Tuesday, 11 October 2011

भाई सब गोलमाल है....


प्रधानमंत्री के लिए रथयात्रा...


लालकृष्ण आडवाणी की चिंता से जायज है, बताइये उन्हें लोग एक साजिश के तहत "ओवरएज" बताकर हाशिए पर डालने की कोशिश कर रहे थे। हालाकि कम लोग जानते हैं कि उनकी सेहत का राज ही पीएम इन वेटिंग कहा जाना है। अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के निशाने पर कांग्रेस है, उम्मीद की जा रही है कि अगले चुनाव में बीजेपी को कुछ फायदा मिल सकता है। वैसे तो ये कहना जल्दबाजी है, लेकिन सबकुछ ठीक रहा तो केंद्र में एक बार फिर बीजेपी की अगुवाई में सरकार बन सकती है। सरकार बनने की  गुंजाइश दिखाई दे रही है तो ना जाने कहां से युवा नेतृत्व की बात छेड़ दी गई। यही बात आडवाणी जी के गले नहीं उतर रही है।
संघ के दबाव में पहले उन्हें नेता विपक्ष का पद छोड़ने को कहा गया, हालांकि बहुत ही भारी मन से उन्होंने ये पद छोड़ा। मुझे लगता है कि उनके राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ा झटका ये होगा कि उनकी मौजूदगी में लोग प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम ले रहे हैं और मजबूरी में उन्हें भी सभी के हां में हां मिलाना पड़ रहा है। बस फिर क्या था आडवाणी को साबित करना था कि अभी उनमें राजनीति बची हुई है। इसके लिए वो एक बार फिर रथ पर सवार हो गए। यात्रा पर निकलने से ठीक पहले उन्होंने ये कह कर चौंका दिया कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा ये फैसला पार्टी करेगी। अब किसी में ये भ्रम नहीं होना चाहिए कि आडवाणी प्रधानमंत्री की दौड से बाहर हैं, क्योंकि जब पार्टी के सभी महत्वपूर्ण फैसले आज भी आडवाणी जी ही कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री के बारे में भला उनकी राय को कैसे अनदेखा किया जा सकता है। उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जो नरेन्द्र मोदी को बिहार में देखना नहीं चाहते, वो आडवाणी की रथयात्रा को हरी झडी दिखाने को तैयार हो गए। भइया ये राजनीति है, इसे समझने के लिए चाणक्य दिमाग की दरकार होगी।

राहुल बाबा मान जाओ...

ये आधा नहीं पूरा सच है कि राहुल गांधी अभी प्रधानमंत्री के लिए फिट नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंद की बात को भले ही कांग्रेस नेताओं ने खारिज कर दिया हो, पर मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूं कि राहुल गांधी अभी राजनीति के अमूल बेबी से ज्यादा कुछ नहीं  हैं। मुझे लगता है कि कांग्रेस इस समय जिस बुरे दौर से गुजर रही है, शायद ही इसके पहले कभी उसने ऐसा दिन देखा हो। इसमें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं। यूपीए चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया गांधी जब इलाज के लिए विदेश गईं तो उन्होंने सरकार और पार्टी के महत्वपूर्ण फैसले के लिए चार सदस्यीय टीम का गठन कर दिया।
इसी दौरान जनलोकपाल बिल को लेकर  अन्ना हजारे का हाई प्रोफाइल ड्रामा शुरू हो गया। कांग्रेस नेता एक के बाद एक गल्ती करते रहे, लेकिन ना ही राहुल की अगुवाई वाली पूरी टीम पर्दे से गायब रही। माना जा रहा था कि अगर राहुल इस मामले में आगे आते और कुछ ठोस पहल करते तो ये मामला पहले ही सुलझ सकता था, पर कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी का नतीजा ये हुआ कि अन्ना ने पूरी सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
सवाल ये है कि जब इस मामूली समस्या को सुलझाने में राहुल गांधी की ना ही कोई रुचि रही और ना ही उन्होंने इसके लिए कोई पहल किया। प्रधानमंत्री के तौर पर तो रोजाना इससे भी बडी मुश्किलों का सामना करना होगा। राहुल बाबा आप के लिए ये ठीक है स्कूली बच्चों और दलित गांव की महिलाओं के बीच रोटी सोटी तोड़ते रहिए। देश को संभालना ना आपके बस की बात है और ना ही आप की इसमें कोई रुचि दिखाई दे रही है। हां कांग्रेस नेता कैमरे पर होते हैं तो भले ही उन्हें आपमें प्रधानमंत्री के सभी गुण दिखाई देते हों, पर कैमरे के बाहर उन्हें भी पता है कि आप अभी इस पद के लिए बिल्कुल फिट नहीं हैं। वैसे ही मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस एक करीब दस साल पीछे चली गई है और अगर उसने आपको प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की तो पार्टी की केंद्र में वही दशा होगी जो देश के सबसे बडे राज्य यूपी में है।

अन्ना नहीं रहे वो अन्ना...

