आपके दोनों हाथो में सोना भरा हो, फिर भी आपको उम्मीद हो कि दूसरी जगह जाने पर हीरा मिलना तय है। अब हाथ तो भरा हुआ है सोने से फिर हीरा कैसे ले पाएंगे? जाहिर है आपको सोने का मोह त्यागना होगा और हाथ खाली करके हीरे की ओर बढ़ना होगा। हीरे के लालच में अगर आपने सोने का त्याग कर दिया तो क्या आप समाज की नजरों में महान हो जाएंगे ? बिल्कुल नहीं। आपको दूसरा पक्ष भी देखना होगा कि उसने सोने को यूं ही नहीं फैंक दिया, उसने हीरे की लालच में फैंका। आप खुद सोचें कि अगर हाथ खाली ही नहीं रहेगा तो भला हीरा कैसे ले पाएंगे ? अब आप इस उदाहरण को सामने रखें और कथित सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल के बारे में विचार कीजिए।
अरविंद केजरीवाल आयकर विभाग में नौकरी कर रहे थे, मुझे ठीक ठीक तो पता नहीं पर लाख डेढ लाख रुपये उन्हें वेतन मिलता होगा। अगर बेईमानी की जाए तो आमदनी बढ़ भी सकती है, लेकिन इसमें रिस्क भी है। तब केजरीवाल ने तय किया कि अब वो नौकरी नहीं करेंगे और स्वयं सेवी संस्था (एनजीओ) बनाकर काम करेंगे। बहरहाल संस्था बनी, कुछ काम आगे बढ़ा। विदेशों में संपर्क बनाया गया, अब संस्था को ठीक ठाक रकम भी बाहर से मिलने लगी। आयकर विभाग मे महीने भर काम करें तो महज लाख रुपये वेतन, यहां दुकान थोड़ी सी चल गई तो लाख रुपये वेतन देने की स्थिति बन जाएगी। इसलिए नौकरी छोड़कर यहां आकर उन्होंने कोई अहसान नहीं किया है, आयकर के मुकाबले यहां कई गुना ज्यादा पैसा है। मुझे लगता है कि मेरी बात समझ में आ गई होगी।
लगे हाथ इस बात पर भी चर्चा कर लेते हैं कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि जिस अन्ना ने केजरीवाल को केजरीवाल बनाया, उनके इनकार करने के बाद भी राजनीतिक दल बनाने पर अरविंद अड़े रहे। वैसे इसके लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा। आपको याद होगा कि जिस समय जनलोकपाल बिल को लेकर आंदोलन चल रहा था। उसमें टीम अन्ना नेता मंत्री, अफसर और कर्मचारी सभी को इसके दायरे में लाने की मांग कर रहे थी। इस पर राजनीतिक दलों ने शोर मचाना शुरू किया और कहा कि जनलोकपाल के दायरे में एनजीओ को भी शामिल कर दिया जाए। एनजीओ का नाम उछलते ही तथाकथित समाजसेवियों के पैर तले जमीन ही खिसक गई। क्योंकि सबको पता है कि केजरीवाल के एनजीओ को विदेशों से मदद मिलती है। इन्हें लगा कि अगर जनलोकपाल में एनजीओ को शामिल किया गया तो अपनी भी पोल पट्टी खुल जाएगी, बस फिर क्या था उसका उपाय की तलाशा जाने लगा।
अरविंद में एक बात तो है कि वो जानते हैं कि क्या किया जाए जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। आपको पता है कि देश में राजनीतिक दलों को भी ज्ञात अज्ञात जगहों से बड़ी मात्रा में चंदा मिलता है। राजनीतिक दल ये बताने को भी मजबूर नहीं है कि ये पैसा आखिर उनके पास आया कहां से। इसका कोई हिसाब नहीं देना होता है राजनीतिक दलों को। बस फिर क्या, अरविंद को लगा कि राजनीतिक दल बनाया जाना चाहिए और जितने भी पैसे जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने के लिए मिले हैं या फिर आज तक मिल रहे हैं उसे इसी राजनीतिक पार्टी के खाते में डाल दिया जाए। अब ये पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा, क्योंकि राजनीतिक दल अगर उनसे हिसाब मांगने की बात करेंगे तो उन्हें अपनी पार्टी का भी हिसाब देना होगा। मसला साफ है चोर चोर मौसेरे भाई।
