Sunday, 30 October 2011

अब तो देर हो गई अन्ना...

बिल्कुल देर हो चुकी है, वो भी थोड़ा बहुत नहीं बल्कि काफी देर हो चुकी है  आपको जागने में। मुझे ही नहीं देश के लोग भी जानते हैं कि आपने इसीलिए  मौन धारण किया है, जिससे आत्ममंथन कर सही फैसला कर सकें। आप मौन से ज्यादा नाराज हैं, चूंकि इसके लिए आप खुद जिम्मेदार हैं, लिहाज बोलने से बेहतर था कि आप चुप हो जाते और  यही किया भी आपने।
 सच ये है कि अन्ना से चिपके लोग बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं। अन्ना त्याग का संदेश देते हैं, लेकिन उनके  करीबियों पर उनकी बातों का कोई खास असर नहीं है ।  जंतर मंतर के अनशन को मिली कामयाबी के बाद अन्ना  दिल्ली के सहयोगियों के हाथ की कठपुतली  बन गए । सरल अन्ना समझ नहीं पा रहे थे और अन्ना को आगे रखकर कुछ लोग अपना कद बढाने में जुट गए । वैसे  जंतर मंतर के अनशन के बाद सरकार हिली  हुई थी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस पूरे मूवमेंट से कैसे निपटे । इसी दौरान सरकार के कुछ घाघ मंत्रियों ने एक पासा फेंका, और कहा कि वो चाहते हैं कि मजबूत जनलोकपाल बिल बने ।  आइये हम सब मिल कर बिल का ड्राप्ट तैयार करें । सरकार ने एक साजिश के तहत अन्ना की और ये पासा फैंका कि आप पांच  लोगों के नाम दे, जो सरकार के साथ बैठकर बिल का प्रारूप तैयार करेंगें । मुझे लगता है कि जिस दिन टीम अन्ना बिल ड्राप्ट करने के लिए सरकारी कमेटी में शामिल हई, उसी दिन ये आंदोलन मजबूत होने के बजाए कमजोर सा पड़ गया । क्योंकि सरकार ने जो सोच कर ये चाल चली थी वो उसमें कामयाब हो गई। सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि के तौर पर जो पांच लोग सरकार से बात कर रहे थे, उन पर ही सवाल खड़े होने लगे कि आप सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधि कैसे बन गए।
बाबा रामदेव ने  सबसे पहले इस टीम पर हमला हमला बोला और कहा कि यहां भी परिवारवाद की बू आ रही है। पांच लोगों की टीम में पिता पुत्र को शामिल कर दिया गया । मसखरे नेता लालू यादव ने तो इस टीम का सार्वजनिक रूप से  माखौल उड़ाया । उन्होंने अन्ना से जानना चाहा कि इस सिविल सोसाइटी का चुनाव कब हो गया ?  अन्ना को सफाई देनी पड़ी कि ये टीम केवल बिल का प्रारूप तैयार करने तक की है। प्रारुप बनने के बाद टीम का काम खत्म  हो जाएगा ।  सवाल ये है अन्ना जी कि क्या आपको लगता है कि सरकार के पास बिल ड्राप्ट करने वालों की कमी है। आपने तो जनलोकपाल बिल का प्रारूप पहले ही तैयार कर लिया था और उसमें आप किसी तरह का बदलाव आपको  मंजूर ही नहीं था । ऐसे में  आप चाहते तो अपना बिल सरकार को सौंप कर साफ कर देते कि इसमें हम कोई बदलाव नहीं चाहते। लेकिन नहीं, आपके साथ के लोग महत्वाकांक्षी थे, उन्हें लगा कि इसी बहाने सरकार के बडे बड़े मंत्रियों के साथ बैठने का मौका मिलेगा । इसी एक गल्ती का खामियाजा आज तक अन्ना भुगत रहे हैं । भाई आप तो सरकार का सहयोग करने के लिए ड्राप्ट कमेंटी में शामिल  हुए थे, जब आपकी सुनी ही नहीं जा रही थी, तो वहां एसी कमरे में मंत्रियों के साथ चाय पीने लगातार क्यों जा रहे थे।  अंदर चाय पीकर बाहर गाली देने का क्या मतलब है । पहले ही इस कमेटी को छोड़ कर पल्ला क्यों नहीं झाड़ लिया ?
