डरों को बेचा और मोटा मुनाफा कमाया ?

खुलासा सप्ताह की शुरुआत सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से हुई। चूंकि मैं काफी दिनों तक मुरादाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़ा रहा हूं। इसलिए जब वाड्रा पर आरोप लगा तो मुझे कत्तई हैरानी नहीं हुई। मैं इस परिवार को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। दो दिन बाद केजरीवाल के निशाने पर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद आ गए। आरोप लगा कि विकलांगो के नाम पर सरकारी रकम की बंदरबाट की गई। कांग्रेस पर काफी हमला कर चुके थे, लिहाजा अरविंद पर ये आरोप ना लगे कि वो बीजेपी के इशारे पर सब कर रहे हैं, इसलिए अपनी छवि जनता में बनाए रखने के लिए उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को भी निशाने पर लिया। नितिन पर आरोप लगाया तो गया, पर कमजोर तथ्यों को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश हुई, इसलिए बीजेपी को ये मुश्किल में नहीं डाल पाए। गडकरी के मामले मे तो मैं ये भी कह सकता हूं कि केजरीवाल ने मीडिया और देश को गुमराह किया। उन्होंने तथ्यों को गलत ढंग से रखा, लगा कि जमीन के अधिग्रहण के मामले की उन्हें जानकारी ही नहीं है। वैसे भी नितिन गडकरी को ये जमीन बेची नहीं गई है। सरकार ने उन्हें सिर्फ 11 साल के लिए लीज पर दी है।

खैर एक के बाद एक खुलासे से केजरीवाल को लग रहा था कि उनका सियासी ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पूरी टीम तब बैक फुट पर आ गई, जब केजरीवाल समेत अहम सदस्यों पर भी गंभीर आरोप लगे। अच्छा इसमें केजरीवाल तो आरोप को खारिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि उन पर किसी राजनीतिक दल ने आरोप नहीं लगाया है, बल्कि उन्हें महाराष्ट्र के एक पूर्व आईपीएस वाई पी सिंह ने कटघरे में खड़ा किया है। वाई पी सिंह को  पूरा देश जानता है कि वो एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रहे हैं, उन्होंने देखा कि मौजूदा सिस्टम में ईमानदारी से नौकरी करना संभव नहीं है तो नौकरी ही छोड़ दी। महाराष्ट्र के पूरे सिचाई घोटाले के मामले की जानकारी केजरीवाल को उन्होंने ही दी। केजरीवाल को जो अभिलेख और जानकारी दी गई थी, उसमें शरद पवार का लवासा प्रोजेक्ट भी शामिल था। लेकिन केजरीवाल ने मीडिया के सामने अधूरे तथ्य रखे और गडकरी को ही निशाने पर लिया, पवार का उन्होंने नाम तक नहीं लिया। जबकि वाईपी सिंह ने जो अभिलेख केजरीवाल को दिए थे, उसमें सिर्फ शरद पवार ही नहीं बल्कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले, भतीजे अजित पवार समेत कुछ और लोगों का काला चिट्ठा था। अब सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल पर ऐसा क्या दबाव था कि उन्होंने पवार फैमिली का नाम तक नहीं लिया।  अब केजरीवाल की भूमिका की जांच कहां होगी और कौन करेंगा ?

