Wednesday, 5 December 2012

गीर अभ्यारण : शेर ही शेर


गुजरात में चुनावी चौपाल की भागमभाग के बीच एक दिन समय निकाल कर हम सब पहुंच गए जूनागढ़ में गीर के जंगलों में। वैसे तो मैं कई बार जिम कार्बेट, नेशनल दुधवा पार्क गया हूं, लेकिन आज तक मैं शेर के दर्शन नहीं कर पाया था। हां पिछली दफा दुधवा नेशनल पार्क में जरूर एक शेर की पूंछ दिखी थी, क्योंकि वो महज 30 सेकेंड में जंगल में गुम हो गया। लेकिन मेरी वर्षों की हसरत पूरी हुई इस गीर कें जंगल में। इस जंगल में इतने शेर देखे कि अगर मैं ये कहूं कि यहां मैने कुत्तों की तरह शेर देखे, मतलब जिस तरह आपको जहां तहां कुत्तों के झुंड दिखाई दे जाते हैं, उसी तरह गीर फारेस्ट में शेरों के साथ है।

अच्छा शेर को देखने का अपना अलग आनंद है, लेकिन आप अंदाज नही लगा सकते कि हम सब उसके कितने करीब थे। हमारे और शेर के बीच फासला महज तीन चार मीटर का रहा है। एक बार तो मुझे लगा कि शेर ये नहीं शेर तो हम हैं जो जानते हुए कि ये मिनट भर में हम सब की ऐसी तैसी कर सकता है, फिर भी हम डटे हुए थे। आज हम सबको लग रहा था कि शायद ऐसा मौका फिर ना मिले, लिहाजा कैमरे रुक ही नहीं रहे थे।  शेर को भी ना जाने क्या सूझ रहा था, वो भी कैमरे को देखकर तरह तरह के पोज बना रहा था। पहले तो वह जंगल के बीच था, उसे लगा कि हम सबको तस्वीर लेने मे दिक्कत हो रही है, लिहाजा वो पूरे परिवार के साथ खुद ही सड़क के बीचो बीच आया और लेट गया।

जंगल मे घूमने के दौरान यहां के डीएफओ डा. संदीप कुमार हमारे साथ थे। वो जंगल की बारीकियां हमें बता रहे थे। उनके महकमें के ट्रैकर जंगल मे तैनात थे, जो सभी वाकी टाकी से जुड़े हुए हैं। डा कुमार पूछते कि इस वक्त कहां कहां शेर मौजूद है। कई लोकेशन से मैसेज मिल गया, जिससे शेरो को हमने आसानी से देख सके। इन दिनों टेलीविजन और रेडियो पर एक विज्ञापन आ रहा है। जिसमें सदी के महानायक अमिताभ बच्चन पर्यटकों को गुजरात आने का न्यौता दे रहे हैं। वे बताते हैं कि गुजरात के गीर के जंगलों में शेर देखने आइये। जहां राजा और प्रजा सब साथ मिलकर रह रहे हैं। वैसे तो ये महज पर्यटक विभाग का एक विज्ञापन भर है, लेकिन बताते हैं कि अमिताभ भी यहां शेरों को देख काफी खुश थे। अमिताभ ने ट्विटर पर लिखा है कि मुझसे केवल पाँच फुट की दूरी से शेर गुजरे.. अमेजिंग..। नर, मादा, शावक.. मेरी ओर आए, मुझे देखा और आगे बढ़ गए। उन्होंने लिखा है कि जो कुछ मैंने देखा, उस पर मुझे विश्वास ही नहीं हुआ।

वैसे इस जंगल मे कई तरह के अनुभव हुए। मेरे समझ नहीं आ रहा था कि क्या शेर किसी पर रहम कर सकता है? क्या वह किसी को जीवन भी दे सकता है ? क्या उसके सामने आ जाने पर कोई भी अपने स्थान पर यूं ही खड़ा रह सकता है ? उसके पैने नुकीले दांतों और लंबे-लंबे नाखूनों में लगे खून को देखकर भी कोई भयमुक्त हो उसके सामने खड़ा रह सकता है ? क्या शेर शाकाहारी हो सकता है ? ये तमाम ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर मैं अभी भी नहीं तलाश पाया हूं। अच्छा एक दो जगह नहीं इसी जंगल में कई जगह शेर मिले और सभी के बहुत करीब जाकर हम सबने तस्वीरें लीं। वैसे सच बताऊं मन में तो शैतानी सूझ रही थी कि एक ईंट इसकी ओर दे मारूं, फिर देखूं क्या करता है ? हाहाहहाहा

आपको बता दूं कि दुनिया दुनिया भर मे जहां सरंक्षित वन्य जीवों की संख्या लगातार घट रही है वहीं गुजरात में एशियाई शेरों की संख्या में काफी बढोत्तरी हुई है। गुजरात के इस गीर अभ्यारण और आस पास के इलाकों में शेरों की गिनती का काम पूरा हो चुका है और नतीजे काफी उत्साहजनक आए हैं. पिछले तीस सालों में गीर के शेरों की संख्या दुगनी हो गई है। नई गणना के अनुसार यहां 411 शेर विचरण करते हैं। बताया गया कि 1979 में यहाँ केवल 205 शेर ही बचे थे, लेकिन अब शेरों को बचाने का अभियान अपना असर दिखा रहा है और शेरों की संख्या लगातार बढ रही है।