अरविंद दुनिया भर के लोगों से जवाब मांगते हैं, आज मैं एक सवाल पूछ रहा हूं। ये बड़ा सवाल है आखिर जिस अन्ना को आगे करके ये लड़ाई लड़ी गई, जिस अन्ना के 13 दिन के आमरण अनशन की वजह से सरकार घुटने टेकने को मजबूर हो गई। उस अन्ना को इन लोगों ऐसी क्या तकलीफ पहुंचाई जिससे उन्हें ये कहने को मजबूर होना पड़ा कि अरविंद और उनकी टीम अब उनकी तस्वीर तो क्या नाम भी इस्तेमाल नहीं करेगी। अन्ना के इस रूख से साफ था कि अरविंद या उनकी टीम ने उन्हें ऐसी गंभीर तकलीफ पहुंचाई है, जिससे मजबूर होकर अन्ना इतना सख्त बयान मीडिया के सामने दे रहे हैं।
अच्छा इस टीम के बिखरने की वजह आज तक साफ नहीं है। अंदर से जो जानकारी छन कर बाहर आ रही है, उससे पता चल रहा है कि चंदे के पैसे को लेकर टीम में बिखराब हुआ। इस मामले में टीम के ही कुछ सदस्यों ने अन्ना को कहा था कि पैसे के रखरखाव की व्यवस्था दुरुस्त करनी चाहिए। सच तो ये है कि किरण वेदी भी इस बात से नाराज थीं कि चंदे के पैसे को लेकर पूरी तरह पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। ईमानदारी की बड़ी बड़ी बातें अरविंद केजरीवाल और उनके दो तीन सहयोगी करते हैं, लेकिन जितने लोग भी टीम से अलग हुए सबकी वजह अरविंद रहे और सबने चंदे के पैसे में गोरखधंधे का आरोप लगाया। केजरीवाल इस मामले में कुछ नहीं बोलते। अगर बोले भी तो बस इतना ही कि सारा हिसाब किताब वेबसाइट पर मौजूद है। अरे भाई हिसाब किताब तो बाबा रामदेव का भी उनकी साइट पर मौजद है, उनका भी दावा है कि सब कुछ ठीक है, पर क्या वाकई ठीक है ?
हां अरविंद नैतिकता की बहुत ज्यादा बातें करते हैं। मैं पूछता हूं कि दो साल आप स्टडी लीव पर थे, इस दौरान आप सरकार से वेतन भी लेते रहे। लेकिन स्टडी लीव के बाद कम से कम जितने दिन नौकरी करनी चाहिए, वो आपने नहीं किया। इसके लिए जब आपको नोटिस देकर कहा गया कि दो साल का वेतन ब्याज समेत वापस करें। इस पर आपने पहले तो इनकार कर दिया, लेकिन सरकार का कड़ा रुख देखकर आपने नौ लाख रुपये का चेक प्रधानमंत्री के आवास पर भेज दिया। मुझे एक बात का जवाब चाहिए कि क्या प्रधानमंत्री के घर पर बकाये का भुगतान करने के लिए कोई विंडो है ? ये केजरीवाल की बीमारी है, जिसे आप अहम कह सकते हैं।
आपको पता है कि अरविंद का ये पूरा आंदोलन सोशल नेटवर्क साइट की देने है। आईएसी यानि इंडिया अगेंस्ट करप्सन की बेवसाइट का संचालन एक समय में वरिष्ठ पत्रकार शिवेंद्र चौहान करते थे। कहा जा रहा है कि अरविंद के एक सहयोगी ने साइबर एक्सपर्ट की मदद से अरविंद की नई वेबसाइट " फाइनल वार अगेंस्ट करप्सन " पर आईएसी के फेसबुक एकाउंट को जोड़कर फेसबुक से जुड़े सभी छह लाख सदस्यों को वहां शामिल कर दिया। इस पर शिवेंद्र ने फेसबुक को कानूनी कार्रवाई को पत्र लिखा, इसके बाद से आईएसी अब किरण बेदी के कब्जे वाली टीम के पास आ गई है। अरविंद की साइट पर अभी ज्यादा लोग नहीं है।
