Sunday, 29 December 2013

"आप" का समर्थन कर मुश्किल में कांग्रेस !

ज बिना लाग लपेट के एक सवाल  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पूछना चाहता हूं। मैंडम सोनिया जी, आप बताइये कि क्या कोई कांग्रेसी आपके दामाद राबर्ट वाड्रा को बेईमान और भ्रष्ट कह कर पार्टी में बना रह सकता है ? मैं जानता हूं कि इसका जवाब आप भले ना दें, लेकिन सच्चाई ये है कि अगर किसी नेता ने राबर्ट का नाम भी अपनी जुबान पर लाया तो उसे पार्टी से बिना देरी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। अब मैं फिर पूछता हूं कि आखिर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ये कांग्रेस उनके पीछे कैसे खड़ी हो गई, जिसने आपके दामाद वाड्रा को सरेआम भ्रष्ट और बेईमान बताया। क्या ये माना जाए कि केजरीवाल ने जितने भी आरोप आपके परिवार और पार्टी पर लगाएं है, वो सही हैं, इसलिए आपकी पार्टी उनके साथ खड़ी हैं, या फिर पार्टी में कहीं कई विचार पनप रहे हैं,  लेकिन सही फैसला लेने में मुश्किल आ रही है और आपका बीमार नेतृत्व पार्टी को अपाहिज  बना रहा है।

खैर सच तो ये है कि आम आदमी पार्टी को समर्थन देना अब कांग्रेस के गले की फांस बन गई है। मेरी नजर में तो आप को समर्थन देकर कांग्रेस ने एक ऐसी राजनीतिक भूल की है, जिसकी भरपाई संभव ही नहीं है। सबको पता ही है किसी भी राजनीतिक दल को दिल्ली की जनता ने बहुमत नहीं दिया, लिहाजा लोग सरकार बनाने की पहल ना करते और ना ही किसी को समर्थन का ऐलान करते ! लेकिन कांग्रेस के मूर्ख सलाहकारों को लगा कि अगर वो आप को समर्थन का ऐलान करती है, तो ऐसा करके वो दिल्ली की जनता के दिल मे जगह बना लेगी और केजरीवाल जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पाएंगे, लिहाजा वो जनता का विश्वास खो देंगे। इससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। इधर पहले तो केजरीवाल समर्थन लेने से इनकार करते रहे और कहाकि वो किसी के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। इस पर कांग्रेसी दो कदम आगे आ गए और कहने लगे की उनका समर्थन बिना शर्त है, सरकार बनाकर दिखाएं।

अब कांग्रेसियों की करतूतों से केजरीवाल क्या देश की जनता वाकिफ है, सब जानते हैं कि इन पर आसानी से भरोसा करना मूर्खता है। लिहाजा केजरीवाल ने ऐलान किया कि वो जनता से पूछ कर इसका फैसला करेंगे। इस ऐलान के साथ केजरीवाल दिल्ली की जनता के बीच निकल गए, और जनता की सभा में उन्होंने आक्रामक तेवर अपनाया। हर सभा में ऐलान करते रहे कि सरकार बनाते ही सबसे पहला काम भ्रष्टाचार की जांच कराएंगे और दोषी हुई तो शीला दीक्षित तक को जेल भेजेंगे। आप पार्टी ने कांग्रेस पर हमला जारी रखा, लेकिन कांग्रेस को लग रहा था कि वो केजरीवाल को बेनकाब कर देंगे, इसलिए समर्थन देने के फैसले पर अडिग रहे। मैने तो पहली दफा देखा कि जिसके समर्थन से कोई दल सरकार बनाने जा रहा है वो उसके नेताओं को गाली सरेआम गाली दे रहा है और पार्टी कह रही है कि नहीं सब ठीक है। वैसे अंदर की बात तो ये भी है कांग्रेस में एक तपका ऐसा है जो पूर्व  मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का विरोधी है, उसे लग रहा है कि केजरीवाल जब जांच पड़ताल शुरू करेंगे तो शीला की असलियत सामने आ जाएगी।

केजरीवाल ने शपथ लेने से पहले कांग्रेस को इतना घेर दिया है कि अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा। शपथ लेने के दौरान भी केजरीवाल ने साफ कर दिया कि वो किसी से समर्थन की गुजारिश नहीं करेंगे। बहुमत मिला तो सरकार चला कर जनता की सेवा वरना जनता के बीच रहकर उसकी सेवा। अब कांग्रेस के गले मे ये हड्डी ऐसी फंसी है कि ना उगलते बन रहा है ना ही निगलते बन रहा है। अगर कांग्रेस समर्थन वापसी का ऐलान करती है तो उसकी दिल्ली में भारी फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। बता रहे हैं कि इस सामान्य मसले को पेंचीदा बनाने के बाद अब कांग्रेसी 10 जनपथ की ओर देख रहे हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि 10 जनपथ में तमाम जानकार बैठे हैं, जो मुद्दे का हल निकाल देंगे। बहरहाल शपथग्रहण के बाद से जो माहौल बना है, उससे दो बातें सामने हैं। एक तो दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो जाएगा, दूसरा दिल्ली में आराजक राजनीति की शुरुआत  हो गई है।

वैसे आप कहेंगे कि सोनिया गांधी से सवाल पूछना आसान है, लेकिन किसी मुद्दे का समाधान देना मुश्किल है। मैं समाधान दे रहा हूं। एक टीवी  न्यूज चैनल के स्टिंग आँपरेशन में पार्टी के पांच विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग हट कर बयान दिया और केजरीवाल को  पागल तक बताया। कांग्रेस आलाकमान को इस मामले को तत्काल गंभीरता से लेते हुए अपने पांचो विधायकों को पार्टी से निलंबित कर उनकी प्राथमिक सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए। इससे दिल्ली की जनता में ये संदेश जाएगा कि पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर अरविंद की आलोचना करने पर इन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। उधर विधायक दल बदल कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे।   



Friday, 27 December 2013

ईमानदार ही नहीं गंभीर भी हो सरकार !

बहुत बुलंद फजाँ में तेरी पतंग सही,
मगर ये सोच जरा डोर किसके हाथ में है ।

मुझे लगता है कि इन दो लाइनों से अरविंद केजरीवाल को समझ लेना चाहिए कि उनके बारे में आम जनता की राय क्या है ? हम सब जानते हैं कि केजरीवाल ने अन्ना के मंच से जोर शोर से दावा किया था कि कभी राजनीति में नहीं जाऊंगा, पर राजनीति में आ गए। राजनीति में आने के लिए इस कदर उतावले रहे कि उन्होंने अन्ना को भी किनारे कर दिया। यहां तक आंदोलन में उनकी सहयोगी देश की पहली महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी से भी नाता तोड़ लिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई, बाद में
बच्चे की कसम खाई कि ना बीजेपी और कांग्रेस से समर्थन लूंगा और ना ही दूंगा, ये भी बात झूठी निकली, कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने जा रहे हैं। कह रहे थे कि सरकार में आते ही दिल्ली में रामराज ला दूंगा, अब कह रहे हैं कि हमारे हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है। बहरहाल जैसा दूसरे दलों में मंत्री पद के लालची होते हैं, वो चेहरा केजरीवाल की पार्टी में भी दिखाई दिया। उनकी पार्टी का एक विधायक मंत्री ना बनाए जाने से नाराज हो गया, महज नाराज होता तो भी गनीमत थी, वो तो कहने लगा कि प्रेस कान्फ्रेंस करके केजरीवाल की पोल खोल दूंगा। खैर रात भर मेहनत करके उस विधायक को मना तो लिया गया, लेकिन ये सवाल जनता में जरूर रह गया कि आखिर ये विधायक अरविंद केजरीवाल की कौन सी पोल खोलने की धमकी दे रहा था।


केजरीवाल कहते रहे कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी बीजेपी को निभानी चाहिए थी, क्योंकि उनके पास 32 विधायक हैं। अरे भाई केजरीवाल साहब वो सरकार बना लेते, पहले आप कहते तो कि " मैं बीजेपी को समर्थन देने को तैयार हूं"। जब बीजेपी को कोई समर्थन नहीं दे रहा है, तो उनकी सरकार भला कैसे बन सकती थी ? आप रोजना उनकी आलोचना कर रहे हैं, मैं पूछता हूं कि आप तो इन राजनीतिज्ञों से हट कर हैं, आपको तो कुर्सी की कोई लालच भी नहीं है, आप हमेशा कहते रहे हैं कि अगर सरकार जन लोकपाल लाने का वादा करे, तो वो चुनाव के मैदान से भी हट जाएंगे। मेरा सवाल है कि आपने खुद शर्तों के साथ समर्थन देने की पहल क्यों नहीं की ? भाई केजरीवाल साहब समर्थन देने के मामले में तो आप ये कहते हैं कि उनका जनता से वादा है कि किसी को समर्थन नहीं दूंगा। मित्र केजरीवाल जनता से तो आपका ये भी वादा था कि किसी से समर्थन लूंगा भी नहीं, फिर ये वादा तो आपने तोड़ दिया। उस कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं, जिससे चुनाव में आपकी सीधी लड़ाई थी, जिसके खिलाफ जनता ने आपको वोट दिया।


कांग्रेस  से जनता कितनी त्रस्त थी, ये बताने की जरूरत नहीं है। क्योंकि आपको  भी ये उम्मीद नहीं थी कि उनकी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी चुनाव में हार जाएंगी। ईमानदारी की बात तो ये है कि आप को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि आप चुनाव जीत सकते हैं। लेकिन जनता का गुस्सा ऐसा था कि कांग्रेस  के तमाम दिग्गजों को चुनाव हरा दिया। अब जिनको आप गाली देते रहे, उन्हीं की मदद से कुर्सी पर बैठ रहे हैं। वैसे तो आप पहले कुर्सी संभालिए, फिर जनता देखेगी कि कांग्रेस के बारे में आप की अब क्या राय है ? कांग्रेस के जिन मंत्रियों को आप गाली देते रहे, जिन पर गंभीर आरोप थे, जब आप विधानसभा में बहुमत साबित करेंगे तो वो आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। चलिए एक आखिर बात कहकर इस विषय को यहीं खत्म करते हैं। चुनाव के दौरान 20 करोड़ रुपये चंदा आ गया तो आप ने कहाकि अब आपको पैसे की जरूरत नहीं है, लोग चंदा ना दें। यहां आप नैतिकता की बात कर रहे थे। अब विधानसभा में संख्या कम हो गई तो वही चोर, उचक्के, भ्रष्ट (ये सब  आप कहते रहे हैं) उनका साथ लेने से आपको कोई परहेज नहीं है। भाई अब नैतिकता की बात कभी मत कीजिएगा.. आपके मुंह से ये शब्द सुनना बेईमानी है।


पगलाई इलेक्ट्रानिक मीडिया टीआरपी के चक्कर में आपके आस पास चिपकी हुई है। दिन भर में आप और आपकी टीम भी कई बार कैमरे के सामने आती है। एक बार कहते हैं कि लाल बत्ती नहीं लूंगा, दो घंटे बाद फिर बाहर आते हैं अब कहते हैं गाड़ी नहीं लूंगा। केजरीवाल साहब लालबत्ती नहीं लूंगा का मतलब ही ये है कि आप गाड़ी भी नहीं लेगें। अब बताइये गाड़ी नहीं लेगें तो क्या लाल बत्ती हाथ में लेकर चलेंगे ? बात यहीं खत्म नहीं हुई, मीडिया में आप छाये रहें इसके लिए कुछ चाहिए ना.. इसलिए कुछ देर बाद आप फिर कैमरे के सामने आए और कहा कि शपथ लेने मेट्रो से जाएंगे। चलिए जनता  को मालूम हो आपकी हकीकत, इसलिए बताना जरूरी है कि रामलीला मैदान तक मेट्रो नही जाती है, ऐसे में केजरीवाल मैट्रो से बाराखंभा रोड तक मेट्रो से आएंगे, उसके बाद अपनी कार से रामलीला मैदान जाएंगे। आपकी कार बाराखंभा रोड पर तो रहती नहीं है, मतलब ये कि आप कार को घर से बाराखंभा तक खाली भेजेंगे, फिर यहां से उस पर सवार होंगे। ऐसे में मेरा सवाल है कि आप इस कार पर घर से ही क्यों नहीं सवार हो जाते ? ये हलकी  फुलकी  बातों से सरकार नहीं चलती केजरीवाल साहब ! ये सब करके आप  दिल्ली और मेट्रो यात्रियों को केवल डिस्टर्ब ही करेंगे। शहर में आराजकता के हालात पैदा करेंगे।


केजरीवाल कितने दिनों से गिना रहे हैं कि वो आटो पर चलेगे, मेट्रो का सफर  करेंगे, लाल बत्ती नहीं लेगें, बंगला और गाड़ी नहीं लेगें। आपने कभी गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर के मुंह से ये सब सुना है। वो काफी समय से गोवा के मुख्यमंत्री हैं। उनके पास भी  सरकारी गाड़ी, बंगला, लालबत्ती कुछ नहीं है। स्कूटी से दफ्तर जाते हैं, कई बार तो रास्ते में खड़े होकर किसी से  लिफ्ट लेते भी दिखाई दे जाते  हैं। और  हां केजरीवाल की पत्नी तो लालबत्ती की गाडी में ऑफिस जाती है जबकि गोवा के CM की पत्नी आज भी रिक्शे में बैठकर बाजार से खुद सामान लाती हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता  बनर्जी को ही ले लीजिए। रेलमंत्री रहने के दौरान कभी वो दिल्ली में लालबत्ती की कार पर नहीं चढ़ीं, मंत्रालय में अपनी टूटही जेन कार पर सवार होकर जाती हैं और सूती साड़ी के साथ हवाई चप्पल पहनती हैं। एक बार ममता ने देखा कि एक स्कूटर सवार सड़क पर अचानक गिर पड़ा , तो वो अपने कार से उतरी और घायल  को उसी कार से अस्पताल भेज दिया और खुद आटो लेकर संसद गईं। लेकिन उन्होने अपने मुंह से ये सब कभी नहीं कहा।


त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी साफ छवि वाले राजनेता हैं। गरीबी में पले-बढ़े माणिक सरकार की कुल चल और अचल संपति ढाई लाख रुपए से भी कम आंकी गई है। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र के अनुसार, 64 साल के माणिक सरकार के पास 1,080 रुपए कैश और बैंक में 9,720 रुपए हैं। केजरीवाल तो फिर भी लाखों  रूपये के मालिक हैं। माणिक तो अपनी सैलरी और भत्ते भी पार्टी फंड में देते हैं। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी सादगी पसंद इंसान हैं। वह किराये के सरकारी मकान में रहते हैं। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र में उन्होंने जानकारी दी थी कि उनके पास न ही कोई मकान है और न ही गाड़ी। कैश के नाम पर उनके पास केवल पांच हजार रुपए हैं। ऐसा नहीं  है कि गाड़ी, बंगला ना लेने वाले आप कोई पहले नेता हैं, बहुत सारे लोग ऐसे रहे हैं।  लेकिन हां आप इस मामले में जरूर पहले नेता हैं जो अपने मुंह से पूरे दिन मीडिया के सामने गाते रहते हैं कि मैं ये नहीं लूंगा वो नहीं लूंगा। दूसरे नेताओं ने कभी अपने मुंह से कहा नहीं।


खैर आप मुख्यमंत्री बनिए, हमारी  भी शुभकामनाएं हैं। हम भी चाहते हैं कि दिल्ली मे एक ईमानदार सरकार  ही न हो, बल्कि वो ईमानदारी से काम भी करे। लेकिन जिस सरकार की बुनियाद में बेईमान हों, उससे बहुत ज्यादा ईमानदारी की उम्मीद रखना, मेरे ख्याल से  बेईमानी होगी। मैं चाहता हूं कि दिल्ली में ना सिर्फ एक ईमानदार बल्कि गंभीर सरकार होनी  चाहिए। दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह से टोपी लगाए गुमराह नौजवान घूम रहे हैं, इन्हें आपको ही नियंत्रित करना होगा, वरना कल ये आपके लिए ही सबसे बड़ा खतरा  बन जाएंगे।




Thursday, 12 December 2013

कुर्सी से भाग रहे हैं केजरीवाल !

पको ऐसा नहीं लग रहा कि केजरीवाल अब कुछ ज्यादा बोल रहे हैं ? इन दिनों उनमें कुछ ज्यादा ही अहम दिखाई दे रहा है। उनके बयानों से लगता है कि या तो वो दिल्ली की  जनता को मुर्ख समझ रहे हैं या फिर एक साजिश के तहत मूर्खता कर रहे हैं। उन्होंने जीत के जश्न में कहाकि भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने से डर रही है। ये बात केजरीवाल किस आधार पर कर रहे हैं, ये तो वही बता सकते हैं, क्योंकि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जो जरूरी संख्या है, वो किसी के पास  नहीं है। आइए पहले मैं आपको विधानसभा का गणित समझा दूं। दिल्ली की 70 विधान सभा सीट में बहुमत के लिए 36 विधायकों का समर्थन चाहिए। बीजेपी के पास महज 32 ही विधायक हैं, आप के पास 28 और कांग्रेस के पास 8 जबकि दो अन्य सदस्य हैं। बीजेपी को कांग्रेस और आप दोनों ने ही समर्थन देने से इनकार कर दिया है, फिर कैसे बन सकती है सरकार ? अब इसका जवाब तो केजरीवाल के पास ही होगा।

बीजेपी को अगर सरकार बनानी है तो उसे कम से कम चार विधायकों का समर्थन जुटाना होगा। माना की बीजेपी बहुत कोशिश करेगी तो जो अन्य दो सदस्य जीते हैं, उनका समर्थन हासिल कर सकती है, लेकिन बाकी दो विधायक कहां से आएंगे, ये मैं केजरीवाल से ही पूछना चाहता हूं। समर्थन जुटाने के लिए अगर बीजेपी दूसरी पार्टियों यानि कांग्रेस या आप  को तोड़ने की कोशिश करे तो उसे दो तिहाई सदस्यों को तोड़ना होगा। मसलन कांग्रेस के 8 विधायकों में जब तक छह लोग एक साथ पार्टी से विद्रोह नहीं करेंगे, वो कांग्रेस से अलग नहीं हो सकते। इसी तरह अगर केजरीवाल की पार्टी आप को तोड़ना हो तो उसके 28 सदस्यों में दो तिहाई का मतलब 19 विधायकों को पार्टी में विद्रोह करना होगा। अब केजरीवाल ही बताएं कि उनके 19 विधायकों को क्या बीजेपी तोड़ सकती है ? या फिर वो ये कहना चाहते हैं कि कांग्रेस के 6 विधायक आसानी से बीजेपी को समर्थन दे देंगे ? इन हालातों में बीजेपी सरकार बनाने के लिए भला कैसे आगे आ सकती है ?

