Wednesday, 14 December 2011

कौन लिख रहा अन्ना की स्क्रिप्ट ...

देश संकट के दौर से गुजर रहा है, ये वक्त है जब नेताओं को अपने दल से ऊपर देश को रखना होगा, उन्हें मिलकर सोचना होगा कि आखिर गल्ती कहां हुई, क्यों लोग सड़कों पर जमा हो रहे हैं ? सरकार के प्रति लोगों में इतनी नफरत क्यों है? इस समस्या का समाधान भी जल्दी तलाशना होगा। अगर सभी दलों के नेता आपस में ही झगड़ते रहे, तो उनका नुकसान तो ज्यादा नहीं होगा, लेकिन देश की जो दुर्गति होगी, उसकी भरपाई बिल्कुल आसान नहीं होगी। वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल खुद ही भ्रष्टाचार से देश को बाहर निकालने का ऐसा रास्ता तलाशें, जिस पर लोगों को यकीन हो। सच्चाई ये है कि देश में महंगाई एक समस्या है, भ्रष्टाचार उससे भी बड़ी समस्या है, लेकिन सियासी दल जनता का भरोसा खोते जा रहे हैं ये सबसे बड़ी समस्या है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में अगर राजनीतिक दलों से जनता का भरोसा खत्म होने लगे तो समझ लिया जाना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में हैं। इसी का फायदा उठा रही है टीम अन्ना।

मै मानता हूं कि देश में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में गुस्सा है। इसे रोकने के लिए पहले ही ठोस प्रयास किया जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ, गल्ती किसकी है, इस पर जाना बेमानी है। देश में वोट की राजनीति ने कानून को भी जाति धर्म के आधार पर बांट दिया है। आतंकवादियों से निपटने के लिए देश में बीजेपी की सरकार ने पोटा कानून बनाया, कांग्रेस ने महज एक तपके के वोट की लालच में इस कानून को खत्म कर दिया। मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ एक बात कहना  चाहता हूं कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून की बात की जा रही है। मैं कहता हूं कि कानून सख्त बन भी गया, लेकिन उस पद पर आदमी ढीला बैठ गया तो सख्त कानून का माखौल भर उड़ना है। मुझे लगता है कि कानून कैसा भी हो,आदमी सख्त हो तो वो सूरत बदलने में सक्षम होगा। आपको याद होगा निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को लोग गैरजरूरी समझते थे, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर तैनात हुए टीएन शेषन ने कानून के दायरे में रहकर बता दिया कि पद की मर्यादा कैसे कामय रखी जाती है।

बहरहाल मैं आज भी इस बात पर कायम हूं कि अन्ना की मांग सही है, परंतु तरीका बिल्कुल गलत। अन्ना का आंदोलन देश के लोकतांत्रिक ढांचे को तार तार करने वाला है, सच कहें तो ये आंदोलन संसद पर हमला है। संसद पर दस साल पहले पांच आंतकवादियों ने हमला किया था, लेकिन उनका मकसद कुछ लोगों की हत्या करना था, पर सिविल सोसायटी के पांच लोग संसद पर जो हमला कर रहे हैं वो उस आतंकी हमले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि इनका मकसद देश के लोकतंत्र की हत्या करना दिखाई दे रहा है। जब भी मैं ऐसा कहता हूं तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी मोर्चा संभाल लेते हैं और मुझ पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगाकर गंभीर मसले से जनता का ध्यान हटाने की साजिश करते हैं। अब आप ही बताएं कि सांसदों पर दबाव बनाया जा रहा है कि जो अन्ना कहें, संसद के भीतर उन्हें वही बोलना है, अगर वैसा नहीं बोला गया तो उस सांसद के घर के बाहर धरना शुरू हो जाएगा। यानि सांसद को देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में टीम अन्ना का बंधक बना रहना होगा।

मैं हैरान हूं आज तमाम बुद्धिजीवी अन्ना के आँदोलन  की तुलना उन देशों से कर रहे है, जहां किसी तानाशाह शासक का राज चल रहा है, वहां ना चुनाव होते हैं ना लोगों के नागरिक अधिकारों की रक्षा होती है। 30- 40 साल से कोई एक शख्स ताकत और पैसे के बल पर राज कर रहा है, ऐसे में एक ना एक दिन जनता का गुस्सा सड़कों पर आना ही था। अन्ना के सम्मान में तर्क दे रहे है कि ये आंदोलन कितना शांतिपूर्ण है, एक भी पत्थर नहीं चला। जबकि दूसरे मुल्कों के आंदोलन में कितना खून खराबा हुआ। अब इन्हें कौन बताए दूसरे मुल्कों में तानाशाह शासक हैं जो अपने ही देश के लोगों पर गोली बारी करा रहे थे, इसके जवाब में आंदोलनकारियों ने भी पत्थरबाजी और गोलीबारी की। यहां सरकार ने भी तो संयम बरता है, वरना जिस तरह से मंच से भड़काऊ भाषण देकर जनता को उकसाने की कोशिश हो रही है, अगर सरकार सख्ती करे, तो आंदोलन की सूरत यहां भी बदल सकती है। आंदोलन के शांतिपूर्ण होने का क्रेडिट अन्ना से ज्यादा सरकार को दिया जाना चाहिए। अन्ना के मुकाबले जेपी आंदोलन पर भी कीचड़ उछालने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि उनके आंदोलन के दौरान देश में हिंसा हुई। मुझे लगता  है कि उस  दौरान आंदोलन को ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश हुई,  जिससे जनता में भी आक्रोश भड़का और कई जगह हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की वारदातें हुईं।

जेपी आंदोलन आखिर में एक राजनैतिक आंदोलन बन चुका था, उन्हें लगने लगा था कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के लिए जरूरी है कि राजनैतिक विकल्प भी खड़ा किया जाए। इसके बाद लोकनायक ने एक मजबूत विकल्प भी दिया। आज अन्ना कहां खड़े हैं अभी तक साफ नहीं है। यानि " ना ही में, ना सी मैं, फिर भी, पांचो उंगली घी में "। पर्दे के पीछे  से सियासी लड़ाई नहीं लड़ी जाती। अगर वाकई मैदान में हैं और राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सरकार को घेरना चाहते हैं, साफ कहना चाहिए। जिस जंतर मंतर से कुछ महीने पहले  राजनेताओं को खदेडा गया, फिर उन्हें उसी मंच पर स्थान देने के लिए टीम अन्ना क्यों इतनी उतावली दिखी। क्या देश  के लोगों पर से उसका भरोसा खत्म हो गया है। वैसे टीम अन्ना को पता था कि उनके मंच पर यूपीए के घटक दलों से तो कोई शामिल होगा नहीं, अच्छा मौका है जंतर मंतर पर विपक्ष को बुलाकर सरकार की किरकिरी कराई जाए, लेकिन ये दांव भी उल्टा पड़ गया। यहां बीजेपी नेता अरुण जैटली ने भले ही अन्ना की मांगो का समर्थन किया, लेकिन लेफ्ट नेता ए वी वर्धन ने टीम अन्ना को  खूब खरी खरी सुनाई।

