Thursday, 26 February 2015

रेल बजट : डरपोक नजर आए प्रभु !

रेल बजट से सिर्फ निराशा ही नहीं हुई बल्कि इस बजट ने रेलवे बोर्ड के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं ! बजट पर बात करूंगा, लेकिन पहले रेलवे बोर्ड की प्रासंगिकता पर बात करना जरूरी हो गया है। इस बजट को सुनने के बाद मन में जो पहला सवाल है वो ये कि रेलवे बोर्ड की आखिर जरूरत क्या है ? जर्नलिज्म से जुड़े होने की वजह से मेरा 15 - 20 साल से रेलवे और बोर्ड के तमाम अफसरों से संपर्क रहा है, इसलिए रेलवे के सिस्टम को बखूबी समझता हूं। बोर्ड में मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरों की जबर्दस्त खेमेबंदी है। दोनों गुट की कोशिश रहती है कि बोर्ड में उनकी तूती बोलती रहे, इसके लिए ये बहुत नीचे तक गिर जाते हैं। खैर इस मसले पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी, आज मैं ये जानना चाहता हूं कि रेलवे बोर्ड के पास ना कोई प्लानिंग है ना कोई विजन है और ना ही कोई सिस्टम है, ऐसे में रेलवे को इस हाथी ( रेलवे बोर्ड ) की जरूरत क्यों है ? ये इंजीनियर ट्रेन को पटरी से उतार देगें, वरना मेरा तो यही मानना है कि बोर्ड का प्रबंधन इंजीनियरों से लेकर IAS को सौंप दिया जाना चाहिए, क्योंकि मुझे लगता है कि योजना, बजट, अनुशासन ये सब एक इंजीनियर के मुकाबले IAS बेहतर कर सकता है।  

आइये बजट पर चर्चा करते हैं। रेलमंत्री सुरेश प्रभु पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट है, इसलिए वो गुणा भाग में माहिर हैं। उनकी ये महानता बजट में दिखाई दी और उन्होंने सबसे बड़ा झूठ ये कहाकि आज रेलवे का आँपरेशन रेसियो 88.5 है। मतलब रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए 88.50 रुपये खर्च करता है। सच्चाई ये है कि रेलवे 100 रुपये कमाने के लिए करीब 113 रुपये खर्च करती है। वैसे प्रभु आपकी लीला अपंरपार है, आपने कहा कि अभी तक लोग 60 दिन पहले का ही रिजर्वेशन करा सकते थे, जिसे बढ़ाकर 120 दिन कर दिया गया है। मतलब लगभग पांच हजार करोड रूपये बिना सफर कराए ही एडवांस में रेलवे के खाते में जमा हो जाएंगे । यात्रियों की इस रकम पर बैंक तो रेलवे को ब्याज देगा, लेकिन टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो रेलवे यात्री को पूरा पैसा तक वापस नहीं करेगी, वो कैंसिलेशन चार्ज वसूलेगी। फिर चार महीने बाद क्या होगा ये साधारण यात्री तो नहीं जानता, ये तो प्रभु आपको ही पता हो सकता है। 

प्रभु आपका ये ऐलान कि ट्रेनों और प्लेटफार्म पर विज्ञापन के जरिए रेलवे आय का स्रोत बढाएगी, ये बात तो समझ में आती है। लेकिन आप का ये ऐलान गले नहीं उतरा कि कंपनियों के नाम पर स्टेशन और ट्रेन का नाम रखकर बड़ी रकम वसूल की जाएगी। मुझे याद है कि पूर्व रेलमंत्री स्व. कमलापति त्रिपाठी ने एक बार रेल के अफसरों को इसीलिए लताड लगाई थी कि वो ट्रेनों का नाम ठीक तरह से नहीं रखते थे। पहले ट्रेन का नाम होता था, बाम्बे मेल, तूफान मेल, कालका मेल आदि आदि। स्व. त्रिपाठी ने कहाकि ट्रेन के नाम सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पहचान के आधार पर रखे जाएं। उनके समय में जो भी ट्रेनें चलीं उनका नाम बहुत सोच समझ कर रखा जाता था, जैसे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, त्रिवेणी एक्सप्रेस, गंगा गोमती एक्सप्रेस, हिमगिरी एक्सप्रेस इत्यादि। लेकिन प्रभु आपके ऐलान के बाद तो लगता है कि ट्रेनों का नाम होगा एमडीएच चिकन मसाला एक्सप्रेस, कुरकुरे एक्सप्रेस, पेप्सी मेल, सहारा एक्सप्रेस, जाँकी अंडरवियर सुपरफास्ट ट्रेन, तुफान बीडी मेल, बेगपाईपर सुपर फास्ट ! ये सब क्या है प्रभू ? 

