Tuesday, 12 February 2013

बड़ा सवाल : क्या मूर्ख हैं रेलमंत्री ?


इसका जवाब सिर्फ यही है हां हमारे रेलमंत्री मूर्ख हैं, मैं कहूं कि बिल्कुल 24 कैरेट के मूर्ख हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। महाकुंभ में मौनी अमवस्या के दिन इलाहाबाद रेलवे प्लेटफार्म पर मची भगदड़ और उसमें मारे गए लोगों के बारे में चर्चा करूंगा पहले मैं आपको ये बता दूं कि जब से पवन कुमार बंसल रेलमंत्री बने हैं, वो कर क्या रहे हैं। सच बताऊं वो कुछ नहीं कर रहे हैं , रेल अफसरों के साथ बैठकर रेल को समझने की कोशिश भर कर रहे हैं। जिस तरह से रेलवे के मामले में उनके बयान आ रहे हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि रेलवे के बारे में उनकी जानकारी एक थर्ड क्लास यात्री से ज्यादा नहीं है। यही वजह है कि वो अफसरों के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं। उन्होंने आंखो पर काली पट्टी बांध रखी है और रेल अफसर महाभारत के संजय की तरह उन्हें जो समझाते हैं, उन्हें उतना ही समझ में आता है। रेलमंत्री बनने के बाद सिर्फ एक ही रोना रोए जा रहे हैं, रेलवे की माली हालत खराब है, इसलिए किराया बढ़ाना पड़ेगा।

किराया बढ़ाइये, मगर देश की जनता को गुमराह मत कीजिए। बार-बार कह रहे हैं कि रेलवे में 12 साल से किराया नहीं बढ़ा। अगर कोई रेलमंत्री ऐसी बात कहता है तो समझ लेना चाहिए कि वो रेलवे की एबीसीडी नहीं जानता। मैं आपको बता दूं कि चोर दरवाजे से रेलवे का किराया बढ़ाकर इन 12 सालों में किराया दोगुना से भी ज्यादा हो गया है। सच ये है कि रेलवे का किराया तर्कसंगत नहीं है। यानि आप स्लीपर क्लास में दिल्ली से इलाहाबाद का सफर करें तो किराया है 300 रुपये, वहीं एसी थ्री में चले जाएं तो किराया 810 रुपये हो जाता है, एसी सेकेंड में ये किराया 1155 रुपये हो जाता है। देश में मात्र 20 फीसदी लोग ही एसी कोच में सफर करते हैं, जिन पर हर साल किराए का बोझ बढ़ा दिया जा रहा है, इससे शोरगुल भी हो जाता है कि किराया बढा और रेलवे को अपेक्षित आय भी नहीं होती है। ऐसे में 80 फीसदी यात्री जिस क्लास में चलते हैं, वहां किराए को तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। खैर.. मैं देख रहा हूं कि बंसल जी जब मुंह खोलते है कि रेलवे का किराया बढ़ाने के अलावा कोई बात ही नहीं करते। बसंल जी थोड़ा रेलवे को और समझिए फिर मुंह खोलिए, कभी भी चुनाव हो सकते हैं, किराया-किराया ज्यादा शोर मत मचाइये। रेलवे के खजाने को दुरुस्त करने के तमाम और भी उपाय हैं, उन पर भी गौर कीजिए। पिछले दिनों जिस तरह से आपने किराया बढ़ाया है, ऐसे तो आज  तक किराया नहीं बढ़ा। इससे तो अच्छा है कि आप रेलवे में जेबकतरों की भर्ती कर लें, जो सफर के दौरान यात्रियों की जेब भी काटे। दो दिन से शोर मचा रहे हैं कि डीजल के दाम बढ़ गए,  अब किराया बढ़ाना जरूरी हो गया है। ये भी कहिए ना कि इलाहाबाद भगदड़ में कई लोगों के मारे जाने पर उन्हें मुआवजा देने से रेलवे पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा है, इसलिए किराये में और बढ़ोत्तरी और भी जरूरी हो गई है। इस बात को यहीं खत्म करते हैं, लेकिन किराए के मामले में थोड़ा पढ़े लिखों की तरह व्यवहार कीजिए।

चलिए इलाहाबाद की घटना का जिक्र कर लें। आपके रेलमंत्री रहते इलाहाबाद का ये महाकुंभ आपके लिए पहली चुनौती थी, जिसमें आप फेल हो गये। सच कहूं तो रेलमंत्री फेल नहीं हुए हैं, बल्कि अपनी गैरजिम्मेदार और गैरजरूरी बातों से ये भी साबित कर दिया कि वो कम से कम रेलमंत्री बनने के काबिल बिल्कुल नहीं हैं। जब से उन्होंने रेलमंत्री  के तौर पर मुंह खोलना शुरू किया है एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि कोई जनप्रतिनिधि बोल रहा है। हमेशा यही लगा कि कोई घुटा हुआ रेल का अफसर अपनी काली जुबान खोल रहा है। रेलवे का बचाव करना भी इन्हें नहीं आता। कह रहे हैं कि महाकुंभ में चार करोड़ लोग आए थे, और इतने लोगों की सुरक्षा करने में रेल महकमा सक्षम नहीं है। मुझे लगता है कि रेलमंत्री का गणित बहुत कमजोर है, चलिए कुछ दिन बाद ही सही जरा बता दीजिएगा कि रेलवे ने कितने लोगों को गन्तव्य तक पहुंचाया ? रेलमंत्री को कौन समझाए, कह रहे हैं कि इलाहाबाद में इतने ज्यादा लोग थे कि संभाल नहीं पाए, मैं पूछता हूं कि 2010 में छठ पूजा के दौरान दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गई थी, यहां भी कई लोगों की मौत हो गई थी, मंत्री जी यहां तो संख्या हजारों में भी नहीं थी। दरअसल मानना चाहिए की रेलवे में आज भी "प्रोफेशनल एटीट्यूड" की कमी है। इस पर ध्यान देने के बजाए झगड़ा ये हो रहा है कि इसमें गलती केंद्र सरकार की है या राज्य सरकार की।

