खुलासा सप्ताह मना रही टीम अरविंद केजरीवाल फिलहाल चारो खाने चित हो गई है। वजह और कुछ नहीं बल्कि केजरीवाल समेत उनके अहम सहयोगियों पर नेताओं से कहीं ज्यादा गंभीर आरोप लगे हैं। हैरानी इस बात पर है कि खुद केजरीवाल की भूमिका पर भी उंगली उठी है। इसे ही कहते हैं " सिर मुड़ाते ही ओले पड़े "। अरे भाई कितने दिनों से एक ही बात समझा रहा हूं कि बेईमानी की बुनियाद पर कभी भी ईमानदारी की इमारत खड़ी नहीं हो सकती है। इसलिए पहले खुद को साफ सुथरा दिखना भर ही काफी नहीं है बल्कि अपने काले कारनामों को बंद कर जनता के बीच माफी मांगना होगा। अगर जनता माफ कर देती है, फिर आप दूसरों पर उंगली उठाने की कोशिश करें। बताइये अपना दामन साफ किए बगैर खुलासा सप्ताह मनाने लगे। अब केजरीवाल को भी जवाब देना होगा कि क्यों वो सब कुछ जानते हुए एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के मामले में खामोश रहे। उनके सहयोगी प्रशांत भूषण को कैसे हिमांचल में चाय बगान की वो जमीन आवंटित हो गई, जो नियम के तहत सामान्य व्यक्ति को नहीं हो सकती। महाराष्ट्र की अंजलि दमानिया ने कैसे खेती की जमीन लेकर बिल्डरों को बेचा और मोटा मुनाफा कमाया ?
खुलासा सप्ताह की शुरुआत सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से हुई। चूंकि मैं काफी दिनों तक मुरादाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़ा रहा हूं। इसलिए जब वाड्रा पर आरोप लगा तो मुझे कत्तई हैरानी नहीं हुई। मैं इस परिवार को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। दो दिन बाद केजरीवाल के निशाने पर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद आ गए। आरोप लगा कि विकलांगो के नाम पर सरकारी रकम की बंदरबाट की गई। कांग्रेस पर काफी हमला कर चुके थे, लिहाजा अरविंद पर ये आरोप ना लगे कि वो बीजेपी के इशारे पर सब कर रहे हैं, इसलिए अपनी छवि जनता में बनाए रखने के लिए उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को भी निशाने पर लिया। नितिन पर आरोप लगाया तो गया, पर कमजोर तथ्यों को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश हुई, इसलिए बीजेपी को ये मुश्किल में नहीं डाल पाए। गडकरी के मामले मे तो मैं ये भी कह सकता हूं कि केजरीवाल ने मीडिया और देश को गुमराह किया। उन्होंने तथ्यों को गलत ढंग से रखा, लगा कि जमीन के अधिग्रहण के मामले की उन्हें जानकारी ही नहीं है। वैसे भी नितिन गडकरी को ये जमीन बेची नहीं गई है। सरकार ने उन्हें सिर्फ 11 साल के लिए लीज पर दी है।
खैर एक के बाद एक खुलासे से केजरीवाल को लग रहा था कि उनका सियासी ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पूरी टीम तब बैक फुट पर आ गई, जब केजरीवाल समेत अहम सदस्यों पर भी गंभीर आरोप लगे। अच्छा इसमें केजरीवाल तो आरोप को खारिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि उन पर किसी राजनीतिक दल ने आरोप नहीं लगाया है, बल्कि उन्हें महाराष्ट्र के एक पूर्व आईपीएस वाई पी सिंह ने कटघरे में खड़ा किया है। वाई पी सिंह को पूरा देश जानता है कि वो एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रहे हैं, उन्होंने देखा कि मौजूदा सिस्टम में ईमानदारी से नौकरी करना संभव नहीं है तो नौकरी ही छोड़ दी। महाराष्ट्र के पूरे सिचाई घोटाले के मामले की जानकारी केजरीवाल को उन्होंने ही दी। केजरीवाल को जो अभिलेख और जानकारी दी गई थी, उसमें शरद पवार का लवासा प्रोजेक्ट भी शामिल था। लेकिन केजरीवाल ने मीडिया के सामने अधूरे तथ्य रखे और गडकरी को ही निशाने पर लिया, पवार का उन्होंने नाम तक नहीं लिया। जबकि वाईपी सिंह ने जो अभिलेख केजरीवाल को दिए थे, उसमें सिर्फ शरद पवार ही नहीं बल्कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले, भतीजे अजित पवार समेत कुछ और लोगों का काला चिट्ठा था। अब सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल पर ऐसा क्या दबाव था कि उन्होंने पवार फैमिली का नाम तक नहीं लिया। अब केजरीवाल की भूमिका की जांच कहां होगी और कौन करेंगा ?
