Friday, 8 July 2011

राजनीति: अज़ब प्रेम की गज़ब कहानी


राजनीति में सौ - सौ जूते खाने पड़ते हैं,
कदम- कदम पर सौ- सौ बाप बनाने पड़ते हैं।
मुझे याद नहीं कि कब और कहां ये लाइनें मैने सुनीं, लेकिन इतना मुझे जरूर याद है कि जब कवि सम्मेलन में किसी कवि ने ये लाइनें पढी तो पूरा पंडाल तालियों की गडगड़ाहट से गूंज उठा था। लगभग दस हजार लोगों की भीड़ ने इस लाइन पर जिस तरह से समर्थन जताया, उससे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूं कि लोगों के दिलो दिमाग में सियासियों की छवि बहुत ही घटिया स्तर की है। हो भी क्यों ना, कुर्सी पाने और बचाने के लिए ये एक दूसरे के जूते सिर पर सजाने को तैयार बैठे रहते हैं।
ऐसा नहीं कि छोटे नेता इस तरह की हरकतें करते हैं, सच तो ये है कि बडी पार्टी के नेता इस खेल के हीरो हैं। चलिए दो एक उदाहरण देता हूं कि कैसे ये कदम कदम पर जमीर को ताख पर रख कर सियासी मलाई चाटने के लिए लार टपकती हुई जीभ निकाले  घूमते फिरते हैं। आज कांग्रेस के राजकुमार यूपी सरकार को दलालों की सरकार बताते फिर रहे हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं कि यूपी में कम से कम कानून का राज तो नहीं रह गया है, लेकिन तस्वीर का ये दूसरा रुख है।
सोनिया गांधी 10 जनपथ पर मायावती के साथ नही हैं, ये मायावती के घर आई हुई हैं। यहां आने की वजह तो मायावती को जन्मदिन की बधाई बताई जा रही है, लेकिन सोनिया जी आप बधाई दें और वो भी मायावती के घर आकर, बात जरा जम नहीं रही है। मायावती का जन्मदिन इसके पहले भी आया, लेकिन घर जाकर बधाई देना तो दूर आपने फोन भी नहीं किया। ये दाल जरूर काली है। सच तो ये  है कि कांग्रेस को जब मायावती की जरूरत थी, तो पार्टी की मालकिन सोनिया गाधी जन्मदिन की बधाई देने मायावती के घर जा धमकी। ऐसा नहीं  है कि मायावती जो कुछ आजकल कर रही हैं, वो इसके पहले नहीं कर रही थीं। या उनकी छवि के बारे में लोगों को पता नहीं था। लेकिन नहीं सोनियां गांधी सब जानते हुए सिर्फ वो रास्ता खोलने गईं थी कि लोकसभा चुनाव के पहले या बाद में गठबंधन की जरूरत पडे़ तो सोनिया गांधी को मायावती से बात करने में कोई मुश्किल ना हो। इस तस्वीर से आप समझ सकते हैं कि सियासी लोगों के ये गुलदस्ते बहुत कीमती होते हैं, क्योंकि इसमें जन्मदिन का प्रेम, स्नेह नहीं सरकार की सौदेबाजी छिपी हुई है। राहुल आज मायावती सरकार को दलाल तो बता रहे हैं, लेकिन इस पर खामोश हैं कि केंद्र सरकार में मायावती का भी समर्थन है।
चलिए अब बात लालू यादव की करते हैं। देश की घटिया राजनीति का इन्हें जनक भी कह सकते हैं। राजनीति के शुरुआत इन्होंने लोकनायक जयप्रकाश के साथ की, ये कहते हुए तो मुझे शर्म महसूस हो रही है। जेपी मूवमेंट में ऐसे लोग भी थे, जो अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कितना भी गिर सकते हैं। हम आप जितने कान्फीडेंस से सच नहीं बोल सकते, उससे दोगुना कान्फींडेस से लालू झूठ बोल सकते हैं। मुझे हैरत हुई रेलमंत्री रहने के दौरान लालू कैसे पूरे देश की आंख में धूल झोंकते रहे। हां कांग्रेस में आपसी सिर फुटव्वल का लालू ने खूब फायदा उठाया। इनकी चमचागिरी से पार्टी के मठाधीसों की नौकरी खटाई में पड़ गई थी, क्योंकि सोनियां गांधी और मनमोहन सिंह लालू पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते थे। यूपीए सरकार में रेलमंत्री के तौर पर कई साल तक मलाई काटने के बाद इन्होंने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उसकी औकात बता दी। 



