Saturday, 1 September 2012

सम्मान समारोह : ब्लागिंग का ब्लैक डे !


जी हैं आप मेरी बात से भले सहमत ना हों, लेकिन मेरे लिए 27 अगस्त " ब्लागिंग के ब्लैक डे " से कम नहीं है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं कि इसके पर्याप्त कारण हैं। इस दिन ब्लागिंग में ईमानदारी की हत्या हुई, इस दिन ब्लागिंग में बडों के सम्मान की हत्या हुई, इस दिन हमारी सांस्कृतिक विरासत "अतिथि देवो भव" की हत्या हुई। सच कहूं तो कल को अगर इस दिन को कुछ लोग याद रखेंगे तो सिर्फ इसलिए कि इस दिन ब्लागिंग में लंपटई की बुनियाद रखी गई, जिसे अब सहेज कर रखने की जिम्मेदारी कुछ लोगों के कंधे पर है। हालाकि ये कंधे बहुत मजबूत हैं, इसलिए  वो  सबकुछ संभाल लेंगे, वैसे भी ये सब ऐसे ही धंधे में सने हुए हैं।

मैने तो इस आयोजन के शुरू में भी कुछ बातें सामने रखीं तो काफी लोगों ने कहा कि मैं बिल्कुल सच कह रहा हूं, कई ने तो मुझे यहां तक कहा कि इतना साफ-साफ कहने की हिम्मत आप ही कर सकते हैं, मेरे में तो ये बूता नहीं है। मैं हैरान था इस बात से कि यहां लोग इतना डरते क्यों हैं ? बहरहाल उस वक्त मैं नया नया था, सबको जानता समझता नहीं था। लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब लोगों को जानता भले ही न हूं, लेकिन समझता सबकुछ हूं। चलिए भूमिका बहुत बना लिया अब सीधे सीधे मुद्दे की बात करते हैं।

रश्मि दीदी माफ कीजिएगा, मुझे शुरुआत आपकी बातों से करनी पड़ रही है। आपने सवाल उठाया है कि जिन लोगों को सम्मान दिया गया क्या वो इसके काबिल नहीं थे ? मतलब जिन लोगों को सम्मान नहीं मिला वो सम्मान के काबिल नहीं थे। यही कहना चाहतीं है ना आप। खैर सम्मान वम्मान छोड़िए। मेरी नजर में ना ये सम्मान मायने रखता है और ना ये कि किसे मिला किसे नहीं। लेकिन सम्मान की परिभाषा जरूर बदल दी आप लोगों ने। परिकल्पना दुनिया का पहला सम्मान है जो जीता जाता है। सम्मान पर कब्जा करने के लिए हमारे मित्रों ने कितनी  मेहनत की, लगातार वोटिंग के लिए मैसेज आ रहे थे। अगर सम्मान वोटिंग के आधार पर तय किया गया है कि तो इसमें सम्मान जैसा तो कुछ नहीं है, क्योंकि संसद में भी तमाम लोग जीत कर बैठे हैं, जिन्हें सड़क पर गाली देने से हम आप पीछे नहीं रहते। सम्मान के लिए तो  सम्मानीय लोग ब्लागर को चुनते, तो माना जाता है कि हां सम्मान है, ये तो वोटिंग से जीता गया है।

पहले तो इसमें दशक के ब्लागर का ही सम्मान होना था, लेकिन जब उसके तौर तरीके  पर सवाल उठने लगे, आयोजकों की भी किरकिरी होने लगी। तो लोगों को लगा कि कहीं ऐसे में ब्लागरों ने इस आयोजन से कन्नी काट ली तो क्या होगा ? आनन फानन में एक साजिश के तहत 40 और सम्मान जोड़ दिए गए। बस फिर क्या था, पूरी हो गई "अलीबाबा 40 चोर" की टीम। ब्लागर की आवाज को बंद करने का इससे नायाब तरीका हो ही नहीं सकता। इन्होंने पहले तो 40 लोगों को सम्मानित करने का ऐलान कर दिया। फिर हर वर्ग में तीन तीन ब्लागर का नाम शामिल कर दिया गया। अब 120 लोग सम्मान की कतार में आ गए। इतनी बड़ी संख्या में जब सम्मानियों की कतार लग गई तो सब के मुंह बंद हो गए।

वैसे सच तो ये है कि इन शातिर लोगों ने राजनेताओं को भी मात दे दिया। इन्होंने दशक के ब्लागर के नाम का ऐलान तो पहले कर दिया, लेकिन इन 40 में कौन कौन शामिल है। इनके नाम नहीं खोले गए। अलीबाबा को लगा कि अगर ये नाम खोल दूंगा तो 80 लोग तो तुरंत हमारी ऐसी तैसी करने लग जाएंगे। लिहाजा अच्छा है कि इन नामों का ऐलान वहीं किया जाए, इससे कम से कम आयोजन तक तो खामोशी बनी रहेगी, ये अपने मंसूबो में कामयाब भी हो गए। अब सब के सब लग गए किसी तरह जोड़ तोड़ कर अपना नाम सम्मानित होने वालों की सूची में शामिल कराने में,  अपनी ब्लागिंग की जिम्मेदारी सब भूल गए। उस समय भी हमने सबको चेताने की कोशिश की थी कि " सम्मान से बहुत बड़ा है आत्मसम्मान " लेकिन मेरी बात भला क्यों सुनी जाती।

और हां आयोजकों को इस मामले में भले ही शर्म ना आए, लेकिन मुझे आती है। इतना ही नहीं हर स्वाभिमानी आदमी को आनी भी चाहिए। क्योंकि मैं हैरान हूं इस बात से कि इस आयोजन को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागर सम्मान समारोह का नाम कैसे दिया जा सकता है। तीन भारतीय जिनका विदेशों में कारोबार है। वो ब्लागिंग में रुचि रखते हैं और वो अपने काम से देश आते हैं और आपके कार्यक्रम मे शरीक हो जाएं हैं तो आपका समारोह अंतर्राष्ट्रीय हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजना का यही मापदंड है। सवाल उठता है कि ऐसे सफेद झूठ बोलने के पीछे क्या वजह हो सकती है ? मुझे जो समझ में आता है वो तो यही कि इससे आपको धन संग्रह करने में थोड़ी आसानी हो जाती है। जो लोग आपको 10 रुपये देना चाहते हैं, आप उन्हें अंतर्राष्ट्रीय समारोह बता कर बीस रुपये वसूल सकते हैं। फिर आद. रुपचंद्र शास्त्री जी ने भी किसी ब्लागर का नाम लिया है जो केद्रीय विद्यालय में अध्यापिका हैं, उन्हें लंदन का बताया गया है। कुल मिलाकर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इसें अतर्राष्ट्रीय स्तर का समारोह बताने के पीछे इनकी मंशा साफ नहीं थी, इसके पीछे छिपा एजेंडा था, उसे आप समझ गए होंगे।