दिल्ली का जो गणित है, उसके आधार पर बीजेपी कैसे सरकार बना सकती है जो वो नहीं बना रही है ? ये बात दिल्ली की जनता को अरविंद केजरीवाल ही समझा दें। क्या उन्हें ये लगता है कि उनकी पार्टी या फिर कांग्रेस के लोग टूटने के लिए बेकरार हैं, लेकिन बीजेपी नहीं तोड़ रही है ? ऐसे में बीजेपी की सरकार तो बनने से रही। बात कांग्रेस की करें, तो  उसकी सरकार किसी सूरत में नहीं बन सकती। उनके पास महज आठ सदस्य हैं, बीजेपी उसे समर्थन दे नहीं सकती, और केजरीवाल ने समर्थन देने से इनकार कर दिया है। इन हालातों में बाकी कौन बचता है ? बाकी बचते हैं, केजरीवाल और उनकी पार्टी आप ।

अब आप कहेंगे कि आप क्यों सरकार बनाए ? दरअसल कांग्रेस विधायक दल की बैठक में तय हुआ है कि वो केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी को बिना शर्त समर्थन देने के लिए तैयार हैं। अगर कांग्रेस बिना शर्त समर्थन दे रही है तो केजरीवाल साहब आप सरकार बनाने के लिए आगे क्यों नहीं आ रहे हैं ? राजनीति में सहयोग और समर्थन जरूरी है। वरना तो कोई भी सरकार नहीं चल सकती। जनता ये भी जानना चाहती है कि बिना शर्त समर्थन लेने से आप क्यों भाग रहे हैं ? अब अगर मैं आपसे कहूं कि आप सरकार  बनाने से खुद डर रहे हैं, क्योकि जब आपके हाथ में माइक होता तो आप क्या बोल रहे हैं, उस पर तो नियंत्रण है नहीं, कुछ भी बोलते हैं। लंबे चौडे जो वादे आपने जनता के सामने किए हैं, उसे भी पूरा करना होगा, वरना अगले चुनाव में जनता आपका हिसाब पूरा कर देगी।

केजरीवाल साहब मुख्यमंत्री बनिए, दिल्ली की जनता चाहती है कि आप मुख्यमंत्री बनें और बिजली दरों को आधी कर दें। आपका सबसे बड़ा मुद्दा ही ये रहा है कि सरकार बनते ही बिजली दरों को आधी करेंगे। अब वक्त आ गया है, दिल्ली में कम दर पर बिजली मिलने का। लेकिन अंदर की बात ये है कि आप बिजली दरों को जैसे ही आधी करने को कहेंगे, बिजली कंपनियां दिल्ली को अंधेरे में छोड़ कर दूसरे राज्य को चली जाएंगी। उसके बाद पड़ने वाली गाली से बचने के लिए यही अच्छा है कि आप कुर्सी से दूर रहें और साजिश के तहत आप कुर्सी पर नहीं बैठ रहे हैं। वैसे मौका है आपको दूसरे वादे भी याद दिला ही दूं, वरना नेताओं का क्या है, उनकी याददास्त बहुत कमजोर होती है।

भाई केजरीवाल जी सरकार बनाकर ही आप आधी दर पर बिजली देने के अलावा, 700 लीटर मुफ्त पानी, सभी गैरकानूनी कॉलोनियों को रेगुलराइज, मुस्लिम युवाओं पर लगे फर्जी मुकदमे वापस, सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी और ओबीसी का रिजर्वेशन सख्ती से लागू करने और बैकलॉग वैकेंसी भरने, करप्शन करने वाले लोकसेवक को नौकरी से निकालने, जेल भेजने और संपत्ति जब्त करने, दिल्ली के तमाम सफाई कर्मचारियों और ड्राइवरों को पर्मानेंट करने, उर्दू और पंजाबी भाषा की हैसियत बढ़ाने जैसे कदम उठा पाएंगे। चुनाव के दौरान जिस तरह आपने जनता को भरोसा दिया था, उससे लग रहा था कि सारे नेता, अफसर, कर्मचारी चोर हैं, उनमें ईमानदारी से काम करने की क्षमता नहीं है, इसीलिए सारी चीजें मंहगी है। लेकिन मैं जानता हूं कि आप सिर्फ कीचड़ उछालना जानते हैं, कोई विजन या क्षमता नहीं है आपमें जिससे मुश्किल आसान हो।

आखिर में एक बात और कहना चाहूंगा कि जिस तरह से आज एक गुमराह युवा वर्ग सफेद टोपी पहन कर सार्वजनिक स्थानों पर गुंडागर्दी कर रहा है, उससे इतना तो साफ है कि इनके खिलाफ अगर शुरू में ही सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले समय में देश में एक खतरनाक आराजक राजनीति की शुरूआत होगी। वैसे तो देश की राजनीति में पहले ही गुंडे बदमाश हावी रहे हैं। हर पार्टी इन बदमाशों, हिस्ट्रीशीटरों को गले लगाती रही है, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम रही है, जिससे समय-समय पर उन्हें जेल भी भेजा गया। लेकिन ये संगठित आराजक तत्व आसानी से कब्जे में नहीं आने वाले हैं। वैसे एक बात और , अगर केजरीवाल सरकार में आते हैं, तो जरा उनके विधायकों की शैक्षिक योग्यता तो देख लीजिए...


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Wednesday, 4 December 2013

आसाराम का भी बाप है नारायण साईं !

इये आज एक बार फिर बात बाबाओं के बलात्कार पर मचे बवाल की करते हैं। आसाराम की करतूतें सामने आ चुकी हैं, बाबा की जो करतूतें है उससे लग नहीं रहा है कि इसके बाल इसकी उम्र की वजह से सफेद हैं। लग रहा कि अपनी काली करतूतों को छिपाने के लिए इसने अपने दाढ़ी-बाल खुद सफेद किया है। खैर भगोड़ा घोषित हो चुका इसका बेटा नारायण साईं के भी पाप का घड़ा भर गया, देर रात ये भी आखिर पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया। पकडे़ जाने के दौरान नारायण सिख के वेष में था। इसने पिंक कलर की पगड़ी बांध रखी थी और जींस- टीशर्ट पहने हुए था। पकड़े जाने के बाद उसे इस बात की शर्म नहीं थी कि वो बलात्कार का आरोपी है, उसे इस बात पर शर्म थी कि अगर लोगों ने उसे जींस-टीशर्ट में देख लिया तो आगे बाबागिरी की दुकान का क्या होगा ? लिहाजा वो पुलिस वालों से गिड़गिड़ाने लगा कि पहले उसे धोती- कुर्ता पहन लेने दो, फिर गिरफ्तार करो। बहरहाल रात में तो पुलिस ने उसे कपड़े बदलने की छूट नहीं दी, लेकिन सुबह पुलिस ने उसे फिर बाबा बना दिया। कहावत है ना बाप एक नंबरी तो बेटा दस नंबरी। ये कहावत इस बाप-बेटे पर सटीक बैठती है, क्योंकि आसाराम का बाप है नारायण साईं...

अगर मैं नारायण साई को आसाराम का बाप बता रहा हूं तो इसके पीछे खास वजह है। इन दोनों के यौन उत्पीड़न को लेकर तो रोजाना नए - नए खुलासे होते ही रहते थे, लेकिन सबसे चौकाने वाली बात ये कि नारायण साईं दो-दो नाजायज औलाद का बाप है। मेरा मानना है कि कोई महिला आमतौर पर बच्चों के बारे में ऐसा दावा नहीं कर सकती। महिला का आरोप है कि साईं उसके साथ दुराचार करता रहा है और ये संतान भी उसी की है। महिला ने यह भी दावा किया कि साईं केवल उसके ही संतानों का पिता नहीं है, बल्कि वह एक अन्य सेविका की बेटी का भी पिता है। यह लड़की अभी अहमदाबाद में रह रही है। इतना ही नहीं नारायण साईं को मैं इसलिए भी आसाराम का बाप बता रहा हूं, क्योंकि ये अपने ही बाप की अश्लील सीडी बनाने की फिराक में था। साईं चाहता था कि आसाराम की कई महिलाओं के साथ सीडी बना ली जाए और फिर उसे ही संपत्ति से बेदखल कर पूरे राज पर कब्जा जमा ले। आपको पता है ये नारायण साईं अपने आश्रम की लड़कियों के साथ कृष्ण लीला करता था और वह लड़कियों के साथ नहाता था। इसे वह अपनी रासलीला कहता था। सूरत की जिस महिला ने साईं के खिलाफ रेप का केस दर्ज कराया था, उसी ने यह सनसनीखेज आरोप एक समाचार चैनल से बातचीत में लगाया है।

बहरहाल दोनों ही कुकर्मियों के पाप का घड़ा भर चुका था, लिहाजा दोनों की धोती खुल गई। बाप एकांतवास और बीमारी के इलाज नाम महिलाओं का शोषण करता रहा और बेटे का तो भगवान ही मालिक है। आमतौर पर स्मगलर कोडवर्ड में बातचीत करते हैं,  जिससे वो कभी धरे ना जाएं। लेकिन यहां तो नारायण साईं भी लड़कियों के मामले में कोडवर्ड में बात करता था। कोडवर्ड जानना चाहते हैं ? हां क्यों नहीं जानना चाहेंगे, आपको भी तो अय्यास बाबाओं की स्टोरी चटखारे लेकर पढ़ने में मजा आ रहा है। तो सुनिए कोडवर्ड.....जो लड़की एक बार आश्रम की चारदीवारी के अंदर पहुंच गई उसके बाद उसका बाहर आ पाना मुश्किल हो जाता है। आश्रम में लड़कियों को लाने और ले जाने के लिए कुछ खास कोडवर्ड् का इस्तेमाल किया जाता था।  मसलन जब नारायण साईं के लिए कोई नई लड़की पेश की जाती थी तो उसके लिए कहा जाता था `लाल तिलक लगा लिया है`। जब आश्रम में पहले से मौजूद किसी लड़की को नारायण साईं के पास दोबारा भेजा जाता था तो कहा जाता था ` चंदन का तिलक लगा लिया है `। जब नारायण साईं के पास पेश करने के लिए लड़कियों को तैयार कर लिया जाता था तो कहा जाता था` भगवान का भोग तैयार हो गया है`। जब किसी लड़की को आश्रम में रोकने का फरमान जारी करना होता था तो कहा जाता था ` तिलक मिटने न पाए, मुंह मत धोना`। जांच में ये भी पता चला है कि आश्रमों में लड़कियों को डराया धमकाया जाता था और नारायण साईं के पास जाने के लिए मजबूर किया। तफ्तीश में ये भी साफ हो चुका है कि आश्रम में काम करने वालों को नारायण साईं की काली करतूतों की पूरी जानकारी थी ।

वैसे आसाराम जैसे का बेटा नारायण ही होना चाहिए । कहा जाता है ना कि जैसा बाप वैसा बेटा । नारायण साईं से जुड़े अब तक जितने भी खुलासे हुए हैं, उनसे एक बात तो साफ हो चुकी है कि बेटा अपने बाप से किसी भी मामले में कम नहीं है। आश्रमों में होने वाली हर काली करतूत को बाप बेटे की ये जोड़ी मिलजुलकर अंजाम देती रही है, और आश्रम के सेवादार और सेविकाएं इनके गलत काम में उनका भरपूर साथ देते रहे हैं। जांच में खुलासा हुआ है कि नारायण साईं भी अपने बाप आसाराम के पदचिह्नों पर चल रहा था । बाप-बेटे की इस जोड़ी ने देश भर में फैले अलग-अलग आश्रमों में सेविकाओं के नाम पर 50 से ज्यादा महिलाओं को रखा हुआ था, इन सेविकाओं में कई नारायाण साईं की बेहद खास थीं,  आरोप तो ये भी है कि आश्रम की कई सेविकाएं ही नारायण साईं के लिए लड़कियां मुहैया कराती रही हैं। मासूम लड़कियों को आस्था, भक्ति और इलाज के नाम पर अपने जाल में फंसाया जाता था और फिर उन्हें आसाराम और नारायण साईं के पास भेज दिया जाता था। अब नारायण साईं के पकड़े जाने के बाद पुलिस को उम्मीद है कि इन दोनों की काली करतूतों के और मामले भी सामने आएंगे।

आइये इस नारायण साईं की गिरफ्तारी पर भी थोड़ी चर्चा कर ली जाए। 58 दिन से ये पुलिस की आंख में धूल झोंककर गिरफ्तारी से बचता रहा है। लेकिन यौन उत्पीड़न का ये आरोपी आखिर में पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया। दिल्‍ली और सूरत पुलिस की टीम ने मंगलवार देर रात नारायण साईं को कुरुक्षेत्र के पास पीपली से गिरफ्तार किया। नारायण साईं के साथ उसके सहयोगी हनुमान, भाविका, विष्‍णु और रमेश भी पुलिस के  हत्थे चढ़ गए। साईं को दिल्‍ली लाया गया, जहां उससे पूरे दिन क्राइम ब्रांच ने खूब पूछताछ की। पुलिस को साईं ने बताया कि उसके सलाहकार ही छिपने को कह रहे थे, इसलिए वो इधर-उधर भागता रहा। साईं ने यह भी बताया कि वह छिपने के क्रम में यूपी के आगरा और बिहार के सीतामढ़ी भी गया था। बताते हैं कि गिरफ्तारी के पहले उसे अंदेशा हो गया था कि वो पुलिस से घिर चुका है। इसलिए उसने भागने की भी कोशिश की। साईं जिस मकान में छिपा  था उसके आसपास के सभी रास्‍तों पर पुलिस ने पहले ही बैरीकेडिंग कर रखी थी। फिर भी उसकी हिम्मत देखिए , वो एक  एसयूवी में बैठकर वहां से निकल भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन तब तक पुलिस ने अपना हाथ उसके गले पर जकड़ दिया। इस ऑपरेशन में करीब 60 पुलिसवाले थे जिनकी अगुवाई दिल्‍ली पुलिस के डीसीपी कर रहे थे।

आपको  पता है कि पुलिस से बचने के लिए नारायण साईं ने क्या क्या नहीं किया। उसके पास से कई मोबाइल फोन के साथ ही लगभग 120 सिम बरामद किए गए। बहरहाल नारायण साईं ने जितनी अय्य़ाशी की, आज सब निकल गई है। अब पुलिस ने इसे दिल्ली कोर्ट में पेश किया है, इसके बाद इसे गुजरात पुलिस ट्रांजिट रिमांड लेकर गुजरात ले जाएगी। वैसे कुछ दिन तो नारायण भी सुर्खियों  में रहेगा, क्योंकि इसकी अय्य़ाशी से जुड़ी खबरें जो सामने आती  रहेंगी। हां आखिर में ये बात जरूर बताना चाहूंगा कि पुलिस जब इसके  डाक्टरी जांच के लिए अस्पताल या फिर कोर्ट में पेश करने के लिए ले गई, तो इसके  चेहरे पर दो पैसे की शर्म-लिहाज नहीं दिखा। हंसता हुआ ये कोर्ट में रुम दाखिल हुआ, बाहर निकलने के दौरान तो ये जिस तरह दोनों हाथ  ऊपर उठाकर लोगों का  अभिवादन स्वीकार कर रहा था, लगा ही नहीं कि ये यौन उत्पीड़न का आरोपी है।





Saturday, 16 November 2013

सचिन सावधान ! ये है चुनाव का " भारत रत्न "

सचिन सावधान !  भूल से भी प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की तारीफ मत कर देना। वरना ये वो कांग्रेस है जो भारत रत्न देकर वापस मांगती है, आपको तो अभी मिला भी नहीं है, सरकार ने बस देने का फैसला भर किया है। ऐसे में सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। लता दी को आप मां की तरह मानते हैं, इन कांग्रेसियों ने उनसे " भारत रत्न " वापस  मांगने की मांग शुरू कर दी है। मुझे लगता है कि जनवरी में भारत रत्न देने के बाद आप पर एक और जिम्मेदारी होगी, वो ये कि लोकसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करें। चूंकि अब कांग्रेस नेताओं की सभाओं में भीड़ नहीं हो रही है, लिहाजा आपको इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है। आपका " भारत रत्न " इसी तैयारी का हिस्सा है।   

दुनिया भर के करोडों क्रिकेट प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले सचिन तेंदुलकर ने आज भारी मन से क्रिकेट को अलविदा कह दिया। ये भावुक क्षण था, उनकी  आंखों में आंसू थे, उनकी मां की आंखे छलक रहीं थी, पत्नी अंजली आंसुओं को रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थीं, लेकिन वो रोक नहीं पाईं। इसके अलावा न सिर्फ स्टेडियम में मौजूद हजारों क्रिकेटप्रेमियों की आंखें डबडबा रहीं थी, बल्कि जो लोग टीवी पर सचिन का विदाई भाषण सुन रहे थे, वो भी बार-बार रुमाल से आंखे पोछते नजर आ रहे थे। देश की जनता की आंखो में आंसू देख सरकार गंभीर हो गई और शाम होते होते पीएमओ ने सचिन को " भारत रत्न " देने का ऐलान कर क्रिकेटप्रेमियों के आंसू पोछने की कोशिश की। 

सरकार को लग रहा था कि भारत रत्न के ऐलान से देश भर में सरकार की जय-जयकार होगी, लेकिन सरकार का ये दांव उलटा पड़ गया। भारत रत्न की घोषणा के आधे घंटे बाद ही  सोशल साइट पर क्रिकेट प्रेमी सरकार की किरकिरी करने लगे। आप जानते ही होंगे कि जानी मानी गायिका लता दी को " भारत रत्न " मिल चुका है। पिछले दिनों एक समारोह में उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि जैसी देशी की इच्छा है कि नरेन्द्र भाई मोदी प्रधानमंत्री बनें, वैसे ही मैं भी चाहती हूं कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनें। उनका इतना कहना भर था कि कांग्रेस के दिग्गज लाल पीले होने लगे और उन्होंने लता दी से भारत रत्न वापस लेने की मांग शुरू कर दी। 

हालांकि लता दी सरल महिला हैं, इसलिए उन्होंने किसी बात का जवाब नहीं दिया। वरना अगर वो भारत रत्न वापस करने के लिए 10 जनपथ रवाना भर हो जातीं, तो पूरी सरकार और पार्टी घुटनों पर  नजर आती। खैर अब सरकार ने सचिन को भारत रत्न देने की बात की तो सोशल साइट पर सचिन को नसीहत दी जा रही है। कहा जा रहा है कि सचिन भूल से भी नरेन्द्र मोदी का नाम मत ले लेना, वरना ये भारत रत्न वापस मांग लेंगे। ये कांग्रेसी बहुत अवसरवादी है। सच तो ये है कि इन्होंने सचिन को भारत रत्न नहीं दिया है, बल्कि देश की करोडों जनता की भावनाओं को भुनाने के लिए एक साजिश के तहत ऐसा किया है।

आपको याद होगा कि सचिन को भारत रत्न की मांग क्रिकेट प्रेमियों ने ही उठाई थी। सरकार पर दवाब बढ़ा तो इतना तो कर लिया गया कि भारत रत्न की श्रेणी में खेल को शामिल कर लिया गया। पहले खेल के क्षेत्र में भारत रत्न  देने का प्रावधान नहीं था। जब बात भारत रत्न देने की आई तो सरकार ने हीला हवाली शुरू कर दी और उन्होंने पहले हाँकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न के लिए सामने किया। कहा गया कि मेजर का योगदान सचिन के मुकाबले कहीं ज्यादा है। ऐसे में खेल का पहला भारत रत्न मेजर को ही दिया जाना चाहिए। देश में किसी ने इस बात का विरोध भी नहीं किया। लेकिन अब चुनाव आ गया है और कांग्रेस हर किसी की कीमत लगाना जानती है। इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि ये क्रिकेट का नहीं चुनाव का "भारत रत्न" है।



Thursday, 14 November 2013

... ताकि फिर कोई " लंपट " न बने प्रधानमंत्री !

