Tuesday, 12 July 2011

..तो मनमोहन क्यों हैं पीएम

आपको ये सवाल अजीब लग सकता है या आप इसे छोटी मुंह बड़ी बात भी कह सकते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के नए मंत्रिमंडल पर गौर फरमाना जरूरी है। महीनों से कहा जा रहा था कि एक ऐसा फेरबदल किया जाएगा, जिससे जनता में संदेश जाएगा कि सरकार वाकई भ्रष्टाचार और बढती मंहगाई से चिंतित है और कुछ ठोस पहल करना चाहती है। लेकिन जो कुछ किया गया है, वो हास्यास्पद है। सच तो ये है कि ये बदलाव करने के लिए मंत्रिमंडल का विस्तार बिल्कुल नहीं किया गया है।
चलिए एक सवाल आप से ही पूछता हूं। आज नए मंत्रिमंडल में पुराने सात मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई। कहा गया कि इनका परफार्मेंस ठीक नहीं है। यही बात मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछना चाहता हूं कि फिर आप  कैसे कुर्सी पर जमें हुए हैं। आपकी छुट्टी क्यों नहीं की गई। मुझे नहीं देश भर को लगता है कि प्रधानमंत्री का परफार्मेंस सबसे ज्यादा खराब रहा है। उनकी देखरेख में भ्रष्टाचार पनपता रहा और जानते हुए भी ए राजा पर नियंत्रण नहीं कर पाए और उनके मंत्री को जेल जाना पड़ा। उनकी अगुवाई वाले सरकार के एक और मंत्री किसी भी समय जेल जा सकते हैं। कामनवेल्थ गेम में भ्रष्टाचार की सभी हदें पार हो गईं, ये अलग बात है कि कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी को जेल भेज दिया गया। मनमोहन जी मंहगाई पर अंकुश लगाने में आप पूरी तरह फेल रहे।
भ्रष्टाचार में अभी तक सहयोगी दलों के नेताओं और मंत्रियों का नाम  सामने आ रहे थे। लेकिन मनमोहन जी अब तो टू जी स्पेक्ट्रम के मामले में पी चिंदम्बर में का नाम भी जुड गया है, क्योंकि जो कुछ भी ए राजा ने किया, वो उनकी सहमति से किया है। लेकिन चिंदबरम के मामले में आप खामोश हैं। अंबानी बंधुओं को फायदा पहुंचाने के आरोप कपिल सिब्बल पर भी लग रहे हैं। वैसे सच तो ये है कि  आप  राजा और मारन को अभी तक अपने सिर पर बैठाए रखते, वो तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने सरकार पर थोड़ा लगाम लगाया और जिसकी वजह से ये मंत्री जेल पहुंचे।
प्रधानमंत्री जी आपको लोग भले ही ईमानदार कहते फिरें, मैं नहीं कह सकता,  जिस तरह से आपने नेता विपक्ष की आपत्ति के बावजूद पी वी थामस को सीवीसी बनाया और सुप्रीम कोर्ट ने जब पीएमओ को  कटघरे में खड़ा किया तो थामस को जाना पड़ा। भले ही आप चिदंबरम के कहने में थामस के नाम पर अड़े रहे, लेकिन थामस के मामले में कोर्ट के सख्त रुख से किरकिरी चिदंबरम की नहीं प्रधानमंत्री जी आपकी हुई। आपके कार्यकाल के सैकडों ऐसे मामले गिना सकता हूं जहां आपको सख्त निर्णय लेना चाहिए था, लेकिन आप नहीं ले पाए।
चलिए सारी बातों दरकिनार कर दीजिए.. देखते हैं कि कितने मजबूर हैं हमारे ये प्रधानमंत्री। सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में रेल मंत्रालय का नाम आता है। आए दिन दुर्घटनाओं से महकमा पूरी तरह पटरी से उतर चुका है, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री ये मंत्रालय बहुत ही कम अनुभवी टीएमसी के सांसद दिनेश त्रिवेदी को देने को मजबूर हो गए।
मंत्रिमंडल से अमेरिका नाखुश
एक बार फिर आपको अटपटा लग रहा होगा कि भारत के मंत्रिमंडल से अमेरिका नाखुश क्यों। जी लेकिन सच है अमेरिका नाराज है। सरकार कभी मानने को तैयार नहीं होगी कि मंत्रिमंडल के गठन में दूसरे देशों का कोई हस्तक्षेप होता है, लेकिन ये बात सही नहीं है। दरअसल जो बाहरी लोगों को मंत्री बनाने की बात थी, उसमें सबसे ऊपर नाम था मांटेक सिंह अहलूवालिया का और अमेरिका उन्हें वित्त मंत्रालय दिलवाना चाहता था। बताते हैं कि इसकी तैयारी पूरी हो गई थी। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को उप प्रधानमंत्री बनाकर गृहमंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी जानी थी। इसके अलावा चूंकि चिदंबरम पर भी टू जी की आंच आ रही है, लिहाजा उन्हें विदेश विभाग देकर किनारे लगाने की तैयारी थी। यही वजह है कि सोनिया और मनमोहन की कई दौर की बातचीत आखिरी समय तक होती रही। सरकार को लग रहा था कि संसद का मानसून सत्र हंगामेदार होने वाला है, ऐसे में प्रणव दा की जिम्मेदारी बढा दी जाए और वो ही विपक्ष का मुकाबला करें। इसके अलावा लालू यादव को मंत्री बनाने के लिए तो सरकार तैयार थी, लेकिन मंत्रालय के नाम पर बात नहीं बनी। लालू को भी इसी लिए सरकार में लेने की बात की जा रही थी, जिससे वो विपक्ष को करारा जवाब दे सकें। खैर मुझे लगता है कि सरकार अमेरिका की नाराजगी ज्यादा दिनों तक नहीं झेल पाएगी और मानसून सत्र के बाद मंत्रिमंडल में एक बार फिर फेरबदल तय है।
बेईमानों की कुर्सी सुरक्षित
जी हां... बेईमानी का रिकार्ड तोड़ने वाली पार्टी द्रमुक के लिए अच्छी खबर है। उनके दोनों मंत्री ए राजा और दयानिधि मारन के महकमें सुरक्षित हैं। कपिल सिब्बल पहले की तरह टेलीकाम विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालते रहेंगे। इसी तरह कपड़ा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार आनंद शर्मा को दिया गया है। मतलब साफ है कि द्रमुक जब चाहे अपने दो लोगों को मंत्री बना सकती है उनका महकमा सुरक्षित है। खैर जो कुछ बदलाब हुआ है, उसमें मजबूती कम मजबूरी ज्यादा दिखाई दे रही है।