जी हां, जिस अन्ना को मैं जानता था, ये अन्ना अब वो अन्ना नहीं रहे। अन्ना ही नहीं उनकी पूरी टीम को लगता है कि अब वो देश से ऊपर हैं। यही वजह है कि लोग उन पर और उनकी टीम पर उंगली उठाने लगे हैं। जनलोकपाल में जैसे ही एनजीओ को शामिल करने की बात चली तो टीम अन्ना के तेवर कडे हो गए, अरे भाई ईमानदारी सिर्फ नेताओं में ही क्यों होनी चाहिए, सामाजिक कार्यकर्ताओं में ईमानदारी क्यों नही होनी चाहिए।
मेरे मन में एक सवाल है जो मैं टीम अन्ना से पूछना चाहता हूं। रामलीला मैदान में जो फैसला हुआ था कि जनलोकपाल बिल को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जाएगा, तो ऐसा क्या हो गया टीम अन्ना ने सत्र के पहले ही खुलकर कांग्रेस का विरोध शुरू कर दिया। मैं कहता हूं कि चलिए मान भी लिया जाए कि हिसार में अन्ना की टीम के विरोध से कांग्रेस चुनाव हार सकती है, तो इससे कौन पहाड टूट पडेगा। लेकिन टीम अन्ना ने ये भरोसा जरूर तोड़ दिया कि वो जो कहते हैं, उस पर अडिग नहीं रहते।
और अगर दबाव बनाने के लिए हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध हो रहा है तो जब रामलीला मैदान में अनशन के दौरान सरकार घुटनों पर थी, तो अनशन खत्म करके ढील क्यों दी गई। सरकार संसद में चर्चा कर ही रही थी, फिर क्यों नहीं कहा गया कि संसद का सत्र चल रहा है, हमें इसी सत्र में जनलोकपाल बिल चाहिए। इससे तो साफ लगता है कि अन्ना और उनकी टीम अब अपने को खुदा समझने लगी है, उन्हें लगता है कि देश में वो जो कर रहे हैं, वही ठीक है, बाकी सब गलत।
मित्रों मुझे लगता था कि जो अन्ना प्रधानमंत्री पर उंगली उठाते हैं और कहते हैं कि मनमोहन सिंह इमानदार हैं, लेकिन उनका रिमोट कहीं और है। सच कहूं तो मुझे भी यही लगता है कि अन्ना इमानदार हैं, लेकिन उनका रिमोट भी कहीं और है। जिस तरह से उनकी टीम ने तिरंगा लेकर खुलेआम एक पार्टी के उम्मीदवार का विरोध किया, उससे तो यही लगता है। क्योंकि अन्ना भी जानते हैं कि अकेले कांग्रेस ही जनलोकपाल बिल संसद मे पास नहीं करा सकती, इसके लिए उसे बीजेपी की भी मदद लेनी होगी, फिर विरोध सिर्फ कांग्रेस का ही क्यों। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिससे लगता है कि ये अन्ना वो अन्ना नहीं रहा। अन्ना का लोग सम्मान करते थे, लेकिन जिस तरह से बेलगाम हो चुके हैं, उससे अब उनपर ना सिर्फ कांग्रेस बल्कि और नेताओं ने भी उंगली उठानी शुरू कर दी है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने तो खुले आम चेतावनी दी कि अन्ना उनसे ना उलझें, क्योंकि वो गांधीवादी नहीं है। मतलब साफ है कि वो ईंट का जवाब पत्थर से देते हैं। इसके बाद अन्ना बेचारे खामोश हो गए। टीम अन्ना को बिखर जाए, इसके पहले उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए।






Friday, 7 October 2011

मैं छह महीने पुराना हो गया...