गीर जंगल के बारे में भी दो चार बातें ना लिखूं तो इस अभ्यारण की कहानी अधूरी रह जाएगी। वन्य जीवों से भरा गिर अभ्यारण्य लगभग 1424 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस वन्य अभ्यारण्य में अधिसंख्य मात्रा में पुष्प और जीव-जन्तुओं की प्रजातियां मिलती है। यहां स्तनधारियों की 30 प्रजातियां, सरीसृप वर्ग की 20 प्रजातियां और कीडों- मकोडों तथा पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियां पाई जाती है। दक्षिणी अफ्रीका के अलावा विश्व का यही ऐसा एकलौता स्थान है जहां शेरों को अपने प्राकृतिक आवास में रहते हुए देखा जा सकता है। जंगल के शेर के लिए अंतिम आश्रय के रूप में गिर का जंगल, भारत के महत्वपूर्ण वन्य अभ्यारण्यों में से एक है।

बताते हैं कि गिर के जंगल को सन् 1969 में वन्य जीव अभ्यारण्य बनाया गया और 6 वर्षों बाद इसका 140.4 वर्ग किलोमीटर में विस्तार करके इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया। यह अभ्यारण्य अब लगभग 258.71 वर्ग किलोमीटर तक फैल चुका है। वन्य जीवों को सरक्षंण प्रदान करने के प्रयास से अब शेरों की संख्या बढकर 411 हो गई है। कुछ ही लोग जानते होंगे कि गिर भारत का एक अच्छा पक्षी अभ्यारण्य भी है। यहां फलगी वाला बाज, कठफोडवा, एरीओल, जंगली मैना और पैराडाइज फलाईकेचर भी देखा जा सकता है। साथ ही यह अधोलिया, वालडेरा, रतनघुना और पीपलिया आदि पक्षियों को भी देखने के लिए उपयुक्त स्थान है। इस जंगल में मगरमच्छों के लिए फॉर्म का विकास किया जा रहा है जो यहां के आकर्षण को ओर भी बढा देगा । देश में सबसे बड़े कद का हिरण, सांभर, चीतल, नीलगाय, चिंकारा और बारहसिंगा भी यहां देखा जा सकता है साथ ही यहां भालू और बड़ी पूंछ वाले लंगूर भी भारी मात्रा में पाए जाते है।


चलते - चलते

मित्रों की सलाह पर हमने एक रात इसी जंगल के रिसार्ट मे गुजारी। बताया गया कि देश में सिर्फ यहां ही नीग्रो की आबादी है। हमने इच्छा जताई कि चलो उनके गांव चलते हैं, थोड़ी देर वहां बिताते हैं, पर सलाह दी गई कि  नहीं इनके गांव  शाम के वक्त जाना ठीक नहीं है। एक मित्र उनके कुछ लोगों को जानता था, उसने उनसे बात की और हमारे रिसार्ट पर ही  सज कई नीग्रो का हंगामा। वो बहुत मस्ती और अलग धुन में डांस करते है, हम सब भी खुद को रोक नहीं पाए। खूब झूमे।


सोच रहा  हूं कि दो तीन और तस्वीरें आपके साथ शेयर करूं......


ये तस्वीर बिल्कुल सामने से चार मीटर की दूरी से ली गई है। आप पहचान ही गए होंगे ये बब्बर शेर है।













अब ये मत कहिएगा कि हमने तस्वीर चोरी से ली है,  एक नहीं चार चार शेरों के आंख में आंख मिलाकर तस्वीर ली गई है। चलिए आप ही तय कीजिए असली शेर कौन ?











देश में बहुत कम ही जगह नीग्रो रहते हैं। जूनागढ़ में गिरी अभयारण्य के करीब ये कबीला रहता है। शाम की मस्ती इन्हीं के साथ...












मूड मस्ती का था हमने भी नहीं रह गया और थाम लिया उनका ढोलक, दो चार थाम मेरे साथ भी..












Wednesday, 28 November 2012

नरेन्द्र मोदी : सावधानी हटी, दुर्घटना घटी ...


आपसे वादा था कि गुजरात चुनाव के बारे में आप सबको अपडेट दूंगा, तो चलिए आज गुजरात विधानसभा चुनाव की ही कुछ बातें कर ली जाए। दो दिन पहले ही दिल्ली से अहमदाबाद पहुंचा हूं और इस 48 घंटे में बहुत सारे लोगों से मुलाकात हुई, हर मुद्दे पर बहुत ही गहन विचार किया गया है। आप सबका ब्लड प्रेशर ना बढ़े इसलिए एक बात पहले ही स्पष्ट कर दूं कि दिल्ली में था, तो वहां से भी यही लग रहा था कि मोदी तीसरी बार भी सरकार बनाएंगे, गुजरात पहुंचने के बाद भी ऐसा ही लग रहा है की मोदी की सरकार बन ही जाएगी। अब सवाल उठता है कि अगर मोदी की सरकार बन ही रही है तो फिर चुनाव में इतनी मारा मारी क्यों है ? तो आइये अब भूमिका खत्म, सीधे मुद्दे की बात की जाए।