इंडिया अगेंस्ट करप्सन की एक और सदस्या अंजलि दमानिया की बात कर लें। टीवी कैमरे पर पानी पी पी कर नेताओं को कोस रही दमानिया का चेहरा भी दागदार निकला। आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि पर आरोप लगा है कि किसानों की ज़मीन खरीद कर उस ज़मीन का उपयोग बदलवा कर ऊंचे दामों में बेचा। अग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया है कि अंजलि दमानिया ने 2007 में करजत के खरवंडी गांव में सात एकड़ ज़मीन खरीदी, इसके ठीक बाद इस जमीन का उपयोग बदलने की अर्जी दे दी। हालांकि ज़मीन बेचने वाले किसानों का दावा है कि दमानिया ने उनसे कहा था कि वो यहां खेती करेंगी, लेकिन उन्होंने ज़मीन का लैंड यूज चैंज करा दिया और 39 प्लॉट काट दिए। उन्हें ज़मीन का इस्तेमाल बदलने की इजाज़त रायगढ़ के कलेक्टर ने दी थी। लैंड यूज बदलते ही दमानियां भी बदल गईं और उन्होंने पूरी जमीन एसवीवी डेवलपर्स को दे दी, जिसमें दमानिया भी डारेक्टर हैं। आरोप है कि कुल 39 प्लॉट काटे गए जिनमें से सैंतीस प्लॉट अलग अलग लोगों को मोटे दाम में बेचा गया।
इतना ही नहीं दमानियां जमीनों की जिस तरह से खरीद फरोख्त करती हैं, उससे तो नहीं लगता है कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका काम बिल्डर जैसा ही दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि दमानिया ने करजत के जिस खरवंडी गांव में ज़मीन खरीदी, उसके बगल के गांव कोंदिवाड़े में भी उन्होंने 30 एकड़ जमीन खरीद ली। वहां बन रहे कोंधाणे बांध के खिलाफ दमानिया ने इसी साल अप्रैल में पीआईएल दायर की। आरोप तो ये भी है कि केजरीवाल अंजलि दमानिया की जमीन बचाने के लिए ही आरोप लगा रहे हैं। दरअसल अंजलि ने पिछले वर्ष जून में महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग को एक पत्र लिखा था कि कोंधाने-करजाट बांध में उनकी जमीन अधिगृहीत न की जाए। इसकी जगह बांध को 700 मीटर आगे शिफ्ट कर दिया जाए जहां आदिवासियों की जमीन है। अंजलि की मौजूदा लड़ाई इसी से संबंधित है। अब अंजलि के मामले का खुलासा हो जाने के बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है।
टीम केजरीवाल के एक और सहयोगी प्रशांत भूषण का मामला भी कम गंभीर नहीं है। हिमाचल प्रदेश में प्रशात भूषण की सोसायटी को चाय बगान के लिए आरक्षित जमीन दे दी गई। भूषण ने कागड़ा जिले के पालमपुर में 2010 में करीब साढ़े चार हेक्टेयर जमीन खरीदी है। ये जमीन कुमुद भूषण एजुकेशन सोसाइटी के नाम है। प्रशांत भूषण ही इस सोसाइटी के सचिव हैं। ये जमीन यहां कॉलेज खोलने के नाम पर ली गई थी। 2010 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने बाकायदा धारा-118 के तहत ये जमीन खरीदने की इजाजत भी दी है। इस जमीन पर कुछ बिल्डिंग बन गई हैं और कुछ का काम चल रहा है। सवाल ये उठता है कि हिमांचल में आम आदमी तो जमीन भी नहीं खरीद सकता, फिर भूषण की सोसायटी को वो जमीन कैसे मिल गई जो चाय बगान के लिए आरक्षित थी ? जाहिर है कि उनकी पहुंच का ही नतीजा है। अगर भूषण को हिमाचल में वो जमीन मिल सकती है जो चाय बगान के लिए है, और जहां कोई निर्माण तक नहीं किया जा सकता। अपनी पहुंच का फायदा उठाने वाले ऐसे लोग दूसरों पर कैसे कीचड़ उछाल सकते हैं, इनमें इतना नैतिक बल आता कहां से है ? भूषण जी की जमीन पर केजरीवाल खामोश क्यों है ? नितिन गड़करी को तो जमीन सिर्फ 11 साल की लीज पर मिली है, तो हाय तौबा मचा रहे हैं।