बिहार में अपने पुराने विरोधी रामविलास पासवान को गले लगाया और कांग्रेस को लोकसभा की 54 सीटों में तीन पर लड़ने का न्यौता दिया। इससे कांग्रेसी ऐसा तिलमिलाए कि सोनिया गांधी ने तो लालू से मिलने तक से इनकार कर दिया। लोकसभा और विधानसभा में करारी  हार के बाद अब लालू औकात में हैं। अब उनके सिर से राजनीति का पगलापन दूर हो गया है। अब वो बनियान पहन कर टीवी पर बात करते नहीं दिखाई दे रहे हैं।
द्रमुक मंत्री चोरी में पकडे गए तो अब लालू की बांछे खिल गई हैं। लगातार 10 जनपथ का चक्कर काट रहे हैं। सोनिया को भी लग रहा है कि कहीं सरकार मुश्किल में ना आ जाए, इसलिए लालू को भी दाना डाले हुए हैं। संसद में कांग्रेस पर हमला बोल रहे लालू को लगने लगा है कि थोडी चमचागिरी करके कुर्सी पाई जा सकती है, सो सोनिया की चंपुई करने में लग गए हैं, लेकिन ये कांग्रेस है, पूरी जिल्लत कराने के बाद कोई ऐरा गैरा मंत्रालय थमा देगी।

द्रमुक नेता बेईमान हैं, ये देश के ईमानदार प्रधानमंत्री को पहले ही पता था। यही वजह है कि चुनाव जीतने के बाद सरकार बनाने की बारी आई तो उन्होंने टी आर बालू और ए राजा को मंत्रिमंडल में लेने से साफ इनकार कर दिया, लेकिन गठबंधन की मजबूरी होती है, जिसे मना किया, मजबूरी में उसे ही मंत्री बनाना पड़ा। पहले तो ए राजा को मंत्री बनाने और बाद में इन्हें संचार मंत्रालय महकमा दिलाने के लिए जिस तरह से कारपोरेट जगत ने लाबिंग की, वो बेमिशाल है। मेरा एक सवाल प्रधानमंत्री से भी है, जब आप राजा को जानते थे कि वो बेईमान है, तो आपने क्यों उसे संचार मंत्रालय दिया। खैर इस समय द्रमुक नेता किस तरह से सरकार की फजीहत करा रहे हैं, ये पूरा देश नहीं दुनिया देख रही है। लेकिन आप हैरान तब होंगे जब ए राजा के एवज में द्रमुक से कोई दूसरा ए राजा मंत्री बनेगा। चोरों की जमात द्रमुक से रिश्ता तोड़ना भी नहीं चाहते हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री।
इसीलिए कहते हैं...
राजनीति में सौ - सौ जूते खाने पड़ते हैं,
कदम- कदम पर सौ- सौ बाप बनाने पड़ते हैं।

Tuesday, 5 July 2011

राहुल गांधी: ट्रेनी महासचिव !


