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Monday, 17 June 2013

नीतीश को मांस से नहीं तरी से परहेज !

एक सप्ताह से चल रहे नीतीश कुमार के सियासी ड्रामे का आज अंत हो गया। वैसे मुझे लगता है कि ये स्टोरी लोगों को पसंद नहीं आई होगी। आपको पता है कि अगर स्टोरी में दम होता तो अब तक प्रकाश झा इस कहानी पर फिल्म बनाने का ऐलान कर चुके होते, लेकिन वो पूरी तरह खामोश हैं। हां कोई नया निर्माता-निर्देशक होता तो वो जरूर इस कहानी को हाथोहाथ लेता, क्योंकि इसमें ड्रामा है, एक्शन है, सस्पेंस है, वो तो इस कहानी पर जरूर दांव लगाता। लेकिन मेरा मानना है कि चूंकि इस कहानी में नीतीश कुमार एक महत्वपूर्ण किरदार में रहे और नीतीश की बाजीगिरी पूरे देश को खासतौर पर बिहार को तो पता ही है। ऐसे में किसी ने भी इस कहानी में रुचि नहीं ली। लेता भी कैसे कहानी का अंत सभी को पहले से मालूम था, लिहाजा जनता की आंख में लंबे समय तक धूल नहीं झोंका जा सकता था। बिहार के लोग ही कहते हैं कि नीतीश की दोस्ती चाइनीज प्रोडक्ट की तरह है। मसलन चल गई तो चांद तक नही तो बस शाम तक ! खैर मैं इस कहानी को फिल्मी रंग देकर इसकी गंभीरता को खत्म नहीं करना चाहता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि नीतीश के खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग हैं। नीतीश कुमार ऐसे शाकाहार राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें मांस से नहीं उसकी तरी से परहेज है। कौन नहीं जानता कि बीजेपी की बुनियाद ही कट्टर हिंदूवादी सोच पर आधारित है, लेकिन उन्हें बीजेपी में नरेन्द्र मोदी के अलावा सभी धर्मनिरपेक्ष लगते हैं, यहां तक की देश भर में रथयात्रा निकाल कर माहौल खराब करने वाले एल के आडवाणी भी सैक्यूलर दिखते हैं।

एक-एक कर सभी बिंदुओं पर चर्चा करूंगा, लेकिन पहले बात कर लूं बिहार में मुस्लिम वोटों  पर गिद्ध की तरह आंख धंसाए लालू और नीतीश की। दरअसल लालू यादव मुसलमानों की नजर में उस वक्त हीरो बनकर उभरे जब उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा को बिहार में रोक कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद लालू यादव काफी दिनों तक मुस्लिम टोपी और चारखाने वाला गमछा लिए बिहार में फिरते रहे। इधर नीतीश एक मौके की तलाश में थे कि कैसे मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ लाएं। उन्हें ये मौका मिला 2010 में, जब पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान समाचार पत्रों में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ, जिसमें नीतीश कुमार और नरेन्द्र मोदी को हाथ पकड़े प्रसन्न मुद्रा में दिखाया गया। हालाकि ये तस्वीर गलत नहीं थी, लेकिन नीतीश को लगा कि इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता। उन्होंने इस पर कड़ा एतराज जताया। इतना ही नहीं कार्यकारिणी में हिस्सा लेने आए बीजेपी के बड़े नेताओं का रात्रिभोज जो मुख्यमंत्री आवास पर तय था, उसे रद्द कर दिया। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश को भारी कामयाबी मिली। बस यहीं से नीतीश बेलगाम हो गए, उन्हें लगा कि बीजेपी नेताओं को बेइज्जत करने से मुसलमान उनके साथ आया है और  इस कामयाबी में सिर्फ मुसलमानों का ही हाथ है। जबकि इसी चुनाव में बीजेपी को भी अच्छी सफलता मिली। दरअसल सच्चाई ये है कि लालू के कुशासन से परेशान बिहार की जनता को एनडीए गठबंधन से उम्मीद जगी और उन्होंने इस गठबंधन को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