वैसे प्रभु एक बात बताऊं, पूर्व रेलमंत्री लालू यादव को आज मैं वाकई याद कर रहा हूं। लालू का मैं बड़ा आलोचक रहा हूं, लेकिन आपके बजट के बाद इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि लालू बजट पर मेहनत करते थे और उनके बजट में रेलवे के मुनाफे के साथ दूरदर्शिता दिखाई देती थी। लालू ने रेलवे बोर्ड के इंजीनियरों पर आंख मूंद कर कभी भरोसा नहीं किया, वो अपने साथ बिहार कैडर के कुछ आईएएस अफसरों को  अपना OSD बनाकर बोर्ड में बैठा दिया था। नतीजा ये हुआ कि बिगडैल इंजीनियरों पर लगाम कसा जा सका। सच कहूं प्रभु आपका बजट तो मैं अभी तक यही नहीं समझ पा रहा हूं कि ये है किसके लिए ? इसे ना यात्रियों का बजट कह सकते है, ना रेल कर्मचारियों का बजट कह सकते हैं और ना ही व्यापारियों का बजट कह सकते हैं। संसद में आपने साफ-साफ बता दिया कि दिल्ली मुंबई राजधानी की औसत गति सिर्फ 79 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि दूसरी राजधानी की औसत गति तो 55 से 60 किलोमीटर प्रतिघंटा ही है। इसलिए प्रभु जी आपने ऐलान किया कि आप कुल 9 रेलमार्ग पर गति सीमा बढ़ाएंगे। पता नहीं आपको याद है या नहीं, लेकिन ये काम लालू यादव ने शुरू किया था, उन्होंने सबसे पहले दिल्ली से आगरा तक भोपाल शताब्दी को 150 किलोमीटर की रफ्तार से चलाने की कोशिश की। कई साल काम चला, रेलवे ने 180 करोड रुपये ज्यादा पटरियों को अपग्रेड करने पर खर्च भी किया। लेकिन आज भी भोपाल शताब्दी की औसत गति 110 - 120 किलोमीटर ही है। मुझे लगता है कि बोर्ड के इंजीनियरों ने मोटा माल बनाने के लिए पुरानी पटरी को अपग्रेड करने का तरीका तलाशा है। 

साफ-सफाई तो खैर जितना भी हो कम है, इस पर आपने ध्यान दिया है अच्छी बात है। लेकिन फिर मुझे कहना पड़ रहा है कि बोगी में बायो टायलेट की शुरुआत पूर्व रेलमंत्री लालू यादव ना सिर्फ अपने बजट में कर चुके है, बल्कि उनके समय में ही आईआरडीएसओ ने एक बोगी तैयार कर दिल्ली में इसका प्रदर्शन भी किया था। इस दौरान लालू के साथ कैबिनेट मंत्री रहीं अंबिका सोनी भी मौजूद थीं। आपने कहाकि मेक इन इंडिया के तहत इंजन, बोगी, पहिए देश में बनाए जाएंगे। प्रभु देश में तो आज भी ये तीनों चीजें बन रही हैं, हां जरूरत के मुताबिक उत्पादन नही कर पा रहे हैं। सफर के दौरान यूज एंड थ्रो बेडरोल की बात नई जरूर है, बहरहाल इसका इंतजार रहेगा। ये अच्छा प्रयास है। 