इंडिया अगेंस्ट करप्सन की एक और सदस्या अंजलि दमानिया की बात कर लें। टीवी कैमरे पर पानी पी पी कर नेताओं को कोस रही दमानिया का चेहरा भी दागदार निकला। आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि पर आरोप लगा है कि किसानों की ज़मीन खरीद कर उस ज़मीन का उपयोग बदलवा कर ऊंचे दामों में बेचा। अग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया है कि  अंजलि दमानिया ने 2007 में करजत के खरवंडी गांव में सात एकड़ ज़मीन खरीदी, इसके ठीक बाद इस जमीन का उपयोग बदलने की अर्जी दे दी। हालांकि ज़मीन बेचने वाले किसानों का दावा है कि दमानिया ने उनसे कहा था कि वो यहां खेती करेंगी, लेकिन उन्होंने ज़मीन का लैंड यूज चैंज करा दिया और 39 प्लॉट काट दिए। उन्हें ज़मीन का इस्तेमाल बदलने की इजाज़त रायगढ़ के कलेक्टर ने दी थी। लैंड यूज बदलते ही दमानियां भी बदल गईं और उन्होंने पूरी जमीन एसवीवी डेवलपर्स को दे दी, जिसमें दमानिया भी डारेक्टर हैं। आरोप है कि  कुल 39 प्लॉट काटे गए जिनमें से सैंतीस प्लॉट अलग अलग लोगों को मोटे दाम में बेचा गया।

इतना ही नहीं दमानियां जमीनों की जिस तरह से खरीद फरोख्त करती हैं, उससे तो नहीं लगता है कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका काम बिल्डर जैसा ही दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि दमानिया ने करजत के जिस खरवंडी गांव में ज़मीन खरीदी, उसके बगल के गांव कोंदिवाड़े में भी उन्होंने 30 एकड़ जमीन खरीद ली। वहां बन रहे कोंधाणे बांध के खिलाफ दमानिया ने इसी साल अप्रैल में पीआईएल दायर की। आरोप तो ये भी है कि केजरीवाल अंजलि दमानिया की जमीन बचाने के लिए ही आरोप लगा रहे हैं। दरअसल अंजलि ने पिछले वर्ष जून में महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग को एक पत्र लिखा था कि कोंधाने-करजाट बांध में उनकी जमीन अधिगृहीत न की जाए। इसकी जगह बांध को 700 मीटर आगे शिफ्ट कर दिया जाए जहां आदिवासियों की जमीन है। अंजलि की मौजूदा लड़ाई इसी से संबंधित है। अब अंजलि के मामले का खुलासा हो जाने के बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है।

टीम केजरीवाल के एक और सहयोगी प्रशांत भूषण का मामला भी कम गंभीर नहीं है। हिमाचल प्रदेश में प्रशात भूषण की सोसायटी को चाय बगान के लिए आरक्षित जमीन दे दी गई। भूषण ने कागड़ा जिले के पालमपुर में 2010 में करीब साढ़े चार हेक्टेयर जमीन खरीदी है। ये जमीन कुमुद भूषण एजुकेशन सोसाइटी के नाम है। प्रशांत भूषण ही इस सोसाइटी के सचिव हैं। ये जमीन यहां कॉलेज खोलने के नाम पर ली गई थी। 2010 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने बाकायदा धारा-118 के तहत ये जमीन खरीदने की इजाजत भी दी है। इस जमीन पर कुछ बिल्डिंग बन गई हैं और कुछ का काम चल रहा है। सवाल ये उठता है कि हिमांचल में आम आदमी तो जमीन भी नहीं खरीद सकता, फिर भूषण की सोसायटी को वो जमीन कैसे मिल गई जो चाय बगान के लिए आरक्षित थी ? जाहिर है कि उनकी पहुंच का ही नतीजा है। अगर भूषण को हिमाचल में वो जमीन मिल सकती है जो चाय बगान के लिए है, और जहां कोई निर्माण तक नहीं किया जा सकता। अपनी पहुंच का फायदा उठाने वाले ऐसे लोग दूसरों पर कैसे कीचड़ उछाल सकते हैं, इनमें इतना नैतिक बल आता कहां से है ? भूषण जी की जमीन पर केजरीवाल खामोश क्यों है ? नितिन गड़करी को तो जमीन सिर्फ 11 साल की लीज पर मिली है, तो हाय तौबा मचा रहे हैं।