पांच छह महीने बाद देश में एक बार फिर लोकसभा का चुनाव हो जाएगा और जोड़-तोड़ के बाद कोई प्रधानमंत्री भी बन जाएगा, फिर अब तक के प्रधानमंत्रियों की तरह वो भी देश को हांकने लगेगा। कई बार जब लोग कहते हैं कि भारत का लोकतंत्र दुनिया में सबसे ज्यादा मजबूत है, ये सुनकर मैं तो भड़क जाता हूं। मेरा मानना है कि भारत का लोकतंत्र सबसे ज्यादा मजबूर है। सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोग एक मजबूत और भरोसेमंद सरकार के लिए वोट करते है, घंटो लाइन में लगकर इसलिए वोट डालते हैं ताकि वो अपना भविष्य सुरक्षित बना सकें। लेकिन हैरानी तब होती है जब चुनाव के बाद एक ऐसा व्यक्ति सामने आता है जो चुनाव के दौरान कहीं पिक्चर में ही नहीं था, वो अचानक प्रधानमंत्री बन जाता है। सच बताऊं मैं बात कर रहा हूं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की। मैं कांग्रेस से जानना चाहता हूं कि क्या देश के मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट इसलिए दिया था ताकि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें ? मेरा मानना है कि देश में एक भी मतदाता ऐसा नहीं होगा जो ये कहे कि उसने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही वोट किया था। अगर ऐसा नहीं है  तो फिर किस बात का लोकतंत्र ?

देश का लोकतंत्र लगभग 65 साल पुराना हो गया है, फिर भी लगता है कि इसमें बहुत खामियां हैं। पिछले दो लोकसभा चुनावों में पहले तो देश ने किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं दिया। मतलब साफ है कि देश की जनता ने राजनीतिक दलों को खारिज कर दिया। अब जो जीत कर आए, कम से कम इतना तो है कि उन्हें अपने इलाके की जनता का समर्थन  हासिल है। लेकिन हुआ क्या ? सोनिया गांधी ने एक थके हुए बिना रीढ़ की हड्डे वाले व्यक्ति का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया, और सब ताली बजाकर उन्हें अपना नेता मानने को तैयार हो गए। खैर सोनिया गांधी की राजनीति समझ को तो आसानी से समझा जा सकता है, उन्हें तो सरकार और पार्टी में अपनी हनक बनाए रखने के लिए कमजोर आदमी को ही प्रधानमंत्री बनाने के लिए नाम आगे करना था और उन्होनें किया भी। हैरानी इस बात पर हुई कांग्रेस को छोड़ दें तो गठबंधन के दूसरे नेता भला क्यों चुप्पी साधे रहे ? शरद पवार,  करुणानिधि, मुलायम सिंह यादव, अजित सिंह, मायावती, लालू यादव, राम विलास पासवान, फारुख अब्दुल्ला जैसे लोगों की खामोशी का राज क्या है ? इनकी ओर से मांग क्यों नहीं उठी कि कोई मजूबत आदमी प्रधानमंत्री होना चाहिए, किसी को भी नेता हम सब स्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, सहयोगी दलों के ज्यादातर नेता मंत्रालयों की बंदरबांट में ही लगे रहे।

एक सवाल का जवाब दीजिए, क्या मुलायम सिंह यादव और मायावती को यूपी में इसलिए समर्थन मिला था कि वो दिल्ली में जाकर कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को समर्थन दें और समर्थन के एवज में अपने मुकदमें निपटाते रहें। हम सब जानते हैं कि चुनाव के पहले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में कोई गठबंधन नहीं था, सब एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में थे, फिर दिल्ली में सपा और बसपा ने कांग्रेस को कैसे समर्थन दे दिया ? करुणानिधि ने तो हद ही कर दी, उन्होंने ए राजा के लिए संचार मंत्रालय मांग लिया। मांग पूरी होने के बाद क्या हुआ, ये किसी से छिपा नहीं है। आज इस गठबंधन सरकार की हालत ये हो गई समर्थन के एवज में छोटे-छोटे राजनीतिक दल एक तरह से हफ्ता वसूली कर रहे हैं। मैं तो प्रधानमंत्री से सवाल पूछता हूं कि दिल पर हाथ रखिए और बताइये कि क्या आप वाकई प्रधानमंत्री पद का काम बिना दबाव के कर पा रहे हैं ? क्या  जो आप करना चाहता है, वो करने के लिए आजाद हैं ? अच्छा छोड़िए, आप साफ सुथरी बात करने वाले व्यक्ति है, खुद ही बताएं कि क्या जैसे आप प्रधानमंत्री बने, ऐसे ही पिछले दरवाले से प्रधानमंत्री बनना चाहिए ? मुझे पता है कि इसका कोई जवाब आपके पास नहीं है। जवाब होगा भी तो आप में इतनी हिम्मत नहीं है कि साफगोई से बात कर सकें।

बस देश के लोकतंत्र में यही कमी है। अब देश मेच्योर हो चुका है, देशवासियों को हर बात का हिसाब चाहिए। जब से कांग्रेस ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर थोपा है, देश की जनता खुद को छला हुआ महसूस कर रही है। उसे लगता है कि उसके वोट के साथ कांग्रेस ने न्याय नहीं किया। इतना ही नहीं आगे भी कांग्रेस जनता के वोट के साथ न्याय करेगी, इसमें लोगों को संदेह है। देश ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहता है, जिसके शरीर में और कुछ हो ना हो, पर रीढ की हड्डी जरूर हो। उसमें आत्मसम्मान जरूर हो, उसमें इतनी क्षमता हो कि वो " नाँनसेंस " कहने  वालों को मुंहतोड़ जवाब दे सके। लेकिन ये तभी संभव है, जब वो खुद जनता के बीच से चुनाव जीत कर आए। इतना ही नहीं उसे पार्टी नेता घोषित करे और वो अपने दम पर पार्टी उम्मीदवारों को भी जिता कर लाए। यहां तो हालत ये है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पार्टी के उम्मीदवार प्रचार के लिए अपने क्षेत्र में बुलाने से घबराते हैं।  बात होती है तो लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कह कर चुप हो जाते हैं। सवाल ये है कि देश एक कमजोर को प्रधानमंत्री कैसे स्वीकार कर सकता है?

मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि संविधान में बड़ा फेरबदल किया जाए। फेरबदल करके ये व्यवस्था बनाई जाए कि हर राष्ट्रीय पार्टी चुनाव में जाने के पहले अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करे। देश के मतदाताओं को अब पार्टी नेताओं पर भरोसा नहीं रहा है। उन्हें लगता है कि राष्ट्रीय पार्टी के नेता उनके मतों का सम्मान नहीं करते। अगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देश के मतदाताओं के वोट की कीमत समझतीं तो कम से कम प्रधानमंत्री के पद पर मनमोहन सिंह को कभी नहीं बैठाती। उन्होंने एक कमजोर व्यक्ति को जानबूझ कर प्रधानमंत्री बनाया जिससे पार्टी और सरकार दोनों पर उनकी पकड़ मजबूत रहे।

सुझाव..

1. राष्ट्रीय पार्टी चुनाव की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का ऐलान करें ...     
2. क्षेत्रीय पार्टियों के लोकसभा चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि  वो दिल्ली आकर सौदेबाजी करते हैं। 
3. अगर प्रतिबंध संभव ना हो तो क्षेत्रीय दल जिसे समर्थन देते हैं, वो सरकार के एक अंग माने जाएं, अगर समर्थन वापस लें तो उनकी सदस्यता खत्म हो। 
4. अगर प्रधानमंत्री पद का घोषित उम्मीदवार चुनाव हार जाता है तो पार्टी + समर्थक दल के सांसद गु्फ्त मतदान के जरिए नेता का फैसला करें । 
5. नेता चुनने का अधिकार किसी भी पार्टी के अध्यक्ष को नहीं होना चाहिए । 
6. प्रधानमंत्री के लिए ये अनिवार्य  होना चाहिए कि वो लोकसभा का चुनाव लड़कर सदन मे पहुंचे। राज्यसभा सांसद को प्रधानमंत्री के अयोग्य घोषित किया जाए।
7. अगर राज्यसभा को कोई सदस्य प्रधानमंत्री बनता है तो उसे छह महीने के भीतर देश के किसी भी हिस्से से चुनाव लड़कर लोकसभा में आने की बाध्यता होनी चाहिए। 
8. जो दल एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हों, सरकार बनाने के लिए उनके एक दूसरे का समर्थन करने पर रोक होनी चाहिए।
9. समर्थन के लिए गलत तरीका अपनाने वालों और समर्थन के एवज में सौदेबाजी करने वाले दलों की मान्यता रद्द करने का प्रावधान होना चाहिए।
10. यही व्यवस्था राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी होनी चाहिए। 


अब भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। सभी जानते हैं गुजरात दंगे को लेकर मोदी पर तरह तरह के गंभीर आरोप हैं। अब उनके बारे में देश की जनता अपना फैसला सुना देगी। दूसरी तरफ कांग्रेस है, उसका प्रधानमंत्री कौन होगा, किसी को नहीं पता। अगर राहुल गांधी उनके नेता हैं तो प्रधानमंत्री पद पर उनके नाम का ऐलान कर दिया जाना चाहिए। तीसरी ओर क्षेत्रीय राजनीतिक दल है। वो एक तरफ तो सरकार को समर्थन देकर अपने मुकदमें निपटा रहे हैं और बंगले हथियाने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर तीसरे मोर्चे की भी हवा बना रहे हैं। मैं फिर वही बात दुहराऊंगा कि क्षेत्रीय दलों पर लोकसभा का चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए।
 



Saturday, 12 October 2013

आसाराम का मिशन बलात्कार !

हले सोच रहा था कि पांच राज्यों मं चुनाव घोषित हो गए हैं, उसकी बात करूं, 2014 यानि आम चुनाव में भले ही अभी देरी हो पर सियासी पारा बिल्कुल चढ़ा हुआ है। लेकिन इन सब पर भारी पड़ रहा है आसाराम और उसका परिवार। सूरत की दो बहनें जिस तरह सामने आई हैं और उनकी आप बीती सुनने से तो लगता है कि आसाराम और उसका दुलारा नारायण साई दोनों ही रेपिस्ट हैं। सवाल ये भी है कि अगर आसाराम रेपिस्ट नहीं होता तो भला वो क्यों भरी सभा में कहता कि वो मर्दानगी बढ़ाने के लिए दूध में सोना उबाल कर पीता है। इसके अलावा पलास का फूल और ना जाने क्या - क्या चबाता है। अच्छा इस बाप बेटे की करतूतें सुन कर ही आम आदमी हिल जाता है, उसे लगता है कि ये धर्म की आड़ कैसे - कैसे भेड़िए पनाह लिए हुए हैं। एक बार बात यहीं खत्म हो जाती तो गनीमत थी, लोगों को लगता कि अब इस बाप - बेटे की करतूत सामने आई है तो ये दोनों आगे सुधर जाएंगे, क्योंकि अब तो ये समाज में क्या परिवार में मुंह दिखाने के लायक नहीं रहे। पर सबसे बड़ी हैरानी इस बात पर हुई की बाप के लिए लड़की का इंतजाम उसकी बेटी कर रही थी। जब ऐसी करतूतें सामने आ रही हों तो भला कहां राजनीति पर कलम चलाने की जरूरत थी, पहले तो इन कुकर्मियों का असली चेहरा लोगों के बीच में लाना जरूरी हो गया।

चलिए पहले बात आसाराम की ही कर लेते हैं। यूपी की शाहजहांपुर की बेटी ने जिस तरह इसके कुकर्मों का खुलासा किया है, मुझे लगता है कि उस बेटी ने तमाम दूसरी बेटियों की जिंदगी तबाह होने से बचा ली। वरना एकांतवास और समर्पण की आड़ में आसाराम की  अय्याशी यूं ही चलती रहती। आसाराम के लिए लड़कियों का इंतजाम कौन करता था, ये नाम सुनकर आप भी हमारी तरह चौंक जाएंगे। इसके लायक बेटे और बेटी अपने अपने बाप के लिए लड़कियां पहुंचाने का काम करते थे। इतना ही नहीं इसकी बीबी भी अपने पति के चरणों में लड़की पेश करती थी। ये बात मैं नहीं कह रहा हूं, इसका खुलासा जोधपुर में मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान में आसाराम के ही पूर्व सेवादार अजय कुमार ने किया है। उसका साफ कहना है कि नारायण साई अक्सर आसाराम के लिए लड़की का इंतजाम करता था। लड़के की करतूतों का खुलासा जहां पूर्व सेवादार ने कर दिया, वहीं सूरत की बहनों ने पुलिस में दर्ज कराई गई एफआईआर में कहा है कि उन्हें आसाराम के पास उनकी बेटी ले जाती थी, इतना ही नहीं एक बार जाने से मना कर देने पर आसाराम की बीबी ने उसे तमाचा मारा। आसाराम के कुकर्मों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो अय्य़ाशी में इस कदर अंधा है कि लड़की का इंतजाम करने के लिए अपने बेटे, बेटी और पत्नी सब को लगा रखा है।

हालांकि ये सब सुनकर हैरानी होती है। मेरा मानना है कि बेटा अगर खुद भी निकम्मा और अय्याश हो तो एक बार बाप की करतूतों को बर्दास्त कर लेगा, लेकिन बेटी और पत्नी भला ये कैसे बर्दास्त कर सकती हैं कि उसका बाप या पति लड़कियों के साथ अय्याशी करे ? जब से सूरत की दोनों बहनों ने इस परिवार के बारे में खुलासा किया है, ये पूरा परिवार कम से कम मेरी निगाह में तो घृणा का पात्र बन गया है। बताते हैं कि पुलिस को प्राथमिक जांच में आसाराम के खिलाफ पुख्ता सुबूत मिले हैं। इसके बाद अहमदाबाद पुलिस ने कोर्ट से आसाराम का ट्रांजिट वारंट मांगा है। चूंकि लड़की का आरोप  है उसके साथ बलात्कार अहमदाबाद के मोटेरा आश्रम में हुआ, इसलिए इस मामले की जांच अहमदाबाद पुलिस कर रही है। इस बीच आसाराम की न्यायिक हिरासत 25 अक्टूबर तक बढ़ गई है। मतलब ये कि अभी कुछ दिन और इस आसाराम जेल की ही रोटी खानी होगी। वैसे लड़कीबाजी आसाराम की बीमारी है, तो ये साल दो साल अगर जेल में रह गया तो काफी  हद तक उसे इस बीमारी से आराम मिलेगा। बस जरूरत इस बात की है इसे महिला वैद्य से भी दूर रखा जाए।

बात नारायण साईं की करें तो हम कह सकते हैं कि बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुहानल्लाह ! खैर जब बाप ही आश्रमों में रंगरेलियां मना रहा है, उसे लड़की की सप्लाई भी बेटा कर रहा है, फिर नारायण साईं तो आसाराम के अनुयायी ही है ना। उसका तो बाप के पदचिन्ह पर चलना हक बनता है। आरोप लगा है कि सूरत की जिन दो बहनों के साथ बलात्कार हुआ, उसमें बड़ी के साथ आसाराम ने और छोटी के साथ नारायण साईं ने मुंह काला किया। इसके पहले  इंदौर की एक लड़की ने भी नारायण साईं पर छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाया था। हालांकि ये सब आरोप है, सभी मामले न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में इस मामले में किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन ये बात भी सही है कि अगर नारायण साईं सही होता तो वह पुलिस से भागता नहीं। कुछ दिन पहले तक तो वो खुद तमाम न्यूज चैनलों में जाकर अपने बाप आसाराम का बचाव कर रहा था, जब से सूरत की लड़कियों ने रिपोर्ट दर्ज कराई है, ये अचानक लापता हो गया है। पुलिस की नोटिस का जवाब भी नहीं आ रहा है। लुकआउट नोटिस के बावजूद इसका कहीं कोई अता पता नहीं है। सूरत पुलिस ने इसे पूछताछ के लिए जहांगीरपुरा आश्रम में समन भेजा है। ऐसी आशंका है कि नारायण साईं नेपाल भाग गया है। लेकिन पुख्ता तौर पर पुलिस को उसके बारे में कुछ नहीं पता। उधर पुलिस ने सूरत आश्रम में छापेमारी के बाद दावा किया कि बलात्कार के मामले में नारायण साईं के खिलाफ उसे पुख्ता सबूत मिले हैं।