राज्य सरकार की भी बात करुंगा, पहले जरा रेलवे के इंतजामों की बात कर लें। मैं जानना चाहता हूं कि दर्शनार्थियों की भीड़ एक ही जगह ना जमा हो जाए, इसके लिए क्या रेलवे ने कोई इंतजाम किया था। मसलन क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि बिहार की तरफ जाने वाली स्पेशल ट्रेनों को नैनी और करछना से संचालित किया जाता, जौनपुर, लखनऊ, फैजाबाद, गोंडा सुल्तानपुर की ओर जाने वाले यात्रियों को प्रयाग और फाफामऊ से ट्रेन की सुविधा दी जाती। इसले अलावा फतेहपुर, कानपुर दिल्ली की ओर जाने वाले यात्रियों को भरवारी या दूसरे किसी हाल्ट से ट्रेन मुहैया कराई जाती। छोटी लाइन की ट्रेन रामबाग से चलती ही है। इससे कम से कम इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर उतनी भीड़ नहीं होती, जितनी वहां हो गई थी। इलाहाबाद से लंबी दूरी के यात्रियों को ट्रेन दी जाती। मैं कहता हूं कि इसी तरह का कुछ और भी किया जा सकता था, जिससे कम से कम एक ही स्टेशन पर भीड़ का दवाब ना होता। आप सबको पता है कि खास मौकों पर स्नान के लिए यहां कई दिन पहले से लोग जमा होते हैं, लेकिन जाते एक ही दिन हैं। ऐसे में क्या ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता कि स्टेशन से काफी पहले टिकट खिड़की की सुविधा होती और ट्रेनों की क्षमता के अनुसार ही यहां टिकट देने के बाद खिड़कियां बंद कर दी जातीं और स्टेशन की ओर उन्हें ही आने की इजाजत होती, जिनके पास टिकट है।

मुझे याद है कि लखनऊ में मायावती की रैली में लगभग तीन लाख लोग यूपी से शामिल हुए और भीड़ का ठीक से प्रबंधन न कर पाने की वजह से यहां भगदड़ मची, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी। जब रेल महकमा लाख दो लाख लोगों का प्रबंध सही तरह से नहीं कर सकता है तो इतने बड़े मेले का प्रबंध भला वो क्या करेगा, फिर जब लल्लू टाइप रेलमंत्री हों तब तो बिल्कुल नहीं। इस हादसे की अभी जांच होनी है, जिससे तय होगा कि आखिर  चूक कहां हुई ? अभी ये पता किया जाना है कि आखिरी समय में ट्रेन का प्लेटफार्म क्यों और किसके आदेश पर बदला गया ? इसके पहले ही रेलमंत्री अपने महकमें को क्लीन चिट दे रहे हैं। कह रहे हैं कि रेलवे की ओर से सबकुछ ठीक था। सच बताऊं गाली देने का मन हो रहा है ऐसे मंत्री को, लेकिन क्या करें थोड़ी देर और मर्यादा में रह ही लेते हैं। पवन कुमार बंसल को ये नहीं दिखाई दिया कि हादसे के बाद घायलों को चादर और कंबल में उठाकर एंबूलेंस तक ले जाया जा रहा था, प्लेटफार्म पर स्ट्रेचर तक की व्यवस्था नहीं थी। हादसे के ढाई घंटे के बाद पहली एंबूलेंस लोगों को दिखाई दी, घटना स्थल पर तीन घंटे तक कोई डाक्टर नहीं आया। हादसे में मारे गए लोगों के शव चार घंटे तक प्लेटफार्म पर यूं ही पड़े रहे। इन सबके  बाद भी रेलमंत्री कहते हैं कि सबकुछ ठीक ठाक था।

आखिर में एक बात और रेलमंत्री ने साफ साफ कह दिया कि इतनी बड़ी भीड़ को संभालने में रेल महकमा असमर्थ है। बंसल जी अगर ऐसा है तो आपको एक मिनट भी रेलमंत्री रहने का हक नहीं है। सच तो ये है कि इस हादसे के पहले और बाद जो तस्वीर रेल महकमें के सामने आई है, कहीं से ऐसा नहीं लगा कि रेलवे ने भी कोई तैयारी की है। अब तैयारी भी भला क्या करते ? रेलमंत्री को सिर्फ किराया बढ़ाने से मतलब है, इसके अलावा वो कोई और बात करते ही नहीं है। खैर बंसल साहब जो हालात दिखाई दे रहे हैं उससे साफ है कि आप तो डूबेंगे ही रेलवे को भी डुबा देगें। फिलहाल सिर्फ एक बात आपको बता रहा हूं इसे ही गांठ बांध लीजिए, रेल के अफसरों पर भरोसा कम कीजिए, ये आपको कहीं का नहीं छोड़ेंगे। सारी गलत बातें मीडिया के सामने आपसे कहलाएंगे और खुद पाक साफ बने रहेंगे। समझ गए ना।