मित्रों आठ अक्टूबर ! ये तारीख मेरे लिए खास है, क्योंकि आज मेरा ब्लाग " आधा सच " छह महीने पुराना हो गया। इस दौरान मैने विभिन्न विषयों पर कुल 51 लेख लिखे। इसे लेख कहना शायद सही नहीं होगा, हम इसे अपना विचार कहें तो ज्यादा ठीक है। वैसे मेरा ब्लागिंग में आना महज एक संयोग है, जिसके लिए मैं अपने साथी रजनीश कुमार का दिल से शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने ब्लाग बनाने से लेकर हर तकनीक की बारीकियों से मुझे रुबरू कराया।
ब्लाग पर मेरा पहला लेख आठ अप्रैल 2011 को " अब तो भ्रष्ट्राचार भी हो गया है भ्रष्ट्र " ये लिखा। इस लेख के जरिए मैं गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के आंदोलन से सहमत होते हुए ये बताने की कोशिश की कि ये लड़ाई आसान नहीं है। क्योंकि आप भ्रष्ट्राचार के खिलाफ जंग छेड़ने जा रहे हैं, जबकि हम इस भ्रष्ट्राचार में भी ईमानदारी खो चुके हैं। इस पहले लेख को पोस्ट करने के कुछ समय के भीतर ही सबसे पहला कमेंट मुझे इंदौर से कविता पांडेय का मिला। उन्होंने मेरी सराहना की, मुझे अच्छा लगा। हालाकि ये लेख तीन चार दिन ब्लाग पर रहा, इस दौरान कुल पांच लोगों के ही कमेंट मिले। मुझे लगा कि यहां बहुत जबर्दस्त प्रतियोगिता है, इसमें जगह बना पाना आसान नहीं है।
बहरहाल कुछ सहयोगियों ने कहा कि अभी शुरुआत है, आप लिखना बंद ना करें, कुछ समय लगेगा, क्योंकि आपकी लेखनी कुछ हटकर है। बस फिर क्या था, मैने तय किया कि छह महीने मैं पूरी शिद्दत के साथ यहां समय दूंगा और देखता हूं ये ब्लाग परिवार मुझे स्वीकार करता है या नहीं। इसके कुछ समय बाद ही कालेधन के मामले में बाबा रामदेव का आंदोलन शुरू हुआ, चूंकि मैं मीडिया में होने के कारण बहुत कुछ जानता था कि यहां क्या होता है। बालकृष्ण को लेकर मैने पहले भी कई स्टोरी की थी, लिहाजा मैंने अपनी जानकारी के हिसाब से पांच लेख लिखे। मैने देखा कि मुझे कई लोग जो स्नेह करते थे, वो मेरे खिलाफ हो गए, कांग्रेसी बताकर मेरे खिलाफ टिप्पणी की। मै टिप्पणी से ज्यादा निराश नहीं था, लेकिन आशुतोष जैसे मित्र का साथ छूटने का मलाल आज भी है।
ब्लाग लिखते हुए एक महीना भी नहीं बीता था कि मुझे "भारतीय ब्लाग लेखक मंच" से ना सिर्फ हरीश सिंह ने जोड़ा बल्कि एक निबंध प्रतियोगिता का निर्णय देने को कहा। मैने अपने विवेक के अनुसार इस काम को अंजाम दिया। मुझे खुशी हुई कि मेरे निर्णय पर किसी को आपत्ति नहीं थी। मैं लंबे समय तक हरीश जी और उनके साथियों के संपर्क में रहा, पर इस साथ का जिस तरह से अंत हुआ, उसकी चर्चा करना मैं ठीक नहीं समझ रहा हूं। हालाकि हरीश जी को लेकर मेरे मन में आज भी वही स्नेह बरकरार है, क्योंकि वो पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने मुझे एक सार्वजनिक मंच से जोड़ा था।
ये सब बातें चल ही रहीं थी कि दिल्ली में अन्ना हजारे भ्रष्ट्राचार पर अंकुश लगाने के लिए जनलोकपाल बिल के लिए अनशन पर बैठ गए। मैं अन्ना की मांगों को पूरी तरह जायज मानता हूं, लेकिन मेरा मानना है कि उनका तरीका लोकतंत्र को कमजोर करने वाला था। लिहाजा मैने तर्कों के आधार पर अपने विचार व्यक्त किए। इस पर मेरा समर्थन करने वालों का प्रतिशत ज्यादा था। मेरी हिम्मत बढी और मैं जो ठीक समझा उसे बेबाक तरीके से लिखता रहा। बहरहाल मेरे ब्लाग पर उतने कमेंट भले दर्ज ना हों, पर ब्लाग को हिट करने की संख्या संतोषजनक थी।