नीतीश कुमार इसे मुसलमानों के वोटों पर मिली अपनी जीत समझने लगे। यहीं से विवाद गहराता गया। बड़ा और अहम सवाल ये है कि आज नीतीश कुमार अगड़े वोटों को लेकर क्या सोच रहे हैं। जमीनी हकीकत तो ये हैं कि बिहार में अगड़ों की कुल आबादी करीब 21 फीसदी है। सियासी गलियारे में चर्चा है कि करीब 13 फीसदी अगड़े वोट पर अकेले बीजेपी का कब्जा है। सबको पता है कि जेडीयू के 20 सांसदों की जीत में बीजेपी के अगड़े वोटों का बड़ा हाथ है। इतना ही नहीं राज्य की सियासत में अगड़े वोट का असर और भी ज्यादा है। विधानसभा की कुल 243 सीटों पर 76 अगड़े विधायक काबिज हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो इनकी संख्या लगातार बढ़ी भी है। मुझे हैरानी इस बात की है कि नीतीश जिस स्तर पर जाकर मुस्लिम मतों को लुभाने की कोशिश या कहें साजिश कर रहे हैं, उससे क्या उन्हें आने वाले चुनावों में अगड़े वोटों का नुकसान नहीं होगा ? सब को पता है बिहार की सियासत में अगड़ों का असर लगातार बढ़ रहा है। सच्चाई भी यही है कि ज्यादातर जेडीयू विधायकों के इलाके में अगड़े वोट नतीजे बदलने की ताकत भी रखते हैं। ऐसे में तो बीजेपी का साथ छोड़ने की कीमत नीतीश को जरूर चुकानी पड़ेगी। अगड़ों को लुभाने के लिए पिछले विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश ने सवर्ण आयोग का वादा किया और चुनाव जीतते ही उन्होंने सवर्ण आयोग गठित भी कर दिया। लेकिन मोदी को लेकर जो रवैया उन्होंने अपनाया, उसे देखते हुए तो नहीं लगता कि नीतीश अगड़ों में अपनी जगह बना पाएंगे।

हमारा अनुभव रहा है कि सियासत में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता। बस मोदी का भूत खड़ा कर बिहार में नीतीश भी वही करना चाहते हैं जो उनके धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव करते आए हैं। यानी अल्पसंख्यक वोटों की सियासत। इसके लिए वो जिस स्तर तक गिरते जा रहे हैं, उसे देखकर कई बार हैरानी होती है। मैं तो कहता हूं कि मुस्लिम टोपी और गमछा तो आजकल उनका पारंपरिक पहनावा हो गया है। कहा जा रहा है कि कहीं इस वोट के खातिर वो पार्टी में "खतना" अनिवार्य ना कर दें। मेरे मन में एक सवाल है कि आखिर नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव से भी ज्यादा बुलंद आवाज में मोदी विरोध का झंडा क्यों बुलंद कर रहे हैं ? क्या ये वही नीतीश कुमार नहीं हैं जो 2002 में गुजरात के दंगों के वक्त केंद्र में वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे। इस दौरान उन्होंने एक बार भी इस दंगे के बारे में अपनी राय नहीं जाहिर की। मैं पूछता हूं नीतीश कुमार का अल्पसंख्यक प्रेम उस वक्त कहां था ? इसका जवाब नीतीश कुमार के पास नहीं है। दरअसल नीतीश को उम्मीद ही नहीं थी कि उनका कभी बिहार की राजनीति में इतना ऊंचा कद होगा कि वो लालू का सफाया करने में कामयाब हो जाएंगे। इसलिए वो रेलमंत्री की कुर्सी पर चुपचाप डटे रहे। आप सबको पता होगा कि दंगों में मोदी की भूमिका के सवाल पर रामविलास पासवान ने वाजपेयी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में अगर आज पासवान मोदी का खुला विरोध करें तो बात समझ में आती है, लेकिन कहावत है ना कि " सूपवा बोले त बोले, चलनियों बोले, जिहमें बहत्तर छेद "

खैर अब 17 साल पुराना बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन खत्म हो चुका है। नीतीश का कहना है कि वो अपनी पार्टी की नीतियों से कत्तई समझौता नहीं कर सकते,जबकी बीजेपी इसे विश्वासघात बता रही है। हालाकि बिहार की राजनीति को समझने वालों को कहना है कि  बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को मुस्लिम, कुर्मी के साथ अग़ड़ों के वोट मिलते थे, जिसकी वजह से गठबंधन जीतता रहा है। लेकिन जिस हालात में नीतीश ने इस गठबंधन को तोड़ा है, उससे  अब अगड़ों के वोट निश्चित रूप से खिसक जाएंगे। रही बात मुस्लिम वोटों की तो उसमें चार हिस्सेदार हैं,
नीतीश, लालू, पासवान और कुछ हद तक कांग्रेस भी। ऐसी सूरत में नीतीश का ये दांव उनके लिए उल्टा भी पड़ सकता है। वैसे एक बात तो है कि सियासत में बड़े दांव खेलने में नीतीश को महारत हासिल है। आपको याद होगा कि पहली बार 1996 में उन्होंने जार्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर बीजेपी से गठबंधन किया। विवादित ढांचा ढहने के बाद बीजेपी को सेकुलर दल अछूत मानने लगे थे लेकिन समता पार्टी के झंडे तले नीतीश ने बीजेपी से हाथ मिलाया और बीजेपी की इस मुश्किल को हल कर दिया था। इसके बाद से बीजेपी से नीतीश का रिश्ता मजबूत होता गया। मई 1998 में जब 13 दलों ने एनडीए की बुनियाद रखी तो इसमें नीतीश की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1999 में एनडीए के तहत बीजेपी और जेडीयू ने मिल कर चुनाव लड़ा। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नीतीश रेल मंत्री बने। नवंबर 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला। अटल और आडवाणी के आशीर्वाद से नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बने।

