Thursday, 23 June 2011

धर्मनगरी का अधर्म...



जी हां आजकल देश भर में भ्रष्टाचार की बात जोर शोर से की जा रही है। आप सबको पता है कि समाज का कोई तबका ऐसा नहीं है, जिसके हाथ इस गोरखधंधे में ना सने हों। आप सब पहले से जानते हैं कि देश के ज्यादातर सियासी भ्रष्ट हैं, नौकरशाह भी ईमानदार नहीं रहे। यहां तक की सरकारी दफ्तरों के बाबू को भी घूस का खून लग चुका है। हमारी न्यायालयों में बहुत श्रद्धा थी, लेकिन जज के साथ बैठा उनका पेशकार जब उनके सामने ही पैसे थामता है, तो सिर शर्म से झुक जाता है। पेशकार को जब कटघरे में खडा किया जाता है तो वह साफ साफ बताता है कि इस पैसे में जज साहब की भी शाम की सब्जी शामिल है।
माफ कीजिएगा मैं भ्रष्टाचार की बातें कर रहा हूं, लेकिन मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, वजह आप कह सकते हैं कि मीडिया को ये बात कहने का अब कोई हक नहीं है, क्योंकि यहां भी चोर घुसपैठ कर चुके हैं। जी बिल्कुल...मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं। यहां भी चोरों ने पांव पसार लिए हैं। कारपोरेट दलाल नीरा राडिया का जो टेप सामने आया है, उसने मीडिया के ऐसे बड़े बडे़ चेहरों को दागदार किया है, जिससे हम सब को काफी उम्मीदें थीं। पंजाब के आईपीएस एसपीएस राठौर के खिलाफ छेडछाड़ का मामला दर्ज हुआ तो मीडिया ने इतना हो हल्ला मचाया कि उन्हे सर्विस के दौरान मिले सभी पदक सरकार ने वापस ले लिए, लेकिन मीडिया का दोहरा चरित्र तो  देखिए..जब बडे पत्रकारों की काली करतूतें सामने आ चुकी हैं, फिर भी कहीं से ये आवाज नहीं उठाई गई कि दागी पत्रकारों से पद्मश्री वापस लिया जाए।
 
आइये विषय पर आते हैं, जो मै कहना चाहता हूं। आज मैं बहुत ही जिम्मेदारी से ये बात कह रहा हूं कि देश के साधु संत भी अब ईमानदार नहीं रह गए। सिर्फ काली कमाई ही नहीं, जमीन कब्जाने, जमीन के लिए किसी भी हद तक जाने के साथ ही अब तो कई बाबाओं के चरित्र पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।  
फिलहाल छोटी सी बात पुत्तपार्थी की करते हैं। आप सब जानते हैं कि सत्य साईं बाबा का शुरू से ही विवादों से नाता रहा है। जीवन काल में उनके बारे में अनैतिक रिश्तों की बात सामने आई थी, और अब मौत के बाद अकूत संपत्ति की। हम विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए शोर कर रहे हैं, लेकिन देश में जमा कालेधन पर क्यों खामोश हैं। सत्य साईं आश्रम में चोरी से ले जाए जा रहे 35 लाख रुपये पकडे जाने के बाद ट्रस्टियों की भूमिका संदिग्ध हो गई है। अब तो यहां तक बताया जा रहा है कि आश्रम में कई तहखानों में अऱबो रुपये नकद और हीरा, सोना चांदी जमा है। हैरत है कि जब सत्य साईं के कमरे से धन बरामद हो रहा है, तो आप समझ सकते हैं कि जो संत लोगों को मोह माया से दूर रहने  का संदेश देते हैं, उनका असली चेहरा कितना भद्दा, गंदा और बदबूदार है।