प्रभु आपके एक ऐलान से तो मेरा पूरा परिवार हंसते हंसते थक गया। आपने कहाकि चार महीने पहले आप ट्रेन का टिकट ले सकते हैं और टिकट लेने के दौरान ही मनचाहे खाने का आर्डर भी IRCTC के जरिए आँनलाइन ही कर सकते है। पहला तो ये कि जहां लोग सुबह नाश्ते के बाद सोचते हों कि लंच में क्या खाया जाए, वहां आप चार महीने पहले खाने के आर्डर को मनचाहा खाना बता रहे हैं। चलिए ये तो कोई खास नहीं.. लेकिन एक वाकया बताता हूं। दिल्ली से गोवा जा रहा था, ट्रेन को दोपहर एक बजे भोपाल पहुंचना था, एक  मित्र ने कहाकि भोपाल में वो खाना लेकर आएंगे ! ट्रेन 6 घंटे लेट हो गई और हम सभी  बिस्किट खाकर भूख से जूझते रहे। ट्रेनों की लेट लतीफी के बीच अगर यात्री भोजन का इंतजार करता रहा तो उसका भगवान ही मालिक है। 

जनरल कोच में मोबाइल चार्ज करने की सुविधा दे रहे हैं, लेकिन प्रभु कुछ ऐसा कीजिए कि सामान्य श्रेणी के कोच में यात्री आराम से सफर भर कर सके, तो भी चल जाएगा। स्टेशन पर फ्री वाईफाई भी गैरजरूरी बात लगती है, क्योंकि आज कल सभी के फोन पर नेट की सुविधा आमतौर पर होती ही है। सरकारी पैसे को बेवजह खर्च करने की जरूरत नहीं है। और हां प्रभु ये बताएं आपने एक भी नई ट्रेन का ऐलान नहीं किया ! मुझे तो ये बात समझ में ही नहीं आ रही है। आपको पता है कि लोगों को आसानी से रिजर्वेशन नहीं मिल रहा है, रेलवे आज भी डिमांड पूरी नहीं कर पा रही है ऐसे में नई ट्रेन का ऐलान होना ही चाहिए। मुझे पता है कि रेल रूट बिजी है, लेकिन जब आप कह रहे हैं कि ट्रेनों की स्पीड बढ़ाकर कुछ समय निकाला जाएगा, तो नई ट्रेन चलाई जा सकती है। इससे तो आपकी और बोर्ड अफसरों में इच्छाशक्ति की कमी दिखाई देती है। डिमांड पूरी करने के लिए ट्रेनों में बोगी बढ़ाने की बात कर रहे हैं, ज्यादातर ट्रेनो में 24 कोच लगाए जा रहे हैं, इससे ज्यादा कोच लगाने की क्षमता ही नहीं है। कई रेलवे स्टेशन पर तो 24 कोच की ही ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी नहीं हो पाती है, फिर और बोगी बढ़ाने की बात तो बेमानी लगती है। 

आखिर में रेलवे के आय पर बात करना है। एक बार फिर बजट में पीपीपी की बात की गई है। प्रभु आपको पता है कि वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन के लिए पीपीपी के तहत देश विदेश से टेंडर आमंत्रित किए गए थे, लेकिन कोई भी आवेदन नहीं आया। दरअसल सच्चाई ये है कि भारतीय रेल पर किसी को भरोसा ही नहीं है। आपने सिर्फ पीठ थपथपाने के लिए रेल किराए में कोई बढोत्तरी नहीं की। मै तो आपके इस फैसले से पूरी तरह असहमत हूं। देश में रोजाना 2.30 करोड यात्री ट्रेन से सफर करते हैं। इसमें अकेले मुंबई में 85 लाख यात्री रोजाना लोकल ट्रेन से सफर करता है। अभी वहां तीन महीने का मासिक सीजन टिकट सिर्फ 15 दिन के किराए पर दिया जाता है। मासिक सीजन टिकट में बढोत्तरी की गुंजाइश थी, लेकिन आपने नहीं किया। इसी तरह अपर क्लास का किराया लगातार बढाया गया है लेकिन जनरल और स्लीपर क्लास में किराया नहीं बढ़ा है, इसलिए जरूरी है कि किराए को तर्कसंगत बनाया जाए। माल भाडा बढ़ाया तो.. लेकिन आपकी हिम्मत नहीं हुई कि बजट भाषण में इसे आप पढ सकें। मुझे बजट तो दिशाहीन लगा ही प्रभु आप डरपोक भी नजर आए। 