अब छोटी सी बात यूपी सरकार की। मैं राहुल गांधी के मुकाबले अखिलेश यादव को समझदार मानता था। मुझे लगता था कि इन्हें पता है कि मूली और आलू जमीन के अंदर लगते हैं और जबकि भिंडी और तरोई ऊपर लगता है। मतलब ये कि शासन- प्रशासन का बेसिक तो कम से कम यादव जी जानते ही होगे। मुख्यमंत्री जी राजकीय रेलवे पुलिस यानि जीआरपी रेलवे स्टेशन पर तैनात होती है। ये पुलिस राज्य सरकार के अधीन काम करती है। इनके ट्रांसफर, पोस्टिंग, दंड सबकुछ तो राज्य सरकार के हाथ में होता है। फिर आपात स्थिति में स्थानीय प्रशासन को असीमित अधिकार प्राप्त हैं। ये आपको पता है ना। अगर आपके प्रशासन को लगता है कि रेलवे की लापरवाही से कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है तो आपका प्रशासन कोई भी कड़ा फैसला कर सकता है। खैर आप तो शादी में व्यस्त थे, इसलिए आपको पूरी बात पता ही नहीं चली होगी,  अभी मेला महीने भर है और कई स्नान भी हैं, रेलवे के साथ तालमेल करके ऐसा प्रबंध करें कि अब आगे कुछ ना हो। भूल से भी ये मत कहिएगा कि राज्य सरकार का इससे कोई लेना देना नहीं है, वरना लोग हंसेगे।


Sunday, 3 February 2013

बीजेपी : डूबते को तिनके का सहारा !


देश की राजनीति और उसका चरित्र काफी कुछ बदल गया है। अब किसे नहीं पता है कि कांग्रेस की सरकार बनी तो उनका प्रधानमंत्री कौन होगा ? ये फैसला 10 जनपथ ही करेगा, और अगर किसी तरह एनडीए के पक्ष में बहुमत हुआ तो प्रधानमंत्री का फैसला नागपुर यानि आरएसएस मुख्यालय ही तो करेगा। मुझे तो नहीं लगता कि इस बात में किसी को किसी तरह का कोई कन्फ्यूजन होना चाहिए। लेकिन देश में एक राजनीतिक मर्यादा बनी हुई थी, पहले चुनाव होता है, फिर नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक में संसदीय दल का नेता चुना जाता है, जो राष्ट्रपति के यहां जाकर बताता है कि सांसदों ने उसे नेता चुनाव है, अब उसे सरकार बनाने का मौका दिया जाए। लेकिन अब तो चुने जाने वाले सांसदों का नेता चुनने का अधिकार पहले ही छीन लेने की साजिश चल रही है। मसलन अगर प्रधानमंत्री  कौन होगा, ये पहले ही तय हो जाए तो चुने हुए सांसदों से क्या मशविरा लिया जाएगा। खैर ये बड़ी बात नहीं है, ये तो राजनीतिक चरित्र में गिरावट का एक नमूना भर है।

आज देश की निगाह सबसे बड़े विपक्षी दल यानि बीजेपी पर लगी हुई है। ये वो पार्टी है जिसे अपने चाल चरित्र और चेहरे पर गुमान था। लेकिन ये चेहरा भी अब दागदार है। कुछ साल पहले बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण कैमरे पर पैसे लेते हुए पकड़े गए, उन्हें अध्यक्ष का पद गवांना पड़ा। अब कुछ ऐसा ही भ्रष्ट आचरण दिखा बीजेपी के दूसरे पूर्व अध्यक्ष नीतिन गड़करी का। हालांकि नागपुर तो उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाने को लेकर उतावला था, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के अड़ जाने से गड़करी को ये पद छोड़ना पड़ा। इन दो अध्यक्षों ने पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया है। वैसे भी ईमानदारी से अगर बात की जाए तो गड़करी अध्यक्ष तो थे नहीं, वो एक पुतला भर थे, जिन्हें कुर्सी पर बैठाकर उनमें अध्यक्ष पद की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई थी। उनका काम नागपुर के आदेश को महज पार्टी के लोगों तक पहुंचाना भर था। ठीक उसी तरह जैसे बिग बास के शो में बिग बास एक लिखित आदेश दिया करते थे और वो पत्र घर का कोई एक सदस्य सबको सुना देता था। चलिए इस पर ज्यादा बात नहीं करते हैं, ये कह कर बात को खत्म करते हैं कि अब बीजेपी को चाल, चरित्र और चेहरे का दावा करना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि असलियत सामने आ चुकी है।

यहीं छोटी सी बात नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह की कर ली जाए उसके बाद प्रधानमंत्री पद को लेकर छिड़ी बहस को आगे बढ़ाते हैं। राजनाथ सिंह सुलझे हुए नेता है, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन किसी भी बड़े मुद्दे को सुलझाने की क्षमता उनमें नहीं है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने पिछली बार उनकी बहुत छीछालेदर की। वो जो भी कहते वसुंधरा मानने से ही इनकार कर देतीं। बहरहाल वरिष्ठ नेताओं के सहयोग से किसी तरह बीच बचाव हो पाया था। इस बार अध्यक्ष बनते ही श्री सिंह ने वसुंधरा को उनकी मर्जी के मुताबिक पद देकर खुश कर दिया, जिससे बेवजह की मुश्किल से बचा जा सके। वैसे उन्हें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी का अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों बनने का मौका मिला, यहां तक कि वो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं। लेकिन वो कभी भी यूपी में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी को जीत नहीं दिला सके। इसलिए वो किसी नेता को बहुत अधिकार के साथ आदेश नहीं दे सकते, क्योंकि आज तक राजनाथ अपनी सियासी जमीन को बहुत मजबूत नहीं बना पाए हैं।

