Wednesday, 25 May 2011

तेल पीती है ये सरकार

चलिए आज बात पेट्रोल और डीजल की कर लेते हैं। वैसे तो मैं इस विषय पर पहले ही सरकार का ध्यान आकृष्ट कराना चाहता था, पर क्या करुं राहुल गांधी के चक्कर में समय खराब हो गया। वैसे ये एक ऐसा विषय है कि तमाम आंकेडबाजी के जरिए भी आपको समझाने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन मैं आपको ज्यादा बोर नहीं करना चाहता। सिर्फ वितरण प्रणाली पर मेरे मन मे कुछ सवाल हैं, जो आपके सामने उठाता हूं।

रसोई गैस

पहले बात रसोई गैस की। मुझे लगता है कि ये बात आप समझ लेगें तो आगे के विषय खुद बखुद आसान हो जाएंगे। आपको पता है कि घरेलू उपयोग की रसोई गैस की कीमत व्यावसायिक इस्तेमाल करने वालों के मुकाबले कम है। मतलब होटल और रेस्टोरेंट में जो गैस सिलेंडर इस्तेमाल होते हैं, वो घरेलू गैस सिलिंडर के मुकाबले मंहगे हैं। सरकार का मानना है चूंकि होटल और रेस्टोरेंट के लोग गैस का व्यावसायिक इस्तेमाल करते हैं, इसलिए उन्हें सब्सिडी से अलग रखा गया है। ये अच्छी बात है, मैं क्या आप भी सहमत होंगे।

डीजल

लेकिन यही बात डीजल पर क्यों नहीं। व्यावसायिक पंजीकरण वाले वाहनों को बिना सब्सिडी के डीजल क्यों नहीं दी जानी चाहिए। आज खेतों की सिंचाई के लिए गरीब किसानों को जिस कीमत पर डीजल मिल रहा है, वही कीमत ट्रकों, बसों और अन्य व्यावसायिक इस्तेमाल वाले वाहनो को भी मिल रहा है। वैसे तो केंद्र की सरकार गरीबों की बात करती है, कमजोर तपकों को राहत देने का संकल्प दोहराती है, लेकिन डीजल के मामले में ऐसा भेदभाव क्यों कर रही है।

पेट्रोल

यही बात पेट्रोल पर भी लागू हो सकती है। लग्जरी कार इस्तेमाल करने वाले धनपशुओं को क्यों सब्सिडी वाला पेट्रोल दिया जाना चाहिए। स्कूटी और मोटर साइकिल इस्तेमाल करने वाले स्टूडैट भी 60 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल लेते हैं और अंबानी भी यही कीमत चुकाते हैं। छोटी कार इस्तेमाल करने वाले महीने में जितने पैसे का पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं, उससे कई गुना तथाकथित बडे लोग ड्राईवर को वेतन देते हैं। जिनके लिए एक से बढ़कर एक मंहगी कार दरवाजे पर खड़ा करना उनके लिए स्टेट्स सिम्बल है, तो उन्हें सब्सिडी क्यों दी जा रही है।

सुझाव

-मुझे लगता है कि वेतनभोगी जो छोटी कार भी लेने के लिए लोन का सहारा लेते हैं, उनकी गाड़ी का पंजीकरण और लग्जरी गाड़ियों के पंजीकरण से अलग होनी चाहिए, और उन्हें सब्सिडी के साथ पेट्रोल और डीजल देना चाहिए।


-एक से अधिक कार वालों को सब्सिडी से तो मुक्त रखना ही चाहिए, बल्कि उनसे अतिरिक्त टैक्स भी लेना चाहिए।


-देश में पेट्रोल और डीजल पर एजूकेशन टैक्स की वसूली होती है। ये टैक्स बच्चों से क्यों लिया जाना चाहिए। मुझे लगता है स्कूटी और अन्य हल्के दुपहिया वाहन को स्टूडैंट वाहन मानकर बच्चों को आधे दाम पर पेट्रोल दिया जाना चाहिए।


-एबूलेंस और अन्य जरूरी वाहनों को भी आधे दाम पर डीजल और पेट्रोल देने का प्रावधान होना चाहिए। अगर गंभीर मरीजों को ट्रेन और सरकारी बसों में रियायत दी जाती है तो एंबूलेंस को क्यों नहीं।