नारायण साईं खुद फरार है, लेकिन पुलिस से बचने और जनता में अपनी छवि बनाए रखने के लिए वो अपने वकील गौतम देसाई के जरिए समर्थकों को संदेश दे रहा है। उसके वकील ने सूरत के एक स्थानीय अखबार में इश्तेहार दिया है कि नारायण को बलात्कार के केस में फंसाया जा रहा है। मैं कहता हूं कि अरे भाई अगर तुम्हें फंसाया जा रहा है तो सामने आकर उसका सामना करो । लड़की के साथ आमने सामने की बात चीत से साफ हो जाएगा कि तुमने बलात्कार किया या नहीं ! भागने से क्या होगा, किसी को ये पता नहीं है कि नारायण इस समय है कहां, वो देश में है या नेपाल  भाग गया है। रही बात अग्रिम जमानत की अर्जी डालने की, तो वो सभी को हक है।  हास्यास्पद तो ये है कि प्रवक्ता नीलम दुबे कह रही हैं कि नारायण कहीं  भाग नहीं हैं, बल्कि वो किसी आश्रम में ध्यान-योग में लीन है। मैडम नीलम जिसके पीछे पुलिस लगी हो, वो भी बलात्कार जैसे गंभीर मामले में, वो ध्यान योग भला क्या करेगा ! माफ कीजिएगा, पर आपसे एक बात जरूर कहूंगा कि बलात्कार जैसे गंभीर मामलो के आरोपी आसाराम और नारायण साईं के चक्कर में पड़कर कम से कम ध्यान और योग को कलंकित मत कीजिए। अगर नारायण साईं सच्चा और अच्छा होगा तो वो खुद पुलिस के सामने आएगा और कहेगा कि मेरी जांच कीजिए, मैं निर्दोष हूं। लेकिन इतना कहने के लिए नैतिक बल की जरूरत है, जो आपके नारायण साईं में नहीं है।

वैसे मैडम नीलम दुबे जी माफ कीजिएगा, मैं महिलाओं के बारे में बिना ठोस जानकारी के कुछ नहीं कहना चाहता, लेकिन एक टीवी चैनल पर चर्चा के दौरान आश्रम के पूर्व सेवादार नाम शायद भोला है, उसने तो आप पर भी गंभीर आरोप लगाएं हैं। उसने तो चैनल पर चर्चा के दौरान यहां तक कहाकि नारायण साईँ ने आपके प्राईवेट पार्टंस पर बाईं ओर दांत काट लिया है, जिसका काफी दिनों तक इलाज चला है। उसका दावा है कि आज भी कटे का निशान वहां मौजूद है। इस दावे की सच्चाई मे मैं नहीं जाना चाहता, पर इतना जरूर कहूंगा कि आप महिला हैं, इसलिए इस संवेदनशील मुद्दे पर बस सच बोलना चाहिए, वरना लोगों का महिलाओं पर से भी भरोसा टूट जाएगा। आप ये बात भले ना स्वीकार करें, पर जब आप आसाराम और नारायण साईं का बचाव करतीं है, तब आपकी बाँडी लँग्वेज से बदबू आती है, पता चलता है कि आप झूठ बोल रही हैं।

खैर जहां आसाराम की बेटी और पत्नी पर गंभीर आरोप लग रहे हों, वहां आपकी चर्चा करना बेमानी है, लेकिन हर मामले में आश्रम की ओर से आप ही मीडिया के सामने आती हैं, इसलिए आपके बारे में दो बातें करना जरूरी हो गया था। हालांकि मैने जो बातें कहीं है, वो आश्रम के ही पूर्व सेवादार यानि भोला के आरोप हैं। हो सकता है कि भोला का दावा गलत हो, लेकिन इसके लिए आपको भी ये साबित करना होगा कि आपके प्राईवेट पार्टस के बाईं ओर दांत से काटने का कोई निशान मौजूद नहीं है और ना ही इसका कोई इलाज कराया गया है। बीजेपी की वरिष्ठ नेता साध्वी उमा भारती ने जब आसाराम की बेटी को अपना प्रिय दोस्त बताया तो मुझे लगा कि आसाराम की बेटी एक सरल और सामान्य महिला होंगी। लेकिन जिस तरह का आरोप उन पर सूरत की दोनों बहनों ने लगाया है, वो बहुत ही गंभीर है। मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि कि आसाराम की बेटी और पत्नी पर लगे आरोप सच ना हों, लेकिन ये आरोप अगर सच हैं तो मैं एक बात तो दावे के साथ कह सकता हूं कि देश और दुनिया में इससे ज्यादा निकृष्ट परिवार और कोई नहीं होगा।




Tuesday, 1 October 2013

प्रधानमंत्री जी बस एक बार अंदर झांकिए !

मित्रों कुछ व्यक्तिगत कारणों से महीने भर से ज्यादा समय से मैं ब्लाँग पर समय नहीं दे पा रहा हूं। वैसे समय ना दे पाने की एक वजह मेरे निजी कारण तो हैं ही, लेकिन दूसरी बड़ी वजह रिलायंस जैसी कंपनी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना भी रहा है। पहले मैं MTS का डेटा कार्ड इस्तेमाल कर रहा था, पता चला कि इस कंपनी के तमाम जगहों पर लाइसेंस रद्द हो चुके हैं, लिहाजा ये कार्ड देश के एक बड़े हिस्से में काम करना ही बंद कर दिया। बाद में मैने कुछ मित्रों की सलाह पर रिलायंस का 3 जी डेटा कार्ड लिया, ये कार्ड दिल्ली में तो फिर भी ठीक काम करता है, लेकिन जैसे ही दूसरी जगह पहुंच जाइये, काम करना बंद कर देता है। इसके बाद तो बेवजह अंबानी बंधुओं के लिए मुंह से गाली निकलती है। पिछले महीने मैं 20 से 25 दिन लखनऊ में रहा हूं। अब बताइये देश के इतने बड़े राज्य की राजधानी लखनऊ में रिलायंस का डेटा कार्ड इसलिए काम नहीं कर रहा है, क्योंकि यहां 3 जी की सुविधा नहीं है। कुछ नहीं हो सकता इस शहर का। हैरानी इस बात की होती है कि अदब के इस शहर में हर चीज की मांग के लिए शोर मचते देखता हूं, पर तकनीकि खामियों को दूर करने या फिर नई तकनीक का लाभ शहर को मिले, इसके लिए ये शहर गूंगों-बहरों की बस्ती के अलावा कुछ भी नहीं है। खैर छोड़िए ! इस शहर पर उलझा रहूंगा तो जो बात कहने आया हूं, वो कहीं खो जाएगा। बहरहाल अब कोशिश होगी कि ब्लाँग पर नियमित बना रहूं, आप सबके ब्लाँग भी काफी समय से नहीं देख पाया हूं, वहां भी जाऊं !

आज बात की शुरूआत चटपटे नेता लालू यादव से। चारा घोटाले में आरोप सिद्ध हो जाने के बाद लालू यादव जेल चले गए। 17 साल से ये मामला न्यायालय में विचाराधीन था। अगर पिछले चार पांच साल को छोड़ दें तो इस मुकदमे के चलने के दौरान लालू बिहार और केंद्र की सरकार में अहम भूमिका निभा रहे थे। ये लोकतंत्र का माखौल ही है कि भ्रष्टाचार का आरोपी व्यक्ति यहां मंत्री बना बैठा रहता है। होना तो यही चाहिए कि जब तक नेता आरोपों से बरी ना हो जाए, उसे मंत्री, मुख्यमंत्री बिल्कुल नहीं बनाया जाना चाहिए। बहरहाल लालू यादव अब सही जगह पर हैं, उन्हें यहीं होना चाहिए। जो हालात हैं उसे देखकर हम कह सकते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट की चली तो आने वाले चुनावों के बाद संसद और विधानसभाओं की सूरत थोड़ी बदली हुई होगी। क्योंकि तब यहां भ्रष्ट, बेईमान, अपराधी, हत्यारे, बलात्कारी नहीं आ पाएंगे। अब देखिए शिक्षक भर्ती घोटाले मे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला जेल चले गए, मेडीसिन खरीद घोटाले में रसीद मसूद जेल गए, चारा घोटाले में ही बिहार के एक और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र भी जेल भेजे गए। खैर जो नेता अभी तक जेल जा रहे हैं, सच्चाई तो ये है कि अब वो राजनीति के हाशिए पर हैं, उनकी कोई खास पूछ रही नहीं अब सियासत मे। हालांकि लालू जरूर कोई भी करिश्मा करने की हैसियत रखते हैं। जेल जाने के दौरान लालू ने कहा "मैं साजिश का शिकार हो गया" । मुझे भी लगता है कि वो साजिश के शिकार हो गए। मेरा मानना है कि मायावती और मुलायम सिंह की तरह अगर लालू के पास भी 19 - 20 सांसद होते, तो यही सरकार और प्रधानमंत्री उनके तलवे चाटते फिरते। यूपीए (एक) की सरकार में लालू की हैसियत किसी से छिपी नहीं है।

बहरहाल इन दिनों घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा हैं। आपने देखा ना कि राहुल गांधी ने एक शिगूफा छोड़ा और खबरिया चैनलों से लेकर देश दुनिया के सारे अखबार राहुल की तस्वीरों से रंग गए। लेकिन मुझे चैनल और अखबारों की रिपोर्ट देखकर काफी हैरानी हुई । हैरानी इस बात पर हुई कि क्या इतना बड़ा फैसला सरकार ने कांग्रेस पार्टी की मर्जी के बगैर ले लिया गया ? अगर इस फैसले में पार्टी की राय थी तो सवाल उठता है कि क्या पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी से इस मामले में कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया ? सवाल ये भी क्या राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाकर सिर्फ उनका कद बढ़ाया गया है, उनसे जरूरी मसलों पर कोई सलाह मशविरा नहीं की जाती है ! या फिर ये समझा जाए कि राहुल गांधी की विशेषता सिर्फ ये है कि वो गांधी परिवार में जन्में है, इसलिए उनका सम्मान भर है, उनकी राय पार्टी या सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखती ? यही वजह तो नहीं कि उनसे किसी मसले पर रायशुमारी नहीं की जाती। अरे भाई मैं एक तरफा बात किए जा रहा हूं,  पहले मैं आपसे पूछ लूं कि मुद्दा तो आपको पता है ना ? बहुत सारे लोग सरकारी काम से बाहर या फिर निजी टूर पर रहते हैं, इसलिए हो सकता है कि उन्हें  ना पता हो कि राहुल ने ऐसा क्या तीर चला दिया, पूरी व्यवस्था ही हिल गई है।

दरअसल आपको पता होगा कि 10 जुलाई 13 को सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में अपराधियों को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। इसमें कहा गया कि अगर किसी जनप्रतिनिधि को दो साल या इससे अधिक की सजा सुनाई जाती है तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देश भर में स्वागत हुआ। कहा गया कि इससे राजनीति में सुचिता आएगी, अपराधी, भ्रष्ट नेताओं पर लगाम लगाया जा सकेगा। देश की आम जनता और विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुले मन से स्वागत किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से केंद्र की सरकार खुद को असहज महसूस करने लगी। सरकार को मालूम है कि अगर कोर्ट के आदेश का पालन हुआ तो केंद्र की ये सरकार किसी भी समय मुंह के बल जा गिरेगी, क्योंकि दो एक पार्टी को छोड़ दें तो ज्यादातर पार्टी के नेताओं पर भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े कई मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। वैसे भी पूरा देश जानता जानता है कि आज अगर केंद्र सरकार के हाथ में सीबीआई ना हो, तो ये सरकार कब का गिर चुकी होती। अगर मैं ये कहूं कि इस सरकार को सीबीआई  चला रही है तो ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा। इस सरकार को लूटेरे, चोर, भ्रष्ट नेताओं का आगे भी समर्थन लेना होगा, यही सोचकर अंदरखाने विचार मंथन शुरू हो गया।

मेरी तरह आप भी  देख रहे होंगे कि जैसे-जैसे इस सरकार का कार्यकाल समाप्त होने को आ रहा है, अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का असली और बदसूरत चेहरा भी सामने आता जा रहा है। आमतौर पर मेरी आदत गाली गलौज करने की नहीं है, पर अब प्रधानमंत्री का नाम जब भी आता है, वाकई इनके लिए बहुत गाली निकलती है। पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि मनमोहन सिंह महज एक इंसानी शरीर का पुतला भर हैं, इनके भीतर अपना कुछ भी नहीं है। इस पुतले को अपने और अपने पद के मान, सम्मान, इमान किसी भी चीज की कोई चिंता नहीं है। बस कुर्सी पर बने रहने के लिए सब कुछ 10 जनपथ में गिरवी रख चुके हैं। कई बार मन में एक सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सचमुच अस्वस्थ हैं या फिर ऐड़ा बनकर पेड़ा खा रहे है, ये बात मैं समझ नहीं पा रहा हूं। अब देखिए ना दो दागी मंत्री अश्वनी कुमार और पवन बंसल से इस्तीफा लेने  की बारी आई, तो पार्टी की ओर से ऐसा संदेश दिया गया कि सोनिया गांधी तो दोनों मंत्रियों को भगाना चाहती हैं, पर मनमोहन सिंह उन्हें चंड़ीगढ़ का होने की वजह से बचा रहे हैं। दोनो मंत्रियों के इस्तीफे का मामला तूल पकड़ रहा था, प्रधानमंत्री की किरकिरी हो रही थी, लेकिन पूरी पार्टी खामोश रही। बाद अचानक सोनिया गांधी 10 जनपथ से निकलीं और प्रधानमंत्री निवास यानि 7 आरसीआर पहुंच गईं। सोनिया के सख्त तेवर के बाद प्रधानमंत्री ने दोनों से इस्तीफा ले लिया ! दागी  मंत्रियों को कौन बचा रहा था ? इस बात की जानकारी आज तक किसी को नहीं हुई।

अब एक बार फिर संदेश दिया जा रहा है कि चोरों, दागियों , अपराधियों, जेल में बंद नेताओं के मददगार हैं अपने प्रधानमंत्री। इन पर कुर्सी का ऐसा भूत सवार है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बदलने के लिए अध्यादेश लाने से भी नहीं बाज आते। हुआ क्या, कल के लड़के ने प्रधानमंत्री की अगुवाई में लिए गए कैबिनेट के फैसले को "नानसेंस" कह कर संबोधित किया। राहुल ने ये कह कर कि " मेरी निजी राय में अध्यादेश बकवास है, इसे फाड़कर फैंक देना चाहिए"  तूफान खड़ा कर दिया।  बहरहाल राहुल की निजी राय के बाद जैसी हलचल देखी जा रही है, उससे  प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट की हैसियत का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है । वैसे एक बात है राहुल को जिसने भी ये सलाह दी वो है तो बहुत ही शातिर राजनीतिबाज ! जानते हैं क्यों ? सब को पता है कि इस समय राष्ट्रपति भवन में प्रतिभा  देवी सिंह पाटिल नहीं बल्कि महामहिम प्रणव दा हैं । मेरा दावा है कि इस अध्यादेश पर प्रणव दा एक बार में तो हस्ताक्षर बिल्कुल नहीं कर सकते थे ! सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के जरिए संभवत: ये संदेश भी उन्होंने सरकार तक पहुंचा दिया था। राष्ट्रपति भवन से अध्यादेश बिना हस्ताक्षर के वापस आता तो सरकार और कांग्रेस पार्टी और उसके नेता कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहते।

बीजेपी पहले से ही इसका विरोध कर रही थी। यहां तक की आडवाणी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिलकर आग्रह भी कर चुका था कि इस अध्यादेश पर वो अपनी मुहर ना लगाएं। सच्चाई ये है कि राष्ट्रपति भवन और विपक्ष के तेवर से कांग्रेस खेमें में बेचैनी थी। सब तोड़ निकालने में जुट गए थे कि कैसे इस अध्यादेश को वापस लिया जाए। बताते हैं कि राहुल गांधी ने जिस तरह अचानक प्रेस क्लब पहुंच कर रियेक्ट किया, वो एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक रणनीति  के तहत राहुल को सामने किया गया। कांग्रेस नेताओं ने जानबूझ कर राहुल को कड़े शब्द इस्तेमाल करने को कहा। इस बात पर भी चर्चा हुई कि अपनी ही सरकार के खिलाफ कड़े तेवर दिखाने से प्रधानमंत्री नाराज हो सकते  हैं, इतना ही नहीं यूपीए में शामिल घटक दल भी अन्यथा ले सकते हैं। इस पर कांग्रेस के रणनीतिकारों ने साफ किया कि ये एक ऐसा मुद्दा है कि इस पर कोई भी खुलकर सामने नहीं आ सकता। जो अध्यादेश का समर्थन करेगा, जनता उससे किनारा कर लेगी। राहुल अगर  अपनी ही सरकार को "नानसेंस" कहते हैं तो सांप  भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। जहां तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नाराजगी का सवाल है, कहा गया कि कई बार इससे भी गंभीर टिप्पणी उनके बारे में हो चुकी है और वो नाराज नहीं हुए। इस बार तो उनकी अगुवाई में इतना गंदा काम हुआ है कि इस मुद्दे पर नाराज हुए तो फिर कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे।

बताया जा रहा है कि सब कुछ तय हो जाने के बाद राहुल को तीन लाइन की स्क्रिप्ट सौंपी गई और कहा गया कि उन्हें ये याद करना है और आक्रामक तेवर में मीडिया के सामने रखना है। मीडिया के सवाल का जवाब नहीं देना है। अगर कोई सवाल हो भी जाए और जवाब देने की मजबूरी हो तो इसी बात को दुहरा देना है। बताया गया कि गंभीर मामला है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमेशा की तरह इस बार भी बाहर हैं, इसलिए नपे तुले शब्दों में ही हमला होना चाहिए, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री को गुस्सा कम आता है, लेकिन जब आता है तो कुछ भी कहने से नहीं चूकते। वैसे मेरा एक सवाल है, प्रधानमंत्री जी विपक्ष ने आपको भ्रष्ट कहा तो नाराज हो गए, आपने संसद में कहाकि दुनिया के किसी दूसरे देश में प्रधानमंत्री को वहां का विपक्ष भ्रष्ट नहीं कहता है। आपकी बात सही है, लेकिन मुझे ये जानना है कि दुनिया के किसी दूसरे देश में अपनी ही पार्टी का नेता अपने प्रधानमंत्री को " नानसेंस " कहता है क्या ? प्लीज आप जवाब मत दीजिए, क्योंकि इसका आपके पास कोई जवाब है भी नहीं ।

चलते - चलते

मैं प्रधानमंत्री होता तो अमेरिकी से ही इस्तीफा भेजता और वहीं ओबामा से टू बीएचके का एक फ्लैट ले कर बस जाता, देशवासियों को अपना काला चेहरा नहीं दिखाता ।



Friday, 30 August 2013

चोर नहीं चोरों के सरदार हैं पीएम !