अब सबके मन में एक सवाल है, जब सबकुछ ठीक चल रहा था तो आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि गठबंधन टूट गया। मैं बताता हूं, नीतीश कुमार को लगता था कि जिस तरह वो बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के गले पट्टा डाले अपने कब्जे में रखते हैं, उसी तरह वो नरेन्द्र मोदी के गले में भी पट्टा डालने में कामयाब हो जाएंगे। फिर उन्हें गलतफहमी हो गई थी कि  उनकी गीदड़भभकी से बीजेपी और संघ परिवार भी घुटनों पर आ जाएगा और वो ऐलान कर देंगे कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होगे। पर राजनीति की एबीसी भी जानने वाले अब समझ गए हैं कि नरेन्द्र मोदी को रोकना आसान नहीं है, अब उन्हें बीजेपी नेताओं का समर्थन मिले या ना मिले, उनके साथ देश का समर्थन है। दो दिन पहले खबरिया चैनलों पर बिहार के युवाओं से बात हो रही थी। मैने देखा कि वहां के नौजवान एक स्वर में कह रहे थे कि नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर कामयाब नेता मानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में आज मोदी का कोई मुकाबला नहीं है। जब  बिहार के नौजवानों की ये राय है तो देश के बाकी हिस्सों की राय का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। मेरी अपनी राय है कि नीतीश कुमार इसलिए भी बेलगाम हो गए कि बिहार बीजेपी ने उनके सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया था, कभी लगा ही नही कि शरीर की सबसे जरूरी रीढ की हड्डी उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के शरीर में है। इस बार उनका पाला 24 कैरेट के मोदी से पड़ा तो चारो खाने चित्त हो गए।

चलिए अब आगे की राह नीतीश को अकेले तय करनी है। अंदर की खबर तो है कि जेडीयू के दो चार अल्पसंख्यक नेताओं के अलावा किसी की भी ये राय नहीं थी कि बीजेपी से नाता खत्म किया जाए। यहां तक की पार्टीध्यक्ष शरद यादव खुद आखिरी समय तक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे थे। वो लगातार एक ही बात कहते रहे कि बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को अपनी पार्टी का प्रचार प्रमुख बनाया है, वो कोई एनडीए के प्रमुख थोड़े बन गए हैं कि इतनी हाय तौबा मचाई जाए। लेकिन सब जानते हैं कि नीतीश अंहकारी है, उन्हें लगता है कि पार्टी की जो भी ताकत है, ये सब उनकी वजह है। ऐसे में वो जो चाहेंगे वही होगा। वैसे सच तो ये है कि नीतीश गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से अंदरखाने खुंदस रखते ही हैं, वो मौका तलाश रहे थे और उन्हें मौका मिल गया। लेकिन गठबंधन टूटने के बाद नीतीश जिस तरह बीजेपी पर भड़क रहे थे, इससे साफ हो गया कि वो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

दुश्मनी जम कर करो मगर इतनी गुंजाइश रहे,
कि जब कभी फिर दोस्त बनें तो शर्मिंदा ना हों। 




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Friday, 14 June 2013

नीतीश के दांत : खाने के और दिखाने के और !

कई बार सोचता हूं कि गुजरात दंगे का असली मुजरिम कौन है ? इस सवाल पर इतने विचार मन में आते हैं कि अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच पाता हूं। जब गुजरात दंगे की तरफ नजर उठाता हूं तो लगता है कि बेईमानी कर रहा हूं, क्योंकि दंगे के पहले साबरमती एक्सप्रेस की घटना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर साबरमती एक्सप्रेस में सफर कर रहे यात्रियों की सुरक्षा पुख्ता होती तो, 59 यात्रियों को जिंदा नहीं जलाया जा सकता था। और अगर 59 आदमी जिंदा ना जले होते तो गुजरात में दंगा ना भड़कता। उस वक्त ट्रेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी यानि रेलमंत्री यही नीतीश कुमार थे। ईमानदारी की बात तो यही है कि साबरमती एक्सप्रेस की आग में ही गुजरात जला, वरना गुजरात में कुछ नहीं होता। अगर ऐसा है तो फिर गुजरात दंगे के लिए पहली जिम्मेदारी तो नीतीश कुमार की ही होनी चाहिए, दूसरी जिम्मेदारी नरेन्द्र मोदी डाली जानी चाहिए। मोदी पर भी यही आरोप है कि वो दंगे को काबू नहीं कर पाए, यही आरोप नीतीश पर भी है कि वो ट्रेन की सुरक्षा नहीं कर पाए। यानि ना खुद नीतीश ने ट्रेन में आग लगाई और ना ही मोदी ने सड़कों पर उतर कर दंगाइयों के साथ खड़े थे। हम कह सकते हैं कि दोनों ही अपने काम को अच्छी तरह नहीं निभा सके। वैसे बड़ा सवाल है कि सुरक्षा कर पाने में फेल नीतीश ने उस वक्त नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेलमंत्री के पद से इस्तीफा क्यों नहीं दिया ? नीतीश ने उस वक्त गुजरात दंगे को लेकर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी, क्योंकि नीतीश को कुर्सी हमेशा से प्रिय रही है। खैर मेरा अब भी मानना है कि नीतीश कुमार में इतनी ईमानदारी अभी बची है कि वो शीशे के सामने खड़े होकर नरेन्द्र मोदी को दंगाई कभी नहीं कह सकते, क्योंकि गुजरात दंगे के लिए दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं।       