ताजा मामला बाबा रामदेव का ही ले लें। वो कहते हैं कि मुझे दान मिलता है, जिससे 1100 करोड का ये विशाल एंपायर खड़ा है। बाबा जी अगर आपने सभी दान चेक से लिया है तब तो ठीक है, उसका हिसाब किताब आपके पास होगा ही, लेकिन अगर बड़ी मात्रा में आपने नगद चंदा लिया है, तो ये कैसे पता चलेगा कि आपकी सम्पत्ति में कालाधन नहीं है। बाबा जी पर जब भी सवाल दागे जाते हैं, तो वो ये नहीं कहते कि मेरे पास जो कुछ है सब नंबर एक में है। वो लचर कानून का सहारा लेते हैं, और कहते है कि जो कुछ भी उन्होंने किया है वो सब कानून के दायरे में रह कर किया है। वैसे तमाम ट्रस्ट और कंपनी बनाने से ही ये साफ है कि बाबा रामदेव भी दूध के धुले नहीं है। यही वजह कि अब खामोश हो गए हैं, उछल कूद और बोलती बंद है।
हो सकता है कि आप मेरी बात से सहमत ना हों, लेकिन मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ ये बात कह रहा हूं कि नौकरशाहों ने संत समाज को भ्रष्ट बनाने में अहम रोल निभाया है। आप किसी भी बाबा, योगी, कथावाचक, या फिर संत को ले लें, उनके यहां कुछ नौकरशाह जरूर चिपके होगें। संत सरल होते हैं, इससे वो नौकरशाहों के कुचक्र में फंस जाते हैं। संत समाज में नौकरशाहों के बढते दखल से न्याय पालिका के भी कान खड़े हो गए, और जजों ने भी इन साधु संतो में घुसपैठ बना लिया। आज देश में ऐसा कोई साधु, संत, सन्यासी नहीं है, जिसके यहां कार्यरत नौकरशाह या फिर रिटायर नौकरशाह और जजों की फौज ना हो। इसमें दोनों का फायदा है। सत्य साईं के आश्रम पुत्तपार्थी में तो एक नौकरशाह पूरे साम्राज्य का मालिक बनने की फिराक में है। 
पिछले दिनों आईबीएन 7 चैनल के एक स्टिंग आपरेशन में कई बाबा पकड़े गए थे। वो लोगों के कालेधन को सफेद करते थे। कैमरे पर पकड़े गए बाबा  सौदेबाजी कर रहे थे, जिसमें वो बकायदा ब्लैकमनी को व्हाइट करने के लिए परसेंटेज की बात कर रहे हैं।  वैसे तो आप भी जानते हैं  कि जहां कहीं भी "साला " शब्द जुड़ जाता है, वहीं गड़बड़ी शुरू हो जाती है। जैसे धर्मशाला, पौशाला, गौशाला, पाठशाला आदि आदि। इन सबके नाम पर सरकारी छूट की लूट हो रही है। इसमें साधु संत सबसे आगे हैं। किसी भी साधु संत को देख लें, उनके पास करोडों की प्रापर्टी है। सबके धंधे चल रहे हैं। सबके साथ विवाद जुडा हुआ है। कम साधु संत ऐसे हैं जिनके खिलाफ कोई विवाद ना हो। जमीनों के विवाद जितने साधु संतो के साथ है, भूमाफियाओं के खिलाफ भी उतने मामले नहीं होंगे।
मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि साधु संतों के साम्राज्य पर सरकार कड़ी नजर रखे। चूंकि इन साधू संतों को इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स समेत अन्य सभी प्रकार के टैक्स से छूट दी गई है। छूट इसलिए कि ये समाज सेवा करते हैं। लेकिन अब कहां समाज सेवा रह गई। जब योग क्लास के लिए पंजीकरण शुल्क हजारों में हो, आर्ट आफ लीविंग के कोर्स की फीस ली जा रही हो, आगे बैठकर प्रवचन सुनने का अतिरिक्त शुक्ल देना मजबूरी हो, ऐसे में बाबाओं को छूट क्यों। क्यों नहीं बाबाओं को टैक्स के दायरे में लाना चाहिए। जब छूट का फायदा ये बाबा ले रहे हैं तो इन्हें सरकार के नियंत्रण में रहना चाहिए। सरकार को भी देखना चाहिए कि कैसे ये बाबा लोगों को चूना लगाकर रातोंरात अकूत संपत्ति जमा कर रहे हैं। मुझे लगता है कि इस मामले पर गंभीर बहस की जरूरत है और मैं जोर देकर ये कहना चाहता हूं कि बाबाओं के धार्मिक प्रतिष्ठानों, मंदिरों सभी जगह टैक्स का प्रावधान होना चाहिए।
और अब बात धर्मनगरी के अधर्म की। आप किसी भी धर्मनगरी मथुरा, हरिद्वार, श्रृषिकेश समेत और भी महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों पर चले जाएं। यहां आपको रहने के लिए एक से एक आलीशान धर्मशाला मिलेंगे। जिसमें सभी तरह की फाइव स्टार सुविधाएं मिलेंगी और आपसे हजारों रुपये किराया भी वसूला जाएगा। लेकिन जब आप यहां बिल मांगेगे तो वो किराए का बिल ना देकर  धर्मशाला के लिए सहयोग राशि यानि दान की रसीद थमा देगें। ये काम सबसे ज्यादा कृष्णनगरी मथुरा में है। खुलेआम लूट करते हैं धर्म के ठेकेदार, पर कोई बोलने वाला नहीं है।