बहरहाल बीजेपी और उनके सहयोगी दलों को ये बताना चाहता हूं कि आप राजनीति तब करेंगे जब देश बचेगा, जब संसद और उसकी मर्यादा बची रहेगी। आज संसद की सर्वोच्चता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है। क्या हम मान लें कि कुछ लोग सड़क पर मसौदा तैयार कर सरकार पर दबाव बनाएं कि इसे इसी रूप में कानून बनाया जाना चाहिए, क्या सरकार को ऐसी मांगे मान लेनी  चाहिए। मुझे लगता है कि ये तरीका तो अनुचित है ही, अगर ऐसा होता है तो देश में एक ऐसा गलत रास्ता खुल जाएगा, जिसे बाद में बंद करना मुश्किल होगा।
मेरा मानना है कि कमजोर नेतृत्व के चलते  सरकार हर गंभीर मसले पर घुटनों पर आ जाती है। अन्ना के आंदोलन से निपटने में सरकार फेल रही है। वैसे भी टीम अन्ना पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ये जो बातें करते हैं उस पर कायम नहीं रहते। इसलिए अगर सरकार सख्त रहती, तो रास्ता ये निकलता कि सिविल सोसायटी के ही कुछ लोग बातचीत का प्रस्ताव लेकर  सरकार के पास आते। सच तो ये भी है कि जिन लोगों से सरकार की बात हो रही थी, वो इसके काबिल नहीं थे। वरना प्रधानमंत्री के पत्र के बाद पहले तो अन्ना ने अनशन खत्म किया, फिर पूरे देश में जीत का जश्न मनाया गया। इस बीच ऐसा क्या हो गया जिससे टीम अन्ना लोकसभा उप चुनाव में हिसार जाकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध करने लगी। यूपी के कई शहरों में जाकर कांग्रेस के खिलाफ बात की गई।

इस सवाल पर  टीम अन्ना का जवाब होता है कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है, वो चाहे तो जनलोकपाल बिल पास करा सकती है। टीम अन्ना को कौन समझाए कि  खुदरा व्यापार में प्रधानमंत्री एफडीआई के पक्ष में थे, लेकिन उनके सहयोगी और विपक्ष के तीखे विरोध के चलते ये बिल संसद में पास नहीं हो सका। हमारे देश के लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। अगर सरकार चाह कर भी एफडीआई नही पास करा पाई तो वो जनलोकपाल बिल कैसे पास करा सकती है ? तमाम घटनाक्रम को देखने से साफ हो जाता है कि टीम अन्ना इस  ड्रामें की पात्र भर है, इनकी स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जाती है। टीम अन्ना लोगों को किस कदर गुमराह करती है, इसे भी  समझना जरूरी है। स्थाई समिति की रिपोर्ट का माखौल उड़ाते हुए कहा गया कि कमेटी में कुल 30 लोग हैं, जिसमें दो सदस्य कभी आए नहीं। 17 लोगों ने विरोध किया, जबकि सात कांग्रेस  के अलावा लालू यादव और अमर सिंह जैसे 11 लोगों ने मिलकर देश के कानून का मसौदा तैयार कर दिया। टीम ने कहा कि सिर्फ 11 लोग देश का कानून कैसे बना सकते हैं? मैं पूछता हूं, कि चलो वो तो 11 लोग थे, लेकिन आप तो सिर्फ पांच लोग ही हैं जो 121 करोड़ जनता के लिए कानून अपने मनमाफिक बनवाने पर आमादा हैं।
बहरहाल मैं चाहता हूं कि स्थाई समिति की प्रक्रिया की संक्षेप में जानकारी लोगों को होनी ही चाहिए। इस मसौदे में कुल लगभग 24 प्रस्ताव हैं। जिन 17  लोगों ने डिसेंट नोट (असहमति पत्र) दिया है,  उसका ये मतलब नहीं है कि उन्होंने कमेटी के पूरे मसौदे को ही खारिज कर दिया है। आमतौर पर कोई सदस्य किसी एक प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, किसी को दो पर आपत्ति होती है, कुछ को तीन चार पर भी आपत्ति हो सकती। इससे ये नहीं समझना चाहिए कि सदस्यों  ने पूरा मसौदा ही खारिज कर दिया, चूंकि इस मामले में गलत संदेश लोगों को देने की कोशिश हो रही है, लिहाजा इस पर चर्चा जरूरी थी। एक बात और की जा रही है कि प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया था कि निचले स्तर के अधिकारियों कर्मचारियों को लोकपाल  के दायरे में लाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब टीम अन्ना लोगों मै कैसे जहर घोलती है, ये देखें। प्रधानमंत्री के पत्र में साफ किया गया था कि निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों को उपयुक्त तंत्र के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास किया जाएगा। अब सरकार ने सीवीसी को उपयुक्त तंत्र माना है, तो ये कैसे कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जो आश्वासन दिया था, उसे पूरा नहीं किया।

टीम अन्ना की मांगे बेतुकी भी हैं। वो कह रहे हैं सीबीआई को जनलोकपाल के अधीन कर दिया जाए। अब आप बताएं सीबीआई क्या केवल भ्रष्टाचार की ही जांच करती है? अरे सीबीआई के दायरे में दुनिया भर के अपराध शामिल हैं। कई बार हत्या और  बलात्कार जैसी घटनाओं की भी जांच सीबीआई करती है। ऐसे में जनलोकपाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कैसे केंद्रित हो सकता है। जब ये सवाल उठा तो कहा गया कि पूरी सीबीआई को ना दें, आर्थिक मामलों  की जांच करने वाली टीम को लोकपाल के दायरे में कर दिया जाए। अब टीम अन्ना की ऐसी बातों से लगता है कि वो महज विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। मैं एक वाकया बताता हूं, यूपी के स्वास्थ्य विभाग में करोडो का घोटाला हुआ, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। इसमें गिरफ्तार एक स्वास्थ्य महकमें  के अफसर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जहां बाद में उसकी संदिग्ध हालातों में मौत हो गई। अब क्या एक ही मामले में आधी जांच लोकपाल और आधी जांच कोई अन्य विभाग करेगा ?

क्या होना चाहिए, क्या नहीं, ये सब जानते हैं। सभी को पता है कि देश में 121 करोड़ की आबादी को किसी कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। जब तक लोग खुद नैतिक नहीं होंगे,  तब तक ईमानदारी की बात करना बेमानी है। अन्ना का आंदोलन पूरी तरह राजनैतिक आंदोलन  है और इससे राजनैतिक आंदोलन की तरह ही निपटा जाना चाहिए। सरकार जितना घुटना टेकेगी, टीम अन्ना एक के बाद एक मुद्दे पर ऐसे  ही सरकार को घुटनों पर लाने की कोशिश करेगी, क्योंकि इस आंदोलन के पीछे की कहानी कुछ और ही है।

Saturday, 10 December 2011

जर्नलिस्ट तो ठीक है, पर करते क्या हैं ?

मौका खुशी का है, सोच रहा हूं कि आज अपने ब्लाग परिवार से खुल कर बातें करूं। आमतौर पर हमेशा दूसरों की बातें करता रहा हूं, लेकिन आज सिर्फ अपनी ही करुंगा। हां ये बता दूं कि जो बातें मैं आज करुंगा उसे आप कत्तई आधा सच न समझे, ये पूरा सच है। मित्रों कल सु बह यानि 11 दिसंबर मेरे लिए क्या परिवार के लिए खास दिन है, क्योंकि 17 साल पहले आज ही के दिन लखनऊ में हम विवाह बंधन में बंध गए थे। 17 साल पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता ही नहीं कि हम कितना सफर तय कर चुके हैं, सच कहूं तो लगता है कि सब कुछ कल ही की तो बात है।

मेरी शादी जिस दौर में हुई सच बताऊं तो उस समय किसी भी माता-पिता को अपनी बेटी की शादी किसी पत्रकार से करने में वो खुशी नहीं होती थी, जो खुशी उन्हें सरकारी महकमें के बाबू से करने में मिलती थी। या ये कह लें कि हाईस्कूल के बाद पालिटेक्नीक किया लड़का जो जेई हो जाता था, या फिर हाईस्कूल पास रेलवे में टिकट कलेक्टर बन जाते थे, पत्रकारों के मुकाबले लड़की वाले जेई और टीसी को ज्यादा बेहतर मानते थे। एक वाकया बताता हूं। 1991-92 में लोग मेरी शादी के लिए घर आने लगे थे। एक साहब वाराणसी से मेरी शादी के लिए पापा के पास आए, बातचीत शुरू हुई। उन्होंने पहला ही सवाल पापा से पूछ लिया " जी लड़का करता क्या है ? पापा ने जवाब दिया कि वो जर्नलिस्ट है। वो बोले ये तो ठीक है, पर करता क्या हैं। मतलब उस दौरान जर्नलिज्म को कुछ करना माना ही नहीं जाता था। लोगों को ये भी पता नहीं था कि भाई पत्रकार भी नौकरी करते हैं और उन्हें भी हर महीने वेतन मिलता है।