इसी दौरान मैं डा. अनवर जमाल के संपर्क में आया और उन्होंने मुझे "आल इंडिया ब्लागर्स फोरम" के साथ जोड़ा। मैं यहां भी अपनी क्षमता के मुताबिक योगदान देता रहा। इस फोरम से भी मुझे अपार स्नेह मिला। लगभग दो महीने पहले फोरम पर शुरू हुए वीकली मीट में मुझे बराबर स्थान मिलता रहा। इसके लिए भी मैं भाई डा.अनवर जमाल साहब और बहन प्रेरणा जी का दिल से आभारी हूं।
मैं अपने इस छह महीने के सफर में आद. डा रुपचंद्र शास्त्री जी की चर्चा ना करुं, तो सफर पूरा हो ही नहीं सकता। कम समय में ही मुझे यहां कई बार स्थान मिला। चर्चा मंच पर जगह मिलने का नतीजा है कि आज मेरे ब्लाग पर आने वालों की संख्या रोजाना 100 से ऊपर है। इसके अलावा श्री राज भाटिया जी के ब्लाग परिवार, ललित जी  के ब्लाग4 वार्ता, बंदना गुप्ता जी के तेताला और यशवंत माथुर जी के नई पुरानी हलचल का भी मैं दिल आभारी हूं, जिन्होंने मुझे समय समय पर अपनी चर्चाओं में शामिल कर मेरे मुश्किल सफर को आसान बनाने में योगदान दिया। चर्चा मंच के सहयोगी चंद्रभूषण मिश्र गाफिल, श्रीमति विद्या जी, अरुणेश सी दबे, दिलबाग बिर्क, रविकर जी, मासूम साहब और मनोज जी का आभार व्यक्त ना करुं तो ये नाइंसाफी होगी। इन सभी लोगों ने मुझे बराबर सम्मान दिया है। हां यहां एक बात का और जिक्र करना जरूरी है, मैं आज ही भाई सलीम खान के जरिए आल इंडिया ब्लागर्स एसोसिएशन से जुडा हूं, कोशिश होगी कि यहां मैं अपना योगदान पूरी क्षमता के अनुसार दे सकूं।
छह महीने का समय बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इस दौरान मुझे ब्लाग परिवार का अपार स्नेह मिला है। ब्लाग जगत में रश्मि जी एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। मैं जानता हूं कि उनके पास समय का अभाव जरूर होगा, पर मेरे ज्यादातर लेख को ना सिर्फ उन्होंने पढा, बल्कि अपने विचार भी व्यक्त किए। इससे बढकर उन्होंने मुझे छोटे भाई का जो सम्मान दिया है, वो मेरे लिए अनमोल है। आज मैं बंदना गुप्ता जी को भी दिल याद करना चाहता हूं। हमलोग सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए एक दूसरे के संपर्क में आए। उन्होंने मुझे बहुत पहले सलाह दी थी कि आप एक ब्लाग बनाएं और इसमें कुछ ना कुछ लिखें। पर मित्रों उस दौरान मैं फील्ड में रहकर रेल मंत्रालय के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करता था, लिहाजा मेरे पास समय की बहुत कमीं थी। इसलिए मैं ब्लाग से दूर रहा। आज मुझे लगता है कि अगर मैने बंदना जी की बात को उसी समय स्वीकार कर लिया होता तो शायद मेरे ब्लाग की उम्र कुछ ज्यादा होती। वंदना जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