चलते-चलते
रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अरुणेन्द्र कुमार टीवी बहस में इस रेल बजट को 10 में 11 नंबर दे रहे थे, मुझे लगता है कि उन्हें उम्मीद है कि बीजेपी सरकार रेलवे बोर्ड की किसी कमेटी का उन्हें चेयरमैन बना देगी !




Friday, 5 December 2014

आखिर कैमरे पर पकड़े गए केजरीवाल !

म आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल वैसे तो चप्पल पहनते हैं, दिखावे के लिए एक झरी हुई सी शर्ट पहनते हैं, कैमरे के सामने ट्रेन की सामान्य बोगी में सफर करते हैं, ड्रामेबाजी के लिए बदबूदार मफलर कान पर डाल लेते हैं और ठंड पडे तो कत्थई रंग का गंदा सा स्वेटर पहनते हैं, पर वही केजरीवाल जब हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में सफर करते पकड़े जाते हैं तो उनके चंगू-मंगू सफाई देते हैं कि आयोजकों ने टिकट उपलब्ध कराया था, इसलिए वो क्या कर सकते थे ? हाहाहा, क्या केजरीवाल साहब आप  इतने ना समझ है । चलिए मैं बताता हूं क्या कर सकते थे ! बात पुरानी है, लेकिन जिक्र करना जरूरी है। आप पार्टी नेता आशुतोष भी इस बात के गवाह हैं। टीवी न्यूज चैनल IBN 7 में कार्य के दौरान चैनल का अवार्ड फंक्शन होना था । उस दौरान UPA की सरकार में ममता बनर्जी रेलमंत्री थीं। उन्हें आमंत्रित करने मैं उनके पास गया और कार्ड देते हुए आग्रह किया कि आपको इस आयोजन में जरूर आना है। ममता दीदी ने आग्रह को स्वीकार कर लिया और मुझे आश्वस्त किया कि वो जरूर पहुंचेंगी। उन्होंने मेरे सामने ही कार्ड अपने पीए को दिया और कहाकि प्रोग्राम में मुझे जाना है। मैने उस दौरान मैनेजिंग एडिटर रहे आशुतोष जी को बताया कि ममता बनर्जी से बात हो चुकी है और वो पहुंच रही हैं।

लेकिन शाम को जब मैं आफिस में था, अचानक उनका फोन आया और उन्होंने जो मुझसे कहा, कम से कम वो बात केजरीवाल को जानना बहुत जरूरी है। ममता जी ने कहाकि मैं आपके चैनल के आयोजन में आना चाहती हूं, उस दिन में मैं दिल्ली में हूं भी, लेकिन मजबूरी ये है कि " मैं कभी भी किसी पांच सितारा होटल में होने वाले आयोजन में नहीं जाती हूं और आपका आयोजन पांच सितारा होटल में है, इसलिए मुझे माफ कीजिए, मैं इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाऊंगी " पहले तो मुझे बुरा लगा कि वादा करने के बाद अब वो मना कर रही हैं, लेकिन सच कहूं उनका स्पष्ट बात कहना और सिद्धांतवादी होना मुझे अच्छा लगा।

इसलिए केजरीवाल जी ये कहना कि आयोजक ने टिकट उपलब्ध कराया तो ले लिया और बिजनेस क्लास में सफर कर लिया, ये ठीक नहीं है। इसका मतलब कोई बड़ा आदमी आपको कुछ आफर करेगा तो आप मना नहीं करेंगे ! फिर तो देश में आँफर देने वालों की कमी नहीं है। और हां वो बेचारे गरीब चाय वाले को गाली देते रहते हो, उन्हें भी तो अडानी ने चार्टर प्लेन का आफर कर दिया था, वो मना नहीं कर पाए, अब इसमें " चायवाले " की क्या गलती है ? आप उन्हें क्यों गरियाते रहते हो ? केजरीवाल साहब किसी पर उंगली उठाओ या किसी को बेईमान बताओ तो अपने तरफ भी देख लिया करो !

