Tuesday, 30 August 2011

आधी जीत के मायने....




सच कहूं तो ये एक बड़ा सवाल है। आधी जीत की परिभाषा क्या है। मेरी नजर में तो जीत सिर्फ जीत होती है, आधी या फिर चौथाई कहकर खुद को खुश करने का ये बहाना भर है। मैने पिछले लेख में आपको संसदीय प्रक्रिया की जानकारी देने की कोशिश की थी, जिसमें बताया था कि संसद में किसी विषय पर कैसे चर्चो होती है। पहले तो आप यही जान लें कि शनिवार को जो चर्चा हुई, वो बेमानी है, उसका कोई मतलब ही नहीं है। क्योंकि केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में कोई प्रस्ताव नहीं रखा, सिर्फ एक बयान दिया, जिस पर चर्चा तो हुई, पर संसद के किसी नियम के तहत नहीं। लिहाजा चर्चा खत्म होने पर कोई प्रस्ताव स्थाई समिति को नहीं भेजा गया, बल्कि ये कहा गया कि नेताओं ने जो भाषण दिए हैं, वही स्थाई समिति को भेज दी जाए। इसमें कौन सी जीत आपको दिखाई दे रही है।
लोकपाल का बिल ड्राप्ट करना है स्थाई समिति को। उस स्थाई समिति को जिसमें लालू यादव जैसे सांसद भी इसके सदस्य हैं। लालू खुलेआम सिविल सोसाइटी का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी ने भी इसका विरोध किया। कई राजनीतिक दलों ने मंत्री के वक्तव्य पर टिप्पणी की और उसमें कई तरह के संशोधन का जिक्र किया। इसके बावजूद सरकार की ओर से कहा गया कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ। मित्रों आप खुद समझ सकते हैं कि सरकार की मंशा क्या है। सच सिर्फ इतना है कि अन्ना के आंदोलन से सरकार ही नहीं विपक्ष की भी मुश्किलें बढ गई थीं और वो किसी भी सूरत में अन्ना का अनशन समाप्त कराना चाहते थे, जिसमें वो कामयाब हो गए।
अन्ना क्या मांग कर रहे थे। वो कह रहे थे कि संसद में जनलोकपाल बिल पेश किया जाए और उसे पास कर 30 अगस्त तक कानून बनाया जाए। उनकी ये बात पूरी नहीं हुई। फिर अन्ना ने 30 अगस्त तक कानून बनाने की बात छोड दी और कहा कि उनके बिल पर संसद में चर्चा की जाए और उस पर मतदान कराया जाए। लेकिन सरकार ने बिना किसी नियम के संसद में महज एक बयान देकर चर्चा की और कोई प्रस्ताव पास नहीं किया। अन्ना ने कहा कि संसद मे सर्वसम्मति से बिल पास हो जाने पर वो अनशन तो तोड़ देगें लेकिन रामलीला मैदान में धरना जारी रहेगा। लेकिन हुआ क्या.. संसद में चर्चा के बाद अन्ना के पास कोई प्रस्ताव भेजने के बजाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पत्र लेकर विलासराव देशमुख पहुंचे और अन्ना को अनशन खत्म करना पड़ गया।
सवाल ये है कि अन्ना खुद अपना जनलोकपाल बिल संसद की स्थाई समिति को सौंप आए थे। बाद में प्रधानमंत्री ने भी इसे स्थाई समिति को भेज दिया था। उस दौरान टीम अन्ना से कहा गया कि अब वो अपनी बात स्थाई समिति से करें। लेकिन टीम अन्ना ने उस समय ऐसा नहीं किया। अब नई बात क्या हुई, क्या टीम अन्ना स्थाई समिति से बात नहीं कर रही है। मित्रों संसद में पेश किए जाने वाले किसी भी बिल को स्थाई समिति ही ड्राप्ट करती है। ऐसे में टीम अन्ना किस जीत की बात कर रही है। ये कम से कम मेरे समझ से परे है।