बहरहाल सरकार अपने मकसद  में कामयाब  हो गई थी, क्योंकि जो लोग दिन रात मेहनत कर रहे थे, वो कहीं पीछे रह गए  । अन्ना टीम में नामचीन लोगों का कब्जा हो चुका था । रामलीला मैदान में अनशन के दौरान जब इनसे सरकार ने बात करना बंद कर दिया तो इनकी धड़कने तेज हो गईं, क्योंकि ये चाहते थे अन्ना अनशन पर बने रहें और हमसे हर मंत्री बात करें । लेकिन सरकार ने इन्हें बात चीत शुरू  करने के लिए ही खूब छकाया । हालत ये हो गई कि ये लोग टीवी पर बोलने लगे कि हम बात चीत किससे करें, हम तो चाहते हैं कि बात हो ।
बहरहाल अब आज की बात करें तो मुझे लगता है कि ये टीम राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखती है और सबका अपना अपना  एजेंडा है । वैसे  इस टीम को  एक गलतफहमीं भी है ।  जहां तक मैं इस टीम को समझ पाया हू मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार को मिले देशव्यापी समर्थन को ये टीम समझती है कि ये  समर्थन उसे  मिला है । यही वजह है कि इन सभी के चाल ढाल बदल गए।  अन्ना ने संसद सदस्यों को जब नौकर और जनता को मालिक बताया तो  ये खुद को खुदा मान बैठे । देश की बड़ी बड़ी समस्याओं को सुलझाने लगे। लेकिन जो कश्मीर की समस्या इतने दिनों से उलझी हुई है, जब टीम अन्ना के एक सदस्य प्रशात भूषण ने उसे सुलझाने की कोशिश की तो  बेचारे को पब्लिक का थप्पड़ झेलना पडा ।
मैने पहले ही कहा था ईमानदारी की लड़ाई वो ही लड़ सकता है,  जिसका खुद का दामन पूरी तरह साफ हो । बाबा रामदेव के समर्थकों पर केंद्र   सरकार ने लाठी भांजने का फैसला इसीलिए किया क्योंकि उनका दामन पाक साफ नहीं है। विदेशों में जमा कालेधन को बाहर लाने की मांग कर रहे हैं, पर उनके हाथ भी इसी कीचड़ में सने हुए है। यही वजह है कि रामलीला मैदान से तड़ीपार किए जाने के बाद से बाबा बेचारे खुद अपनी सफाई देने में लगे हैं । अब ऐसे बाबा जब सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे जो पांच रुपये का चूरन चटनी 50 रुपये में बेच रहे हों, तो ऐसा आंदोलन भला कैसे कामयाब हो सकता है।
कुछ यही हाल अन्ना के सहयोगियों की  है । मुझे लगता है कि इस आंदोलन के मुख्य सूत्रधार अरविंद केजरीवाल हैं ।  उनकी पत्नी के सरकारी आवास पर ही पूरे आंदोलन की रुपरेखा बनाई जा रही है । दूसरों  को नैतिकता का  पाठ पढाने वाले लोगों को ये समझ में क्यों नहीं आता कि उन्हें भी इस पवित्र आंदोलन से तब तक दूर रहना चाहिए, जब तक की उन पर लगे आरोप गलत साबित नहीं  हो जाते हैं । लेकिन ये कैसे संभव है, ये कैसे भी हों, कुछ भी कर रहे हों, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । ये टीम तो दूसरों को ईमानदारी का सर्टिफिकेट  देने के लिए है । ये जिसे कहे  ईमानदार वो ही ईमानदार वरना सब बेईमान । अरविंद केजरीवाल पर सरकारी बकाया,  दूसरी सदस्य किरन बेदी हवाई जहाज के किराये की गलत तरीके से वसूली । कुमार विश्वास   बच्चों के पढाई में व्यवधान डाल रहे हैं । हालाकि छुट्टी वो ले सकते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन बच्चों की पढाई की कीमत पर तो नहीं ही ली जानी चाहिए ।