नमोहन सिंह जी मैं आपके साथ हूं, मैं कह रहा हूं कि आप चोर नहीं है, आप चोरों के सरदार हैं। अगर विपक्ष कहता है कि प्रधानमंत्री चोर हैं तो मान लिया जाना चाहिए कि विपक्ष की जानकारी कम है। वैसे आप भावुक व्यक्ति है, जज्ज़बाती हो गए और संसद में बोल गए कि विपक्ष प्रधानमंत्री को चोर कहता है, बताइये अब ये बात संसद की कार्रवाई में दर्ज हो गई ना। ऐसे तो देश अपने नेताओं के कितने बड़े-बड़े दाग भूल जाता है। आपकी ही की पार्टी की पूर्व प्रधानमंत्रियों इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बारे में देश भर में क्या - क्या नारे नहीं लगते थे ? एक नारा ये भी लगा करता था " गली-गली में शोर है, इंदिरा गांधी .......... है। आपने सुना कभी कि इंदिरा जी या राजीव गांधी ने कोई जवाब दिया हो। उन्होंने कभी रियेक्ट नहीं किया। ये ऐसे मामले थोड़े होते हैं कि इस पर प्रतिक्रिया दी जाए। बस एक कान से सुनिए और दूसरे निकाल दीजिए। चलिए कोई बात नहीं गलती हो गई, अब आगे देखिए। वैसे पता नहीं आपके सलाहकार कौन हैं, लेकिन सच में आपको सलाह गलत मिल रही है। ये कहने की क्या जरूरत थी कि आप कोल ब्लाक से जुड़े फाइल के संरक्षक नहीं है, मुझे तो लगता है कि ये गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य है।

खैर प्रधानमंत्री जी, आप बेशक  चोर ना हों, लेकिन आपकी सरकार ने चोरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। सरकारों पर एक आरोप हो, दो हो, बात समझ में आती है। आपकी सरकार के लगभग हर मंत्री पर कोई ना कोई आरोप लगता ही जा रहा है। बात टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की हुई तो आपकी सफाई आई कि गठबंधन की सरकारों में कुछ दिक्कतें रहती हैं। मतलब आपने समर्थन दे रही पार्टी पर इसका ठीकरा फोड़ दिया। लेकिन काँमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाले के बारे में आप क्या कहेंगे ? आपके रेलमंत्री ने क्या गुल नहीं खिलाया। कोल ब्लाक आवंटन के मामले ने तो आपकी सरकार को नंगा ही कर दिया। इसकी जांच रिपोर्ट में हेराफेरी के मामले में आपके कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह की टिप्पणी सरकार और सीबीआई के बारे में की वो भी सरकार के लिए शर्मनाक रही है। आप ही बताइये जिस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में चल रही हो, उसकी फाइल गायब हो जाए, और ये मसला उस वक्त का हो, जब कोल मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास हो, ऐसे में आप भला जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं ? खैर इस मामले में सच्चाई सब को पता है।

चलिए प्रधानमंत्री जी हम आपके शुभचिंतक हैं, इसलिए कुछ बात आपसे सीधे पूछ रहे हैं। क्या आपको लगता है कि वाकई आप देश के प्रधानमंत्री हैं ? हां आप कानून और संविधान की बात करते हुए कह सकते हैं कि मैं देश का प्रधानमंत्री हूं। फिर मेरा सवाल होगा कि देश के प्रधानमंत्री के पास जो अधिकार हैं, क्या वो आपके पास है ? आप फिर कहेंगे कि हां वो अधिकार मेरे पास है। मैं फिर सवाल करूंगा कि आपकी सरकार में जो लोग मंत्री हैं, क्या आपको लगता है कि वो आपकी मर्जी यानि आपकी पसंद के हैं ? इस सवाल पर आप खामोश हो जाएंगे, कुछ नहीं बोलेंगे। बुरा मत मानिएगा, एक सवाल और पूछ रहा हूं। सोनिया गांधी ने आपको ही प्रधानमंत्री क्यों बनाया ? कभी इस पर विचार किया आपने ? अब ये मत कह दीजिएगा कि मैं लोकप्रिय नेता हूं और मेरी वजह से चुनाव में पार्टी को फायदा पहुंचता है। मैं बताता हूं आपको प्रधानमंत्री इसलिए बनाया गया क्योंकि सोनिया को पता था कि शरीर में जो सबसे जरूरी हड्डी यानि रीढ़ की हड्डी है, वो आपके पास नहीं है। आपकी सबसे बड़ी क्वालिटी सोनिया जी की नजर में यही थी कि आपको उंगली इशारे पर आसानी से नचाया जा सकता है। आपने कभी सोचा नहीं की प्रणव दा जब वित्तमंत्री थे तो आप वित्त विभाग के सचिव थे। क्या आपको प्रणव दा की काबीलियत पर किसी तरह का संदेह है? मेरे ख्याल से नहीं होगा। कड़वी बात कह रहा हूं, गुस्सा मत हो जाइयेगा। आप नौ साल पहले भी देश के प्रधानमंत्री नहीं थे और आज भी नहीं हैं। आप सिर्फ प्रधानमंत्री पद के केयरटेकर हैं, जैसे ही राहुल इसके काबिल हो जाएगें, आपकी छुट्टी हो जाएगी।

चूकि आज आपने खुद बात छेड़ दी, इसलिए एक आम आदमी की तौर पर मैं आपसे सीधे बात करना चाहता हूं। आपने राज्यसभा में कहा कि दुनिया में कहीं भी विपक्ष के नेता देश के प्रधानमंत्री को चोर नहीं कहते। मैं आपकी इस बात से सहमत हूं, लेकिन ज्यादा दूर की बात नहीं करूंगा, चीन में ही उसके एक मंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध हुआ तो अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई है। अपने देश में कितने चोट्टे हैं, उन्हें फांसी तो दूर वो आपकी  सरकार में मंत्री बने बैठे हैं। इसलिए आप विदेशों से अपनी तुलना मत किया कीजिए। बात आपने शुरू की है तो एक सवाल और पूछ लेते हैं। किस देश में मुलायम सिंह यादव  और मायावती जैसी नेता और उनकी जैसी पार्टी है। बहुत गरज कर बोल रहे थे, बताइये अगर सीबीआई का डर ना हो तो ये दोनों आपकी सरकार को समर्थन दे सकते हैं ? नीतिगत विरोध पर आप अपने ईमानदार सहयोगियों को किनारे कर देते हैं। वामपंथी आपसे क्या मांग रहे थे ? कोई सौदेबाजी कर रहे थे ? नहीं ना । ममता बनर्जी क्या भ्रष्ट हैं, उनकी पार्टी की कुछ सोच है, जिससे वो समझौता नहीं कर सकतीं। आपने दोनों को किनारे कर दिया। आपको मुलायम और मायावती का साथ रास आ रहा है। प्रधानमंत्री जी आपकी सरकार की बुनियाद ही बेईमानी और भ्रष्टाचार पर टिकी है, इसलिए आपके मुंह से अच्छी बातें भी बहुत बुरी लगती हैं।

अब बहुत ज्यादा लंबी बात करने का मन नहीं है। क्या आपको अभी भी लगता है कि आप एक ईमानदार सरकार चला रहे हैं ? आपको पता है ना कि आपके समय में ये संसद भी कलंकित हो गई, जहां सांसदों की खरीद फरोख्त का मामला सामने आया। राज्यसभा में जब आप आक्रामक होने की कोशिश कर रहे थे और नेता विपक्ष अरुण जेटली ने आपको तीखा जवाब दिया कि दुनिया के दूसरे देशों में सांसदों की भी खरीद फरोख्त भी नहीं होती, उस वक्त आप का चेहरा देखने लायक था। ऐसा लगा कि सरेआम किसी चौराहे पर प्रधानमंत्री के कपड़े उतार लिए गए हों। आप भौचक रह गए, आपको उम्मीद भी नहीं थी कि विपक्ष से ऐसा तीखा जवाब मिलेगा। आमतौर पर प्रधानमंत्री की भाषा बहुत संयमित होती है, जिससे उनकी बातों के बीच सदन में टीका टिप्पणी ना हो, लेकिन आज तो सदन में भी आप चारो खाने चित्त हो गए। वैसे मेरी समझ में नहीं आया कि आप खड़े तो हुए थे चौपट हो रही अर्थव्यवस्था पर अपनी बात कहने, कई महीने पहले आपको सदन में चोर कहा गया था, उस वक्त तो आप खामोश थे, इतनी पुरानी बात आज कहां से याद आ गई ?

आखिर में एक ही बात कहूंगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए रिटायरमेंट ले लीजिए, आपके लिए ज्यादा बेहतर होगा। वजह पहले तो मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस के नेतृत्व में अगली सरकार बन सकती है। मान लीजिए बन भी गई तो सौ फीसदी गारंटी है कि आप प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। वैसे तो कांग्रेस की कोशिश होगी कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाकर घाघ कांग्रेसी नेता मजे लूटें, अगर किसी वजह से राहुल तैयार नहीं हुए तो विकल्प  की तलाश होगी। अंदर की बात बता दूं, बहुत सारे कांग्रेसी सोनिया जी के करीब आने के चक्कर में आपरेशन कराकर अपने शरीर में मौजूद रीढ़ की हड्डी निकलवा रहे हैं। इसलिए अच्छा मौका है अभी आप पर कमजोर प्रधानमंत्री का ही आरोप सिद्ध हुआ है, भ्रष्ट प्रधानमंत्री का नहीं। चुपचाप शानदार एक्जिट ले लीजिए, शुकून में रहेंगे। वरना चुनाव में पार्टी की हार का ठीकरा आप पर ही फोड़ी जाएगी, और आप सख्त होकर जवाब भी नहीं दे पाएंगे।



Tuesday, 27 August 2013

ये राजस्थान नहीं आसाराम की पुलिस है !

मुझे नहीं पता ये कौन है, आप पहचानिए !
साराम के बारे मे आगे बात करने से पहले आप इस तस्वीर को देख लीजिए। आमतौर पर ऐसी तस्वीर सामने आने के बाद पहले तो लोग तस्वीर को ही खारिज कर देते हैं, कहते हैं कि इस तस्वीर के साथ छेड़छाड़ की गई है। लेकिन सोशल नेटवर्क साइट पर ये तस्वीर मौजूद है और जिसने इस तस्वीर को पोस्ट किया है, उसका दावा है कि इस तस्वीर के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। इसमें जो शख्स दिखाई दे रहा है, वो वही आसाराम है जो इन दिनों की एक बहुत ही घिनौने आरोपों में बुरी तरह फंस हुआ है। सवाल ये कि  अगर ये तस्वीर सही है तो आसाराम का ये कौन सा एकांतवास है ? ये कौन सी साधना कर रहे है आसाराम ? अच्छा चूंकि मैने तो ये तस्वीर खिंची नहीं है, इसलिए मैं भी इस तस्वीर को खारिज कर दे रहा हूं। लेकिन मासूम बेटी ने जिस तरह का आरोप लगाया है, अगर उसकी बातों के आधार पर आसाराम का चित्र बनाया जाए, तो वो तस्वीर इससे भी गंदी होगी। वो ऐसी तस्वीर होगी, जिसे यहां पोस्ट करना भी संभव नहीं होगा। आसाराम कहते हैं कि उनकी अवस्था 75 वर्ष की हो गई है, ऐसे में उन पर बलात्कार का आरोप लगाना ठीक नहीं है। योनशोषण का आरोप लगाने वाली लड़की को अब आसाराम अपनी पोती बताकर "दादा" के रिश्ते को भी कलंकित कर रहा है। चित्र में जिस लड़की को वो खिला रहे हैं, मुझे तो लगता है कि ये भी उनकी पोती के ही समान होगी, लेकिन आसाराम बताएगा कि पोती को स्नेह, प्यार और दुलार करने का ये कौन सा आसन है। बहरहाल एक लाइन की बात ये कि इस घृणित कार्य के बाद भी जिस तरह से पुलिस की कार्रवाई चल रही है, उसे तो यही लग रहा है कि ये राजस्थान की नहीं आसाराम की पुलिस है।

हम सब जानते हैं कि संत के पीछे भक्त लगे होते हैं, इस संत की पीछे पुलिस लगी है। संत भागवत गीता, रामायण, रामचरित मानस पढ़ता है, ये संत कानून की धाराएं पढ़ता है। संत भक्तों को भगवान से मिलने का रास्ता बताता है, ये संत लोगों कानून की आंख में धूल झोंकने का रास्ता सिखाता है। एक सामान्य आदमी पर भी ऐसा घिनौना आरोप लगता है तो वह भीतर से टूट जाता है और आत्ममंथन कर गलती को सुधारने की कोशिश करता है। ये गलती पर गलती को दोहराता रहता है। ये संत झूठ भी बोलता है और तब तक बोलता रहता है, जब तक पकड़ा नहीं जाता। इस तथाकथित संत के ऊपर देश भर में ना जाने कितने मामले चल रहे हैं, मैं तो यही देखकर हैरान हो जाता हूं। बलात्कार, हत्या की कोशिश, जमीन कब्जाने, काला जादू से लेकर और ना जाने क्या-क्या आरोप इस पर और इसके आश्रम पर नहीं लगे। अच्छा हैरानी तो ये कि गंदगी करने के बाद श्रद्धालुओं की आड़ में कानून को चुनौती भी देता है। उसे लगता है कि अगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया तो देश में बवाल मचा देगा। फिर चुनाव का मौका है, लिहाजा कोई भी राज्य सरकार उससे पंगा लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी।

बहरहाल पुलिस की जो कार्रवाई चल रही है, उससे तो लगता नहीं कि राजस्थान में पुलिस है, बल्कि वो सामाजिक कार्यकर्ता की तरह काम कर रही है। यही वजह है कि वो किसी तरह इस मामले का शांतिपूर्ण समाधान निकालना चाहती है। मसलन लाठी भी ना टूटे और काम भी बन जाए। लेकिन काम इतनी आसानी से बनने वाला नहीं है। नाबालिग लड़की के यौन शोषण का मामला है और आरोपी भी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि आसाराम हैं। ये तो साफ है कि आसाराम के खिलाफ जितनी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज है, अगर उसकी जगह कोई और होता तो अब तक तो उसे पुलिस गिरफ्तार कर थर्ड डिग्री के जरिए अपराध भी कबूलवा चुकी होती। लेकिन आसाराम को अतिथि अपराधी का दर्जा हासिल है। जिन धाराओं में अपराध पंजीकृत है, उसमें पुलिस को तो ज्यादा मेहनत करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि इसके तहत खुद आसाराम को साबित करना है कि वो पाक साफ है। पुलिस को तो बस उसे गिरफ्तार कर कोर्ट के सामने पेश भर करना है।

मैने देखा कि मुंबई बलात्कार की घटना के बाद राजस्थान सरकार, राजस्थान पुलिस और आसाराम बहुत खुश थे। इन्हें लगा कि अब मीडिया मुंबई में ही रहेगी, उसे जोधपुर की घटना से ज्यादा लेना देना नहीं रहेगा। लेकिन भला हो उस बेटी का कि इस वक्त संसद चल रही है। वैसे तो मैने संसद में शरद यादव को बेकार की बातें करते हुए ही ज्यादा सुना है, लेकिन पहली बार उन्होंने देश की जनता की आवाज में अपनी आवाज मिलाई और आसाराम के खिलाफ जमकर बोले। गुरुदास गुप्ता ने तो इसे फांसी देने तक की बात कह दी। इसके अलावा भी तमाम सांसदों ने आसाराम पर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। संसद में माहौल गरम देख राजस्थान सरकार के पसीने छूट गए। मुख्यमंत्री को लगा कि अगर राजस्थान पुलिस की लापरवाही की वजह से संसद में कार्य बाधित हुआ तो पार्टी नेता उन्हें निशाना बना सकते हैं। इसी बीच गृहमंत्री ने अपनी बचाने के लिए राजस्थान सरकार से पूरी रिपोर्ट तलब कर ली। यहीं से पुलिस थोड़ा सतर्क हुई और इंदौर जाकर आसाराम को नोटिस देकर कहा कि वो 30 अगस्त तक पूछताछ के लिए हाजिर हों। वरना तो इसके पहले राजस्थान पुलिस पूरे केश का बलात्कार करने में जुटी हुई थी। राजस्थान के एक गैरजिम्मेदार पुलिस अफसर ने तो अपना  फैसला ही सुना दिया, कहाकि बलात्कार का मामला पुष्ट नहीं हुआ है, इसलिए धारा 376 हटा ली गई है। जब देश में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई तो पुलिस का वही अफसर अपनी बात से पलट गया। वैसे भी राजस्थान पुलिस की कार्रवाई का भगवान ही मालिक है। सब ने देखा कि आसाराम इंदौर में है और राजस्थान की पुलिस अहमदाबाद में उन्हें नोटिस थमाने गई थी। आसाराम मालामाल है, उन्हें पैसे की कमी तो है नहीं। इसलिेए वो कहीं भी भाग सकते हैं, लिहाजा राजस्थान की पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी कर दिया है, इससे अब आसाराम विदेश नहीं भाग सकेंगे।

शिकंजा कसता देख आसाराम अब परेशान है। लेकिन इसके बाद भी वो परेशानी से निकलने के लिए सच्चाई का रास्ता नहीं देख रहा है। वो सरकारों को डराने की कोशिश कर रहा है। ऐसा माहौल बनाना चाहता है जिससे सरकार डर जाए और गिरफ्तार ना करे। इसीलिए आज उसने भक्तों के बीच कहाकि  अगर  पुलिस ने गिरफ्तार किया तो वो अन्न जल त्याग देगा। अब उसे कौन समझाए कि तुझे तो फांसी पर लटकाने की बात तक संसद में हो रही है। ऐसे में खाना पानी छोड़ने से भी कोई सहानिभूति नहीं होने वाली। अब तो एकांतवास और साधना की आड़ में रंगबाजी या कहूं रंगरेलिया नहीं चल पाएगी। आपको पता है इंदौर में जब आसाराम को बताया गया कि पुलिस आई है, आसाराम तुरंत एक कमरे चला गया और चेलों से कहा कि उन्हें बता दो कि मैं साधना कर रहा हूं। हाहाहहा। वाह रे, साधना वाले आसाराम। हां एक बात तो बताना ही भूल गया। आसाराम कह रहा है कि पुलिस उसे गिरफ्तार करके कुछ ऐसा वैसा खिला देगी। अरे पुलिस क्यों खिला देगी ? पुलिस पागल है क्या ? पुलिस के लिए तो आसाराम संत नहीं बल्कि "मोटा माल" है। पुलिस अच्छी तरह जानती है कि किसके साथ कैसा सलूक करना है। मैं तो बहुत से पुलिस वालों को देखता हूं कि वो अपने सर्विस काल में किसी लंपू चंपू बाबा का साथ देते रहते हैं और रिटायर होने के बाद उसी के आश्रम पर कब्जा जमा लेते हैं। अब आसाराम को भी एक दो आश्रम से तो हाथ धोना ही पडेगा।

सच कहूं, मैं आसाराम से ज्यादा उनके श्रद्धालुओं को गलत मानता हूं। भक्ति तो ठीक है, लेकिन अंधभक्ति का क्या मतलब है ? जब हम सब देख रहे हैं कि जिस आदमी का हम सब जय जयकार कर रहे हैं, वो बहुत ही घृणित और नीच कर्म में शामिल हैं। ऐसे में हमें खुद ही उस आदमी के खिलाफ मुखर होना चाहिए। यहां मुखर होना तो दूर, हम उसकी जय-जय कार कर सरकार को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं, कि हम इसी के पापी के साथ खड़े हैं। मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जिस किसी को लगता है कि पीड़ित बेटी झूठ बोल रही है, वो किसी साजिश के तहत ऐसा आरोप लगा रही हो, तो प्लीज आप एक काम कर सकते हैं, जब ये आसाराम के एकांतवास में जाए तो अपनी बेटी को उसके पास भेज कर देखिए। शायद फिर आपकी आंखे खुल जाएं !