ब्लाग को कैसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए, इसके लिए कविता वर्मा जी ने मुझे बहुत सहयोग किया। कई बार ब्लाग पर तरह तरह की कठिनाई आई, जिसे कविता जी के जरिए मैने दूर किया। हालाकि मेरे बहुत सारे लेख से वो  कत्तई सहमत नहीं हैं, उनके सोचने का अपना अलग नजरिया है, और मेरी सोच कुछ अलग है। कई लेख पर विवाद की स्थिति भी पैदा हुई, हालत बातचीत बंद होने तक पहुंची, पर हम लोग मानते हैं कि विचारों में भिन्नता से आपस की दूरियां नहीं बढनी चाहिए। वो बहुत पुराने समय से लिख रही हैं, अगर मैं ये कहूं कि उनके अनुभवों से मुझे काफी फायदा हुआ है, तो गलत नहीं होगा।
ब्लाग परिवार में मैं अनु चौधरी जी से और डा. दिब्या श्रीवास्तव से काफी प्रभावित हूं। स्पष्ट सोच और बेबाक लेखन की दोनों महारथी हैं। ऐसे हालात में कई बार दिव्या जी को तो मुश्किलों का सामना तक करना पडा, लेकिन मैं उनकी हिम्मत की दाद देता हूं कि वो कैसे सभी मसलों को सुलझाते हुए अपना रास्ता बना लेती हैं। आप दोनों ने मेरे ब्लाग पर आकर मेरा सम्मान बढाया है और मुझे ब्लाग की मुख्यधारा से जुडने में मेरी मदद की है।
मैं आज इस मौके पर अगर अपने प्रिय लोगों की चर्चा न करुं, जिनके साथ मैने ये सफर तय किया है तो गलत होगा। मेरे हर लेख पर इन सभी लोगों ने मुझे स्नेह और शुभकामनाओं से नवाजा है। इसमें राजेश कुमारी जी, मीनाक्षी पंत जी, रचना दीक्षित जी, डा. वर्षा सिंह जी, अमृता तन्मय जी, डा. मोनिका शर्मा जी, पूनम श्रीवास्तव जी, कविता रावत जी, माहेश्वरी किरण जी, रजनी मल्होत्रा, अनीता अग्रवाल जी, सुमन जी, रचना जी, हरिकीरत हीर जी, अपनत्व जी, बबली जी, शालिनी कौशिक जी, शिखा जी, अल्पना वर्मा जी, निर्मला कपिला जी, निवेदिता जी और संध्या शर्मा जी शामिल हैं।
इसके अलावा श्री चंद्र मोलेश्वर प्रसाद जी, प्रवीण पांडेय जी, विजय माथुर जी, सुनिल कुमार जी, महेन्द्र वर्मा जी, जयकृष्ण तुषार जी, नीलकमल जी, राकेश कौशिक जी, केवल राम जी, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी, अरुण चंद्र राय जी, डा. विजय कुमार शुक्ल जी, कुवर कुसुमेश जी, कैलाश सी शर्मा, वीरेंद्र चौहान जी, संजय भाष्कर जी, संतोष त्रिवेदी जी, योगेन्द्र पाल जी, अतुल श्रीवास्तव जी, अभिषेक जी, अमित श्रीवास्तव जी, वीरभूमि जी, आशुतोष जी, मिथिलेश जी और बृजमोहन श्रीवास्तव जी प्रमुख हैं। मित्रों याददाश्त ही है, हो सकता है कि यहां किसी का जिक्र करना रह गया हो, तो इसे मेरी गल्ती समझ कर माफ कर दीजिएगा।
इस छह महीने में एक वाकये ने मुझे बहुत दुख पहुंचाया, जब एक ब्लागर ने मेरे किसी लेख से नाखुश होने पर मुझे मेल करके आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। अगर मैं इस वाकये को भूल जाऊं तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरा ये सफर बहुत ही संतोष जनक रहा है। मुझे नही पता कि इस छह महीने में मेरे ब्लाग को 9328 हिट मिले हैं, ये संख्या आप लोगों की नजर में ठीक है या नहीं, लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर संतुष्ट हूं। मुझे लगता है कि मैं अपनी बात आप सभी तक पहुंचाने में कामयाब रहा हूं। ये मेरे दिल की बात है, अगर किसी को इससे पीडा पहुंची हो तो मैं उनसे बिना किसी लाग लपेट के खेद व्यक्त करता हूं।