इंडिया अंगेस्ट करप्सन के एक और हिमायती हैं मयंक गांधी। नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ा है तो हम सबको उम्मीद थी कि चलिए कम से कम मयंक यहां ऐसे सदस्य है,जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं कि वो गलत नहीं करेंगे। अब गांधी जी भी आरोपों के घेरे में है। वो भी ऐसे वैसे आरोप नहीं हैं, जमीन की धांधली की शिकायत है। कहा जा रहा है कि पहले तो उन्होंने एक एनजीओ बनाया। एनजीओ के नाम पर सरकारी जमीन ली और वो भी सस्ते में। लेकिन बाद में उन्होंने इस जमीन को अपने रिश्तेदारों को बेच दिया। ये सब क्या है भाई गांधी जी।
इसीलिए कहते हैं कि शीशे के मकान में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। अब देखिए ना लगभग पूरी टीम ही चोरी चकारी में घिरती नजर आ रही है। फिलहाल आज केजरीवाल साहब शाम को घर से बाहर निकले और कहा कि तीन लोगों की एक कमेटी बना दी है, वो हमारे सदस्यों के मामले की जांच करेंगे और अगर ये दोषी होंगे तो इन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा। हाहाहहाहाह कमाल है केजरीवाल साहब। पहले तो ये बताइये कि कमेटी किसने बनाई है ? जब आपने ही कमेटी बनाई है और आप सब पर आरोप है तो कैसे मान लिया जाए कि कमेटी आपकी सही जांच करेगी ? अच्छा पार्टी तो अभी बनी भी नहीं है तो इन लोगों को किस पार्टी से निकाल देंगे आप ? अगर वाकई आपको अपने सदस्यों की जांच चाहिए तो जैसे दूसरों के मामले में जांच की मांग करते हैं, वैसे ही सरकार से मांग कीजिए की जांच कराए।
महत्वपूर्ण ये है कि आपकी बनाई कमेटी को कोई अधिकार हासिल है नहीं। ऐसे में ये टीम जांच कैसे कर पाएगी। टीम को जांच के लिए सरकारी अभिलेखों की भी जरूरत होगी। अब सरकारी अधिकारी आपकी बनाई टीम को सरकारी अभिलेख भला क्यों दिखाएंगे ? मान लीजिए अगर टीम प्रशांत भूषण की जांच करती है तो उसे सरकारी अभिलेख में ये देखना होगा कि जो जमीन चाय बगान के लिए आरक्षित थी, वो जमीन ही भूषण को दी गई है। अब भूषण जी तो आपको ये अभिलेख टीम को दिखाने वाले नहीं है, इसके लिए तहसील में अभिलेखों की जांच करनी होगी। जांच का ये विषय भी होगा कि कैसे जमीन दी गई, किसके आदेश पर जमीन दी गई, नियमों की अनदेखी कैसे की गई। ये बात प्रशांत टीम को बताएंगे ? अंजलि के मामले को ले लें, उनके मामले में भी सरकारी अभिलेखों की जरूरत होगी। ये टीम कैसे सरकारी अधिकारियों और अभिलेखों को तलब कर पाएगी। कृषि की जमीन का किन हालातों में लैंड यूज बदला गया, इसमें कौन कौन से नेता अफसर जिम्मेदार थे, ये कौन बताएगा। केजरीवाल साहब देश को गुमराह मत कीजिए।