वैसे सच यही है कि बीजेपी एक डूबते हुए जहाज से ज्यादा कुछ नहीं थी, लेकिन केंद्र में आजादी के बाद अब तक की सबसे भ्रष्ट और कमजोर सरकार की वजह से लोग एक बार फिर बीजेपी की ओर उम्मीद से देख रहे हैं। सब जानते हैं कि यूपीए (एक) में ही प्रधानमंत्री मनमोहन बुरी तरह फेल हो चुके थे, उनके कमजोर नेतृत्व की वजह से देश की अर्थव्यवस्था तो पटरी से उतरी ही, मंत्रिमंडल भी चोरों की जमात साबित हुई। जिसे देखो वही भ्रष्ट निकला। ऐसे में कांग्रेस को चाहिए था कि यूपीए (दो) में मनमोहन सिंह को सम्मानजनक तरीके से बाहर का रास्ता दिखा दे, लेकिन 10 जनपथ को मजबूत प्रधानमंत्री के बजाए कठपुतली प्रधानमंत्री ही शूट कर रहा था, इसलिए जनाब मनमोहन सिह की दोबारा लाटरी निकल गई। अगर सोनिया गांधी ने दूसरी बार मनमोहन के बजाए प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाया होता तो आज तस्वीर बिल्कुल अलग होती। बहरहाल सरकार की भ्रष्ट करतूतों की वजह से ही देश में बदलाव का एक संदेश है। लोगों को लग रहा है चूंकि विपक्ष में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए प्रधानमंत्री तो बीजेपी का ही बनेगा।

नीतीश जी इस तस्वीर में आप ही हैं ना  ?
कहावत सुना ही है आप सबने कि डूबते को तिनके का सहारा। ऐसा ही कुछ बीजेपी में नरेन्द्र मोदी के साथ है। गुजरात में नरेन्द्र मोदी की वापसी हो गई है, लेकिन कितनी मुश्किल थी ये वापसी, ये बात खुद नरेन्द्र मोदी जानते हैं। चूंकि इस चुनाव में मोदी का पूरा राजनैतिक कैरियर दांव पर लगा था, लिहाजा उन्होंने ये नहीं देखा कि उनका कौन सा उम्मीदवार भ्रष्ट है, किसकी छवि खराब है, किसके ऊपर गंभीर आपराधिक मामले हैं। मोदी ने सिर्फ ये देखा कि कौन आदमी चुनाव जीत सकता है। खैर नतीजा आ चुका है और हम कह सकते हैं कि जो जीता वही सिकंदर । इसलिए अब मोदी की, उनके भ्रष्ट मंत्रियों की, उनके दागी विधायकों की या फिर गुजरात में अधूरे विकास कार्यों की चर्चा करना बेमानी है। बीजेपी को लगता है  कि नरेन्द्र मोदी के सहारे वो दिल्ली में सरकार बना सकती है। पार्टी के दो चार बड़े नेता भले अपने बंगले के भीतर चुपचाप बैठे हों, पर पार्टी के 90 फीसदी नेताओं ने मोदी की चरणवंदना शुरू कर दी है, सभी जोर लगा रहे हैं कि पार्टी उन्हें तत्काल प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दे।

पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी लग रहा है कि प्रधानमंत्री पद को लेकर ही विवाद बना रहे थे तो ज्यादा बेहतर है, वरना सामान्य हालात होते तो उन्हें जिस तरह आनन- फानन में अध्यक्ष बनाया गया है, पार्टी में इसे लेकर भी बहस शुरू हो जाती, क्योंकि राजनाथ भी पार्टी में अविवादित नहीं हैं। बीजेपी में जिस तरह से राजनीतिक घटनाक्रम चल रहा है उससे साफ है कि जल्दी ही मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाएगा। इसके पहले उन अड़चनों को समाप्त कर रास्ता बनाने की कोशिश हो रही है। इसके लिए बीजेपी की संसदीय बोर्ड में नरेन्द्र मोदी को शामिल करने की कोशिश शुरू हो गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पार्टी के दूसरे मुख्यमंत्री इसका विरोध ना करें, इसलिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को भी बोर्ड में शामिल किया जा सकता है। मोदी की हिंदुत्व की छवि को भुनाने के लिए ही पार्टी चाहती है मोदी के नाम का ऐलान इलाहाबाद कुंभ मेले में साधु संतो से कराया जाए। खैर पार्टी ने तय कर लिया है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, अब इसके ऐलान का तरीका क्या हो, इस पर ही चर्चा हो रही है।

