Showing posts with label अनशन. Show all posts
Showing posts with label अनशन. Show all posts

Tuesday, 14 August 2012

ये बाबा बड़बोला है ...

पांच दिन उपवास के बाद बाबा रामदेव आज बोरिया बिस्तर समेट कर हरिद्वार चले गए, लेकिन जाते जाते उन्होंने कहा कि उनकी जीत हुई है। अब ये पेंच फंसाकर वो तो दिल्ली से खिसक लिए, यहां लोग यही सोच रहे हैं अगर बाबा की जीत हुई है तो हार किसकी हुई, क्योंकि ये तो संभव ही नहीं है कि किसी के हारे बगैर किसी की जीत हो जाए। मैने जो देखा अगर उसके आधार पर आंदोलन को देखा जाए तो मैं कह सकता हूं कि अगर बाबा की जीत हुई है तो उनके चेलों की ही हार हुई होगी। आप कहेंगे वो कैसे ? मैं बताता हूं। बेचारे इतनी दूर से यहां आए थे कि बाबा कुछ बढिया बातें करेंगे, आंदोलन को और आगे कैसे ले जाएं इसका मंत्र देंगे, लेकिन ये क्या ? ना कोई नई बात, ना कोई मंत्र, ना कोई विजन बस पांचो दिन पागलपन, पागलपन और पागलपन। मैने एक आंदोलनकारी से पूछा आप यहां से क्या लेकर जा रहे हैं, बड़ा ही साधारण सा दिखने वाले इस आदमी ने कहा "कुच्छो नहीं, बस दू ढाई सौ सीडी ले जा रहे हैं।" मैने कहा सीडी ले जा रहे हैं ? बोला "हां हम आश्रम की दवाएं बेचते हैं, केवल उसके बिकने से पेट नहीं भरता है, तो सीडी वीडी भी बेच लेते हैं।"

हां एक नई बात मुझे जरूर दिखाई दी। इस बार बाबा थोड़ा नंगई पर उतारू दिखे। भाषा की मर्यादा की तो उन्हें कत्तई फिक्र थी ही नहीं। कहने लगे कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर उन्हें शर्म महसूस होती है और फर्जीवाड़े में फंसे अपने चेले बालकृष्ण पर उन्हें गर्व होता है। हैरानी तो इस बात की कि बालकृष्ण की तुलना वो शहीदों से करते रहे और कहा कि जेल जाना तो आंदोलनकारियों का सपना होता है। अरे बाबा कम से कम ऐसी बातें करो जिससे  लोगों में तुम्हारी विश्वसनीयता बनी रहे। अभी भी नहीं मान रहे हैं कि बालकृष्ण फर्जीवाडे में फंसा है। वो पढा लिखा नहीं है, गलत ढंग से खुद को आचार्य बता रहा है। गलत नागरिकता बताकर उसने ना सिर्फ पासपोर्ट हासिल किया है, बल्कि इसी पासपोर्ट से कई बार विदेशों की यात्रा भी की है, और अब उसी फर्जीवाड़े के पकड़े जाने के बाद वो जेल की सजा काट रहा है। सच तो ये है कि ऐसे आदमी से तो बाबा को अलग हो जाना चाहिए था, लेकिन कैसे अलग हो सकते हैं। कहावत है ना चोर- चोर मौसेरे भाई। दरअसल इसके पीछे कुछ दूसरे ही राज है। आपको पता होगा कि अगर बालकृष्ण चाहे तो रामदेव को पतंजलि आश्रम से बेदखल कर सकता है, क्योंक आश्रम, विश्वविद्यालय से लेकर सभी कंपनियां उसी के नाम से है। बस यही वजह है कि बालकृष्ण कितना बड़ा अपराध क्यों ना कर लें, बाबा उसका साथ नहीं छोड़ सकते।
 अब देखिए ना आंदोलन स्थल यानि रामलीला मैदान में तमाम ऐसे बैनर लगाए गए जिसमें शहीदे आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर समेत अन्य के चित्र छोटे थे और बीच में फर्जीवाडे में फंसे बालकृष्ण की तस्वीर और वो भी शहीदों से बड़ी साइज में लगा दी गई। इतना ही नहीं इसी बैनर में हत्या के आरोप में जेल जा चुके जयेन्द्र सरस्वती की तस्वीर भी लगाई गई थी। इस बैनर को जो भी देखता वही हैरान हो जाता था। सब को लगने लगा कि अब बाबा अपने चेले को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो रहे हैं। कुछ भी हो बालकृष्ण ने अपराध किया है और वो किसी राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन में जेल नहीं गया है, बल्कि फर्जीवाडा यानी 420 में जेल गया है। ऐसे में शहीदों की तरह सम्मान करना बचकानी हरकत है। लेकिन भाई बाबा की मजबूरी है, वो अपराधी ही क्यों ना हो, बाबा गले लगाए रखेंगे और ईमानदारी पर भाषण भी देंगे। बाबा को अपने इस दोहरे चरित्र पर शर्म नहीं आती, बालकृष्ण की पैरवी करने पर भी उन्हें शर्म नहीं आती, शर्म आती है मनमोहन सिंह पर।

वैसे इस बार बाबा डरे हुए थे। हालांकि उसकी वजह खुद बाबा है। पिछली बार दिल्ली की पुलिस ने बाबा को पीटा नहीं था, बस धक्का मुक्की कर उन्हें जीप में डाल दिया था। लेकिन बाबा ने पूरे देश में हल्ला मचाया कि पुलिस ने उन्हें खूब पीटा। इतना ही नहीं  उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पुलिस के जरिए उनकी हत्या कराना चाहती थी। बाबा ये अनाप शनाप बोल तो गए, अब एक बार फिर वो दिल्ली पुलिस के पास थे। रामदेव को खुद ये लग रहा था कि कही पुलिस वाले उनकी पिछली  गल्तियों का बदला ना लें और इस बार सच मे ही ना लठिया दें। यही वजह थी कि पहले तीन दिन बाबा सरकार के सामने याचक की भूमिका में थे। आप भी सुनिए क्या कहते थे बाबा.. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाधीं को पूज्यनीया माता जी और राहुल गांधी को आदरणीय भाई राहुल गांधी का संबोधन देकर अपने मंच पर आमंत्रित कर रहे थे। बार बार कहा कि वो यहां किसी पार्टी या सरकार के खिलाफ उपवास नहीं कर रहे हैं। सरकार बाबा के प्रति आक्रामक ना हो जाए, इसलिए पहले ही घोषणा कर दी कि इस बार उनका आंदोलन सांकेतिक है, इसलिए महज तीन दिन  उपवास रखा जाएगा। सरकार के करीब आने के लिए यहां तक कहा कि सरकार लोकपाल बिल पास करें और उसमें जो कमियां रह जाएंगी, उसे बाद में संशोधित कर लिया जाएगा। प्रधानमंत्री को अन्ना के सहयोगी बेईमान बता रहे थे, लेकिन रामदेव खुले मंच से उन्हें ईमानदारी का सर्टिफिकेट दे रहे थे।

इन सबके बावजूद कांग्रेस और सरकार ने तय कर लिया था कि रामदेव से बात करनी ही नहीं है, क्योंकि ये आदमी विश्वसनीय नहीं है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बातचीत मे बताया कि हम रामदेव के योग और उनके संत होने की वजह से उनका आदर करते थे। यही वजह है कि पहले आंदोलन के दौरान उनसे मिलने एयरपोर्ट पर प्रणव दा जैसे वरिष्ठ मंत्री भी गए। लेकिन ये  बाबा  दूसरे राजनीतिक दल और संगठन के लिए काम कर रहे हैं,लिहाजा इनसे बात करने का कोई मतलब ही नहीं है। तीन दिन तक लगातार बाबा अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से सरकार को लुभाने की कोशिश करते रहे, लेकिन सरकार ने तय कर लिया था कि इनसे कोई बात नहीं की जाएगी, इनसे जो भी बात होगी वो सिर्फ और सिर्फ पुलिस करेगी। वही हुआ भी, वर्दीधारी ही रामदेव के पास जाते रहे और उन्हें याद दिलाते रहते कि उन्हें पुलिस से किया हुआ वादा याद रखना चाहिए। दरअसल बाबा से जब कोई बात करने नहीं आया, तो बाबा को लगा कि देश को जवाब क्या दें, फिर उन्होंने माहौल थोड़ा गरमाने की साजिश रची और तय किया कि संसद का घेराव करने का ऐलान करते हैं। ये तय है कि पुलिस वहां तक जाने नहीं देगी और सभी को हिरासत में ले लिया जाएगा। जहां हिरासत में लिया जाएगा, हम वहीं धरना देखर बैठ जाएंगे और फिर शोर शराबे के बीच कार्यक्रम का समापन कर दिया जाएगा।

लिखी हुई स्क्रिप्ट की तरह कल सोमवार को बाबा लोगों के साथ संसद की ओर निकले, फिर रास्ते में रोक लिए गए और रामलीला मैदान से निकल कर अंबेडकर पार्क में आ गए। अब पार्क में भी उन्होंने पूरा माहौल खराब करने की कोशिश की, वो चाहते थे कि यहां भी हल्का फुल्का पुलिस सीन क्रिएट करे, इसके बाद यहां से रवानगी हो। पहले उन्होंने मांग रखी कि सभी आंदोलनकारियों को खाना और पानी दें। सवाल ये है कि हिरासत में लेने के आधे घंटे बाद जब पुलिस ने सभी को मुक्त कर दिया तो किस बात का खाना पानी ? फिर बाबा जी आप तो अनशन करने आए हो, आपकी मांग कालेधन को वापस लाने की है, लेकिन ये क्या सारी मांगे पीछे छोड़ आप खाना पानी की मांग पर अड़ गए। खैर पुलिस को ना देना था ना ही दिया गया। बाद में बाबा के चेलो ने ही कुछ इंतजाम किया, फिर भारी मच्छरों के बीच किसी तरह रात बीती।