Tuesday, 21 June 2011

संकलन


मित्रों,
कई बार कुछ ऐसी रचनाएं नजर से गुजरती हैं, जिसे बार बार न सिर्फ दुहराने का मन होता है, बल्कि सोचे जागते आप उसी रचना में रमें रहते हैं। मैं यहां दो तीन रचनाएं आपके सामने रखता हूं, मुझे लगता है कि आप भी इसे पसंद करेंगे और मेरी तरह गुनगुनाते रहेंगे। चलिए बात वीर रस के जाने माने कवि डा. हरिओम पंवार से शुरू करता हूं।


मैं भी गीत सुनाता हूँ, शबनम के अभिनन्दन के
मैं भी ताज पहनता हूँ नंदन वन के चन्दन के ||

लेकिन जब तक पगडण्डी से संसद तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत लिखूंगा जन गन मन के क्रंदन के ||
जब पंछी के पंखो पर हो पहरे बम के गोली के,
जब पिंजरे में कैद पड़े हो सुर कोयल की बोली के ||

जब धरती के दामन पर हो दाग लहू की होली के,
कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के ||

मैं झोपड़ियों का चारण हूँ आंसू गाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

अन्धकार में समां गए जो तूफानों के बीच जले,
मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले||

क्रांतिकथा में गौण पड़े है, गुमनामी की बाहों में,
गुंडे तस्कर तने खड़े है राजमहल की राहों में ||
यहाँ शहीदों की पावन गाथाओं को अपमान मिला,
डाकू ने खादी पहनी तो संसद में सम्मान मिला ||

राजनीति में लोह पुरुष जैसा सरदार नहीं मिलता,
लाल बहादुर जी जैसा कोई किरदार नहीं मिलता ||
ऐरे गेरे नत्थू खैरे तंत्री बन कर बैठे है,
जिनको जेलों में होना था मंत्री बन कर बैठे है ||

लोक तंत्र का मंदिर भी बाज़ार बना कर डाल दिया,
कोई मछली बिकने का बाज़ार बना कर डाल दिया ||
अब जनता को संसद भी प्रपंच दिखाई देती है,
नौटंकी करने वालों का मंच दिखाई देती है ||

पांचाली के चीर हरण पर जो चुप पाए जायेंगे
,इतिहासों के पन्नो में वे सब कायर कहलायेगे ||
कहाँ बनेंगे मंदिर मस्जिद कहाँ बनेगी राजधानी,
मंडल और कमंडल पी गए सबकी आँखों का पानी ||

प्यार सिखाने वाले बस ये मजहब के स्कूल गए,
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गए ||
कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल जले,
सांझ चिरैया सूली टंग गयी पंछी गाना भूल गए ||

आँख खुली तो पूरा भारत नाखूनों से त्रस्त मिला,
जिसको जिम्मेदारी दी वो घर भरने में व्यस्त मिला ||

क्या यही सपना देखा था भगत सिंह की फ़ासी ने,
जागो राजघाट के गाँधी तुम्हे जगाने आया हूँ,
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||


जो अच्छे सच्चे नेता है उन सबका अभिनन्दन है,
उनको सौ सौ बार नमन है मन प्राणों से वंदन है ||
जो सच्चे मन से भारत माँ की सेवा करते है,
हम उनके कदमो में अपने प्राणों को धरते है ||

लेकिन जो कुर्सी के भूखे दौलत के दीवाने है,
सात समुंदर पार तिजोरी में जिनके तहखाने है ||
जिनकी प्यास महासागर है भूख हिमालय पर्वत है,
लालच पूरा नीलगगन है दो कौड़ी की इज्ज्ज़त है ||

इनके कारण ही बनते है अपराधी भोले भाले,
वीरप्पन पैदा करते है नेता और पुलिस वाले ||
केवल सौ दिन को सिंघासन मेरे हाथों में दे दो,
काला धन वापस न आये तो मुझको फ़ाँसी दे दो ||