एक सवाल आप से पूछता हूं केजरीवाल साहब । अगर आप बिना जांच के कानून मंत्री का इस्तीफा मांग सकते हैं, तो बिना जांच के अपने सदस्यों को टीम से बाहर क्यों नहीं कर सकते ? मैं कहता हूं कि गंभीर आरोप लगा है, ऐसे में कम से कम अपने सहयोगियों को तो टीम से बाहर करने की हिम्मत दिखाइये। ये कह कर आप बच नहीं सकते कि आपने जांच टीम बना दी है, कल को साबित हो जाए कि हां लोगों ने गडबड़ी की है तो आप अपना पुलिस स्टेशन बनाकर कहें कि उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। फिर अपनी अदालत और जेल भी बना लीजिए। वैसे भी आप ने ऐलान किया है कि आप मनमोहन सिह को आप अपना प्रधानमंत्री मानते ही नहीं है। मतलब साफ है कि देश के लोकतंत्र में आपको यकीन ही नहीं रह गया है। समानांतर व्यवस्था चलाने के हिमायती हैं, तो फिर दिखावा क्यों ? बनाइये संसद, पुलिस स्टेशन, अदालत और जेल।
बहरहाल नेताओं पर आरोप लगता है तो हमें उतनी हैरानी नहीं होती, क्योंकि आज लोग नेताओं के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करते। हालत ये है कि भले ही नेताओं पर आरोप ही लगे कि उन्होंने करप्सन किया है, फिर भी हम बिना जांच के ही मान लेते हैं कि हां नेता है तो जरूर किया होगा। लेकिन करप्सन के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले जब ऐसे मामले में शामिल होते हैं तो देश का भरोसा टूटता है। मैं देख रहा हूं कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जितने लोग भी जुड़े हैं, सभी के अपने एनजीओ की अलग अलग दुकान है। आमतौर पर सभी अपने एनजीओ से मोटा माल बनाने में लगे हैं। कुतर्क से सच को नहीं दबाया जा सकता, सच पारदर्शी होता है, जिसे जनता देख रही है। इस सवाल का क्या जवाब है आपके पास कि जो लोग भी शुरू से आपके साथ जुड़े थे, एक एक कर सब अलग हो गए। वजह क्या है कि अलग हुए ज्यादातर लोगों को अरविंद केजरीवाल से ही शिकायत है। बेचारे अन्ना को ये कहने को क्यों मजबूर होना पड़ा की अब टीम केजरीवाल ना उनके नाम का इस्तेमाल करेगी और ना ही चित्र का। अगर अन्ना ऐसा कहते हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि दाल में कुछ काला जरूर है।
खुलासा सप्ताह की शुरुआत सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से हुई। चूंकि मैं काफी दिनों तक मुरादाबाद में अमर उजाला अखबार से जुड़ा रहा हूं। इसलिए जब वाड्रा पर आरोप लगा तो मुझे कत्तई हैरानी नहीं हुई। मैं इस परिवार को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। दो दिन बाद केजरीवाल के निशाने पर कानून मंत्री सलमान खुर्शीद आ गए। आरोप लगा कि विकलांगो के नाम पर सरकारी रकम की बंदरबाट की गई। कांग्रेस पर काफी हमला कर चुके थे, लिहाजा अरविंद पर ये आरोप ना लगे कि वो बीजेपी के इशारे पर सब कर रहे हैं, इसलिए अपनी छवि जनता में बनाए रखने के लिए उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को भी निशाने पर लिया। नितिन पर आरोप लगाया तो गया, पर कमजोर तथ्यों को लेकर उन्हें घेरने की कोशिश हुई, इसलिए बीजेपी को ये मुश्किल में नहीं डाल पाए। गडकरी के मामले मे तो मैं ये भी कह सकता हूं कि केजरीवाल ने मीडिया और देश को गुमराह किया। उन्होंने तथ्यों को गलत ढंग से रखा, लगा कि जमीन के अधिग्रहण के मामले की उन्हें जानकारी ही नहीं है। वैसे भी नितिन गडकरी को ये जमीन बेची नहीं गई है। सरकार ने उन्हें सिर्फ 11 साल के लिए लीज पर दी है।