( उत्तर प्रदेश में हुए रेल हादसे के बारे में मैं आपको गंभीर जानकारी देना चाहता था, लेकिन आज इन सियासियों ने वक्त जाया कर दिया, लेकिन दो दिन के भीतर मैं बताऊंगा दुर्घटना का पूरा सच )

Friday, 8 July 2011

राजनीति: अज़ब प्रेम की गज़ब कहानी


राजनीति में सौ - सौ जूते खाने पड़ते हैं,
कदम- कदम पर सौ- सौ बाप बनाने पड़ते हैं।
मुझे याद नहीं कि कब और कहां ये लाइनें मैने सुनीं, लेकिन इतना मुझे जरूर याद है कि जब कवि सम्मेलन में किसी कवि ने ये लाइनें पढी तो पूरा पंडाल तालियों की गडगड़ाहट से गूंज उठा था। लगभग दस हजार लोगों की भीड़ ने इस लाइन पर जिस तरह से समर्थन जताया, उससे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूं कि लोगों के दिलो दिमाग में सियासियों की छवि बहुत ही घटिया स्तर की है। हो भी क्यों ना, कुर्सी पाने और बचाने के लिए ये एक दूसरे के जूते सिर पर सजाने को तैयार बैठे रहते हैं।
ऐसा नहीं कि छोटे नेता इस तरह की हरकतें करते हैं, सच तो ये है कि बडी पार्टी के नेता इस खेल के हीरो हैं। चलिए दो एक उदाहरण देता हूं कि कैसे ये कदम कदम पर जमीर को ताख पर रख कर सियासी मलाई चाटने के लिए लार टपकती हुई जीभ निकाले  घूमते फिरते हैं। आज कांग्रेस के राजकुमार यूपी सरकार को दलालों की सरकार बताते फिर रहे हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं कि यूपी में कम से कम कानून का राज तो नहीं रह गया है, लेकिन तस्वीर का ये दूसरा रुख है।
सोनिया गांधी 10 जनपथ पर मायावती के साथ नही हैं, ये मायावती के घर आई हुई हैं। यहां आने की वजह तो मायावती को जन्मदिन की बधाई बताई जा रही है, लेकिन सोनिया जी आप बधाई दें और वो भी मायावती के घर आकर, बात जरा जम नहीं रही है। मायावती का जन्मदिन इसके पहले भी आया, लेकिन घर जाकर बधाई देना तो दूर आपने फोन भी नहीं किया। ये दाल जरूर काली है। सच तो ये  है कि कांग्रेस को जब मायावती की जरूरत थी, तो पार्टी की मालकिन सोनिया गाधी जन्मदिन की बधाई देने मायावती के घर जा धमकी। ऐसा नहीं  है कि मायावती जो कुछ आजकल कर रही हैं, वो इसके पहले नहीं कर रही थीं। या उनकी छवि के बारे में लोगों को पता नहीं था। लेकिन नहीं सोनियां गांधी सब जानते हुए सिर्फ वो रास्ता खोलने गईं थी कि लोकसभा चुनाव के पहले या बाद में गठबंधन की जरूरत पडे़ तो सोनिया गांधी को मायावती से बात करने में कोई मुश्किल ना हो। इस तस्वीर से आप समझ सकते हैं कि सियासी लोगों के ये गुलदस्ते बहुत कीमती होते हैं, क्योंकि इसमें जन्मदिन का प्रेम, स्नेह नहीं सरकार की सौदेबाजी छिपी हुई है। राहुल आज मायावती सरकार को दलाल तो बता रहे हैं, लेकिन इस पर खामोश हैं कि केंद्र सरकार में मायावती का भी समर्थन है।
चलिए अब बात लालू यादव की करते हैं। देश की घटिया राजनीति का इन्हें जनक भी कह सकते हैं। राजनीति के शुरुआत इन्होंने लोकनायक जयप्रकाश के साथ की, ये कहते हुए तो मुझे शर्म महसूस हो रही है। जेपी मूवमेंट में ऐसे लोग भी थे, जो अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कितना भी गिर सकते हैं। हम आप जितने कान्फीडेंस से सच नहीं बोल सकते, उससे दोगुना कान्फींडेस से लालू झूठ बोल सकते हैं। मुझे हैरत हुई रेलमंत्री रहने के दौरान लालू कैसे पूरे देश की आंख में धूल झोंकते रहे। हां कांग्रेस में आपसी सिर फुटव्वल का लालू ने खूब फायदा उठाया। इनकी चमचागिरी से पार्टी के मठाधीसों की नौकरी खटाई में पड़ गई थी, क्योंकि सोनियां गांधी और मनमोहन सिंह लालू पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते थे। यूपीए सरकार में रेलमंत्री के तौर पर कई साल तक मलाई काटने के बाद इन्होंने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उसकी औकात बता दी। 



बिहार में अपने पुराने विरोधी रामविलास पासवान को गले लगाया और कांग्रेस को लोकसभा की 54 सीटों में तीन पर लड़ने का न्यौता दिया। इससे कांग्रेसी ऐसा तिलमिलाए कि सोनिया गांधी ने तो लालू से मिलने तक से इनकार कर दिया। लोकसभा और विधानसभा में करारी  हार के बाद अब लालू औकात में हैं। अब उनके सिर से राजनीति का पगलापन दूर हो गया है। अब वो बनियान पहन कर टीवी पर बात करते नहीं दिखाई दे रहे हैं।
द्रमुक मंत्री चोरी में पकडे गए तो अब लालू की बांछे खिल गई हैं। लगातार 10 जनपथ का चक्कर काट रहे हैं। सोनिया को भी लग रहा है कि कहीं सरकार मुश्किल में ना आ जाए, इसलिए लालू को भी दाना डाले हुए हैं। संसद में कांग्रेस पर हमला बोल रहे लालू को लगने लगा है कि थोडी चमचागिरी करके कुर्सी पाई जा सकती है, सो सोनिया की चंपुई करने में लग गए हैं, लेकिन ये कांग्रेस है, पूरी जिल्लत कराने के बाद कोई ऐरा गैरा मंत्रालय थमा देगी।