इस फैसले में एक बड़ा मुद्दा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। ध्यान रखिएगा मुद्दा जेडीयू का नहीं है सिर्फ नीतीश कुमार का है। नीतिश को लगता है कि बिहार में मुस्लिम वोटों को अपने साथ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मोदी से दूरी बनाए रखें। चलिए नीतीश से सवाल करता हूं, क्योंकि वो मोदी को गुजरात दंगों के लिए दोषी मानते हैं। नीतीश जी ट्रेन की बोगी में आग लगाकर तमाम लोगों को आग के हवाले कर दिया गया था और उसके बाद पूरे गुजरात में दंगा भी भड़का। आप उस वक्त रेलमंत्री थे, अगर मोदी को जिम्मेदार मान रहे थे तो उसी समय आपने ऐसा दबाव क्यों नहीं बनाया कि मोदी से इस्तीफा लिया जाए ? और अगर बीजेपी इस्तीफा नहीं ले रही थी तो आप सरकार से क्यों नहीं अलग हो गए ? कहावत है गुड़ खाए गुलगुला से परहेज ! आज भी उसी बीजेपी की मदद से सरकार चला रहे हैं, अगर आपको लगता है कि मोदी से दूरी रहनी चाहिए तो आपको खुद गठबंधन तुरंत तोड़ देना चाहिए। नीतीश जी ये आप ही कर सकते हैं कि बाप से दोस्ती और बेटे से नाराजगी। हाहाहाहाहा।

मेरा मानना है कि नीतीश कुमार जितना विरोध कर रहे हैं उसकी वजह बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी हैं। उप मुख्यमंत्री होते हुए सुशील ने कभी पार्टी के पक्ष को या फिर नरेन्द्र मोदी के मामले में जिम्मेदारी के साथ बिहार में अपना पक्ष नहीं रखा। आज अगर वहां सुशील मोदी के बजाए किसी दूसरे नेता को उपमुख्यमंत्री बना दिया जाए तो नीतीश कुमार की भी बोलती बंद हो जाएगी। सच तो ये है कि सुशील मोदी ने बिहार बीजेपी को नीतीश कुमार के यहां गिरवी रख दिया है। बीजेपी के समर्थन से सरकार चला रहे हैं फिर भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा साधु संत या नागा से क्यों करेंगे ? लेकिन  बीजेपी ने भी जेडीयू को खरा खरा जवाब  दे दिया है कि साधु संत नहीं करेंगे तो क्या आतंकवादी हाफिज सईद करेगा। दोनों के बीच जिस तरह से बात चीत चल रही है उससे तो लगता है कि गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चलने वाला, लेकिन ये राजनीति है कहीं ये दोनो मिल कर खेल ना खेल रहे हों, कुछ नहीं कह सकते।

वैसे ये तो सही बात है कि अगर बीजेपी ने मोदी को आगे किया तो दूसरे दलों के लिए मुश्किल तो बढेगी। खासतौर पर बेचारे राहुल गांधी के जरूर पसीने छूट जाएंगे। मोदी जितने आक्रामक तरीके से अपनी बात रखते हैं राहुल इतनी जल्दी जल्दी लिखा हुआ पर्चा पढ भी नहीं पाते हैं। वैसे कांग्रेसी मेरी सलाह नहीं मानेंगे, लेकिन मुझे लगता है कि अब सोनिया गांधी को अपने राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के बजाए शंकर सिंह बाघेला को बना लेना चाहिए। सभी  को पता है बाघेला ही मोदी के गुरु रहे हैं, ऐसे में मोदी की काट तो बाधेला के पास ही होगा।

चलते - चलते  

मेरे नए ब्लाग  TV स्टेशन पर पढ़ना ना भूलें  मीडिया : ये कहां आ गए हम ! चलिए लिंक भी दे रहा हूं। मुझे लगता है कि आप सबको ये भी मालूम होना चाहिए कि अखबारों में, टीवी न्यूज में या फिर मनोरंजक चैनलों पर आखिर चल क्या रहा है। फिलहाल तो मीडिया को देखिए ...  http://tvstationlive.blogspot.in/2013/02/blog-post.html#comment-form



Monday, 28 January 2013

पदम् सम्मान : जूते घिसने से नहीं बेचने से मिलता है !


आज बात पदम् सम्मानों की ! लोग इस सम्मान के लिए सालों साल जूते घिसते रहते हैं, फिर भी निराश होना पड़ता है। वैसे अंदर की बात कुछ और है, उन्हें पता नहीं है कि पदम् सम्मानों के लिए जूते घिसना जरूरी नहीं है, बल्कि जूता बेचना जरूरी है। मैं पहले  ही समझ रहा था कि ये बात आपकी समझ में आसानी से नहीं आएगी। चलिए बता देता हूं कि सम्मान का क्राइट एरिया दिल्ली में कैसे तय किया जाता है। अब देखिए ना तमाम बड़े बड़े खिलाड़ी हैं, जिन्हें आज तक पदम् सम्मान मिलना तो दूर, उनका जिक्र तक नहीं हुआ। जबकि क्रिकेटर्स  को कीनिया के खिलाफ शतक बनाते ही सबसे पहले जूते बेचने का विज्ञापन मिल जाता है। अब चैनलों पर दिन भर जूता बेचता जब कोई खिलाड़ी दिखाई देता है तो दिल्ली के अफसरों और नेताओं को भी लगता है कि यार ये खिलाड़ी तो बड़ा पापुलर है । ये खेल में उसके योगगान को नहीं देखते, बस उसके हाथ में जूता देखने पदम सम्मानों में नाम शामिल कर देते हैं।
अब इस बार के सम्मान को ही ले लीजिए, लोग उंगली उठा रहे हैं। कह रहे हैं इन्हें देना चाहिए था, उन्हें नहीं देना चाहिए था। मजेदार बात तो ये है कि जिन्हें नहीं मिला वो तो नाराज हैं ही, जिन्हें मिला वो भी नाराज हैं। बहरहाल मुझे लगता है कि शटलर साइना नेहवाल और शूटर गगन नारंग को इस बार जरूर पदम सम्मान से नवाजा जाना चाहिए था, दोनों ने ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन किया है। लेकिन सरकारी सूची में इन दोनों का नाम ना देखकर मैं ही क्या पूरा देश हैरान रह गया। मेरा दावा है कि अगर देश में मतदान करा लिया जाए कि इन दोनों को सम्मान मिलना चाहिए या नहीं, तो मुझे लगता है कि सौ फीसदी लोगों का एक  ही जवाब होगा कि इन्हें सम्मान जरूर देना चाहिए। ऐसे में अगर इन दोनों खिलाड़ियों ने नाराजगी जताई है तो इसमे गलत कुछ नहीं है।