मेरी थोड़ी सी नाराजगी शिखा वार्ष्णेय से भी है। आप मंचासीन थीं, आप नहीं जानतीं कि रुपचंद्र शास्त्री जी का हिंदी ब्लागिग और ब्लागर के बीच क्या सम्मान है। इस पर तो हिंदी ब्लागर में वोटिंग करा ली जानी चाहिए कि क्या शास्त्री जी को मंच पर स्थान नहीं मिलना चाहिए था ? मुझे पता है कि जब लोग देश छोडकर बाहर जाते हैं तो अपनी संस्कृति  और सभ्यता से भी बहुत दूर हो जाते हैं। वरना शिखा से ऐसी  उम्मीद नहीं की जा सकती थी। उन्हें चाहिए था कि वो अपना स्थान शास्त्री जी के लिए खाली करतीं, इससे आयोजक मजबूर हो जाते एक वरिष्ठ ब्लागर को सम्मान देने के लिए। और हां माफ कीजिएगा शास्त्री जी जिन दो आदमी के हस्ताक्षर वाला प्रमाण पत्र आप लेने के लिए मंच पर चले गए, ये गल्ती आपने भी की है। कम से कम आपके प्रमाण पत्र जो हस्ताक्षर है वो इस काबिल नहीं है।

मुझे लगता है कि मैने ये बात क्यों कही कि इस आयोजन से ईमानदारी की हत्या हुई, बड़ों के सम्मान की हत्या हुई और हमारी विरासत अतिथि देवो भव की हत्या हुई, अब आपके समझ मे आ गई होगी। आप दुनिया भर से लोगों के आने का दावा करते हैं और उनके ठहरने के नाम पर कह देते हैं कि ये हमने कब कहा कि हम आपके रुकने का इंतजाम करेंगे ? इसे ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर का समारोह कहते हैं ? भाई हिंदी के सारे ब्लागर चंदा-चुंदी नहीं करते हैं, वो किसी तरह ब्लागिंग कर लेते हैं और आप जैसे लोगों के आयोजन को कामयाब  करने के लिए लंबा सफर तय कर आप तक पहुंच जाते हैं, यही बहुत है। जब किसी समारोह का नाम अंतर्राष्ट्रीय कहते हैं तो उसका स्तर क्या होना चाहिए ये भी जानना जरूरी है।

रश्मि दीदी बड़ी हैं, मैं व्यक्तिगत रुप से उनका बहुत आदर करता हूं। लेकिन मैं उनकी इस बात से कत्ताई सहमत नहीं हूं कि जब किसी कार्यक्रम की आलोचना हो तो ये भी उस आयोजन की कामयाबी का पैमाना है। उनकी इस बात से मैं हैरान हूं। एक अक्षम्य अपराध को जब कामयाबी का पैमाना बताया जाए तो समझ लिया जाना चाहिए ऐसे संगठन का भावी कार्यक्रम कितना बदसूरत हो सकता है। वैसे बड़े होने के नाते आपका फर्ज था कि इस बेवजह की बहस को बंद होना चाहिए और परिचर्चा में लिखने आपका मकसद भी मुझे तो यही लगता है। लेकिन मुझे अच्छा लगता कि आप आयोजन की खामियों के लिए दो बातें आयोजकों को भी समझाते हुए कहतीं । बहरहाल मैं अपने विचार आप पर थोप नहीं सकता,  आपको जैसा लगा वो आपने व्यक्त किया। खैर.. एक शेर याद आ रहा है कि ..

जी चाहता है तोड़ दूं शीशा फरेब का,
अफसोस मगर अभी तो खामोश रहना है।

मित्रों मैं इस बात को नहीं समझ पाता हूं कि हम सही को सही कहने की हिम्मत रखते हैं, लेकिन गलत को गलत कहने में हमारी हिम्मत कहां चली जाती है। पिछले दिनों मैने जब इस समारोह के बारे में लिखा तो बहुत सारे लोगों ने मुझे फोन कर शुक्रिया कहा और ये भी कहा कि आपने सच कहने की हिम्मत की। एक ब्लागर की बात तो मैं आज भी नहीं भूल पाया हू, जिन्होंने मुझे बताया कि उन्हें "वटवृक्ष" का सह संपादक बनाने के लिए पैसे लिए गए। जब हिंदी की सेवा करने का दावा करने वालों का चेहरा ऐसा हो तो आसानी से समझा जा सकता है कि इन सबकी आड़ में असल में क्या खेल चल रहा है। फिर मुझे तो इसलिए भी हंसी आई कि इस अंतर्राष्ट्रीय समारोह में इन्हें मुख्य अतिथि कोयला मंत्री ही मिले, जिस मंत्रालय की कारगुजारी की वजह से देश की संसद कई दिनों से ठप है। खैर अच्छा हुआ वो नहीं आए। चलिए आयोजन के जरिए यहां भी खेल करने के लिए एक और जुगाड़ की बुनियाद रख दी गई है,  स्व. राम मनोहर लोहिया के नाम पर अब ब्लागरों का कल्याण किया जाएगा। हाहाहहाहा..