सच तो ये है कि राहुल गांधी पर कुछ लिखना सिर्फ अपना समय खराब करना है, लेकिन आज सुबह से खबरिया चैनल जिस तरह से राहुल के आगे पीछे दौड़ लगा रहे हैं उससे मैं भी मजबूर हो गया कुछ लिखने के लिए। दो महीने पहले पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव के दौरान केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी एस अच्युदानंद ने जब राहुल को "अमूल बेबी " कहा तो तमाम लोगों के साथ ही मुझे भी अच्छा नहीं लगा। मुझे लग रहा था कि एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव पर इस तरह व्यक्तिगत हमले से बचा जाना चाहिए। लेकिन अब जिस तरह की हरकतें राहुल गांधी कर रहे हैं, उससे मैं " अमूल बेबी " टिप्पणी को गलत नहीं मानता।
दरअसल राहुल जो कुछ कर रहे हैं उससे उन्हें अमूल बेबी कहना बिल्कुल गलत नहीं है। सच में उनकी सियासी हरकतें बचकानी लगतीं हैं। एक राष्ट्रीय पार्टी का महासचिव बचकानी हरकत करे, तो हैरत होती है। आज कांग्रेस के ही मित्रों से जब राहुल गांधी को लेकर बात होती है तो वो कहतें है कि राहुल अभी कांग्रेस के ट्रेनी महासचिव हैं। मुझे लगता है कि शायद इसीलिए राहुल के साथ एक फुलटाइम महासचिव दिग्विजय सिंह पूरे टाइम बने रहते हैं। वैसे राहुल का कान्वेंट शैली का भाषण लोगों को सुनने में अच्छा तो लगता ही है, वो खूब मजे लेकर राहुल को सुनते हैं। अपने राहुल बाबा मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में खो जाते हैं कि लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं।
आइये मुद्दे की बात करते हैं। राहुल उत्तर प्रदेश में पार्टी और खुद को मजबूत करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इसके लिए अधिक से अधिक समय यूपी में बिताया जाना चाहिए। ये अच्छी बात है, लेकिन राहुल को क्यों लगता है कि भट्टा पारसौल गांव और आसपास (नोएडा) के किसानों का मुद्दा उठाने से ही उनकी पार्टी मजबूत होगी। यहां के किसानों से बदतर हालत में पूर्वांचल और बुंदेलखंड के किसान रह रहे हैं, लेकिन राहुल को उनकी याद नहीं आती। शायद आपको ना पता हो कि भट्टा पारसौल गांव में इक्का दुक्का किसान ही ऐसे होंगे जो करोडपति ना हों। इन पैसे वाले किसानों के बजाए और किसानों के गम का भागीदार क्यों नहीं बन रहे हैं राहुल बाबा।
वैसे राहुल बाबा से यहां की महिलाएं पहले ही काफी नाराज हैं। दो महीने पहले जब राहुल यहां आए तो उन्होंने पुलिस की बर्बरता की कहानी प्रधानमंत्री को सुनाते हुए कहा कि यूपी पुलिस ने किसानों पर फायरिंग तो की ही, महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया। इसके बाद से महिलाएं नाराज हैं। उनका कहना है कि वो ऐसी दबी कुची महिलाएं नहीं है कि पुलिस वाले उनके साथ कुछ भी कर लेगें। महिलाओं ने साफ कहा कि राजनीति के लिए उनकी इज्जत को दांव पर ना लगाएं। इस मामले की जानकारी के बाद काफी दिन तक राहुल भट्टा पारसौल के मामले में खामोश रहे। आज तड़के जब राहुल अचानक इसी गांव में फिर पहुंचे तो, सवाल उठा कि आखिर राहुल को हो क्या गया है वो नोएडा के महासचिव नहीं हैं, वो तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। आखिर क्या चाहते हैं, तो पता चला कि उन्हें किसानों की समस्याओं से ज्यादा लेना देना नहीं है, बस भट्टा पारसौल की बात होती है तो मुख्यमंत्री मायावती को मिर्ची लगती है, बस इसीलिए वो यहां आ जाते हैं। फिर दिल्ली के करीब होने से मीडिया में भी छाए रहते हैं। कहावत है ना हर्रे लगे ना फिटकरी रंग चोखा।