आज सुबह बाबा पूरी तरह पटरी से उतरे नजर आए। वजह सरकार की ओर से पुलिस के अलावा कोई उनसे बात करने को तैयार ही नही था। एक मंत्री से तो जब पूछा गया कि रामदेव की मांग पर कोई विचार हो रहा है तो मंत्री ने उल्टा पत्रकारों से ही पूछा कौन रामदेव। आप समझ सकते हैं कि जब मंत्री ये पूछने लगे कि कौन रामदेव, तब ये जान लेना चाहिए कि सरकार इनसे कोई बात करने वाली नहीं है। जैसे जैसे समय बीत रहा था रामदेव की खिसियाहट बढ़ती जा रही थी,जो उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। जब उन्हें लगा कि कांग्रेस या फिर सरकार से कोई बात नहीं करने वाला तो उन्होंने सुर बदल लिया। अब उनकी पूज्यनीय सोनिया गांधी पूज्यनीय नहीं रह गईं। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री होने पर उन्हें शर्म आती है। फिर उन्होंने नारे लगवाए कि कांग्रेस हराओ और देश बचाओ। यानि अब ये बाबा पूरी तरह बेनकाब हो चुके थे, क्योंकि पहले दिन कह रहे थे कि वो किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है, फिर पल्टी कैसे मार गए। कहने लगे कि आज कालेधन पर सदन मे चर्चा हो जाए तो सरकार गिर जाएगी। अरे बाबा जैसा की आप दावा है कि आपके मुद्दे पर सभी आपके साथ हैं, तो वो खुद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को गिरा सकते हैं।
बडबोले बाबा यहीं नहीं रुके कहने लगे कि मैं अगर चाह लूं तो कल प्रधानमंत्री झंडा नहीं फहरा सकते। पता नहीं बाबा को किस बात पर इतना घमंड है। आजकल गोली तो बहुत कम चलानी पड़ती है,पुलिस की लाठी से ही बड़े से बडा आंदोलन टूट जाता है। अब बात स्व. लोकनायक जय प्रकाश की मत करने लगिएगा, क्योंकि लोकनायक बनने का माद्दा ना रामदेव में है और ना ही अन्ना में। ये आंदोलन के फुटकर दुकानदार है, फिर अन्ना ने जिस तरह से अपना आंदोलन खत्म किया है, उससे सामाजिक आंदोलनों को गहरा झटका लगा है। बहरहाल कुछ वैसा ही हाल रामदेव के आंदोलन का भी रहा। भन्नाए रामदेव ने कहा कि अब भूखे रह कर नहीं खा पीकर आंदोलन करेंगे। हाहाहहाहाह। कौन जाने आप भूखे थे खा पीकर आंदोलन कर रहे थे, कोई डाक्टरी जांच तो चल नहीं रही थी। बहरहाल रामदेव 2014 में कांग्रेस का विरोध करने का संकल्प लेकर यहां से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए, लेकिन सपोर्ट किसका करेंगे, ये पत्ते अभी नहीं खोले। वैसे रामदेव के मंच पर जिस तरह से बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी और शरद यादव दिखाई दिए, उससे इतना तो साफ है कि बाबा की पसंद एनडीए ही है। बहरहाल ये आंदोलन अब न सिर्फ भटक गया है, बल्कि बाबा के साथ आंदोलन भी पटरी से उतर गया है।

 
          

Tuesday, 7 August 2012

गांधीगिरी की आड़ में नेतागिरी ....


गांधीगिरी से नेतागिरी में कदम रखते ही अन्ना सियासी चाल चलने लगे हैं। अन्ना को पता है कि यहां अपनी चालों से ही शह-मात का खेल खेला जा सकता है। बस फिर क्या आज उन्होंने पहला झटका अपनी ही टीम को दिया, और मंजे हुए नेताओं की तरह अपने ब्लाग पर लोगों को जानकारी दी कि अब "टीम अन्ना" को भंग कर दिया गया है, टीम अन्ना नाम का इस्तेमाल भी आगे से नहीं किया जा सकता। इसकी वजह भी अन्ना ने अपने ब्लाग में साफ किया है। उन्होंने कहा कि है जनलोकपाल के लिए टीम अन्ना का गठन किया गया था। चूंकि अब जनलोकपाल की लड़ाई खत्म हो गई है, इसलिए टीम अन्ना का अस्तित्व भी खत्म हो जाना चाहिए। उन्होंने अपनी टीम से भी कहा है कि अब ये नाम खत्म समझा जाए और मीडिया से भी आग्रह किया है कि इस नाम का इस्तेमाल तत्काल बंद हो जाना चाहिए।

अन्ना की बात कुछ हद तक सही है, भाई जनलोकपाल के लिए टीम अन्ना बनी थी, अब जनलोकपाल का मुद्दा फिलहाल स्थगित या समझ लीजिए कि खत्म हो गया है, क्योंकि टीम ने रास्ता ही बदल कर अपना रुख राजनीति की ओर कर लिया है। चूंकि राजनीति तो अन्ना के अलावा बाकी लोग  ही करने वाले हैं, फिर ये नाम वाकई बेमानी है। चलिए अन्ना ने टीम अन्ना को भंग किया, ये ठीक है। लेकिन ये जानकारी उनके टीम के सदस्यों को भी उनके ब्लाग से हुई। किसी को पता नहीं था कि अन्ना ऐसा कदम उठाने जा रहे हैं। अन्ना के इस कदम से कई सवाल उठ रहे हैं। क्या अन्ना टीम के सदस्यों से संतुष्ट नहीं हैं ? क्या अन्ना को लग रहा था कि टीम अन्ना के नाम का दुरुपयोग किया जा रहा है ? क्या उन्हें लग रहा था कि टीम अन्ना के नाम पर कुछ लोग गलतबयानी कर रहे हैं ? बहरहाल सवाल तो खड़ा होगा ही क्योंकि अन्ना ने किया ही कुछ ऐसा है। अच्छा अन्ना ने टीम को भंग करने की घोषणा तो कर दी, लेकिन उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया कि वो जल्दी ही अपने राजनीतिक दल का ऐलान करने जा रहे हैं या फिर विकल्प की कोई ठोस रुपरेखा पेश करने वाले हैं।

अन्ना ने ब्लाग में इस मसले पर सिर्फ इतना कहाकि ‘‘ मैने संसद मे अच्छे लोगों को भेजने के लिए विकल्प दिया है। लेकिन मैं किसी पार्टी का हिस्सा नहीं बनूंगा और ना ही मैं चुनाव लडूंगा। सबसे बड़ी बात जो अन्ना ने की है वो ये कि जनलोकपाल बन जाने के बाद मैं वापस महाराष्ट्र चला जाऊंगा और अपनी गतिविधियों में संलग्न हो जाऊंगा। अच्छा अन्ना ने अपनी यहां सफाई भी दी है कि मैने पार्टी बनाने वाले लोगों को साफ कर दिया है कि भले राजनीतिक दल बन जाए, लेकिन ये आंदोलन चलते रहना चाहिए। आंदोलन में पहले हमने जनलोकपाल की मांग की थी ओर अब इस आंदोलन को जीवित रखने के लिए लोगों की मदद से अच्छे व्यक्तियों को संसद में भेजा जाना चाहिए,  जिससे कानून बनाना आसान हो जाए। अन्ना ने ब्लाग के जरिए सारी बातें की, लेकिन इशारों इशारों में। मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि अन्ना ने आखिर ये बात क्यों कही कि वो जनलोकपाल बिल के बाद वापस महाराष्ट्र चले जाएंगे। क्या वो दिल्ली में खुद को ठगा सा महसूस कर रहे थे ?