Thursday, 22 August 2013

क्या " लाल " करना नहीं जानती दिल्ली पुलिस ?

मैं बात तो बापू आसाराम की ही करने आया हूं, लेकिन इस बूढ़े की करतूत से मन इतना खिन्न है कि इसके नाम के आगे बापू लिखने का बिल्कुल मन नहीं है। लिहाजा आगे बस आसाराम ही लिखूंगा। आपको पता ही होगा, हफ्ते भर पहले पुलिस के हत्थे चढ़ा 70 साल का आतंकी टुंडा ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि तीन साल पहले उसने 18 साल की लड़की से शादी की है, ये उसकी तीसरी बीबी है। शायद इसी टुंडा की कहानी आसाराम को जंच गई. और वो खुद को रोक नहीं पाया, और एक नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म करने के लिए पागल हो गया। खैर इस बूढे आसाराम की तो मैं आगे खबर लूंगा ही, लेकिन सच बताऊं मैं आसाराम से ज्यादा दिल्ली और राजस्थान की पुलिस से नाराज हूं। एफआईआर दर्ज हुए तीन दिन बीत गए और अभी तक पुलिस इसे गिरफ्तार नहीं कर पाई। मेरा दावा है कि ये मामला अगर यूपी पुलिस के पास होता तो अब तक पुलिस न सिर्फ आसाराम को गिरफ्तार कर चुकी होती, बल्कि इतना लाल कर चुकी होती कि ये आसाराम कम से कम महीने भर तो बैठकर प्रवचन करने की हालत में नहीं होता। ये पुलिस वाले दो चार रूपये चोरी करने वाले बच्चों पर तो "थर्ड डिग्री" इस्तेमाल कर दरिंदगी की सारी सीमाएं तोड़ देते हैं, लेकिन जब इनके सामने किसी बड़े आदमी का नाम आता है, चाहे उसने कितना ही घिनौना काम क्यों ना किया हो, इनकी घिग्घी बंध जाती है।

स्वामी नित्यानंद, कृपालु महराज, चिन्मयानंद के बाद अब आसाराम। सभी पर महिलाओं के साथ यौन शोषण के गंभीर आरोप है। संत समाज का रवैया अगर ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब संतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी। हालाकि मेरा मानना है कि अब इन संतो के प्रवचन में कोई दम नहीं रहा, वरना आज जितनी अधिक मात्रा में भागवत कथा, रामकथा के साथ देश भर में जहां तहां धार्मिक प्रवचन हो रहे हैं। उसके बाद तो देश के लोगों में कोई सुधार नहीं है। आपको पता है कि लगभग हर प्रवचन का टीवी पर प्रसारण भी होने लगा है, ऐसे में तो देश में कोई बुराई रहनी ही नहीं चाहिए थी, लेकिन मेरा मानना है कि इन प्रवचनों में का समाज पर कोई असर नहीं है,  यही वजह है कि अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अब बढ़े भी क्यों ना ! संतों का चरित्र जो सामने आ रहा है, ये सब देखकर इन भगवाधारियों से घिन्न आने लगी है। मुझे हैरानी इस बात पर भी है कि बिना जांच कि रिपोर्ट आए ही, बीजेपी नेता उमा भारती ने आसाराम को कैसे क्लीन चिट दे दिया। आसाराम के चरित्र को किस आधार पर उमा भारती साफ सुथरा बता रही हैं, जबकि आसाराम पर आज भी तरह तरह के गंभीर  आरोप हैं। खैर खग ही जाने खग की भाषा।

आसाराम पर आरोप लगा कि उनके आश्रम में काला जादू होता है, इससे दो बच्चों की मौत तक हो गई, उन पर जमीन कब्जाने के कई मामले चल रहे हैं। बद्जुबानी तो आसाराम के खून मे हैं। उनकी नजर में पत्रकार कुत्ते हैं, राहुल गांधी कम बुद्धि वाला लड़का है, महाराष्ट्र में पानी की बर्बादी पर सवाल उठा तो बोले पानी किसी के बाप का नहीं है। रतलाम में कहाकि पृथ्वी पर पानी की कमी नहीं है, अगर मैं झूठ बोलूं तो तुम सब मर जाओ। तुम सब का आशय सामने बैठे भक्तों से था। सबसे घृणित आचरण तो इसने तब किया जब दिल्ली में बलात्कार के खिलाफ आंदोलन चल रहा था तो कहा कि " इतनी रात में लड़की सिनेमा देखकर आ रही थी, फिर भी अगर वो बलात्कारियों से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती और उन्हें भाई बना लेती तो ऐसा नहीं होता। ये तो यहां तक कहने से नहीं चूके कि गलती एक तरफ से नहीं होती। मतलब दामिनी की भी गलती थी। बहरहाल अब एक बच्ची ने इसी आसाराम पर इतने गंभीर आरोप लगाए हैं कि सुनकर इस आदमी से नफरत होने लगी है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली की पुलिस किसी भी लड़की के आरोप लगाने मात्र से इतनी गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर लेगी ? ऐसा तो बिल्कुल नहीं है, बकायदा पुलिस ने लड़की का मेडिकल कराया है। रिपोर्ट में लड़की के आरोपों को सही पाया गया है, उसके बाद ही यहां एफआईआर दर्ज हुई है। फिर मामला गंभीर था, इसीलिए धारा 376 के साथ ही "पास्को" के तहत भी मामला दर्ज किया गया। मतलब ये कि अब खुद आसाराम को साबित करना है कि वो बेगुनाह हैं।

मुझे तो लगता है कि दिल्ली पुलिस लाल करना ही नहीं जानती है। वरना तो आसाराम कुछ दिन पहले यहीं दिल्ली में थे। बंद कमरे में आधे घंटे की पूछताछ में एक-एक बात बता देते। मेरा तो मानना है कि पुलिस को बहुत ज्यादा लाल करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। सच बताऊं, दिल्ली पुलिस ने एक बहुत बड़ा अवसर खो दिया। अगर वो आसाराम के मामले में सख्त कार्रवाई करती तो दिल्ली पुलिस पर लोगों का भरोसा बढ़ जाता। लगता कि दिल्ली में कानून का राज है, यहां कोई बड़ा छोटा नहीं है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर महज खानापूरी की, कार्रवाई के नाम पर वो पीछे हट गई। हैरानी इस बात पर हो रही है कि आसाराम के प्रवक्ता मीडिया के सामने झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। कह दिया कि जिस दिन बलात्कार की बात की जा रही है, उस दिन ये जोधपुर में थे ही नहीं। बाद में फार्महाउस के मालिक ने खुलासा किया कि नहीं आसाराम यहीं रुके थे और लड़की भी अपने परिवार के साथ यहां थी।  

बहरहाल आसाराम पर जो आरोप लगे हैं मैं तो उससे बिल्कुल हैरान नहीं हूं। मेरा तो मानना है कि एक अयोग्य आदमी को जब इतना मान सम्मान, एश्वर्य मिलता है तो वो पागल  हो जाता है। ये संत समाज ऐसे ही अपराधियों की शरणस्थली बनता जा रहा है। आपको याद होगा जो नित्यानंद एक अभिनेत्री के साथ अश्लील हरकत करते हुए पकड़ा गया और उसकी सीडी तक आम जनता के बीच आ गई। उसे जेल तक जाना पड़ा।  पर उस भगवाधारी को इसी संत समाज ने इलाहाबाद के कुंभ मेले के दौरान जगतगुरु की उपाधि से नवाजा। बुजुर्ग कृपालु महराज पर भी बलात्कार का गंभीर आरोप लग चुका है। स्वामी चिन्मयानंद पर भी उनकी  ही शिष्य़ा चिदर्पिता ने बलात्कार का ना सिर्फ आरोप लगाया, बल्कि थाने में रिपोर्ट तक दर्ज कराई। मैं तो ऐसा आचरण करने वालों को साधु संत बिल्कुल नहीं मानता। ये अपराधी हैं और इनके साथ अपराधियों जैसा ही सलूक होना चाहिए।









Wednesday, 21 August 2013

रिटायर होकर आराम करने आया है आतंकी टुंडा !

मुझे देश में बढ़ रहे आतंकवाद के बारे में तो अच्छी जानकारी है, लेकिन आतंकवादियों इनके ठिकाने, इनके संगठन के बारे में बस सुनी सुनाई बातें ही पता हैं। देख रहा हूं तीन चार दिन से एक सेवानिवृत्त आतंकवादी अब्दुल करीम टुंडा को लेकर दिल्ली पुलिस इधर उधर घूम रही है। हालाकि इसने अकेले ही पुलिस के पसीने छुड़ा दिए हैं। पुलिस उसे आतंकवाद की पांच घटनाओं में शामिल होने की बात करती है, टुंडा पुलिस की जानकारी में इजाफा करते हुए दावा करता है कि वो पांच और यानि आतंकवाद की 10 घटनाओं में शामिल रहा है। खुद को अंडरवर्ल्ड डाँन दाउद इब्राहिम का सबसे करीबी भी बता रहा है। इतना ही नहीं खुद ही कह रहा है कि वो लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का बड़ा आतंकवादी है। पुलिस बहुत मेहनत से सवाल तैयार करती है, उसे लगता है कि टुंडा सही जवाब देने से हिचकेगा, लेकिन वो पुलिस को बिल्कुल निराश नहीं कर रहा है, आगे बढ़कर अपने अपराध कुबूलता जा रहा है। जानते हैं टुंडा खाने पीने का भी काफी शौकीन है, वो खाने में सिर्फ ये नहीं कहता है कि उसे बिरयानी चाहिए, बल्कि ये भी बताता है कि जामा मस्जिद की किस दुकान से बिरयानी मंगाई जाए। टुंडा के हाव भाव से साफ है कि वो यहां पुलिस से टांग तुडवाने नहीं बल्कि जेल में रहकर मुर्गे की टांग तोड़ने आया है।

सुना है कि भारत - नेपाल सीमा यानि उत्तराखंड के बनबसा से दिल्ली पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया है। देखिये ये तो पुलिस का दावा है। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि टुंडा पुलिस के बिछाए जाल में फंसा है, मेरा तो मानना है कि पुलिस इसके जाल में फंसी है। अंदर की बात बताऊं ? टुंडा की जो तस्वीर पुलिस के रिकार्ड में है, उस तस्वीर से तो पुलिस सात जन्म में भी टुंडा को तलाश नहीं सकती थी। हो सकता है कि ये बात गलत हो, पर मेरा तो यही मानना है कि टुंडा ने खुद ही पुलिस को अपनी पहचान बताई है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं क्या कहता जा रहा हूं। भला टुंडा क्यों पुलिस के हत्थे चढ़ेगा ? उसे मरना है क्या कि वो दिल्ली पुलिस के पास आएगा ? हां मुझे तो यही लगता है कि वो बिल्कुल आएगा, क्योंकि इसकी ठोस वजह भी है। दरअसल टुंडा अब बूढा हो गया है और इस उम्र में वो पुलिस के साथ आंखमिचौनी नहीं खेल सकता। ऐसे मे हो सकता है कि आतंकवादी गैंग से ये रिटायर हो गया हो। साथियों ने उसे सलाह दी हो कि अब तुम्हे आराम की जरूरत है।

किसी आतंकवादी को आराम की जरूरत हो तो उसके लिए भारत की जेल से बढिया जगह भला कहां मिल सकती है। मुझे तो लगता है कि वो यहां पूरी तरह आराम करने के मूड में ही आया है। यही वजह है कि वो किसी भी मामले में अपना बचाव नहीं कर रहा है। आतंकवाद से जुड़ी जिस घटना के बारे में भी पुलिस उससे पूछताछ करती है, वो सभी अपने को शामिल बताता है। इतना ही देश के दूसरे राज्यों में भी हुई आतंकी घटनाओं में भी वो अपने को शामिल बताने से पीछे नहीं हटता। हालत ये है कि दिल्ली पुलिस से उसकी पूछताछ पूरी होगी, फिर उसे एक एक कर दूसरे राज्य की पुलिस रिमांड पर लेकर अपने यहां ले जाएगी। ऐसे में टुंडे का पर्यटन भी होता रहेगा। टुंडा को इस बात का दुख होगा कि पर्यटक स्थलों के लिए प्रसिद्ध राज्य की पुलिस अपने यहां की आतंकी वारदात में उसका नाम शामिल क्यों नहीं कर रही है ? केरल, जम्मू कश्मीर, पोर्ट ब्लेयर, सिक्किम और मिजोरम, मेघालय में भी कुछ मामले निकल आएं तो टुंडा की चांदी हो जाए । घूमने फिरने का टुंडा वैसे भी शौकीन है, अब सरकारी खर्चे पर उसे ये सुविधा मिलेगी, तो भला उसे क्या दिक्कत है।

70 साल का ये बूढा आतंकी अपने को खुंखार साबित करने का कोई मौका नहीं चूक रहा है। कह रहा है कि जब वो स्कूल में पढ़ रहा था, तब वह एक चूरनवाले से बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि चूरनवाला पोटाश, चीनी और तेजाब की मदद से बच्चों को आकर्षित करने के लिए हल्की आतिशबाजी किया करता था। इसी से प्रभावित होकर बम बनाना शुरू किया। वो कहता है कि आसानी से मिलने वाली सामग्री ही वो बम बनाने में इस्तेमाल करता है। मसलन  यूरिया, नाइट्रिक एसिड, पोटैशियम क्लोराइड, नाइट्रोबेंजीन और चीनी की सहायता से बम बनाता था। मुझे तो इसकी बात में झोल नजर आ रहा है। क्योंकि इसने बम बनाने की किसी से ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन ये आतंकवादी गिरोहों का सबसे बड़ा ट्रेनर जरूर बन गया। अपने को बड़ा खिलाड़ी बताने के लिए ये अपना संबंध पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भी बता रहा है। दिल्ली के दरियागंज में एक गरीब परिवार में जन्मा टुंडा वैसे तो गाजियाबाद के पिलखुवा में बढ़ईगिरी करता था। बाद में इसने कबाड़ का काम शुरू किया । इसमें भी फेल हो जाने के बाद कुछ समय तक कपड़े का कारोबार में रहा। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में जिस तरह ये अपना आना जाना बता  रहा है, उससे तो लगता है कि इन देशों के बीच कोई लोकल ट्रेन चलती है, जिससे ये बिना देरी पहुंच जाता था।

बहरहाल मुझे ना जाने क्यों लग रहा है कि 70 साल की उम्र में टुंडा यहां एक रिटायरमेंट प्लान के तहत आया है। आसानी से समझा जा सकता है कि इतने बूढे आतंकी का खर्च दाउद या फिर पाकिस्तानी क्यों उठाएंगे ? इसलिए टुंडा किसी साजिश के तहत तो यहां नहीं आया है ! ये भी देखा जाना चाहिए । वैसे भी सब जानते  हैं कि देश की पुलिस पद, प्रमोशन और पदक के लिए पागल रहती है। जाहिर है इतने बड़े आतंकी को पकडने वाली पुलिस टीम को पद भी मिलेगा, प्रमोशन भी मिलेगा और पदक भी। इसलिए टुंडा पुलिस की हर बात बिना दबाव के खुद ही मान ले रहा है। उसे ये भी पता है कि  कोर्ट में उसका जितने साल मुकदमा चलेगा, उतनी तो उसकी उम्र भी नहीं बची है। अब टुंडा इतना बड़ा आतंकी है तो उसे कड़ी सुरक्षा में रखा भी जाएगा। टुंडा जानता कि यहां कसाब के रखरखाव पर मुंबई सरकार ने कई सौ करोड रुपये खर्च किए हैं। कसाब को उसकी मन पसंद का खाना मिलता था, अब इस उम्र में टुंडा और क्या चाहिए ? लेकिन टुंडा ने कुछ जल्दबाजी कर दी, अभी पुलिस की पूछताछ चल ही रही है कि उसने पुलिस से लजीज खाने की मांग रखनी शुरू कर दी। एक सलाह दे रहा हूं टुंडा, थोड़ा तसल्ली रखो, जेल में अच्छी सुविधा मिलेगी। अभी अगर बिरयानी वगैरह मांगने लगे तो आगे मुश्किल हो जाएगी।








Tuesday, 20 August 2013

ट्रेन हादसा : बड़बोले नीतीश का असली चेहरा !