चलिए छो़ड़ दीजिए की राहुल कब, क्या और कैसे करते हैं। लेकिन एक बात कांग्रेसियों को भी खटकती है कि उनके राष्ट्रीय महासचिव राष्ट्रीय मुद्दों पर क्यों खामोश रहते हैं। आज देश भर में जनलोकपाल बिल को लेकर माथापच्ची चल रही है। लेकिन राहुल गांधी खामोश हैं। कालेधन के मामले में पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है, यहां तक कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की ऐसी तैसी करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन राहुल पर इसका कोई असर नहीं। महिलाओं पर अत्याचार को लेकर राहुल काफी संवेदनशील दिखने की कोशिश करते हैं। अत्याचार की ऐसी घटनाओं पर संवेदना व्यक्त करने चोरी छिपे वो कहां कहां पहुंच जाते हैं। लेकिन चार जून को रामलीला मैदान में पुलिस लाठीचार्ज में घायल महिला राजबाला को देखने वो आज तक नहीं गए, जबकि उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।
एक सवाल दिग्विजय सिंह से करना जरूरी लग रहा है। उन्हें राहुल गांधी में ऐसा क्या दिखाई देता है जिसके आधार पर वो दावा करते हैं कि राहुल में अच्छे प्रधानमंत्री के सभी गुण मौजूद हैं। ठाकुर साहब कहीं ये तो नहीं सोच रहे हैं कि महासचिव राहुल को महासचिव की बारीकियां समझाने की जो जिम्मेदारी वो अभी निभा रहे हैं, अगर राहुल प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री का काम सिखाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी और राहुल को मुखौटा बनाकर पीछे से प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी वो खुद निभाएंगे।
सरकार की हालत आज इतनी खराब हो चुकी है कि इसे कोई भी धमका ले रहा है। बेचारे मजबूर प्रधानमंत्री को खुद को मजबूत बताने के लिए खुद ही आगे आना पड़ रहा है। पिछले सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया। अब सिविल सोसाइटी ने सरकार का पसीना निकाल दिया है। मुश्किल में फंसी सरकार को सहारा देने के लिए राहुल कभी आगे नहीं आते। कई बार तो लगता है कि पार्टी का एक तपका चाहता है कि पार्टी इतनी मुश्किलों से घिर जाए कि लोग खुद मांग करने लगें कि अब राहुल को गद्दी सौंप दी जानी चाहिए। भाई राहुल मेरी आपको सलाह है कि आप सियासी काम चोरी छिपे करना बंद करें। ताल ठोंक कर जाएं, जहां जाना हो। शुरू में एक दो बार तो ये बात समझ में आ रही थी, लेकिन अब तो वाकई ड्रामेबाजी लगती है। इतना ही नहीं विषय की गंभीरता भी नहीं रह जाती। इस तरह आपके निकलने से पूरे दिन मीडिया में मुद्दों की चर्चा नहीं होती, राहुल कैसे मोटर वाइक से गए, गर्मी में कैसे वो पैदल चले, क्या खाया-पिया, किसके घर रुके इन्हीं बातों की चर्चा होकर खत्म हो जाती है।
केंद्र सरकार के काम काज की बात की जाए तो मुझे स्व. शरद जोशी की याद आ जाती है। वो कहते हैं कि सरकार किसी काम के लिए ठोस कदम उठाती है, कदम चूंकि ठोस होते हैं, इसलिए उठ नहीं पाते। मैने एक नेता से पूछा आप ये ठोस कदम क्यों उठाते हैं, पोले यानि हल्के कदम उठाएं, उठ तो जाएंगे, नेता जी आंख मार कर बोले कदम तो हल्के ही हैं, मैने पूछा फिर उठाते क्यों नहीं, बोले नहीं उठाते इसीलिए तो ठोस हैं। सरकार और हमारे ट्रेनी महासचिव का हाल भी कुछ ऐसा ही है।