हकीकत ये है कि उस दौरान लोग बहुत ज्यादा घूमने फिरने में भरोसा नहीं रखते थे, लोगो को अपने जिले और आस पास के अलावा कोई खास जानकारी भी नहीं होती थी। हमलोग मिर्जापुर के रहने वाले हैं, यहां दैनिक जागरण और आज अखबार का बोल बाला था।  अब साल तो मुझे ठीक ठीक नहीं याद है, पर मुझे लगता है कि ये बात 1992 की होगी। मैं बरेली में दैनिक जागरण अखबार में उप संपादक/ संवाददाता के पद पर तैनात था। मेरी शादी भी लगभग पक्की हो चुकी थी। इसी बीच मुझे अमर उजाला अखबार में बेहतर पैकेज मिला तो मैने वहां ज्वाइन कर लिया।  इसका नतीजा ये हुआ कि  मेरी तय हुई शादी सिर्फ इसलिए टूट गई, क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को अमर उजाला अखबार के बारे में जानकारी ही नहीं थी। उन्हें लगा कि पता नहीं किस अखबार में चला गया,  दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग अमर उजाला अखबार को जानते ही नहीं थे। मुझे और मेरे मित्रों को जब इस बात की जानकारी हुई तो हम बहुत हंसे..।

चलिए अब सीधे 11 दिसंबर 1994 पर आ जाते हैं। उस दौरान मैं अमर उजाला मुरादाबाद में तैनात था। हमारे ससुर जी सिचाई विभाग में इंजीनियर और सासू मां सरकारी स्कूल में टीचर। वैसे ससुर जी  तो पहले एक कस्टम इंस्पेक्टर से शादी की बात चला रहे थे। उनकी कई दौर की बात हो चुकी थी, पर शादी मंहगी पड़ रही थी। मुझे तो शादी के बाद मैडम ने ही बताया कि लड़के वालों ने सभी बारातियों के लिए अंगूठी की मांग रख दी, और इस मांग से वो पीछे नहीं हटे, लिहाजा बात आगे नहीं बढ पाई। फिर घर में सोचा गया कि चलो जर्नलिस्ट को ही टटोल लेते हैं। अब 17  साल पुरानी बात हो गई, इसलिए कोई इस बात से सहमत नहीं होगा, पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी शादी इसलिए तो बिल्कुल ही नहीं हुई कि लड़का जर्नलिस्ट है। अगर ऐसा होता तो मैं जहां काम कर रहा था, वहां एक बार कोई ना कोई ससुराल से जरूर आता। हां एक दिन जब मैं शाम को आफिस पहुंचा तो मुझे गेटमैन ने जरूर बताया कि भाईसाहब आज एक सिचाई विभाग से कोई आदमी आया था, जो आपके बारे में बहुत जानकारी कर रहा था। मैने उसे सब बढिया बढिया बताया है। उसी ने कहाकि शायद आपकी शादी के लिए पूछताछ कर रहा होगा।  वैसे ये बात  तो यहीं खत्म हो गई,  पर शादी के बाद पता चला कि मुरादाबाद में मेरे ससुर के एक सहायक थे, जिन्होंने मेरे बारे में प्राथमिक जानकारी उन्हें मुहैया कराई थी।

खैर मुझे तो लगता है कि वो यहां सिर्फ ये जानना चाहते होंगे, जिस लड़के से शादी के बारे में बातचीत चल रही है, वो वाकई मुरादाबाद में है भी या नहीं। इतना ही मतलब रहा होगा। मेरा मानना है कि मेरी शादी की दो वजहें थीं, एक तो ये  कि मेरे जीजा जी के छोटे भाई की शादी मेरी मैडम की बड़ी बहन से हुई है। इससे दोनों परिवार एक दूसरे को ठीक ठीक जानते समझते थे। दूसरा ये कि हमारे यहां खेती बारी ठीक ठाक है।  वैसे अच्छा तो ये है कि  इस बात को यहीं खत्म कर दिया जाए, बेवजह मैं मैडम को नाराज नहीं करना चाहता, क्योंकि हमारे विवाह की सालगिरह 11 दिसंबर को और  अगले ही दिन यानि 12 दिसंबर को  मैडम का जन्मदिन भी है, बेहतर ये होगा  कि सबकुछ  ठीक ठाक रहे जिससे दोनों दिन हम साथ साथ कहीं बाहर जाकर डिनर कर सकें।

  अच्छा फिल्मों ने भी पत्रकारों की इमेज कुछ इसी तरह की बना रखी थी। पत्रकार का नाम सुनते ही लोगों के मन में जो तस्वीर बनती थी वो बहुत डरावनी होती थी। यानि एक ऐसे  युवक की जो महीनों बिना नहाए, चेहरे पर उलझी दाढ़ी़, बेतरतीब बाल, एक उद्धत हो चुकी जींस, गंदा कुर्ता, लंबा झोला और कुल्हापुरी चप्पल पहन कर साईकिल से चला जा रहा है, लेकिन उसे जाना कहां ये भी इस नौजवान को पता नहीं हैं। हां मैं ये नहीं कहता की जो तस्वीर बनाई गई थी वो गलत थी, सच्चाई ये थी कि जींस और कुर्ते में हम खुद को कम्फरटेबिल समझते थे। दरअसल कल और आज मे फर्क भी बहुत है। उस दौर में पत्रकारों को पड़ी लकड़ी उठाने की आदत होती थी। यानि हम अगर सरकारी अस्पताल पहुंच गए और देख लिया कि कोई मरीज कराह रहा है और उसे देखने वाला कोई नहीं है। तो हम पूरे अस्पताल की चूलें हिला दिया करते थे। एक एक्टिविस्ट की तरह हम काम करते थे, पहले मरीज के बेहतर इलाज के लिए संघर्ष फिर दफ्तर पहुंच कर रिपोर्ट लिखते थे। अब ऐसा नहीं है, अब तो पत्रकार महज रिपोर्टर बनकर रह गए हैं। वो सिर्फ रिपोर्ट लिखते हैं।

वैसे पत्रकारों का पहनावा ठीक होने की एक बडी वजह महिलाएं भी हैं। मै अखबार का जिक्र नहीं करूंगा, लेकिन बताऊं कि मेरे  आफिस में रिसेप्सनिस्ट के पद पर एक लड़की की तैनाती हो गई। हफ्ते भर के भीतर ही आधे से ज्यादा लोगों ने शेविंग करनी शुरू कर दी। हम पत्रकारों में नए कपड़े खरीदने का चलन ही नहीं था। हम तीन चार दोस्त एक कमरे में रहते थे, कुछ कपडे़ खरीदे जाते थे, और ये कपडे किसी एक के नहीं होते थे। जिसे जो जी में आया पहन कर चला जाता था। पर इस लड़की ने हमें ब्रीफकेश खरीदने को मजबूर कर दिया, क्योंकि फिर सबके अपने अपने कपड़े हो गए जो ताले वाले ब्रीफकेश में रखे जाने लगे। एक बार अखबार के डायरेक्टर यानि मालिक का आना हुआ, वो लोगों का बदला हुआ ये रूप देखकर हैरान रह गए। उन्होंने मैनेजर से पूछा ये माजरा क्या है, सब के सब अप टू डेट कैसे हो गए। जवाब आया रिसेप्सन पर लड़की की तैनाती इसकी मुख्य वजह है। मैनेजर इस बात से भी परेशान थे के लोग एक बार मैनेजर से हैलो हाय भले ना करें, पर रिसेप्शन पर जरूर करते थे।