बिहार के सहरसा के पास एक ट्रेन हादसे में 37 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनका करीब के अस्पताल में इलाज चल रहा है। ये एक घटना है, कहीं भी हो सकती है। इस पर मुझे ज्यादा बात नहीं करनी है। लेकिन मुझे हैरानी मुख्यमंत्री के उस बयान पर हो रहा है,  जिसमें वो राज्य सरकार की गलती मानने को तैयार ही नहीं हैं। सच कहूं तो ये एक गंभीर मामला है, क्योंकि जब सूबे का मुख्यमंत्री ऐसे टुच्चेपने का जवाब देगा तो भविष्य में भी उसके अफसर इसी तरह लापरवाह बने रहेंगे। मै समझ में नहीं पा रहा हूं कि इतना गैर-जिम्मेदाराना बयान एक ऐसा मुख्यमंत्री दे रहा है, जो कभी रेलमंत्री भी रह चुका है। इन्हें तो रेल मंत्रालय और राज्य सरकार दोनों की जिम्मेदारी और कार्यप्रणाली की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे रेल मंत्रालय की गलती मानते हैं, फिर तो वो ट्रेन को फूंक देने और ट्रेन चालक की पीट पीट कर हत्या कर देने को भी जायज ही ठहराएंगे। क्योंकि जो गलत है, उसे सजा तो मिलनी ही चाहिए, और बिहार की जनता ने उसे सजा दे दिया। मैं समझता हूं कि अपनी खोखली तारीफों से अब नीतीश कुमार ना सिर्फ हवाबाज हो गए हैं, बल्कि मैं तो कहूंगा कि बद्जुबान भी हो गए हैं।

एक मिनट में नियम और कानून की बात कर ली जाए। नियम तो ये है कि अगर आप रेल पटरी क्रास भी करते हैं तो ये अपराध है। इसमें आपके खिलाफ मामला दर्ज हो सकता है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है। इतना ही नहीं अगर पटरी पर कोई जानवर आ जाता है, और उसकी वजह से दुर्घटना होती है, जान माल की हानि होती है तो भी जानवर के मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकता है। आइये अब इस हादसे की बात कर लेते हैं। बताते हैं कि खगड़िया और धमौरा रेलवे स्टेशन के पास ये एक ऐसा इलाका है, जहां सड़क नहीं है। ट्रेन से उतर कर यात्रियों को रेल की पटरी के सहारे ही काफी दूरी तय करनी पड़ती है। अगर ये सच है तो राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करना ही होगा, भला ये कैसे संभव है कि स्टेशन की पहुंच में सड़क ही ना हो। दुर्घटना के बाद अपनी सफाई में मुख्यमंत्री ने खुद भी कहाकि ये एक ऐसा इलाका है, जहां सड़क नहीं है। इसलिए राहत दल को पहुंचने में समय लगा। दुर्घटना के कई घंटे बाद तक घायल रेल पटरी पर ही तड़पते रहे, ना डाक्टर पहुंचे और ना बिगड़ती कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मी ही पहुंच पाए।

आपको पता है कि इसी रेलवे स्टेशन के पास एक कात्यायनी देवी का मंदिर है। बताया गया कि यहां हर साल सावन के महीने में काफी भीड़ होती है, खासतौर पर अंतिम सोमवार को। अब रेल मंत्रालय अपने 86 हजार किलोमीटर रेल पटरी पर के अगल-बगल कौन सा मंदिर है और यहां कब-कब मेला लगता है, ये हिसाब लगाता रहेगा। मुख्यमंत्री की बात से तो यही लगता है कि ये हिसाब राज्य सरकार को नहीं बल्कि रेलमंत्रालय को रखना चाहिए। कमाल है मुख्यमंत्री जी, आपकी समझ और सोच तो राहुल गांधी से भी घटिया होती जा रही है। मैं नीतीश कुमार से पूछना चाहता हूं कि क्या आपके स्थानीय प्रशासन को ये जानकारी थी, सोमवार के दिन माता कात्यायनी देवी के मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए आएंगे ? अगर जानकारी थी तो मंदिर और आसपास सुरक्षा के क्या प्रबंध किए गए थे ? एसडीएम और तहसीलदार स्तर के किस अधिकारी की यहां तैनाती थी ? कितने पुलिसकर्मियों की यहां ड्यूटी लगाई गई थी ? क्या सहरसा के जिलाधिकारी ने संभावित भीड़ के मद्देनजर मुख्य सचिव के अलावा रेल अफसरों से ट्रेनों के संचालन को लेकर कोई पत्र लिखा था ? क्या राज्य सरकार और रेलमंत्रालय के बीच ट्रेनों की रफ्तार कम किए जाने को लेकर कोई मीटिंग या पत्राचार हुआ ? अब ये सब नहीं हुआ तो मुख्यमंत्री जी आपको तो मुंह छिपाकर घर में बैठे रहना चाहिए था, कैसे कैमरे के सामने कुतर्क करने आ गए?

एक और कुतर्क किया जा रहा है। राज्य  सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि पहले जब यहां मीटर गेज की लाइन थी, तब यहां "कासन" लगा हुआ था। अब ब्राडगेज होने के बाद वो कासन क्यों हटा लिया गया ? सच कहूं जब नीतीश कुमार ऐसा बकवास कुतर्क करते हैं, तब मैं सोचता हूं कि आखिर इन्होंने रेल मंत्रालय कैसे चलाया होगा ? इन्हें तो अफसर छोड़िए ग्रुप डी के कर्मचारी मूर्ख बनाते रहे होंगे। बात बहुत लंबी हो जाएगी, लेकिन नीतीश जी इतना जान लीजिए कि "कासन" कोई स्थाई प्रबंध नहीं होता है। कासन कई वजहों से लगाए जाते हैं, कभी रेल पटरी की मरम्मत हो रही हो, स्थानीय जरूरतों के हिसाब से भी कई बार लगाए जाते हैं। कासन होता भी कई तरह का है, कुछ कासन में स्पीड कम कर दी जाती है, कुछ में टोकेन एक्सचेंज करना होता है, कुछ डेड कासन होते है, जहां ट्रेन को पूरी तरह रोक कर, फिर चलाना होता है। लेकिन इसकी समीक्षा होती रहती है और कासन लगना और हटना एक सामान्य प्रक्रिया है।

एक हास्यास्पद तर्क और दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि स्टेशन मास्टर क्या कर रहा था, उसे देखना चाहिए कि रेल पटरी पर लोग जमा हैं तो ट्रेन की गति धीमी करा दे। अब मूर्खों को कौन समझाए ? जब  बताया जा रहा है कि वहां लोग रेल पटरी पर चलने के आदि हैं, वहां कोई रास्ता ही नहीं है। आप सब जानते हैं कि छोटे स्टेशनों पर एनाउंसमेंट का कोई सिस्टम होता नहीं है, लेकिन सिगनल देखकर लोग खुद ही रेल की पटरी से छोड़कर अलग चलते हैं। ट्रेन  को आता देख लोग पटरी से दूर हो जाते हैं। अच्छा ऐसा भी नहीं है राज्यरानी एक्सप्रेस के पहले इस पटरी से कोई ट्रेन नहीं निकली।  इस पटरी पर लगातार ट्रेन दौड़ लगा रही थीं, फिर एक एक्सप्रेस ट्रेन को अचानक कैसे रोका जा सकता है ? अच्छा स्थानीय ग्रामीणों को ट्रेनों के संचालन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है, उन्हें लगता है कि ट्रेन को चालक और स्टेशन मास्टर चलाते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री जी आपको पता है ना कि ट्रेनों का संचालन कैसे होता है। इन सभी ट्रेनों का संचालन मंडल मुख्यालय के कंट्रोल रूम से होता है। बाकी सब उसके आदेशों का पालन करते रहते हैं। इसके अलावा जब यहां सड़क ही नहीं है तो मुख्यमंत्री जी आप ये कहना चाहते हैं कि यहां तैनात स्टेशन मास्टर पूरे समय पटरी देखता रहे कि कब कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, जिससे लगातार कंट्रोल रूम को बताता रहे।

नीतीश कुमार जी आप तो बिहार मे कानून व्यवस्था का बहुत बखान करते हैं। कहते हैं कि अब बिहार मे कानून का राज है। कानून का राज होने के बाद आपके प्रदेश की हालत ये है कि एक दुर्घटना के कई घंटे बाद तक आपकी पुलिस का कोई अता पता नहीं होता। अधिकारी राहत के काम में लगने के बजाए आपको गुमराह करते रहते हैं। वरना ये कैसे संभव है कि दुर्घटना के तीन घंटे बाद उत्तेजित भीड़ स्टेशन पर खड़ी दो ट्रेनों को आग के हवाले कर दे। आपके कानून के राज में उस ट्रेन चालक की पीट पीट कर हत्या कर दी जाती है, जिसकी कोई गलती नहीं है। ट्रेन चालक सिगनल देख कर ट्रेन चलाता है, अगर सिगनल ग्रीन है, तो वो भला क्यों ट्रेन रोकेगा। फिर भी आपके प्रदेश मे उसकी हत्या हो गई। मुख्यमंत्री जी आपने तो पूरी जिम्मेदारी शातिराना अंदाज में रेलवे पर सौंप दी और खुद दूर खड़े हो गए। आप ने ट्रेन चालक की हत्या पर शोक संवेदना जाहिर करने से भी परहेज किया। इस वीभत्स घटना के बाद भी अगर आप कहते हैं कि बिहार मे कानून का राज है, तो मैं ऐसे कानून के राज पर थूकता हूं।

बहरहाल मुख्यमंत्री जी मेरा मानना है कि राजनीति के भूत का जो पागलपन आप पर सवार है, उससे आप दूर होने की कोशिश कीजिए। होना तो ये चाहिए था कि जैसे ही आपको दुर्घटना की खबर मिली, आपको सारे काम छोड़कर खुद वहां पहुंचना चाहिए था, इससे वहां राहत के काम में भी तेजी आती। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी बिहार के लोग मुश्किल में होते हैं, आप  लोगों के दुख दर्द मे शामिल नहीं होते हैं। मिड डे मील के तहत जहरीला खाना खाने से जब तमाम बच्चे दम तोड़ रहे थे, उस समय भी आप सियासत कर रहे थे। इस घटना को भी आप राजनीति के चश्मे से देख रहे थे। आपने वहां जाना तक ठीक नहीं समझा और आज तमाम श्रद्धालु जब ट्रेन की चपेट में आ गए तो भी आप लोगों के दुख दर्द मे शामिल होने के बजाए पटना में बैठकर सियासत करते रहे। सच कहूं तो आप बेनकाब हो चुके हैं, इसलिए बिहार की जनता से माफी मांगिए और कुर्सी तो आप छोड़ने वाले नहीं, फिर भी हो सके तो आत्ममंथन जरूर कीजिए,  जिससे फिर ऐसी घटना हो तो आप कुछ करें या ना करें, लेकिन बिहार की जनता का भरोसा हासिल करने की तो कोशिश जरूर कीजिए। आज की घटना और आपके व्यवहार से ये तो साफ हो गया है कि आपके लिए कुर्सी से बढ़कर कुछ भी नहीं है।







Thursday, 15 August 2013

मोदी के भाषण में ही था प्रधानमंत्री का रंग !

ठीक बात है, आज यानि 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री पर सीधा हमला नहीं होना चाहिए, ऐसा तो मेरा भी मानना है। मैं भी इसी मत का हूं कि आजादी के जश्न में सभी को एक साथ शरीक होना चाहिए वो भी मन में किसी के प्रति बिना कटुता का भाव रखे हुए। आजाद भारत में आज पहली बार किसी प्रधानमंत्री को इस तरह जलील होना पड़ा। एक मुख्यमंत्री  15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री पर इस कदर हमलावर होगा, ये तो हमने और आपने कभी सोचा ही नहीं होगा। इन सब बातों के बावजूद मैं मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हूं। मेरा मानना है कि मोदी ने तो सिर्फ जनता की भावनाओं को अपनी आवाज दी है। सच तो यही है कि आम जनता के मन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए अब वाकई कोई सम्मान नहीं रह गया है। यही वजह है कि जब गुजरात के कच्छ से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पर हमला बोला तो तालियां सिर्फ कालेज के मैदान में ही नहीं बजी, बल्कि मोदी को घर बैठे टीवी पर सुन रहे लोग भी ताली बजाने से नहीं चूके। वैसे सच बताऊं, सरकार का जो हाल मनमोहन सिंह ने बना दिया है, इससे तो वो इसी दुत्कार के पात्र हैं।

इस बहस को शुरू करने से पहले आडवाणी की बात दो लाइन मे कर लूं, वरना आगे भूल जाऊंगा। सच बताइये क्या अब ऐसा नहीं लगता कि आडवाणी प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर होने के बाद कुछ असहज हो गए हैं। वो शानदार एक्जिट ना मिलने से काफी परेशान हैं। पार्टी में "बड़का बाबू" तो कहलाना चाहते हैं, लेकिन उनका काम ऐसा नहीं है, जिससे लोग उन्हें सम्मान से बड़का बाबू कह कह बुलाएं। हम सब जानते हैं कि इस जंग का ऐलान तो मोदी ने कल ही यानि एक दिन पहले कर दिया था। उन्होंने साफ कर दिया था कि लालन कालेज की आवाज लाल किले तक पहुंचेगी। अगर आडवाणी को लग रहा था कि मोदी गलत कर रहे हैं, तो उन्होंने कल ही क्यों नहीं समझाया ? जब मोदी ने दो दो हाथ कर लिया, तो घर में झंडा फहरा कर भाषण देने लगे। चलिए दो चार बार और ऐसे ही बक-बक करते रहे तो जो दो चार लोग दुआ सलाम कर रहे हैं, वो भी बंद हो जाएगा। आइये हम आप लाल किले पर चलें।

देश को इंतजार था कि कम से कम लालकिले पर तो मनमोहन सिंह सही मायने में प्रधानमंत्री नजर आएंगे। यहां से जब भाषण होगा तो लगेगा कि देश का प्रधानमंत्री बोल रहा है। लेकिन मनमोहन सिंह ने लालकिले से भी देश को निराश किया। एक बार भी नहीं लगा कि लाल किले से देश का एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री बोल रहा है। ऐसा लगा कि पंजाब का कोई थका हारा, मरा गिरा सा ब्लाक स्तर का कांग्रेस नेता भाषण पढ़ रहा है। इतना ही नहीं जो कागज वो पढ़ रहा है, शायद उसका अर्थ उसे भी नहीं पता है। आज देश में सबसे ज्यादा दो बातों की चर्चा है, पहला मंहगाई और दूसरा भ्रष्टाचार। मीडिया में इन दोनों विषयों पर लगातार चर्चा हो रही है। अगर प्रधानमंत्री के भाषण में इन दोनों विषयों की चर्चा तक ना हो तो भला देश के प्रधानमंत्री को कौन कहेगा कि ये जिम्मेदार प्रधानमंत्री हैं। फिर अपने प्रधानमंत्री के बाँडी लंग्वेज से तो लगता है कि शायद वो लालकिले से बोलने के लिए तैयार ही नहीं थे, लेकिन उन पर भाषण देने का काफी दबाव था, इसलिए वो बस खूंटी पर टंगी सदरी डाल कर भाषण पढ़ने आ गए। चेहरे पर भी कोई खुशी नहीं, लग रहा था कि प्रधानमंत्री किसी के अंतिम संस्कार में शामिल होकर आटो रिक्शा से लाल किला पहुंचे हैं।

मैं तो कहता हूं कि प्रधानमंत्री भले ही ज्यादा कुछ ना कहते, लेकिन राष्ट्रपति के भाषण का जिक्र करते हुए, पाकिस्तान की ओर इशारा कर इतना ही कह देते कि वो हमारे धैर्य की परीक्षा ना ले। एक कड़ा संदेश देते, जिससे देश की जनता को कम से कम इतना तो भरोसा होता कि देश सुरक्षित हाथों में है। लेकिन प्रधानमंत्री ने तो वही घिसी पिटी दो लाइनें दुहरा दीं जो कई साल से कहते आ रहे हैं। इससे लगता है कि पाकिस्तान को लेकर प्रधानमंत्री और सरकार कितनी लापरवाह है। हैरानी इस बात पर भी हुई कि उन्होंने पूरे भाषण के दौरान चीन का जिक्र तक नहीं किया। अब ऐसे प्रधानमंत्री को अगर नरेन्द्र मोदी ने उठक - बैठक करा भी दी, तो इतना  हाय तौबा क्यों मचा है भाई ? 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री को कटघरे में नहीं खड़ा किया जाएगा, ऐसा कोई नियम थोड़े है। ये तो महज एक परंपरा है। लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री देश के बारे में ना सोचे, सिर्फ कुर्सी पर चिपके रहने के लिए कुर्सी की मर्यादा के साथ समझौता कर ले, ऐसे प्रधानमंत्री पर सिर्फ एक मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि हर सूबे का मुख्यमंत्री हमला बोले वो भी कम है।

बात नरेन्द्र मोदी की होती है तो कुछ पत्रकार 2002 याद करने लगते हैं, मैं इन तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों से कहता हूं कि उन्हें अगर 2002 याद है, तो वो 1984 क्यों भूल जाते हैं। मैं कहता हूं कि 1984 दंगे में शामिल लोग भी उतने ही बड़े गुनाहगार हैं जितने 2002 के। खैर ये बात अब बहुत पुरानी हो चुकी है और देश यहां से बहुत आगे निकल गया है। लेकिन कुछ नेता, पत्रकार और तथाकथित समाजसेवी देश को बीती बातों को भूलने ही नहीं देना चाहते। चलिए मैं मोदी की बातों पर आता हूं। कहा जा रहा है कि मोदी ने गलत परंपरा कायम की है। 15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री पर सीधा हमला किया है, ये नैतिक नहीं है। मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा मानना है कि चोट गरम लोहे पर ही की जाए तभी असर होता है। कम से कम आज रात प्रधानमंत्री जब सोने जाएंगें तो एक बार सोचेंगे जरूर कि 67 सालों में कितने प्रधानमंत्री रहे हैं, कितनों ने यहां झंडा फहराया है, पर किसी को ऐसे हालात का सामना नहीं करना पड़ा, आखिर उन्हें ही क्यों ये सब सुनना पड़ रहा है। शायद कल से कुछ बदलाव देखने को मिले।

फिर नरेन्द्र मोदी ने कोई कडुवी या अभद्र भाषा इस्तेमाल नहीं किया, अगर उन्होंने अपने भाषण में प्रधानमंत्री का संबोधन किया भी तो उन्हें "प्रधानमंत्री जी" कह कर संबोधित किया। मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बुराई है। लोकतंत्र में हर आदमी को अपने नेता से सवाल पूछने का हक है। अगर मोदी ने प्रधानमंत्री से पूछ लिया कि भाषण में सिर्फ एक परिवार की बात क्यों की ? उत्तराखंड की मदद सभी राज्यों ने की, फिर सिर्फ  केंद्र की ही बात क्यों की ? पाकिस्तान को कड़ा जवाब क्यों नहीं दिया ? भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री क्यों चुप रहे ?  अगर मोदी ने गुजरात की तुलना दिल्ली से करने की चुनौती दी तो इसमें गलत क्या है ? आपने अगर अच्छा काम किया है, तो चुनौती का सामना कीजिए। मै देखता हूं कि कांग्रेस के नेता मोदी की बातों पर चुप्पी साध लेते हैं और मोदी पर हमला करने लगते हैं। अब ये तो सच है कि मोदी अच्छे वक्ता हैं और बात कहने का उनका अंदाज भी अलग है। उन्होंने राष्ट्रपति की बात को आगे बढ़ाते हुए कहाकि राष्ट्रपति कह रहे हैं कि हमारी सहन शक्ति की सीमा होनी चाहिए। अब ये सीमा शासक ही तो तय करेंगे। चीन आकर हमारी सीमाओं पर अड़ंगा डाले, इटली के सैनिक केरल के मछुआरों की हत्या कर दें, पाकिस्तान के सैनिक हमारे जवानों के सिर काट लें, तब हमें चिंता होती है कि सहनशीलता की सीमा कौन सी है। वो सीमा परिभाषित होनी चाहिए, राष्ट्रपति जी आपकी चिंता से मैं भी अपना सुर मिलाता हूं। मैं फिर पूछना चाहता हूं कि इसमें मोदी ने आखिर क्या गलत कहा ?

