एक सवाल मेरे जेहन में हमेशा रहता है और मुझे कुरेदता रहता है। वो ये कि भाई श्रीवास्तव जी आप ब्लाग क्यों लिखते हो ? गिने चुने मित्रों की तारीफ करती हुई टिप्पणी के लिए ? या विचारों से सहमत ना होने वाले ब्लागर्स की गाली सुनने के लिए ? ईमानदारी से बताऊं, जब अपना ही मन मुझसे ये सवाल करता है तो मेरे पास वाकई इसका ऐसा जवाब नहीं होता जिससे मैं संतुष्ट हो सकूं। वैसे भी मीडिया से जुड़े होने के कारण इतना वक्त नहीं मिलता है कि मैं यहां पर बहुत सक्रिय भूमिका निभा सकूं, लेकिन कई बार लगता है कि वाकई यहां जो कुछ होना चाहिए, वो नहीं हो रहा है। इसकी वजह और कुछ नहीं बस आपस में तालमेल का अभाव और बिखराव ही मुख्य कारण है। अच्छा किसी से अगर ब्लाग पर चर्चा करें तो उसे लगता है कि वाह जी वाह ! बताइये दो दिन से ब्लाग लिखने लगे और आए हैं हमें ज्ञान देने। स्वाभाविक है ऐसे में हाथ पीछे खींच लेना ही बुद्धिमानी है।
दिल्ली में सियासी गलियारे में फिलहाल मेरी ठीक ठाक पकड़ और पहुंच है। देखता हूं कि नेताओं में सोशल मीडिया की हनक को देखकर उनमें एक भय बना हुआ है। इस भय की एक वजह ये भी है कि कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के विवादित वीडियो की जानकारी इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया सभी को थी, लेकिन इसकी एक लाइन खबर कहीं नहीं दिखी। पर you tube और फेसबुक पर इतनी जगह ये डाल दी गई कि पार्टी को जवाब देना मुश्किल हो गया। हालत ये हुई कांग्रेस को खुद अपने इस प्रवक्ता को घर बैठाना पड़ गया। बहरहाल काफी दिनों के बाद अब उनकी एक बार फिर बहाली हो गई है। इस वीडियो के बाद से इस माध्यम को नेता और सरकार दोनों ही बहुत गंभीरता से लेते हैं। लेकिन इसके बाद हमें यानि ब्लागर्स को जितना गंभीर होना चाहिए था, उसमें मुझे कमी दिखाई देती है।
वैसे ब्लागर्स के कमियों पर हाथ डालना खतरनाक है। पिछले साल की इस वारदात को हम तो भूलना चाहते हैं, लेकिन वो कैसे भूल सकते हैं। लखनऊ में ब्लागर्स के एक समारोह के मामले में मैने अपनी बात की, तहजीब के शहर वालों ने मुझे निर्लज्ज और बेशर्म की उपाधि दे दी। हैरानी तब हुई जब एक ब्लागर्स ने लेख की सराहना करते हुए कहा कि अच्छा जूता चलाया है। मतलब कलम ताख पर रख कर हाथ में जूता ले लिया भाइयों ने। यहां सबको चौड़ी कुर्सी की चाहत तो है, पर कुर्सी पर बैठने का सलीका सीखने को लोग ना जाने क्यों तैयार नहीं हैं। जो लोग इस पूरे वाक्यात में शामिल रहे, बाद में मैने उनके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला सभी लोग पुराने ब्लागर्स हैं और उन्होंने कुछ पढ़ाई लिखाई भी की हैं, लेकिन पढ़ाई लिखाई गया तेल लेने वो अपनी ओर उठने वाली उंगली का जवाब देने के बजाए उंगली तोड़ने में यकीन रखते हैं। खैर ब्लाग परिवार में कुछ लोग हैं जिनका मैं बहुत आदर करता हूं, उनके समझाने पर मैने विवाद को वहीं विराम दे दिया। बहरहाल बात पुरानी हो गई है, अब इस पर क्या चर्चा करूं।
कौन कहता है आसमां में छेद हो नहीं सकता
एक पत्थर तबियत से उछालो तो यारों !