Friday, 1 July 2011

ये पब्लिक है सब जानती है..




सच तो ये है कि अब सड़े गले सरकारी तंत्र से बदबू आने लगी है। अगर हम भ्रष्ट्राचार पर नजर डालें तो देश में इसकी शुरुआत आजादी के एक साल बाद 1948 में ही हो गई थी, जब लेह और कश्मीर सीमा पर चौकसी के लिए जीपें खरीदें जानी थीं। विदेशों से खरीदी गई इन जीपों का कीमत से दोगुना भुगतान किया गया और ये जीपें जब देश में आईं, तो इनकी गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी। इस भ्रष्टाचार में अहम किरदार था, एक भारतीय राजदूत का। हालाकि अब नेता, अफसर जिसे जब और जहां मौका मिला, वो हाथ साफ करने से पीछे नहीं है। हम कह सकते हैं कि आज इस गोरखधंधे में किसी का दामन बेदाग नहीं है. यहां तक की मीडिया का भी।
आप हैरान हो सकते हैं, लेकिन सच ये है कि आज भी अगर लोग किसी काम से अफसर या नेता से मिलने जाते हैं और नेता ने बात सुनने के बाद कहा कि ठीक है, काम हो जाएगा, तो लोगों को भरोसा ही नहीं होता है कि उनका काम हो जाएगा, क्योंकि नेता ने पैसे की बात तो की ही नहीं, और बिना पैसे के भला काम कैसे हो जाएगा। आज नेताओं और अफसरों  ने जनता में ये भरोसा ही खो दिया है कि बिना पैसे के भी काम हो सकता है।
सवाल उठता है कि जब लोग खुद पैसे देने को तैयार हैं तो आखिर गडबड़ी कहां हुई। क्यों इतना बड़ा आंदोलन सड़कों पर आ गया। मै बताता हूं,  गडबड़ी इसलिए हुई लोगों की बढ़ती लालच ने देश में भ्रष्ट्राचार को भी भ्रष्ट्र कर दिया। आप नहीं समझे, मैं समझाता हूं। उदाहरण के तौर पर हमने किसी काम के लिए नेता या नौकरशाह को पैसे दिए.. ये तो हुआ भ्रष्ट्राचार। लेकिन पैसे लेने के बाद भी उसने काम नहीं किया और पैसा भी डकार गया। ये हुआ भ्रष्ट्राचार को भ्रष्ट्र करना। मुझे लगता है कि अगर भ्रष्ट्राचार में ये नेता और नौकरशाह ईमानदारी बरतते तो उनकी चांदी कटती रहती। लेकिन बेईमानों सावधान हो जाओ..अब देश की जनता जाग गई है।
सरकारी तंत्र में जब ईमानदार की तलाश की जाती है तो बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि एक भी नहीं मिलता, जिसे दावे के साथ ईमानदार कहा जा सके। यहां तो सब चोर हैं,  फर्क महज बड़े और छोटे का रह गया है। एक जमाना था की गांव में बड़े बुजुर्गों को जब आप प्रणाम करते थे तो आशीर्वाद मिलता था "बेटवा दरोगा बन जा "। ये आशीर्वाद अब क्यों नहीं ? क्योंकि खाकी वर्दी पर अब हमारा भरोसा  ही नहीं रहा। ये वर्दी डीजीपी की हो या फिर कांस्टेबिल की। सब जानते हैं कि ये वर्दी दागदार है जो बदमाशों को संरक्षण देती है।
आइये.. देश के  इंजीनियरों की भी बात कर लें, क्योंकि विकास के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन्हीं की है। आसानी से समझाने के लिए एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं। भगवान श्री राम जब लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे, तो एक समय ऐसा आया जहां वो भी फेल हो गए। ये मुश्किल घड़ी थी कि समुंद्र को कैसे पार किया जाए ?  भगवान राम की समझ में ये नहीं आ रहा था। फिर यहां उनकी मदद की नल और नील ने। वो अपने हाथ से पत्थर उठा कर भगवान श्रीराम को देते और भगवान उस पत्थर को फूंक मारकर समुंद्र में डालते तो वो पत्थर तैरने लगते थे और इस तरह समुंद्र पर पुल का निर्माण हुआ। जिससे भगवान राम की सेना समुद्र् पार कर पाई। कहते हैं उसी समय भगवान राम ने नल और नील को आशीर्वाद दिया कि जाओ कलयुग तुम दोनों जेई और एई बनकर राज करोगे, कैसा भी पुल बनाओगे, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब से इंजीनियर मस्त हैं।