हां इस बात के लिए मैं अन्ना जी को जरूर क्रेडिट देना चाहूंगा कि भ्रष्टाचार जो आज एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन इस पर आम जनता खामोश थी, उसमें जान फूंकने का काम किया अन्ना ने। आज जिस तरह से लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हैं, वो आने वाले समय में सिर्फ नेताओं के लिए नहीं, बेईमान अफसरों और कर्मचारियों पर भी लगाम लगाने मे जरूर कामयाब होगा।
इस दौरान एक चौंकाने वाला आरोप लगा अन्ना के अनशन पर। अगर टीम अन्ना ने सरकारी डाक्टरों को अन्ना के चेकअप करने से ना रोका होता तो ये आरोप को सिरे से खारिज किया जा सकता था। लेकिन लालू यादव ने अन्ना और उनके चिकित्सक डा. नरेश त्रेहन को बातों बातों में संदेह के घेरे में खडा कर दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि इस पर दुनिया भर के डाक्टरों को रिसर्च करना चाहिए कि 74 साल का बुजुर्ग 12 दिन भूखे रहने के बावजूद किस तरह टनाटन बोल रहा है। वैसे अन्ना इसका जवाब ना देते तो बेहतर था, लेकिन उन्होंने लालू यादव की बात का जवाब दिया कि जिसने 12 बच्चे पैदा किए हों, वो ब्रह्मचर्य जीवन जीने वालों की ताकत को क्या जानेगें। हालाकि इसके बाद जो बात हुई, इससे ये विवाद और गहरा गया। कहा गया कि तो क्या बाबा रामदेव जो छह दिन में ही ढीले पड गए थे, वो ब्रह्मचर्य का जीवन नहीं जी रहे हैं। बहरहाल इस विवाद को यहीं छोड देता हूं, लेकिन इतना सही है कि अन्ना के अनशन पर तो उंगली उठ ही रही है।
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका पर सवाल खडे़ हो रहे हैं। ये सही है कि मीडिया को अन्ना और उनकी टीम ने खूब सराहा। आम जनता को भी मजा आ रहा था, वो जो कुछ कहना चाहती थी, मीडिया ने उन्हें भरपूर मौका दिया। लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया को मंथन करना होगा कि ऐसे मौकों पर क्या जनभावना के साथ उन्हें भी बह जाना चाहिए, या फिर किसी तरह का नियंत्रण जरूरी है। मित्रों आपको बताना चाहता हूं कि मुंबई में जब ताज होटल पर हमला हुआ तो यहां मीडिया ने जिस तरह रिपोर्टिंग की, उससे ताज होटल में मौजूद आतंकी टीवी पर बाहर की सभी गतिविधियों को देख रहे थे, उन्हें पता चल रहा था कि उन्हें घेरने के लिए किस तरह कमांडो कार्रवाई की जा रही है। बाद में मीडिया ने यह कह कर पीछा छुडाने की कोशिश की कि ऐसा हमला पहली बार हुआ है, और हमें जो सतर्कता बरतनी थी वो नहीं बरत सके। देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया अभी अपरिपक्व है, लेकिन प्रिंट से बेहतर की उम्मीद थी, पर जनभावना के आगे उन्होंने भी घुटने टेक दिए। दूसरे देशों में इस आंदोलन की तुलना सीरिया, लीबिया और मिश्र के आंदोलनों से की जाने लगी। दुनिया में देश के सम्मान को चोट पहुंचा। मुझे लगता है कि मीडिया आंदोलन की रिपोर्ट देने के बजाए इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गई थी। सच ये है कि सरकारी चाल की जानकारी अगर मीडिया ने लोगों को दी होती तो सबको सच्चाई का पता चलता।