हां एक सवाल भी है : क्या आप पार्टी के चंदे का पैसा पार्टी के किसी नेता के पिता के खाते में ट्रांसफर हुआ है ? अगर हां तो उसका नाम क्या है ? पार्टी का पैसा पिता के खाते में ट्रांसफर करने की वजह क्या है ? क्या इस बात की जानकारी पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को दी गई हैं ? बाकी बातें बाद में ...


Sunday, 14 September 2014

हिंदी दिवस : ऊंचे लोग ऊंची पसंद !

जी हां, आज ये कहानी आपको एक बार फिर सुनाने का  मन हो रहा है। जहां भी और जब  हिंदी की बात होती है तो मैं ये किस्सा लोगों को जरूर सुनाता हूं। मतलब ऊंचे लोग ऊंची पसंद। मेरी तरह आपने  भी महसूस किया होगा  कि एयरपोर्ट पर लोग अपने घर या मित्रों से अच्छा खासा हिंदी में या फिर अपनी बोलचाल की भाषा में बात करते दिखाई देते  हैं, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज में सवार होते हैं और जहाज जमीन छोड़ता है, इसके यात्री भी जमीन से कट जाते हैं और ऊंची-ऊंची छोड़ने लगते हैं। मुझे आज भी याद है साल भर पहले मैं एयर इंडिया की फ्लाइट में दिल्ली से गुवाहाटी जा रहा था। साथ वाली सीट पर बैठे सज्जन कोट टाई में थे, मैं तो ज्यादातर जींस टी-शर्ट में रही रहता हूं। मैंने उन्हें कुछ देर पहले एयरपोर्ट पर अपने घर वालों से बात करते सुना था, बढिया हिंदी और राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे। लेकिन हवाई जहाज के भीतर कुछ अलग अंदाज में दिखाई दिए। सीट पर बैठते ही एयर होस्टेज को कई बार बुला कर तरह-तरह की डिमांड कर दी उन्होंने। खैर मुझे समझने में  देर नहीं लगी कि ये टिपिकल केस है। बहरहाल थोड़ी देर बाद ही वो मेरी तरफ मुखातिब हो गए ।

सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजी में मेरा नाम पूछा... लेकिन मैने उन्हें नाम नहीं बताया, कहा कि गुवाहाटी जा रहा हूं । उन्होंने  फिर दोहराया मैं तो आपका नाम जानना चाहता था, मैने फिर गुवाहाटी ही बताया। उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा,  तो मैने उन्हें बताया कि मैं थोडा कम सुनता हूं और हां अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं जानता। अब उनका चेहरा देखने लायक था । बहरहाल दो बार गुवाहाटी बताने पर उन्हें मेरा नाम जानने में कोई इंट्रेस्ट नहीं रह गया । लेकिन कुछ ही देर बाद उन्होंने कहा कि आप काम क्या करते हैं। मैने कहा दूध बेचता हूं। दूध बेचते हैं ? वो  घबरा से गए, मैने कहा क्यों ? दूध बेचना गलत है क्या ?  नहीं नहीं  गलत नहीं है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप क्या कह रहे हैं। उन्होंने फिर कहा  मतलब आपकी डेयरी है ? मैने कहा बिल्कुल नहीं  दो भैंस हैं, दोनो से 12 किलो दूध होता है, 2 किलो घर के इस्तेमाल के लिए रखते हैं और बाकी बेच देता हूं।