नीतीश कुमार की ये तस्वीर गोधरा दंगे के बाद की है। एक सार्वजनिक मंच पर नीतीश ने सिर्फ नरेन्द्र मोदी के हाथ में हाथ ही नहीं डाला, बल्कि जनता के सामने हाथ ऊंचा कर अपनी दोस्ती का भी इजहार कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस तस्वीर के बाद नीतीश कुमार के बारे में कुछ कहना-लिखना ही बेमानी है, पर मेरी कोशिश है कि उन्हें जरा पुरानी बातें भी याद करा दूं। प्रसंगवश ये बताना जरूरी है कि गुजरात दंगे की शुरुआत गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस 6 डिब्बे में आग लगाने से हुई, जिसमें सवार 59 कार सेवकों की मौत हो गई थी। इसके बाद गुजरात के हालात बेकाबू हो गए और जगह-जगह दंगे फसाद में बड़ी संख्या में एक खास वर्ग के लोग मारे गए। सभ्यसमाज में किसी से भी आप बात करें वो यही कहेगा कि दंगे नहीं होने चाहिए थे, मेरा भी यही मानना है कि वो दंगा गुजरात के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था। अब नीतीश कुमार की बात कर ली जाए। गुजरात में जब दंगा हुआ उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, जिसमें नीतीश कुमार रेलमंत्री थे। दंगे की शुरुआत साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाने से हुई, जिसमें 59 लोगों को जिंदा जला दिया गया। ट्रेन में ये हादसा हुआ था, ऐसे में अगर नीतीश कुमार में थोड़ी भी ईमानदारी होती तो उन्हें तुरंत रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। खैर, ट्रेन में हुए हादसे की प्रतिक्रिया हुई और गुजरात में दंगा भड़क गया। बड़ी संख्या में एक ही वर्ग के लोग मारे गए। मोदी की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठे, आरोप यहां तक लगा कि उन्होंने जानबूझ कर दंगा रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की। मामला अदालत में है, फैसला होगा, तब  देखा जाएगा।


गुजरात दंगे से सिर्फ गुजरात ही नहीं पूरा देश सिहर गया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी गुजरात पहुंचे और उन्होंने मोदी को राजधर्म का पाठ पढ़ाया। सच तो ये है कि वाजपेयी मोदी को मुख्यमंत्री के पद से ही हटाना चाहते थे, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की वजह से उन्हें नहीं हटाया जा सका। आज वही आडवाणी नीतीश कुमार के लिए धर्मनिरपेक्ष हैं। जिस आडवाणी की रथयात्रा से देश भर में माहौल खराब हुआ और अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई, देश के अलग अलग हिस्सों में दंगे हुए, जिसमें हजारों लोग मारे गए। आज वो आडवाणी बिहार के मुख्यमंत्री के आदर्श है। खैर ये उनका व्यक्तिगत मामला है। मैं सीधा सवाल नीतीश से करना चाहता हूं। बताइये नीतीश जी, मेरे ख्याल से जब आप रेलमंत्री थे तो बालिग रहे ही होंगे, इतनी समझ जरूर होगी कि अल्पसंख्यकों के साथ बुरा हुआ है। उस वक्त आप खामोश क्यों थे ? आपने उस दौरान केंद्र की सरकार पर ऐसा दबाव क्यों नहीं बनाया कि मुख्यमंत्री को तुरंत बर्खास्त किया जाए ? आपने उस वक्त गुजरात जाकर क्या अल्पसंख्यकों के घाव पर मरहम लगाने की कोई कोशिश की ? मुझे पता है आप कोई जवाब नहीं देंगें। जवाब भी मैं ही दे देता हूं, आपको कुर्सी बहुत प्यारी थी, इसीलिए आप रेलमंत्री भी बने रहे और दंगे को लेकर आंख पर पट्टी भी बांधे रहे।