इस आंदोलन की सबसे बडी ताकत थी गांधीवादी तरीके से आंदोलन का संचालन। हजारों की भीड लेकिन सब अनुशासन में। लेकिन इस अनुशासन को मंच पर तार तार किया ओमपुरी और किरन बेदी ने। सस्ती लोकप्रियता के लिए किरन बेदी भले ही अपने कृत्य को जायज ठहराएं, लेकिन मैं इसे कत्तई गांधीवादी आंदोलन का हिस्सा नहीं कह सकता। मंच पर इससे फूहड कुछ भी नहीं हो सकता। इसने आंदोलन की गंभीरता को कम किया। बाकी कसर स्वामी अग्निवेश ने पूरी कर दी।
सामाजिक संगठनो ने भी इसमें सही भूमिका नहीं निभाई। सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने जब मीडिया के सामने लोकपाल पर जब एक अलग बिल आगे बढाया तो ऐसा लगा कि अन्ना के खिलाफ ये एक साजिश है। लोग इसे सरकारी हथकंडा तक बताने लगे। बहरहाल अब स्थाई समिति के सामने ये मेरा बिल ये तेरा बिल करके लोकपाल को लेकर इतने मसौदे आ चुके हैं कि सभी का निस्तारण करने में समिति के हाथ पांव फूल रहे हैं। संवैधानिक मर्यादाओं में बंधी समिति को सभी मसौदों पर चर्चा करना जरूरी है। ऐसे में जाहिर है कि उसे और समय देना हो होगा।
जनलोकपाल बिल में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सीधा संबंध राज्य सरकारों से है। ऐसे में बिल पास करने के पहले समिति को ये भी ध्यान रखना होगा कि कहीं राज्य सरकारों की स्वायत्तता का अधिग्रहण ना हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो बिल पास हो जाने के बाद राज्य सरकारों को इस बिल पर विधानसभा में भी सहमति बनानी पडेगी। इससे ये खतरा भी बढ सकता है कि कुछ राज्यों में ये कानून लागू हो जाए और कुछ स्थानों पर इसे लागू ना किया जाए।
बहरहाल सच ये है कि भ्रष्टाचार से देशवासी परेशान हैं और इसके लिए सख्त कानून बनना ही चाहिए। लेकिन कहते हैं ना कि वीणा के तार को इतना ना कसें कि तार ही टूट जाए और ना ही इतना ढीला कर दें कि उसमें सुर ही ना निकले। आपको पता है कि कानून से अपराध रुकते नहीं हैं, बल्कि इससे अपराधियों को सजा मिलती है। महात्मा गांधी जी का ही कहना था कि हमारी कोशिश ऐसी होनी चाहिए 99 गुनाहगार भले ही छूट जाएं, पर एक भी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। मुझे लगता है कि दहेज के मामले में बहुत सख्त कानून जरूर बना, पर इसका दुरुपयोग भी सबसे ज्यादा हो रहा है। ऐसे में मुझे भरोसा है कि कानून में गांधी जी की भावना का ध्यान रखा जाएगा और भ्रष्टाचार पर एक सख्त कानून जरूर पास होगा।