हम सब ना पहलवान सुशील कुमार को भूले हैं और ना ही उनके योगदान को भुलाया जा सकता है। सुशील ने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीत कर देश का गौरव बढ़ाया है। उन्हें 2011 में पद्मश्री दिया गया था। हम सबको उम्मीद थी कि इस बार उन्हें पद्म भूषण से नवाजा जाएगा, लेकिन उनका नाम शामिल नहीं किया गया। पता चला है कि खुद खेल मंत्रालय ने उनके नाम की सिफारिश की थी, फिर भी उनके  नाम को शामिल  नहीं किया गया। अब सुशील तो देश के लिए पदक जीतने के लिए जूता घिसते रहते हैं, अब वो  जूता बेचते तो हैं नहीं, तो भला उनके नाम को कैसे शामिल किया जाता। मैं सचिन का सम्मान करता हूं लेकिन देखिए ना उन्हें "भारत रत्न" देने के लिए इस सरकार ने आनन-फानन में नियमों में बदलाव कर दिया। हालाकि ये अलग बात है कि अब सचिन को भारत रत्न देने की मांग ठंडी पड़ चुकी है, लेकिन सुशील जैसे खिलाड़ियों के लिए सरकार गूंगी बन जाती है।

देश  की विभिन्न भाषाओं में 20 हजार से ज्यादा गाना गाने वाली पार्श्वगायिका एस जानकी का नाम इतनी देर में पदम् सम्मान की सूची  में शामिल किया गया तो वो नाराज हो गईं। उन्होंने इस सम्मान को लेने से ही इनकार कर दिया। मुझे लगता है कि उनका गुस्सा जायज है और उन्होंने सरकार की आंख खोलने के लिए सम्मान को ठुकरा कर ठीक ही किया। लेकिन जानकी मेम तो गुस्सा जताकर हल्की हो गईं। पर सरकार के कारिंदों ने जो कुछ सदाबहार हीरो स्व. राजेश खन्ना के साथ किया है उसके लिए तो इन्हें जितना भी दंड दिया जाए वो कम है। राजेश खन्ना ने कई साल तक  देश और दुनिया में अपने करोंडो प्रशंसकों के दिलों पर राज किया, लेकिन उन्हें तब सम्मान देने का फैसला लिया गया जब  वो इस सम्मान को हासिल करने के लिए खुद इस  दुनिया में नहीं हैं। मेरा सवाल है कि राजेश खन्ना को सम्मानित करने में इतनी देरी क्यों की गई ? क्या आपको  नहीं लगता कि इसके लिए जिम्मेदारी तय कर दोषी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

सच बताऊं ये राष्ट्रीय सम्मान धीरे धीरे अपनी गरिमा को खोते जा रहे हैं। इसकी वजह और कुछ नहीं बल्कि सम्मान में सियासत का घुसना है। अब देखिए ना ये अपने ही देश में  संभव  है कि दो कौड़ी के नेता जिनका कोई सम्मान नहीं, वो ही सम्मान पाने वालों की सूची तैयार कराने में अहम भूमिका निभाते हैं। मैं शहर और शिक्षिका का नाम नहीं लूंगा, लेकिन एक सच्ची घटना बताता हूं। कुछ साल पहले की बात है एक शिक्षिका ने पता नहीं कैसे जोड़ तोड़ करके अपना नाम राष्ट्रपति पुरस्कार की सूची में शामिल करा लिया। शिक्षक दिवस पर उक्त  शिक्षिका को सम्मान दिया जाना था। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय प्रशासन को शुरू में विश्वास में ही नहीं लिया गया, बाद में जब पुरस्कार देने की तारीख नजदीक आई तो उस शिक्षिका के बारे में स्थानीय प्रशासन से एक रिपोर्ट मांगी गईं। अब  जिलाधिकारी हमारे परिचित थे, उन्होंने मुझे बताया कि फलां शिक्षिका को राष्ट्पति सम्मान मिलना है, मुझसे रिपोर्ट मांगी गई है।

ओह! कसम से नाम सुनकर मैं हैरान रह गया। जिलाधिकारी को मैने कहा कि आपको सही सही रिपोर्ट भेजनी चाहिए। बेचारे नौजवान थे, कहने लगे श्रीवास्तव जी क्यों  मुझे  मुश्किल में डालने की बात कर रहे हैं। बताइये इस शिक्षिका ने अगर अपना नाम शामिल करा लिया है तो ऐसे ही तो कराया नहीं होगा, जाहिर है उसके संपर्क बहुत ऊपर तक होंगे, मेरा  इसके बारे में खिलाफ रिपोर्ट देना ठीक नहीं रहेगा। वो काफी देर  तक मेरे साथ माथापच्ची करते रहे, बाद में तय हुआ कि इस टीचर की रिपोर्ट के साथ कई और नाम भेज देते हैं, जो वाकई इस सम्मान के काबिल हैं। मुझे भी लगा कि ये ठीक है, उन्होंने ऐसा किया और सम्मान को लेकर विवाद की स्थिति बन गई और किसी भी नाम  को शामिल नहीं किया गया। ये सब  देखने के बाद लगता है कि राष्ट्रीय सम्मान भी मकसद खोते जा रहे हैं।  बहरहाल इस मामले में सरकार को गंभीर होना पड़ेगा।


Sunday, 20 January 2013

साला मैं तो साहब बन गया ....