आप कह सकते है कि सियासी लोग जितने बडी चोरी कर रहे हैं, उसके आगे इनका अपराध तो कुछ भी नहीं  है । इस बात से तो मैं भी सहमत हूं, लेकिन मेरा मानना है कि इनके भ्रष्टाचार से ये साफ  हो गया है कि इन्हें बडा हाथ मारने का मौका नहीं  मिला । जो मौका मिला, उससे भुनाने में ये पीछे  नहीं रहे । उसका दोहन तो किया ही है।  अब ये टीम विवादों  के घेरे में है, मेरा मानना है कि कम से कम इस टीम ने ईमानदारी की वकालत करने का नैतिक अधिकार खो दिया है । अन्ना के निश्कलंक जीवन को ये टीम दागदार बनाने में जुटी है । इन सभी को सियासत करना है, अभी से  चर्चा हो रही है कि किरन बेदी दिल्ली की चांदनीचौक और अरविंद केजरीवाल  हिसार  लोकसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं । ऐसी  चर्चाओं के बीच  इन्हें खुद को सियासत से दूर  रखना  चाहिए, लेकिन ये अभी  भी इस बात पर आमादा है कि चुनावों के दौरान वो अपना अभियान जारी रखेंगे, इससे साफ है कि इनका सियासत से कुछ अंदरखाने रिश्ता है।
हालाकि अब अन्ना को भी बात समझ में आने लगी है, यही वजह है कि वो मौन व्रत कर आत्ममंथन कर रहे हैं कि कैसे सब कुछ ठीक ठाक किया जाए । लेकिन सच ये है कि अन्ना की दागी टीम ने पूरे आंदोलन की साख पर बट्टा लगा दिया है ।  अब  और लोग भी चर्चा करने लगे हैं कि जरूर इस आंदोलन के पीछे कुछ सियासी लोगों का हाथ है।  वैसे ये आरोप लगना गलत भी नहीं है क्योंकि इस वक्त पूरी तरह टीम  अन्ना एक राजनीतिक दल की तरह बर्ताव कर रही है, वो चुनाव में एक राजनीतिक दल को हराने और बाकी को जिताने की बात कर रही है । हालांकि  ये राजनीति के भी जोकर हैं,  जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में इनका रवैया पारदर्शी नहीं है, उसी तरह सियासत के मैदान में भी ये अधकचरे हैं।  टीम अन्ना  निगेटिव राजनीति   कर रही है,  वो चुनाव वाले इलाके में जाते हैं और एक पार्टी को वोट ना देने की अपील करते हैं, पर ये नहीं कहते की मतदाता वोट किसे दें । इसके पीछे डर सिर्फ एक कि अगर जिसे वोट देने की अपील टीम अन्ना ने की उसके अलावा कोई दूसरा जीत गया तो उनकी औकात भी लोगों के सामने खुल जाएगी, बस अपनी खोई  प्रतिष्ठा को बचाने के लिए  जनता में आधी अधूरी बात कर रहे हैं ।
वैसे  अब अन्ना की समझ में आ गया है कि उनके नाम का कुछ लोग गलत इस्तेमाल कर रहे हैं । अन्ना के टीम में भी खुलेआम बगावत की बू आने लगी  है।  इसी टीम के कुछ खास सदस्य भीतर की बात सीधे अखबारों और चैनल के संपादकों के साथ शेयर कर कोशिश करते हैं कि वो अधिक से अधिक समय तक टीवी के पर्दे पर दिखाई देते रहें।  इसके लिए बेचारे सुबह से शाम तक  मीडिया से संपर्क बनाए रखते हैं।  अब एक सदस्य को ही ले लीजिए, दो पन्ने की चिट्ठी  अन्ना को लिखकर  टीवी के जरिए उन्हें बताते रहे कि पत्र में उन्होंने क्या लिखा है । आखिर जब सारी बात टीवी पर ही करनी थी तो पत्र लिखने का क्या मतलब है । मै  नहीं समझ पा रहा हूं कि  टीम अन्ना के सहयोगी किसे बेवकूफ बना रहे हैं । बहरहाल अन्ना अगर  दिल्ली वालों के चंगुल से मुक्त हो पाए तो वो अब इस टीम में इस तरह का फेरबदल करना चाहते हैं कि उनके बाद सबकी औकात एक रुपये के साधारण सदस्य जैसी हो । टीवी पर कोई बोलने नहीं जाएगा, टीम अन्ना का अस्तित्व नहीं रहेगा, पूरे दिन घूम घूम कर चैनलो पर ज्ञान बांटने पर पूरी तरह रोक लग जाएगी । ऐसा कठिन फैसला अगर अन्ना कर रहे हैं तो जाहिर है कि उन्हें भी कुछ बातें तो इनके बारे में मालूम हो ही गईं होंगी, वरना इतना सख्त कदम भला अन्ना क्यों उठाते । अन्ना को मनाने की एक कोशिश कल  दिल्ली से रालेगांव जा रही टीम करेगी, लेकिन वो कामयाब होगे, ऐसा लगता नहीं है, क्योंकि अन्ना  जितना सरल हैं, उससे कई गुना जिद्दी भी । बहरहाल मेरी प्रार्थना कि ये आंदोलन  किसी भी तरह कामयाब जरूर हो ।