Saturday, 27 August 2011

दिल्ली दूर है अन्ना जी.....

बेचारे अन्ना बुरे फंस गए। संसदीय प्रक्रिया को वो समझते नहीं और उनकी टीम में जो लोग समझते हैं, उनसे सरकार बात ही नहीं करना चाहती। वैसे तो मेरे पिछले लेख को आप पढें तो मैने साफ कर दिया था कि जिस तरह से ये आंदोलन चलाया जा रहा है, उससे अन्ना को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। अन्ना रामराज्य की बात कर रहे हैं, वो देश को पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त करने चाहते हैं, लेकिन ये काम जिसे करना है, वो दागदार है। ऐसे में उनसे ज्यादा उम्मीद करनी ही नहीं चाहिए। ठीक उसी तरह जैसे सिविल सोसायटी में अगर अन्ना को छोड़ दें तो बाकी लोगों का दामन भी साफ है, ये पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। जहां से आंदोलन शुरु हुआ था, हम वही आज भी वहीं खडे हैं, ये चर्चा पूरी तरह बेमानी है। इसका बिल ड्राप्ट होने में कोई महत्व नहीं है।
बाकी बातें हम बाद में करते रहेंगे, आज बिना भूमिका के मैं ये समझाने की कोशिश करुंगा कि सरकार कैसे मूर्ख बना रही है अन्ना को। अन्ना जी चाहते थे उनके जनलोकपाल बिल को तत्काल संसद में पेश किया जाए, और ना सिर्फ पेश किया जाए, बल्कि उसे पास करके कानून बनाया जाए। इस मामले में सरकार ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि एक बिल इस मामले में पेश किया जा चुका है और वो स्थाई समिति के पास है, लिहाजा दूसरा बिल पेश नहीं किया जा सकता। लेकिन ये बात अन्ना टीम को समझ में नहीं आई, फिर सरकार ने माथापच्ची शुरू की।
कई दौर की बातचीत के बाद तय हुआ कि उनके बिल के कुछ खास बिंदुओं को एक प्रस्ताव के रुप में संसद में रखा जाएगा और इस पर चर्चा की जाएगी। अब पेच फंसा कि संसद में किस नियम के तहत ये चर्चा की जाए। सरकार नियम 193 के तहत चर्चा चाहती थी, जिसमें चर्चा के बाद कोई वोटिंग नहीं होती है, सिर्फ एक प्रस्ताव तैयार होता है। विपक्ष इस पर नियम 184 के तरह चर्चा चाहता था, जिसमें चर्चा के बाद वोटिंग होती है, इसके बाद प्रस्ताव स्थाई समिति को भेजा जा सकता है। इस बात को लेकर सरकार और विपक्ष में ठन गई और कहा गया कि ये चर्चा किसी नियम के तहत नहीं होगी। सरकार के मंत्री एक प्रस्ताव लाएंगे और उसी के आधार पर एक प्रस्ताव काम मजमून अन्ना के पास भेज कर उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया जाएगा। आपको बता दूं कि ऐसी चर्चा आमतौर पर संसद के नियम 342 के तहत होती है, जिसमें संसद की भावना क्या है, इसकी जानकारी की जाती है।
यहां यह बताना जरूरी है कि जब किसी मसले पर एक बिल संसद में पेश किया जा चुका हो, तो उस पर संसद में किसी तरह की चर्चा नहीं की जा सकती। इससे स्थाई समिति जो एक संवैधानिक संस्था है, उसकी गरिमा गिरती है। गरिमा को छोड भी दें तो ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि बिल को अंतिम रूप देने का अधिकार स्थाई समिति को ही है। बहरहाल इस चर्चा से इतना साफ हो गया है कि ज्यादातर लोग जनलोकपाल बिल का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन प्रस्ताव का समर्थन करने का यह मतलब कत्तई नहीं की, ये लोकपाल बिल का भी समर्थन करेंगे। यहां एक लाइन मे लालू का जिक्र करना जरूरी है, जो स्थाई समिति के सदस्य हैं। उनका साफ कहना है कि सभी दल संविधान के तहत काम करने की बात कर रहे हैं, लेकिन संविधान के तहत तो यह चर्चा ही नहीं हो सकती।
वैसे सरकार और सिविल सोसायटी दोनों ही जानते हैं कि इस चर्चा का कोई मतलब नहीं है। स्थाई समिति में इससे जु़डे चार बिल और हैं, इसलिए समिति को सभी बिलों को चर्चा के लिए सामने रखना होगा। इसके अलावा स्थाई समिति में आम आदमी भी अपना सुझाव दे सकता है। यहां सभी सुझावों पर गुण दोष के आधार पर फैसला होता है। ऐसे में सदन में की ये चर्चा सिर्फ समय की बर्बादी भर है, इसका कोई मायने नहीं है।