इंडिया अंगेस्ट करप्सन के एक और हिमायती हैं मयंक गांधी। नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ा है तो हम सबको उम्मीद थी कि चलिए कम से कम मयंक यहां ऐसे सदस्य है,जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं कि वो गलत नहीं करेंगे। अब गांधी जी भी आरोपों के घेरे में है। वो भी ऐसे वैसे आरोप नहीं हैं, जमीन की धांधली की शिकायत है। कहा जा रहा है कि पहले तो उन्होंने एक एनजीओ बनाया। एनजीओ के नाम पर सरकारी जमीन ली और वो भी सस्ते में। लेकिन बाद में उन्होंने इस जमीन को अपने रिश्तेदारों को बेच दिया। ये सब क्या है भाई गांधी जी।

इसीलिए कहते हैं कि शीशे के मकान में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। अब देखिए ना लगभग पूरी टीम ही चोरी चकारी में घिरती नजर आ रही है। फिलहाल आज केजरीवाल साहब शाम को घर से बाहर निकले और कहा कि तीन लोगों की एक कमेटी बना दी है, वो हमारे सदस्यों के मामले की जांच करेंगे और अगर ये दोषी होंगे तो इन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा। हाहाहहाहाह कमाल है केजरीवाल साहब। पहले तो ये बताइये कि कमेटी किसने बनाई है ? जब आपने ही कमेटी बनाई है और आप सब पर आरोप है तो कैसे मान लिया जाए कि कमेटी आपकी सही जांच करेगी ? अच्छा पार्टी तो अभी बनी भी नहीं है तो इन लोगों को किस पार्टी से निकाल देंगे आप ?  अगर वाकई आपको अपने सदस्यों की जांच चाहिए तो जैसे दूसरों के मामले में जांच की मांग करते हैं, वैसे ही सरकार से मांग कीजिए की जांच कराए।

महत्वपूर्ण ये है कि आपकी बनाई कमेटी को कोई अधिकार हासिल  है नहीं। ऐसे में ये टीम जांच कैसे कर पाएगी। टीम को जांच के लिए सरकारी अभिलेखों  की भी  जरूरत  होगी। अब सरकारी अधिकारी आपकी बनाई टीम को सरकारी अभिलेख भला क्यों दिखाएंगे ? मान लीजिए अगर टीम प्रशांत भूषण की जांच करती है तो उसे सरकारी अभिलेख में ये देखना होगा कि जो जमीन चाय बगान के लिए आरक्षित थी, वो जमीन ही भूषण को दी गई है। अब भूषण जी तो आपको ये अभिलेख टीम को दिखाने वाले नहीं है, इसके लिए तहसील में अभिलेखों की जांच करनी  होगी। जांच का ये विषय भी होगा कि कैसे जमीन दी गई, किसके आदेश पर जमीन दी गई, नियमों की अनदेखी  कैसे की  गई। ये बात प्रशांत टीम  को बताएंगे ? अंजलि  के मामले  को ले लें, उनके मामले में भी सरकारी अभिलेखों  की जरूरत होगी। ये टीम कैसे सरकारी अधिकारियों और अभिलेखों को तलब कर पाएगी। कृषि की जमीन का किन हालातों  में लैंड यूज बदला  गया, इसमें कौन कौन से नेता  अफसर जिम्मेदार थे, ये कौन बताएगा। केजरीवाल  साहब देश को गुमराह  मत कीजिए। 