 

Wednesday, 26 October 2011

तिहाड़ में दीपावली...

फेस्टिव सीजन शुरू हो चुका है, मैं भी सियासी माहौल से थोड़ा हटकर इसी माहौल में रहना चाहता हूं, कई साल बाद इस बार मैं भी दीपावली का त्यौहार घर पर परिवार के बीच मनाना चाहता हूं। इसके लिए मैं अपने गृहनगर मिर्जापुर जाने के लिए शनिवार को निकल चुका हूं। मित्रों इस बार ट्रेन का सफर बहुत उबाऊ रहा, क्योंकि ट्रेन दो चार घंटे नहीं बल्कि 14 घंटे लेट थी। खैर अब घर पहुंच चुका हूं, सभी थकान भी भूल गया हूं। सच तो ये है कि मैं अपने साथ और लोगों को भी चाहता हूं कि वो भी खूब मस्ती से त्यौहार इंज्वाय करें, मैं आज किसी की छीछालेदर नहीं करना चाहता।
हालांकि एक बात मुझे परेशान कर रही है, वो ये की तिहाड़ में दीपावली इस बार कैसी होगी। यहां ज्यादातर कैदी ऐसे हैं, जिनकी कई दिपावली यहां बीत चुकी है, लेकिन कुछ खास मेहमान जो शायद पहली  बार ही यहां आए हैं और उन्हें दीपावली इसी चारदीवारी के भीतर मनाना है। उनके बारे में सोचकर मैं थोड़ा असहज हूं। मेरा मानना है कि पूर्व मंत्री ए राजा और कनिमोडी तो इसके हकदार हैं, क्योंकि वो बेईमानी अपने फायदे के लिए कर रहे थे, लेकिन कई नामी गिरामीं कंपनियों के सीईओ भी यहां हैं, जो अपने से ज्यादा अपनी कंपनी के लिए काम  कर रहे थे। यानि वो बेचारे तो कंपनी की बैलेंस शीट मजबूत करना चाहते थे। इस बात का ही वो वेतन लेते हैं।
अब राजा और कनिमोडी जेल में रहें तो चलो कोई खास बात नहीं, पर एक दर्जन से ज्यादा अफसरों के जेल जाने से तो यही कहा जाएगा ना कि गेंहूं के  साथ बेचारे घुन भी पिस गए। खैर ऐसा होता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि यहां से निकलने के बाद ये अफसर जान जाएंगे कि सच्चाई और ईमानदारी से काम करना कितना जरूरी है। कम से कम वो यहां से निकलने के बाद और कुछ भले ना बन पाएं, पर सच्चा इंसान बनेंगे।
 मुझे याद है अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, जेल में कैंपस प्लेसमेंट के दौरान 90 से ज्यादा तिहाड़ के कैदियों ने अपने हुनर दिखाए और 52 कैदी बेहतर हुनर के चलते सलेक्ट हो गए, पर मेरिट के आधार पर 43 कैदियों को नौकरी मिल  गई। वो भी ऐरू गैरू कंपनी में नहीं, बल्कि देश के नामचीन कंपनियों ने कैदियों के हुनर को सराहा और अपनी कंपनी में इन्हें नौकरी दी। कुछ खास कंपनियों का जिक्र किया जाए तो इसमें हल्दीराम, वेदांता फाउंडेशन,रोगन गोरमेंट्स, जीआई पाइप के साथ कई और नामी गिरामीं कंपनी शामिल हैं।
दरअसल तिहाड़ जेल में कैदियों को उनकी क्षमता के अनुसार प्रशिक्षण दिए जाने की व्यवस्था है, जिससे वो यहां से सिर्फ  सजा काट कर ना निकलें, बल्कि बेहतर नागरिक बने । इसी वजह से यहां कैदियों के लिए व्यावसायिक  प्रशिक्षण की  पर्याप्त  सुविधा उपलब्ध है।
इस बात का जिक्र मैं इसलिए कर रहा था कि जेल में बेहतर नेता कैसे बनें, जेल में आए नेताओं को बेहतर नागरिक कैसे बनाया जाए, उनके चारित्रिक दोष को कैसे खत्म किया जाए, इस तरह के किसी भी प्रशिक्षण का प्रावधान नहीं  हैं। मुझे लग रहा है कि जिस तरह से यहां नेताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों का लगातार आना जाना बना हुआ है, सरकार इस बारे में भी विचार करेगी और  जेल में बेहतर नेता कैसे बनें, भ्रष्टाचार से कैसे अछूते रहें, कुछ इस तरह की ट्रेनिंग का भी प्रावधान होगा। पर लगता है कि मैं गलत सोच रहा हूं, सरकार की प्राथमिकता सिर्फ ये है कि किस तरह जल्द से जल्द आरोपी नेताओं और मंत्रियों को जमानत मिल जाए। पूरी कवायद सिर्फ यहीं तक सीमित है।