माई आन्हर, बाऊ आन्हर,
हम्मैं छोड़ सब भाई आन्हर,
केके केके दिया देखाई
बिजुरी अस भौजाई आन्हर।

(स्व. कैलाश गौतम)





136 comments:

  1. @जब हिंदी की सेवा करने का दावा करने वालों का चेहरा ऐसा हो तो आसानी से समझा जा सकता है कि इन सबकी आड़ में असल में क्या खेल चल रहा है।

    जी, आज बिना सेवा - मेवा नहीं मिलता. पहली बात, हम लोग शौकिया इस ब्लॉग्गिंग के पचड़े में पड़े हैं... ब्लोग्गर की तादाद बढती गयी तो जिनमे दिमाग था वो उनको पैसा कमाने का मौका मिल गया. और जिनके पास पैसा था - उनको पैसा खर्च करके नाम मिल गया. बुरा मत मानियेगा.. कई ब्लॉग्गिंग पर पुस्तकें छपती है और जिसका क्राइटेरिया मात्र इतना होता है कि इतने पेज के इतने रूपये ... आप बताइये अपनी कौन सी पोस्ट इस किताब में छपवाना चाहते है.

    हम में से अधिकतर ब्लोग्गर तो छपास के मारे हैं, एक बार किसी तरह से किसी भी किताब में अपना फोटू सहीत आ जाए.

    कुछ भी बुरा नहीं है, सब ठीक है.

    गन्दा है पर धंधा है ये :)


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    1. सही रास्ता कौन दिखाएगा..
      छपास का ये रोग क्यों है भाई....
      आपकी पहचना आपकी रचनाएं हैं,
      ये बात आखिर सबकी समझ मे कब आएगी..

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  2. sir mai aapki baat se sahmat hu.....sammaan paane ki ,or sammaan dene ki jo parampara hai wo aaj kahi bhi baki nahi hai .....kisse videsh gaye bhartiye ko is tarah se treet kiya jata hai jaise ham bhartiye logo ka koi vajood hi nahi hai....blogger ki duniya mai mai abhi naye hu par samaj aata hai ki kis daud mai sab shamil hai.

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    1. आपके विचारो से मैं सहमत हू

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  3. रविन्द्र प्रभात द्वारा किये गए कार्यक्रम में उन लोगों का सम्मान किया गया जिन्हें वे भली भांति जानते थे , इसमें बुरा कुछ भी नहीं है !

    खराब बात यह है कि वे इसे वैश्विक अथवा अखिल भारतीय बता रहे हैं !इससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है , निष्काम भाव से हिंदी की सेवा करते बेहतरीन मनीषियों के बारे में या तो रविन्द्र भाई को पता नहीं था अथवा उन्हें चुपचाप छोड़ दिया गया !
    उदाहरण के लिए तमाम ज्योतिर्मय पुंजों में से एक नाम अजित वडनेरकर का भी था ...

    हाँ,किसी ब्लोगर ने, ऐसे आयोजन करने की पहल की है, इसके लिए वे अभिनंदनीय अवश्य है मगर केवल इसी कारण, वे अपने आपको स्वयं पुरस्कृत कर रहे हैं यह अवश्य उनके प्रति श्रद्धा में कमी लाएगा!

    बहरहाल जहाँ कुछ पुरस्कार बेहतरीन लोगों को दिए गए, जिसके वे सर्वथा योग्य थे वहीँ कुछ अन्य पुरस्कार ऐसे लोगों को भी मिला जिन्हें उसकी बहुत आवश्यकता थी यकीनन उनके उत्साह में वृद्धि हुई है !

    इस कारण रविन्द्र प्रभात बधाई के पात्र हैं !

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    1. सतीश जी अच्छे काम का और अच्छा करने वालों का मैं पूरे मन से प्रशंसा करता हूं। लेकिन ये आयोजन तो शुरू से ही पटरी से उतर गया था। इसमे जोड तो़ड की गंदगी दिखाई दे रही थी।
      फिर आप जानते हैं कि अगर कोई आदमी खूब दान करता है, लोगों की हर जरूरतों को पूरी करने के लिए हमेशा आगे रहता है, बेटियों की शादियों मे मदद करता है तो वाकई हम उसकी बहुत प्रशंसा करते हैं। हम क्या पूरा समाज प्रशंसा करता है। लेकिन जब आपको ये बात पता चलती है कि जो आदमी इतना दान पुण्य कर रहा है वो तो रात में डकैती करता है। तो ऐसा नहीं है कि उसके रात के काम की आलोचना होगी और दिन के काम की तारीफ।
      अन्यथा मत लीजिएगा ये पूरा मामला कुछ ऐसा ही है...

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    2. अगर यह आयोजन आयोजकों के अपने पैसे से हुआ है तो वे बधाई के पात्र हैं, वे जिसे चाहें पुरस्कार दें मगर यदि यह पैसा पब्लिक फंड से लिया गया है और ब्लोगिंग अथवा हिंदी के उत्थान के लिए लिया गया तो कार्य शैली पर लोगों का प्रश्न पूंछना उचित ही है ! उन्हें चाहिए कि एक पोस्ट लिख कर स्पष्टीकरण दे , इससे गलत फहमिया शांत हो सकती हैं !

      हाँ पुरस्कारों के नाम बड़े भ्रामक एवं हास्यास्पद हैं , इससे आपत्ति है और होनी भी चाहिए !

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    3. अगर यह आयोजन आयोजकों के अपने पैसे से हुआ है ????????
      best joke of the year 2012

      pata nahi sateesh saxena ko bhola kahun ya .....

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  4. वाकई !आप में बहुत हिम्मत है.हिम्मत बनी रहे.
    आप ने अपनी बात सब के सामने रखी.
    कागजी शेर बने लोग अक्सर देश के बाहर के भ्रष्टाचार पर तो खूब नारे लगाते हैं लेकिन अपने आस-पास कुछ गलत होते देख कर घर में घुस कर छुप जाते हैं.
    ऐसा कुछ हाल है आजकल हिंदी ब्लॉग जगत का भी हो रहा है ,या तो लोग अनदेखा करे हैं या फिर बिगाड़ के डर से चुप रहते हैं.

    ब्लॉगर सतीश पंचम की एक पोस्ट पढ़ी थी जिस में उन्होंने विशेष श्रेणी के ब्लोगरों के लिए लिखा था कि एक परसेंट तो अपना दंभ बनाए रखो!