इससे जुडे कुछ और मसलों पर के बारे में आपको बताना चाहता हूं। दरअसल सरकार में शामिल कुछ लोग सरकार के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसकी वजह भी आपको मालूम होनी चाहिए। आपको पता है कि सोनिया गांधी गंभीर रुप से बीमार हैं और अमेरिका में इलाज करा रही हैं। जानकार कहते हैं कि तीन चार महीने वो पार्टी के काम में सक्रिय नहीं रह सकती। अपनी अनुपस्थिति में पार्टी का कामकाज चलाने के लिए उन्होंने एक चार सदस्यीय कमेटी बनाई। इसमे राहुल गांधी, जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल और ए के एंटोनी को शामिल किया है। इस टीम को लेकर सरकार और पार्टी में शामिल तमाम नेता पार्टी से सख्त नाराज हैं।
अन्ना ने जब आंदोलन की धमकी दी तो पहले ही बातचीत करके मसले का कुछ हल निकाला जा सकता था। लेकिन सोनिया की बनाई टीम को लोग उसकी औकात बताना चाहते थे, लिहाजा किसी ने कोई पहल ही नहीं की। जो कोई आगे आया भी तो वो बाबा रामदेव के तर्ज पर अन्ना से भी निपटने का सुझाव देते रहे। वो ऐसे सुझाव देते रहे, जिससे सरकार की किरकिरी हो। इसी के तहत पहले अन्ना को गिरफ्तार कराया गया, सरकार की किरकिरी हुई, फिर अन्ना को छोडने का फरमान सुनाया गया तो सरकार की किरकिरी हुई, अन्ना ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया, फिर सरकार की किरकिरी हुई। अनशन के लिए जगह देने में जिस तरह का ड्राम सरकार की ओर से किया गया, उससे भी सरकार की किरकिरी हुई। अब सरकार ने संसद में इस मामले में पूरे दिन चर्चा की, लेकिन बिना किसी नियम के हुई इस चर्चा से वो किसे बेवकूफ बना रहे हैं। ये समझ से परे है। सरकार में तो आपस में मतभेद और संवादहीनता रही है है, टीम अन्ना सही तरह से आंदोलन चलाने में नाकाम रही है।
बेचारे अन्ना की अंग्रेजी जानते नहीं और हिंदी कम समझते हैं। टीम अन्ना के सदस्य उन्हें जिस तरह से बात समझाते हैं, वो उन्हें समझ में ही नहीं आती। कई बार देखा गया है कि मंत्रियों से बात कुछ हुई और रामलीला मैदान तक पहुंचते पहुंचते बात कुछ और हो जाती है। हालत ये हुई कि सरकार को अन्ना के नुमाइंदों से किनारा करना पडा और एक ऐसे मंत्री को अन्ना से बात करने की जिम्मेदारी दी गई जो महाराष्ट्र से आते हैं। जिससे अन्ना से सीधे मराठी में बात करके उन्हें समझाया जा सके और उनके चंगू मंगू को दूर किया जा सके। बहरहाल सरकार को ये काम पहले करना चाहिए था, जो उसने बाद में किया। वैसे भी अन्ना की टीम से दो महत्वपूर्ण सदस्य खासे नाराज हैं और वो यहां से जा चुके हैं।
बहरहाल अब अन्ना को एक प्रस्ताव थमाने की तैयारी है और हो सकता है वो अपना अनशन भी समाप्त कर दें। लेकिन मित्रों अन्ना को तीन दिन त उनकी टीम ने सिर्फ अपनी "फेस सेविंग" के लिए भूखा रखा। अन्ना को उस दिन ग्रेसफुल तरीके से अपना अनशन खत्म कर देना चाहिए था, जिस दिन संसद ने उनसे अपील की थी। लेकिन जिस संसद से उन्हें अपने बिल की उम्मीद है, उसकी गरिमा को अन्ना ने तार तार कर दिया।
आज मैं पूछना चाहता हूं अन्ना के नुमाइंदों से उस दिन और आज में अनशन तोडने मे क्या फर्क है। क्या कुछ नया हासिल कर लिया आपने। बिना किसी नियम के हुई इस चर्चा के बाद ये मसला भी स्थाई समिति में ही जाएगा। वहीं से इस बिल को ड्राफ्ट किया जाएगा। अगर बिल को स्थाई समिति से ही ड्राफ्ट होना था, तो ये बात तो प्रधानमंत्री बहुत पहले ही कह चुके थे , आप खुद उनसे मिल कर अपना बिल सौंप चुके थे। फिर इतने दिन अनशन से क्या हासिल हुआ। लेकिन हां आपकी टीम ने बहुत कुछ हासिल किया है, इन्हें कोई नहीं जानता था, अब इन लोगों की इतनी पहचान हो गई है कि वो चुनाव लड़ सकते हैं। अन्ना जी प्लीज अबकी बार आंदोलन शुरु कीजिए, तो पहले जान लीजिए कि हम किसलिए आंदोलन कर रहे हैं, और कहां तक बात माने जाने पर समझौता कर सकते हैं। ये दिल्ली है अन्ना जी और दिल्ली अभी भी आमआदमी से बहुत दूर है।