Tuesday, 4 October 2011

मैं राष्ट्रपति पद की दौड़ में नहीं...


सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दो दिन पहले अचानक ना जाने क्यों नया शिगूफा छोड़ा कि मैं राष्ट्रपति नहीं बनना चाहता। उन्होंने ऐसा क्यों कहा, ये तो वही जानें, लेकिन पुख्ता जानकारी ये है कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल ने राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाने के लिए संपर्क नहीं किया है। वैसे भी कांग्रेस से तो उनका छत्तीस का आंकडा है, लिहाजा कांग्रेस उन्हें भला क्यों उम्मीदवार बनाएगी ? बीजेपी समेत और राजनीतिक दल भी अन्ना को लेकर असहज स्थिति में हैं, तो वो भी अन्ना को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कभी नहीं बना सकते। फिर भी अन्ना कहते फिर रहे हैं कि वो राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते। उनका ये बयान अखबार में पढकर मैं हैरान रह गया, मुझे लगा कि अन्ना तो वैसे भी दिल्ली में नहीं रहते, मैं तो यहीं रहता हूं और अक्सर सियासी गलियारे से होकर गुजरता हूं, कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन जबर्दस्ती मुझे ही राष्ट्रपति पद की शपथ दिला दें।  
जी हां ! इसीलिए मैने सोचा कि मुझे भी अपनी स्थिति साफ कर देनी चाहिए, वरना मैं तो मीडिया से जुड़े होने की वजह से अक्सर सभी राजनीतिक दलों के बड़े ब़ड़े नेताओं से भी मिलता जुलता रहता हूं, लोग ये ना समझें कि मैं राष्ट्रपति  बनना चाहता हूं, इसलिए इन नेताओं के घर की गणेश परिक्रमा कर रहा हूं। इसीलिए आज मैं शपथ पूर्वक ये बात दोहराना चाहता हूं कि ना मैं राष्ट्रपति बनना  चाहता हूं और ना ही इसकी दौड़ में शामिल हूं।
वैसे जब से ये बात घर में बच्चों ने सुनी है कि अन्ना ने राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया है, वो मुझे घर से बाहर जाने ही नहीं देते। दरअसल उनके दिमाग में राष्ट्रपति का बहुत खौफ है। कई बार ऐसा हुआ कि हम बच्चों के साथ घर से बाहर निकले और दिल्ली में सभी गाड़ियों को रोक दिया गया, सड़कों पर कारों की लंबी लंबी कतारें लग गईं, बच्चों ने पूछा पापा क्यों पुलिस वाले जाने नहीं दे रहे हैं, जबकि आगे पूरा रास्ता साफ है। अभी वो हमसे ये बात पूछ ही रहे थे कि एक बाइक सवार को पुलिस वाले ने पीटना शुरू कर दिया। दरअसल उस बाइक सवार का अगला पहिला पुलिस वालों ने जो रस्सी बांध रखी थी, उसे छू भर गया था। मैने बच्चों को बताया जब राष्ट्रपति का काफिला निकलता है तो सड़क पर कोई दूसरा वाहन नहीं निकल सकता। बच्चों ने पूछा ऐसा क्यों ? मैने उन्हें बताया कि ये सब उनकी सुरक्षा के लिए किया जाता है।
इस पर छोटी बेटी ने पूछ लिया कि उन्हें इतना खतरा क्यों होता है, आखिर ऐसा कौन सा काम उनके जिम्मे है कि उन्हें इतना खतरा बना रहता है। इसके पहले की मैं उसे जवाब देता सामने से शूं शां करता हुआ राष्ट्रपति का काफिला निकल गया और पुलिस वालों ने रास्ता खोल दिया। यही बात बच्चों  के दिमाग में घर कर गई है कि राष्ट्रपति बन जाने के बाद लोग आम आदमी से बहुत दूर हो जाते हैं। बताइये रास्ते से गुजरते वक्त भी लोगों को दूर भगा दिया जाता है। उन्हें लगा कि शायद इसीलिए अन्ना ने राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया।
बैसे मैं मानता हूं देश में राष्ट्रपति उसे ही बनना चाहिए, जिसने अपनी सभी जिम्मेदारी पूरी कर ली हो। यानि जिस तरह हज यात्रा उसे ही करनी चाहिए, जिसने अपनी सभी तरह की पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा कर लिया हो, उसके ऊपर किसी तरह की जिम्मेदारी ना हो। फिर मेरी गृहस्थी तो अभी बहुत अधूरी है, मुझे तमाम जिम्मेदारियों को पूरा करना है। बच्चों के स्कूल में पीटीएम में जाना होता है। पता चला स्कूल गया तो वहां से पूरे स्कूल को भी पुलिस ने सुरक्षा कारणों से खाली करा दिया। मैं ऐसा नहीं कर सकता। जबकि अन्ना के पास इस तरह की कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं हैं, वो राष्ट्रपति बन जाएं तो उनके घर का कोई काम प्रभावित नहीं होगा।
बहरहाल सरकार को भी मेरा यही सुझाव है कि वो अन्ना को राष्ट्रपति बनाएं तो उनकी समस्या कम हो सकती है। सरकार सही मायने में अन्ना से नहीं डरती है, वो डरती है उनके सामने जमा होने वाली भीड़ से। अगर अन्ना राष्ट्रपति बन गए तो सुरक्षा कारणों से भीड को जमा होने ही नहीं दिया जाएगा। सरकार चाहे तो उन्हें राष्ट्रपति भवन में ही कैद करके रख सकती है।
खैर सरकार को जो करना है वो जाने, लेकिन मैं तो किसी भी सूरत में ये पद लेने को तैयार नहीं हूं। अब देखिए जब से अन्ना ने मना किया है, बच्चे लगातार फोन करके मुझसे मेरा लोकेशन पूछते हैं कि आप कहां हैं। हमारा आफिस नोएडा में है, उनका कहना है कि आप घर से सीधे आफिस जाइये और वहां से घर। भूल कर भी आप राष्ट्रपति भवन की तरफ मत जाना। वैसे भी मुझे राष्ट्रपति भवन से ज्यादा शुकून अपने छोटे से घर में है, क्योंकि यहां खाना बनने के बाद सबसे पहले हम लोग ही खाते हैं। सुरक्षा कारणों से ऐसा नहीं होता कि खाने को पहले डाक्टर टेस्ट करें, उनकी रिपोर्ट आए कि सब ठीक है, तब राष्ट्रपति को भोजन मिले। हमारे यहां कोई भी रिश्तेदार कभी भी आएं जाएं, उन्हें पुलिस की सुरक्षा से नहीं गुजरना पड़ता, वहां तो सुना है बहुत पाबंदी है भाई। प्लीज मुझे बख्श दीजिए, मैं यहीं संतुष्ट हूं।