भ्रष्टाचार पर मोदी के तेवर से वाकई कुछ लोगों को दिक्कत हो सकती है। इसकी वजह ये है कि मोदी पिछले दरवाजे सोनिया गांधी के घर मे घुस गए। उन्होंने कहा कि जैसे पहले टीवी सीरियल आते थे, वैसे अब भ्रष्टाचार के सीरियल आने लगे हैं। मसलन भ्रष्टाचार पर पहले भाई - भतीजावाद के सीरियल का दौरा था,  फिर नया सीरियल आया मामा - भांजे का और अब इससे आगे बढ़ते हुए सास - बहू और दामाद का सीरियल शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कितना भी गंभीर आरोप लगे कांग्रेस के नेता उसे बर्दास्त कर लेंगे, लेकिन सोनिया गांधी के परिवार पर कोई उंगली उठाए, ये बात उन्हें नागवार लगती है। इसका विरोध कर सोनिया की नजर में नंबर बढ़ाने के लिए एक साथ कई नेता मैदान में उतर आते हैं। ऐसा ही आज भी हुआ, इशारों इशारों में रावर्ट वाड्रा पर हमला करने के मामले में बौखलाए नेता कैमरे के सामने आए और मोदी के खिलाफ जहर उगलने लगे।

हाहाहा इस पूरे मामले में एक चैनल का भी जिक्र करना जरूरी है। वो मनमोहन और मोदी के भाषण को प्रतियोगिता मान कर उस पर चार पांच लोगों को न्यूज रूम में बैठाकर नंबर मांगने लगे। चैनल की 28 - 30 किलो की एंकर जिसकी विषय पर जानकारी सिर्फ "माशाल्लाह" दिखी, उसकी रुचि किसी की बात सुनने में नहीं, बल्कि नंबर हासिल करने में ज्यादा दिखी। एक पत्रकार भाई जो इन दिनों अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्होंने मोदी को 4.5 नंबर दिए इसके पीछे जो तर्क दिया, इसे सुनकर लगा कि वो चैनल के न्यूज रूम में बैठकर नंबर नहीं दे रहे हैं, बल्कि कांग्रेस दफ्तर में बैठकर नंबर दे रहे हैं। हां वैसे तो आज चैनल अपनी लाइन बदलने के मूड में भी दिखे और वो चाहते थे कि 15 अगस्त के दिन मोदी के हमलावर तेवर को लेकर उनके कपड़े उतारे जाएं, पर डर सताने लगा कि कहीं औद्योगिक घराने अपने विज्ञापन वापस ना ले लें, लिहाजा वो ये हिम्मत नहीं जुटा सके। पर मैं एक सवाल पूछता हूं चैनलों के संपादक से, मोदी पर उंगली उठाने के पहले अपने गिरेबां क्यों नहीं झांकते ? देश में 28 राज्य हैं, हर जगह झंडा फहराया गया, हर जगह मुख्यमंत्री का भाषण हुआ, फिर चैनल ने केवल गुजरात के मुख्यमंत्री का ही भाषण क्यों दिखाया ? दोस्त साफ - साफ कहो ना मोदी टीआरपी मैटेरियल हैं। इसलिए उन्हें दिखाना चैनल की मजबूरी है।

चलते - चलते

एनबीआई यानि न्यूज ब्राडकास्टिंग आँफ इंडिया जो टीआरपी का आंकलन करती है। उसके अनुसार जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण दे रहे थे तो उस वक्त देश में 73.27 लाख टीवी खुले हुए थे। लेकिन जब मोदी का भाषण शुरू  हुआ तो 5.60 करोड़ टीवी देश में खुले  हुए थे। ऐसे में आज की जंग तो मोदी ने जीत ली।









Sunday, 4 August 2013

बड़ी बहस : क्रिकेट का काठमांडू सम्मान !


ये तो आप भी मानते ही होंगे कि पाप का घड़ा एक ना एक दिन भरता जरूर है। अब क्या मेरी तरह आप भी विश्वास के साथ ये बात कह सकते हैं कि बीसीसीआई के हाशिए पर डाल दिए गए अध्यक्ष श्रीनिवासन के पाप का घड़ा भर गया है ? देखा जाए तो पहली नजर में तो यही लगता है। उनके चेहरे पर जो अहंकार दिखाई देता था, कल दिल्ली में बेचारगी दिखाई दे रही थी। देखने से ही लग रहा था कि वो अपने और दामाद के किए पर शर्मिंदा हैं, लेकिन आप जानते ही हैं कि रस्सी जल भी जाए तो उसकी ऐंठन नहीं जाती। लिहाजा उन्हें लगा कि हो सकता है कि उनकी दादागिरी जिस तरह अभी तक चलती रही है, शायद उनके रुतबे के आगे सब बौने हो जाएं और अध्यक्ष की कुर्सी पर फिर जम जाएं। पर प्यारे श्रीनिवासन आगे से जब दिल्ली आओ, तो एक बार यहां के लोगों से राय ले लिया करो, फायदे में रहोगे। ये दिल्ली है, कुर्सी किसी को आसानी से नहीं देती, हां यही बैठक अगर आप काठमांडू में कर लेते तो कोई पूछने ही वाला नहीं था। जिसको जैसे चाहते बेवकूफ बनाते, सब आपके सामने सिर झुकाए खड़े रहते। लगता है कि आप सोशल मीडिया से दूर है, वरना आपको काठमांडू के बारे में सबकुछ पता होता।

खेल के बारे में जब भी कुछ चर्चा करता हूं तो डर लगता है। मुझे लगता है कि पता नहीं आप लोगों को इसके बारे में कितना पता है। चलिए फिर भी दो चार बातें फटाफट बता देते है, उसके बाद असल मुद्दे पर चर्चा करेंगे। दरअसल बीसीसीआई ने आईपीएल के बारे में जो " रुल बुक " तैयार किया है उसमें साफ है कि अगर आईपीएल की किसी भी टीम के प्रबंधन से जुड़ा आदमी अनैतिक कार्य करता है, तो उस टीम को डिबार यानि अयोग्य़ घोषित कर दिया जाएगा। आपको जानते ही है कि चेन्नई सुपर किंग के मालिकों में श्रीनिवासन के अलावा उनका दामाद मयप्पन भी शामिल है, जबकि राजस्थान रायल्स में शिल्पा के पति राजकुंद्रा है। इन दोनों पर सट्टेबाजी के गंभीर आरोप हैं। राजस्थान टीम के तो कई खिलाड़ी और भी गंभीर हरकतों में पकड़े जाने पर जेल तक की हवा खा चुके हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर चेन्नई और राजस्थान की टीमों को अभी तक अयोग्य़ घोषित क्यों नहीं किया गया ? आपको पता है कि श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष भी रहे हैं और उनकी टीम भी है। इसलिए उनके बारे में नियम कायदे की बात करना बेमानी है। मीडिया ने जब उनके दामाद मयप्पन, राजस्थान रायल्स के राजकुंद्रा के साथ बिंदू दारा सिंह की हरकतों के बारे में खबरें दिखाई तो कई हफ्तों के ड्रामें के बाद श्रीनिवासन बीसीसीआई से अलग होने को मजबूर गए। इतना ही नहीं जल्दबाजी में दो सदस्यों की एक कमेटी बना दी गई। इस कमेटी ने जांच कर अपनी  रिपोर्ट में श्रीनिवासन को क्लीन चिट्ट दे दी। लेकिन मुंबई हाईकोर्ट ने जांच कमेटी को ही अवैध बताकर उसकी रिपोर्ट खारिज कर दी।

इन सबके बाद भी श्रीनिवासन " मैं हूं डान " की स्टाइल में कुर्सी पर कब्जा करने की जुगत बैठाने लगे। अध्यक्ष का ख्वाब मन पाले हुए बेचारे दिल्ली तो आ धमके, लेकिन वो जिन लोगों के बूते दिल्ली आए थे, यहां उन्हीं लोगों ने उनकी खूब बजाई। बैठक के दौरान उनके खास लोगों ने ही उन्हें डराया धमकाया और कहाकि अब पूरा मामला कोर्ट में है। कोर्ट बीसीसीआई की हर गतिविधियों पर कड़ी नजर बनाए हुए है, लिहाजा ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे कोर्ट में अपना केस कमजोर हो। श्रीनिवासन चाहते थे कि वो ही इस मीटिंग की अध्यक्षता करें। जब उन्हें बताया गया कि इस होटल में तो आप कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन कोर्ट ने अगर अपना रुख कड़ा कर लिया तो इसके बाद क्या होगा ? बताते हैं कि जो तस्वीर उनके सामने रखी गई, बेचारे श्रीनिवासन हिल गए। अब सोचा जाने लगा कि बाहर मीडिया वाले खड़े हैं, उन्हें क्या बताया जाए ? कहा गया कि वो कौन सा हमें नंबर देने वाले हैं, कुछ भी बता दो। बस मीटिंग रद्द हो गई और कहा गया कि मीटिंग का एंजेंडा ही तैयार नहीं था। ये सुनकर आपको भी हंसी आ रही होगी, हमें तो खैर आ ही रही है।

आइये एक मिनट सीरियस बात कर लें, आपको ये पता है कि देश में क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों में उन्ही खिलाड़ियों को राष्ट्रीय सम्मान मिल सकता है, जिस खेल के महासंघ को भारत सरकार के खेल मंत्रालय से मान्यता मिली हुई है। मसलन कुश्ती, दौड़, टेबिल टेनिस, हाकी, टेनिस, तैराकी, बैडमिंटन कोई भी खेल हो, इससे से जुड़े महासंघ को अगर खेल मंत्रालय की मान्यता नहीं है तो कितना बढ़िया खिलाड़ी हो या फिर कितने ही पदक ही क्यों ना जीता हो, उसे सरकार मान्यता नहीं देती है, और ऐसे खिलाड़ी को कभी राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिल सकता। मतबल ऐसे खिलाड़ी को पद्मश्री, पद्मभूषण या अन्य किसी भी सम्मान से नही नवाजा जा सकता है। लेकिन देश में क्रिकेट को लोग धर्म मानते हैं और सचिन जैसे खिलाड़ी को भगवान। यही वजह है कि सरकार के क्रिकेट के मामले में सारे नियम कायदे किनारे रह जाते हैं। यहां बीसीसीआई जो पैसे वालों का एक गिरोह है, वो जो भी चाहे कर सकती है। आज तक बीसीसीआई को खेल मंत्रालय की मान्यता नहीं है, पर तमाम क्रिकेटर को पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान मिल चुके हैं। अब तो बात इससे भी आगे की हो रही है है, वो ये कि क्रिकेटर को भारत रत्न दिए जाएं। हाहाहाहा.... आपने शोले पिक्चर देखी होगी, एक डायलाँग है ना, बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना। मुझे भी लगता है कि अगर बीसीसीआई खेल मंत्रालय की मान्यता नहीं लेती है तो क्रिकेटरों को भी राष्ट्रीय सम्मान से वंचित कर दिया जाना चाहिए।

सच कहूं तो बीसीसीआई और क्रिकेटरों ने राष्ट्रीय सम्मान को काठमांडू सम्मान बना दिया है। मसलन कोई नियम कायदा नहीं। सम्मान किसको दिया जाएगा, सम्मान देने की प्रक्रिया क्या होगी, सम्मान के लिेए योग्यता क्या होगी, सम्मान के लिए निर्णयाक मंडल मे कौन होगा, कुछ भी से तय नहीं होगा। बस 4100 रुपये दो और सम्मान की पूरी प्रक्रिया इसी से पूरी हो जाएगी। मेरा मानना है कि ऐसे सम्मान खेल में तो नहीं बस ब्लाग में दिए जा सकते हैं। चलिए अंदर की बात बताते हैं। मेरे पिछले पोस्ट से ब्लाग परिवार में थोड़ी खलबली जरूर मची। वैसे एक बार आंख खोलने से आयोजकों की आंख खुल जाएंगी, अगर ऐसा कोई भी सोचता है तो मैं तो उसे 24 कैरेट का मूर्ख समझूंगा। लेकिन थोड़ा बहुत सुधार होगा, ये मुझे जरूर उम्मीद थी। काठमांडू सम्मान में भी थोडा बदलाव आया है। दो दिन पहले जिन नए आठ - दस नए लोगों का नाम सम्मान के लिए घोषित किया गया है। इसमें पहली बार ये बताने की कोशिश की गई है कि उन्हें किस क्षेत्र में सम्मान दिया जा रहा है। इसके पहले जो नाम थे, उन्हें तो यही लग रहा था कि ये 4100 रुपये का सम्मान है।

ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि एक ब्लागर ने स्वीकार किया कि उसे नहीं पता कि ये 5100 रुपये मुझे क्यों दिए जा रहे हैं। बस मैं इतना कहूंगा कि हां मुझे काठमांडू में 5100 रुपये दिए जा रहे हैं। रुपयों के साथ ही कुछ कपड़े वपडे भी दिए जाने का वादा किया गया है। अब प्राइमरी स्कूल के बच्चों से भी पूछा जाए कि अगर 4100 रुपये खर्च करने पर 5100 रुपये हासिल होते हैं तो 4100 रुपये खर्च करने चाहिए या नहीं ? बच्चे का जवाब होगा कि बिल्कुल खर्च करना चाहिए। अब भाई लोग भले ही ये कहें कि सम्मान की पैसे से तुलना नहीं करनी चाहिए, लेकिन सच यही है कि पूरा मामला ही पैसे का है। वरना सम्मान के लिए ब्लागरों को लुभाने के लिए नई स्कीम ना जारी की गई होती।  जानते हैं अब नए सम्मान की जो सूची जारी की गई है, उसमें एक बदलाव देखा गया है। कहा जा रहा है कि तमाम कपड़े - वपड़े के साथ ही एक निश्चित धनराशि भी दी जाएगी। मुझे लगता है कि ये स्कीम इसलिए घोषित करनी पड़ी क्योंकि लोगों को पता चल गया कि भारतीय रुपये की कीमत नेपाल मे ज्यादा है। बहरहाम मुझे इस बात की खुशी है कि अब मेरे ब्लागर मित्रों को जो बेचारे पैसे जमा कर फंस गए हैं, उन्हें कुछ तो राहत मिलेगी ।  

आप भी जानते हैं कि आयोजक आसानी से सही रास्ते पर आएंगे,  इसकी तो किसी को उम्मीद नहीं है। लेकिन सामाजिक न्याय का यही तकाजा है कि एक ना एक दिन पाप का घड़ा भरता ही है। ऐसे में हम सब को भी इनके पाप के घड़े को भरने तक का इंतजार करना ही होगा। लेकिन मैं देख रहा हूं कि जिन लोगों का नाम सम्मान के लिए घोषित किया गया है, अब वो बेचारे जरूर सकते में हैं। सब एक बार सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि कहीं वो वाकई ठगे तो नहीं जा रहे हैं ? 4100 रुपये कोई छोटी रकम तो है नहीं, ऊपर से काठमांडू पहुंचने का किराया भाड़ा अलग ! अब ये भी एक दूसरे से बात कर पूछ रहे हैं कि "आखिर मुझे ही सम्मानित क्यों किया जा रहा है ? ये बात ब्लागर सोचने को मजबूर है, क्योंकि उन्हें भी लग रहा है कि हमने ऐसा कोई तीर भी नहीं मार लिया कि सम्मानित होने के लिए मेरा पहला हक बनता हो ? ऐसा नही है कि इस सम्मान से सब पीछा ही छुड़ा रहे हों, कुछ लोग इस सम्मान के चक्कर में जगह-जगह प्रशंसा में खूब कमेंट कर रहे हैं, जिससे आयोजको का ध्यान उन पर भी जाए। मैं ऐसे लोगों को बता दूं कि घबराने की जरूरत नहीं है, जल्दी ही आयोजक ऐलान कर सकते हैं कि सम्मान के लिए 4100 रुपये के साथ अपना नाम खुद सूची में शामिल कर लें। चलिए ये तो ऐसा  मुद्दा है कि कभी खत्म ही नहीं होगा। इस पर तो लंबी बात चलती ही रहेगी, लेकिन मुझे इस बात की खुशी है कि कम से कम अब जितने भी लोग सम्मानित होंगे, उन्हें कुछ कम ही सही लेकिन रकम तो मिलेगी ना। चलते चलते एक बात बताऊं, अब लखनऊ में यही तय नहीं हो पा रहा है कि ब्लागर को किस कटेगरी में सम्मानित किया जाए ? चूंकि इतने ज्यादा  सम्मान है कि कटेगरी कम पड़ गई है। मित्रों ये बात आगे भी जारी रहेगी।