वैसे तो युद्ध और चुनाव के सामान्य नियम हैं, मसलन जो जीता वही सिकंदर। यहां बहुत ज्यादा साइंस नहीं है कि ऐसा होता तो ऐसा होता, वैसा होता तो फिर ये होता। खैर इन सबके बाद भी मैं चाहता हूं कि आपको यहां की कुछ बारीक जानकारी दूं। ये ऐसी जानकारी है जिससे यहां मोदी की हवा होते हुए भी खुद मोदी साहब की हवा निकली हुई है। गुजरात मे विधानसभा की 41 सीटें ऐसी है, जो मोदी का गणित पूरी तरह से बिगाड़ सकती हैं। यहां पिछले चुनाव में बीजेपी की जीत तो हो गई थी, लेकिन मतों का अंतर काफी कम था। इसमें 18 सीटें कच्छ और सौराष्ट्र के हिस्से में आती हैं। इस बार केशुभाई पटेल ने अलग पार्टी बना ली है, लिहाजा कुछ नुकसान तो यहां बीजेपी को उठाना ही होगा। वैसे भी यहां जातिवाद की राजनीति बहुत चरम पर रहा करती है, इसलिए लोग केशुभाई को कम आंकने को तैयार नहीं है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैने जो समझा है, मुझे नहीं लगता कि केशभाई की गुजरात परिवर्तन पार्टी इस बार कोई बड़ा करिश्मा कर पाएगी।

हां आपको पता ही है कि मोदी ने पिछले यानि 2007 के विधानसभा चुनाव में 182 में से 117 सीटों पर जीत हासिल कर दूसरी बार अपनी सरकार बनाई थी, जो सत्ता के जादुई आंकड़े 92 से सिर्फ 25 सीटें ज्यादा है, लेकिन, 76 सीटें ऐसी रहीं, जिन पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला रहा और अंतिम राउंड में भाजपा इनमें से 41 सीटों को अपनी झोली में करने में कामयाब हो गई। इन 41 सीटों में भी 4 सीटों पर उसके उम्मीदवार बमुश्किल एक हजार वोट के अंतर से जीत पाए। इसी तरह 9 उम्मीदवार तीन हजार वोट, 11 उम्मीदवार पांच हजार वोट और 16 उम्मीदवार सिर्फ दस हजार वोट ज्यादा लेकर ही जीत का सेहरा अपने सिर पर बांध सके।
मोदी को पिछले चुनाव मे सबसे ज्यादा कामयाबी कच्छ – सौराष्ट्र में मिली थी। गुजरात के इस सबसे बड़े हिस्से में बीजेपी के खाते में 58 में से 43 सीटें गईं। लेकिन 18 सीटों पर तो यहां भी बीजेपी उम्मीदवारों को जीत के लिए बहुत पसीना बहाना पड़ा। हालत ये थी कि यहां की खंभलिया सीट भाजपा का उम्मीदवार महज 798 वोट से ही जीत पाया। बात यहां के दूसरे हिस्से की करें तो राजपीपला विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ 631, मांडल में सिर्फ 677, खंभलिया में 798 और कांकरेज में जीत-हार का ये अंतर महज 840 वोटों का रहा। मुझे लगता है कि इस नजरिये से अगर पिछले चुनाव को देखा जाए तो मोदी की हालत उतनी अच्छी नहीं रही है, जितनी देश भर में चर्चा है। इसीलिए तो कहता हूं कि सावधानी हटी, दुर्घटना हुई।

हालाकि विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद शहरी आबादी की सीटें पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई हैं। कहा तो ये जा रहा है कि शहरी क्षेत्र में सीटें बढ़ने का फायदा मोदी को होगा, लेकिन इसे दूसरी तरह से भी देखा जा रहा है। मसलन जो लोग मोदी से नाराज हैं, या जो उनकी सरकार के प्रदर्शन से नाखुश हैं, वो कांग्रेस को वोट करते, लेकिन मैदान में केशूभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी के उतरने से अब विरोधी वोटों का कांग्रेस और गुजरात परिवर्तन पार्टी में बटवारा हो जाएगा, जिसका फायदा सीधे मोदी को हो सकता है। बदले हालात में अपनी संभावना जानने के लिए बीजेपी ने जो सर्वे कराया, उसमें 48 विधान सभा सीटों पर तो उसकी जीत सौ प्रतिशत बताई गई, लेकिन 32 सीटों पर ये संभावना सिर्फ 30 प्रतिशत, 42 सीटों पर 50 प्रतिशत और 60 सीटों पर 60 प्रतिशत आंकी गई है। हालांकि गुजरात की सत्ता में बने रहने के लिए 92 सीटें ही पर्याप्त हैं. यदि सर्वे पर यकीन किया जाये तो हैट्रिक के लिए मोदी को सिर्फ 44 सीटों पर ही कड़ी मेहनत करने की जरूरत होगी।

वैसे यहां चुनाव प्रचार में भी काफी नयापन दिखाई दे रहा है। आजकल बीजेपी का एक विज्ञापन चर्चा में है। इसमें कबड्डी के खेल के लिए दो टीमें तैयार हैं, और मैदान में हैं। रेफरी दोनों टीमों के कप्तान को बुलाता है तो बीजेपी का कप्तान आगे आ जाता है, लेकिन  कांग्रेस का कप्तान नहीं आता है, यहां खिलाड़ी एक दूसरे की ओर देखते हैं। फिर रेफरी कांग्रेस की ओर से उप कप्तान को बुलाया जाता है तो सभी खिलाड़ियों में मारी मारी हो जाती है और सब आगे बढ़ते हैं। इससे बीजेपी ये साबित करना चाहती है कि कांग्रेस एक ऐसी टीम है, जिसका कोई कप्तान ही नहीं है। लेकिन सवाल ये उठता है कि गुजरात में बीजेपी से ही उसका उप कप्तान पूछ लिया जाए तो मुझे लगता है कि बीजेपी के पास भी उप कप्तान के लिए कोई नाम नहीं है। इसी तरह के कई विज्ञापन यहां लोगों के बीच खास चर्चा में हैं।