अन्ना सच में दिल्ली में खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि उनके  नाम पर ही यहां भीड़ जमा होती है, उनके ही नाम से करोड़ो रुपये जमा हो रहे हैं, आंदोलन की साख मेरे नाम से ही है, जबकि टीम में दूसरे जितने लोग भी अग्रिम पंक्ति में हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल, किरन बेदी, प्रशांत भूषण समेत और लोग कहीं ना कहीं विवादित हैं। अन्ना को लगता है कि इस आंदोलन से उनकी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाया गया, और अब बात इतनी आगे बढ़ गई है कि वापस लौटने पर उनकी ही किरकिरी होगी। लिहाजा अन्ना ने मौका देखते ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी और साफ कर दिया कि अब टीम अन्ना नाम का अस्तित्व में रहना ठीक नहीं है क्योंकि जिस मकसद को लेकर ये टीम बनी थी अब मकसद खत्म हो गया है। बहरहाल अन्ना के मन में क्या है वो तो वही जानें, लेकिन जिस तरह से उन्होंने ब्लाग के जरिए टीम को भंग किया है, उससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। खासतौर पर टीम अन्ना की भूमिका को लेकर।

अब एक सवाल जनता की ओर से... देश भर से लोगों ने इंडिया अगेंस्ट करप्सन को करोडों रुपये का चंदा दिया। लोगों ने जो चंदा दिया वो अरविंद केजरीवाल को राजनीति करने के लिए नहीं दिया है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में मदद करने के लिए दिया है। ऐसे में ईमानदारी तो यही कहती है कि सभी के पैसे वापस कर दिए जाएं। वैसे भी केजरीवाल ईमानदारी की बहुत बड़ी बड़ी बातें करते हैं, उन्हें तो राजनीति में इसका एक पैसा भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अच्छा ये तो ईमानदारी का दावा करते हैं, इसलिए ऐसा भी नहीं कि इन्होंने चंदा गलत तरीके से लिया होगा, केजरीवाल तो हिसाब किताब के मास्टर हैं,   हमेशा दूसरों से पैसे का हिसाब मांगते रहते हैं फिर उन्हे तो पता होगा ना कि किसने कितना पैसा दिया है। ऐसे में भाई केजरीवाल साहब जनता से पूछ लो कि क्या वो भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने वाले पैसे का इस्तेमाल राजनीति मे इस्तेमाल करने की इजाजत देते भी हैं या नही। अगर नहीं तो उनके पैसे वापस करने का इंतजाम करना चाहिए।

चलिए अब कुछ खरी खरी बातें कर ली जाए। आखिर अन्ना को टीम भंग करने जैसा ऐलान अचानक क्यों करना पड़ा ? क्या अन्ना अपनी ही टीम में खुद को बेगाना महसूस कर रहे थे? क्या अन्ना किसी मजबूरी में टीम के साथ थे ? क्या अन्ना टीम के सदस्यों की कारगुजारी से खुश नहीं थे ? क्या अन्ना अपनी टीम से एक के बाद एक सदस्यों के टीम छोड़ने से दुखी थे ? क्या अन्ना को लग रहा था कि टीम मे सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है ? क्या अन्ना को भी लगने लगा था कि पैसों का हिसाब किताब ठीक से नहीं रखा जा रहा है? सबसे बड़ी बात क्या अन्ना किसी मजबूरी  में टीम के साथ थे ? ये तमाम ऐसे सवाल है जिसका जवाब अब टीम के सदस्यों को देना होगा, क्योंकि अगर ऐसा नहीं था तो अन्ना ने अपने ही साथियों को टीम भंग करने के पहले भरोसे में क्यों नहीं लिया। बहरहाल दिल्ली मे सदस्यों ने मीटिंग कर राजनीतिक पार्टी के सिलसिले में एक प्रीपेशन कमेटी ( तेयारी समिति) गठित कर झेंप मिटाने की कोशिश की है।

वैसे मैने पहले ही इस बारे में सभी को आगाह करने की कोशिश की थी। मैने ये भी बताने की कोशिश की थी अन्ना भी उतने पाक साफ नहीं है। अन्ना हमेशा चरित्र, निष्कलंक जीवन, ईमानदारी के साथ ना जाने किन किन बातों पर जोर देते हैं। लेकिन मै चाहता हूं कि खुद अन्ना ही बताएं कि मुंबई प्रवास के दौरान क्या क्या हुआ। जब वो सिनेमा हाल के बाहर टिकट ब्लैक किया करते थे, जब वो मंदिर के बाहर फूल बेचते थे। उस दौरान क्या क्या हुआ ? ये सारे वाकये खुद अन्ना ही बताएं तो ज्यादा बेहतर है। सेना से अचानक वापस  लौटने पर उन्हें गांव में कैसे शरण मिली, परिवार  के प्रति उनका व्यवहार कैसा रहा, मंदिर मे उन्हें ठिकाना लेने के लिए क्यों  मजबूर होना पड़ा,  महाराष्ट्र पुलिस क्यों उनके पीछे लगी  रही, आर आर पाटिल ने उनकी किस तरह मदद की? इन तमाम सवालों  का जवाब खुद अन्ना दें तो ज्यादा बेहतर है।

चलिए अभी तो दिल्ली की  टीम से अन्ना ने किनारा करने का संकेत दिया है। लेकिन सच ये है कि आने वाले समय मे ये टीम बेनकाब होगी तो सामाजिक आंदोलनों को बहुत ठेस लगने वाला है। जब पता चलेगा कि इस आंदोलन के पीछे किन लोगों का हाथ था, आंदोलन के लिए विदेश की कौन कौन सी संस्थाओं ने फंडिंग किया है। आंदोलन को खड़ा करने में देश के लोगों ने कितना चंदा दिया है और उसका कैसे इस टीम ने दुरुपयोग किया है। ये सारी बातें छिपने वाली नहीं है। मित्रों शायद अब आपको भरोसा हो जाए की बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की ईमारत नहीं खड़ी हो सकती। अब देखिए ना अन्ना गांधीगिरी करते रहे, हम अन्नागिरी में बिजी रहे और टीम नेतागिरी की राह तलाश रही थी।

टूट चुके हैं रामदेव ....

सच तो ये है कि रामदेव को अगर पहले पता होता कि आंदोलन का उन्हें ये खामियाजा भुगतना पड़ सकता है तो शायद वो अपनी दुनिया में मस्त रहते। इस पचड़े में कत्तई ना पड़ते। देखिए ना बेचारे विदेश में आयरलैंड का आनंद भी नहीं उठा पा रहे हैं। वैसे रामदेव को लग रहा था कि देश विदेश में उनके इतने समर्थक हैं,  ये सब देखकर सरकार की सांसे फूल जाएंगी और सरकार उनके आगे अनुलोम विलोम करने लगेगी, लेकिन सरकार ने तो रामदेव और उनके चेलों से सीधे मुंह बात करने के बजाए पुलिस से लाठी ठुकवा दी।

अब सरकार रामदेव के अभिन्न बालकृष्ण को अपने पाले में करने की साजिश कर रही है। रामदेव हमेशा दावा करते रहे हैं कि उनके नाम पर तो कुछ भी नहीं है, इसी बूते पर वो केंद्र सरकार को चुनौती दे रहे थे, लिहाजा अब जेल में बंद बालकृष्ण को सरकार इतना टार्चर करेगी की वो सरकारी गवाह बन जाएं और रामदेव के काले कारनामों का चिट्ठा खोले। अगर बालकृष्ण ने ऐसा करने से इंकार किया तो जाहिर है उन्हे नेपाली टोपी पहना कर देश निकाला करने का रास्ता तैयार किया जाएगा। वैसे मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बालकृष्ण डरपोक है, वो टूट जाएगा। वैसे भी पतंजलि आश्रम में रामदेव के अलावा उसने बहुत सारे लोगों को अपना दुश्मन बना रखा है। ऐसे में बालकृष्ण ज्यादा दबाव झेलने की स्थिति मे नहीं होंगा। जब सीबीआई उसे बताएगी कि उसने जो अपराध किया है उसकी सजा क्या है, जेल में ही चक्की पीसनी पड़ सकती है, तो उसके सामने विकल्प चुनना होगा कि  वो आराम  पतंजलि मे रहना चाहते है या फिर जेल में चक्की पीसेगें।

खैर अन्ना ने जिस तरह अनशन को खत्म किया है, उससे रामदेव पर भी दबाव बन गया है। रामदेव को पता है कि अब सरकार उनसे बात तो करने वाली नहीं है, क्योंकि अन्ना से बात न करके सरकार ने देख लिया कि थोड़ा बहुत हो हल्ला के अलावा कुछ नहीं होने वाला। मीडिया के साथ जिस तरह से अन्ना के चेलों ने गाली गलौच किया है, उससे अब मीडिया भी समझ गई है, इन्हें ज्यादा तवज्जो देने का कोई मतलब नहीं है। बहरहाल आगे आगे देखिए होता है क्या.....  

Thursday, 2 August 2012

अधूरी क्रांति की खलनायक टीम अन्ना ....


टीम अन्ना को लेकर आज बहुत सारी बातें करनी हैं, लेकिन इसकी शुरुआत करते हैं अनशन खत्म करने के ऐलान से। अनशन शुरू करने के पहले तो टीम अन्ना बड़ी बड़ी बातें कर रही थी, अन्ना और उनके साथी जान देने की बात कर रहे थे, फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक अनशन खत्म करने का ऐलान करना पड़ा। अब मंच से भले दावा किया जा रहा हो कि देश के 23 वरिष्ठ लोगों ने उनसे आग्रह किया कि अनशन से कुछ नहीं होगा, उनकी जान कीमती है, इसलिए अनशन खत्म कर दें और टीम अन्ना ने बैठक की और आपस मे ही निर्णय ले लिया कि कल यानि तीन अगस्त को पांच बजे अनशन खत्म कर दिया जाएगा। सवाल ये उठता है कि अचानक आंदोलन खत्म करने की बात कहां से शुरू हो गई ? अब जिन लोगों ने अनशन खत्म  करने की अपील की, टीम अन्ना ने उनसे पूछ कर तो अनशन शुरू नहीं किया था, फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि अनशन खत्म करने का ऐलान करना पड़ा?