बहरहाल हमारे डायरेक्टर खुश हुए और उन्होंने सभी स्टाफ को रेमंड का कोट गिफ्ट किया, लेकिन इसके साथ ये शर्त रखी गई कि लोगों को आफिस कोट टाई में आना होगा। सभी ने कहा बिल्कुल, हम जरूर पहना करेंगे। लेकिन हमारे एक मित्र कौशल किशोर आफिस से देर रात घर के लिए निकले। कोट टाई पहने कौशल को मुहल्ले का कुत्ता पहचान नहीं पाया और काट लिया। बात मालिक तक पहुंची और कोट टाई की अनिवार्यता खत्म हो गई।
समय कैसे बदलता है, आज देखिए, जो जर्नलिस्ट कभी शादी के लिए लोगों की प्राथमिकता में नहीं थे, आज तमाम बडे बडे अफसर लाखों रुपये खर्च कर अपनी बेटी को जर्नलिज्म का कोर्स करा रहे हैं। देश में मास कम्यूनिकेशन हजारों कालेज खुल गए हैं। लगभग सभी विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढाई शुरू हो गई है, मेरिट इतना हाई है कि अच्छे संस्थान में लोगों को दाखिला नहीं मिल रहा है। अब अखबार का दफ्तर हो या फिर न्यूज चैनल, सभी जगह लड़कियों की अच्छी खासी संख्या है। सच तो ये है कि अब शादी के लिए जर्नलिस्ट भी लोगों की प्राथमिकता में आ गए हैं। बहरहाल पत्रकारों को समाज की स्वीकार्यता मिल गई, मुझे लगता है कि ये पत्रकारों की काम की वजह से हैं। बहरहाल बात बेवजह की लंबी हो गई, मैं तो बस अपनी शादी की सालगिरह को यादगार बनाने के लिए पुरानी बातों को याद करने लगा। एक एक बात याद इसीलिए है, कि मुझे लगता ही नहीं कि हमने लंबा सफर तय किया है, मेरे हिसाब से ये सब कुछ दिन पहले की बात है।


चलते - चलते
आखिर में एक बात और । जनवासे से बारात के रवाना होने के पहले मैने बैंड बाजा  के मास्टर को बुलाया और उसे समझाया कि देखो भाई मुझे दो गानों से बहुत परहेज है और आप इस बात का ध्यान रखें कि पूरे रास्ते ये गाना बजना  नहीं चाहिए। एक गाना है आज मेरे यार की शादी है और दूसरा ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश के यारों.......। सब कुछ ठीक चल  रहा था, लेकिन जैसे ही बारात दरवाजे पर पहुंची और मैं कार से नीचे  उतर रहा था, तभी बैंडवालों  से रहा नहीं गया और ये गाना बजा ही दिया कि ये देश है वीर जवानों का....... । खैर अब मैं कुछ नहीं कर सकता था ।

 
 
   

Monday, 5 December 2011

ईमानदार आदमी समझदार भी हो जरूरी नहीं ...

अन्ना एक बार  फिर सरकार से दो दो हाथ करने के मूड में हैं । धमकी दे रहे हैं कि अब की निर्णायक लड़ाई  होगी यानि  आर पार की । अब निर्णायक लड़ाई  का क्या मतलब है ? क्या जनलोकपाल  कानून  की अधिसूचना रामलीला मैदान  से  खुद जारी कर देगें ? कुछ बोलना है, क्या बोलना है, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है ।  दरअसल अन्ना ईमानदार है, उनकी ताकत भी यही ईमानदारी है । अब ये तो जरूरी नहीं है ना कि ईमानदार आदमी समझदार भी होगा । बस  समझदारी से काम ना लेना  यही उनकी  सबसे बडी कमजोरी है । 

अब देखिए सड़क पर उतरने वाली भीड़ को अन्ना अपना समर्थक मानते हैं,  उन्हें  लगता है कि उनकी आवाज पर  ये भीड़ सड़क पर  आ  जाती है, पर ऐसा है नहीं । दरअसल इस भीड़ का दुश्मन नंबर एक कौन है ? आप बता सकते हैं ? चलिए मैं बताया हूं। इस सवाल का सिर्फ एक जवाब है वो है राजनेता । क्योंकि  लोग जब देखते हैं पहला चुनाव लड़ने के दौरान जिस नेता की हैसियत महज एक 1974 माडल जीप की थी, आज वो कई एकड़ वाले रिसार्ट, आलीशान बंगला, फरारी, पजीरो और होंडा सिटी कार का मालिक कैसे बन गया । नेताओं के बच्चे कैसे विदेशों में पढाई करने के साथ ही मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ओहदे पा गए । जाहिर है नेताओं  के आचरण से नाराज जनता सड़कों पर  उतर रही है और  ये नाराजगी किसी एक  पार्टी से नहीं  है बल्कि पूरी व्यवस्था से है ।

वैसे मेरा सवाल अन्ना से भी है, क्योंकि मै जानता हूं कि एक संवेदनशील मुद्दे को आगे रख कर आंदोलन खडा करना आसान है, पर उसे समेटना बहुत मुश्किल , लोगों को सड़क पर लाना आसान है, वापस घर भेजना मुश्किल है, लोगों को एक बार भड़काना तो आसान है, पर भड़के लोगों को समझाना बहुत मुश्किल । अन्ना क्या मांग रहे हैं, जनलोकपाल कानून । यानि एक ऐसा कानून जिसमें भ्रष्ट्राचारियों को सख्त और जल्दी सजा मिले। जनलोकपाल  कानून मे  प्रधानमंत्री और सर्वोच्च  न्यायालय के जजों  को भी शामिल करना चाहते हैं ।  अन्ना अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सरकारी लोकपाल जिसे आप सड़कों पर फूंकते फिर रहे हैं, वो भी कम नही है । मै एक उदाहरण देता हूं आपको । सूचना के अधिकार कानून में पीएमओ समेत कई और मंत्रालयों को इससे अलग रखा गया है, तो क्या आपको लगता है कि सूचना का अधिकार कानून बेकार है ? बिल्कुल नहीं । ग्रुप सी  के कर्मचारियों को इसमें शामिल करने की बात की जा रही है ।  क्या आप मानते हैं कि नेता और अफसर ईमानदार होगा तो कर्मचारियों की इतनी हैसियत है कि वो बेईमानी कर सकते हैं । ऐसे  में  ग्रुप सी 57 लाख  कर्मचारियों को अगर इसके दायरे में लाया गया तो बेवजह  लोकपाल पर  काम का इतना बोझ  हो जाएगा कि इसकी गुणवत्ता प्रभावित होगी। 
 