Wednesday, 24 August 2011

संसद पर हमला है ये आंदोलन

दोपहर में एक जरूरी मीटिंग निपटाने के बाद दिल्ली से नोएडा आफिस लौट रहा था। कार संसद भवन के सामने से निकल रही थी, आज ना जाने क्यों मेरी निगाह संसद भवन से हट ही नहीं रही थी, जबकि कार को ड्राईवर संसद भवन से राजपथ पर काफी दूर तक ला चुका था। लेकिन मैं पीछे इसी ऐतिहासिक इमारत को देखता रहा। अचानक मुझे ना जाने क्या हुआ, मैने ड्राईवर से कहा कि इंडिया गेट से वापस मुझे फिर संसद भवन आना है। हालाकि ड्राईवर ने मुझे याद दिलाया कि आपको वैसे ही आफिस पहुंचने में देर हो चुकी है, और आप दोबारा संसद भवन जाने को कह रहे हैं। ये बात याद दिलाते हुए ड्राईवर फिर संसद भवन के करीब पहुंच कर कार रोक दी।
आपको बता दूं कि पिछले पांच छह महीनों को छोड़ दें तो इसके पहले कई साल तक ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो, जब हम अपने पत्रकार मित्रों के साथ एक दो घंटे संसद भवन के सामने विजय चौक पर ना बिताते हों। सच तो ये है कि हम सभी पत्रकार साथी सुबह आफिस निकलने के बाद पूरे दिन जहां कहीं से भी कोई रिपोर्ट कर रहे हों, लंच हम सब यहीं विजय चौक पर साथ ही करते रहे हैं। इसलिए ऐसा भी कुछ नहीं कि मैं पहली बार संसद भवन के सामने से गुजर रहा हूं। खैर पांच सात मिनट यहां ख़ड़े रहने के दौरान मैं फिर गाडी में बैठा और आफिस के लिए रवाना हो गया।
वापस लौटते वक्त सोचता रहा आखिर कितने हमले झेलेगी ये पर्लियामेंट। एक बार 13 दिसंबर 2001 को पांच आतंकी सीमापार हथियारों से लेस होकर यहां घुस आए। वो तो इस संसद को लहुलुहान कर देना चाहते थे और यहां एक ऐसी काली इबारत लिखना चाहते थे, जो धब्बा हम जीवन भर ना भुला सकें। लेकिन हमारे बहादुर सिपाहियों ने उन पांचो को मार गिराया और संसद भवन के भीतर भी घुसने नहीं दिया।
आज 10 साल बाद एक बार फिर संसद पर हमला हो रहा है। आप भले कहें कि ये कोई आतंकी हमला नहीं है। लेकिन मित्रों मैं बताऊं ये उससे भी बड़ा और खतरनाक हमला है। इस हमले में किसी एक व्यक्ति या नेता की हत्या करना मकसद नहीं है। बल्कि इनका मकसद संसदीय परंपराओं और मान्यताओं की हत्या करना है। आज तमाम लोग भावनाओं में बहकर शायद उन पांच आतंकियों को ज्यादा खतरनाक कहें तो हथियार के साथ संसद भवन में घुसे थे, लेकिन मैं उनके मुकाबले सिविल सोसाइटी के पांच लोगों को उनसे ज्यादा खतरनाक मानता हूं। बस दुख तो ये है कि ये सीमापार से नहीं आए हैं, हमारे ही भाई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से भली भांति परिचित भी हैं, फिर भी देश के लोकतंत्र को कमजोर और खत्म करने पर आमादा हैं।
आपको ये जानना जरूरी है कि संसद सदस्य पर ये दबाव नहीं बनाया जा सकता कि वो किस बिल का समर्थन करें और किसका नहीं। ये संवैधानिक अधिकार उन्हें बाबा भीमराव अंबेडकर ने दिया है। अगर उन्हें संसद की किसी कार्रवाई के लिए बाध्य किया जाता है तो यह संसद सदस्य के विशेषाधिकार के उलंघन का मामला बनता है। आज अन्ना जो खुद को गांधी कहे जाने पर गर्व महसूस करते हैं, वो कह रहे हैं कि जो सांसद बिल का समर्थन ना करे, उसके घर के बाहर धरना दो। यहां फिर अन्ना के चेले कहेगें कि सांसद भी तो पैसे लेकर सवाल पूछते हैं, उनका क्या होगा। अरे भाई उन्हें कानून सजा देगा ना। दिल्ली पुलिस ने वोट के बदले नोट कांड में राज्यसभा सदस्य अमर सिंह समेत कई और लोगों के खिलाफ कोर्ट मे चार्जशीट दायर किया है ना। हां आप कह सकते हैं कि इन मामलों के निस्तारण की रफ्तार कम है। इसके लिए स्पेशन कोर्ट बनाकर मामलों की सुनवाई जल्दी की जा सकती है। लेकिन आज सांसदो को मजबूर किया जा रहा है कि वो सिविल सोसाइटी के जनलोकपाल बिल का ही समर्थन करें। वरना उनके घर के बाहर हम हंगामा करेंगे, धरना देंगे।