अरविंद की बात हो और मीडिया की बात न हो, ये संभव नहीं है। क्योंकि अरविंद मीडिया के बिना शून्य हैं। खैर मीडिया को अभी मजा आ रहा है। दरअसल आज की इलेक्ट्रानिक मीडिया का कोई सोच तो है नहीं, यहां पूरा खेल विजुअल का है। जितना ज्यादा देर ड्रामा, उतना अधिक कवरेज। वैसे भी अरविंदे के कुछ सहयोगी इलेक्ट्रानिक मीडिया की कमजोरी जानते हैं। उन्हें पता है कि अगर विजुअल कुछ हट कर नहीं होगा तो कोई पूछेगा ही नहीं। इसलिए आजकल पूरी टीम जोकर बनी हुई है। टोपी पहन कर जनता को टोपी पहना रहे हैं।
सच कहूं तो आज कल अरविंद जो कर रहे हैं उसे देखकर ही लगता है कि वो सियासत में प्राइमरी स्कूल के छात्र हैं। आप ही बताएं कि अगर एक पेड़ को हरा भरा रखना है तो पानी उसके जड़ में डालेंगे या फिर एक एक पत्ती को पानी में भिगोएंगे। अब देखिए बिजली बिल का भुगतान न करने वालों के कनेक्शन दिल्ली सरकार काट रही है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में लोगों के कनेक्शन काटे जा रहे हैं और केजरीवाल साहब मीडिया के साथ एक व्यक्ति के घर पहुंच कर उसका कनेक्शन जोड़ देते हैं। दोनों का काम हो जाता है, मीडिया का भी और केजरीवाल साहब का भी। अब ये सब पागलपन नहीं है तो क्या है ? कह रहे हैं कि जिसकी बिजली काटी जाए, उन्हें फोन करे वो आकर जोड़ देगें। अरे भाई आप लाइनमैन हैं क्या कि सबकी बिजली जोड़ते फिरेंगे। आप राजनीति कर रहे हैं, सरकार को मजबूर कीजिए कि बेवजह किसी की बिजली काटी ही ना जाए।
बहरहाल देखा जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल अपनी और आंदोलन की गंभीरता को खत्म करते जा रहे हैं। यही हालात रहा तो उनकी विश्वसनीयता का भी संकट खड़ा हो जाएगा। केजरीवाल को समझना होगा कि टीवी चैनल के पीछे खड़े होकर आंदोलन को बहुत दिन तक नहीं चलाया जा सकता। टीवी के लिए बड़ा से बड़ा आंदोलन एक पानी के बुलबुले की तरह है। अभी कोई दूसरा मामला आ गया, आप स्क्रिन से गायब हो जाएगे। केजरीवाल साहब कैमरे और सोशल नेटवर्क साइट कब आपको अनफ्रैंड कर दे विश्वास के साथ नहीं कह सकते।
एक जरूरी सूचना :-
मित्रों आपको पता है कि मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुडा हूं। दिल्ली में रहने के दौरान सियासी गलियारे में जो कुछ होता है, वो तो मैं सबके सामने बेबाकी से रखता ही रहता हूं और उस पर आपका स्नेह भी मुझे मिलता है। अब लगता है कि आप में से बहुत सारे लोग टीवी न्यूज तो देखते हैं, लेकिन इसकी बारीकियां नहीं समझ पाते होगें। मैने तय किया है कि अब आपको मैं टीवी फ्रैंडली बनाऊं। मसलन टीवी के बारे में आपकी जानकारी दुरुस्त करुं, गुण दोष के आधार पर बताऊं कि क्या हो रहा है, जबकि होना क्या चाहिए। इसमें मैं आपको इंटरटेंनमेंट चैनल को लेकर भी उठने वाले सवालों पर बेबाकी से अपनी राय रखूंगा। मेरी नजर प्रिंट मीडिया पर भी बनी रहेगी। इसके लिए मैने एक नया ब्लाग बनाया है, जिसका नाम है TV स्टेशन ...। इसका URL है। http://tvstationlive.blogspot.in । मुझे उम्मीद है कि मुझे इस नए ब्लाग पर भी आपका स्नेह यूं ही मिता रहेगा।