जब कोयल की डोली गिद्धों के घर में आ जाती है,
तो बगला भगतो की टोली हंसों को खा जाती है ||
जब जब जयचंदो का अभिनन्दन होने लगता है,
तब तब सापों के बंधन में चन्दन रोने लगता है ||

जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है,
तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है ||

जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते है,
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते है ||
सिंहो को म्याऊँ कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है,
बिल्ली में क्या ताकत होती कायरता दिल्ली में है ||

कहते है की सच बोलो तो प्राण गवाने पड़ते है,
मैं भी सच्चाई को गाकर शीश कटाने आया हूँ,
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ ||

कोई साधू संन्यासी पर तलवारे लटकाता है,
काले धन की केवल चर्चा पर भी आँख चढ़ाता है ||
कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है,
कोई यमुना गंगा अपने घर में भरने लगता है ||
कोई तिरंगे झंडे को फाड़े फूके आज़ादी है,
कोई गाँधी को भी गाली देने का अपराधी है ||

कोई चाकू घोप रहा है संविधान के सीने में,
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में ||
कोई ढाँचे का गिरना UNO में ले जाता है,
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है ||

कोई अपनी संस्कृति में आग लगाने लगता है,
कोई बाबा रामदेव पर दाग लगाने लगता है ||
सौ गाली पूरी होते ही शिशुपाल कट जाते है,
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ,
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ |

-डॉ. हरिओम पंवार

डा.हरिओम पंवार को पढने से ज्यादा उन्हें सुनना अच्छा लगता है। अक्सर कवि सम्मेलनों में उनकी बारी आने तक रात के डेढ दो बज चुके होते हैं, लेकिन जब डा. पवांर खडे होते है तो वो कवि सम्मेलन में मौजद लोगों में ऐसी जान फूंक देते हैं कि ऊंघ रहे लोग उठ बैठते हैं। अब हिन्दी के जाने माने कवि स्व. कैलाश गौतम की एक रचना। कैलाश जी की खास बात यह रहती है कि वो ऐसे विषय को लेते हैं जिससे आमतौर पर सभी का सामना होता है और गौतम जी अपने ही अंदाज में लोगों को संदेश देते नजर आते हैं।


कभी मेरे बेटे कचहरी न जाना
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना- कचहरी न जाना.
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे है
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुहं घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया -बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||

अवधी में हास्य व्यंग की बात हो और स्व. रफीक सादानी की चर्चा ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। सादानी साहब को जिसने एक बार भी सुना है, वो उनका कायल हो गया। उनकी रचना शैली का अलग अंदाज तो देखने को मिलता ही है, मै उनसे काफी संपर्क में रहा हूं, वो एक अच्छे इंशान भी थे। एक उनकी रचना भी..          


कविता : कुपंथी औलाद
औरन के कहे मा हम आयेन
काया का अपने तरसायेन
कालिज मा भेजि के भरि पायेन
      तू पढ़ै से अच्छा घरे रहौ,

      चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम सोचा रहा लिखि पढ़ि जइहौ
आकास मा एक दिन चढ़ि जइहौ
पुरखन से आगे बढ़ि जइहौ
      अब घर कै खेती चरे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
जबसे तू इस्कूल गयौ
तू फर्ज का अपने भूलि गयौ
तुम क्वारै भैया झूलि गयौ
      भट्ठी मा हबिस के बरे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
तुमसे अच्छा रघुआ हरजन
डिगरी पाइस आधा दर्जन
अस्पताल मा होइगा सर्जन
      तू ऊ ..............करे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम सोचा रहा अफसर बनिहौ
या देसभक्त लीडर बनिहौ
का पता रहा लोफर बनिहौ
      अब जेब मा कट्टा धरे रहौ
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
फैसन अस तुमपै छाइ गवा
यक राही धोखा खाइ गवा
हिजड़े का पसीना आइ गवा
      जीते जी भैया मरे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।