 

Saturday, 1 October 2011

सोनिया के भारत में गांधी की औकात...

आपको अटपटा लग रहा होगा कि ये क्या बात है। भारत सोनिया का कब से हो गया ? एक बार भारत को महात्मा गांधी का भारत कहें तो बात मानी भी जा सकती है, उन्होंने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि सही मायने में तो ये देश ना गांधी का है और ना सोनिया का। ये देश उन शहीदों का है जिन्होंने आजादी की लडाई में अपने प्राण त्याग दिए। ये देश जलियांवाला बाग में कुर्बानी देने वालों का है, ये देश सुभाष चंद्र बोष, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और वीर अब्दुल हमीद का है। उन मां और बहनों का है जिन्होने जंग-ए-आजादी में अपने सुहाग को खोया है।
लेकिन पिछले कुछ समय से देख रहा हूं कि विदेशी लेखक और मीडिया गांधी बनाम गांधी का अभियान चलाए हुए हैं। लगातार ऐसी साजिश हो रही है, जिससे महात्मा गांधी को नीचा दिखाया जा सके, वहीं कुछ विदेशी मैग्जीन सोनिया गांधी को देश की सबसे ताकतवर महिला बताते फिर रहे हैं। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आखिर अचानक विदेशी मीडिया देश पर इतना मेहरबान कैसे हो गया, उनमें यहां के मामलों में इतनी रुचि कैसे पैदा होती जा रही है।
आपको याद होगा कि पिछले दिनों एक अमेरिकी लेखक जोसफ लेलीबेल्ड ने एक किताब लिखा, जिसका नाम है " ग्रेट सोल महात्मा गांधी " । उम्मीद की जा रही थी की महात्मा गांधी पर किताब लिखी गई है तो जाहिर है इसमें महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के जरिए कैसे देश को आजाद कराया, इसकी चर्चा की गई होगी और उन्हें महान बताया गया होगा। लेकिन नहीं ऐसा नहीं था, ये किताब गांधी को अपमानित करने वाली है। जाहिर है अब गांधी जी तो रहे नही, लेकिन देश उन्हें राष्ट्रपिता कहता है तो ये किताब देश को अपमानित करने के लिए लिखी गई है। ये कहा जाए तो बिल्कुल गलत नहीं होगा।
किताब में कहा गया है कि गांधी जी समलैंगिग तो बताया ही गया है साथ ही उन्हें नस्लभेदी तक कहा गया। उनकी हरमन कालनबाख से संबंधों की चर्चा की गई है। हालांकि देश में इस किताब पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और गुजरात समेत कई राज्यों में इस किताब पर बैन भी लगाया गया। लेकिन इससे लेखक दोषमुक्त नहीं हो जाता है। बडा सवाल ये है कि देश के महापुरुषों पर इस तरह की टीका टिप्पणी के पीछे कौन सी ताकत काम कर रही है।
हमें लगता है कि कुछ हद तक इसके लिए हम भी जिम्मेदार हैं। बताइये देश का सबसे बड़ा सम्मान " भारत रत्न " तक महात्मा गांधी को नहीं दिया गया। देश के पहले राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने 1954 में जब इस पुरस्कार की शुरुआत की तो कहा गया कि ये उन्हीं लोगों को दिया जाएगा जो जीवित होंगे। लेकिन 1966 में पहली बार जब स्व.लाल बहादुर शास्त्री को ये सम्मान दिया गया तो साथ में महात्मा गांधी को भी ये सम्मान दिया जाना चाहिए था। वैसे भी दोनों महापुरुषों का जन्म दो अक्टूबर को ही हुआ है। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। सम्मान के बारे में जो नीति बनाई गई, उसमें कहा गया कि ये सम्मान कला, साहित्य, विज्ञान और जनसेवा के क्षेत्र में अच्छा काम करने वालों को दिया जाएगा। हालांकि अब ये सम्मान विवादों में है। मैं जानना चाहता हूं कि इंदिरा गांधी की मौत के बाद  स्व. राजीव गांधी को एक तरह से मृतक आश्रित होने के नाते प्रधानमंत्री की कुर्सी दी गई। क्योंकि इसके पहले तो वो एक साधारण पायलट भर थे। उन्होंने ऐसी कौन सी सेवा  कर दी, जिससे उन्हें भारत रत्न दिया गया। अगर दिया भी गया तो अकेले उन्हें क्यों, देश की सेवा तो उनके पूरे मंत्रिमंडल ने की थी।
अब सोनिया गांधी को ही ले लें। आए दिन विदेशी मैग्जीन में सोनिया गांधी का गुणगान होता है। वर्ष 2004 में सोनिया गांधी को फोर्ब्स पत्रिका ने विश्व की तीसरी सबसे ताकतवर महिला के पायदान पर रखा,  वहीं 2010 में सोनिया को इसी पत्रिका ने नौंवा स्थान दिया था। इसी साल एक ब्रिटिश पत्रिका द स्टेट्समैन ने भी सबसे ताकतवर लोगों की सूची में सोनिया गांधी को 29वां स्थान दिया था। टाइम पत्रिका द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में भी विश्व के सबसे प्रभावी लोगों में सोनिया गांधी का नाम शामिल है।