मुझे लगता है कि वितरण प्रणाली में सुधार के जरिए सरकार गरीबों को राहत दे सकती है, पर सच्चाई ये है कि सरकार चुनावों में बड़े लोगों से चंदा वसूलती है, तो भला वो ऐसा कदम कैसे उठा सकते हैं। आइये राहुल गांधी जी गरीबों की इस मुहिम की अगुवाई कीजिए, पार्टी वार्टी, सभी विचारधारा को छोड़ देश का एक बड़ा वर्ग आपकी अगुवाई स्वीकार करेगा। भट्टा परसौल में कुछ लोगों की लड़ाई लड़ने से वो कद नहीं बढ सकता जितना इस मुहिम से जुड़ने से आपका कद बढेगा। लेकिन मुझे पता है आप ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि सरकार ही तेल पीती है।

Tuesday, 24 May 2011

भूख

सिर्फ चार लाइनें.........
भूख ने मजबूर कर दिया होगा,



आचरण बेच कर पेट भर लिया होगा।


अंतिम सांसो पर आ गया होगा संयम,


बेबसी में कोई गुनाह कर लिया होगा।

Thursday, 19 May 2011

इस गांधी की जुबान फिसलती है !

वैसे तो राहुल गांधी पर बात करने से ज्यादा जरूरी और मुद्दे भी हैं, जिस पर लिखने की इच्छा हो रही थी, और इन मसलों से लोग सीधे जुड़े भी हैं। मेरा हमेशा से ये मानना भी रहा है कि ब्लाग सिर्फ लिखने के लिए ना लिखूं, बल्कि यहां मैं अपने सामाजिक दायित्वों को भी ईमानदारी से पूरा करुं। आम धारणा है कि मीडिया वाले कुछ भी लिख सकते हैं, कुछ भी बोल सकते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। मीडिया की लक्ष्मण रेखा का अंदाजा आप मीडिया में रहकर ही लगा सकते हैं। पहले अखबारों में रिपोर्टर खबरें लिखते थे और सब एडीटर उस पर हैडिंग लगाकर खबरों को प्रकाशित कर देते थे, अब हालात बदल गए हैं। रिपोर्टर को सुबह हैडिंग थमा दी जाती है और शाम को हैडिंग के अनुरूप खबर लिखनी होती है। इलैक्ट्रानिक मीडिया की बंदिशे तो कुछ और भी ज्यादा है। वैसे तो यहां खबरों से ही कुछ लेना देना नहीं है। टीवी में वही दिखता है, जो बिकता है। इलैक्ट्रानिक मीडिया में राहुल दिख रहे हैं, जाहिर है इस समय वो बिक रहे हैं। बिक रहे हैं कि आशय कुछ और नहीं बल्कि ये कि उनके बारे में लोग रिपोर्ट देखना चाहते हैं। बस इसीलिए मैं भी मजबूर हुआ और सोचा चलो आज फिर एक घंटा खराब कर लेते हैं राहुल के नाम पर।
दरअसल राहुल के चंपुओं की नींद उड़ी रहती है, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी है कि राहुल को बड़ा बनाने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहिए। इनके करीबियों को लगा कि दिल्ली से सटे गांव भट्टा परसौल में किसान इस समय आग बबूला हैं, यहां राहुल को फिट किया जा सकता है। बस योजना बनी कि भट्टा गांव जाना है, एसपीजी ने चोर रास्ते का मुआयना किया और अगले दिन राहुल को बाइक से लेकर गांव पहुंच गए। इधर चंपुओं ने मीडिया में खबर उड़ाई कि राहुल यूपी पुलिस की आंख में धूल झोंक कर गांव पहुंचे। खैर ये बात सही है कि और दलों के नेता वहां नहीं पहुंच पाए जबकि राहुल पहुंच गए।
आइये अब मुद्दे की बात करते हैं, राहुल कहते हैं कि हम इस मसले पर सियासत नहीं कर रहे हैं बल्कि किसानों को उनका हक दिलाना चाहते हैं। भाई राजनीति में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता है। ऐसे में अगर राहुल सही मायनों में किसानों की समस्या का हल चाहते तो वो इसके लिए यूपी की मुख्यमंत्री मायावती से मिलने का समय मांगते और किसानों के साथ लखनऊ जाते। लेकिन राहुल कहां गए, प्रधानमंत्री मनमोहन के पास। अब प्रधानमंत्री ने यूपी सरकार से रिपोर्ट मांगी है। अब अगर राहुल को प्रधानमंत्री से न्याय नहीं मिला, फिर क्या करेंगे वो, क्या यूएनओ चले जाएंगे।