मुझे नहीं पता कि जो बात मैं कहने जा रहा हूं वो कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में आता है या नहीं, पर मैं इतना जरूर कहूंगा कि आज न्यायालय से लोगों को न्याय बिल्कुल नहीं मिल रहा, बल्कि न्याय बिक रहा है, बस  खरीददार की जरूरत है। न्यायालयों की छवि को सुधारने के लिए कुछ जज बडे और चर्चित मामले  में जनभावनाओं के मुताबिक फैसला सुनाते हैं,  जिससे न्यायालय की छवि बनी रहे। अमर सिंह को कुछ दिन जेल में रखने के बाद उन्हें जमानत दे दी गई, आधार बनाया गया उनकी बीमारी का। पूरा देश जानता है कि आपरेशन के बाद स्वदेश लौटने पर अमर सिंह उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहे हैं, उन्होंने दर्जनों सभाएं की और लगातार अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने में लगे हुए हैं। तब अमर सिंह बीमार नहीं होते हैं, लेकिन जेल जाने पर उन्हें दो दिन में ऐसी बीमारी जकड़ती है कि वो जेल में नहीं रह सकते, सीधे बड़े अस्पताल आ जाते हैं। बहरहाल वो जल्दी  स्वस्थ हों, जिससे नोट के बदले वोट कांड का खुलासा हो सके।
दोस्तों भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री और अफसर अपने रसूख का फायदा उठाकर तिहाड़ में पांच सितारा सुविधाएं जरूर ले रहे होंगे, ऐसा मेरा मानना है। वो यहां किसी तरह की ट्रेनिंग तो कम से कम नहीं ही ले रहे होंगे, जिससे कल बाहर आएं तो लोग उन्हें घृणा और नफरत से देखने के बजाए, उनमें एक अच्छे शहरी की तस्वीर देंखें। फिर मैं आशावादी हूं, मैं दीपावली की बधाई ए राजा, कनिमोडी के साथ ही सभी टेलीकाम कंपनियों के सीईओ को भी देता हूं, इस उम्मीद के साथ कि वो कानून की खामियों का सहारा लेकर खुद को बेदाग साबित करने के बजाए अपनी गल्ती कोर्ट में स्वीकार करें। इतना ही नहीं वो लूट खसोट कर जिस तरह से देश के करोडों लोगों की दीपावली फीकी करते रहे हैं, उसके लिए माफी मांगते हुए देश को हुए नुकसान की भरपाई करें। ऐसा करके वो भी मेरी तरह खुशी खुशी दीपावली का त्यौहार अपने पैतृक गांव में पूरे परिवार के साथ मना सकते हैं।
तिहाड़ में ही सुरेश कलमाड़ी भी हैं, उन्हें भी मेरी शुभकामनाएं। नोट के बदले वोट कांड में बंद नेताओं को भी दीपावली की शुभकामनाएं। मजेदार बात तो ये है कि सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त करने वाला जेल हो आया, जिसने योजना बनाई वो अभी भी जेल में है, जिन सांसदों ने इस मामले का खुलासा किया और पैसे संसद में पेश कर दिए, उन्हें भी जेल हो गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से जिसे फायदा हुआ, उसका कोई नाम भी नहीं ले रहा है। बहरहाल ये नहीं तो अगली दीपावली उनकी भी यहीं तिहाड़ में बीतेगी।
चलिए दोस्तों आप  सभी  को भी दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं। कोशिश ये होनी चाहिए कि आज अपना घर तो रोशन करें ही, पास पडोस में भी अँधेरा ना रहने दें। 