सच ये है कि पहली बार सरकार ने थोड़ा बुद्धिमानी से काम लिया। अनशन की अनुमति मांगी, अनुमति दे दी गई। अनुमति के लिए दिए गए हलफनामें में जो वादा अन्ना टीम ने किया था, वो उसे तोड़ रहे थे। इस पर सरकार ने खुद कुछ कहने के बजाए, पुलिस को आगे किया और कहा कि जहां कहीं भी कानून की अवहेलना हो तो पुलिस ही उससे निपटे। पुलिस के लिए इस आंदोलन से निपटने की चुनौती थी। इस बीच नवनियुक्त गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने सीधे तौर पर भले ही कुछ ना कहा हो, परंतु उन्होंने टीम अन्ना को उनकी लक्ष्मण रेखा की याद इशारों इशारों में जरूर दिला दी। इससे पुलिस को भी बल मिला और पुलिस मुख्यालय पर लगातार बैठकें होने लगीं, और सरकार खामोश रही। पुलिस कार्रवाई की आशंका ने टीम अन्ना को बुरी तरह हिला कर रख दिया। उन्हें मीडिया के कुछ साथियों और सरकारी तंत्र के जरिए सूचना मिलने लगी कि पुलिस कभी भी एक्शन में आ सकती है। उन्हें याद दिलाया गया कि रामलीला मे मैदान में रामदेव के साथ तो रात में हजारों लोग होते थे, फिर भी पुलिस ने उन्हें ठिकाने लगा दिया, यहां तो रात में गिने चुने लोग ही होते हैं। ऐसे में पुलिस कार्रवाई टीम अन्ना को मंहगी पड़ सकती है।

बहरहाल जिस तरह से इस अनशन को खत्म करने का निर्णय लिया गया, इससे टीम अन्ना की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। टीम अन्ना कल तक कुछ लोगों के लिए भले ही हीरो रही हो, पर आज देश के सामने उसकी इमेज एक खलनायक की बन गई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे आंदोलन को देशवासियों ने भरपूर समर्थन दिया, इस मुद्दे पर मिल रहे समर्थन से टीम अन्ना बहक गई, टीम के सदस्यों को लगने लगा कि ये समर्थन मुद्दे को नहीं बल्कि उन्हें मिल रहा है। ऐसे में उनका बेलगाम होना स्वाभाविक था। सरकार से तो वो दो-दो हाथ पहले से कर रहे थे, फिर उन्होंने विपक्ष की ईमानदारी पर भी सवाल खड़े करने शुरू किए, चलिए यहां तक सब ठीक था। पर अब ये इतने बिगड़ैल हो गए है, जिस मीडिया ने इनका पूरा आंदोलन खड़ा किए, अब ये उसी मीडिया पर हमला कराने लगे। इन्होंने देखा कि अब मीडिया भी इस आंदोलन से किनारा कर रही है, ऐसे में पुलिस कार्रवाई हुई तो पूरा आंदोलन तितर बितर हो जाएगा। लिहाजा पीछे हट जाना ही बेहतर है।

हां एक बात और....। जब इतना बड़ा आंदोलन चल रहा हो और उसमें आंदोलन की अगुवाई करने वालों की विश्वसनीयता पर उंगली उठने लगे, तब समझ लेना चाहिए आंदोलन की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अरविंद केजरीवाल के साथ ही दो अन्य लोगों पर आरोप लगा कि इनके अनशन में ईमानदारी नहीं है यानि ये सभी अनशनकारी मंच के पीछे बने कैंप में खाते पीते रहते हैं। ये चर्चा जब ज्यादा होने लगी तो मीडिया ने अरविंद से कैमरे के सामने पूछ भी लिया कि आपके अनशन में ईमानदारी नहीं है। इस सवाल पर केजरीवाल भी थोड़ा असहज हो गए, पर बाद में उन्होंने बात को संभालते हुए कहा कि हां डाक्टर भी कह रहे हैं कि उनकी मेडिकल साइंस हमारे अनशन को लेकर फेल हो गई है। बहरहाल देखा गया कि जब से ये बात शुरू हुई, उसके अगले ही दिन से खबर दी जाने लगी कि अनशनकारियों की तबियत बिगड़ रही है और इस आंदोलन को अचानक विराम देने का फैसला सुना दिया गया। बहरहाल ये आंदोलन जिस तरह खत्म हुआ है, इससे देश को दो बड़ा नुकसान हुआ है। एक तो भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में बने माहौल पर पानी फिर गया दूसरे अब ऐसा आंदोलन खड़ा करना आसान नहीं होगा। दूसरे लोग सड़क पर उतरने के पहले सौ बार सोचेंगे।

वैसे अगर आप इस आंदोलन को शुरू से देखें तो लगातार इस पर आरोप लगता रहा है कि इनके आंदोलन के पीछे कुछ छिपा एजेंडा है। ये बात आज साबित हो गई। अन्ना ने राजनीतिक विकल्प देने का ऐलान कर दिया। सच तो ये है कि टीम अन्ना राजनीतिक एजेंडे पर शुरू से ही काम कर रही थी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि शुरु में इस आंदोलन की बुनियाद आरएसएस ने ही रखी। बाद में जब टीन अन्ना की छीछालेदर होने लगी कि तो टीम अन्ना ने संघ से दूरी बनानी शुरू की। इस दूरी के बाद सच कहा जाए तो आंदोलन अपने रास्ते से भटक गया। टीम के हर सदस्य की राय अलग अलग हो गई। हर मुद्दे पर आंदोलन भटकता नजर आने लगा। टीम के सदस्यों में दूरी ही नहीं मतभेद की खबरें आम हो गईं। बाबा रामदेव के मुद्दे पर तो टीम अन्ना पूरी तरह बिखर सी गई थी। सबकी अलग अलग राय सामने आ रही थी। बहरहाल टीम अन्ना को इस बात पर भी मंथन करना चाहिए कि आंदोलन से एक एक करके तमाम लोग उनका साथ क्यों छोड़ गए ?

अगर मुझसे कोई इस बात का जवाब मांगे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इसका सिर्फ एक कारण है और वो है अरविंद केजरीवाल का अहम, अरविंद केजरवाल की बदजुबानी, अरविंद केजरीवाल का निरंकुश आचरण, अरविंद केजरीवाल की मनमानी, केजरीवाल का बड़बोलापन और सबसे बड़ा उनका घमंड। बातचीत का तौर तरीका भी ऐसा कि उनसे लोग बात करने से भी परहेज ही करते रहे। अरविंद की जगह कोई और होता, जिसमें सहनशीलता और दूसरों के साथ अच्छा सूलूक करने की कला होती, तो शायद जनलोकपाल बिल पास भी हो जाता। इनके अनैतिक  रवैये के कारण सरकार के मंत्री इनसे बात करने से ही कतराने लगे। अरविंद एक बात बार- बार दुहराते हैं कि संसद में 160 दागी सांसद बैठे हैं। ये बात बिल्कुल सही है कि इस  संसद में 160 दागी हैं। लेकिन अरविंद के पास इस बात का क्या जवाब है कि इन सांसदों ने चुनाव के पहले अपने नामांकन पत्र में साफ कर दिया कि उनके ऊपर कौन कौन से मामले विचाराधीन है। इसके बाद भी जनता ने उन्हें चुना है। अब आप उसी बात को बार बार दुहराते है, इसका मतलब क्या है ? क्या आपको देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा नहीं है। मैं दावे के साथ कह सकता हू कि आज अन्ना अगर मुंबई में रहने के दौरान उन पर लगे आरोपों के बारे में लोगों को सच सच बता दें, तो जनता की नजरों से गिर जाएंगे, उनके साथ लोग बिल्कुल खड़े नहीं हो सकते। खैर.. आपने इतना बड़ा आंदोलन चलाया, चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में तमाम जिलों मे दौरा कर सभाएं की,  लोगों को बताने की कोशिश की कि दागी और भ्रष्ट उम्मीदवारों से दूरी बनाएं। क्या उत्तर प्रदेश मे दागी चुनकर नहीं आए ? मुझे तो लगता है कि टीम अन्ना का मकसद भी कोई बहुत बड़ा बदलाव लाने का नहीं है, वो महज सक्रिय राजनीति में अपना दाखिला भर चाहते हैं।

आज जब मंच से अन्ना और केजरीवाल ने इशारों-इशारों में राजनीति में आऩे का ऐलान किया तो मुझे हंसी आ रही थी, मैं सोच रहा था कि ये अभी तक क्या कर रहे थे। क्या ये राजनीति नहीं कर रहे थे ? चुनावी मैदान में एक राजनीतिक दल की तरह सभाएं करते रहे। हरियाणा में तो कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ ना जाने कितनी सभाएं की गईं। राजनीतिक दलों के काम को अच्छा बुरा बताते रहे। अब कौन सी राजनीति करेंगे ये, भाई यही तो राजनीति है। बहरहाल टीम अन्ना और कांग्रेस के बीच जो लड़ाई चल रही थी, उसमें टीम अन्ना लोकपाल बिल मांग रही थी, कांग्रेस कह रही थी कि आप चुनाव जीत कर आएं और अपने मनमाफिक बिल बना लें। खैर टीम अन्ना को बिल तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने राजनीति में आने का लगभग फैसला कर लिया, जो मांग उनसे कांग्रेस लगातार कर रही थी। ऐसे में अगर हार जीत की बात की जाए, तो निश्चित ही इसमें कांग्रेस की जीत  हुई है।