वैसे यहां कांग्रेसियों को एक साथ दो चुनाव लड़ने पड़ रहे हैं। एक तो वो विधानसभा का चुनाव लड़ ही रहे हैं, दूसरी अपनी पार्टी के भितरघात से भी उन्हें जूझना पड़ रहा है। माना जा रहा था कि कांग्रेस के दिग्गज नेता शंकर सिंह बाघेला को पार्टी पूरी ताकत देगी और उन्हीं की अगुवाई में ये चुनाव लड़ा जाएगा। लेकिन कांग्रेस ने बाघेला को जितना तवज्जो देना चाहिए था, शायद वो नहीं दिया, लिहाजा खुले तौर पर तो नहीं लेकिन बाघेला अपनी अनदेखी से काफी खफा हैं और चुनाव के ऐन वक्त वो हैं कहां ? किसी को नहीं पता। अच्छा फिर कांग्रेस ने कुछ जल्दबाजी भी की, मसलन चुनाव के दो महीने पहले ही तमाम चुनावी घोषणाएं कर डाली, अब चुनाव के वक्त उनके कमान में कोई तीर ही नहीं है। सही तो ये है कि जब दो महीने कांग्रेस ने चुनावी घोषणाएं करनीं शुरू कीं तो इससे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी परेशान हो गए थे। लेकिन आज कांग्रेस का हाथ खाली है।

सच बताऊं तो इस चुनाव में मुद्दा क्या हो ? ये नरेन्द्र मोदी भी नहीं समझ पा रहे हैं। दावा भले किया जा रहा हो कि चुनाव में विकास मुद्दा होगा, लेकिन यहां सड़क, बिजली, पानी जैसी कोई खास दिक्कत नहीं है। हां कुछ इलाकों में पानी की दिक्कत जरूर है, लेकिन वो इतना बड़ा मुद्दा नही हैं जो इस चुनाव को सीधे प्रभावित करे। अंदर की बात तो ये है कि खुद मोदी गुजरात मे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चुनावी सभाओं का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर सोनिया पिछले चुनाव की तरह इस बार भी उनके खिलाफ कुछ तल्ख टिप्पणी करतीं हैं तो उसी को लेकर मोदी मैदान में कूद जाएगें। आपको याद होगा कि पिछले चुनाव में सोनिया गांधी ने नाम भले ना लिया हो, लेकिन मोदी को मौत का सौदागर  बताया था। सोनिया तो एक बार बोल कर गुजरात से दिल्ली पहुंच गईं, लेकिन मोदी ने मौत के सौदागर को ऐसा भुनाया कि यहां कांग्रेस औंधे मुंह जा गिरी। अब इस बार भी उन्हें भरोसा है कि उनके बारे में कुछ ऐसी टिप्पणी आए, जिसे वो मुद्दा बना लें। सच यही है कि गुजरात में विकास की बातें करना बेमानी सी लगती है।

मेरा वोट मेरी सरकार :  मेरे न्यूज चैनल आईबीएन 7 का ये खास कार्यक्रम है। जिसका रोजाना शाम 7.30 पर गुजरात के विभिन्न शहरों से सीधा प्रसारण किया जाता है। इसमें हम खासतौर पर गुजरात के चुनाव की नब्ज टटोलने और नेताओं से जनता सवाल पूछ कर उनका हिसाब मांगती है, यानि नेताओं को देना होता है अपने काम काज का लेखा जोखा। एक बात मैं खास तौर पर देख रहा हूं कि गुजरात का दंगा यानि गोधरा कहीं अब वैसे तो चर्चा में नहीं है। लेकिन इसे मुद्दा बनाने की साजिश की जा रही है। साजिश कौन कर रहा है, क्यों कर रहा है, ये तो वही जानें, लेकिन एक तपका चाहता है कि हिंदु मुस्लिम की बात हो और इस पर प्रमुखता से चर्चा हो। आप सोचें कि अगर चुनाव में हिंदू मुस्लिम की बात आती है तो फायदा किसे होगा ? चौपाल के दौरान कुछ लोग गोधरा पर सवाल भी पूछते हैं ।

बहरहाल अगर आप गुजरात में हैं तो हमारे चौपाल में शामिल हो सकते हैं। चौपाल की तारीख भी दे देता हूं आपको.... 26 नवंबर, अहमदाबाद, 27 नवंबर अमरेली, 28 नवंबर जूनागढ़, 29 नवंबर पोरबंदर, 30 नवंबर जामनगर, एक दिसंबर रोजकोट, तीन दिसंबर भावनगर, 4 दिसंबर बड़ोदरा, 5 दिसंबर भरुच, 6 दिसंबर वालसाड़, 7 दिसंबर नवसारी, 8 दिसंबर सूरत, 10 दिसंबर गोधरा, 11 दिसंबर आणद, 12 दिसंबर मेहसाणा, 13 दिसंबर वनासकांटा और 14 दिसंबर को आखिरी चौपाल भुज से करके दिल्ली वापसी होगी।









Wednesday, 21 November 2012

देश अभी शर्मिंदा है, अफजल गुरु जिंदा है !