    ***पुरस्कारों के बारे में प्रसिद्ध लेखक धीरेन्द्र अस्थाना जी का कहना सही प्रतीत होता है ''पुरस्कारों से कोई छोटा या बड़ा नहीं होता .....पुरस्कारों को सोच-समझ कर स्वीकार करना चाहिए.जिस पुरस्कार से गहरा सम्मान ,भावना या अकादमिक ऊँचाई न जुडी हो ,उसे टाल देना चाहिए.
    ***

    शास्त्री जी की पोस्ट उस निमंत्रित व्यक्ति की पोस्ट है जिसे सम्मान देने के लिए बुलाया गया था मगर उनकी बातों से यही लग रह है कि उनका अपमान हुआ है.
    दुःख हुआ उनके साथ यह सब हुआ देख कर.

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    1. जी बिल्कुल,यही बात मैं भी कहना चाहता हूं कि जिसे आपने वहां सम्मान के लिे बुलाया है और वो आदमी वहां मौजूद है। आप कार्यक्रम के समापन का ऐलान कर देते हैं और उन्हें सम्मान के लिए बुलाते तक नहीं है।
      इसका मतलब साफ है कि आप वहां दाव पेच आखिरी समय तक कर रहे थे, फिर ये भी नहीं माना जा सकता है कि आपसे भूलवश ऐसा हुआ, क्योंकि शास्त्री जी कोई सामान्य ब्लागर नहीं है।
      वो हमारे ब्लाग परिवार की रीढ हैं, जिन पर कम से कम मैं तो गर्व करता ही हूं
      जिस उम्र में वो इतने अच्छी तरह से कम्प्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, वाकई ये देखना अद्भुत है। ऐसे लोगों की आप समारोह मे वो स्थान नहीं देते हैं जिसके वो हकदार है..

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    2. प्रसिद्ध लेखक धीरेन्द्र अस्थाना जी का कहना सही प्रतीत होता है ''पुरस्कारों से कोई छोटा या बड़ा नहीं होता .....पुरस्कारों को सोच-समझ कर स्वीकार करना चाहिए.जिस पुरस्कार से गहरा सम्मान ,भावना या अकादमिक ऊँचाई न जुडी हो ,उसे टाल देना चाहिए.

      अल्पना जी,धीरेन्द्र अस्थाना जी का ये कथन, हमने नहीं पढ़ा था...आपने बताया आभार

      पर हमने किया यही...मिला तो मुझे भी...पर हमने टाल दिया. :)

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    3. रश्मि रविजा जी ,गर्भनाल ऑनलाइन पत्रिका के नए अंक में धीरेन्द्र आस्थाना जी का साक्षात्कार छपा है वहाँ पढ़ लिजीये.

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    4. शुक्रिया अल्पना जी :)

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  5. एक पोस्ट पर आई टिप्पणी में एक ब्लोगर ने इसे जीरो लोस घोटालों जैसा कहा गया है.
    है तो घोटाला ही .
    ऐसे आयोजन सिर्फ़ किसी संस्थान से अनुदान लेने के लिए किये जाते हैं.
    अन्तर्राष्ट्रीय के नाम पर दो ब्लोगर जो अपने उद्देश्य से भारत में मौजूद थे उन्हीं को बुला भेजा.

    लगता है लोग राजभाषा की सेवा के नाम पर हिन्दी की चिन्दी उड़ा रहे हैं .
    पाबला जी ने हिंदी की सेवा करने वालों का एक केस जो इसी २९ अगस्त को अखबार में छपा था ,
    के बारे में बताया था.

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    1. बिल्कुल आपकी बातों में दम है...

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    3. सॉरी ,एक ही कमेन्ट दो बार पेस्ट हो गया था..इसलिए एक डीलीट करना पड़ा.

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  6. मेरे लिखने से दुःख हुआ तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ भाई

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    1. बिल्कुल नहीं, ये एक बहस है और बहस से ही सही रास्ता निकल सकता है। मैं ही नही सच सब लोग जानते हैं, लेकिन लोग खुद को दूर रखते हैं।

      कुछ लोग का काम होता है कि वो अपने साथ एक ऐसे चेहरे को शामिल कर लेते हैं, जिसका सब रिस्पेक्ट करते हैं। ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ है।

      हम सब ब्लागर आपका बहुत सम्मान करते हैं वो वाला नहीं जो लखनऊ में हुआ, हम सब दिल से आपको आदर करते हैं।

      आप ऐसा कहकर अपमानित मत कीजिए। प्लीज

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  7. आपकी खरी-खरी बात बहुत अच्छी लगी ! फिल्म कर्मा में डाक्टर डैंग का डायलाग याद आता है - "दो-दो पैसे में बिकता है ये हिन्दुस्तानी दो-दो पैसे में"
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    मैं तो यह भी सोच रहा हूँ कि जब एक ऐसे मामुली एवार्ड के लिए ये हाल है तो कहीं अगर राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिल रहा होता अथवा बीस-पच्चीस लाख रुपया कैश मिल रहा होता तो क्या हाल होता ?
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    इसी घटना क्रम पर अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट पढ़ी थी, वो लिखते हैं - "अब तो ऐसे आयोजनों में खूब पुरस्कार सम्मान भी बाटे जाते हैं - जो अपनों के लिए अपनों के द्वारा अपनों के जरिये दिए लिए जाते हैं और यह एक वैश्विक कल्चर बन चुका है"

    मैं पूछता हूँ कि अगर ऐसा ही है तो देश की संसद क्यों ठप्प है ? क्या गलत किया कांग्रेस ने ?
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    यहाँ बहुतों से बात-चीत होती है ... सभी इस सम्मान आयोजन के तरीके से नाराज हैं ... लेकिन सबकी रिश्तेदारियां हैं आपस में इसलिए कोई कुछ कहना नहीं चाहता ! आपका बेबाक और बेलाग लेखन बहुत बढ़िया लगता है !
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    बधाई एवं आभार

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    1. शुक्रिया प्रकाश जी, लेकिन वक्त है, जब लोगों को सोचना होगा कि कुछ लोग कुछ भी करते रहें, हम खामोश कैसे रह सकते हैं। इनका असली चेहरा सबके सामने आना चाहिए....

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  8. हद होती है किसी चीज़ की ...

    अगर शास्त्री जी को आयोजक ने मंच पर नहीं स्थान नहीं दिया तो उस की जिम्मेदार शिखा जी कैसे हो गई ??? शास्त्री जी की हम सब इज्ज़त करते है पर इसका यह मतलब तो नहीं कि बेवजह किसी को भी 'सॉफ्ट टारगेट' बनाया जाये ! मंच पर और भी लोग थे ... आपके हिसाब से तो वो भी दोषी हुये फिर ...