खैर एक के बाद एक खुलासे से केजरीवाल को लग रहा था कि उनका सियासी ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पूरी टीम तब बैक फुट पर आ गई, जब केजरीवाल समेत अहम सदस्यों पर भी गंभीर आरोप लगे। अच्छा इसमें केजरीवाल तो आरोप को खारिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि उन पर किसी राजनीतिक दल ने आरोप नहीं लगाया है, बल्कि उन्हें महाराष्ट्र के एक पूर्व आईपीएस वाई पी सिंह ने कटघरे में खड़ा किया है। वाई पी सिंह को पूरा देश जानता है कि वो एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रहे हैं, उन्होंने देखा कि मौजूदा सिस्टम में ईमानदारी से नौकरी करना संभव नहीं है तो नौकरी ही छोड़ दी। महाराष्ट्र के पूरे सिचाई घोटाले के मामले की जानकारी केजरीवाल को उन्होंने ही दी। केजरीवाल को जो अभिलेख और जानकारी दी गई थी, उसमें शरद पवार का लवासा प्रोजेक्ट भी शामिल था। लेकिन केजरीवाल ने मीडिया के सामने अधूरे तथ्य रखे और गडकरी को ही निशाने पर लिया, पवार का उन्होंने नाम तक नहीं लिया। जबकि वाईपी सिंह ने जो अभिलेख केजरीवाल को दिए थे, उसमें सिर्फ शरद पवार ही नहीं बल्कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले, भतीजे अजित पवार समेत कुछ और लोगों का काला चिट्ठा था। अब सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल पर ऐसा क्या दबाव था कि उन्होंने पवार फैमिली का नाम तक नहीं लिया। अब केजरीवाल की भूमिका की जांच कहां होगी और कौन करेंगा ?
इंडिया अगेंस्ट करप्सन की एक और सदस्या अंजलि दमानिया की बात कर लें। टीवी कैमरे पर पानी पी पी कर नेताओं को कोस रही दमानिया का चेहरा भी दागदार निकला। आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि पर आरोप लगा है कि किसानों की ज़मीन खरीद कर उस ज़मीन का उपयोग बदलवा कर ऊंचे दामों में बेचा। अग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया है कि अंजलि दमानिया ने 2007 में करजत के खरवंडी गांव में सात एकड़ ज़मीन खरीदी, इसके ठीक बाद इस जमीन का उपयोग बदलने की अर्जी दे दी। हालांकि ज़मीन बेचने वाले किसानों का दावा है कि दमानिया ने उनसे कहा था कि वो यहां खेती करेंगी, लेकिन उन्होंने ज़मीन का लैंड यूज चैंज करा दिया और 39 प्लॉट काट दिए। उन्हें ज़मीन का इस्तेमाल बदलने की इजाज़त रायगढ़ के कलेक्टर ने दी थी। लैंड यूज बदलते ही दमानियां भी बदल गईं और उन्होंने पूरी जमीन एसवीवी डेवलपर्स को दे दी, जिसमें दमानिया भी डारेक्टर हैं। आरोप है कि कुल 39 प्लॉट काटे गए जिनमें से सैंतीस प्लॉट अलग अलग लोगों को मोटे दाम में बेचा गया।
इतना ही नहीं दमानियां जमीनों की जिस तरह से खरीद फरोख्त करती हैं, उससे तो नहीं लगता है कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनका काम बिल्डर जैसा ही दिखाई दे रहा है। कहा जा रहा है कि दमानिया ने करजत के जिस खरवंडी गांव में ज़मीन खरीदी, उसके बगल के गांव कोंदिवाड़े में भी उन्होंने 30 एकड़ जमीन खरीद ली। वहां बन रहे कोंधाणे बांध के खिलाफ दमानिया ने इसी साल अप्रैल में पीआईएल दायर की। आरोप तो ये भी है कि केजरीवाल अंजलि दमानिया की जमीन बचाने के लिए ही आरोप लगा रहे हैं। दरअसल अंजलि ने पिछले वर्ष जून में महाराष्ट्र में सिंचाई विभाग को एक पत्र लिखा था कि कोंधाने-करजाट बांध में उनकी जमीन अधिगृहीत न की जाए। इसकी जगह बांध को 700 मीटर आगे शिफ्ट कर दिया जाए जहां आदिवासियों की जमीन है। अंजलि की मौजूदा लड़ाई इसी से संबंधित है। अब अंजलि के मामले का खुलासा हो जाने के बाद स्थानीय प्रशासन ने सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है।
