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Thursday, 11 April 2013

देवी भक्तों ने जमकर उड़ाया नानवेज !

देवी के भक्तों ने कल यानि 10 अप्रैल की रात को जमकर उड़ाया नानवेज ! वैसे तो मैं नवरात्र में पूरे नौ दिन व्रत ना करके पहले और आखिरी दिन ही व्रत करता हूं, लेकिन कोशिश ये रहती है कि इस दौरान नानवेज से दूरी बनाएं रखें। दूरी बनाएं रखें का मतलब नवरात्र तक परहेज किया जाए। वैसे मैडम नौ दिन व्रत रहती हैं, इसलिए घर पर बनाना भी मुश्किल है। अब हुआ ये कि कल शाम बच्चों ने कहा कि 11 अप्रैल यानि कल से नवरात्र शुरू हो रहा है तो नानवेज बंद हो जाएगा, तो क्यों ना आज रात में कुछ नानवेज बाहर से ही मंगा लें। बच्चों की राय मुझे अच्छी लगनी ही थी, क्योंकि मैं तो नानवेज खाने के लिए 40-50 किलोमीटर सफर भी करना पड़े तो पीछे हटने वाला नहीं हूं।

बस फिर क्या होम डिलीवरी के लिए रात नौ साढे नौ बजे के करीब रेस्टोरेंट पर फोन करना शुरू किया। घर से पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 20- 22 रेस्टोरेंट है, कुछ के यहां नानवेज रात नौ बजे के करीब खत्म हो चुका था, कुछ ने कहा कि आज रेस्टोरेंट में बहुत ज्यादा भीड़ है, हम होम डिलीवरी नहीं कर पाएंगे। मैं हैरान रह गया कि देवी भक्तों को आज नानवेज का ये कैसा बुखार चढ़ा है। खैर मैने गाड़ी निकाली और बच्चों को कहा चलो बाहर ही चलते हैं। भाई आप विश्वास कीजिए सात आठ दुकानों पर पहुंचा, जहां दुकानदारों ने कहाकि आज हम आपको नानवेज नहीं खिला पाएंगे। वो खुद भी हैरान थे कि आखिर आज ऐसा क्या हो गया है कि इतने ज्यादा लोग नानवेज मांग रहे हैं। खैर मुझे लगा कि शहरों में कई बार खास मौकों पर ऐसा हो जाता है। बहरहाल मैने अपनी कार का रुख ढाबे की ओर कर दिया, लेकिन यहां भी मुझे निराश होना पड़ा।

आमतौर पर जिन ढ़ाबों पर ट्रकों की लंबी कतारें दिखाई देंती हैं और यहां का नजारा बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा था। लंबी-लंबी कारें खड़ी हैं। कुछ उत्साही युवक कारोबार में लगे हुए थे। मैं जानता हूं कि " कारोबार " आपकी समझ में नहीं आएगा, दरअसल ये शब्द मीडिया का है। वैसे आपको इसका अर्थ जानना जरूरी है। कारोबार का मतलब "कार में बार" यानि लोग कार में ही शराब वगैरह पी रहे थे। ये लोग निश्चिंत इसलिए दिखाई दे रहे थे, क्योंकि इनका खाने का आर्डर हो चुका था। खैर मुझे लगा कि यहां इतनी भीड़ जमी हुई है तो नानवेज मिल ही जाएगा। वरना तो यहां सन्नाटा रहता। मैं हैरान हो गया ये जानकार कि ढाबे वाले का नानवेज दो बार खत्म हो चुका था अब वो आखिरी बार बना रहा था और उसका आर्डर बुक हो चुका था और यहां लोग नानवेज बनने का इंतजार कर रहे थे। नया आर्डर ढाबे पर भी नहीं लिया जा रहा था।

आपको पता होगा कि शहरों में कुछ ठेले बहुत फेमस होते हैं, वहां भी नानवेज लोग बड़े ही स्वाद लेकर खाते हैं। ऐसा ही एक ठेला हमारे यहां भी है। मैने कहाकि अब आखिरी विकल्प यही है, ठेले पर चलते हैं और कार में बैठे बैठे ही खाना मंगा लिया जाएगा। रात 11 बजे के करीब ठेले के पास पहुंचा तो वहां का हाल देखकर हैरान रह गया । शामी कबाब का जो तवा रात 12 बजे तक गरम रहता है वो मेरे पहुंचने के पहले साफ हो चुका था और सीक कबाब की अंगीठी भी बुझाई जा चुकी थी। मतलब यहां भी नानवेज की कोई गुंजाइश बाकी नहीं थी। लेकिन अब तो मैं वाकई परेशान हो गया, सोचने लगा आखिर ये क्या बात है? इतने बड़े-बड़े होटल रेस्टोरेंट होने के बाद भी मैं एक दिन अपनी पसंद का खाना नहीं खा सकता ?