हां एक बात अन्ना की भी कर ली जाए। अन्ना बार बार कहते हैं कि वो भीतर नहीं जाएंगे, मतलब संसद में नहीं जाएंगे। मैं अन्ना के गांव रालेगनसिद्धी हो आया हूं और मैं चुनौती देता हूं कि अन्ना लोकसभा, विधानसभा चुनाव तो दूर अपने गांव में प्रधान का चुनाव जीत कर दिखाएं। इनका गांव ही नहीं बल्कि आसपास का पूरा इलाका एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार का समर्थक है और यहां से उन्हीं की पार्टी की अक्सर जीत होती है। ऐसे में अन्ना वहां अपने ही गांव से चुनाव नहीं जीत सकते। यही वजह है कि जब भी चुनाव की बात होती है, अन्ना पहले ही हाथ खड़े कर देते हैं कि वो अंदर नहीं जाएंगे। अच्छा कई बार उनकी बातों से हंसी आती है, राष्ट्रपति के चुनाव के पहले उन्होंने कहा कि वो राष्ट्रपति बनने के इच्छुक नहीं हैं। अब सवाल ये उठता है कि उन्हें राष्ट्रपति बना कौन रहा था ? कांग्रेस ने या फिर बीजेपी किसी ने उन्हें उम्मीदवार बनाने की बात की थी क्या ? फिर अन्ना जी मेरा ये मानना है कि राष्ट्रपति को कम से कम पढा लिखा तो होना ही चाहिए। आप क्यों बेवजह हर जगह अपना नाम लेने लगते हैं, जबकि कोई आपको पूछता तक नहीं है।

बहरहाल भ्रष्टाचार की इस लड़ाई से जिस तरह टीम अन्ना पीछे हटी है, उससे सामाजिक  आंदोलनों  को झटका लगा है। आज टीवी चैनलों पर बहस के दौरान कांग्रेस नेता बहुत उत्साह के साथ बात करते नजर आए। अब तो सबसे बड़ी मुश्किल होगी बाबा रामदेव के साथ। कालेधन पर रामदेव का अनशन नौ अगस्त से शुरू हो रहा है, अन्ना टीम के पीछे हटने सरकार को ताकत मिली है। सरकार को लग रहा है कि आंदोलनकारियों से बातचीत का कोई मतलब नहीं है। बात करने से इनका दिमाग सातवें आसमान पर होता है। लिहाजा इनसे बात करने का कोई मतलब ही नहीं है। टीम अन्ना ने देश को इस हालात में पहुंचा दिया कि अब यहां सामाजिक आंदोलन करने के पहले लोगों को सौ बार सोचना होगा। आखिर में टीम अन्ना को सिर्फ एक सलाह...

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए
औरन को शीतल करे,आपहूं शीतल होए।



Sunday, 29 July 2012

दिल्ली : जंतर मंतर से live ...


जंतर-मंतर पर भव्य मंच तो सजाया गया है इसलिए कि लोगों को बताया जाए कि भ्रष्टाचार के चलते देश कहां पहुंच गया है, लेकिन पांच दिन से देख रहा हूं यहां भ्रष्टाचार की तो बात ही नहीं हो रही है, बात महज भीड़ की हो रही है। सबको चिंता इसी बात की है कि भीड़ कहां गायब हो गई। अच्छा मैं हैरान इस बात से हूं कि जो लोग इनके आंदोलन को समर्थन कर रहे हैं, टीम अन्ना  उन्हें "भीड़" कहती है। ये सुनकर मैं वाकई हैरान हूं। बहरहाल जंतर मंतर पर एक बार फिर लोग जमा हैं, उनका दावा है कि वो खाना नहीं खा रहे हैं। कह रहे हैं तो झूठ नहीं बोलेंगे, नहीं खा रहे होंगे। लेकिन एक बात आज तक मेरी समझ में नही आती है कि जो लोग भूख हड़ताल कर रहे हैं, वो सरकारी डाक्टर से जांच कराने से क्यों कतराते हैं, क्यों सरकारी डाक्टर को वापस लौटा कर निजी चिकित्सक की मदद लेते हैं। वैसे मुझे उम्मीद है कि आमरण अनशन कैसे होता है, इसके क्या तरीके हैं, ये आपको पता होगा, लेकिन संक्षेप में मैं इसलिए जिक्र कर देना चाहता हूं जिससे अगर किसी को कोई संदेह हो तो वो दूर हो जाए।

आमरण अनशन पर बैठने के लिए पहले आपको इसकी सूचना स्थानीय प्रशासन को देनी होती है, जिसमें उन मांगो का जिक्र करना होता है, जिसके लिए आप अनशन के लिए मजबूर हुए। इस सूचना पर स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वो वहां अपेक्षित संख्या में पुलिस की ड्यूटी के साथ ही एक चिकित्सक की तैनाती करे, जिससे अनशन पर बैठे व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रोजाना जानकारी प्रशासन को मिलती रहे। अब चिकित्सकों का दल जब अरविंद, मनीष और गोपाल के स्वास्थ्य की जांच करने पहुंचा, तो इन लोगों ने डाक्टरों के दल को वापस भेज दिया। चूंकि ये टीम बदजुबान के साथ बद्तमीज भी होती जा रही है, इसे पता ही नहीं है कि डाक्टर आपकी मदद के लिए  हैं और उनकी रिपोर्ट मायने रखती है।

आपको याद होगा कि पिछली बार अन्ना ने 13 दिन से ज्यादा अनशन किया और उसके बाद जब अनशन खत्म हुआ तो लालू यादव जैसे लोगों ने उनके अनशन पर ही सवाल खड़े कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले इस बात की जांच हो कि अन्ना बिना खाए पीए 13 दिन रह कैसे गए ? उनके कहने का मकसद साफ था कि सरकारी डाक्टरों ने तो इनके स्वास्थ्य का परीक्षण किया नहीं और निजी चिकित्सक की बात का कोई मतलब नहीं है। इसी का फायदा उठाते हुए लालू ने तो यहां तक कहा कि बाबा रामदेव नौ दिन अनशन नहीं कर पाए, उनकी सांस टूटने लगी, जबकि वो तो व्यायाम वगैरह भी करते हैं,  तब  अन्ना 13 दिन कैसे भूखे रह सकते हैं ? ये सवाल उठाया गया और इसका किसी के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। यही सब इस बार भी हो रहा है, निजी चिकित्सकों ने पहले ही दिन कहा कि अरविंद को शूगर है और उनकी तबियत बिगड़ गई है, जबकि तीन दिन बाद कहा गया कि वो सामान्य हैं। ऐसी मेडिकल रिपोर्ट भी बेमानी है, क्योंकि ये विश्वसनीय नहीं रही।
सच तो ये है कि अनशनस्थल के पीछे बने कैंप में बहुत ज्यादा समय अरविंद, मनीष और गोपाल बिताते हैं।  इसलिए वहां भी ज्यादातर लोग यही चर्चा कर रहे हैं कि ये आमरण अनशन कई साल चल सकता है, क्योंकि सब कुछ ना कुछ खा पी रहे हैं, वरना छठें दिन तो हालत पतली हो ही जाती है, जबकि अनशनकारी पहले से ज्यादा टनाटन नजर आ रहे हैं। अच्छा मीडिया भी अनशनकारियों से ये सवाल पूछ रही है कि जनता को आपके अनशन पर भरोसा नहीं रहा,  उसे लगता है कि आप खा पी रहे हैं।  बहरहाल सच तो अनशनकारी ही बता सकते हैं, लेकिन जब सभी स्वस्थ हैं तो सरकार भी मस्त है, चलो खाते पीते रहो, कोई दिक्कत नहीं। इसलिए अब इसे कथित अनशन कहना ज्यादा ठीक होगा, क्योंकि ये खा रहे हैं या नहीं खा रहे हैं, इस बारे में भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

बहरहाल कथित अनशन का आज पांचवा दिन है, इन पांच दिनों में मंच से या फिर टीवी पर चर्चा क्या हो रही है आपको पता है ? चर्चा ये हो रही है कि आज  भीड़ आई , कल नहीं आई थी। इसकी क्या वजह है। चैनलों के रिपोर्टर बताते हैं कि पहले दो दिन बहुत गर्मी थी,  शनिवार और रविवार को छुट्टी के साथ ही मौसम बहुत सुहाना हो गया, लिहाजा बड़ी संख्या में लोग यहां जुटे।  मतलब भ्रष्ट्राचार का मुद्दा खत्म हो कर  मुद्दा भीड़ में बदल गया है। पांच दिन से सिर्फ यही एक बात हो रही है। कहा जा रहा है कि पहले तीन दिन तो सौ दो सौ लोग ही यहां थे। एक दिन बाबा रामदेव समर्थन देने आए तो उनके साथ हजार बारह सौ लोग आए, लेकिन वो भी रामदेव के जाते ही खिसक गए। फिर कथित अनशन  का कामयाब बनाने के लिए भगवान ने मदद की। यहां बारिश नहीं  हुई, लेकिन पूरे दिन काले बादल से मौसम थोड़ा खुशनुमा हो गया और सबसे बड़ी बात शनिवार और रविवार की छुट्टी हो गई। तो लोग वीकेड  इन्ज्वाय करने पहुंच गए जंतर मंतर।
वैसे यहां आने पर लोग मायूस हुए, लोगों को उम्मीद थी कि जिस तरह रामलीला मैदान में अनशन के दौरान देशी घी की पूड़ी कचौड़ी का फ्री में इंतजाम था, वैसा कुछ इस बार भी  होगा, पर यहां इस बार ऐसा कुछ नहीं, लिहाजा लोग यहां आए और कुछ देर तमाशा देख कर खिसक गए कनाट प्लेस की ओर। वैसे इस कथित अनशन से एक बात और साफ हो गई जो कुछ साख बची है वो सिर्फ अन्ना हजारे की है। क्योंकि जब तक अरविंद की अगुवाई  में ये शोर शराबा चल रहा था तो यहां गिने चुने लोग ही मौजूद थे। लेकिन रविवार को जब अन्ना इस अनशन मे शामिल हुए तो जरूर कुछ  लोग घर से निकले और जंतर मंतर पहुंचे। अन्ना की वजह से ये आंदोलन शांतिपूर्ण  है, वरना इस अनशन में जिस तरह उपद्रवी शामिल हैं,  ये तो दूसरे ही दिन पिट पिटाकर कुछ जेल चले जाते और बाकी घर में दुबक कर बैठ जाते। मंच से कुमार विश्वास जिस तरह से अनर्गल बातें कर माहौल खराब कर रहे हैं,  उससे भी आंदोलन पर खराब असर पड़ रहा है।