टीम केजरीवाल के एक और सहयोगी प्रशांत भूषण का मामला भी कम गंभीर नहीं है। हिमाचल प्रदेश में प्रशात भूषण की सोसायटी को चाय बगान के लिए आरक्षित जमीन दे दी गई। भूषण ने कागड़ा जिले के पालमपुर में 2010 में करीब साढ़े चार हेक्टेयर जमीन खरीदी है। ये जमीन कुमुद भूषण एजुकेशन सोसाइटी के नाम है। प्रशांत भूषण ही इस सोसाइटी के सचिव हैं। ये जमीन यहां कॉलेज खोलने के नाम पर ली गई थी। 2010 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने बाकायदा धारा-118 के तहत ये जमीन खरीदने की इजाजत भी दी है। इस जमीन पर कुछ बिल्डिंग बन गई हैं और कुछ का काम चल रहा है। सवाल ये उठता है कि हिमांचल में आम आदमी तो जमीन भी नहीं खरीद सकता, फिर भूषण की सोसायटी को वो जमीन कैसे मिल गई जो चाय बगान के लिए आरक्षित थी ? जाहिर है कि उनकी पहुंच का ही नतीजा है। अगर भूषण को हिमाचल में वो जमीन मिल सकती है जो चाय बगान के लिए है, और जहां कोई निर्माण तक नहीं किया जा सकता। अपनी पहुंच का फायदा उठाने वाले ऐसे लोग दूसरों पर कैसे कीचड़ उछाल सकते हैं, इनमें इतना नैतिक बल आता कहां से है ? भूषण जी की जमीन पर केजरीवाल खामोश क्यों है ? नितिन गड़करी को तो जमीन सिर्फ 11 साल की लीज पर मिली है, तो हाय तौबा मचा रहे हैं।
इंडिया अंगेस्ट करप्सन के एक और हिमायती हैं मयंक गांधी। नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ा है तो हम सबको उम्मीद थी कि चलिए कम से कम मयंक यहां ऐसे सदस्य है,जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं कि वो गलत नहीं करेंगे। अब गांधी जी भी आरोपों के घेरे में है। वो भी ऐसे वैसे आरोप नहीं हैं, जमीन की धांधली की शिकायत है। कहा जा रहा है कि पहले तो उन्होंने एक एनजीओ बनाया। एनजीओ के नाम पर सरकारी जमीन ली और वो भी सस्ते में। लेकिन बाद में उन्होंने इस जमीन को अपने रिश्तेदारों को बेच दिया। ये सब क्या है भाई गांधी जी।
इसीलिए कहते हैं कि शीशे के मकान में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। अब देखिए ना लगभग पूरी टीम ही चोरी चकारी में घिरती नजर आ रही है। फिलहाल आज केजरीवाल साहब शाम को घर से बाहर निकले और कहा कि तीन लोगों की एक कमेटी बना दी है, वो हमारे सदस्यों के मामले की जांच करेंगे और अगर ये दोषी होंगे तो इन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा। हाहाहहाहाह कमाल है केजरीवाल साहब। पहले तो ये बताइये कि कमेटी किसने बनाई है ? जब आपने ही कमेटी बनाई है और आप सब पर आरोप है तो कैसे मान लिया जाए कि कमेटी आपकी सही जांच करेगी ? अच्छा पार्टी तो अभी बनी भी नहीं है तो इन लोगों को किस पार्टी से निकाल देंगे आप ? अगर वाकई आपको अपने सदस्यों की जांच चाहिए तो जैसे दूसरों के मामले में जांच की मांग करते हैं, वैसे ही सरकार से मांग कीजिए की जांच कराए।