फिलहाल तो आज की ताजा खबर यही है कि राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाकर कहा गया है कि अगर 2014 में प्रधानमंत्री बनना है तो अभी से मेहनत करो। अंदर की बात तो ये है कि राहुल गांधी कांग्रेसियों की इस चाल को बखूबी समझते हैं, लिहाजा पहले तो वो इसके लिए कत्तई राजी नहीं थे, लेकिन बहन प्रियंका की बात वो टाल नहीं पाए और मां की मदद के लिए बड़ी जिम्मेदारी उन्होंने स्वीकार कर ली। जैसे ही ये खबर बाहर आई, मीडिया ने इसे हांथो हाथ लिया और दुनिया भर में बात पहुंच गई राहुल नंबर दो बने, राहुल नंबर दो बन गए। बहरहाल मुझे तो इस फैसले पर कोई ज्यादा हैरानी नहीं हुई, क्योंकि मेरा पहले से मानना रहा है कि राहुल गांधी सामान्य कार्यकर्ता नहीं है, उनकी हैसियत पार्टी में पहले नंबर की है, हां अब जरूर अधिकारिक रूप से वो नंबर दो हो गए हैं। अब ये तो पार्टी समझे, लेकिन मुझे लग रहा है कि कांग्रेस में एक अकेला नौजवान था जो थोड़ा बहुत काम कर लेता था, मसलन मजदूरों के साथ मिट्टी उठाकर खुद को सामान्य व्यक्ति बताना। दलित के साथ भोजन कर अखबारों की सुर्खियां बटोरने का काम कभी कभार कर लेते थे। वैसे राहुल चालाक बहुत है, दलितों के यहां तो बहुत बार भोजन कर लिया, लेकिन अपने यहां उन्हें भोजन पर कभी नहीं बुलाया। खैर अब तो राहुल भी साहब बन गए हैं, देखिए पार्टी का क्या होता है।

साहब बनने के बाद जयपुर में पहला भाषण ! साउथ वालों के लिए अंग्रेजी में नार्थ वालों के लिए हिंदी में और कुछ इमोशनल बातें भीं। पहले राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी की हत्या का जिक्र किया और फिर पिता राजीव गांधी का जिक्र करना भी नहीं भूले। लेकिन अंत में उन्होंने बताया कि कल उनकी मां सोनिया गांधी उनके कमरे में आईं और रोने लगीं। उन्होंने कहा कि सत्ता जहर के समान है। सच है एक मां के तौर पर सोनिया का भावुक होना स्वाभिवाक है, उन्होंने घर में दो लोगों की हत्या देखी है। ऐसे में आंखे भर आना स्वाभाविक है। पर सोनिया जी को उन आंसुओं का भी अहसास होना चाहिए जो 84 के दंगे में बेवजह मारे गए। कितनी मां की गोद सूनी हो गई, कितनी बहनों की मांगे सूनी हो गईं। लोगों को टायरों में बांध कर सरेआम जला दिया गया। सबसे ज्यादा शर्मनाक तो ये कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से इस मामले में सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। खैर ये समय नहीं है इन बातों का, लेकिन आंसू सिर्फ सोनिया की आंखों में नहीं है, दिल्ली और देश के तमाम हिस्सों मे रहने वाली मां और बहनों के आंखो में भी हैं।

काम करने वाला 1 नेता कम हुआ
बेवजह इमोशनल बातें मैने भी शुरू कर दी, अच्छा खासा राजनीतिक बातें हो रहीं थी, पर आंसू, मांग, सिंदूर खैर छोड़िए। आइये राजनीति पर ही बात करते हैं। आज राहुल ने पार्टीध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम भले ना लिया हो, लेकिन पार्टी कैसे चल रही है, इसे लेकर इशारों इशारों में नेताओं को खूब खरी खोटी सुनाई। कहा कांग्रेस बहुत मजेदार संगठन है, यहां कोई नियम कानून नहीं है। कब नियम बनते हैं और टूटते हैं, पता नहीं चलता। उन्होंने कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी पीड़ा चुनावों में टिकट वितरण को लेकर होने वाली धांधली पर भी बेबाक राय रखी और कहाकि उन्हें पता है कि चुनाव में आलाकमान से उम्मीदवार आप सब पर थोपा जाता है, जिलाध्यक्षों की कोई राय नहीं ली जाती है। अक्सर देखा गया है कि पार्टी नेताओं की उपेक्षा कर हाईकमान दलबदलुओं को टिकट थमा देता और वो नेता चुनाव लड़ता है, हार जाता है, फिर पार्टी से भाग भी जाता है। राहुल ये बात किसे समझा रहे थे, किसे ये बात नहीं मालूम है। राहुल क्या ये बताना चाह रहे थे कि राष्ट्रीय महासचिव था तो उनकी नहीं सुनी जा रही थी, अब वो उपाध्यक्ष बन गए हैं तो सारे घर के बदल डालेंगे। सच्चाई तो ये है चुनाव में उम्मीदवारों की सूची पर अंतिम मुहर ही राहुल गांधी लगाते रहे हैं। यूपी चुनाव में तो उन्होंने एक एक आदमी का इंटरव्यू लिया फिर तमाम बाहरी लोगों को टिकट मिला।