आज बात तो करने आया था महाराष्ट्र सरकार के उस शर्मनाक फैसले की, जिससे उसने देश के एक बड़े तपके के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। यानि शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे का निधन हो जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से किए जाने का ऐलान कर। इस पर विस्तार से बात होगी लेकिन पहले बात करते हैं आतंकी अजमल कसाब की, जिसे फांसी देकर केंद्र सरकार ने दुनिया को दिखाया कि आतंकवाद से लड़ने की मजबूत इच्छाशक्ति सरकार मे हैं। वहीं संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु के मामले में आज तक फैसला ना होने से राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय को जनता कटघरे में खड़ा कर रही है। तीसरी मौत के बारे मे शायद उत्तर प्रदेश के बाहर रहने वाले ना जाने, लेकिन राजनेताओं को उंगली पर नचाने वाला शराबमाफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति विवाद में गोली से उड़ा दिया।

चार साल पहले पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से 10 आतंकी समुद्री मार्ग से मुंबई पहुंचे और उन्होंने खून की होली खेलनी शुरू कर दी। इन आतंकियों ने किस तरह मुंबई को हिलाया ये सब आपने टीवी पर देखा है। आपको  पता है कि नौ आतंकियों को हमारे जवानों मे मार गिराया था, जबकि एक आतंकी अजमल कसाब को जिंदा पकड़ने में हमारी फौज कामयाब रही। कसाब का ट्रायल शुरू हुआ, पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि वो पाकिस्तानी है और उसने जो पता बताया वहां भी स्थानीय लोगों ने स्वीकार किया कि कसाब इसी गांव का रहने वाला है। इन सबके बावजूद पाकिस्तान सरकार ने साफ इनकार कर दिया कि कसाब पाकिस्तानी है। बहरहाल पड़ोसी मुल्क का होने के बाद भी कसाब के मामले की अदालत में सुनवाई हुई और जिस तरह एक भारतीय को अपना बचाव करने का हक है, वो सारी सहूलियतें कसाब को दी गई। निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा मिलने के बाद आखिर में राष्ट्रपति के यहां कसाब ने दया याचिका पेश किया। इसी 5 नवंबर को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उसकी याचिका खारिज कर दी और आज यानि 21 नवंबर को सुबह 7.36 पर उसे फांसी पर लटका दिया गया।

आतंकवादियों के इस हमले में मुंबई में 166 लोगों ने जान गवांई थी। इस आतंकी घटना के बाद से ही हमले में मारे गए लोगों के परिजन लगातार मांग कर रहे थे कि कसाब को फांसी दी जाए, लेकिन सरकार कोई भी फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं करना चाहती थी, उसने न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए उसे फांसी पर लटकाया। पहले से तय था कि कसाब को फांसी देने के बाद देश में एक बड़ा सवाल उठेगा कि कसाब तो सिर्फ एक मोहरा था, उसे कब फांसी होगी जो ऐसी घटनाओं का मास्टर माइंड है। इशारा साफ है कि संसद पर हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू को फांसी कब होगी ? ये सवाल पहले भी उठता रहा है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट से भी अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, फिर अफजल कैसे जिंदा है। आपको पता है कि अफजल की दया याचिका भी राष्ट्रपति के पास लंबित है।

कसाब को फांसी के मामले में केंद्र महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह से तालमेल दिखाया, देश में अपनी तरह की ये पहली ही कार्रवाई है। 19 अक्टूबर को गृहमंत्रालय ने कसाब की फाइल राष्ट्रपति के यहां भेजी, राष्ट्रपति ने महज 15 दिन यानि पांच नवंबर को दया याचिका खारिज करते हुए फाइल गृहमंत्रालय को वापस भेज दी, सात नवंबर को गृहमंत्रालय ने इस पर फांसी की मुहर लगा दी और आठ नवंबर को ये फाइल महाराष्ट्र भेजी गई। इस फाइल में 21 नवंबर को फांसी देने की तारीख तय कर दी गई थी। 19 नवंबर को कसाब को मुंबई से पुणे ले जाया गया और आज यानि 21 को फांसी दे दी गई। इस मामले में पूरी तरह गोपनीयता बरतने के लिए इसे आपरेशन X नाम दिया गया। यहां तक की अफसर कसाब को मेहमान के संबोधन से आपस में बात कर रहे थे, जिससे किसी को कानोंकान खबर ना हो कि किस मामले में बात हो रही है।

राष्ट्रपति भवन पर सवाल ! अफजल गुरु की दया याचिका का निस्तारण ना होने से आम जनता  में तो हैरानी है ही, राजनीतिक दल भी लगातार इस मामले में केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। कुछ समय पहले कहा गया राष्ट्रपति भवन में अफजल गुरु के मामले में फैसला लेने से पहले 17 और दया याचिकाओं का निस्तारण किया जाना है। खुलकर तो ये बात नहीं कही गई थी, लेकिन इशारा यही था कि जब अफजल की बारी आएगी तो उसके मामले में भी फैसला लिया जाएगा। इसके बाद लोग निराश थे, क्योंकि सभी को लग रहा था कि जब अफजल गुरु को कई साल पहले  फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है और उसे आज तक फांसी नहीं दी जा सकी है तो भला कसाब को कैसे फांसी दी जा सकती है ? लेकिन कसाब की फांसी पर इतनी जल्दी फैसला लिया गया और बिना देरी उसे फांसी पर लटका भी दिया गया, इससे तो साफ हैं कि अगर सरकार की इच्छाशक्ति मजबूत हो तो, फैसला लेने में कोई मुश्किल नहीं है। यही वजह है कि आज कसाब को फांसी दिए जाने के बाद संसद पर आतंकी हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को फांसी देने की मांग जोर पकड़ रही है। हालाकि देखा जा रहा है कि गुरु को फांसी देने का मामला आसान नहीं है, वजह साफ है, ये मामला सियासी ज्यादा हो गया है।