    हिन्दी ब्लॉग जगत अभी भी काफी युवा है मेरी समझ मे अभी यहाँ किसी की सीट पक्की नहीं हुई है ! अपना अपना सम्मान सब को प्रिय है ... किसी के लिए किसी का अपमान तो मत कीजिये !

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    1. अरविंद मिश्र जी क्या शास्त्री जी को नहीं जानते ??? और आप वहाँ थे क्या ???
      केवल एक सत्र के लिए शिखा जी मंच पर थी ... आप आज एक तरफा सोच के साथ लिख रहे है ... इस लिए बात आपकी समझ के परे है ! कोई बात नहीं कभी कभी हो जाता है ... अपना ख्याल रखें !

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    2. ओह मैं आपकी दिक्कत को समझ सकता हूं...

      वैसे आपने पूरा पैरा नहीं पढ़ा और लगता है जल्दबाजी में कमेंट कर दिया है। मेरा मतलब ये है कि मंच पर और जो भी लोग मौजूद थे, वो शायद शास्त्री जी को ना जानते हों,लेकिन शिखा मेम जानती थीं, अगर वो सम्मान दिखातीं तो आयोजकों को अपनी गलती का अहसास होता। खैर उन्होंने ऐसा नहीं किया, इसके लिए मैने जो लिखा है, उस पर कायम हूं।

      मैं शिखा जी से माफी मांगते हुए ये बात कह रहा हूं कि उन्हें मंच पर स्थान उनकी विद्वता की वजह से नहीं, बल्कि उन्हें आयोजन का गुलदस्ता बनाकर बुलाया गया और मंच पर सजाया गया था।

      पता है ना वो ना होती तो समारोह अंतर्राष्ट्रीय नहीं रह जाता ना।

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    3. हा हा हा किस ने बता दिया यह सब ... पुर्णिमा जी भी तो थी वहाँ ... समारोह अंतर्राष्ट्रीय तो फिर भी होता ! यही होता है खुद देख कर बात कहने और सुनी सुनाई मे ... ;-)

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    4. आपको पता नहीं क्यों लग रहा है कि मैं उनकी आलोचना कर रहा हूं, मैं तो ये कह रहा हूं कि वो यहां और बड़ी हो सकतीं थीं अगर बड़ों को सम्मान दिलाने की पहल करतीं। एक दूसरा नाम आपने किसी ब्लागर का लिया, सच कहूं तो मैने उनका नाम सुना है, पहचानता नही हूं।
      भाई शिवम जी आपने कहा कभी कभी हो जाता है, ना ना ऐसा नहीं है। मैं ये बात पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूं।

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    5. मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि आप अपने ऊपर हस रहे या फिर मेरे पर.. वैसे आप तो मेरे पर ही हस रहे है।

      पूर्णिमा वर्मन को जानते हैं आप वो कहां कि रहने वाली हैं। यहीं उत्तर प्रदेश की पैदाइश है और लखनऊ, मिर्जापुर में काफी वक्त उन्होंने बिताया है। उनसे ये मंच अंतर्राष्ट्रीय हो गया.. यही कहना चाहते है ना आप.. खुश रहिए अपने आप में

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    6. सिर्फ यह जानकारी देनी थी कि पूर्णिमा बर्मन जी की फेसबूक प्रोफ़ाइल के अनुसार वे आजकल शरजाह मे रहती है ... जो जाहिर है भारत के बाहर है तो मामला अंतर्राष्ट्रीय बनता है ...

      दूसरी ओर शिखा जी की पैदाइश दिल्ली की है और १२वी तक उन्होने भारत मे ही पढ़ाई की है तो मामला राष्ट्रीय बनता है !


      बाकी मेरी ओर से भी बात ख़त्म ... जय हो !

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  9. आप शुरू से इस आयोजन के खिलाफ रहे है ... और आपने अपनी बात काफी तर्क के साथ पेश भी की है ... जिस का मैंने समर्थन भी किया और तारीफ भी ... पर आपका यह तर्क तर्क कम कुतर्क ज्यादा लगा ... माफ कीजिएगा !

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    1. अब आपने चूंकि फैसला ही सुना दिया, इसलिए ये गुंजाइश ही नहीं है कि मैं आगे कुछ कहूं। बस थोड़ा करेक्ट कर दूं आपको.. मैं आयोजन के खिलाफ कभी नहीं रहा। मैं इसके तरीके के खिलाफ पहले भी था और आज भी हूं।

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    2. क्या करे साहब आजकल जैसा माहौल चल रहा है अनुरोध कोई सुनता ही नहीं ... सब धरे के धरे रह जाते है ... सो एक फैसला का चोगा पहना कर अनुरोध किया कि किसी को बेवजह निशाना न बनाया जाये ... बात आप तक पहुंची ... मेरा मकसद पूरा हुआ ... बाकी आपकी बातों से मुझे कोई दिक्कत न रही न है ... और उम्मीद है न होगी ... और यकीन जनिएगा अपने बारे मे भी मैं ऐसा ही सोचता हूँ !

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  10. शास्त्री जी की पीड़ा अपनी जगह पर एकदम सही है . समारोह की उपलब्धिया और अपल्ब्धियाँ के बारे में चर्चा तो ठीक है . कौन लाभान्वित हुआ और कौन नहीं ये चर्च्जा भी ठीक. लेकिन मुझे नहीं लगता है रश्मि जी ने ऐसा कहा होगा को जिनको पुरस्कार नहीं मिले वो काबिल नहीं थे. कही कुछ कन्फयूजन तो नहीं ? . दूसरी बात मई शिवम् जी से सहमत हूँ की किसी को मंच पर स्थान देने का कम आयोजको का होता है , मुझे इसमें मंच पर बैठे किसी पर उंगुली उठाने का कारन नहीं दिखता. जैसा की आपने कहा की मंच पर शिखा जी थी और उन्होंने शास्त्री जी को बुलाया नहीं , शायद आपने ध्यान नहीं दिया. मंच पर शिखा जी के साथ और भी कई वरिष्ठ ब्लोग्गर थे जो शास्त्री जो को जरुर जानते होगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है . तो भैये पुरे मंच की बात करते न आप , एक को ही काहे कोस रहे है . रही बात किसी की विद्वता की तो सबके अपने अपने पैमाने है और विचार., बकिया तो सब ठीक ही है . बस किसी व्यक्ति के लिए आप जजमेंटल कैसे हो सकते है . आभार .