मैं समझता हूं कि ये तस्वीर आपको नीतीश कुमार का असली चेहरा दिखाने के लिेए काफी है। क्योंकि गुजरात दंगे के बाद नीतीश हमेशा मोदी के साथ बहुत ही मेल-मिलाप के साथ रहे हैं। दोनों की खूब बातें होती रही हैं, खूब हालचाल होते रहे हैं। लेकिन सिर्फ मुझे ही नहीं लगता, बल्कि बिहार के लोगों का भी मानना है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश में " अहम् " आ गया है। वो अब खुद को मोदी से बड़ा आईकान समझने लगे। लेकिन नीतीश कुमार भूल गए कि आज राजनीतिक स्थिति यह है कि जिस बिहार के वो मुख्यमंत्री हैं, उसी बिहार में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में एक मजबूत ग्रुप तैयार हो चुका है, जो नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। इतना ही नहीं नीतीश कुमार जब मोदी के खिलाफ जहर उगलते हैं तो इससे इन्हें काफी तकलीफ भी होती है। यही वजह है कि बिहार का एक बड़ा तबका आज नीतीश से चिढ़ने लगा है। नीतीश को ये बात पता है कि अब बिहार की राजनीति में दो ध्रुव है। एक पिछड़ों की जमात है और दूसरा अगड़ों की जमात है। यादव को छोड़ कर पिछड़ों और अगड़ों का बड़ा तबका आज नरेन्द्र मोदी के नाम की जय-जयकार कर रहा है। सच बताऊं मुझे लगता है कि नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य में काफी मुश्किल होने वाली है, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सेना के मिग-21 के उस लड़ाकू उड़ान जैसी है, जो अकसर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है, जिसमे बेचारे तीरंदाज पायलटों को भी जान गवानी पड़ जाती है।

कुछ दिन पहले हुए महराजगंज लोकसभा उप चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार को लगभग डेढ लाख मतों से हार का सामना करना पड़ा। नीतीश की समझ में क्यों नहीं आया कि अब उनका असली चेहरा बिहार की जनता के सामने आ चुका है। दरअसल विधानसभा चुनाव में जो कामयाबी जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को मिली, उसे ये अपनी जीत समझने लगे। जबकि सच्चाई ये थी कि लोग लालू और राबड़ी की सरकार से लोग इतने तंग थे कि वो बदलाव चाहते थे। बस उन्होंने इस गंठबंधन को मौका दे दिया। आज तो नीतीश पर भी तरह-तरह के गंभीर आरोप हैं। उन पर भी उंगली उठने लगी है। नीतीश सिर्फ अपनी ही पार्टी के नहीं बल्कि दूसरे दलों के भी चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भ्रष्ट मानते हैं। लेकिन अब बिहार की जनता उनसे पूछ रही है कि भ्रष्ट नौकरशाह एन के सिंह और भ्रष्ट उद्योगपति किंग महेन्द्रा को राज्यसभा में उन्होंने क्यों भेजा? इतना ही नहीं उन्होंने अपने स्वजातीय नौकरशाह जो प्राइवेट सेक्रटरी था, उसे किस नैतिकता के साथ राज्यसभा में भेजा? इन सबके बाद भी जब नीतीश कुमार ईमानदारी की बात करते हैं तो बिहार में लोग हैरान रह जाते हैं। लोकसभा के उप चुनाव में हार इन तमाम गंदगी का ही नतीजा है।

अच्छा गली-मोहल्ले से गुजरने के दौरान कई बार आपको कंचा खेलते बच्चे दिखाई पड़ते हैं, जो साथ में खेलते भी है, फिर भी एक दूसरे को मां-बहन की गाली देते रहते हैं। आज जब जेडीयू की ओर से बयान आया कि वो दंगाई के साथ नहीं रह सकते, तो सच मे गली मोहल्ले में कंचा खेलते हुए और आपस में गाली गलौच करने वाले उन्हीं बच्चों की याद आ गई। मैं चाहता हूं कि नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा सार्वजनिक करें, जिससे देश की जनता ये समझ सके कि आडवाणी किस तरह धर्मनिरपेक्ष हैं और नीतीश कुमार कैसे साम्प्रदायिक हैं। सच कहूं तो नीतीश कुमार का बनावटी चेहरा यह है कि एक तरफ वो नरेन्द्र मोदी को दंगाई कहते हैं और दूसरी तरफ भाजपा के साथ सत्ता सुख भी लूट रहे हैं। अगर नरेन्द्र मोदी दंगाई हैं और भाजपा उन्हें लगातार प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की राह आसान कर रही है, तो फिर भाजपा से अलग क्यों नहीं हो जाते ? इसमे इतना सोच विचार क्यों ? नीतीश कुमार एक साथ धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का जो खेल-खेल रहे हैं, उस पर जनता की नजर अब कैसे नहीं होगी?