एक सवाल  आप  से  पूछता हूं  केजरीवाल साहब । अगर आप बिना जांच के कानून मंत्री का  इस्तीफा मांग सकते हैं,  तो बिना जांच के अपने सदस्यों को टीम से बाहर क्यों  नहीं  कर सकते ?  मैं कहता  हूं  कि गंभीर आरोप लगा  है, ऐसे में  कम से कम अपने सहयोगियों को तो  टीम से बाहर करने की  हिम्मत दिखाइये। ये कह कर आप बच नहीं  सकते  कि आपने जांच टीम बना दी है, कल को साबित  हो जाए कि  हां लोगों ने गडबड़ी की है तो आप अपना पुलिस स्टेशन  बनाकर कहें कि उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। फिर अपनी अदालत और जेल भी बना लीजिए। वैसे  भी आप ने ऐलान  किया है कि आप  मनमोहन सिह को आप अपना  प्रधानमंत्री मानते ही नहीं है। मतलब  साफ है कि देश के लोकतंत्र में आपको  यकीन ही नहीं रह गया है। समानांतर व्यवस्था चलाने  के हिमायती  हैं, तो फिर दिखावा क्यों ?  बनाइये संसद, पुलिस स्टेशन, अदालत और जेल। 

बहरहाल नेताओं पर आरोप लगता है तो हमें उतनी हैरानी नहीं होती, क्योंकि आज लोग नेताओं के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करते। हालत ये है कि भले ही नेताओं पर आरोप ही लगे कि उन्होंने करप्सन किया है, फिर भी हम बिना जांच के ही मान लेते हैं कि हां नेता है तो जरूर किया होगा। लेकिन करप्सन के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले जब ऐसे मामले में शामिल होते हैं तो देश का भरोसा टूटता है। मैं देख रहा हूं कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जितने लोग भी जुड़े हैं, सभी के अपने एनजीओ की अलग अलग दुकान है। आमतौर पर सभी  अपने  एनजीओ से मोटा माल बनाने में लगे  हैं।  कुतर्क से सच  को नहीं दबाया  जा सकता, सच पारदर्शी  होता है,  जिसे जनता देख रही है। इस सवाल  का क्या जवाब  है आपके पास कि जो लोग  भी शुरू से आपके साथ  जुड़े थे, एक एक कर सब अलग हो गए। वजह क्या है कि अलग  हुए ज्यादातर लोगों को अरविंद केजरीवाल से ही शिकायत  है। बेचारे अन्ना को ये कहने  को क्यों  मजबूर  होना पड़ा की अब टीम केजरीवाल ना उनके नाम का इस्तेमाल करेगी  और ना  ही चित्र का। अगर अन्ना ऐसा कहते हैं तो आसानी से समझा  जा सकता  है कि दाल  में कुछ काला  जरूर है।


Sunday, 29 July 2012

दिल्ली : जंतर मंतर से live ...


जंतर-मंतर पर भव्य मंच तो सजाया गया है इसलिए कि लोगों को बताया जाए कि भ्रष्टाचार के चलते देश कहां पहुंच गया है, लेकिन पांच दिन से देख रहा हूं यहां भ्रष्टाचार की तो बात ही नहीं हो रही है, बात महज भीड़ की हो रही है। सबको चिंता इसी बात की है कि भीड़ कहां गायब हो गई। अच्छा मैं हैरान इस बात से हूं कि जो लोग इनके आंदोलन को समर्थन कर रहे हैं, टीम अन्ना  उन्हें "भीड़" कहती है। ये सुनकर मैं वाकई हैरान हूं। बहरहाल जंतर मंतर पर एक बार फिर लोग जमा हैं, उनका दावा है कि वो खाना नहीं खा रहे हैं। कह रहे हैं तो झूठ नहीं बोलेंगे, नहीं खा रहे होंगे। लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नही आती है कि जो लोग भूख हड़ताल कर रहे हैं, वो सरकारी डाक्टर से जांच कराने से क्यों कतराते हैं, क्यों सरकारी डाक्टर को वापस लौटा कर निजी चिकित्सक की मदद लेते हैं। वैसे मुझे उम्मीद है कि आमरण अनशन कैसे होता है, इसके क्या तरीके हैं, ये आपको पता होगा, लेकिन संक्षेप में मैं इसलिए जिक्र कर देना चाहता हूं जिससे अगर किसी को कोई संदेह हो तो वो दूर हो जाए।