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    1. देखिए मेरा शिखा जी के लिए इसलिए कहना है कि वो यहां एक तरह से अतिथि के तौर पर मौजूद थीं,अगर वो पहल करतीं तो ज्यादा कारगर होता है। रही बात कि मंच पर और लोग भी थे, ये मेरी गल्ती है कि मैं ज्यादा लोगों को पहचानता नहीं। अगर ऐसा है तो सभी उसमें बराबर के दोषी है।
      वैसे आप मेरी भावना पर जाइये, बहुत ज्यादा इसे व्यक्तिगत करने की जरूरत नहीं है।
      रही बात रश्मि दीदी की वो मेरे लिए आदरणीय है और हमेशा रहेगी। विचारो में भिन्नता अलग है।

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    1. मैं आपके पहले पैरे की बातों से तो सहमत हूं। लेकिन अतिरिक्त योग्यता के नाम पर जो कुछ भी आपने व्यक्त किया है उससे असहमत होने के साथ ही मुझे तो आज के प्रशंग में गैरजरूरी भी लगता है।
      ब्लागर महिला हों या पुरुष हों, व्यक्तिगत रुप से मैं सभी का आदर करता हूं।

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    2. बेनामी जी, आप इस समय किसी महिला का नाम ले कर अपनी टीप दे रहे हैं, आप को आपको अपना नाम दर्ज करवाना चाहिए. आखिर आपमें इतना सहस तो होना ही चाहिए.

      जो भी मैं ब्लॉग के मालिक से प्राथना कर्ता हूँ कि वो इस टीप को डिलीट कर दे.

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    3. 5. ६० से कम उम्र की हैं,देखने में अच्छी हैं तो और भी बेहतर

      आप जो भी हैं एक भारतीय हैं ,,क्या आप के संस्कार आप को ऐसा लिखने की इजाज़त देते हैं श्रीमान ???
      हमारी भारतीय संस्कृति तो नारी का सम्मान करना सिखाती है और आप इन शब्दों के द्वारा अपमान कर रहे हैं ,,मेरी आप से विनती है कि कृपया ऐसा न करें और अपनी इस सोच को बदल लें
      धन्यवाद !

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    4. जी, मैं आपकी बातों से सौ फीसदी सहमत हूं। हम सब के वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, पर किसी को भी व्यक्तिगत आक्षेप और गैरमर्यादित टिप्पणी से बचना चाहिए...

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    5. सस्ते और घटिया कमेन्ट नहीं छापने चाहिए महेंद्र जी इससे आपकी विश्वसनीयता पर आंच आएगी !

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    6. शायद आप इसी कमेंट के लिए कह रहे हैं। इसे मैं अभी डिलीट कर रहा हूं

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    7. इस्मत जी का आभार की उन्होंने महिलाओं के प्रति अभद्रता पर की गयी टिप्पणी पर इशारा कर दिया...

      @ महेंद्र श्रीवास्तव,
      आप जो कार्य कर रहे हैं वह सराहनीय है ! पिछले कुछ समय से आप के लेख आकर्षित करते रहे हैं और उसका कारण आपका दृढ निश्चय , विषय पर आपके द्वारा किया अध्ययन और निडरता है ! समझदार पाठको का अभाव होने के बावजूद मुझे विश्वास है कि धीरे धीरे लोग आपकी मज़बूत लेखनी को सम्मान देना शुरू करेंगे !

      आपके कार्य के प्रति मेरी शुभकामनायें स्वीकारें !

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  12. महेन्द्र भाई, परिकल्पना का अपना कार्यक्रम था। किसे मंचासीन करना है किसे नहीं, यह उनका निजि निर्णय है। शिखा का इसमें क्या रोल है? जो आप उससे नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। हम ब्लॉगिंग करते हैं अपने मन से। कोई बुला कर नहीं लाया कि ब्लॉगिंग करो तो तुम्हे मान-सम्मान मिलेगा। मुझे 4 साल हो गए यहीं। यहाँ जो घट रहा है सब देख रहा हूँ। समय मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया भी देता हूँ। किसी की नजर में कोई महान होता है किसी की नजर में कोई। सबकी नजर एक सी नहीं होती। मैने आपकी सारी पोस्ट पढी और पिछली पोस्ट पर मेरा मंतव्य भी है। अब कार्यक्रम हो चुका है और जिन्हे जो मिलना है वह मिल गया तो इसे विराम दें तो ठीक है। क्योंकि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी और व्यर्थ के विवादों में कुछ धरा नहीं है। हैप्पी ब्लॉगिंग………:)

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    1. @क्योंकि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी

      पंडित जी, जाने दीजिए... किसको पडी है बात को रास्ते में रोकने की. :)

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    2. अरे ललित भाई जी मैने तो ब्लाग मे ही लिखा है कि मेरी थोड़ी सी नाराजगी उनसे है, लेकिन लोग इसे बड़ा बना दे रहे हैं। लेकिन भाई जी मेरा मानना है कि वरिष्ठ ब्लागर को स्थान देकर वो बहुत बड़ी हो जाती। और आयोजक तो उन्हें मच से नीचे जाने ही नहीं देते, ये तो सौ फीसदी तय था।
      खैर मेरी ओर से तो ये मामला खत्म ही है....

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    3. सारे ही नौ गजे हैं। सभी की बोर्ड से ब्लॉगिंग करते हैं। वरिष्ठ कनि्ष्ठ सब अपनी जगह। जिसे जहाँ जगह मिली वही सही। ……… जय हिन्द

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  13. बहुत ही सच बोलता हुआ आलेख बधाई |जो कविता आपने नीचे दिया है उस कवि [कैलाश गौतम ]का नाम जोड़ दें तो मुझे अच्छा लगेगा |आभार

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    1. आपका बहुत बहुत आभार

      ( मुझे थोडा कन्फ्यूजन हो गया था कि ये स्व. कैलाश जी की रचना है या फिर जौनपुर वाले स्व. चंद्रशेखर जी की, इसलिए नाम नहीं लिखा। आपने बताया तो मैने अब दर्ज कर दिया है। आभार)

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  14. http://krantiswar.blogspot.com/2012/09/blog-post.html
    yeh padheeye..Rashmi Prabha jinhen aap didi kahte hain..ve parikalpna se judi hain.bahut chalak stri hain.
    personal anubhav hain.savdhaan raheeye.

    unke bare mei ham bhi kuchh khulaase karna chahte hain.

    yeh is post se related nahin hai lekin blogging ka dirty paksh dikhane ko kafi hai.
    pls do not publish -not related to post.

