पहले तो आज का सबसे बड़ा सवाल ये कि रामदेव हैं क्या ? सन्यासी हैं, योगगुरु हैं, आयुर्वेदाचार्य हैं, व्यापारी हैं, उद्यमी हैं आखिर क्या हैं रामदेव ? वैसे आमतौर पर लोग इस सवाल का एक ही जवाब देंगे कि वो योगगुरु हैं। पर आजकल रामदेव का काम और उनका आचरण देख कर कहीं से नहीं लगता है कि वो योग गुर हैं या कभी योगगुरु रहे होंगे। उनकी बातचीत और हरकतों से तो यही लगता है कि वो योग की एबीसी भी शायद नहीं जानते। साध्वी चिदर्पिता की मानें तो योग का अर्थ होता है जोड़ना। जब योग को आध्यात्मिक घटना के तौर पर देखा जाता है तो योग का अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन। सरल शब्दों में कहा जाये तो, मनुष्य का ईश्वर से मेल। मानव मन को ईश्वर से जुडने के लिए मानसिक, आत्मिक और शारीरिक रूप से निरोगी होना जरूरी है। विकार युक्त मन से यह संभावना खत्म हो जाएगी। ध्यान से पहले के सभी आसन और प्राणायाम आदि उसी विकार मुक्त मन को पाने की कोशिश भर होते हैं। ये सही है कि रामदेव ने योग का बहुत प्रसार किया। इसे मुनियों की कुटी से निकाल कर घर-घर पहुंचा दिया। परंतु रामदेव का योग पेट कम करने, वज़न कम करने, जोड़ो के दर्द से छुटकारा पाने का व्यायाम बनकर ही रह गया। अब या तो रामदेव योग को इतना ही जानते हैं या फिर वो लोगों की रुचि और सुविधा के अनुसार इसे सीमित कर रहे हैं। योग के मामले में महर्षि पतंजलि के जो मूलमंत्र हैं, रामदेव का उससे भी कोई लेना देना नहीं है।
अब फैसला आप ही करें कि रामदेव योग की कितनी सेवा कर रहे हैं। हां वो आयुर्वेद में भी हाथ आजमा रहे हैं। आपको पता होगा कि आयुर्वेद भारत की सनातन चिकित्सा पद्धति है, जो कि पूरी तरह वैज्ञानिक है। ऋषि-मुनि वन में जीवन बिताते हुए जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों के लाभ और उपयोगों की खोज किया करते थे। यह अनुसंधान से कहीं ज्यादा तपस्या और समर्पण पर निर्भर था। वैसे आज के समय में उसकी जगह बीएएमएस डाक्टर ने ले ली है। सही मायने में इस डिग्री को हासिल करने के बाद ही कोई आयुर्वेदिक चिकित्सक के तौर पर प्रैक्टिस कर सकता है। अब रामदेव तो योगगुरु है, फिर उनके उत्पाद रामदेव के ही नाम पर बेचे जा रहे हैं। रामदेव की इस ईमानदारी का फैसला मैं आप पर छोड़ देता हूं। हालाकि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को मैं जानता हूं,वो कुछ भी अनाप शनाप बोलते रहते हैं। लेकिन जब रामदेव को वो ठग बताते हैं, तो मुझे लगता है कि उनकी बात में कुछ तो दम है। बालकृष्ण रामदेव के दोस्त हैं, शिष्य हैं, सहयोगी हैं या बिजिनेस पार्टनर ये तो वही बता सकते हैं। लेकिन सीबीआई को अभी तक वो आयुर्वेद की कोई मान्य डिग्री नहीं दिखा पाए हैं। उन्होंने अपनी शिक्षा की जो कुछ डिग्री पेश की है, जांच पड़ताल में वो फर्जी पाई गई हैं। वैसे डिग्री या उनके अन्य कागजात सही हैं या गलत इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन वारंट जारी होने पर उनके भाग जाने से साफ है कि दाल में कुछ काला जरूर है।