मैं इस बात से हैरान हूं कि देश की सबसे ताकतवर महिला के क्या मायने हैं। अगर ये है कि सत्ता की चाभी सोनिया के हाथ में है, वो अभी चाहें तो मनमोहन सिंह को कुर्सी से उतार दें और किसी ऐरे गैरे को ये कुर्सी सौंप दें। इससे क्या सोनिया गांधी का सम्मान भले ही बढता हो, मगर देश का तो अपमान ही है। हमारे संबिधान के मुताबिक देश में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च है और वो तीनों सेनाओं का भी प्रमुख है। अगर ऐसे देखा जाए तो महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सबसे ताकतवर कही जाएंगी। शारीरिक ताकत को अगर मानक बनाया जाए तो मेरीकॉम मुक्केबाजी में विश्व चैंपियन हैं, कर्णम मल्लेश्वरी भारोत्तोलन में एशियन चैंपियन थीं। इन्हें देश की सबसे ताकतवार महिलाओं में रखा जा सकता है। पर सोनिया गांधी कैसे सबसे ताकतवर हैं, ये तो सर्वै कराने वाले लोग ही बता सकते हैं। जहां तक मेरी समझ है, विदेशी मैग्जीन देश को अपमानित करने के लिए इस तरह की रिपोर्ट सामने रखते हैं। हैरान करने वाली बात ये है कि देश की मीडिया इस पर आपत्ति करने के बजाए, इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित करती है।    
बहरहाल अगर महापुरुषों का सम्मान वाकई बरकरार रखना है तो हमें जागना होगा। हमें खुद आगे बढकर ऐसे लोगों को जवाब देना होगा कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं और हम उनके खिलाफ एक भी बात सुनने को तैयार नहीं हैं।  वरना तो फिर सोनिया की जय जयकार करते रहिए। पता नहीं आपको पता है या नहीं सोनिया का असली नाम एड्विग ऐंटोनिया एल्बिना माइनो है। इनके पिता स्टेफिनो भवन निर्माण ठेकेदार और पूर्व फासिस्ट सिपाही थे। इटली के मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी सोनिया अंग्रेजी की शिक्षा के लिए कैंब्रिज पहुंची, यहां एल्बिना माइनो अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक होटल में काम करतीं थीं। यहीं इनकी मुलाकात स्व. राजीव गांधी से हुई, जिनका अब नया पता 10 जनपथ, नई दिल्ली है।