ये संघर्ष आमआदमी का संघर्ष है, क्योंकि भ्रष्ट्राचार से सबसे ज्यादा  आम आदमी ही प्रभावित है। अन्ना जी, देश आपके साथ है, मैं भी आपके साथ हूं। लेकिन कई बार डर लगता है, वो इसलिए कि हम "जनलोकपाल" बना भी लें, तो इस बात की क्या गारंटी है वो ईमारदार ही होगा। सुप्रीम कोर्ट को हम न्याय का मंदिर मानते है, लेकिन यहां भी के जी बालाकृष्णन जैसे लोग चीफ जस्टिस बन रहे हैं। निर्वाचन आयोग को अगर टीएन शेषन ने सम्मान दिलाने का काम किया तो दूसरे निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला ने इस संस्था को कांग्रेस पार्टी का गिरवी बना दिया। सीबीआई से ईमानदारी की अपेक्षा करना अब चुटकुला लगता है। इसलिए मुझे लगता है कि जब तक लोगों में नैतिक बल मजबूत नहीं होगा, ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। 121 करोड़ की आबादी को कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। आज केंद्रीय मंत्रिमंडल चोरों की जमात है, और मनमोहन उसके सरदार। पीएम मानते ही हैं गठबंधन की बहुत कुछ मजबूरी होती है, लेकिन मनमोहन जी चोरों का सरदार बने रहने की कोई मजबूरी नहीं। आप चाहें तो हट सकते हैं, लेकिन नहीं कुर्सी बगैर तो आप भी नहीं रह सकते।
एक छोटी सी बात अन्ना जी को फिर दुहराना चाहूंगा। आप बेईमान नेताओं के दरवाजे पर कितनी भी दस्तक दे लें, ये जनलोकपाल के लिए सहमत नहीं होंगे। आपकी ताकत देश की जनता है और इसी ताकत के बल पर हम जनता के मनमाफिक कानून बनवा सकते हैं। पहले ही आप ड्राफ्ट कमेटी में शामिल होकर दो महीने खराब कर चुके हैं, अब इन नेताओं के चक्कर काट कर और समय ना खराब करें। मैं देख रहा हूं कि तमाम नेता आफ द रिकार्ड बातचीत में आपकी खिल्ली उडा रहा है। प्लीज आप देश भर में यात्रा कर लोगों को जगाने का काम करें। जनलोकपाल बिल इनके पिता जी को संसद में पास करना होगा।

और हां प्रधानमंत्री जी, मुझे पता है कि आप मजबूत नहीं मजबूर प्रधानमंत्री हैं। इसलिए आप अपने मंत्रियों को चोर और भ्रष्ट्र तो नहीं कह सकते, लेकिन एक पत्र सभी मंत्रियों को जरूर लिख सकते हैं। वो यह कि वही मंत्री अपने आफिस में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चित्र लगाए, जो वाकई ईमानदारी से काम कर रहा है। वरना गांधी जी के चित्र को वापस कर दे। देखिए क्या वाकई आपके मंत्री  ईमानदारी से चित्र वापस करते हैं, या फिर इंतजार करते हैं कि जब तक न्यायालय उन्हें चोर नहीं कहता है तो भला वो चोर कैसे हो गए। वैसे सच्चाई यह है कि हर मंत्री, हर नेता, हर अफसर और हर जज के बारे में सभी को पता है कि कौन अन्ना है और कौन ए.राजा, क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है।

Saturday, 25 June 2011

नही चलेगी ये अन्नागिरी...


आज चर्चा के लिए तीन मुद्दे हैं जो मुझे बेहद परेशान कर रहे हैं। कल से यही सोच रहा हूं कि क्या करूं। अन्ना जी का मैं समर्थक हूं, मुझे ही नहीं देश के आम आदमी को उनके आंदोलन से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं, लेकिन अब मुझे अन्ना को कटघरे में खड़ा करना पड़ रहा है। इस बारे में मैं कल ही लिखना चाहता था, लेकिन कल अन्ना और उनकी टीम को लेकर मैं बेहद गुस्से में था, लिहाजा मुझे लगा कि अभी मैं अपने लेख के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि मेरे लेख पर मेरे गुस्से का प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मैं ये बात मन में दबाए रहा। लेकिन समय बीतने के साथ हालत ये हो गई कि हमें रात में डाक्टर के पास जाकर ब्लडप्रेशर चेक कराना पड़ा। मुझे जो अंदेशा था वही निकला। मेरा बीपी 105 और 180 था। चूंकि मैं अभी बीपी की दवा नहीं लेता हूं, लिहाजा काफी देर तक मैं बच्चों के साथ अपार्टमेंट के भीतर ही टहलता रहा। आज आराम है।  दूसरा मुद्दा उत्तर प्रदेश से जुड़ा है, जबकि तीसरी बात मुझे केंद्र सरकार की तेल नीति पर करनी है। आइये सबसे पहले बात अन्ना की कर लेते हैं।