द्रमुक नेता बेईमान हैं, ये देश के ईमानदार प्रधानमंत्री को पहले ही पता था। यही वजह है कि चुनाव जीतने के बाद सरकार बनाने की बारी आई तो उन्होंने टी आर बालू और ए राजा को मंत्रिमंडल में लेने से साफ इनकार कर दिया, लेकिन गठबंधन की मजबूरी होती है, जिसे मना किया, मजबूरी में उसे ही मंत्री बनाना पड़ा। पहले तो ए राजा को मंत्री बनाने और बाद में इन्हें संचार मंत्रालय महकमा दिलाने के लिए जिस तरह से कारपोरेट जगत ने लाबिंग की, वो बेमिशाल है। मेरा एक सवाल प्रधानमंत्री से भी है, जब आप राजा को जानते थे कि वो बेईमान है, तो आपने क्यों उसे संचार मंत्रालय दिया। खैर इस समय द्रमुक नेता किस तरह से सरकार की फजीहत करा रहे हैं, ये पूरा देश नहीं दुनिया देख रही है। लेकिन आप हैरान तब होंगे जब ए राजा के एवज में द्रमुक से कोई दूसरा ए राजा मंत्री बनेगा। चोरों की जमात द्रमुक से रिश्ता तोड़ना भी नहीं चाहते हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री।
इसीलिए कहते हैं...
राजनीति में सौ - सौ जूते खाने पड़ते हैं,
कदम- कदम पर सौ- सौ बाप बनाने पड़ते हैं।

Tuesday, 5 July 2011

राहुल गांधी: ट्रेनी महासचिव !