आमरण अनशन पर बैठने के लिए पहले आपको इसकी सूचना स्थानीय प्रशासन को देनी होती है, जिसमें उन मांगो का जिक्र करना होता है, जिसके लिए आप अनशन के लिए मजबूर हुए। इस सूचना पर स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वो वहां अपेक्षित संख्या में पुलिस की ड्यूटी के साथ ही एक चिकित्सक की तैनाती करे, जिससे अनशन पर बैठे व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रोजाना जानकारी प्रशासन को मिलती रहे। अब चिकित्सकों का दल जब अरविंद, मनीष और गोपाल के स्वास्थ्य की जांच करने पहुंचा, तो इन लोगों ने डाक्टरों के दल को वापस भेज दिया। चूंकि ये टीम बदजुबान के साथ बद्तमीज भी होती जा रही है, इसे पता ही नहीं है कि डाक्टर आपकी मदद के लिए  हैं और उनकी रिपोर्ट मायने रखती है।

आपको याद होगा कि पिछली बार अन्ना ने 13 दिन से ज्यादा अनशन किया और उसके बाद जब अनशन खत्म हुआ तो लालू यादव जैसे लोगों ने उनके अनशन पर ही सवाल खड़े कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले इस बात की जांच हो कि अन्ना बिना खाए पीए 13 दिन रह कैसे गए ? उनके कहने का मकसद साफ था कि सरकारी डाक्टरों ने तो इनके स्वास्थ्य का परीक्षण किया नहीं और निजी चिकित्सक की बात का कोई मतलब नहीं है। इसी का फायदा उठाते हुए लालू ने तो यहां तक कहा कि बाबा रामदेव नौ दिन अनशन नहीं कर पाए, उनकी सांस टूटने लगी, जबकि वो तो व्यायाम वगैरह भी करते हैं,  तब  अन्ना 13 दिन कैसे भूखे रह सकते हैं ? ये सवाल उठाया गया और इसका किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। यही सब इस बार भी हो रहा है, निजी चिकित्सकों ने पहले ही दिन कहा कि अरविंद को शूगर है और उनकी तबियत बिगड़ गई है, जबकि तीन दिन बाद कहा गया कि वो सामान्य हैं। ऐसी मेडिकल रिपोर्ट भी बेमानी है, क्योंकि ये विश्वसनीय नहीं रही।
सच तो ये है कि अनशनस्थल के पीछे बने कैंप में बहुत ज्यादा समय अरविंद, मनीष और गोपाल बिताते हैं।  इसलिए वहां भी ज्यादातर लोग यही चर्चा कर रहे हैं कि ये आमरण अनशन कई साल चल सकता है, क्योंकि सब कुछ ना कुछ खा पी रहे हैं, वरना छठें दिन तो हालत पतली हो ही जाती है, जबकि अनशनकारी पहले से ज्यादा टनाटन नजर आ रहे हैं। अच्छा मीडिया भी अनशनकारियों से ये सवाल पूछ रही है कि जनता को आपके अनशन पर भरोसा नहीं रहा,  उसे लगता है कि आप खा पी रहे हैं।  बहरहाल सच तो अनशनकारी ही बता सकते हैं, लेकिन जब सभी स्वस्थ हैं तो सरकार भी मस्त है, चलो खाते पीते रहो, कोई दिक्कत नहीं। इसलिए अब इसे कथित अनशन कहना ज्यादा ठीक होगा, क्योंकि ये खा रहे हैं या नहीं खा रहे हैं, इस बारे में भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