अन्ना आए दिन  अनशन की धमकी देकर  संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं । मेरा मानना  है कि आपका मुद्दा तो एक बार सही हो सकता है, पर तरीका बिल्कुल गलत है ।  ये बात  तो टीम अन्ना भी जानती है कि  देश में कोई भी कानून जंतर मंतर या रामलीला मैदान में नहीं बन सकता । इसके लिए तो संसद की ही शरण लेनी होगी । अब आपने पहले तो नेताओं को जंतर मंतर से  खदेड़ दिया ।  उस  समय आपने सोचा कानून जंतर मंतर पर ही बन जाएगा ।  लेकिन इसके कुछ दिन बाद आप कांग्रेसियों के झांसे में आकर उनके साथ गलबहियां करने लगे । मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि  आज टीम अन्ना को  ये दिन नहीं देखना पडता अगर उन्होंने  थोडा  सूझ बूझ के साथ काम लिया होता । अब अन्ना को कौन बताए कि ये महाराष्ट्र नहीं दिल्ली है । यहां राज ठाकरे नहीं, उनके पिता जी बैठे हैं । अगर आपने ड्राप्टिंग कमेटी के गठन के दौरान व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को अलग कर देश हित में सोचा होता तो आज ये हालत ना होती । आपको सिर्फ इतना करना था कि कमेटी में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को प्रतिनिधित्व देने की मांग करते, तो  यहीं सबके पत्ते खुल जाते और आपको एक एक नेता दरवाजे पर मत्था टेकना नहीं पडता, लेकिन ऐसा करने से आपके सहयोगियों की कीमत कैसे बढती, उन्हें तो सरकार के मंत्रियों के साथ मीटिंग कर  अपना कद बढ़ाना था ।

हम सब अन्ना में गांधी की तस्वीर देखते हैं । लेकिन जब अन्ना भ्रष्टाचारियों को  फांसी देने की मांग करते हैं  तो हमें लगता है कि ये गांधी  की गलत छवि  देश में प्रस्तुत कर रहे हैं ।  सच तो ये है कि  देश में  भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पर्याप्त कानून है, बशर्ते उस पर सख्ती से अमल हो । आप देखें कानून की वजह से ही तो ए राजा, सुरेश कलमाडी जेल में है । यहां तक की राजकुमारी की तरह जिंदगी जीने वाली कनिमोझी को भी  लगभग  छह महीने जेल की सलाखों के पीछे रहना पडा । बीजेपी के मुख्यमंत्री वी एस यदुरप्पा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्वाण को भ्रष्टाचार में शामिल होने की वजह से ही कुर्सी गंवानी पडी ।  कोई जनलोकपाल कानून की वजह से ये जेल नहीं  गए थे ।

मुझे तकलीफ होती है जब संसद की  गरिमा के खिलाफ कोई बात होती  है । देश की खूबसूरती  ही ये है कि यहां  संसदीय  परंपरा  आज भी मजबूत है और देशवासी इसका सम्मान करते हैं ।  मैं तो इस आंदोलन को संसद पर  हमला करने के बराबर  मानता हूं ।  मुझे लगता है कि आखिर कितने हमले झेलेगी ये पर्लियामेंट । एक बार 13 दिसंबर 2001 को पांच आतंकी सीमापार से हथियारों से लेस होकर यहां घुस आए । वो तो इस संसद को लहुलुहान कर देना चाहते थे और यहां एक ऐसी काली इबारत लिखना चाहते थे, जो धब्बा हम जीवन भर ना धो  सकें। लेकिन हमारे बहादुर सिपाहियों ने उन पांचो को मार गिराया और संसद भवन के भीतर भी घुसने नहीं दिया ।
आज 10 साल बाद एक बार फिर संसद पर हमला हो रहा है ।  हालाकि ये कोई आतंकी  हमला नहीं  है, लेकिन  मैं इस हमले  को आतंकी हमले से ज्यादा खतरनाक  मानता हूं ।  इस हमले में किसी एक व्यक्ति या नेता की हत्या करना मकसद नहीं है । बल्कि इनका मकसद संसदीय परंपराओं और मान्यताओं की हत्या करना है । आज तमाम लोग भावनाओं में बहकर शायद उन पांच आतंकियों को ज्यादा खतरनाक कहें जो  हथियार के साथ संसद भवन में घुसे थे, लेकिन मैं उनके मुकाबले सिविल सोसाइटी के पांच लोगों को  ज्यादा खतरनाक मानता हूं । बस दुख तो ये है कि ये सीमापार से नहीं आए हैं, हमारे ही भाई है । लोकतांत्रिक व्यवस्था से भली भांति परिचित भी हैं, फिर भी देश के लोकतंत्र को कमजोर और खत्म करने पर आमादा हैं । अब संसद  के भीतर  सांसद निष्पक्ष होकर अपनी राय न रख पाएं तो फिर संसदीय प्रणाली  कैसे चल सकती है । बराबर धमकी दी जा रही है कि जो सांसद जनलोकपाल बिल का समर्थन  ना  करे , उसके घर के बाहर  धरना देना है । आखिर  टीम अन्ना  देश  को किस ओर  ले  जाना  चाहती है, क्या इससे देश में आराजकता का माहौल नही पैदा हो जाएगा ।

मुझे तो कई बार लगता है कि टीम अन्ना  ही अन्ना की दुश्मन  बन गई है । आपको पता है कि  एक भुट्टे को पैदा करने के लिए एक दाने को शहीद होना  पड़ता है । यानि जब एक बीज जमीन में डाली जाती है, तभी एक पूरा भुट्टा पैदा होता है । तो क्या सिविल सोसाइटी अन्ना  को शहीद होने का दाना समझ रही है । मैं मानता हूं कि प्रधानमंत्री सच्चे आदमी हैं, वो  झूठी बात जनता के सामने नहीं कह सकते । वजह उनकी बातों की और पद की एक मर्यादा है । टीम  अन्ना तो  कुछ भी कह सकती हैं । बताइये जिस देश का प्रधानमंत्री कह रहा हो कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो एक दिन में इसे खत्म कर दें । लेकिन अन्ना और टीम जिस तरह से बात कर रही है उससे लगता है कि जनलोकपाल बनते ही भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा । मैं  पूरे दावे  के  साथ कह सकता हूं  कि 121  करोड़ की आबादी को एक कानून में नहीं  बांधा जा सकता ।  देश में आज किस अपराध के लिए सख्त कानून नहीं है, फिर भी कौन सा अपराध देश में नहीं हो रहा है । मित्रों मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को हम सजा नहीं दे पा रहे हैं । संसद पर हमला करने का षडयंत्र करने वाला अफजल गुरू जेल मे वीआईपी सुविधा ले रहा है । और हम चोरों को फांसी देने की बात कर रहे हैं, ये बात कैसे किसी के गले उतर सकती है ।  सच तो ये है कि  सरकार अपराधियों को न्यायालय से मिली सजा पर अमल भर करने लगे, तो लोगों में कानून के प्रति सम्मान और भय पैदा होगा। बडे बडे भ्रष्टाचारी जेल जाने लगें और उनकी संपत्ति जब्त होने लगे तो  छोटे  कर्मचारी खुद ही रास्ते पर आ जाएंगे।

आज देश को  सोचना  होगा कि हम लोकतंत्र को कैसे मजबूत बनाए रखें ।  पडो़सी देश पाकिस्तान को ले लें, आज उसकी जो दशा है, इसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वहां आराजकता की मुख्य वजह ही  लोकतंत्र का कमजोर  होना । उसका रिमोट कंट्रोल पूरी तरह अमेरिका के हाथ में है । लोकतंत्र कमजोर होने से ही  नेपाल की अस्थिरता भी किसी से छिपी नहीं है । आज अन्ना का आंदोलन भी कहीं ना कहीं लोकतंत्र के लिए सबसे बडा खतरा है । संसद की सर्वोच्चता को  किसी भी सूरत में बरकरार  रखना ही होगा ।  यही   देश  के मजबूत  लोकतंत्र  की खूबसूरती रही है । मैं ये  नहीं कहता कि जनता को अपनी आवाज उठाने का हक नहीं है, जरूर उठाना चाहिए। लेकिन हमें ये भी देखना है कि कहीं संवैधानिक संस्थाओं का अस्तित्व खतरे में ना पड़ जाए। मैं फिर दावे के साथ कहता हूं कि भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए हमारे पास कानून की कमी नहीं है । उसका कड़ाई से पालन भर किया जाए तो बहुत कुछ समस्या का समाधान हो सकता है ।