Tuesday, 18 October 2011

जूते से हमला : ये तो होना ही था...

टीम अन्ना को देश के युवाओं ने पहले सिर पर बैठाया, अब यही नौजवान अन्ना की टीम के अहम सहयोगियों के साथ मारपीट कर रहे हैं। आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि इन पर हमले किए जा रहे हैं और हमला करने वाले कोई और नहीं देश के नौजवान ही हैं। रामलीला मैदान में 12 दिन के अनशन के बाद केंद्र की सरकार को घुटनों पर लाने वाले अन्ना हजारे अपने गांव पहुंचते ही आक्रामक हो गए और उन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे पर हमला बोल दिया। ठाकरे ने चेतावनी दी कि वो गांधीवादी नहीं है, ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं, बस अन्ना खामोश हो गए। इसके बाद प्रशांत भूषण ने कश्मीर को लेकर ऐसा जहर उगला कि पूरे देश में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई।
मैने देखा कि कुछ नौजवानों ने प्रशांत भूषण पर हमला कर दिया। हालाकि मैं मारपीट का कत्तई समर्थन नहीं करता हूं, लेकिन मेरा मानना है कि ये नौजवान अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाए और ऐसी हरकत कर बैठे। पर इस बात से शुकून जरूर है कि देश के खिलाफ बात करने वालों को जवाब देने के लिए देश का युवा तैयार है। प्रशांत पर हमले का मामला अभी ठंडा भी नहीं पडा था कि लखनऊ में अरविंद केजरीवाल पर एक युवक ने जूते से हमला कर दिया। अरविंद केजरीवाल बाल बाल बच गए। ईश्वर का मैं धन्यवाद करना चाहता हूं, क्योंकि वैचारिक मतभेद में कभी भी ऐसी घटनाओं का समर्थन नहीं किया जा सकता।
लेकिन लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद जरूरी है कि टीम अन्ना भी आत्ममंथन करे, कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि जो नौजवान कल उन्हें सिर माथे पर बैठाए हुए था वही आज हमलावर हो गया है। टीम अन्ना के ही सहयोगी क्यों उनके खिलाफ मैदान में आ गए हैं। हिसार में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने के मामले में जस्टिस संतोष हेगडे ने टीम अन्ना को आडे हाथ लिया। कश्मीर के मामले में विवादित बयान देने पर टीम अन्ना के अहम सहयोगी एक चिकित्सक ने प्रशांत को टीम से बाहर करने की खुलेआम मांग की।
हद तो ये हो गई है कि अब टीम अन्ना पर चंदे के पैसों पर में गडबडी के आरोप भी लगने लगे हैं। कल तक जो युवा "मैं भी अन्ना"  कि टोपी पहन कर रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन में सहयोग कर रहे थे, आज उन्हीं युवाओं ने विरोध का बिगुल फूंक दिया है। इन युवाओं का आरोप है कि यहां मनमानी हो रही है और पैसों का हिसाब किताब सही ढंग से नहीं किया जा रहा है। इसके लिए तमाम युवा जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं। आखिर ये सब क्यों हो रहा है। टीम अन्ना पर हमला करने वालों को एक बार कहा जा सकता है कि विरोधी ऐसा करा रहे हैं, लेकिन टीम अन्ना के भीतर से ही जब नेतृत्व के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है तो टीम अन्ना को भी आत्ममंथन तो करना ही चाहिए।  

भ्रष्टाचार को लेकर देश की जनता आग बबूला थी, इसी लिए टीम अन्ना की मामूली पहल को भी लोगों ने हाथों हाथ लिया और 74 साल के नौजवान अन्ना के पीछे देश का युवा पूरी ताकत के साथ जुट गया। युवाओं को कुछ उम्मीद थी कि अब कुछ हद तक भ्रष्टाचार से निजात मिलेगी। लेकिन ये क्या, जनलोकपाल बिल की आड में टीम अन्ना के कुछ लोगों ने सियासत शुरू कर दी। देश में कई स्थानों पर उप चुनाव हो रहे थे, लेकिन कांग्रेस का विरोध सिर्फ हिसार में किया गया। आपको बता दूं कि अरविंद केजरीवाल इसी क्षेत्र के रहने वाले हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कहीं अरविंद यहां अपनी राजनीतिक जमीन तो नहीं तैयार कर रहे हैं।
वैसे भी आप हिसार चले जाएं और निष्पक्ष रूप से जानकारी करें, तो वहां जीतने वाले और दूसरे नंबर पर रहने वाले दोनों ही उम्मीदवारों के खिलाफ तमाम आरोप हैं। जिस उम्मीदवार का टीम अन्ना विरोध कर रही थी, वो ही एक मात्र ऐसा उम्मीदवार था, जिसके ऊपर फिलहाल भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। ऐसे में टीम अन्ना किस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडने की बात कर रही है, ये वही बता सकते हैं। बहरहाल अन्ना जी साफ सुथरे सामाजिक कार्यकर्ता हैं उन्हें इस मामले को खुद देखना चाहिए।
चलते चलते एक बात और। आज अन्ना के गांव के सरपंच कुछ लोगों के साथ राहुल गांधी से मिलना चाहते थे। इन लोगों ने कांग्रेस सांसद के जरिए खुद राहुल गांधी से मिलने की इच्छा जताई थी। यहां वडा सवाल ये भी है कि क्या अन्ना अपनी टीम से नाखुश हैं, क्यों उन्होंने अपने गांव के लोगों को सीधे राहुल के पास भेज दिया, टीम के अहम सहयोगी अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों को इस मुलाकात से दूर रखा। बहरहाल इसका जवाब तो अन्ना ही दे सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी इस बात से नाराज हो गए कि अन्ना के गांव के सरपंच ने मीडिया के सामने गलत बयानी की और कहा कि राहुल ने मिलने की इच्छा जताई है, जबकि राहुल से इन लोगों ने खुल मिलने के लिए पत्र लिखा था। राहुल को लगा कि जब मुलाकात के पहले ही ये गलत बयानी कर रहे हैं तो बाद में और कुछ भी उल्टा पुल्टा बोल सकते हैं, लिहाजा उन्होंने इनसे दूरी बना ली। हो सकता है कि सियासी तौर पर इसका नुकसान राहुल को हो, लेकिन मैं राहुल गांधी के इस कदम की सराहना करता हूं। अब लोग कह रहे हैं कि राहुल ने अन्ना का अपमान किया, तो कहते रहें, राहुल ने ठीक किया। मैं उन्हें पूरे 10 में 10 नंबर देता हूं।

Saturday, 15 October 2011

टीम अन्ना का खतरनाक खेल...