आप खुद भी देखें जंतर मंतर पर लगे मजमें कुछ नया भी नही है। अन्ना दो साल  से एक ही बात जनता को समझा रहे हैं कि वो देश के मालिक है और संसद में बैठे लोग सेवक है। हंसी आती है उनकी बात सुनकर..। अरे अन्ना जी ये बात तो हम सब जानते है, पर हम कैसे मालिक हैं ये आप भी जानते हो। टीम अन्ना की बात करें तो वो अब बातों से हार कर गाली गलौच पर उतर आई हैं। दरअसल हर जगह कुछ ऐसे लोग होते हैं जो संतुष्ट नहीं होते। ऐसी ही एक बड़ी संख्या नौकरशाहों में है। सिस्टम से असंतुष्ट कहें, या अवसर ना मिलने से हताश कुछ नौकरशाह इस टीम के संपर्क में हैं, जो इक्का दुक्का सरकारी अभिलेख इन तक पहुंचाते हैं, जिसके बल पर ये कुछ मंत्रियों की चार्जशीट लिए फिर रहे हैं। हालाकि मैं जानता हूं कि इन्हें मेरे सलाह की जरूरत नही है, लेकिन सच ये है कि अगर आंदोलन को वाकई एक  सही  दिशा देनी है तो कुछ और करना पड़ेगा। टीवी चैनल और मीडिया के बूते पर आंदोलन अधिक दिन तक टिका नहीं रह सकता। आज ये पूरा आंदोलन मीडिया संभाले हुए है। बातें गांधी की करते हैं, तो दो एक चीजें उनसे सीख भी लें, और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पदयात्रा करें। हर कोने से पदयात्रा निकालें जो एक जगह मिले। जमीन पर काम नहीं सीधे दिल्ली से टकराना आसान नहीं मूर्खता  है। आप जैसा अनशन चला रहे हैं चलाते रहिए, क्योंकि आपके अनशन पर जनता को ही भरोसा नहीं है तो सरकार को क्या होगा। सब यही चर्चा कर रहे हैं,  टीम अन्ना भोजन छाजन मस्ती से कर रही है।

चलिए ये तो रही बात कथित अनशन की। लेकिन जिस मांग को लेकर ये अनशन चल रहा है, वो मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है। पिछले तीन दिनों में अन्ना ने कई न्यूज चैनल से बात की। इस बात चीत में एक नई बात सामने  आई। अन्ना ने स्वीकार किया है कि अब उन्हें इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। इस लिए उनकी कोशिश होगी कि दो साल बाद होने वाले लोकसभा के चुनाव में देश भर में सच्चे और ईमानदार उम्मीदवार  को समर्थन दिया जाएगा। मतलब अब अन्ना देश की सियासत में भी अपनी भूमिका  तलाश रही है। वैसे तो इस टीम पर पहले ही आरोल लगा करता था कि ये जनलोकपाल और भ्रष्ट्राचार की आड़ में राजनीति कर रहे हैं और खासतौर पर इनके पीछे आरएसएस का हाथ है। बहरहाल इनके पीछे किसका हाथ है, ये तो टीम अन्ना ही जाने, लेकिन इतना तो साफ है कि कुछ ना कुछ तो छिपा एजेंडा जरूर है, जिस पर ये काम कर रहे हैं।

वैसे इस कथित अनशन से सरकार कनफ्यूज्ड है। मीडिया वाले जब किसी मंत्री से पूछते हैं कि आप अनशनकारियों से बात कब करेंगे ? मंत्री उल्टे सवाल पूछते हैं कि आप ही बताइये ये अनशनकारियों की मांग क्या है। बताया जाता है कि वैसे तो उनकी मांग जनलोकपाल है, लेकिन अभी वो 15  भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ जांच चाहते हैं। तब मंत्री का सवाल  होता है कि अब ये मांग बेचारे प्रधानमंत्री कैसे मान सकते हैं। उनकी सूची में प्रधानमंत्री भी शामिलि हैं, फिर तो उन्हें ये मांग सरकार से नहीं करनी चाहिए। जिसके खिलाफ आप अनशन कर रहे हैं, उसी से मांग पूरी करने को दबाव बना रहे हैं, ये तो सामाजिक न्याय के भी  खिलाफ है। मंत्री जी बात तो आपकी सही है, लेकिन आप ही बताएं उन्हें करना क्या चाहिए ? बोले अरे उनके यहां तो जाने माने वकील है, वो मंत्रियों के भ्रष्टाचार से संबंधित जो भी फाइलें हैं, वो लेकर सुप्रीम कोर्ट चले जाएं, जांच का आदेश करा लें।

बहरहाल सरकार और टीम अन्ना के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता रहेगा। ना सरकार कानून लाने वाली, ना टीम अन्ना आंदोलन खत्म करने वाली। अच्छा सरकार भी चाहती है कि ये आंदोलन चलता रहे, जिससे देशवासियों का ध्यान मुख्य समस्या से हटा रहे। टीम अन्ना भी चाहती है कि मांग पूरी ना हो, जिससे उनकी दुकान भी चलती रहे। दुश्यंत कुमार की दो लाइनें याद आ रही हैं..

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
   

Thursday, 26 July 2012

अनशन: टीम अन्ना का टीवी प्रेम ...

आज एक बार फिर जरूरी हो गया है कि टीम अन्ना की बात की जाए ।वैसे तो मेरा मानना है कि इनके बारे में बात करना सिर्फ समय बर्बाद करना है, लेकिन दिल्ली में जो माहौल है, उसमें जरूरी हो गया है कि कुछ बातें कर ली जाए। मैं जानता हूं कि एक सवाल आप सब के मन में होगा कि हर बार टीम अन्ना का अनशन सुबह आठ बजे के करीब शुरू हो जाता था, आज क्या वजह थी कि ये अनशन दोपहर बाद शुरू हुआ। इस सवाल का जवाब आप जानेगें तो चौंक जाएंगे। इसकी वजह और कुछ नहीं दिल्ली की टीवी मीडिया रही। दरअसल देश के 13 वें राष्ट्रपति के रूप में प्रणव मुखर्जी को संसद भवन के सेंट्रल हाल में आज शपथ लेना था। इसके चलते सभी न्यूज चैनल पर राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह का सीधा प्रसारण हो रहा था। अब टीम अन्ना को लगा कि अगर वो भी इसी समय अनशन शुरू करते हैं तो कैमरे का फोकस उनके ऊपर नहीं रहेगा। फिर जंगल में मोर नाचा किसने देखा.. हाहाहहाहाह
बस यही वजह थी कि टीम अन्ना के सदस्य भी सुबह से घर में बैठ कर शपथ ग्रहण समारोह का आनंद लेते रहे। जब ये समारोह समाप्त हो गया तो वो भी घर से निकले, उन्हें लगा कि अब उन्हें भी न्यूज चैनलों में जगह मिल जाएगी। मित्रों अगर आप हमारे पुराने लेखों को ध्यान से पढें तो आपको पता चल जाएगा कि इस टीम का असल मकसद क्या है। वैसे तो मैं पहले से कहता रहा हूं टीम अन्ना सुर्खियों में रहना चाहती है। मैं सौ फीसदी दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर जंतर मंतर से न्यूज चैनलों के कैमरे हटा लिए जाएं, तो आमरण अनशन सुबह से शुरू होकर शाम को खत्म हो जाएगा। वैसे टीम अन्ना के सदस्य आजकल जिस तरह बहकी बहकी बातें कर रहे हैं, उससे उनकी झल्लाहट साफ झलकती है। माइक हाथ में लेने के बाद ये बेकाबू हो जाते हैं, इन्हें समझ मे नहीं आता दरअसल ये किसके बारे में और क्या कह रहे हैं।

आज जब देश के राष्ट्रपति के रूप में प्रणव दा शपथ ले रहे थे, उस समय टीम अन्ना का एक कारिंदा मंच से कह रहा था कि अगर लोकपाल होता तो प्रणव दा राष्ट्रपति नहीं बन पाते। वैसे ये बात तो उन्होंने मंच से नहीं कहा, लेकिन उनके कहने का मकसद यही था कि अगर लोकपाल होता तो दादा राष्ट्रपति भवन में नहीं बल्कि जेल में होते। देश में इस तरह की आराजकता तब होती जब सरकार का नेतृत्व कमजोर हाथो में होता है। केंद्र की सरकार जितना पीछे हटती है, ये बिगडैल उतना ही आगे बढ़ जाते हैं। इन्हें पता नहीं क्यों लगता है कि इन पर हाथ डाला तो देश मे तूफान खड़ा हो जाएगा। सरकार अगर मजबूत होती तो आज कुछ लोग देश को इस तरह गुमराह नहीं कर पाते। सच तो ये है कि जनता का ये आंदोलन भटक गया है, फिर भी टीम अन्ना को लगता है कि वो एक सामान्य नागरिक नहीं बल्कि भगवान हैं। उनमें इतनी शक्ति है कि वो लोगों को देख कर बता सकते हैं कि ये ईमानदार है और ये बेईमान है। मैं जब भी तर्क और साक्ष्य के साथ कोई बात कहता हूं तो मुझपर कांग्रेसी होने का आरोप लगा दिया जाता है। मैं जानता हूं कि वही बात फिर दुहराई जाएगी, पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं सच्चाई को ठोंक कर कहने की हिम्मत रखता हूं।