नासमझ अन्ना
अब मुझे टीम अन्ना को नासमझ, अल्पज्ञानी, महत्वाकांक्षी कहने में जरा भी संकोच नहीं है, क्योंकि अन्ना जब जंतर मंतर पर आमरण अनशन कर रहे थे तो उन्हें आम जनता का भरपूर समर्थन मिला। इस दौरान कुछ राजनीतिक दलों के नेता भी उन्हें समर्थन देने के लिए जंतर मंतर पहुंचे, पर अन्ना समर्थकों ने नेताओं को खदेड़ दिया। मुझे लगता है कि ये इतनी बड़ी गल्ती थी कि अब अन्ना इस चूक की भरपाई आसानी से नहीं कर पाएंगे। अरे भाई भारत लोकतांत्रिक देश है, सबको पता है कि यहां कानून जंतर मंतर पर नहीं बनेगा, कानून बनेगा संसद में, और संसद में अगर कानून बनवाना है तो राजनीतिक दलों से नफरत नहीं दोस्ती करनी होगी। खैर कोई बात नहीं लेकिन अन्ना जी कल तक राजनीतिक दल अछूत थे तो अब राजनीतिक दलों के दरवाजे पर घुटने  टेकने क्यों पहुंच गए। अब आपको आडवाणी और ए वी वर्धन की याद आने की वजह क्या है। अब आप ऐसा क्यो सोच रहे हैं कि सभी दलों ने नेतृत्व से मुलाकात करें। आपको लगता है कि शरद पवार, करुणानिधि, मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू प्रसाद जैसे नेता जनलोकपाल बिल को समर्थन देंगे।
अन्ना जी आपके इस फैसले से आपकी किरकिरी हो रही है। जान लीजिए कि नेताओं से मिलने की जिसने भी सलाह दी है वो आपकी टोपी नेताओं के पैर में रखवाना चाहता है। उसकी नीयत में खोट है। देश का युवा आपको आज का गांधी मानता है, और गांधी दो कौडी के नेताओं के चौखट पर जाए, ये किसी को बर्दाश्त नहीं। अन्ना जी आप तो देश की जनता को मालिक और सियासी को नौकर बताते हैं, फिर ऐसा क्या हो गया कि मालिक को नौकर के दरवाजे पर मत्था टेकना पड़ रहा है, और नौकर दुत्कार रहा है। अरे आपकी टीम मूर्ख है क्या, जब आप सांसदों को जनलोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं तो सियासी दलों को कुत्ते ने काटा है कि वो आपका समर्थन करेंगे।
अन्ना जी लगता है कि कुछ गलतफहमी में आप और आपके सलाहकार भी हैं। उन्हें लग रहा है कि आपके अनशन से सरकार झुक गई और इसलिए आप से बातचीत को राजी हुई। अगर आप भी ऐसा समझते हैं तो मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोए रहिए। लेकिन सच्चाई ये है कि आपके आंदोलन को मिल रहे अपार जनसमर्थन ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया। अब आप जनसमर्थन को ठेंगा दिखा कर नेताओं के तलुवे चाटने उनके दरवाजे पर जा रहे हैं। आप समझते हैं कि जिन बेईमानों के खिलाफ आप झंडा उठाए हुए हैं, वो आपके साथ खड़े होंगे। किसी पार्टी के नेता ने आपकी बात मान ली तो वो अपनी पार्टी के सांसदों से पिटेगा। इसलिए अन्ना जी आपको सलाह है कि कहीं ऐसा ना हो कि आपको नेता भी दुत्कार दें और जनता भी। आप मौके की नजाकत को समझें, नेताओं से जो दूरी है, वो बनाए रखें। देश भर से जनसमर्थन जुटाएं, ऐसा माहौल बनाना होगा कि जो दल जनलोकपाल के खिलाफ बात करे, उसे देश की जनता दुत्कार दे। आप गांधी हैं, आप गांधी बने रहें। आप आशीर्वाद देने की भूमिका में रहें, लेने की कत्तई ना सोचें।