सिविल सोसायटी घमंड में चूर है। उसे लग रहा है कि आज वो किसी भी तरह का फैसला करा सकते हैं। उनकी भाषा बेअंदाजों जैसी है। उन्हें लग रहा था कि अनशन शुरू होते ही सरकार हिल जाएगी। मंच से चिल्लाने लगे कि सरकार से जो बात होगी वो यहीं रामलीला मैदान के मंच पर होगी। हालत ये हुई कि सरकार ने बात करने से ही इनकार कर दिया। इस पर सभी हैसियत में आ गए। सरकार ने ठीक ढंग से बात की तो कहने लगे, सरकार झुक गई। भूखे अन्ना तो इतने बेलगाम हैं कि उन्होंने सरकार को सीधे धमकी दी कि अगर 30 अगस्त तक बिल पास ना करा पाए तो गद्दी छोडकर जाएं। अन्ना की बात पर हंसी आती है। दरअसल अन्ना जी ने तमाम लडाइयां जरूर लडी हैं, लेकिन वो छोटे स्तर की थी। मुंबई में नगर पालिका के खिलाफ, प्रदेश सरकार के मंत्री के खिलाफ, कुछ अफसरों को लेकर धरना दिया, और वो कामयाब भी हुए हैं। लेकिन अन्ना जी अब आपकी लडाई केंद्र से है। खैर इसमें आपकी भी कोई ज्यादा गल्ती नहीं है। आपकी पढाई तीन दर्जे तक हुई है, आपके साथ जो लोग हैं उनके बारे में सबको पता है।
कहा जा रहा है कि एक भुट्टे को पैदा करने के लिए एक दाने को शहीद होना ही पड़ता है। यानि जब एक बीज जमीन में डाला जाता है, तभी एक पूरा भुट्टा पैदा हो सकता है। तो क्या सिविल सोसाइटी अन्ना जी को शहीद होने का दाना समझ रही है। रामलीला मैदान है, यहां लोग कई साल से तरह तरह की लीलाएं देखने के लिए जमा होते हैं। यह कोई शहीद स्थल तो है नहीं। आपकी लीला भी देश देख रहा है। अन्ना जी आप अपने टीम के मुखौटा हैं। आपके साथी तो आपको मुखौटा बनाकर जंतर मंतर की छोटी मोटी लडाई लड़ना चाहते थे, लेकिन भ्रष्टाचार से परेशान लोग आपके साथ खडे हैं।
प्रधानमंत्री सच्चे आदमी हैं, वो आपकी तरह झूठी बात जनता के सामने नहीं कह सकते। वजह उनकी बातों की और पद की एक मर्यादा है। आप कुछ भी कह सकते हैं। बताइये जिस देश का प्रधानमंत्री कह रहा हो कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो एक दिन में इसे खत्म कर दें। लेकिन अन्ना और टीम जिस तरह से बात कर रही है उससे लगता है कि जनलोकपाल बनते ही भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा।
वैसे सच सिर्फ इतना भर है कि देश में बडी संख्या में सियासी, नौकरशाह और निचले स्तर पर कर्मचारी बेईमान हो गए हैं। इसकी वजह से आम आदमी की मुश्किलें बढ गई हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 121 करोड़ की आबादी को कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। देश में आज किस अपराध के लिए सख्त कानून नहीं है, फिर भी कौन सा अपराध देश में नहीं हो रहा है। मित्रों मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को हम सजा नहीं दे पा रहे हैं। संसद पर हमला करने का षडयंत्र करने वाला अफजल गुरू जेल मे वीआईपी सुविधा ले रहा है। और हम चोरों को फांसी देने की बात कर रहे हैं। अन्ना जी सरकार अपराधियों को न्यायालय से मिली सजा पर अमल भर करने लगे, तो लोगों में कानून के प्रति सम्मान और भय पैदा होगा। बडे बडे भ्रष्टाचारी जेल जाने लगें और उनकी संपत्ति जब्त होने लगे, छोटे कर्मचारी तो ऐसे ही रास्ते पर आ जाएंगे।
अन्ना जी प्रधानमंत्री ने आज सर्वदलीय बैठक कर आपकी बातों को उनके सामने रख दिया। सर्वदलीय बैठक ने आपके जनलोकपाल को खारिज कर दिया। लेकिन सभी दलों ने आपके प्रति सम्मान व्यक्त किया है, और सलाह दी है कि आप अनशन खत्म करें। प्लीज अन्ना दादा मैं भी आपकी बातों और तरीके से सहमत नही हूं। आप पहले अनशन खत्म करें, फिर सरकार के साथ बात करके मजबूत बिल बनाने के लिए सरकारी तंत्र के साथ लडाई लडें।