 कसाब को फांसी के बाद क्या ? मुझे लगता है कि पाकिस्तान और आतंकवादियों में इसकी प्रतिक्रिया स्वाभविक है। पहला तो जो संदेश आ रहा है, उससे तो लगता है कि पाकिस्तान में भारतीय बंदी सरबजीत की रिहाई कुछ दिन लटक सकती है। अगर वो सरबजीत के साथ कुछ ऐसा वैसा भी करें तो मुझे हैरानी नहीं होगी। इसके अलावा हमें आपको पहले से ज्यादा सावधान रहने की भी जरूरत होगी, क्योंकि आतंकवादी भी प्रतिक्रिया में कुछ बड़ी घटनाओं को अंजाम देने की साजिश कर सकते हैं। इसके अलावा मुझे लगता है कि पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का भारत दौरा एक बार फिर लटक सकता है। वैसे भी जब दिल में एक दूसरे मुल्क के प्रति नफरत भरी हो तो क्रिकेट तो होना भी नहीं चाहिए। बहरहाल कसाब को फांसी दिए जाने के बाद अगर पड़ोसी मुल्क ने प्रतिक्रिया के तौर पर कुछ भी किया तो निश्चित ही इसका परिणाम गंभीर होने वाला है।

हां-अब बात बाल ठाकरे की :  मेरा महाराष्ट्र की सरकार से एक सवाल है। शिवसेना सुप्रीमों का कोई एक ऐसा काम बताएं जो उल्लेखनीय हो, राष्ट्रहित में हो। फिर ठाकरे किसी पद पर भी नहीं रहे, ऐसे में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से करने का ऐलान क्यों किया गया ? क्या महाराष्ट्र की सरकार को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं था ? क्या सरकार डरी हुई थी कि ठाकरे की मौत के बाद मुंबई के हालात को काबू में करना मुश्किल होगा ? मैं बहुत गंभीरता से कहना चाहता हूं कि जिन शिवसैनिकों ने मुंबई की कानून व्यवस्था को लेकर सरकार की नाक में दम कर दिया हो, उसकी अगुवाई करने वाले को आखिर तिरंगे में कैसे लपेटा जा सकता है ? मुंबई आने वाले उत्तर भारतीयों की जो लोग पिटाई का ऐलान करते हो, जो निर्दोष आटो चालकों पर हमला कर उनके पैसे छीन लेते हों। ऐसे लोगों के साथ सरकार की इतनी सहानिभूति आखिर क्यों ?

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि मराठी मानुस की बात कर उत्तर भारतीयों को मुंबई छोड़कर जाने को कहने का ऐलान कर हिंसा फैलाने वालों को भला राजकीय सम्मान कैसे दिया जा सकता है ? सच्चाई तो ये है कि ठाकरे ना कभी लोकतंत्र के हिस्सा रहे और ना ही उनका लोकतंत्र में कभी भरोसा रहा है। वे खुद कहते थे कि वो शिवशाही पर विश्‍वास करते हैं, लोकशाही पर नहीं। वो एक ऐसे व्‍यक्ति थे जो ऐक्‍शन की बात करते थे। हम कहते हैं कि हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन कोई व्‍यक्ति जिसने कभी लोकतंत्र को माना ही नहीं उसके बारे में आप क्‍या कहेंगे। अब किसी के लाखों अनुयायी होने का मतलब यह नहीं कि व्‍यक्ति के शरीर को हम तिरंगे में लपेट दे। उनकी राजनीति ही देश को तोड़ने वाली रही है। मसलन हमारा संविधान कहता है कि हर व्‍यक्ति को देश के किसी भी स्‍थान पर रहने और काम करने का अधिकार है, जबकि ठाकरे हमेशा संविधान की इस धारा के विरोध में रहे। उन्‍होंने मुंबई में बाहरी लोगों का हमेशा विरोध किया। उनकी राजनीति की शुरुआत कम्‍युनिस्‍टों को मुंबई से खदेड़ने से हुई और फिर उन्‍होंने उत्तर भारतीयों का मुंबई में जीना मुहाल कर दिया।

ठाकरे की मौत के बाद महाराष्ट्र सरकार को घुटनों पर देखकर वहां लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। डर का आलम ये कि लोगों ने अपनी दुकानें तक नहीं खोलीं। अब इस बंद को लेकर सोशल साइट फेसबुक पर एक बेटी ने बंद का औचित्य पूछ लिया तो उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मुझे जानना है कि महाराष्ट्र में ये कौन सी सरकार काम कर रही है। आतंकी सिर्फ वही नहीं है जो पाकिस्तान से आया हो, आतंकी वो भी है, जिसकी वजह से लोग शांति से रह ना पाएं। शिवसैनिक भी किसी आतंकी से कम नहीं है। वो सभी आतंक के मास्टर माइंड हैं तो इन्हें गुमराह करते हैं।

आखिर मे मैं केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और कांग्रेस से जानना चाहता हूं कि अगर उन्होंने शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे को राजकीय सम्मान देकर पुलिस की सलामी दिलाई है तो क्या ये माना जाए कि आप सब उनकी सोच और विचारधारा का भी समर्थन करते हैं। आप सबका भी यही मानना है कि मुंबई से उत्तर भारतीयो को खदेड़ दिया जाना चाहिए । इस मामले में अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए।