मैं हमेशा से एक बात कहता रहा हूं कि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती। जब टीम अन्ना अनशन में ईमानदारी नहीं बरत सकती तो उन्हें ईमानदारी की बात करने का कम से कम नैतिक हक तो बिल्कुल नहीं है। चलिए पहले मैं आपको बताने की कोशिश करता हूं कि अनशन के मायने क्या हैं ? टीम अन्ना और गांधी के अनशन में अंतर क्या है ? आपको पता है महात्मा गांधी के लिए अनशन का अर्थ क्या था ? गांधी के लिए अनशन का अर्थ धर्म से जुड़ा हुआ था, इसका एक लक्ष्य हुआ करता था। यानि शरीर और आत्मा की शुद्धि। गांधी जी कहा करते थे कि उपवास या अनशन कभी भी गुस्से में नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गुस्सा एक प्रकार का पागलपन है। टीम अन्ना तो गुस्से में ही अनशन करती है, ये तो अलग बात है कि टीवी पर गाली गलौज नहीं दिखाया जा सकता, वरना इनकी भाषा तो ऐसा ही लगता है कि खामोश हो जाओ, वरना ये तो किसी की भी मां बहन कर सकते हैं। गांधी जी का मानना था कि अनशन का अर्थ बिना कुछ कहे अपनी बात लोगों तक पहुंचाना है। बापू अनशन के जरिए दुश्मनों को दोस्त बनाने का काम करते थे, जबकि टीम अन्ना दुश्मन से और दूरी बढ़ाने का काम करती है।

मित्रों अनशन में शरीर को तपाया जाता है, मकसद को हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट दिया जाता है। अनशनकारियों को ऐसा कोई कृत्य नहीं करना चाहिए, जिससे उनकी वजह से दूसरों को कष्ट हो या वो आहत हों। केजरीवाल की जो भाषा है, उसका भगवान ही मालिक है। कई बार तो उनकी बात से ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने किसी से बयाना ले लिया है कि वो सरकार की ऐसी तैसी कर देंगे, लेकिन जब वो इसमें नाकाम रहते हैं तो अभद्र और अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करते हैं। टीम अन्ना बड़ी बड़ी बातें करती हैं, लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि अनशन के लिए करोंड़ो रुपये फूंकने की क्या जरूरत है ? अनशन तो जंतर मंतर पर एक दरी बिछा कर भी की जा सकती है, फिर ये फाइव स्टार तैयारी क्यों की जाती है ? आप नहीं समझ सकते, क्योंकि ये आपका विषय नहीं है। आपको याद होगा कि यही टीवी चैनलों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के सद्भावना उपवास का मजाक बनाया था और कहा कि ये फाइव स्टार उपवास दिखावटी है, तो उनकी नजर इस अनशन पर क्यों नहीं है? क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है ?

मंच तैयार किए जाने के दौरान ये कई बार टीवी चैनलों के कैमरामैन से भी बात करते हैं कि मंच की ऊंचाई कितनी रखी जाए कि अनशनकारी ठीक से चैनल पर दिखाई दें। इन्हें मकसद से ज्यादा मतलब नहीं होता,ये बार बार कैमरे की ओर नजर गड़ाए रहते हैं। वैसे आज इन्हें चैनलों पर ज्यादा जगह नहीं मिल पाई। वैसे भी आज तो दोपहर बाद यानि लगभग दो बजे तो अनशन शुरू ही हो पाया। खैर इन्हें पहले पता होता कि टीवी चैनल उनका अनशन छोड़कर प्रणव दा के शपथ ग्रहण समारोह में भाग जाएंगे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये टीम अपना अनशन कब का आगे बढ़ा चुकी होती। हो सकता है कि आप मेरी बात से सहमत ना हों, पर जब देश के प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, जिसे दुनिया भर के लोग देखते रहे थे, उस दौरान अपने ही देश के प्रथम नागरिक प्रणब मुखर्जी के लिए अनाप शनाप बातें करके टीम अन्ना के सहयोगी अरविंद ने साफ कर दिया कि उनमें नैतिकता का पतन हो चुका है, फिर ये देश के लिए बड़ी बड़ी बातें करते हैं तो हंसी आती है।

वैसे इस बार अन्ना भी अपनी टीम का इम्तहान ले रहे हैं। वे चाहते तो टीम के साथ आज भी अपना अनशन शुरू कर सकते थे, पर वो अपनी टीम की ताकत देखना चाहते हैं। दरअसल मुंबई में अन्ना का अनशन फ्लाप हुआ तो टीम के सहयोगी अन्ना की बुराई करने लगे। लोगों मे सुगबुगाहट हुई की अन्ना भले ही महाराष्ट्र के रहने वाले हैं, पर उनकी वहां कोई पूछ नहीं है। इसीलिए मुंबई का अनशन कामयाब नहीं हो पाया। दिल्ली में अनशन इसलिए कामयाब हुआ कि टीम अन्ना के सहयोगियों को दिल्ली वाले हांथो हाथ लेते हैं। बस इसी बात से खफा अन्ना देखना चाहते हैं कि उनके बिना इस अनशन में कितने लोग जमा होते हैं और ये टीम कितने दिन भूखी रह सकती है ? और हां बड़ी बड़ी बातें करने वाली टीम अन्ना पहले ही दिन से उस रास्ते की तलाश कर रही है कि कैसे इस अनशन को सम्मान के साथ समाप्त किया जाए।

टीम अन्ना को पता है कि लोकपाल बिल मानसून सत्र मे पास होने वाला नहीं है, जिन मंत्रियों के खिलाफ जांच की बात की जा रही है, वो बात मानी नहीं जा सकती। सरकार अब बात चीत के लिए तैयार भी नहीं दिखाई दे रही है। अभी तक जो लोग सरकार से बातचीत कर रहे थे, वो अनशन पर हैं, उनकी मांग है कि अब सरकार से बात जनता के सामने मंच पर होगी, ये संभव नहीं है। अब अनशनकारी बेचारे यही सोच रहे हैं कि कैसे रास्ता निकाला जाए, जिससे अनशन तोड़ने में आसानी हो..।

चलते - चलते आज तो टीम अन्ना ने हद ही कर दी। सुर्खियों में आने के लिए कुछ नौजवानों के साथ जानबूझ कर धक्का मुक्की की गई और मीडिया में शोर मचाया गया कि कांग्रेस के छात्र संगठन ने टीम अन्ना पर हमला किया। दरअसल सच ये है कि आज अनशन को कोई भी चैनल इतनी गंभीरता से नहीं ले रहा था, लिहाजा सुर्खियों मे आने के लिए ये एक साजिश रची गई, और कहा गया कि कांग्रेसियों ने जंतर मंतर आकर हमला किया।

 

Monday, 26 March 2012

शर्म : गांधी के मंच से गाली ...


टीम अन्ना की बौखलाहट अब उनके चेहरे और जुबान पर दिखाई देने लगी है। अशिष्ट व्यवहार और अभद्र भाषा आम बात हो गई है। गांधी के मंच से गाली दी जा रही है, हाथ में तिरंगा लेकर जानवरों जैसा आचरण किया जा रहा है। मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही है। अन्ना कहते हैं कि अपमान सहने की क्षमता होनी चाहिए, जिसमें अपमान सहने की क्षमता नहीं है, वो जीवन में कभी कामयाब  नहीं हो सकता। उनका कहना है कि फलदार पेड़ पर ही लोग पत्थर मारते हैं, जिसमें फल नहीं, उस पर भला कौन पत्थर मारेगा। वो ये भी कहते हैं कि जिंदा लोग ही झुकना जानते हैं, जो अकड़ा रहता है वो मुर्दा है।  अन्ना की ये सीधी साधी बातें उनके लोगों की समझ में क्यों नहीं आती हैं ?

जब अन्ना की मौजूदगी में मंच से गाली की भाषा इस्तेमाल होती है, ऊंची ऊंची छोड़ने वाले बेचारे अन्ना की आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि वो सब सुनकर भी खामोश रहते हैं और अपनी टीम को रोकते नहीं है, तब मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है क्या अन्ना के भी खाने और दिखाने के दांत अलग अलग हैं। अगर ऐसा है तो क्या इस मंच पर गांधी की तस्वीर होनी चाहिए। हाथ में तिरंगा लेकर अभद्र भाषा के इस्तेमाल की छूट टीम अन्ना को दी जानी चाहिए। मेरा जवाब तो यही होगा कि बिल्कुल नहीं।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि टीम अन्ना अब बौखलाहट में है। टीम के सदस्य किसके लिए कब क्या कह देगें कोई भरोसा नहीं। अब देखिए ना दिल्ली में आज जंतर मंतर पर ये कह कर भीड़ जुटाई गई कि ईमानदारी की लड़ाई लड़ते हुए जो अफसर और कर्मचारी शहीद हो गए, उनकी बात की जाएगी। पर ये तैयारी से यहां आए थे राजनीति करने के लिेए। क्योंकि शहीदों से ज्यादा राजनीतिक बातें हुईं।  ये सोचते हैं कि इशारों इशारों में कही गई बातों को आम आदमी समझता नहीं है। भाई सब जानते हैं कि इस आंदोलन के पीछे  टीम अन्ना का एक छिपा हुआ खतरनाक एजेंडा है। एक शेर याद आ रहा है..