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  15. मेरी नजर में शिखा का इन सबमें कोई रोल नहीं है ... वो एक मेहमान के तौर पे गई थी ... हाँ चूक आयोजकों से अवश्य हुयी !
    -
    -
    सौ बात की एक बात ये है कि कोई भी बड़ा समारोह हो, आयोजन हो वहां कुछ न कुछ चूक होना तो लाजिमी ही है ! किसी भी बड़े काम में आलोचना तो होती ही है ... इससे किसी को भी विचलित होने की जरुरत ही नहीं है ! पिछली गलती से सबक लेकर आगे बढ़ने को सोचा जाए बस !
    -
    लेकिन ये कहना कि जिनको सम्मान नहीं मिला उनको मिर्ची लग रही है .. वो जल रहे हैं .. ये सब कतई गलत बातें हैं !
    अमेरिकाना रवैया भी सही नहीं है कि "या तो तुम मेरे साथ हो या मेरे दुश्मन"

    मैंने स्वयं रवींद्र प्रभात जी की खुलकर प्रशंसा की है ... आज भी कर रहा हूँ ! रवींद्र जी ने ब्लॉग जगत में जितनी मेहनत की है उतनी आज तक किसी ने नहीं की ! जितना उन्होंने कर दिया वो भी अपने आप में इतिहास है !

    बहुत ही सुखद होगा अगर आलोचना को स्वस्थ भाव से लिया जाए !

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    1. किसी कवि की एक रचना याद आ रही है

      वृक्षारोपण का कार्य चल रहा था,
      नेता आए,पेड़ लगाए,पानी दिया.
      खाद दिया,
      जाते जाते भाषण झाड़ गए, पर
      गाड़ना आम का पेड़ था
      बबूल गाड़ गए...

      हा अगर इसे आप ठीक समझते हैं
      तो मुझे भी कुछ नहीं कहना है..

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  16. आयोजक ने पहले ही घोषित कर र्खा था कि किस सत्र में कौन मंचासीन होगा।
    किसी को अगर बुरा लगता तो वे न जाते। शास्त्री जी वहां गए, तो उन्हें इसमें कोई आपत्ति नहीं दिखी होगी। और हां शास्त्री जी के साथ जो हुआ, जो कि उन्होंने लिखा है वह ज़रूर अशोभनीय था।

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    1. अगर आपको लगता है कि शास्त्री जी गलत थे, तो अब मुझे कुछ नहीं कहना..
      खैर आपने स्वीकार किया है कि उनके साथ जो हुआ वो गलत है... तो मैं भी यही कह रहा हूं..

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  17. और हां व्यक्तिगत टिप्पणी और अशोभनीय बातों वाली टिप्पणी को डिलिट कर देना उचित प्रतीत होता है। फिर जिस किसी भी शख्स की वह टिप्पणी है वह नाम तक गोपनीय रख रहा है। वही उसकी लुकाछिपी वाला खेल है। इसे बंद किया जाना चाहिए। जब आपने मॉडरेशन लगा ही रखा है, तो ऐसी टिप्पणियों को जाहिर क्यों करते हैं?

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  18. http://www.deshnama.com/2012/09/blog-post.html

    देशनामा.............मेरी नज़र में लखनऊ ब्लागर सम्मेलन...खुशदीप

    ये लिंक ...खुशदीप जी के ब्लॉग का हैं ....आप सब जो यहाँ टिप्पणी कर रहे हैं ...उनके लिए जरुरी हैं

    महेंद्र जी ...यहाँ सच बोलने का कोई फायदा नहीं हैं ...सच बोलने वाले को ही कटहरे में खड़ा कर दिया जाता हैं .....इस ब्लोगिग में ऐसे ऐसे लोगों से वास्ता पड़ा हैं जो बिन सोंचे ...लोगों पर कीचड़ उछाल देते हैं ...लोगों को फोन करके ...किसी भी शरीफ ब्लोगर के खिलाफ बोलने का मोर्चा खोल देते हैं .....और मैं एक महिला होने के नाते इन सब बातों से दो चार हो चुकी हूँ |
    यहाँ पर सभी बहुत बड़े बड़े ब्लोगर और सम्मानीय भाई बंधू और लेखक साथी हैं ..जिनकी हम दिल से इज्ज़त करते हैं ...और अपने से छोटे ब्लोगर दोस्तों को बस इतना ही कहना चाहती हूँ ...एक मर्यादा कायम रखे ...वक्त का कुछ पता नहीं की जिंदगी के किस मोड़ पर आपकी मुलाकात किस से हो ....कम से कम नज़र मिलाने के काबिल रहे आप लोग ....शब्दों की सीमा ना ही पार की जाए .....ये ही एक अच्छे ब्लोगर और लेखक की पहचान हैं .....आभार

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    1. यहां भी अगर सच कहने का माद्दा मेरे में नही रहा तो ब्लागिंग को बंद कर देने को मैं पसंद करुंगा।
      मुझे बिल्कुल नहीं शौक है कि कोई मेरी तारीफ करे और मेरे लिए ब्लाग लिखे..मुझे ये भी शौक नहीं कि किसी कि प्रायोजित पुस्तक में मेरे लेखे छापे जाएं। हम जो सही समझते हैं अगर वो भी हम ना कह पाएं तो मैं समझता हूं कि मुझे नहीं आप सबको ब्लागिंग करने का अधिकार नहीं है।
      हमारे अँदर इतनी हिम्मत होनी ही चाहिए कि हम चोर को चोर और इमानदार को इमानदार डंके की चोट पर कह सकें...