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी के विरोध में उतरने की जरूरत क्या थी? लगता तो ये है कि नीतीश कुमार पर अहंकार और खुशफहमी भारी पड़ गई है। बिहार को संभालने के बजाए वो देश संभालने का ख्वाब देखने लगे हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नीतीश कुमार मुसलमानों की टोपी और गमछा पहन कर मोदी को दंगाई कहने से भी नहीं रूके। मैं जानना चाहता हूं कि क्या धर्मनिरेपक्ष होने और दिखने के लिए टोपी और गमछा ओड़ना जरूरी है? भाई अगर मुसलमान इतने से भी प्रभावित नहीं हुए तो क्या आने वाले समय में जेडीयू अपने चुनावी घोषणा पत्र में "खतना" को तो अनिवार्य नहीं कर देंगी ?  सच ये है कि जेडीयू की ताकत बिहार में भाजपा के साथ मिलने के कारण बढ़ी है। भाजपा ने लालू से मुक्ति के लिए अपने हित जेडीयू के लिए कुर्बान कर दिया। सबको पता है कि जेडीयू के पास कार्यकर्ता कम नेता ज्यादा हैं। जमीनी स्तर पर लालू से मुकाबले के लिए जेडीयू या नीतीश कुमार का कोई नेटवर्क नहीं है। भाजपा के कार्यकर्ता ही जमीनी स्तर पर लालू को चुनौती देने के लिए खडे रहते हैं। भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक मोदी के तीखे विरोध और नीतीश कुमार द्वारा मुस्लिम टोपी और गमछा पहनने की वजह से उनसे नाराज हैं और उनका कड़ा विरोध भी कर रहे हैं, उपचुनाव में हार इसकी एक बड़ी वजह है।

बहरहाल अब बीजेपी में नरेन्द्र मोदी का नाम बहुत आगे बढ़ चुका है, इतना आगे कि वहां से पीछे हटना बीजेपी के लिए आसान नहीं है। जेडीयू को समझ लेना चाहिए कि जब मोदी का विरोध करने वाले आडवाणी को पार्टी और संघ ने दरकिनार कर दिया तो जेडीयू की भला क्या हैसियत है। ये देखते हुए भी नीतीश कुमार नूरा कुश्ती का खेल खेल रहे हैं, ये भी बिहार की जनता बखूबी समझ रही है। मैं पहले भी कहता रहा हूं आज भी कह रहा हूं कि अब मोदी को राष्ट्रीय राजनीति मे आगे बढ़ने से रोकना किसी के लिए आसान नहीं है। अगर जेडीयू इस मुद्दे पर बीजेपी से अलग रास्ते पर चलती है तो ये उसके लिए भी आसान नहीं होगा, मुझे तो लगता है कि इसका फायदा भी बीजेपी को होगा। बहरहाल अभी 48 घंटे का इंतजार बाकी है, बीजेपी की अंतिम कोशिश है कि गठबंधन बना रहे, लेकिन ये आसान नहीं है। जो हालात हैं उसे देखकर तो मैं यही कहूंगा कि जो लोग जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव और नीतीश कुमार से गठबंधन ना तोड़ने की भीख मांग रहे हैं वो बीजेपी, संघ और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ साजिश कर रहे हैं। वैसे भविष्य तय करेगा, लेकिन इस मुद्दे पर कही जेडीयू ही टूट जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।



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Sunday, 17 March 2013

हकीकत : दिल्ली से भीख मांगते रहे नीतीश !


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली आए तो थे अधिकार मांगने लेकिन भीख मांगकर चले गए। उनके पूरे भाषण में एक बार भी ऐसा नहीं लगा जैसे वो अपने अधिकार की मांग कर रहे हों। उन्हें न ही केंद्र की सरकार से कोई शिकायत थी, न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से। शिकायत करना तो दूर अलबत्ता वित्तमंत्री पी चिदंबरम की तो वो वाह-वाही करते रहे। उनके पूरे भाषण का लब्बोलुआब अगर कहें तो वो ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अभी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया तो ये बिहार पर केंद्र सरकार का एहसान होगा, वरना 2014 यानि चुनाव के बाद तो वो ले ही लेंगे। मसलन वो दिल्ली को कम बल्कि बिहार को ज्यादा संदेश दे रहे थे कि अगर दिल्ली अभी उनकी मांग को नहीं मानती है तो बिहार की जनता लोकसभा चुनाव में जेडीयू को और ताकतवर बनाए। क्यों नीतीश जी ! यही बात आप समझाने की कोशिश कर रहे थे ना ? मै कोई गलत तो नहीं कह रहा हूं ? नीतीश जी एक बात आपको बताऊं, वैसे तो ये अंदर की बात है, लेकिन आप जान लीजिए। जिस कांग्रेस ने अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सिर्फ पद दिया हो, पद का अधिकार नहीं, उस बेचारे मजबूर आदमी से आप बिहार का अधिकार मांग रहे हैं।

रामलीला मैदान में अगर आज आपने नीतीश कुमार की बाँडी लंग्वेज को पढ़ा हो तो उनमें साफ-साफ घमंड नजर आ रहा था। बिहार में वो बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री हैं और ये भी नहीं बीजेपी की संख्या कोई कम है, बल्कि बीजेपी विधायकों की संख्या ठीक ठाक है। ऐसे में अगर वो दिल्ली में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करने आए थे तो बीजेपी से दूरी क्यों बनाए रहे ? इसकी वजह कम से कम मेरे समझ में तो नहीं आई। खैर सच ये है कि दिल्ली में आज कल सब कुछ उल्टा पुल्टा चल ही रहा है। अब देखिए ना केंद्र सरकार के कानून में तंबाकू इस्तेमाल करने की उम्र 18 साल, मतदान करने की उम्र 18 साल, शादी करने की उम्र 18 साल लेकिन सेक्स करने की उम्र 16 साल। अब ये क्या है ? एक कांग्रेसी नेता से मैने पूछा कि ये क्या माजरा है ? आंख दबा कर कहने लगे की शादी के पहले दो साल तैयारी की छूट दी गई है। मुझे तो नीतीश का काम भी कुछ ऐसा ही लग रहा है, अरे भाई मुख्यमंत्री के नाते आप बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं और जिस बीजेपी की वजह से मुख्यमंत्री हैं, उसे दूर रख रहे हैं ? भला ये कैसे संभव है। अब सच्चाई ये है कि बीजेपी में भी इतनी गुटबाजी है, वरना तो जिस वक्त नीतीश कुमार  दिल्ली में थे, उस दौरान पटना में बीजेपी विधायकों को राज्यपाल के पास समर्थन वापसी का पत्र सौंपना चाहिए था।