अब आज राहुल गांधी अपनी ही पार्टी कांग्रेस के संगठन पर हस रहे हैं तो जाहिर है वो अपने पर और मां सोनिया गांधी के काम पर ही हस रहे होंगे। या फिर वो सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेते कि आगे से अपने मन से काम करेंगे। वरना देश में तो यही संदेश है कि फिलहाल दिग्विजय सिंह उनके राजनीतिक गुरू हैं, जो बातें दिग्गी गुरु उन्हें समझाते हैं, वहीं से वो आगे बढ़ते हैं, तो क्या अब राहुल उनसे अलग हो रहे हैं। वैसे भी दिग्विजय अपने बयानों को लेकर विवादित हो गए हैं कि राहुल गांधी से उनका नाम जुड़ना ठीक भी नहीं है। अच्छा राहुल ने आज ये तो बता दिया सबको कि अब वो बर्दाश्त नहीं करेंगे, बल्कि बदलाव करेंगे। ऐसा भी नहीं है कि वो सिर्फ नवजवानों की बात सुनेगें, कह रहे हैं कि पार्टी में सभी की बात सुनेंगे। खैर अच्छी बात है, लेकिन सच बताऊं राहुल को लेकर देशवासियों का अनुभव बहुत खराब रहा है।

राहुल जी अब आपको  अपना पुराना ढर्रा भी बदलना होगा। पार्टी  के नेता और देशवासियों को भी पता है कि जब सोनिया गांधी इलाज के लिए बाहर गई थीं तो चार नेताओं की एक टीम बनाई गई थी, जिसमें आप भी शामिल थे। कहा गया था कि ये टीम पार्टी का कामकाज चलाएगी। हुआ क्या ? याद दिलाऊं आपको ?  अन्ना का आंदोलन शुरू हो गया, हजारों लोग कई दिनों तक सड़कों पर रहे, लेकिन आपने एक बार भी मुंह नहीं खोला। चुनाव  में टिकट वितरण में धांधली की बात कह कर आप कार्यकर्ताओं की ताली ले रहे हैं, मुझे बताइये कि पिछले दिनों तो चुनाव समन्वय समिति का अगुवा आपको ही बनाया गया था, आप ने इसे रोकने के लिए किया क्या ? दिल्ली गैंगरेप  के मामले में पूरे देश में गुस्सा देखा गया। आपका कहीं पता नहीं चला कि आप हैं कहां। हालाकि मुझे सच में नहीं पता है लेकिन कहा जा रहा कि आप छुट्टी पर गोवा में थे। अब ये सब नहीं चलेगा। खैर भइया राहुल ये आप भी जानते हैं और ये पब्लिक है ये भी सब जानती है। राहुल एक बात आपको कान में बता दूं। क्या जरूरत थी डीएनए वगैरह की चर्चा करने की। बोले जा रहे हो कांग्रेसियों में हिंदुस्तान का डीएनए है। कराऊं जांच, इन सब मामलों  में खामोश रहना चाहिए। 127 साल पुरानी कांग्रेस के आप तीसरे उपाध्यक्ष हैं, इन्ज्वाय कीजिए। लेकिन हां आपको पता है ना कि आपको करना क्या है ? नहीं पता ! कोई बात नहीं हम बता देते हैं। दरअसल नौ साल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जितना गोबर किया है, आपको उसी गोबर से गैस बनानी है और उससे गुब्बारा फुलाकर बच्चों को बांटना है। दरअसल बच्चे खुश दिखते हैं देश खुशहाल दिखता है।

सोनिया गांधी : 

पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जयपुर के चिंतन शिविर में तमाम जोक्स सुनाकर लोगों की खूब ताली बटोरी। उन्होंने कहाकि मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बहुत अच्छी सरकार चल रही है। हाहाहाहाह । सोनिया जी इतनी अच्छी सरकार चल  रही है तो चिंतन शिविर क्यों ? फिर तो मौज मस्ती शिविर होना चाहिए था ना। बेचारे प्रधानमंत्री की मुश्किल से तो लोग हंसते  हंसते लोटपोट हो गए।  उन्होंने कहाकि पैसा हम देते हैं, योजनाएं हम बनाते हैं और राज्य सरकारें काम अपने नाम से करा लेती हैं। प्रधानमंत्री जी आप तो समझदार आदमी हैं, कोई दिग्विजय सिंह तो हैं नहीं कि कुछ भी बोलें। अरे आप पैसा अपने घर से नहीं देते हैं, देश की जनता के टैक्स के पैसे ही आप विकास कार्यों के लिए देते हैं। आप पैसे की बात ऐसे कहते हैं, जैसे आप घर की खेती की पैदावार को बेचकर जो पैसे मिलते हैं वो राज्यों को दे रहे हैं। प्रधानमंत्री जी अपनी और पद की गरिमा के अनुरूप बोला कीजिए।