मुझे इस बात पर भी आपत्ति है कि इस आंदोलन को आजादी की दूसरी लडाई कहा जाए । समझ लीजिए ये कह कर हम आजादी के लिए दी गई कुर्बानी और शहीद हुए लोगों को गाली दे रहे हैं । अन्ना खुद को गांधी कहे जाने पर गर्व जरूर महसूस करें, लेकिन मैं उन्हें गांधीवादी तो कह सकता हूं, पर दूसरा गांधी नहीं । जो लोग उन्हें दूसरा गांधी बोल रहे हैं, वो पहले गांधी को गाली दे रहे हैं । मुझे लगता है कि ये जिम्मेदारी अन्ना की है कि उन्हें दूसरा गांधी कहने वालों को रोकें ।  वैसे अगर देश आपको आपको गांधी कह रहा है, तो  आपकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ जाती  है, क्योंकि  आपने कुछ भी ऐसा वैसा किया, जो नहीं होना चाहिए तो आपका  कुछ नहीं होगा, हां गांधी के बारे में बच्चों  के बीच  गलत राय बनेगी । पिछले दिनों अन्ना ने भ्रष्ट लोगों को  फांसी देने की बात की, उन्होंने ये भी कहा कि गांधी के रास्ते बात ना बने तो शिवाजी का रास्ता अपनाना होगा। अन्ना को  तो पता होना चाहिए कि गांधी जी कहते थे कि कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा सामने कर दो ।  99  अपराधी  भले ही छूट जाएं, पर  एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी  चाहिए। पर आप तो कुछ भी बोल रहे हैं । इससे बच्चों में गलत संदेश जा रहा है ।
 अंदर की बात तो ये है कि भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की अऩ्ना की मांग पूरी हो जाए तो, कम से कम 10 हजार जल्लादों की भर्ती तत्काल करनी होगी, और इन्हें देश भर मैं तैनात करना होगा । इसके बाद हर जिले में कम से कम दो सौ लोगों को अगर रोजाना फांसी पर लटकाया जाए, और ये प्रक्रिया साल भर चलती  रहे, फिर भी हम देश को सौ फीसदी भ्रष्टाचारियों से मुक्त नहीं कर सकेंगे । देश में ऱिश्वतखोरों की पैठ बहुत गहरी है । जिस देश में मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए बाबू को पैसे देने पडें, जिस मुल्क में शहीदों के लिए खरीदे जाने वाले ताबूत में दलाली ली जाती हो, जिस मुल्क में सैनिकों को घटिया किस्म का बुलेट प्रूफ जैकेट देकर सीमा पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता हो, जिस देश में डाक्टर चोरी से मरीज की किडनी निकाल लेते हों, जिस देश शहीदों की विधवाओं के लिए बने फ्लैट पर सेना के अफसर और नेता कब्जा जमा लेते हों, उस देश को पूरी तरह  ईमानदार बना देना इतना आसान है क्या?

आइये  थोड़ी चर्चा  संसदीय कार्यप्रणाली की भी कर लें । क्योंकि सब कुछ जानते हुए भी देश की आंख में धूल झोंका जा रहा है ।  यहां यह बताना जरूरी है कि जब किसी मसले पर एक बिल संसद में पेश किया जा चुका हो, तो फिर उस पर संसद में किसी तरह की चर्चा नहीं की जा सकती । इससे स्थाई समिति जो एक संवैधानिक संस्था है, उसकी गरिमा गिरती है । गरिमा को छोड भी दें तो ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है । क्योंकि बिल को अंतिम रूप देने का अधिकार स्थाई समिति को ही है । बहरहाल संसद  में जनलोकपाल बिल के प्रस्ताव पर  एक  दिन की पूरी बहस में ये तो साफ हो गया कि ज्यादातर लोग जनलोकपाल बिल का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन प्रस्ताव का समर्थन करने का यह मतलब कत्तई नहीं की, ये लोकपाल बिल का भी समर्थन करेंगे । चर्चा के दौरान लालू यादव के बयान पर ध्यान देना जरूरी  है, उन्होंने साफ कहा था कि सभी दल  संविधान के तहत काम  करने की बात कर  रहे हैं,  लेकिन  ये जवाब कौन देगा कि संविधान  के तहत तो ये चर्चा  हो ही नही सकती, क्योंकि इससे संबंधित  बिल स्थाई समिति में विचाराधीन है ।
वैसे सरकार और सिविल सोसायटी दोनों ही जानते थे कि संसद में जो चर्चा हो रही है, उसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि स्थाई समिति में इससे जु़डे चार बिल पहले से ही विचाराधीन हैं, और स्थाई  समिति को सभी बिलों को चर्चा के लिए सामने रखना  ही होगा । इसके अलावा स्थाई समिति में आम आदमी भी अपना सुझाव दे सकता है । यहां सभी सुझावों पर गुण दोष के आधार पर फैसला होता है । ऐसे में सदन में हुई चर्चा  सदन की समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ  नहीं थी ।  बस रामलीला मैदान में उपजे जनाक्रोश को शांत करने भर के लिए ये किया गया । स्वामी अग्निवेश की एक बात से तो मैं भी सहमत हूं कि जिस दिन संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर अन्ना से अनशन समाप्त करने की अपील की थी, उन्हें सदन की गरिमा का ध्यान रखते हुए अनशन  खत्म  करना चाहिए था । लेकिन अन्ना की टीम ने उन्हें समझाया कि प्रधानमंत्री के सैल्यूट से काम  नहीं बनने वाला है, सरकार को कुछ ठोस पहल करनी  ही होगी । दरअसल अन्ना को तीन दिन तक उनकी टीम ने सिर्फ अपनी "फेस सेविंग" के लिए भूखा रखा  और  संसद की गरिमा को भी तार  तार किया गया।  
रामलीला मैदान में अनशन कर रहे  अन्ना क्या मांग कर रहे थे । वो कह रहे थे कि संसद में जनलोकपाल बिल पेश किया जाए और उसे पास कर 30 अगस्त तक कानून बनाया जाए । उनकी ये बात पूरी नहीं हुई। फिर अन्ना ने 30 अगस्त तक कानून बनाने की बात छोड दी और कहा कि उनके बिल पर संसद में चर्चा की जाए और उस पर मतदान कराया जाए। लेकिन सरकार ने बिना किसी नियम के संसद में महज एक बयान देकर चर्चा की और कोई प्रस्ताव  भी पास नहीं किया । संसद में हुई चर्चा को एक तरह से “ सेंस आफ हाउस “ माना गया । इसके अलावा अन्ना ने कहा कि संसद मे सर्वसम्मति से बिल पास हो जाने पर वो अनशन तो तोड़ देगें लेकिन रामलीला मैदान में धरना जारी रहेगा । लेकिन हुआ क्या.. संसद में चर्चा के बाद अन्ना के पास कोई प्रस्ताव भेजने के बजाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पत्र लेकर विलासराव देशमुख पहुंचे और अन्ना को अनशन खत्म  कर दिया ।  उसके बाद  पूरा मामला स्थाई समिति को देखना था ।