नीतीश कुमार कई महीने से बिहार के विभिन्न इलाकों मे दौरा कर लोगों को समझा रहे थे कि दिल्ली में अधिकार रैली क्यों करने जा रहे हैं। इसके लिए वो एक बार पटना में भी बड़ी रैली कर चुके हैं। नीतीश का मानना है कि बिहार के साथ दिल्ली न्याय नहीं करती है, बिहार को उसका वाजिब हक नहीं दिया जा रहा है। यही वजह है कि दूसरे राज्यों के मुकाबले बिहार पिछड़ा है। कुमार का दावा है कि बिहार को भी विकास का पूरा अधिकार है। बिहार का  रोना रोते हुए मुख्यमंत्री कहते हैं कि बिहार के लोग मजबूरी में अपने प्रदेश को छोड़ते हैं, सही बात है, मजबूरी ना हो तो भला कोई रोजी रोटी के लिए अपना घर क्यों छोड़ेगा ? एक सवाल उठाया गया कि जिस बिहार की एक गौरवशाली परंपरा रही है, आजादी के आंदोलन में जिस राज्य ने अहम भूमिका निभाई, आखिर वो राज्य इतना पीछे क्यों हो गया ? अगर नीतीश दिल्ली में आकर ये सवाल पूछते हैं तो लगता है कि वो भी ईमानदार नहीं हैं। इस सवाल का जवाब तो आपको पटना के गांधी मैदान में ही मिल सकता है। जमा कर लीजिए पूरे सूबे की जनता को गांधी मैदान में। बिहार में अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों का लेखा जोखा वहां रखिए। लोग खुद बता देंगे कि मुख्यमंत्री चाहे जगन्नाथ मिश्र रहे हों या लालू यादव या फिर आप ही क्यों ना हों। किससे कहां-कहां चूक रही है, सब पता चल जाएगा। नीतीश जी, क्या आपको लगता है कि आपकी सरकार में छेद नहीं है, अगर ऐसा लगता है तो आप गलत फहमी में हैं। इसीलिए कह रहा हूं कि बिहार के पिछड़ने के लिए जिम्मेदार तो वहां के नेता हैं, ऐसे में इसका जवाब दिल्ली नहीं पटना ही दे देगी।

रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री ने गिडगिड़ाते हुए दिल्ली की गूंगी और बहरी सरकार को बताने की कोशिश की कि देखिए सुविधाओं के मामले में भी बिहार की उपेक्षा हुई है। बिहार में प्रति व्यक्ति आय देश की आय से कम है, कृषि विकास के लिए जो पैसा उन्हें मिला है, वह भी नाकाफी है। हमारी जरूरत के हिसाब से हमें पैसा नहीं मिलता है। नीतीश बोले बिहार में जनसंख्या का घनत्व भी ज्यादा है। ऐसे में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिला तो यहां विकास होगा। विशेष दर्जे के मानदंडों में भी बदलाव होना जरूरी है। रैली से पहले बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा है कि आज यानि उनके जमाने में बिहार पहले से ज्यादा तरक्की कर रहा है और अगर केंद्र की ओर से राज्य को सहयोग मिले तो वह जल्द ही विकसित राज्यों में शामिल हो जांएगे। अच्छा नीतीश के सामने जो लोग थे, उनमें से एक बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो दिल्ली आकर बस गए हैं और मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। आपको पता है दिल्ली में बिहार के लोगों की संख्या 35 से 40 लाख के करीब है। नीतीश को लगा कि अगर उनकी बात नहीं की गई तो ये निराश होंगे, लिहाजा उन्होंने दिल्ली की सरकार का नाम लिए बगैर कहा कि बिहार के लोग दिल्ली में भी जहां रहते हैं वहां उन्हें बहुत तकलीफ में रहना पड़ता है, मसलन  बुनियादी सुविधाएं यहां भी नहीं मिलती। खैर ये सब तो ठीक है।