सच तो ये है कि राहुल गांधी पर कुछ लिखना सिर्फ अपना समय खराब करना है, लेकिन आज सुबह से खबरिया चैनल जिस तरह से राहुल के आगे पीछे दौड़ लगा रहे हैं उससे मैं भी मजबूर हो गया कुछ लिखने के लिए। दो महीने पहले पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव के दौरान केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी एस अच्युदानंद ने जब राहुल को "अमूल बेबी " कहा तो तमाम लोगों के साथ ही मुझे भी अच्छा नहीं लगा। मुझे लग रहा था कि एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव पर इस तरह व्यक्तिगत हमले से बचा जाना चाहिए। लेकिन अब जिस तरह की हरकतें राहुल गांधी कर रहे हैं, उससे मैं " अमूल बेबी " टिप्पणी को गलत नहीं मानता।
दरअसल राहुल जो कुछ कर रहे हैं उससे उन्हें अमूल बेबी कहना बिल्कुल गलत नहीं है। सच में उनकी सियासी हरकतें बचकानी लगतीं हैं। एक राष्ट्रीय पार्टी का महासचिव बचकानी हरकत करे, तो हैरत होती है। आज कांग्रेस के ही मित्रों से जब राहुल गांधी को लेकर बात होती है तो वो कहतें है कि राहुल अभी कांग्रेस के ट्रेनी महासचिव हैं। मुझे लगता है कि शायद इसीलिए राहुल के साथ एक फुलटाइम महासचिव दिग्विजय सिंह पूरे टाइम बने रहते हैं। वैसे राहुल का कान्वेंट शैली का भाषण लोगों को सुनने में अच्छा तो लगता ही है, वो खूब मजे लेकर राहुल को सुनते हैं। अपने राहुल बाबा मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में खो जाते हैं कि लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं।
आइये मुद्दे की बात करते हैं। राहुल उत्तर प्रदेश में पार्टी और खुद को मजबूत करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इसके लिए अधिक से अधिक समय यूपी में बिताया जाना चाहिए। ये अच्छी बात है, लेकिन राहुल को क्यों लगता है कि भट्टा पारसौल गांव और आसपास (नोएडा) के किसानों का मुद्दा उठाने से ही उनकी पार्टी मजबूत होगी। यहां के किसानों से बदतर हालत में पूर्वांचल और बुंदेलखंड के किसान रह रहे हैं, लेकिन राहुल को उनकी याद नहीं आती। शायद आपको ना पता हो कि भट्टा पारसौल गांव में इक्का दुक्का किसान ही ऐसे होंगे जो करोडपति ना हों। इन पैसे वाले किसानों के बजाए और किसानों के गम का भागीदार क्यों नहीं बन रहे हैं राहुल बाबा।
वैसे राहुल बाबा से यहां की महिलाएं पहले ही काफी नाराज हैं। दो महीने पहले जब राहुल यहां आए तो उन्होंने पुलिस की बर्बरता की कहानी प्रधानमंत्री को सुनाते हुए कहा कि यूपी पुलिस ने किसानों पर फायरिंग तो की ही, महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया। इसके बाद से महिलाएं नाराज हैं। उनका कहना है कि वो ऐसी दबी कुची महिलाएं नहीं है कि पुलिस वाले उनके साथ कुछ भी कर लेगें। महिलाओं ने साफ कहा कि राजनीति के लिए उनकी इज्जत को दांव पर ना लगाएं। इस मामले की जानकारी के बाद काफी दिन तक राहुल भट्टा पारसौल के मामले में खामोश रहे। आज तड़के जब राहुल अचानक इसी गांव में फिर पहुंचे तो, सवाल उठा कि आखिर राहुल को हो क्या गया है वो नोएडा के महासचिव नहीं हैं, वो तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। आखिर क्या चाहते हैं, तो पता चला कि उन्हें किसानों की समस्याओं से ज्यादा लेना देना नहीं है, बस भट्टा पारसौल की बात होती है तो मुख्यमंत्री मायावती को मिर्ची लगती है, बस इसीलिए वो यहां आ जाते हैं। फिर दिल्ली के करीब होने से मीडिया में भी छाए रहते हैं। कहावत है ना हर्रे लगे ना फिटकरी रंग चोखा।