सवाल ये है कि अन्ना खुद अपना जनलोकपाल बिल संसद की स्थाई समिति को सौंप आए थे । बाद में प्रधानमंत्री ने भी इसे स्थाई समिति को भेज दिया था । उस दौरान टीम अन्ना से कहा गया कि अब वो अपनी बात स्थाई समिति से करें । इसमें ऐसा क्या मिल गया था कि अन्ना और  उनकी टीम ने अनशन खत्म करते हुए इसे आधी जीत बताया । हालाकि आधी  जीत के मायने क्या हैं, ये अन्ना ही बता सकते हैं । मेरा मानना कि ना आधी  जीत होती है और ना आधी हार । लेकिन कुछ भी  हासिल  ना होने के बावजदू देश  भर में जीत का जश्न  मनाया गया ।  फिर  जीत के जश्न की खुमारी उतरी भी नहीं कि   इस टीम ने कांग्रेस से दो दो हाथ करने का ऐलान  कर दिया । हिसार में लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार में उतर आए । धमकी दी जा रही है कि उनके मुताबिक बिल पास  ना हुआ तो पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करेंगे । टीम का कहना था कि कांग्रेस  चाहे  तो बिल पास करा सकती है, इसलिए उसका विरोध किया जा रहा है । अगर ऐसा होता तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुदरा व्यापार के मामले एफडीआई को पास ना करा लेते । देश का  लोकतंत्र इसीलिए मजबूत है ।  फिर  एक ओर सरकार लगातार कहती रही कि शीतकालीन सत्र में बिल पेश  किया जाएगा, लेकिन सत्र का इंतजार किए बगैर सरकार के खिलाफ टीम अन्ना सड़कों पर आ गई । इससे इतना तो साफ हो गया कि टीम अन्ना के पीछे कुछ और  ताकतें भी काम कर रही हैं।

ईमानदारी की बात करने वाली  टीम अन्ना भी गंभीर आरोपों में घिर चुकी  है । प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल  भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल  रहे जनसमर्थन को अपना समर्थन समझने लगे हैं । उनकी हालत ये है कि सरकारी बकाए के भुगतान का चेक वो प्रधानमंत्री को  भेज रहे हैं । उन्हें लगता है कि पीएमओ में बकाए का भुगतान करने का काउंटर  खुला  है । दूसरी  सहयोगी  किरन बेदी पर  जिस तरह से एनजीओ के नाम पर पैसों की हेराफेरी के आरोप लगे हैं, वो  वाकई गंभीर है । मुझे लगता है कि एनजीओ को लोकपाल  के दायरे से बाहर रखने  की बात शायद इसीलिए की जा रही है,  कि ऐसे लोगों की दुकान चलती रहे ।        
बहरहाल मेरा  तो मानना है कि 121 करोड की आवादी वाले देश को किसी भी कानून में नहीं बांधा जा सकता । ईमानदारी के लिए लोगों में नैतिकता की जरूरत है और आज देश में कोई नैतिक नहीं रह गया । अन्ना खुद कहते हैं कि अगर जनलोकपाल बन गया तो आधे मंत्री जेल में होगे, ये सुनकर आप हैरत में पड जाएंगे कि अगर ईमानदारी से बेईमानों की पहचना की  गई तो सेना के आधे से ज्यादा बडे अफसरों को जेल भेजना होगा । आज जितनी भ्रष्ट हमारे देश की सेना है, उसका किसी दूसरे महकमें से कोई मुकाबला नहीं है । वैसे अन्ना  जी आपने लोगों से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर आंदोलन में शामिल होने को कहा था । सरकारी कर्मचारियों ने तो छुट्टी नहीं ली, सब काम पर रहे, पर मेरे  घर की बाई जरूर छुट्टी चली गई । इसलिए आपको लेकर घर में भी बहुत नाराजगी है । अन्ना पर  हंसी  भी आती है क्योंकि आज वो देश में ग्रुप  सी के 57 लाख कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग पर अड़े हैं और उन्हीं से छुट्टी लेकर  आंदोलन में शरीक होने की बात भी कह रहे हैं । ऐसी अपील तो अन्ना ही कर सकते हैं ।

इसी बीच अन्ना शराब बंदी का एक  नया राग अलापने लगे हैं । दिसंबर का महीना, ठंड भी  है । पुराने साल की बिदाई और नए साल की आगवानी देशवासी बिना शराब के कैसे करेंगे  ? सच में ये तो मुझे भी देखना है । वैसे मेरा  सुझाव है अन्ना को कि दिल्ली में शराब वगैरह की बात ना करें, यहां रामलीला मैदान में रोनक की एक खास वजह शराब भी है । ये बातें अपने गांव में ही  करें, यहां लेने के देने पड़ सकते हैं, पता लगा कि रात में आप और टेंट वाले ही मैदान में बचे  हैं ।  

Friday, 2 December 2011

राम तेरी गंगा मैली हो गई...

आज बात करुंगा भगवा पर लग रहे दाग की और वो ऐसे वैसे दाग की नहीं, बल्कि यौनाचार जैसे घिनौने कृत्य से लगे उस दाग की जिसे आसानी से धो पाना संभव नहीं है। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है स्वामी नित्यानंद की एक सीडी ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। इस सीडी में स्वामी नित्यानंद दक्षिण भारत की ही एक अभिनेत्री के साथ अश्लील हरकतें करते हुए कैमरे पर कैद हो गए थे। नित्यानंद की इस करतूतों से कई इलाकों में गुस्सा भड़का और लोग सड़कों पर आ गए। नित्यानंद आश्रम छोड़कर भाग निकले बाद में उन्हें हिमाचल से गिरफ्तार किया गया।

लेकिन इस ताजा मामले में कोई सीडी नहीं है, पर स्वामी की शिष्या ने ही थाने में जो रिपोर्ट दर्ज कराई है। उसमें स्वामी पर बलात्कार, अपहरण और गला दबाकर जान से मारने की बात कही गई है। अब इस स्वामी को भी जान लें, ये स्वामी कोई और नहीं बल्कि बीजेपी नेता, पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद हैं। इन पर गंभीर आरोप लगाने वाली इनकी ही शिष्या हैं, जिनका नाम है साध्वी चिदर्पिता। साध्वी बनने से पहले इनका नाम कोमल गुप्ता था। कोमल की बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। ये मां के साथ लगभग हर शाम मंदिर जाती थी। इसी बीच मां की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया और इन्हें भी वहां मां के साथ जाने का अवसर मिला। उसी समय कोमल गुप्ता का स्वामी चिन्मयानन्द से परिचय हुआ। स्वामी जी उस समय जौनपुर से सांसद थे। तब कोमल की उम्र लगभग बीस वर्ष थी। स्वामी को ना जाने कोमल में क्या बात नजर आई कि वे कोमल को संन्यास के लिये मानसिक रूप से तैयार करने लगे। मैं कह नहीं सकता कि कोमल नासमझ थी या वो सन्यास लेकर नई दुनिया में खो जाना चाहती थी। बहरहाल कुछ भी हो कोमल ने स्वामी की बातों में हामी भरी और सन्यास के लिए राजी हो गई। स्वामी चिन्मयानंद ने कोमल को दीक्षा देने के साथ ही उसका नाम बदल कर साध्वी चितर्पिता कर दिया। दीक्षा के बाद साध्वी का नया ठिकाना बना शाहजहांपुर का मुमुक्ष आश्रम। चिन्मयानंद ने साध्वी को दीक्षा तो दी पर उसके सन्यास की बात को टालते रहे। ऐसा क्यों, इस रहस्य से स्वामी और साध्वी ही पर्दा हटा सकते हैं।
वैसे स्वामी और साध्वी में अंदरखाने क्या संबध थे, इस पर तो ये दोनों ही बात करें तो ज्यादा बेहतर है। पर मैं कुछ बाते आप सबके साथ साझा करना चाहता हूं। पिछले साल की बात है, मेरे सास स्वसुर ने हरिद्वार में स्वामी जी के आश्रम में ही भागवत कथा का आयोजन कराया था। इस दौरान पूरे सप्ताह भर मैं भी परिवार के साथ इसी आश्रम में रहा। आश्रम खूबसूरत है, देवी देवाताओं की मूर्तियां से तो अटा पड़ा है, आश्रम के सामने से गंगा बह रही है। यहां स्वामी और साध्वी दोनों एक साथ निकलते हैं, तो लोग उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने को आतुर दिखाई देते हैं। देर रात में भी स्वामी इसी साध्वी के साथ टहलते दिखाई देते हैं। सप्ताह पर के प्रवास के दौरान कई बार उनके टहलने के दौरान मेरा आमना सामना हुआ। सर तो मैने भी झुकाया, पर इस जोड़ी के सामने सिर झुकाने में कभी श्रद्धा का भाव मन में नहीं आया। गंगा आरती के दौरान ये दोनों वहां मौजूद रहते थे, दोनों की आंखों में होनी वाली शरारत को कोई भी आसानी से पकड़ सकता था। बहरहाल ये सब मैं सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि मैने दोनों के आखों में होने वाली शरारत को कई बार पकडा।
साध्वी लगभग 10 साल से भी ज्यादा समय से स्वामी जी के साथ हैं, वो केवल उनकी आश्रम की ही साथी नहीं रही हैं, बल्कि स्वामी जी जब मंत्री थे तो ये उनकी पीए थीं और दिल्ली में ही रहीं थीं। साध्वी 24 घंटे स्वामी जी के साथ परछाई तरह रहती थीं। एक दुर्घटना के बाद स्वामी जी दिल्ली में भर्ती थे तो साध्वी ही उनकी सेवा में लगी थीं । सच तो ये है कि खुद स्वामी जी ने कभी ये नहीं सोचा होगा कि उन्हें अपनी इस शिष्या से अलग होना पड़ सकता है, क्योंकि स्वामी जी कि अगर कोई कमजोरी है तो वो है सिर्फ यही साध्वी। स्वामी ने उन्हें हरिद्वार, शाहजहांपुर और बद्रीनाथ के आश्रमों की व्यवस्था की पूरी  जिम्मेदारी सौंपी थी। शाहजहांपुर के कालेज की भी जिम्मेदारी खुद साध्वी उठा रही थीं।