मैने भी तय कर लिया कि कुछ भी हो जाए, आज नानवेज तो खाना ही है। बच्चे भी कार में हंस रहे थे कि पापा नानवेज नहीं मिल रहा है तो वेज ही खा लेते हैं, वरना थोड़ी देर बाद वेज खाना भी नहीं मिलेगा और घर चलकर मम्मी को ही कुछ बनाना होगा। बच्चों की ये सामान्य बात भी जैसे मुझे चुभ रही थी । अब तो अंदर से मेरा "जर्नलिस्ट" भी जाग चुका था, जो मुझे धिक्कारने लगा। बताओ श्रीवास्तव जी दूसरे पत्रकार भाई होते तो अब तक नानवेज उनके घर पहुंच चुका होता और वो भी बिना पैसे के। एक आप हो कि दो सौ रुपये के नानवेज के चक्कर में कई लीटर पेट्रोल फूंक चुके हो और पचासों फोन काल अलग। इसके बाद भी नानवेज मिलेगा या नहीं भरोसे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

सच कहूं तो मैं भी किसी को फोन करके नानवेज मंगा सकता था, लेकिन मै संकोच में था। संकोच के अपने इसी स्वभाव के लिए चलते मैं पत्रकारों की मुख्य धारा में आज तक शामिल नहीं हो पाया। हालाकि मैं बहुत दूर तक सोच रहा था कि ऐसा क्या कर सकता हूं, जिससे इस बड़ी समस्या का समाधान हो सके। दिमाग पर काफी जोर देने के बाद भी कुछ सूझ नहीं रहा था। बहरहाल अब तो मैं हार मान गया और घर की ओर वापस चल दिया। अब कहते हैं ना जिसका कोई नहीं उसके साथ भगवान होता है। मैं गेट पर पहुचा तो देख रहा हूं कि एक होम डिलीवरी व्वाय गेट पर शोर मचा रहा था। वो कह रहा था कि खाने का आर्डर कर देते हैं और लेकर आओ तो कहते हैं मैने आर्डर नहीं किया। उसका शोर सुनकर मैने कार गेट पर ही कार रोक दी और नीचे उतरा, पूछा क्या हो गया ? बताया गया कि फ्लैट B 703 से खाने आर्डर किया गया और अब कह रहे हैं कि उन्होंने खाना नहीं मंगाया। मैने पूछा क्या लाए हो ? बोला कढ़ाई चिकन, मटर पनीर, रुमाली रोटी, एक नान और एक मिस्सी रोटी है।

मैने कहाकि अपने रेस्टोरेट में बात करो और कहो कि जिनके यहां खाने की डिलीवरी के लिए आया था, वो तो मना कर रहे हैं कि खाना उन्होंने नहीं मंगाया। लेकिन अपार्टमेंट के दूसरे सज्जन ये डिलीवरी लेने को तैयार हैं, क्या उन्हें दे दूं ? उसके मालिक ने कहा होगा दे दो, उसे मैने 480 रुपये दिए और खाने की डिलीवरी ले लिया। खाने का थैला हाथ में था हम कार में वापस आए तो बच्चों ने भी यही कहा कि आखिर भगवान ने हम लोगों की सुन ली। खैर हम घर पहुंचे, खाना तुरंत खाने की जल्दबाजी इसलिए थी कि सुबह नवरात्र का व्रत करना है इसलिए तारीख बदलने के पहले खाना खा लिया जाए। वैसे भी मैं चाहता था कि नानवेज खाना है तो रात के 12 बजने के पहले ही खा लिया जाए। खैर खाना पीना हो चुका था, मैं टीवी के सामने बैठा हैड लाइन सुन रहा था, इसी बीच इंटरकांम की घंटी बजी।

गेट से सिक्योरिटी वाले ने बताया कि सर वो डिलीवरी वाला लड़का आया है और खाना वापस मांग रहा है। मैने बताया कि अरे भाई हम तो खाना खा चुके हैं। दरअसल गड़बड़ी ये थी कि मेरे अपार्टमेंट का नाम जनसत्ता अपार्टमेंट है और मेरे बगल में सहयोग अपार्टमेंट है। डिलीवरी व्वाय को बताया गया कि जनसत्ता अपार्टमेंट के बगल वाले अपार्टमेंट में ये खाना देना है। अब वो कई आर्डर एक साथ लेकर निकला था, लिहाजा सहयोग अपार्टमेंट जाने के बजाए वो जनसत्ता के गेट पर ही झगड़ा कर रहा था। खैर मुझे वाकई सहयोग अपार्टमेंट के उन सज्जन प्रति सहानिभूति है, जो खाने का आर्डर करके देर रात तक खाने का इंतजार कर रहे थे और उनका खाना मेरे पास आ गया था। खैर सुबह जो बात पता चली, उससे मैं निश्चिंत हो गया कि कोई बात नहीं, क्योंकि वो खाना एक पुलिस अफसर जो उस अपार्टमेंट में रहते हैं, उनके यहां जाना था। ऐसा नहीं हो सकता कि पुलिस अफसर बिना खाना खाए सो जाए। रेस्टोरेंट का मालिक उल्टे पांव भागा-भागा आया होगा दूसरा आर्डर लेकर। खैर मेरा तो मस्त रहा भोजन.. हाहाहहा ।