बड़ा सवाल ये है कि नीतीश कुमार दिल्ली क्यों आए थे ? उन्हें अगर मांगने से अधिकार मिल रहा होता तो कब का मिल चुका होता, क्योंकि वो कई बार पटना में रैली कर चुके हैं, दिल्ली में प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष से व्यक्तिगत तौर पर मिल चुके हैं। सच कहूं तो वो कांग्रेस के सामने घुटने टेकते हुए यहां तक कह चुके हैं कि जो बिहार का साथ देगा, उसे उनका साथ मिलेगा। नीतीश पुराने नेता हैं, लेकिन मुझे उनकी सोच पर हैरानी होती है। नीतीश जी क्या आपको पता  नहीं है?  कांग्रेस को इंतजार है आपकी एक गलती का, उसके बाद जहां सीबीआई में आपकी एक फाइल खुली, बस फिर तो आप भी कतार में खड़े हो जाएंगे। देख रहे है ना, माया मुलायम एक दूसरे के कट्टर विरोधी, लेकिन कांग्रेस को दोनों का समर्थन, वजह दोनों की फाइल है सीबीआई में। लालू यादव बेचारे सीबीआई की वजह से ही तो कांग्रेस की हां में हां मिला रहे हैं। डीएमके सुप्रीमों करुणानिधि के मंत्री ए राजा ही नहीं बेटी कनिमोझी तक को जेल भेज दिया, पर समर्थन जारी है। सब सीबीआई का खेल है। कांग्रेस को महज एक गलती भर मिल जाए आपकी, बस फिर क्या मुलायम और माया की तरह पता चला कि बिहार  से लालू और नीतीश भी कांग्रेस के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं।

बहरहाल मेरा अभी भी यही सवाल है कि आप दिल्ली क्यों आए ? जब आपको कांग्रेस की सरकार में सबकुछ  गुडी-गुडी नजर आ रहा है तो ये करोड़ो रुपये फूंकने की जरूरत क्या थी ? नीतीश जी अगर आपको केंद्र सरकार को कुछ खरी खरी नहीं सुनानी थी तो आपने  पटना में ही ये जलसा क्यों नहीं कर लिया ? जब बिहार में जेडीयू और बीजेपी गठबंधन की सरकार है तो अधिकार रैली से बीजेपी को दूर क्यों रखा ? आपने कहाकि हम यहां अधिकार मांगने आए हैं। जिस तरह से आप अधिकार मांग रहे थे, उससे तो देश में यही संदेश जा रहा था कि आप "भीख" मांग रहे हैं। अधिकार की बात तो  आक्रामक शैली में की जाती है, गिडगिड़ाकर तो भीख ही मांगा जाता है। आपने कई बार वित्त मंत्री की पीठ थपथपाई। अरे उन्होंने अभी क्या दे दिया बिहार को ? वित्तमंत्री ने तो एक जनरल बात की है कि विशेष दर्जा देने के जो मापदंड है उसमें बदलाव जरूरी है। क्या बदलाव होगा, ऐसा कुछ तो कहा नहीं गया है। ये भी नहीं कहा गया है कि बिहार को इसमें शामिल ही कर लिया जाएगा। फिर भी आप जिस शान  की बात कर रहे थे, वो शान दिखाई नहीं दी। मुझे तो लगता है कि आपकी कांग्रेस से अंदरखाने कुछ बात हो गई है। नीतीश जी एक शेर सुनाऊं ?

अल्लाह ये तमन्ना है जब जान से जाऊं। 
जिस शान से आया हूं, उसी शान से जाऊं।।

खैर कांग्रेस के लिए अच्छी खबर है। बिहार बीजेपी में टकराव हो गया है। कई धड़े बन गए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अविश्वसनीय हो गए हैं। बीजेपी के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी बेपेंदी के लोटा हैं, उनकी कोई हैसियत ही नहीं दिखाई दे रही है। अभी जो हालात हैं उसे देखते हुए तो ऐसा ही लग रहा है कि 2014 में कांग्रेस तो अपने लिए वोट मांगती ही फिरेगी, लालू यादव, राम विलास पासवान और अब नीतीश कुमार भी चुनाव भले अलग लड़ें, लेकिन सब काम कांग्रेस के लिए ही करेंगे। झारखंड में सियासी समीकरण बदल रहे हैं, अगर सब सही रहा तो वहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस गठबंधन की सरकार बन सकती है। ऐसे में 2014 में शिबु सोरेन भी कांग्रेस के लिए काम करते दिखाई देंगे।

चलते - चलते

राजनाथ जी आपरेशन बिहार शुरू कीजिए, वरना ऐन  मौके पर ऐसा धोखा खाएंगे कि चारो खाने चित्त हो जाएंगे। अच्छा ज्यादा कुछ करना भी नहीं है, बस नीतीश सरकार से समर्थन वापस लीजिए, सुशील मोदी को किसी जिले का अध्यक्ष बनाकर पैदल कीजिए, बिहार में पार्टी  के गुटबाजों को बाहर कीजिए। अब इंतजार बहुत हो गया, सुशील मोदी ने पार्टी को नीतीश सरकार में गिरवी रख दिया है। अब तैयार हो जाइये, अगर बिहार में कुछ करना है ....