पूछने लगे गुवाहाटी क्यों जा रहे हैं.. मैने कहा कि एक भैंस और खरीदने का इरादा है, जा रहा हूं माता कामाख्या देवी का आशीर्वाद लेने। मित्रों इसके बाद तो उन सज्जन के यात्रा की ऐसी बाट लगी कि मैं क्या बताऊं। दो घंटे की उडान के दौरान बेचारे अपनी सीट में ऐसा सिमटे रहे कि कहीं वो हमसे छू ना जाएं । उनकी मानसिकता मैं समझ रहा  था । उन्हें लग रहा था कि बताओ वो एक दूध बेचने वाले के साथ सफर कर रहे हैं। इसे  अंग्रेजी भी  नहीं आती है, ठेठ हिंदी वाला गवांर है। हालत ये हो गई मित्रों की पूरी यात्रा में वो अपने दोनों हाथ समेट कर अपने पेट पर ही रखे रहे । मैं बेफिक्र था और  आराम  से सफर का लुत्फ उठा रहा था।

लेकिन मजेदार बात तो यह रही कि शादी के जिस समारोह में मुझे जाना था, वेचारे वे भी वहीं आमंत्रित थे। यूपी कैडर के एक बहुत पुराने आईपीएस वहां तैनात हैं। उनके बेटी की शादी में हम दोनों ही आमंत्रित थे। अब शादी समारोह में मैने भी शूट के अंदर अपने को  दबा रखा था, यहां मुलाकात हुई, तो बेचारे खुद में ना जाने क्यों  शर्मिंदा महसूस कर रहे थे । वैसे उनसे रहा नहीं गया और चलते-चलते उनसे हमारा परिचय भी हुआ और फिर काफी देर बात भी । वो राजस्थान कैडर के आईएएस थे, उन्होंने मुझे अपने प्रदेश में आने का न्यौता भी दिया, हालाकि  मेरी उसके  बाद से फिर बात नहीं हुई।



Monday, 11 August 2014

कुपात्रों से वापस हो " भारत रत्न "




श्री नरेन्द्र मोदी जी
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
नई दिल्ली 

विषय : देश के सबसे बड़े सम्मान " भारत रत्न " की गरिमा को बचाने के संबंध में !

महोदय,

देश में एक बार फिर " भारत रत्न " को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। टीवी चैनलों पर तमाम लोगों के नाम इस सम्मान के लिए जा रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर अब ये सम्मान मिलता कैसे है ? वो कौन लोग हैं जो सम्मान के लिए नाम तय करते हैं ? मैने पढ़ा है कि देश के पहले शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को जब भारत रत्न देने की बात हुई तो उन्होंने सम्मान लेने से साफ इनकार कर दिया और कहाकि जो लोग इसकी चयन समिति में रहे हों, उन्हें ये सम्मान हरगिज नहीं लेना चाहिए। बाद में कलाम साहब को ये सम्मान मरणोंपरांत 1992 में दिया गया। अब हालत ये है कि टीवी चैनलों पर भारत रत्न के लिए रोजाना एक नया नाम लिया जा रहा है, जाहिर कि उन सभी को ये सम्मान नहीं मिल सकता, ऐसे में जो लोग रह जाएंगे, उन्हें निश्चित रूप से ना सिर्फ पीड़ा होगी, बल्कि समाज में उनकी बेवजह किरकिरी भी होगी। इसलिए प्रधानमंत्री जी भारत रत्न जैसे गरिमापूर्ण सम्मान की रक्षा के लिए मीडिया में चल रहे अनर्गल प्रलाप को तुरंत बंद करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री जी आपको पता है कि मीडिया ने कैसे क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बना दिया। सोचिए ये क्रिकेट का भगवान भला क्या होता है ? भगवान की मौजूदगी में देश की टीम तमाम मैच हारती रही ! सचिन शतकों के शतक के करीब पहुंचे तो मीडिया का एक तपका उन्हें भारत रत्न सचिन तेंदुलकर लिखने लगा। धीरे-धीरे मीडिया ने ऐसा दबाव बनाया कि केंद्र सरकार सचिन को भारत रत्न देने पर मजबूर हो गई। मजबूर इसलिए कह रहा हूं कि सरकार खेल के क्षेत्र में पहला भारत रत्न हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद्र को देना चाहती थी, लेकिन वो हिम्मत नहीं जुटा पाई। देश में लोकसभा का चुनाव होना था, इसलिए सरकार सचिन की अनदेखी कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए आनन-फानन में सचिन को भारत रत्न देने का एलान कर दिया गया। सचिन को भारत  रत्न दिए जाने का मैं तो उस वक्त भी विरोधी था, आज भी हूं।