तीन दिन दिल्ली में नहीं था, आफिस के काम से बाहर जाना पड़ गया, इस दौरान मैं ब्लागिंग से भी महरूम रहा। पूरे दिन काम धाम निपटाने के बाद रात में टीवी पर न्यूज देख रहा था, अचानक सभी चैनलों ने एक ब्रेकिंग न्यूज फ्लैश की, जिसमें श्रीराम सेना के कुछ कार्यकर्ता टीम अन्ना के प्रमुख सहयोगी प्रशांत भूषण पर हमला कर रहे थे। ये देखकर एक बार तो मैं भी हैरान रह गया, क्योंकि मेरा मानना है कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी सकती है, और इसे हम गुंडागर्दी कहें तो गलत नहीं होगा।
लेकिन कुछ देर बाद ही मार पिटाई करने वाले नौजवानों की बात सुनीं, उनका गुस्सा प्रशांत भूषण के उस बयान पर था, जिसमें भूषण ने कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि वहां जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए और अगर वो लोग चाहते हैं कि वे भारत के साथ नहीं रहना चाहते तो वहां से सेना हटाकर उन्हें आजाद कर दिया जाना चाहिए। मेरा भी निजी तौर पर मानना है कि प्रशांत भूषण का ये बयान गैरजिम्मेदाराना और देश को विभाजित करने वाला है। या यों कहें कि उनका ये बयान कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ ही पडो़सी मुल्क पाकिस्तान के रुख का समर्थन करने वाला है तो गलत नहीं होगा। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और इसके साथ किसी तरह का समझौता संभव नहीं है। कश्मीर को बचाए रखने के लिए देश ने कितनी कुर्बानी दी है, प्रशांत ने उन सभी कुर्बानी को नजरअंदाज कर बेहूदा बयान दिया है। हालाकि मैं फिर दुहराना चाहता हूं कि मैं मारपीट के खिलाफ हूं, पर मुझे लगता है कि नौजवानों का जब खून खौलता है तो वो ऐसा कुछ कर देते हैं, खैर मैं इन युवकों के देश प्रेम की भावना को सलाम करता हूं और इस मामले में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के विचार का भी समर्थन करता हूं।
सवाल ये उठता है कि टीम अन्ना को ऐसा क्यों लगता है कि वो अब खुदा हैं और हर मामले पर अपना नजरिया रखेगें, भले ही वो देश भावना के खिलाफ हो। प्रशांत की बात को अन्ना ने खारिज कर दिया। टीम अन्ना के दूसरे सहयोगी जस्टिस संतोष हेगडे भी समय समय पर टीम अन्ना से अलग राय देते रहे हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि इस टीम में चलती किसकी है। यहां कोई अनुशासन है भी या नहीं। गैरजिम्मेदार लोगों के मुंह पर ताला लगाने की जिम्मेदारी किसके हाथ में है। शर्म की बात तो ये है कि गैरजिम्मेदाराना बयान देने के बाद भी अभी तक प्रशांत भूषण ने खेद भी नहीं जताया, मतलब साफ है कि वो अभी भी अपने देश विरोधी बयान पर कायम हैं।
वैसे मुझे अब टीम अन्ना की नीयत पर शक होने लगा है। उसकी वजह भी है। हालाकि आप मेरे पिछले लेख देखें तो मैं समय समय पर लोगों को आगाह करता रहा हूं, लेकिन अब जो कुछ सामने आ रहा है, उससे लगता है कि ये लोग भी कुछ सियासी लोगों के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं। ये वही करते हैं जो पर्दे के पीछे से इन्हें कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर हरियाणा के हिसार में हो रहे लोकसभा के उपचुनाव में अरविंद केजरीवाल, किरन वेदी और प्रशांत भूषण पहुंच गए। इन सभी ने हाथ में तिरंगा लेकर कांग्रेस को वोट ना देने की अपील की। आपको पता होना चाहिए कि अरविंद केजरीवाल हरियाणा से ताल्लुक रखते हैं। दोस्तों आपको ये बताना जरूरी है कि हिसार में कांग्रेस उम्मीदवार पहले ही दिन से तीसरे नंबर पर था, उसके जीतने की कोई उम्मीद नहीं थी, यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने भी यहां कोई सभा नहीं की। टीम अन्ना ने यहां कांग्रेस का विरोध एक साजिश के तहत किया, जिससे देश में ये संदेश जाए कि टीम अन्ना जिसे चाहेगी उसे चुनाव हरा सकती है।