चलिए छो़ड़ दीजिए की राहुल कब, क्या और कैसे करते हैं। लेकिन एक बात कांग्रेसियों को भी खटकती है कि उनके राष्ट्रीय महासचिव राष्ट्रीय मुद्दों पर क्यों खामोश रहते हैं। आज देश भर में जनलोकपाल बिल को लेकर माथापच्ची चल रही है। लेकिन राहुल गांधी खामोश हैं। कालेधन के मामले में पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है, यहां तक कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की ऐसी तैसी करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन राहुल पर इसका कोई असर नहीं। महिलाओं पर अत्याचार को लेकर राहुल काफी संवेदनशील दिखने की कोशिश करते हैं। अत्याचार की ऐसी घटनाओं पर संवेदना व्यक्त करने चोरी छिपे वो कहां कहां पहुंच जाते हैं। लेकिन चार जून को रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज में घायल महिला राजबाला को देखने वो आज तक नहीं गए, जबकि उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।
एक सवाल दिग्विजय सिंह से करना जरूरी लग रहा है। उन्हें राहुल गांधी में ऐसा क्या दिखाई देता है जिसके आधार पर वो दावा करते हैं कि राहुल में अच्छे प्रधानमंत्री के सभी गुण मौजूद हैं। ठाकुर साहब कहीं ये तो नहीं सोच रहे हैं कि महासचिव राहुल को महासचिव की बारीकियां समझाने की जो जिम्मेदारी वो अभी निभा रहे हैं, अगर राहुल प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री का काम सिखाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी और राहुल को मुखौटा बनाकर पीछे से प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी वो खुद निभाएंगे।
सरकार की हालत आज इतनी खराब हो चुकी है कि इसे कोई भी धमका ले रहा है। बेचारे मजबूर प्रधानमंत्री को खुद को मजबूत बताने के लिए खुद ही आगे आना पड़ रहा है। पिछले सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। अब सिविल सोसाइटी ने सरकार का पसीना निकाल दिया है। मुश्किल में फंसी सरकार को सहारा देने के लिए राहुल कभी आगे नहीं आते। कई बार तो लगता है कि पार्टी का एक तपका चाहता है कि पार्टी इतनी मुश्किलों से घिर जाए कि लोग खुद मांग करने लगें कि अब राहुल को गद्दी सौंप दी जानी चाहिए। भाई राहुल मेरी आपको सलाह है कि आप सियासी काम चोरी छिपे करना बंद करें। ताल ठोंक कर जाएं, जहां जाना हो। शुरू में एक दो बार तो ये बात समझ में आ रही थी, लेकिन अब तो वाकई ड्रामेबाजी लगती है। इतना ही नहीं विषय की गंभीरता भी नहीं रह जाती। इस तरह आपके निकलने से पूरे दिन मीडिया में मुद्दों की चर्चा नहीं होती, राहुल कैसे मोटर वाइक से गए, गर्मी में कैसे वो पैदल चले, क्या खाया-पिया, किसके घर रुके इन्हीं बातों की चर्चा होकर खत्म हो जाती है।
केंद्र सरकार के काम काज की बात की जाए तो मुझे स्व. शरद जोशी की याद आ जाती है। वो कहते हैं कि सरकार किसी काम के लिए ठोस कदम उठाती है, कदम चूंकि ठोस होते हैं, इसलिए उठ नहीं पाते। मैने एक नेता से पूछा आप ये ठोस कदम क्यों उठाते हैं, पोले यानि हल्के कदम उठाएं, उठ तो जाएंगे, नेता जी आंख मार कर बोले कदम तो हल्के ही हैं, मैने पूछा फिर उठाते क्यों नहीं, बोले नहीं उठाते इसीलिए तो ठोस हैं। सरकार और हमारे ट्रेनी महासचिव का हाल भी कुछ ऐसा ही है।