चलिए राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिल लिए अच्छी बात थी, लेकिन उन्हें मीडिया के सामने किसने कर दिया। जब उन्हें ये नहीं पता कि मीडिया से कितनी और क्या बात करनी है तो फिर उन्हें कैमरे के सामने क्यों लाया गया। ये बात मैं आज तक नहीं समझ पाया। राहुल ने कैमरे पर कहा कि भट्टा परसौल गांव में किसानों को जिंदा जला दिया गया और महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। ये दोनों बातें उतनी ही गलत हैं, जैसे मैं ये कहूं कि देश के प्रधानमंत्री राहुल गांधी हैं। फिर भी राहुल और उनके चंपू नेता जब कहते हैं, इस मुद्दे पर वो राजनीति नहीं किसानों को न्याय दिलाना चाहते हैं, तो हंसी आती है। अब हालत ये है कि कांग्रेस के बडे नेताओं को डैमेज कंट्रोल के लिए आगे आना पड़ा है।
मुख्यमंत्री मायावती को भी ये कहने का मौका मिल गया कि राहुल ड्रामेबाजी कर रहे हैं। सच तो ये हैं कि अब लगने भी लगा है कि वो ड्रामेबाजी कर रहे हैं। कांग्रेस के दिमागी दिवालियेपन की हालत ये हो गई है कि यूपी कांग्रेस के अधिवेशन में भी वो पूरे समय तक भट्टा परसौल गांव की मुश्किलों पर चर्चा करने तक सिमट कर रह गए। अरे कांग्रेसी मित्रों, यूपी में हाशिए पर हो, कुछ ठोस पहल करो, जिससे विधानसभा में आपकी संख्या कुछ सम्मानजनक हो जाए। पूरे दिन इस अधिवेशन में इतनी झूठ और फरेब की बातें हुई कि भगवान को भी खफा हो गए। इसलिए दिन में तो पांडाल में आग लगी और रात में ऐसा आंधी तूफान आया कि पांडाल ही उड़ गया, और दो दिन के अधिवेशन को एक दिन में समेटना पड़ गया।

राहुल के चंपुओं को एक बात और समझ में आनी चाहिए कि जब वो सरकार पर आरोप लगाते हैं कि अगड़ों के साथ मारपीट की गई, किसानों को जिंदा जलाया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई, तो मायावती के मतदाता और संगठित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि बहन जी जब कानून का डंडा चलाती हैं तो ये नेता लोग बेवजह चीखते हैं। ऐसे में अगर मैं ये कहूं कि राहुल कांग्रेस के लिए कम मायावती के लिए ज्यादा काम कर रहे है तो गलत नहीं है। बहरहाल राहुल जिस तरह के आरोप लगाया करते हैं वो किसी पार्टी के ब्लाक स्तर का नेता लगाए तो बात समझ में आती है, राहुल के मुंह से तो कत्तई अच्छी नहीं लगती।
राहुल ने भट्टा परसौल के मामले में जो कुछ भी किया उससे वरुण गांधी की याद आ गई। वरुण ने अल्पसंख्यकों को लेकर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया था उससे उनकी न सिर्फ थू थू हुई, बल्कि उन्हें जेल तक जाना पड़ा। अब राहुल गांधी को ले लीजिए, पहले गांव वालों के बीच में उन्होंने कहा कि उन्हें तो भारतीय होने पर ही शर्म आ रही है, और अब जिंदा जलाने और बलात्कार की जो बातें उन्होंने की उसे तो भट्टा गांव के लोग ही सही नहीं मानते। लगता है कि इन दोनों गांधियों को जुबान फिसलने की बीमारी है।

चलते चलते..
मेरे कहने का तरीका गलत हो सकता है, पर आप वो ही समझें जो मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूं। कांग्रेस में चमचागिरी की हालत ये हो गई है कि पार्टी के एक ठीक ठाक नेता ने बातचीत में मुझसे कहा कि मैं राहुल गांधी का बायां हाथ बनना चाहता हूं। मैं परेशान कि लोग तो दाहिना हाथ बनने की बात करते हैं, ये बायां क्यों। मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ लिया.. भाई आप बाया हाथ क्यों बनना चाहते हैं। उन्होंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि श्रीवास्तव जी बाएं हाथ की पहुंच कहां कहां होती है, आप नहीं जानते। खैर सियासत है..कुछ भी संभव है।