हर बुरे काम पै अमल किहेउ
कुछ पढ़ेउ न खाली नकल किहेउ
बर्बाद भविस कै फसल किहेउ
      अब बाप कै सब सुख हरे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
हम पुन्न किहा तू पाप किहेउ
हम भजन तू फिल्मी जाप किहेउ
गुंडई मा कालिज टाप किहेउ
      जो मन मा आवै करे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।
अइसन जौ बिगाड़े ढंग रहिहौ
बेहूदन के जौ संग रहिहौ
जेस रफीक हैं वैसन तंग रहिहौ
      पूलिस के नजर से टरे रहौ,
      ... चाहे खटिया पै परे रहौ।”

   [ अवधी कवि रफीक सादानी ]

चलिए कुछ पंक्तियां राहत भाई इंदौरी की भी हो जाए, जो मुझे बेहद पसंद है। राहत भाई देश के उन चुनिंदा शायरों में हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। जब सरकारें पटरी से उतरने लगती हैं तो राहत भाई उसे अपने शेर के जरिए संभालने की कोशिश करते हैं। दुनिया में अमन का पैगाम देना हो तो राहत भाई के शेर इस काम को भी बेहतर अंजाम देते हैं। बात प्यार मोहब्बत की हो तो भी राहत भाई का क्या कहना... आइये उनकी एक रचना की दो चार लाइनें जो मुझे याद हैं।


उसकी कत्थई आंखों में है, जंतर मंतर सब,
चाकू, वाकू, छुरियां, वुरियां, खंजर,वंजर सब।

जब से रूठी वो मुझसे, सब रुठे रुठे हैं,
चादर, वादर, तकिया, वकिया, बिस्तर विस्तर सब।

हम से बिछुड़ कर वो भी कहां अब पहले जैसी है,
फीके पड़ गए कपड़े, वपड़े, गहने, वहने सब।

इसमें कुछ और भी अच्छी लाइनें है, पर मुझे इस वक्त याद नहीं आ रही है। कोशिश करुंगा कि बाद में उसी भी शामिल किया जाए। मित्रों मैं चाहता हू कि अगर आपको ये संकलन अच्छा लगे तो इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए आप अपने ब्लाग पर भी इसे जगह दे सकते हैं।







Thursday, 16 June 2011

गांव गया था,गांव से भागा..


मित्रों एक ऐसे आदमी को लेकर 20 दिन से हम सभी उलझे हुए थे, जो बात ईमानदारी की कर रहा था, लेकिन खुद इससे काफी दूर था। अब पिछले 20 दिन को देखता हूं तो लगता है कि बेवजह समय बर्बाद कर रहा था। खैर आप लोग भी ऊब गए होंगे। आइये आज आपको इलाहाबाद के जाने माने की कवि स्व. कैलाश गौतम की एक रचना से रुबरू कराता हूं। मुझे उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 रामराज का हाल देखकर
 पंचायत की चाल देखकर
 आँगन में दीवाल देखकर
 सिर पर आती डाल देखकर
 नदी का पानी लाल देखकर
 और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 सरकारी स्कीम देखकर
 बालू में से क्रीम देखकर
 देह बनाती टीम देखकर
 हवा में उड़ता भीम देखकर
 सौ-सौ नीम हक़ीम देखकर
 गिरवी राम-रहीम देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 जला हुआ खलिहान देखकर
 नेता का दालान देखकर
 मुस्काता शैतान देखकर
 घिघियाता इंसान देखकर
 कहीं नहीं ईमान देखकर
 बोझ हुआ मेहमान देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 नए धनी का रंग देखकर
 रंग हुआ बदरंग देखकर
 बातचीत का ढंग देखकर
 कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
 झूठी शान उमंग देखकर
 पुलिस चोर के संग देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 बिना टिकट बारात देखकर
 टाट देखकर भात देखकर
 वही ढाक के पात देखकर
 पोखर में नवजात देखकर
 पड़ी पेट पर लात देखकर
 मैं अपनी औकात देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 नए नए हथियार देखकर
 लहू-लहू त्योहार देखकर
 झूठ की जै-जैकार देखकर
 सच पर पड़ती मार देखकर
 भगतिन का शृंगार देखकर
 गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 मुठ्ठी में कानून देखकर
 किचकिच दोनों जून देखकर
 सिर पर चढ़ा ज़ुनून देखकर
 गंजे को नाख़ून देखकर
 उज़बक अफ़लातून देखकर
 पंडित का सैलून देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

Tuesday, 14 June 2011

बाबा- ये कैसा योग


 