Tuesday, 23 August 2011

कृष्णा : ना आना म्हारे देश

मित्रों
काफी दिनों से कुछ ऐसे मुद्दों पर आप लोगों से बात चीत  कर रहा था, जिसमें मैने देखा कि तमाम लोगों की रुचि ही नहीं है। हालत ये हुई लोगों ने मुझे हाशिए पर डाल दिया। मैं आप सभी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बधाई देने के साथ ही कविवर डा. सुनील जोगी की एक रचना पढवाता हूं। मुझे पक्का भरोसा है कि आप सभी को ये रचना पसंद आएगी।
लेकिन दोस्तों कल से मैं फिर देश की बातें करुंगा, क्योंकि सच्चाई से आपको रुबरू कराना को मैं अपना नैतिक धर्म समझता हूं, इसके लिए कोई मुझे कांग्रेसी कहता है, कोई पत्रकारिता कैसी होनी चाहिए ये समझाने की कोशिश करता है, लेकिन मैं जानता हूं कि सच वो नहीं है जो आंखो के सामने है, सच वो है जो लोगों के मन मे है।  आइये फिलहाल इस रचना का आनंद लीजिए......

कलयुग में अब ना आना रे प्यारे कृष्ण कन्हैया
तुम बलदाऊ के भाई यहाँ हैं दाउद के भैया।।

दूध दही की जगह पेप्सी, लिम्का कोकाकोला
चक्र सुदर्शन छोड़ के हाथों में लेना हथगोला
 कलयुग में अब. . .।।

गोबर को धन कहने वाले गोबर्धन क्या जानें
रास रचाते पुलिस पकड़ कर ले जाएगी थाने
लेन देन करके फिर छुड़वाएगी जसुमति मैया।
कलयुग में अब. . .।।

नंद बाबा के पास गाय की जगह मिलेंगे कुत्ते
औ कदंब की डार पे होंगे मधुमक्खी के छत्ते
यमुना तट पर बसी झुग्गियों में करना ता थैया।
कलयुग में अब. . .।।

जीन्स और टीशर्ट डालकर डिस्को जाना होगा
वृंदावन को छोड़ क्लबों में रास रचाना होगा
प्यानो पर धुन रटनी होगी मुरली मधुर बजैया।
कलयुग में अब. . .।।

देवकी और वसुदेव बंद होंगे तिहाड़ के अंदर
जेड श्रेणी की लिए सुरक्षा होंगे कंस सिकंदर
तुम्हें उग्रवादी कह करके फसवा देंगे भैया
कलयुग में अब. . .।।

विश्व सुंदरी बनकर फ़िल्में करेंगी राधा रानी
और गोपियाँ हो जाएँगी गोविंदा दीवानी
छोड़के गोकुल औ' मथुरा बनना होगा बंबइया।
कलयुग में अब. . .।।

साड़ी नहीं द्रौपदी की अब जीन्स बढ़ानी होगी
अर्जुन का रथ नहीं मारुति कार चलानी होगी
ईलू-ईलू गाना होगा गीता गान गवैया।
कलयुग में अब. . .।।

आना ही है तो आ जाओ बाद में मत पछताना
कंप्यूटर पर गेम खेलकर अपना दिल बहलाना
दुर्योधन से गठबंधन कर बनना माल पचइया..
कलयुग मे अब ना आना रे........