राजनीति के अयोग्य माया
चलिए आज आपको देश के एक हास्यास्पद कानून के बारे में बताता हूं। जिसके लिए निर्वाजन आयोग करोडों रुपये खर्च करता है। चुनावों में बेहिसाब खर्चों पर नियंत्रण के लिए निर्वाचन आयोग हर चुनाव क्षेत्र में पर्यवेक्षक भेजता है, जबकि पर्यवेक्षकों के आने जाने का कोई मतलब नहीं है, हर जगह उम्मीदवार मनमानी खर्च करते ही हैं। खास बात ये हैं कि चुनाव के बाद उम्मीदवार को चुनावी खर्च का पूरा व्यौरा निर्वाचन कार्यालय में जमा कराना पड़ता है। आपको पता है जो लोग चुनाव खर्चे को जमा नहीं कराते हैं, ऐसे लोगों को निर्वाचन आयोग चुनाव लड़ने के अयोग्य करार देता है और वो फिर चुनाव नहीं लड़ पाते।
लेकिन चुनाव जीतने के बाद आप कितने अपराध करें, आपको चुनाव के अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। अब यूपी की मुख्यमंत्री मायावती को ले लें। उत्तर प्रदेश में अब वो समय आ चुका है जब की सरकार को बर्खास्त कर राष्टपति शासन लगाया जाना चाहिए। मायावती पैसे की बर्बादी कर रही हैं। सरकारी पैसे से मूर्ति,पार्क पर उनका ध्यान ज्यादा है। एक खास बिल्डर ग्रुप को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर गोली चलाई जा रही है। उनके पार्टी के मंत्री - विधायक संगीन अपराधों में लिप्त हैं। प्रदेश की राजधानी में कानून का राज बिल्कुल नहीं रह गया है। लखनऊ जेल में डा.सचान की हत्या से साफ हो गया है कि सूबे की सरकार के कुछ बड़े लोगों की कारगुजारी खुल ना जाए, इसलिए ये हत्या कराई गई है।
लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने वालों पर लाठी चलाई जाती है, विरोधी दल के नेताओं के घरों को सरकार के विधायक अपने गनर के साथ जाकर फूंक देते हैं। ये तमाम ऐसे कारण मौजूद हैं कि सूबे की सरकार को ना सिर्फ बर्खास्त किया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा प्रावधान भी किया जाना चाहिए, मायावती जैसे लोगों को चुनाव के अयोग्य ठहराया जा सके, क्योंकि इनके नेतृत्व में गुंडे पल रहे हैं और उन्हें संरक्षण भी मिल रहा है।  

बेशर्म केंद्र सरकार
ये मेरे लिखने की शैली नहीं है, लेकिन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने मजबूर कर दिया कि उन्हें गाली की भाषा ही समझ में आती है। डीजल की कीमतों में तीन रुपये और रसोई गैस सिलेंडर में 50 रुपये की बढोत्तरी को इन दोनों नेताओं ने मामूली बढोत्तरी बताया है। इनसे ये कौन पूछे कि ये बढोत्तरी तुम्हारे लिए मामूली है, इन्हें तो रसोई गैस की कीमत क्या हो गई है, ये भी पता नहीं होगा। इस बढोत्तरी से ज्यादा इन नेताओं की गंदी टिप्पणी ने लोगों को आहत किया है। जनता को पांच जूते मारने के बाद कह रहे हैं कि अरे मेरी वजह से सिर्फ पांच ही पड़े वरना तो 25 पड़ने वाले थे।