मित्रों मै जानता हूं कि कुछ लोग मेरे इस लेख को भी ये कह कर खारिज कर देगें कि कांग्रेसी मानसिकता से लिखा गया लेख है। 15 दिनों से देख रहा हूं कि गिने चुने लोग सत्य का गला घोटने के लिए अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। सच बात की जा रही है तो उसे वो तर्कों के आधार पर नहीं अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर दबाने की कोशिश कर रहे हैं। जो जितना पढा लिखा है वो उतना ही स्तर गिरा कर अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। मित्रों हो सकता है कि बाबा प्रेम में आपको मेरी बात बुरी लगे, लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो है, वो आपको जानना ही चाहिए। वो ये कि आखिर योग क्या है। आज देश में एक बड़ा वर्ग इसे सिर्फ शारीरिक क्रियाओं से जोड़ कर देखता है। मसलन योग के मायने सिर्फ आसन या प्राणायाम हैं। लेकिन महर्षि पंतजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने योगसूत्र में शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग यानी आठ अंगों वाले साधक को ही सच्चा योगी बताया है।




ये योग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। अष्टांग योग में ये सभी चीजें आती हैं। अब मैं एक एक कर आपको ये बताने की कोशिश करुंगा कि इनके मायने क्या हैं। ये जानने के बाद आप बाबा जो योग टीवी पर करते दिखाई देते हैं, उससे मिलान की कीजिए। जो योग के नियम मैं बता रहा हूं, इसके अनुयायी बाबा रामदेव भी हैं, इसलिए उन्होंने अपने " योग कारखाने " का नाम पतंजलि रखा है।

1.यम--.इसके तहत पांच सामाजिक नैतिकताएं आती हैं---

(क) अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना

(ख) सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना

(ग) अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना

(घ) ब्रह्मचर्य - इसके दो अर्थ हैं:
चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना, सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना।

(च) अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना।

( अपरिग्रह को आपको ठीक से समझना होगा, क्योंकि बाबा इसका पालन तो बिल्कुल नहीं करते। मतलब अगर आपको दो रोटी की भूख है, तो तीसरी रोटी के बारे में विचार भी मन मस्तिष्क में नहीं आना चाहिए। आवश्यकता से ज्यादा किसी चीज का संग्रह नहीं हो किया जाना चाहिए। अरे ये बाबा तो संग्रह के आदि हैं।)

२. नियम: पाच व्यक्तिगत नैतिकताएं

(क) शौच - शरीर और मन की शुद्धि

(ख) संतोष - संतुष्ट और प्रसन्न रहना

(ग) तप - स्वयं से अनुशासित रहना

(घ) स्वाध्याय - आत्मचिंतन करना

(च) ईश्वर-प्रणिधान - इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा

३. आसन: योगासनों द्वारा शरीरिक नियंत्रण

४. प्राणायाम: सांस लेने संबंधी खास तकनीक द्वारा प्राण पर नियंत्रण

५. प्रत्याहार: इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना

६. धारणा: एकाग्रचित्त होना

७. ध्यान: निरंतर ध्यान

८. समाधि: आत्मा से जुड़ना। शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था में समाधि का अनुभव।
 अब मैं अपने ब्लागर्स साथियों पर सब कुछ छोड़ देता हूं, वो अष्टांग योग को जानने के बाद बाबा को कहां रखते हैं, उनकी इच्छा। वैसे मैं आपको बताऊं मेरी एक जाने माने योग गुरु से बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि योग के दौरान दुनिया भर की फिजूल बातें नहीं की जा सकतीं, क्योंकि जब आपका ध्यान भटकता रहेगा तो आप सबकुछ कर सकते हैं, पर योग नहीं। मच पर बाबा के उछल कूद करने को भी योग नहीं कहा सकता। योग कराने के दौरान हल्की फुल्की बातें, अजीब तरह से हंसना, अपने उत्पादों को बेहतर बताना, योग के दौरान बीमारी की बात करना ऐसे तमाम मसले हैं जो योग के दौरान नहीं की जानी चाहिए। पर ये बात बाबा और उनके अनुयायियों को कौन समझाए। मुझे पक्का यकीन है कि कुछ लोग जो बाबा से जुडे हुए हैं, वो इन बातों को भी खारिज करते हुए अशिष्ट भाषा में टिप्पणी करेंगे। बहरहाल मेरा मकसद आपको अष्टांग योग के बारे में बताना भर है।