Friday, 1 July 2011

ये पब्लिक है सब जानती है..




सच तो ये है कि अब सड़े गले सरकारी तंत्र से बदबू आने लगी है। अगर हम भ्रष्ट्राचार पर नजर डालें तो देश में इसकी शुरुआत आजादी के एक साल बाद 1948 में ही हो गई थी, जब लेह और कश्मीर सीमा पर चौकसी के लिए जीपें खरीदें जानी थीं। विदेशों से खरीदी गई इन जीपों का कीमत से दोगुना भुगतान किया गया और ये जीपें जब देश में आईं, तो इनकी गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी। इस भ्रष्टाचार में अहम किरदार था, एक भारतीय राजदूत का। हालाकि अब नेता, अफसर जिसे जब और जहां मौका मिला, वो हाथ साफ करने से पीछे नहीं है। हम कह सकते हैं कि आज इस गोरखधंधे में किसी का दामन बेदाग नहीं है. यहां तक की मीडिया का भी।
आप हैरान हो सकते हैं, लेकिन सच ये है कि आज भी अगर लोग किसी काम से अफसर या नेता से मिलने जाते हैं और नेता ने बात सुनने के बाद कहा कि ठीक है, काम हो जाएगा, तो लोगों को भरोसा ही नहीं होता है कि उनका काम हो जाएगा, क्योंकि नेता ने पैसे की बात तो की ही नहीं, और बिना पैसे के भला काम कैसे हो जाएगा। आज नेताओं और अफसरों  ने जनता में ये भरोसा ही खो दिया है कि बिना पैसे के भी काम हो सकता है।
सवाल उठता है कि जब लोग खुद पैसे देने को तैयार हैं तो आखिर गडबड़ी कहां हुई। क्यों इतना बड़ा आंदोलन सड़कों पर आ गया। मै बताता हूं,  गडबड़ी इसलिए हुई लोगों की बढ़ती लालच ने देश में भ्रष्ट्राचार को भी भ्रष्ट्र कर दिया। आप नहीं समझे, मैं समझाता हूं। उदाहरण के तौर पर हमने किसी काम के लिए नेता या नौकरशाह को पैसे दिए.. ये तो हुआ भ्रष्ट्राचार। लेकिन पैसे लेने के बाद भी उसने काम नहीं किया और पैसा भी डकार गया। ये हुआ भ्रष्ट्राचार को भ्रष्ट्र करना। मुझे लगता है कि अगर भ्रष्ट्राचार में ये नेता और नौकरशाह ईमानदारी बरतते तो उनकी चांदी कटती रहती। लेकिन बेईमानों सावधान हो जाओ..अब देश की जनता जाग गई है।
सरकारी तंत्र में जब ईमानदार की तलाश की जाती है तो बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि एक भी नहीं मिलता, जिसे दावे के साथ ईमानदार कहा जा सके। यहां तो सब चोर हैं,  फर्क महज बड़े और छोटे का रह गया है। एक जमाना था की गांव में बड़े बुजुर्गों को जब आप प्रणाम करते थे तो आशीर्वाद मिलता था "बेटवा दरोगा बन जा "। ये आशीर्वाद अब क्यों नहीं ? क्योंकि खाकी वर्दी पर अब हमारा भरोसा  ही नहीं रहा। ये वर्दी डीजीपी की हो या फिर कांस्टेबिल की। सब जानते हैं कि ये वर्दी दागदार है जो बदमाशों को संरक्षण देती है।
आइये.. देश के  इंजीनियरों की भी बात कर लें, क्योंकि विकास के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन्हीं की है। आसानी से समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं। भगवान श्री राम जब लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे, तो एक समय ऐसा आया जहां वो भी फेल हो गए। ये मुश्किल घड़ी थी कि समुंद्र को कैसे पार किया जाए ?  भगवान राम की समझ में ये नहीं आ रहा था। फिर यहां उनकी मदद की नल और नील ने। वो अपने हाथ से पत्थर उठा कर भगवान श्रीराम को देते और भगवान उस पत्थर को फूंक मारकर समुंद्र में डालते तो वो पत्थर तैरने लगते थे और इस तरह समुंद्र पर पुल का निर्माण हुआ। जिससे भगवान राम की सेना समुद्र् पार कर पाई। कहते हैं उसी समय भगवान राम ने नल और नील को आशीर्वाद दिया कि जाओ कलयुग तुम दोनों जेई और एई बनकर राज करोगे, कैसा भी पुल बनाओगे, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब से इंजीनियर मस्त हैं।