लगता है मैं विषय से भटक रहा हूं, मैं बात कर रहा था शास्त्री जी की। उन्होंने स्वीकार किया कि मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं। उनका कहना था कि इस मामले में वाकई काम होना चाहिए। तय हुआ कि पहले हम अपनी बात कुछ और ब्लागर्स से शेयर करते हैं। इसके लिए पहले दिल्ली, लखनऊ, देहरादून और मुंबई में ब्लागर्स के साथ बैठकर पूरी रणनीति तैयार करेगे और उसके बाद इस पर आगे काम किया जाएगा। मैने इस बात की शुरुआत तो की, उसके बाद मैं खुद ही पहले दिल्ली में अन्ना और रामदेव के आंदोलन में काफी व्यस्त रहा। आंदोलन खत्म हुआ तो मुझे हिमाचल के चुनाव में जाना पड़ा और उसके बाद पूरे महीने भर के लिए गुजरात चला गया। इससे ये बात जहां की तहां ही रह गई।
लेकिन आज मैं जो सवाल खुद से पूछता हूं वही सवाल आपसे भी जानना चाहता हूं कि क्या वाकई आप जो कर रहे हैं, बस वही करने के लिए ब्लाग लिखने आए हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इस सशक्त माध्यम का जब देश ही नहीं दुनिया लोहा मान रही है तो हम भी कुछ गंभीर हो और ब्लाग को देश की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश करें। सवाल उठता है कि हम कर क्या सकते हैं ? जवाब है हम बहुत कुछ कर सकते हैं। या ये कहें कि हम बहुत कुछ करते हैं, लेकिन उसमें थोड़ी सी खामी रह जाती है, जिससे ब्लाग की आवाज एक न होकर अलग अलग हो जाती है। आइये मैं बताता हूं कि हम क्या कर सकते हैं।
दिल्ली में गैंगरेप की घटना हुई । इससे पूरा देश में आक्रोश देखा गया। ये गुस्सा ब्लाग पर भी दिखा। सभी ने अपनी अपनी तरह से इस मामले में नाराजगी जताई और सरकार को जमकर कोसा भी। आपको पता है कि कमीं कहां रह गई, कुछ नहीं बस ये कि आवाज एक नहीं हो पाई। इसमें होना ये चाहिए था कि जो ब्लागर तकनीकि रूप से काफी जानकार हैं वो इस घटना को लेकर एक सांकेतिक "लोगो" या स्केच तैयार करते। इस स्केच को हम ब्लागर परिवार का आफीसियल "लोगो" मान लिया जाता, इसमे ये अनिवार्य कर दिया जाता कि जो लोग भी लेख या कविता के माध्यम से इस घटना की निंदा कर रहे हैं, उन्हें अपने ब्लाग पर ये "लोगो" लगाना अनिवार्य है। जब एक ही "लोगो" चारो ओर दिखाई देने लगता तो आप इसके असर को आसानी से समझ सकते हैं। मैं आपको विश्वास के साथ कह सकता हूं कि सोशल नेटवर्किंग साइट के इसी "लोगो" को अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया भी इस्तेमाल करने को मजबूर हो जाती। फिर हमारी ताकत को नजरअंदाज करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। मेरा कहने का मतलब सिर्फ यही है कि हम कर तो बहुत कुछ रहे हैं, लेकिन उसमें एकता और एकरूपता की कमी दिखाई दे रही है।
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
मुझे पक्का भरोसा कि दुश्यंत कुमार की ये पंक्तियां हम सबको ना सिर्फ ताकत देगी, बल्कि एक रास्ता भी दिखाएगी कि हम कैसे न सिर्फ इस माध्यम को मजबूत बल्कि जिम्मेदार भी बनाएं ? मेरा सुझाव एग्रीगेटर मसलन चर्चामंच, ब्लाग4 वार्ता, ब्लाग बुलेटिन और भी कुछ हैं, उनके लिए भी है। मैं जानता हूं कि रोज इतने सारे लिंक्स को समेटना और उसे प्रस्तुत करना आसान काम नहीं है। लेकिन उसका वर्गीकरण कर दें, यानि विषय के हिसाब से लेख और कविताओं को जगह दें। सामाजिक, राजनीतिक, धर्म, यात्रा, विज्ञान, व्रत त्यौहार कुछ इस तरह करें। आप सबको पता है कि देश में तमाम जयंती, व्रत त्यौहार हैं। अब होता क्या है कि लोहणी आ गई, अब उसी पर पच्चीसों कहानी, कविता, लेख से मंच को सजा दिया जाता है। इससे दूसरे विषयों पर लोगों का ध्यान नहीं जा पाता है। मैं जानता हूं कि ये आसान नहीं है, लेकिन मुश्किल भी नहीं है।
बहरहाल बड़ी बड़ी बातें तो बहुत हो गई, लेकिन फिर वही सवाल कि आखिर ब्लाग परिवार की अगुवाई करेगा कौन ? वैसे तो मुझे नहीं लगता है कि इसमें कोई विवाद होना चाहिए, जो लोग काफी समय से लिख रहे हैं और जिनका सभी आदर करते हैं वो आएं आगे। सबके साथ बैंठे और रास्ता निकालें। वैसे मैं ब्लाग में बहुत कम लोगों को जानता हूं, लेकिन मुझे लगता है कि ये काम डा. रुपचंद्र शास्त्री, रश्मि प्रभा, शिवम मिश्रा, दिगंबर नासवा, डा. दराल, राज भाटिया, ललित शर्मा, रवीन्द्र प्रभात, वंदना गुप्ता, दिनेश गुप्ता रविकर, चंद्र भूषण मिश्र गाफिल, दीपक बाबा, सतीश सक्सेना, रश्मि रवीजा, इस्मत जैदी, कविता वर्मा, अल्पना वर्मा, राजेश कुमारी, अंजू चौधरी, जयकृष्ण तुषार, मनोज कुमार, संगीता स्वरूप गीत, अजित गुप्ता, संगीता पुरी, हरीश सिंह, डा. अनवर जमाल, डा. मोनिका शर्मा, डा. दिव्या श्रीवास्तव, रचना श्रीवास्तव, संध्या शर्मा, चला बिहारी ब्लागर बनने, राकेश कुमार, मिथिलेश, संतोष सिंह, सलीम खान, अरुण देव, केवल राम और सदा जी काफी बेहतर तरीके से कर सकती हैं। ये तो मैने वो नाम लिखे हैं जो मुझे याद हैं, वैसे तो मैं बहुत सारे लोगों को पढता रहता हूं, मुझे पक्का भरोसा है कि ये सभी ब्लाग को नेतृत्व देने में सक्षम हैं। बस जरूरत इस बात की है कि ये एक कदम आगे तो बढ़ाएं। वरना तो एक लाइन याद आ रही है कि ..
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली,
चलो बस हो चुका मिलना, ना तुम खाली ना मैं खाली ।