बहरहाल कथित अनशन का आज पांचवा दिन है, इन पांच दिनों में मंच से या फिर टीवी पर चर्चा क्या हो रही है आपको पता है ? चर्चा ये हो रही है कि आज  भीड़ आई , कल नहीं आई थी। इसकी क्या वजह है। चैनलों के रिपोर्टर बताते हैं कि पहले दो दिन बहुत गर्मी थी,  शनिवार और रविवार को छुट्टी के साथ ही मौसम बहुत सुहाना हो गया, लिहाजा बड़ी संख्या में लोग यहां जुटे।  मतलब भ्रष्ट्राचार का मुद्दा खत्म हो कर  मुद्दा भीड़ में बदल गया है। पांच दिन से सिर्फ यही एक बात हो रही है। कहा जा रहा है कि पहले तीन दिन तो सौ दो सौ लोग ही यहां थे। एक दिन बाबा रामदेव समर्थन देने आए तो उनके साथ हजार बारह सौ लोग आए, लेकिन वो भी रामदेव के जाते ही खिसक गए। फिर कथित अनशन  का कामयाब बनाने के लिए भगवान ने मदद की। यहां बारिश नहीं  हुई, लेकिन पूरे दिन काले बादल से मौसम थोड़ा खुशनुमा हो गया और सबसे बड़ी बात शनिवार और रविवार की छुट्टी हो गई। तो लोग वीकेड  इन्ज्वाय करने पहुंच गए जंतर मंतर।
वैसे यहां आने पर लोग मायूस हुए, लोगों को उम्मीद थी कि जिस तरह रामलीला मैदान में अनशन के दौरान देशी घी की पूड़ी कचौड़ी का फ्री में इंतजाम था, वैसा कुछ इस बार भी  होगा, पर यहां इस बार ऐसा कुछ नहीं, लिहाजा लोग यहां आए और कुछ देर तमाशा देख कर खिसक गए कनाट प्लेस की ओर। वैसे इस कथित अनशन से एक बात और साफ हो गई जो कुछ साख बची है वो सिर्फ अन्ना हजारे की है। क्योंकि जब तक अरविंद की अगुवाई  में ये शोर शराबा चल रहा था तो यहां गिने चुने लोग ही मौजूद थे। लेकिन रविवार को जब अन्ना इस अनशन मे शामिल हुए तो जरूर कुछ  लोग घर से निकले और जंतर मंतर पहुंचे। अन्ना की वजह से ये आंदोलन शांतिपूर्ण  है, वरना इस अनशन में जिस तरह उपद्रवी शामिल हैं,  ये तो दूसरे ही दिन पिट पिटाकर कुछ जेल चले जाते और बाकी घर में दुबक कर बैठ जाते। मंच से कुमार विश्वास जिस तरह से अनर्गल बातें कर माहौल खराब कर रहे हैं,  उससे भी आंदोलन पर खराब असर पड़ रहा है।

आप खुद भी देखें जंतर मंतर पर लगे मजमें कुछ नया भी नही है। अन्ना दो साल  से एक ही बात जनता को समझा रहे हैं कि वो देश के मालिक है और संसद में बैठे लोग सेवक है। हंसी आती है उनकी बात सुनकर..। अरे अन्ना जी ये बात तो हम सब जानते है, पर हम कैसे मालिक हैं ये आप भी जानते हो। टीम अन्ना की बात करें तो वो अब बातों से हार कर गाली गलौच पर उतर आई हैं। दरअसल हर जगह कुछ ऐसे लोग होते हैं जो संतुष्ट नहीं होते। ऐसी ही एक बड़ी संख्या नौकरशाहों में है। सिस्टम से असंतुष्ट कहें, या अवसर ना मिलने से हताश कुछ नौकरशाह इस टीम के संपर्क में हैं, जो इक्का दुक्का सरकारी अभिलेख इन तक पहुंचाते हैं, जिसके बल पर ये कुछ मंत्रियों की चार्जशीट लिए फिर रहे हैं। हालाकि मैं जानता हूं कि इन्हें मेरे सलाह की जरूरत नही है, लेकिन सच ये है कि अगर आंदोलन को वाकई एक  सही  दिशा देनी है तो कुछ और करना पड़ेगा। टीवी चैनल और मीडिया के बूते पर आंदोलन अधिक दिन तक टिका नहीं रह सकता। आज ये पूरा आंदोलन मीडिया संभाले हुए है। बातें गांधी की करते हैं, तो दो एक चीजें उनसे सीख भी लें, और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पदयात्रा करें। हर कोने से पदयात्रा निकालें जो एक जगह मिले। जमीन पर काम नहीं सीधे दिल्ली से टकराना आसान नहीं मूर्खता  है। आप जैसा अनशन चला रहे हैं चलाते रहिए, क्योंकि आपके अनशन पर जनता को ही भरोसा नहीं है तो सरकार को क्या होगा। सब यही चर्चा कर रहे हैं,  टीम अन्ना भोजन छाजन मस्ती से कर रही है।