प्रधानमंत्री जी, सचिन को भारत रत्न देने का मैं विरोधी यूं ही नहीं हूं, उसकी वजह है। पहले तो खेल मंत्रालय क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को  मान्यता ही नहीं देता है। इसके अलावा इस खेल में ईमानदारी नहीं है। देश विदेश के तमाम क्रिकेटर मैच फिक्सिंग, स्पाँट फिक्सिंग में पकड़े जा चुके हैं और उन्हें जेल भी हुई है। जब  इस पूरे खेल में ही ईमानदारी नहीं है तो भला क्रिकेटर कैसे ईमानदार हो सकते हैं ? अब देखिए सचिन को भारत रत्न का सम्मान क्रिकेट में योगदान के लिए दिया गया, लेकिन यही सचिन आयकर से कुछ छूट मिल जाए, इसके लिए दावा किया कि उनका मुख्य पेशा क्रिकेट खेलना नहीं बल्कि एक्टिंग करना है। प्रधानमंत्री जी अब आप ही तय कीजिए क्या हमें ऐसे ही लोगों को भारत रत्न जैसा सम्मान देना चाहिए ? मेरा तो कहना है कि सचिन ने भारत रत्न सम्मान की गरिमा को गिराया है।

प्रधानमंत्री जी कांग्रेस इस सचिन के सहारे राजनीति करती रही, यही वजह है कि भारत रत्न देने के कुछ दिन बाद ही सचिन को राज्यसभा में मनोनीति कर दिया। अब उनकी लगातार गैरहाजिरी पर राज्यसभा में सवाल भी उठ रहे है। भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति को किसी उत्पाद का विज्ञापन करना चाहिए, या नहीं ! ये भी एक अहम सवाल है। मैं तो इसके भी खिलाफ हूं। प्रधानमंत्री जी, सच कहूं ! मुझे लगता है कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर भले किसी को भारत रत्न से ना नवाजा जाए, बल्कि जिन लोगों को अब तक भारत रत्न दिए गए हैं, वक्त आ गया है कि उनकी ईमानदारी से समीक्षा की जाए। हम जान सकें कि जिन्हें दिया गया है, क्या वो उसके वाकई हकदार हैं ? इसके लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई जाए, जो तीन महीने के भीतर सरकार को अपनी रिपोर्ट जरूर दे, और अपात्र लोगों से ये सम्मान वापस लिया जाए !

प्रधानमंत्री जी देश ये भी जानना चाहता है कि वो कौन सी वजह रही जिसके चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तो "भारत रत्न" नहीं मिल सका , लेकिन एक परिवार से पंडित जवाहर लाल नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सभी को ये सम्मान मिल गए। मेरे जैसे तमाम लोगों का विचार है कि आजादी की लड़ाई में गांधी के मुकाबले नेहरू का योगदान बहुत कम था, फिर भी गांधी जी ने उन्हे भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी कई दशकों तक भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के सूत्रधारों ने देश में राजतंत्र चलाया, विचारधारा के स्थान पर व्यक्ति पूजा को प्रतिष्ठित किया और लोकहितों की उपेक्षा की। कहा जाता है कि आसपास चाटुकारों को जोड़ कर स्वयं को देवदूत घोषित कराते रहे और स्वयं अपनी छवि पर मुग्ध होते रहे।

प्रधानमंत्री जी, देश में तमाम लोग देश की बहुत सी समस्याओं के लिये सीधे नेहरू को जिम्मेदार मानते है। जैसे लेडी माउंटबेटन के साथ नजदीकी सम्बन्ध, भारत का विभाजन, कश्मीर की समस्या, चीन द्वारा भारत पर हमला, मुस्लिम तुष्टीकरण, भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन का समर्थन, भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देना और हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने में देरी करना। देश की राजनीति में कुलीनतंत्र को बनाए रखने में भी नेहरू का बड़ा हाथ रहा है। सच ये भी है कि गांधीवादी अर्थव्यवस्था की उन्होंने हत्या की और ग्रामीण भारत की अनदेखी भी उनके समय में हुई। नेता जी सुभाषचंद्र बोस का पता लगाने में भी उन पर लापरवाही और गंभीरता ना बरतने के आरोप हैं। इन सबके बाद भी पंडित जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया, और सब खामोश रहे !