अंदाज अपना आइने में देखते हैं वो,
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो।

अब इन्हें कौन समझाए कि जब आप ईमानदारी की बात करतें हैं तो लोगो को उम्मीद रहती है कि आप भी ईमानदार होंगे। ईमानदारी का मतलब सिर्फ  ये नहीं है कि आप चोरी नहीं करते। ईमानदारी का मतलब ये भी है कि जो काम आप कर रहे हैं, उसके प्रति सच मे ईमानदार हैं या नहीं। क्योंकि बेईमानी की बुनियाद पर ईमानदारी की लड़ाई लड़ी गई तो उसमें कभी कामयाबी नहीं मिल सकती। सच तो ये है कि जिस तरह टीम अन्ना व्यवहार कर रही है, उससे बिल्कुल साफ हो गया है कि अब ये लड़ाई सियासी हो गई है। हां यहां एक बात का जिक्र और करना जरूरी है, अखबारों और टीवी रिपोर्ट के हवाले से कई मंत्रियों को टीम अन्ना ने कटघरे में खड़ा किया, बार बार सफाई देते रहे कि ये बात मैं नहीं कह रहा हूं। खुद उस रिपोर्ट से कन्नी काटते रहे, फिर कह रहे हैं कि अगर अगस्त तक सभी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई तो जेल भर देंगे। अरे दोस्त पहले इतना नैतिक साहस दिखाओ कि सार्वजनिक मंच से जो बात कह रहे हो, उसे ये बताओ कि हां मैं कह रहा हूं।

हां टीम अन्ना के सदस्यों में आपस में एक प्रतियोगिता शुरू हो गई है, टीवी पर ज्यादा से ज्यादा समय तक छाए रहने की। आपको पता होगा कि टीवी में पाजिटिव बातों के लिए समय ज्यादा नहीं है, अगर आपको यहां जगह बनानी है तो निगेटिव बातें यानि छिछोरी हरकतें करनी होगीं। अब निगेटिव बातें तो टीम अन्ना के सभी सदस्य करते हैं, उसमें अपना स्तर गिराना होता है, और बंदा बाजी मार ले जाता है तो सबसे नीचे गिरता है। अब देखिए ना पहले एक महिला ने डुपट्टे से घूंघट ओढ़ कर फूहड़ नाटक कर सांसदों की मिमिकरी की। ये पूरे दिन क्या कई दिन तक टीवी पर छाई रही। दूसरे साथी ने देखा कि ये महिला तो टीवी पर छाई हुई है, उसने संसद की ही ऐसी तैसी कर दी, कहा यहां तो गुंडे बदमाश और बलात्कारी बैठे हैं। जाहिर है बवाल होना था, हुआ भी। संसद से विशेषाधिकार हनन का नोटिस मिला। ये साबित करना चाहते हैं कि मैं भ्रष्टाचार की बात कर रहा हूं तो नेता उनके पीछे पड़ गए हैं। इन्हें नोटिस मिलने पर शर्म नहीं आ रही है, इससे वाहवाही बता रहे हैं।

जब टीम अन्ना के सदस्य देख रहे हैं कि उन्हें टीवी पर जगह पाजीटिव बातें करने से नहीं मिल रही हैं तो एक के बाद एक सभी ने छिछोरी हरकतें चालू कर दीं। इसी क्रम में आज एक नेता सदस्य ने एक वरिष्ठ सांसद जिनके ऊपर किसी तरह की बेईमानी के चार्ज नहीं है, वो जेपी आंदोलन में लंबे समय तक जेल में भी रहे। उन्हें इनडायरेक्ट रूप से चोर कहा। वैसे सच ये है कि ऐसे लोगों की चर्चा कर इन्हें बेवजह भाव देने की जरूरत नहीं है। मैं पहले भी कहता रहा हूं कि बेईमानी के पैसे से ईमानदारी की बात करना बेशर्मी से ज्यादा कुछ नहीं है।
हा एक हास्यास्पद बात और है टीम अन्ना का एक आदमी उसे हिसाब किताब  रखने का बहुत शौक है, आए दिन राजनीतिक दलों से हिसाब मांगता रहता है। चलो एक बात मैं भी कह दूं। भाई मुझे बताओ ये फोर्ड फाऊंडेशन क्या है। इसमें किसके चाचा बैठे हैं जो इस आंदोलन में फंडिग कर रहे हैं। इस आंदोलन को चलाने में फोर्ड फाउंडेशन का आखिर क्या इंट्रेस्ट है। इन सवालों का जवाब भी आना चाहिए। अन्ना गारंटी ले सकते हैं कि उनके आंदोलन में सब नंबर एक का पैसा लग रहा है, किसी गलत आदमी का चंदा उनके पास नहीं है।
चोर चोर मौसेरे भाई ...
ये तस्वीर हमें तो हैरान करती है। दोनों गले भले मिल  रहे  हों, पर दिल नहीं मिलता। साथ में बैठकर तस्वीर खिंचवा ली, ये इनकी मजबूरी है। दरअसल रामलीला मैदान में पिटाई के बाद बाबा रामदेव काफी समय तक सदमें में रहे। अपना हिसाब किताब दुरुस्त करते रहे। अब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार भी आ गई है, तो वैसे ही बाबा  की मुश्किल बढ़ गई है। अभी तक तो वहां बीजेपी की सरकार थी, जो उन्हें संरक्षण देती रही। रामदेव भी बीजेपी की सेवा करते रहे। कहा तो यहां तक जाता है कि वो पार्टी को चंदा भी देते रहे हैं। भला एक बाबा किसी राजनीतिक दल को चंदा क्यों देगा,  लेकिन रामदेव देते रहे हैं।

बाबा रामदेव स्वदेशी के नाम जिस तरह से साबुन तेल बेच रहे हैं, उसे कितना भी साफ सुथरा करने की कोशिश करें नहीं कर सकते। कई मामले ऐसे सामने आए हैं, जिसमें बाबा रामदेव ने टैक्स की चोरी की है। तमाम चीजों को छिपाया है। अब बाबा जब अपने धंधे को सौ फीसदी प्रमाणिक बताते हैं तो हंसी आती है। दुनिया में कोई ऐसा धंधा नहीं है, जहां गोरखधंधा ना हो। बस यहां तभी आदमी चोर कहा जाता है जब वो पकड़ा जाता है। बाबा कई बार पकड़े जा चुके हैं, अब बाबा को प्रमाणिकता की बात नहीं करनी चाहिए, हंसी आती है, और याद आते हैं पुलिस के थाने जहां घाघ टाइप के चोर पिटते रहते हैं, पर सच कबूलते नहीं,क्योंकि इनकी क्षमता बहुत होती है।

अन्ना मंदिर में रहते हैं, मित्रों मेरी गुजारिश है कि अन्ना का मंदिर आप भी देख आओ। पांच सितारा सुविधाओं वाला ये मंदिर है। खैर छोड़िये इन बातों को। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर अन्ना को रामदेव की जरूरत क्यों पड़ी ? तो सुन लीजिए अब दिल्ली में जब से अप्पूघर हटा है, यहां लोगों के लिए मनोरंजन का कोई साधन नहीं रहा, जहां लोग जाकर चाय पकोड़े कर सकें। ऐसे में अन्ना का अनशन होता है तो लोग चाय पकोड़े के लिए निकल पड़ते हैं। एक दिन का अनशन था, इसलिए यहां अन्ना ने खाने पीने का इंतजाम नहीं किया था, इसलिए और दिनों की अपेक्षा भीड़ कम थी।    रामलीला मैदान में देशी घी में हलुवा पूड़ी थी, लोगो बड़ी संख्या में जुटते थे, और ये घर पहुंच कर आंदोलन की कम हलुवा पूडी की चर्चा ज्यादा करते थे।

एक अनशन करने टीम अन्ना मुंबई पहुंच गई। उन्हें लगा कि नए साल का मौका है, दिल्ली में ठंड बहुत है, मुंबई का मौसम भी मस्त है, नए साल को इन्ज्वाय करने देश भर से लोग मुंबई जुटेंगे। दिल्ली की ठंड में जान देने से क्या फायदा, मुंबई चला जाए। बस यही चूक हो गई और टीम अन्ना की पोल खुल गई। तीन दिन का अनशन एक दिन में समेट दिया। यहां लोग आए ही नहीं। अरे भाई मुंबई में घूमने की तमाम जगह है, छुट्टी  में लोग कोंकड़ रेलवे का सफर करना बेहतर समझते हैं, वहां दिल्ली की तरह लोग खाली नहीं है।
तब टीम अन्ना को लगा कि अगर इस आंदोलन को जिंदा रखना है और फोर्ड फाउंडेशन समेत देश भर से चंदा लेकर मलाई काटना है तो भीड़ का पुख्ता इंतजाम करना ही होगा। बस फिर क्या था, दिल ना मिलते हुए भी बाबा रामदेव की शरण में जा गिरे। इन्हें पता है कि देश भर में हारी बीमारी है और बाबा इसमें लोकप्रिय हैं। ऐसे में और कुछ हो ना हो, दस पांच हजार लोग तो जुट ही जाएंगे। इसी भीड़ को अपने पास बनाए रखने के लिए ये दोनों चेहरे साथ हैं। चलो भाई देश में तमाम लोगों की दुकानदारी चल रही है, इनकी भी चले, क्या करना है।