Tuesday, 17 May 2011

सियासी गलियारे की हकीकत

सत्ता के गलियारे में पिछला 15 दिन काफी उतार चढाव वाला रहा। आइये हर मामले में आपको छोटी छोटी जानकारी देता हूं। बात करेंगे पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलानाडु और कर्नाटक तक की। पेट्रोल की कीमतों के बारे में भी। सबसे पहले बात पश्चिम बंगाल के लाल किले को ढहाने वाली ममता बनर्जी की।

चलिए छोटी सी बात कर ली जाए ममता बनर्जी को लेकर, क्योंकि अब उन्हें देनी है अग्निपरीक्षा। ममता तेज तर्रार नेता हैं, अगर उन्हें आयरन लेडी कहें तो गलत नहीं होगा। लेकिन मेरा मानना है कि वो सत्ता के खिलाफ संघर्ष को तो कुशल नेतृत्व दे सकती हैं, सरकार का नेतृत्व करना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं। सियासत मे तरह तरह के समझौते करने पड़ते हैं, लेकिन ममता किसी तरह का समझौता कर पाएंगी, उनके व्यक्तित्व से तो नहीं लगता है। इतना ही नहीं वो अपनी पार्टी के नेताओं पर आंख मूंद कर भरोसा भी तो नहीं करतीं हैं।

केंद्र की सरकार में जब ममता बनर्जी ने शामिल होने का फैसला किया तो उनके सांसदों की संख्या के हिसाब से कम से कम छह लोगों को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता था, लेकिन पार्टी नेताओं पर भरोसा ना करने वाली ममता ने अपनी पार्टी के किसी भी नेता को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया। केंद्र में वो अकेले कैबिनेट मंत्री रहीं। पार्टी के बाकी नेताओं को मन मसोस कर राज्यमंत्री पर ही संतोष करना पड़ा। टीएमसी के नेता ममता के खिलाफ मुखर होकर बोले तो नहीं, लेकिन ये पीड़ा उनकी पार्टी के कई नेताओं में देखी गई।

अब ममता को पश्चिम बंगाल में पूरा मंत्रिमंडल बनाना है। ये काम उनके लिए एक बड़ी चुनौती होगी। ममता की ईमानदारी की बात होती है तो लोग उन्हें पूरे नंबर देते हैं। सूती साड़ी और हवाई चप्पल को वो सादगी से कहीं ज्यादा हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। बड़ी बात ये है कि क्या ममता अपने मंत्रिमंडल में शामिल लोगों को भी यही सलाह देगी कि वो सादगी से रहें। तड़क भड़क में ना पड़ें। मुझे लगता है कि ऐसा वो नहीं कर पाएंगी, क्योंकि उनकी पार्टी में शामिल 80 फीसदी से ज्यादा लोग डिजाइनर ड्रेस में भरोसा करते हैं। ममता बनर्जी को अब दिखावे से ज्यादा प्रैक्टिकल होना पडेगा। चलिए अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगी, जल्दी ही सब सामने आ जाएगा। पहले तो मंत्रिमंडल का गठन होने दें, देखते हैं वो अपने छवि वाले नेता कहां से लाती हैं। वैसे ममता जी...

राजनीति में अक्सर जूते खाने पड़ते हैं,

कदम कदम पर सौ सौ बाप बनाने पड़ते हैं।

और आपसे ऐसा कम से कम हमें उम्मीद नहीं है। इसलिए ना जाने क्यों मुझे शक है कि आप सरकार का नेतृत्व कैसे कर पाएंगी।

तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके कहने को तो राजनीतिक दल हैं, लेकिन इनका एक दूसरे से व्यवहार सांप और नेवले जैसा है। दोनों एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखना चाहते। ये राजनीतिक लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई की तरह लड़ते हैं, जिसे जब मौका मिलता है वो एक दूसरे को नीचा दिखाने, यहां तक की उसे जेल भेजने से भी पीछे नहीं रहते।

टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा को जेल हो जाने के बाद डीएमके की तमिलनाडु में काफी थू थू हुई। इसके साथ ही विधानसभा चुनाव में पार्टी हाशिए पर पहुंच गई। मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने के बाद जयललिता पूरी तरह फार्म में आ चुकी हैं, अभी वो उन वादों को पूरा कर रही हैं, जो उन्होंने जनता से किए थे। उसके बाद उनका अपना एजेंडा शुरू होगा, एजेंडा साफ है ना सिर्फ करुणानिधि बल्कि पूरे परिवार को सबक सिखाना। वैसे टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कर रही सीबीआई करुणानिधि के घर तक दस्तक देने को तैयार बैठी है। ऐसे में हो सकता है कि जयललिता कुछ इंतजार कर लें कि जब सीबीआई ही इनकी दुर्गत करने में लगी है तो वो क्यों अपने हाथ गंदे करें। वैसे इतना धैर्य देखा तो नहीं गया है जयललिता में।

छूटल घाट धोबनिया पइलस,

अब त पटक-पटक के धोई,

कहो फलाने अब का होई..    हाहाहाहा चचा करुणानिधि


कर्नाटक की अगर बात करें तो समझ में नहीं आता कि वहां सरकार बीजेपी नेता युदुरप्पा की है या फिर कांग्रेसी राज्यपाल हंसराज भारद्वाज की। हंसराज की छवि एक ऐसे नेता की रही है जो हमेशा विवादों में रहना पसंद करते हैं। केंद्र में कानून मंत्री रहने के दौरान भी वो हमेशा सुर्खियों में रहे। भारद्वाज जब से कर्नाटक पहुंचे है, वहां की सरकार को अस्थिर करने मे लगे हुए हैं। ये सही बात है कि कर्नाटक में बीजेपी नेताओं के बीच आपस में ही कुछ अनबन है, जिसके चलते उठा पटक होती रहती है। लेकिन इसका ये मतलब कत्तई नहीं कि कांग्रेसी राज्यपाल राजभवन में ही सियासी खेल शुरू कर दें।

सरकार बहुमत में है या नहीं इसका फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए। अगर ये राजभवन में तय होने लगा तो हमारा संघीय ढांचा चरमरा जाएगा। आपको याद होगा तीन चार महीने पहले भी हंसराज भारद्वाज सरकार को बर्खास्त करने और यहां राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर चुके हैं और तमाम विचार विमर्श के बाद गृहमंत्रालय ने हंसराज की सिफारिश को खारिज कर दिया। अब एक बार फिर उन्होंने सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की है। इस बार तो वो सिफारिश करने के पहले दिल्ली में भी जोड़ तोड़ करके कर्नाटक पहुचे। पहले यहां उन्होंने गृहमंत्री पी चिदंबरम से बात की फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले। वो दोनों नेताओं का समर्थन चाहते थे। हालाकि बीजेपी जिस आक्रामक मुद्रा मे है, उससे कर्नाटक की सरकार को बर्खास्त करने की हिम्मत केंद्र सरकार जुटा पाएगी, लगता नहीं है। वैसे भी सरकार के इस फैसले को संसद में भी पास कराना होगा और सरकार को पता है उच्च सदन यानि राज्यसभा में उनकी संख्या कम है, ऐसे मे उनका ये कदम आत्मघाती साबित हो सकता है। लेकिन इस पूरे एपीसोड में राज्यपाल हंसराज भारद्वाज का काला और गंदा चेहता जरूर सामने आ गया है।

हां अगर चलते चलते पेट्रोल की बात ना करुं तो सियासी गलियारे की गतिविधिया अधूरी रह जाएंगी। ये सही है कि अंतर्रराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमते आग उगल रही हैं, लेकिन सिर्फ ये कह कर सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। आपको ये जानकार हैरत होगी कि जब पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं तो जेट फ्यूल (हवाई जहाज में भरा जाने वाला ईधन) के दाम कम हो रहे हैं। जब हम कहते हैं कि सरकार बडे़ लोगों के मुनाफे की बात करती है तो गलत थोड़े कहते हैं। ये उसका उदाहरण है। वैसे तेल में लगी आग के लिए केंद्र और राज्य सरकारें दोनों जिम्मेदार हैं। आपको बता है कि 60 रुपये लीटर पेट्रोल बेचने पर आयल कंपनियों के खाते में सिर्फ 28 रुपये आते हैं और बाकी के 32 रुपये हम केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न प्रकार के टैक्स भरते हैं। गरीबों और मध्यम श्रेणी के लोगों को कैसे राहत दी जा सकती है, इस पर हम अलग से फिर चर्चा करेंगे।