प्रधानमंत्री जी, मैं देख रहा हूं कि मीडिया में एक बार फिर नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भारत रत्न दिए जाने की बात हो रही है। अच्छी बात है, नेता जी इसके हकदार है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि जब 1992 में नेताजी को भारत रत्न से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था,  उस दौरान उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण पुरस्कार के मरणोपरान्त स्वरूप को लेकर प्रश्न उठा था। इसीलिए भारत सरकार ने यह सम्मान वापस ले लिया। देश में ये सम्मान वापस लिए जाने का एक मात्र उदाहरण है। मेरा सवाल है कि हालात तो आज भी वही बने हुए है, ऐसे में नेता जी का नाम फिर क्यों लिया जा रहा है ? प्रधानमंत्री जी मैं जानना चाहता हूं कि ये नाम सरकार की ओर से उठाया जा रहा है, या फिर मीडिया ने शुरू किया है ? ये साफ होना चाहिए और इस पर सरकार का पक्ष सामने आना चाहिए !

प्रधानमंत्री जी, नेता जी के अलावा मीडिया में इन दिनों पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को भारत रत्न दिए जाने की चर्चा हो रही है। मेरा मानना है कि श्री वाजपेयी जी का कद इतना बड़ा है कि उनके नाम पर पर उंगली उठाने की हैसियत वाला आदमी आज किसी पार्टी में नहीं है, रही बात कांशीराम की तो ये राजनीति इतनी बिगड़ चुकी है कि वोट के लालची नेताओं की इतनी औकात ही नहीं है कि कोई खिलाफ में मुंह खोल सके। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कांशीराम ने दलितों को एकजुट कर उनके हक को लेकर इनमें जो जागरूकता पैदा की वो आसान काम नहीं था।

प्रधानमंत्री जी आज मीडिया बहुत चालाक है, वो मूर्खता भी करती है तो इस हद तक करती है कि उसकी मूर्खता भी सच के करीब लगने लगती है। अब देखिए भारत रत्न के लिए  नियम या परंपरा कहें कि एक साल में तीन लोगों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है। लेकिन मीडिया को लगता है कि कहीं उसकी बात गलत साबित ना हो जाए, लिहाजा वो हर संभावना पर काम करती है। अब देखिए दो नाम मीडिया ने ऐसे जोड़ दिए, जिससे लगता है कि हां इन्हें भी मिल सकता है। पहला नाम वो, जिसे आपने गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बनाया, मतलब बिग बी अमिताभ बच्चन और दूसरा नाम वो जहां से आपने चुनाव लड़ा और पर्चा दाखिल करने से पहले जिस मूर्ति का आपने माल्यार्पण किया, मतलब स्व. महामना मदन मोहन मालवीय जी। ये दोनों नाम ऐसे हैं, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है।

खैर प्रधानमंत्री जी , आप इतने व्यस्त हैं कि आपको इतना समय कहां है कि आप लोगों के पत्र पढ़ सकें। लेकिन एक गुजारिश है, कुछ ऐसा कीजिए, जिससे हम सब को लगे कि वाकई हम देश में आजादी का जश्न मना रहे हैं, ऐसा ना लगे कि परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। इसलिए पात्रों को भले ही इस बार भारत रत्न ना दें लेकिन कुछ ऐसा करें कि एक भी कुपात्र के पास भारत रत्न ना रहे, उससे वापस लेने का ऐलान जरूर करें। 


आपका 

भारतीय नागरिक