ये संघर्ष आमआदमी का संघर्ष है, क्योंकि भ्रष्ट्राचार से सबसे ज्यादा  आम आदमी ही प्रभावित है। अन्ना जी, देश आपके साथ है, मैं भी आपके साथ हूं। लेकिन कई बार डर लगता है, वो इसलिए कि हम "जनलोकपाल" बना भी लें, तो इस बात की क्या गारंटी है वो ईमारदार ही होगा। सुप्रीम कोर्ट को हम न्याय का मंदिर मानते है, लेकिन यहां भी के जी बालाकृष्णन जैसे लोग चीफ जस्टिस बन रहे हैं। निर्वाचन आयोग को अगर टीएन शेषन ने सम्मान दिलाने का काम किया तो दूसरे निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने इस संस्था को कांग्रेस पार्टी का गिरवी बना दिया। सीबीआई से ईमानदारी की अपेक्षा करना अब चुटकुला लगता है। इसलिए मुझे लगता है कि जब तक लोगों में नैतिक बल मजबूत नहीं होगा, ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। 121 करोड़ की आबादी को कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। आज केंद्रीय मंत्रिमंडल चोरों की जमात है, और मनमोहन उसके सरदार। पीएम मानते ही हैं गठबंधन की बहुत कुछ मजबूरी होती है, लेकिन मनमोहन जी चोरों का सरदार बने रहने की कोई मजबूरी नहीं। आप चाहें तो हट सकते हैं, लेकिन नहीं कुर्सी बगैर तो आप भी नहीं रह सकते।
एक छोटी सी बात अन्ना जी को फिर दुहराना चाहूंगा। आप बेईमान नेताओं के दरवाजे पर कितनी भी दस्तक दे लें, ये जनलोकपाल के लिए सहमत नहीं होंगे। आपकी ताकत देश की जनता है और इसी ताकत के बल पर हम जनता के मनमाफिक कानून बनवा सकते हैं। पहले ही आप ड्राफ्ट कमेटी में शामिल होकर दो महीने खराब कर चुके हैं, अब इन नेताओं के चक्कर काट कर और समय ना खराब करें। मैं देख रहा हूं कि तमाम नेता आफ द रिकार्ड बातचीत में आपकी खिल्ली उडा रहा है। प्लीज आप देश भर में यात्रा कर लोगों को जगाने का काम करें। जनलोकपाल बिल इनके पिता जी को संसद में पास करना होगा।

और हां प्रधानमंत्री जी, मुझे पता है कि आप मजबूत नहीं मजबूर प्रधानमंत्री हैं। इसलिए आप अपने मंत्रियों को चोर और भ्रष्ट्र तो नहीं कह सकते, लेकिन एक पत्र सभी मंत्रियों को जरूर लिख सकते हैं। वो यह कि वही मंत्री अपने आफिस में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चित्र लगाए, जो वाकई ईमानदारी से काम कर रहा है। वरना गांधी जी के चित्र को वापस कर दे। देखिए क्या वाकई आपके मंत्री  ईमानदारी से चित्र वापस करते हैं, या फिर इंतजार करते हैं कि जब तक न्यायालय उन्हें चोर नहीं कहता है तो भला वो चोर कैसे हो गए। वैसे सच्चाई यह है कि हर मंत्री, हर नेता, हर अफसर और हर जज के बारे में सभी को पता है कि कौन अन्ना है और कौन ए.राजा, क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है।