आइये एक नजर डालते हैं कि रामदेव बनाते क्या क्या हैं। साध्वी चिदर्पिता ने इस पर काफी अध्ययन किया है। उनका मानना है कि रामदेव फार्मेसी के नाम पर हर वह उत्पाद बना रहे हैं जो बाज़ार में पहले से मौजूद है। ऐसे में सवाल ये है कि रामदेव किस सामाजिक उद्देश्य से मोइश्चराइज़र, फेस क्रीम, साबुन और एंटि रिंकल क्रीम बना रहे हैं? यदि उन्हें योग पर भरोसा है तो मुंह पर तरह-तरह की क्रीमें क्यों मलवाते हैं ? आयुर्वेद के नाम पर बने ये कास्मेटिक उत्पाद बिना लाइसेन्स के हैं जो गैरकानूनी है। आपने वीको टर्मरिक का विज्ञापन देखा है? विज्ञापन में “विको टर्मरिक, नहीं कोस्मेटिक” ऐसा क्यों कहते हैं, कभी सोचा? उसी लाइसेन्स की बाध्यता के कारण जिसके बिना रामदेव करोड़ों का कारोबार धड़ल्ले से चला रहे हैं। पतंजलि उत्पादों पर एमआरपी के जरिए भी चोरी की जा रही है। भारत के टैक्स के नियम साफ कहते हैं कि एमआरपी का मायने ऐसा मूल्य है जिसमें सभी तरह के टैक्स का भुगतान किया जा चुका हैं। अब रामदेव धड़ल्ले से अपने उत्पादों पर एमआरपी लिख रहे हैं और कोई टैक्स नहीं भर रहे। देश में घूम घूम कर ईमानदारी पर लंबी चौड़ी बातें भी कर रहे हैं।
आइये रामदेव को भी जानने की कोशिश कर ली जाए। हिन्दू धर्म में संत की पहचान उसके संप्रदाय से होती है। यह व्यवस्था कुछ वैसी ही है जैसे समाज में जातियाँ। यहां बहुमान्य संप्रदाय सरस्वती संप्रदाय है जो आदि गुरु शंकरचार्य से प्रारम्भ है। यहां दीक्षित संत सन्यासी कहलाते हैं। यह संप्रदाय सनातन हिन्दू धर्म को मानने वाला है। जानकारी के अभाव में अधिकांश भगवाधारियों को समाज में सन्यासी ही मान लिया जाता है। अब रामदेव की बात की जाए तो ये आर्यसमाजी हैं। यह सनातन धर्म से बिल्कुल अलग धारा है। आर्यसमाज वेद को अपना आधार मानता है और सनातनी पद्धति का विरोध करता है। आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार फलित ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत हैं, वेद विरुद्ध हैं। आर्यसमाज को समझने के बाद मैं जानना चाहता हूं कि रामदेव ने आर्यसमाज के लिए क्या कार्य किया? वैसे तो पूरे पतंजलि योगपीठ में एक भी मूर्ति नहीं है, फिर भी अधिकांश लोग उन्हें सनातनी ही मानते हैं। किसी सन्यासी को आर्यसमाजी समझा जाए तो वह इसका मुखर होकर विरोध करता है, पर आर्यसमाजी संत रामदेव को लोग सनातनी संत मान रहे हैं और वे खामोश हैं।
इसी से जुड़ा एक सवाल करते हैं रामदेव से। आर्यसमाज तीर्थ यात्रा का विरोध करता है। रामदेव को बताना चाहिए कि हरिद्वार का उनके लिए क्या महत्व है? हरिद्वार, गंगा के कारण विश्व भर में हिन्दू तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है। पतंजलि योगपीठ को हरिद्वार जैसे तीर्थस्थल पर बनाना इसके महत्व को भुनाना ही था। जब आपके पंथ में तीर्थ का कोई महत्व ही नहीं है तो उसके नाम को भुनाना कैसी ईमानदारी है?