महत्वपूर्ण ये है कि आपकी बनाई कमेटी को कोई अधिकार हासिल है नहीं। ऐसे में ये टीम जांच कैसे कर पाएगी। टीम को जांच के लिए सरकारी अभिलेखों की भी जरूरत होगी। अब सरकारी अधिकारी आपकी बनाई टीम को सरकारी अभिलेख भला क्यों दिखाएंगे ? मान लीजिए अगर टीम प्रशांत भूषण की जांच करती है तो उसे सरकारी अभिलेख में ये देखना होगा कि जो जमीन चाय बगान के लिए आरक्षित थी, वो जमीन ही भूषण को दी गई है। अब भूषण जी तो आपको ये अभिलेख टीम को दिखाने वाले नहीं है, इसके लिए तहसील में अभिलेखों की जांच करनी होगी। जांच का ये विषय भी होगा कि कैसे जमीन दी गई, किसके आदेश पर जमीन दी गई, नियमों की अनदेखी कैसे की गई। ये बात प्रशांत टीम को बताएंगे ? अंजलि के मामले को ले लें, उनके मामले में भी सरकारी अभिलेखों की जरूरत होगी। ये टीम कैसे सरकारी अधिकारियों और अभिलेखों को तलब कर पाएगी। कृषि की जमीन का किन हालातों में लैंड यूज बदला गया, इसमें कौन कौन से नेता अफसर जिम्मेदार थे, ये कौन बताएगा। केजरीवाल साहब देश को गुमराह मत कीजिए।
एक सवाल आप से पूछता हूं केजरीवाल साहब । अगर आप बिना जांच के कानून मंत्री का इस्तीफा मांग सकते हैं, तो बिना जांच के अपने सदस्यों को टीम से बाहर क्यों नहीं कर सकते ? मैं कहता हूं कि गंभीर आरोप लगा है, ऐसे में कम से कम अपने सहयोगियों को तो टीम से बाहर करने की हिम्मत दिखाइये। ये कह कर आप बच नहीं सकते कि आपने जांच टीम बना दी है, कल को साबित हो जाए कि हां लोगों ने गडबड़ी की है तो आप अपना पुलिस स्टेशन बनाकर कहें कि उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। फिर अपनी अदालत और जेल भी बना लीजिए। वैसे भी आप ने ऐलान किया है कि आप मनमोहन सिह को आप अपना प्रधानमंत्री मानते ही नहीं है। मतलब साफ है कि देश के लोकतंत्र में आपको यकीन ही नहीं रह गया है। समानांतर व्यवस्था चलाने के हिमायती हैं, तो फिर दिखावा क्यों ? बनाइये संसद, पुलिस स्टेशन, अदालत और जेल।
बहरहाल नेताओं पर आरोप लगता है तो हमें उतनी हैरानी नहीं होती, क्योंकि आज लोग नेताओं के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करते। हालत ये है कि भले ही नेताओं पर आरोप ही लगे कि उन्होंने करप्सन किया है, फिर भी हम बिना जांच के ही मान लेते हैं कि हां नेता है तो जरूर किया होगा। लेकिन करप्सन के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें करने वाले जब ऐसे मामले में शामिल होते हैं तो देश का भरोसा टूटता है। मैं देख रहा हूं कि इंडिया अगेंस्ट करप्सन से जितने लोग भी जुड़े हैं, सभी के अपने एनजीओ की अलग अलग दुकान है। आमतौर पर सभी अपने एनजीओ से मोटा माल बनाने में लगे हैं। कुतर्क से सच को नहीं दबाया जा सकता, सच पारदर्शी होता है, जिसे जनता देख रही है। इस सवाल का क्या जवाब है आपके पास कि जो लोग भी शुरू से आपके साथ जुड़े थे, एक एक कर सब अलग हो गए। वजह क्या है कि अलग हुए ज्यादातर लोगों को अरविंद केजरीवाल से ही शिकायत है। बेचारे अन्ना को ये कहने को क्यों मजबूर होना पड़ा की अब टीम केजरीवाल ना उनके नाम का इस्तेमाल करेगी और ना ही चित्र का। अगर अन्ना ऐसा कहते हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि दाल में कुछ काला जरूर है।