अगर टीम अन्ना को अपनी ताकत पर इतना ही गुमान था तो अन्ना के प्रदेश महाराष्ट्र में खड़कवालसा में हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध क्यों नहीं किया गया। यहां तो कांग्रेस उम्मीदवार पहले नंबर पर है और उसका जीतना पक्का बताया जा रहा है। अगर वहां ये कांग्रेस उम्मीदवार को हराने में कामयाब होते तो कहा जाता कि अन्ना भाग्य विधाता हैं। लेकिन नहीं, अन्ना को समझाया गया कि आप महाराष्ट्र में कांग्रेस उम्मीदवार को नहीं हरा पाएंगे, ऐसे में आपकी छीछालेदर होगी। लिहाजा अन्ना अपने प्रदेश में कांग्रेस का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
मित्रों एक सवाल सीधे आपसे करना चाहता हूं। रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन के बाद उनमें और सरकार के बीच समझौता हुआ कि वो शीतकालीन सत्र में जनलोकपाल बिल संसद में पेश करेंगे। इसके बाद टीम अन्ना ने पूरे देश में विजय दिवस तक मनाया। देश भर में पटाखे छोड़े गए, खुशियां मनाई गईं। फिर अभी संसद का शीतकालीन सत्र शुरू भी नहीं हुआ, फिर  कांग्रेस के खिलाफ टीम अन्ना ने झंडा क्यों बुलंद किया ? बडा सवाल है कि क्या ये विजय दिवस देश की जनता को बेवकूफ बनाने के लिए मनाया गया था ? चलिए मान लेते हैं कि टीम अन्ना दबाव बनाना चाहती है। अगर दबाव बनाना मकसद था तो विरोध सिर्फ कांग्रेस का क्यों ? बीजेपी और दूसरे राजनीतिक दलों का क्यों नहीं। क्योंकि कांग्रेस चाहे भी तो जब तक उसे दूसरे दलों का समर्थन नहीं मिलेगा, वो इस बिल को लोकसभा में पास नहीं करा सकती। ऐसे में लगता है कि टीम अन्ना की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी है, और उनके सभी फैसलों के पीछे गंदी राजनीति है।
यही वजह है कि अब टीम अन्ना को लगातार मारपीट की धमकी मिल रही है। पहले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अन्ना पर सीधा हमला बोला और साफ कर दिया कि वो उनसे टकराने की कोशिश बिल्कुल ना करें, क्योंकि वो गांधीवादी नहीं हैं, ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं। अन्ना खामोश हो गए। उनके दूसरे सहयोगी प्रशांत भूषण पर हमला हो गया। अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं कि उन्हें भी धमकी भरे एसएमएस मिल रहे हैं। ये सब अचानक नहीं है, जब तक लोगों को लगा कि ये टीम देश हित की बात कर रही है, तबतक लोग 48 डिग्री तापमान यानि कडी धूप में रामलीला मैदान में अन्ना के समर्थन में खड़े रहे, लेकिन जब युवाओं को लगा कि ये टीम लोगों को धोखा दे रही है, तो गुस्साए युवाओं ने अपना अलग रास्ता चुन लिया।
अच्छा मैं हैरान हूं अरविंद केजरीवाल के बयानों से। प्रशांत भूषण के मामले में उन्होंने ये तो नहीं कहा कि प्रशांत ने जो बयान दिया है वो गलत है। हां ये जरूर कहा कि प्रशांत टीम अन्ना में बने रहेंगे। क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि केजरीवाल भी प्रशांत भूषण के बयान से सहमत हैं। फिर आज एक और ड्रामेबाजी शुरू की गई। कहा गया  कि लोग अगर हमें पीटने आते हैं तो हमारे कार्यकर्ता पिटने को तैयार हैं। भाई केजरीवाल खुद तो रालेगांवसिद्धि में हैं और घर के बाहर अपने कार्यकर्ताओं को बैठाया कि कोई पीटने आए तो पिट जाना। मजेदार वाकया है, अनशन अन्ना करेंगे, पिटने की बारी आएगी तो कार्यकर्ता करेंगे आप सिर्फ एयर कंडीशन में टाप नेताओं के साथ वार्ता करेंगे। बहुत खूब दोस्त।
बहरहाल टीम अन्ना को मेरी सलाह है कि अब उन्होंने राजनीति शुरू कर ही दी है तो किसी पार्टी के साथ जुड़ जाएं, या फिर अपनी ईमानदार पार्टी बना लें। हालाकि अब इनकी ईमानदारी पर भी उंगली उठने लगी है। इससे कम से कम एक फायदा जरूर होगा कि तिरंगे की आन बान और शान बनी रहेगी, वरना तो ये टीम अन्ना इस तिरंगे को भी गंदी सियासत में शामिल कर इसे दागदार कर देगी।