ऐसे में बडा सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या कुछ हुआ जिससे साध्वी ने बलात्कार, अपहरण और हत्या का प्रयास जैसे संगीन धाराओं में स्वामी जी के खिलाफ मामला दर्ज कराया दिया। कितने समय से साध्वी आश्रम में हैं उनके ऊपर किसी और का ऐसा नियंत्रण भी नहीं है कि वो कहीं जाना चाहें तो ना जा सकें। ऐसे में अपहरण की बात कहना तो मुझे लगता है कि बेमानी है। सवाल उठता है कि अगर स्वामी ने उनकी मर्जी के खिलाफ उनके साथ शारीरिक संबंध बनाया तो उन्होंने ये बात पहले क्यों नहीं की। फिर साध्वी पहले अचानक आश्रम से भाग निकलीं, और उन्होंने शादी कर ली। अब तीन महीने गुजारने के बाद शाहजहांपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई। सवाल तो ये भी खड़ा हो सकता है कि जिस तरह से उन्होंने प्रेम विवाह किया है, इससे इतना तो साफ है कि आश्रम में रहते हुए भी उनका बाहरी दुनिया में कुछ चल रहा था, वरना शादी एक दिन में तो होती नहीं।

मैं चिन्मयानंद को कोई साफ सुथरा होने का सर्टिफिकेट नहीं दे रहा हूं। बल्कि मेरा तो मानना है कि इन जैसों को साधु, संत, स्वामी कहना ही गलत है। चिन्मयानंद स्वामी क्यों हैं ? स्वामी वाली उनमें क्या बात है?  सैकडों करोड की संपत्ति के स्वामी हैं, क्या कोई साधु संपत्ति जमा करता है ? चुनाव के दौरान हाथ जोड़कर लोगों से वोट मांगना ये साधु संतों का काम है। फिर स्वामी पर वैसे ही तमाम आरोप लगते रहे हैं, अब उनकी ही शिष्या ने स्वामी जी के चरित्र पर जिस तरह से सवाल उठाए हैं उससे तो उनकी रही सही भी खत्म हो गई है। स्वामी जी मैं तो आपसे यही कहूंगा कि फिलहाल ऐसा कुछ कीजिए जिससे भगवा वस्त्र की गरिमा बनी रहे। जिस तरह के सवाल आज आपसे किए जा रहे हैं उसके बारे में खुद मनन करें। देश के लोगों की आज भी आश्रमों, साधु, संतों में बडी आस्था है, इस आस्था को तार तार ना होने दें। ऐसा ना हो कि गंगा किनारे स्थित आपके आश्रम से ये गंगा मैली हो जाए।

साध्वी चिदर्पिता का भी साध्वी जीवन विवादों से भरा रहा है। कहा जा रहा है कि आपकी नजर स्वामी जी के करोड़ों के साम्राज्य पर थी। इसे ही हथियाने के लिए आपने ये छोटा रास्ता चुना और स्वामी जी के करीब आईं। यहां आपने साध्वी धर्म का कितना पालन किया ये तो आप ही बेहतर बता सकती हैं लेकिन आपकी रिपोर्ट से साफ हो गया है स्वामी ने आपके साथ बलात्कार किया। इससे जाहिर है कि आपके साध्वी होने पर प्रश्न खड़ा हो गया है। फिर मेरी एक बात समझ में नहीं आ रही है कि एक ओर आप स्वामी जी से सन्यास लेने की बात कर रही थीं, दूसरी ओर आपके मन में प्रेम भी पनप रहा था। ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हो सकती हैं। आपके साध्वी होने के बावजूद प्रेम का पक्ष इतना मजबूत था कि आपने आश्रम से भागकर शादी कर ली,जाहिर है कि आश्रम में रहने के दौरान आपका कुछ चल रहा था, वरना शादी तो एक दिन में नहीं होती है। ये तो खुद साध्वी कहती हैं कि मुझे स्वामी जी मारते पीटते रहे, लेकिन किस बात पर इसका खुलासा नहीं किया गया।
कहा ये जा रहा है कि अब साध्वी को लगने लगा था कि स्वामी जी को उसकी जरूरत है। स्वामी जी की तमाम इच्छाएं साध्वी के बगैर पूरी नहीं हो सकतीं थीं, साध्वी इसी का फायदा उठा रही थीं। उनकी महत्वाकांक्षा लगातार बढती जा रही थी । पहले तो उनका दबाव था कि स्वामी जी अपना उत्तराधिकारी उन्हें घोषित करें। उत्तराधिकारी भी सिर्फ आश्रम या स्कूल कालेज का ही नही बल्कि राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बनना चाहतीं थीं। उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा भी चिन्मयानंद से जाहिर की। इस पर स्वामी जी भड़क गए। उन्हें लगा कि ये साध्वी अब उन पर हावी होने की कोशिश कर रही है, लिहाजा उन्होंने जमकर फटकार लगा दी।
कहा तो यही जा रहा है कि इसके बाद ही साध्वी ने अलग रास्ता चुना। स्वामी के गुस्से से साफ हो गया था कि यहां से उनके हाथ कुछ लगने वाला नहीं है। उन्हें लगा होगा कि शायद यौन उत्पीड़न के आरोप से स्वामी जी घबरा कर उन्हें बुलाएंगे और कुछ समझौता होगा। पर स्वामी जी ने अभी तक नरमी के कोई संकेत नहीं दिए हैं और पूरी घटना को एक साजिश भर बता कर पल्ला झाड ले रहे हैं।
बहरहाल साधु संतों पर आए दिन अब यौनाचार जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। संतो को समझना होगा कि ऐसा वो क्या करें जिससे और कुछ ना सही लेकिन चरित्र पर धब्बा ना लगे। ये भगवा भी अगर दागदार हो गया तो समाज में लोगों का साधु संतो पर से भी भरोसा डिग जाएगा।