चलते - चलते
इसी हफ्ते एक और गंभीर घटना हुई। उत्तर प्रदेश के एक बड़े शराब माफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति के विवाद में गोलियों से छलनी कर दिया, हालाकि पांटी के लोगों ने वहीं उसके भाई की भी  हत्या कर दी। पांटी चढ्ढा का जिक्र इसलिए करना जरूरी था कि ये वो सख्श है कि जिसके इशारे पर सूबे की सरकार नाचती है। सरकार चाहे किसी पार्टी की हो, सब पर पांटी बहुत भारी था। धीरे धीरे इसका प्रभाव उत्तराखंड और पंजाब में भी बढ़ता जा रहा था।





Saturday, 17 November 2012

राहुल गांधी बोले तो पोंsपोंs पोंपोंs..पोंsss


राजनीति में पूरी तरह फेल राहुल गांधी का कद जिस तरह कांग्रेस बढ़ा रही है, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस को काम पर नहीं चमत्कार पर यकीन है, उसे लगता है कि चुनाव  में अभी डेढ साल बाकी है, तब तक कहां लोगों को सरकार की चोरी-चकारी याद रहेगी। ये सोचते हैं कि देशवासी राहुल गांधी का चेहरा देखेंगे और कांग्रेस के हक में वोट करेंगे। अगर सरकार को काम पर थोड़ा भी यकीन होता तो पार्टी सबसे पहले केंद्र सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के धब्बे को धोने का प्रयास करती। मुझे ये कहने में कत्तई संकोच नहीं है केंद्र की मौजूदा सरकार आजाद हिंदुस्तान की सबसे भ्रष्ट सरकार है। बात यहीं खत्म नहीं होती, मैं ये भी कह सकता हूं कि अब तक देश के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उनमें मनमोहन सिह सबसे घटिया, घिनौने, असफल और मजबूर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। सच तो ये है कि मनमोहन सिंह आज तक खुद ही स्वीकार ही नहीं कर पाए हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं, उन्हें तो लगता है कि सोनियां गांधी ने उनको प्रधानमंत्री का कुछ काम सौंपा है, जिसे वो निभा रहे हैं। यही वजह है कि मनमोहन सिंह देश के प्रति नही 10 जनपथ के प्रति ज्यादा वफादार है। अगर मुझे इस सरकार की समीक्षा करनी हो तो मैं सौ बार एक ही बात दुहराऊंगा कि ये हैं "अलीबाबा 40 चोर" ।

आज कुछ खरी-खरी बात करने का मन है। क्या कांग्रेस के नेता देश को इस बात का जवाब दे सकते हैं कि अगर प्रणव मुखर्जी देश के राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार रहे तो वो  प्रधानमंत्री के लिए सोनिया गांधी की पसंद क्यों नहीं बन पाए ? दरअसल सच्चाई ये है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. पीवी नरसिंहराव जब देश का नेतृत्व कर रहे थे तो 7 रेसकोर्स यानि प्रधानमंत्री निवास ही कांग्रेस नेताओं का मक्का, मदीना था। स्व राव ने कभी 10 जनपथ को उभरने का मौका ही नहीं दिया। इसकी मुख्य वजह उनमें नेतृत्व की क्षमता थी वो राजनीति के अच्छे खिलाड़ियों में शुमार थे। खुद चुनाव लड़ते थे और उनकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जाता  था। वो बखूबी जानते थे कि प्रधानमंत्री आवास की क्या गरिमा है और इस गरिमा को कैसे बरकरार रखा जा सकता है।  स्व. प्रधानमंत्री को पता था कि अगर देश में एक मजबूत सरकार चलानी है तो सत्ता का केंद्र प्रधानमंत्री आवास ही होना चाहिए। अगर देश का प्रधानमंत्री पूरे दिन 10 जनपथ पर ही मत्था टेकता रहा तो सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट ( उनके दोनों बच्चों ) का विश्वास तो जीता जा सकता है, पर देश का विश्वास हासिल करना मुश्किल होगा।

स्व. प्रधानमंत्री राव की सख्त तेवर से 10 जनपथ काफी समय तक एक चाहरदीवारी  मे कैद रहा। लेकिन बाद में बदले सियासी घटनाक्रम की वजह से पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथ में आई। अब गांधी परिवार सतर्क हो गया। मुझे लगता है कि राव की चाल देखकर ही सोनिया गांधी ने तय कर लिया कि अब आगे से किसी मजबूत नेता को प्रधानमंत्री बनाने की गल्ती नहीं  दुहराई जाएगी। यही वजह है कि पार्टी और सरकार दोनो के संकटमोचक रहे वरिष्ठ नेता प्रणव  मुखर्जी की योग्यता का उपहास उड़ाते हुए उन्हें कभी प्रधानमंत्री बनाने के बारे में नहीं सोचा गया। सोनिया गांधी को पता है कि मनमोहन सिंह कम से कम ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जो 7 रेसकोर्स में रहते हुए भी 10 जनपथ के प्रति ज्यादा वफादार होंगे। अगर मनमोहन सिंह को ये लगता है कि वो बहुत ज्यादा पढ़े लिखे हैं, अच्छे नौकरशाह रहे है इसलिए प्रधानमंत्री बने हैं तो ये उनकी गलतफहमी हैं। वैसे भी मेरा तो यही मानना है कि वो प्रधानमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के केयर टेकर हैं, यानि राहुल गांधी के तैयार होने तक वो ये कामकाज देख रहे हैं। केयर टेकर को कभी ये अधिकार नहीं होता कि वो खुद से कोई निर्णय करे।