चलिए ये तो रही बात कथित अनशन की। लेकिन जिस मांग को लेकर ये अनशन चल रहा है, वो मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है। पिछले तीन दिनों में अन्ना ने कई न्यूज चैनल से बात की। इस बात चीत में एक नई बात सामने  आई। अन्ना ने स्वीकार किया है कि अब उन्हें इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। इस लिए उनकी कोशिश होगी कि दो साल बाद होने वाले लोकसभा के चुनाव में देश भर में सच्चे और ईमानदार उम्मीदवार  को समर्थन दिया जाएगा। मतलब अब अन्ना देश की सियासत में भी अपनी भूमिका  तलाश रही है। वैसे तो इस टीम पर पहले ही आरोल लगा करता था कि ये जनलोकपाल और भ्रष्ट्राचार की आड़ में राजनीति कर रहे हैं और खासतौर पर इनके पीछे आरएसएस का हाथ है। बहरहाल इनके पीछे किसका हाथ है, ये तो टीम अन्ना ही जाने, लेकिन इतना तो साफ है कि कुछ ना कुछ तो छिपा एजेंडा जरूर है, जिस पर ये काम कर रहे हैं।

वैसे इस कथित अनशन से सरकार कनफ्यूज्ड है। मीडिया वाले जब किसी मंत्री से पूछते हैं कि आप अनशनकारियों से बात कब करेंगे ? मंत्री उल्टे सवाल पूछते हैं कि आप ही बताइये ये अनशनकारियों की मांग क्या है। बताया जाता है कि वैसे तो उनकी मांग जनलोकपाल है, लेकिन अभी वो 15  भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ जांच चाहते हैं। तब मंत्री का सवाल  होता है कि अब ये मांग बेचारे प्रधानमंत्री कैसे मान सकते हैं। उनकी सूची में प्रधानमंत्री भी शामिलि हैं, फिर तो उन्हें ये मांग सरकार से नहीं करनी चाहिए। जिसके खिलाफ आप अनशन कर रहे हैं, उसी से मांग पूरी करने को दबाव बना रहे हैं, ये तो सामाजिक न्याय के भी  खिलाफ है। मंत्री जी बात तो आपकी सही है, लेकिन आप ही बताएं उन्हें करना क्या चाहिए ? बोले अरे उनके यहां तो जाने माने वकील है, वो मंत्रियों के भ्रष्टाचार से संबंधित जो भी फाइलें हैं, वो लेकर सुप्रीम कोर्ट चले जाएं, जांच का आदेश करा लें।

बहरहाल सरकार और टीम अन्ना के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता रहेगा। ना सरकार कानून लाने वाली, ना टीम अन्ना आंदोलन खत्म करने वाली। अच्छा सरकार भी चाहती है कि ये आंदोलन चलता रहे, जिससे देशवासियों का ध्यान मुख्य समस्या से हटा रहे। टीम अन्ना भी चाहती है कि मांग पूरी ना हो, जिससे उनकी दुकान भी चलती रहे। दुश्यंत कुमार की दो लाइनें याद आ रही हैं..

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।