बहरहाल मनमोहन सिंह की अगुवाई में भ्रष्ट मंत्रियों की खूब चांदी है। ज्यादातर मंत्रियों ने ठीक ठाक खजाना भर लिया है। कई मंत्रियों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के लिए अच्छा होता कि मनमोहन सिंह ने आठ साल खूब मजे कर लिए, अब उन्हीं के हाथ से आरोपी और दागी  मंत्रियों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखाती। इससे पार्टी अपनी खोई प्रतिष्ठा कुछ हद तक हासिल करने में कामयाब होती। लेकिन पार्टी ने इस काम को कभी तवज्जो ही नहीं दिया। उसे आज भी चमत्कार पर भरोसा है। पार्टी को लगता है कि राहुल गांधी को आगे  करके चुनाव लड़ा जाएगा तो देश की जनता भ्रष्टाचार को भूल जाएगी। जबकि मेरा मानना  है कि राहुल गांधी बोले तो सिर्फ पोंs पोंs, पोंपोंss पोंssss भर  हैं। इससे ज्यादा उनकी आज कोई राजनीतिक  पहचान नहीं है।

आप सब जानते हैं कि किसी को तरक्की देने का सामान्य नियम है उसका परफारमेंस। लेकिन राहुल गांधी के मामले में इस नियम को नजरअंदाज कर दिया गया। अगर राहुल गांधी की समीक्षा की जाए तो उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु के चुनाव भी कांग्रेस ने राहुल गांधी को आगे रख कर लड़ा था। लेकिन यहां का परिणाम क्या रहा ? सब जानते हैं। एक के बाद एक चुनाव में फेल हुए राहुल गांधी को अब 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन को बनी समिति की अगुवाई सौंपी गई है। अमूल बेबी राहुल गांधी क्या कर पाएंगे, ये तो आगे देखा जाएगा। लेकिन मैं अगर कहूं कि राहुल का ही नहीं बल्कि गांधी परिवार का जादू  खत्म हो चुका है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। अब देखिए ना यूपी के विधानसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी जहां से सोनिया और राहुल सांसद हैं, वहां भी पार्टी का प्रदर्शन  निराशाजनक रहा है। जो नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता का भरोसा खो चुका हो वो भला  देश की जनता का भरोसा कैसे जीत सकता है।

मुझे हैरानी होती है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री बताते हैं। इसकी  ठोस वजह भी है। आपको याद होगा कि सोनिया गांधी अस्वस्थ होने पर इलाज के लिए महीने भर से ज्यादा समय के लिए विदेश गई हुई थीं। उनकी अनुपस्थिति मे एक टीम बनाई गई,  जिसमें राहुल गांधी भी शामिल थे। इस टीम को जिम्मेदारी दी गई थी कि वो  महत्वपूर्ण विषयों पर फैसला लेगी। इसी दौरान अन्ना का आंदोलन चल रहा था और केंद्र सरकार घुटनों पर थी। सरकार के सामने अन्ना के अनशन को समाप्त कराने की गंभीर चुनौती थी। 12 दिन से ज्यादा हो गए थे अन्ना के अनशन को, डाक्टर सलाह दे रहे थे कि अनशन खत्म होना चाहिए, क्योंकि अन्ना कि तवियत बिगड़ रही है। देश की जनता भी गुस्से से उबल रही थी। हम कह सकते हैं कि देश के सामने गंभीर चुनौती थी, लेकिन अमूल बेबी राहुल गांधी पूरे घटनाक्रम से ही गायब रहे।

अक्सर देखा गया है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर गांधी परिवार पलायन कर जाता है। कोई भी खुल कर सामने नहीं आता है। हां अच्छा-अच्छा गप और कड़ुवा कड़ुवा थू करने में इस परिवार का कोई जवाब नहीं। बहरहाल मेरा मानना है कि राहुल को देश की जिम्मेदारी देने से पहले उन्हें  एक परिवार  की जिम्मेदारी दी जाए, देखा जाना चाहिए कि वो एक खुशहाल परिवार चला पाते हैं  या नहीं, उसके बाद तो काफी वक्त है, देश की भी जिम्मेदारी संभाल लें। क्योकि देशवासियों का अनुभव बहुत खराब रहा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ गेम, आदर्श सोसायटी, कोयला ब्लाक आवंटन जैसे तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों पर गांधी परिवार की चुप्पी आज तक किसी के भी समझ मे नहीं आई।

राहुल ने विदर्भ की कलावती का मामला उठाकर संसद और देश में खूब वाहवाही लूटी। बेचारी वही कलावती दिल्ली आई और राहुल से मिलना चाही तो उसे मिलने का वक्त नहीं मिला। राहुल ने दलितों के यहां भोजन किया और उनकी टूटी चारपाई पर रात भी गुजार दी। लेकिन कभी  किसी दलित को अपने घर भोजन कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। बहरहाल राहुल आपके प्रमोशन पर मैं भी आपको मुबारकबाद देता हूं, इस उम्मीद से कि अब आप दिखावटी और खबर बनने वाले कामों से दूर रह कर कुछ तो ऐसा करेंगे, जिससे देश के लोग राहत महसूस कर सकें। वैसे आपकी परीक्षा तो इसी हफ्ते हो जाएगी, संसद का सत्र शुरू होने वाला है, एफडीआई के मसले पर सरकार और विपक्ष आमने सामने है, अब ये मत कह  दीजिएगा कि ये एफडीआई क्या है ? संसद का पिछला सत्र विपक्ष के हंगामे की वजह से एक दिन भी नहीं चल पाया, देखते हैं आप क्या कुछ हस्तक्षेप करते हैं, जिससे ये सत्र सुचारू रूप से चल सके। अब ऐसा मत  कीजिएगा कि सत्र के दौरान छुट्टी लेकर कहीं घूमने निकल जाएं !

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