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  19. महेंद्र जी, पोस्ट की तमाम बातों से सहमत हूँ. अफसोस है तो इस बात का की जो ब्लोगर बिना किसी मेहनत के चुने गए, सम्मानित किये गए, उनकी भी छीछालेदर हो रही बाकी सबके साथ. इस क्रम में मैं इस्मत और शिखा का नाम लेना चाहूंगी . इन दोनों ने न किसी को जिताने के नाम पर मेल किये, न मैसेज. नाम तो मैं रश्मि रविजा का भी लेना चाहूगी , जिसने सम्मान लगभग टाल दिया.न रश्मि ने पुरस्कार के लिए कहीं मेल किया. गेहूं के साथ घुन पिसने की कहावत चरितार्थ हो रही है....
    एक बात जिस पर आपत्ति के साथ साथ अफ़सोस भी है, वो ये की कार्यक्रम तीन सत्रों में था, हर सत्र के अलग अलग अतिथि थे, पहले सत्र में शिखा भी थी. शास्त्री जी का अपमान तब होता, जब मंच पर वे खड़े होते, और शिखा बैठी रहती. लेकिन ऐसा नहीं था. जिस समय शिखा मंचासीन थी, तब शास्त्री जी दर्शकों की अग्रिम पंक्ति में बैठे थे. ऐसे में शिखा कहाँ दोषी हो गयी??? ये पूर्वाग्रह समझ में ही नहीं आया.

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    1. मैं वैसे तो इस बात का जवाब दे चुका हूं लेकिन फिर दुहरा रहा हूं कि शिखा अपने कद को और बड़ा कर सकतीं थी,अगर वो थोड़ा भारतीय संस्कृति को आगे बढाते हुए एक वरिष्ठ व्लागर के सम्मान में एक कदम आगे बढातीं। क्योंकि वो ऐसा करने की स्थिति मे थीं....
      आपने एक शब्द इस्तेमाल किया पूर्वाग्रह... इससे मुझे सच मे तकलीफ हो रही है। आखिर शिखा से पूर्वाग्रह क्यों?

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    2. @नाम तो मैं रश्मि रविजा का भी लेना चाहूगी , जिसने सम्मान लगभग टाल दिया

      लगभग नहीं बिलकुल ही टाल दिया...मैने इस सम्मान को acknowledge भी नहीं किया.

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  20. इतना कड़वा होता है आधा सच तो पूरा कैसा होगा?
    इस आयोजन के इस पूरे प्रकरण में इतनी जगह इतना कुछ लिखा गया है अगर उसक १० % भी सच है तो समझिये कि कई चेहरों से मुखोटे उतर गए हैं .
    दुःख भी हुआ .

    कुछ गलत फहमियां दूर हो गईं.सच कचोटता है .पीड़ा देता है .

    १५० ब्लोगर और उनके मित्र जो अब भी सच न देख पा रहे हों ,देर सबेर उन्हें भी ज्ञान हो जाएगा.मैं भी २००९ की परिकल्पना सम्मान विजेता हूँ अगर ये सब बातें तब मालूम होती तो कभी इसे स्वीकार न करती.

    डॉ अरविन्द मिश्र जी ने २०१० में विज्ञानं सम्मलेन किया था बहुत ही सलीके से और कोई विवाद नहीं सब को पूरी महत्ता दी गए थी..यहाँ तक कि जो सुनने वाले छात्र आदि आये थे उन्हें भी दोपहर का भोजन-पानी दिया गया था .
    मुझे से सरकारी संस्था के निदेशक महोदय ने पूछा था कि क्या आप सिर्फ़ इस सम्मलेन के लिए यु.ए.ई यहाँ आयी हैं .मैं ने कहा- नहीं .अपने घरवालों से मिलने आयी हूँ.दिल्ली में थी इसलिए लखनऊ भी आना संभव हो पाया .
    मुझे निदेशक महोदय के साथ ऑफिस में बैठने को कहा गया परन्तु मैंने शैलेश भारतवासी जी के साथ बाहर ही बैठना उचित समझा था.
    बहुत सी अच्छी यादें ले कर वहाँ से लौटी थी और आभासी दुनिया के लोगों के बीच हुआ जीवन का पहला अनुभव इस दुनिया को वास्तविक मानने पर मजबूर कर गया .जीवन में पहली बार उन लोगों से मिलना हुआ था जिनसे अब तक सिर्फ़ शब्दों में मिले.

    लेकिन इस बार की आयोजन से जुडी कथा -कहानियां सभी को सचेत करने के लिए आवश्यक हैं.

    हम यहाँ स्वतंत्र लेखक हैं बस इतना ध्यान रहना चाहिए कि कोई हमारा इस्तमाल अपने छुपे प्रयोजन के लिए न कर सके.

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    1. जी यही बात तो मैं भी कह रहा हूं कि सच को स्वीकार करने में क्या जाता है..
      ब्लागर असली चेहरा पहचान गए हैं... इस आयोजन की आड़ मे क्या खेल रहा है अब किसी से छिपा नहीं रहा...

      जिस आयोजन के मुख्य अतिथि ही कोयला मंत्री रहे हों, जिस मंत्रालय को लेकर संसद नहीं चल पा रही है.. तो अंदर क्या कुछ चल रहा होगा.. कहने की जरूरत नहीं..
      हमाम मे सब.........

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  21. बहुत ख़ूब!

    एक लम्बे अंतराल के बाद कृपया इसे भी देखें-

    जमाने के नख़रे उठाया करो

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  22. महेंद्र जी ,

    आपको मैंने हमेशा बहुत सुलझा हुआ पाया है .... पर इस बार परिकल्पना सम्मान समारोह के लिए आपने जो कुछ लिखा उसमें कुछ बातें बिलकुल भी मनाने योग्य नहीं हैं .... रश्मि जी ने यह नहीं कहा कि जिसको सम्मान मिला वो ही काबिल थे ... रही फंड जमा करने की बात तो सबमें इतने गट्स नहीं होते कि सरकार से पैसा निकलवा सकें ... यदि परिकल्पना वाले अपने तरीके से यह काम करते हैं तो आपत्ति क्यों ? जिसको है वो भी कोशिश करे न । खैर यह विषय मेरा नहीं .... शिखा के मंचासीन होने पर कई लोग कह ही चुके हैं .... हर सत्र के अलग अलग अतिथि थे .... लेकिन लगता है कार्यक्रम में मीडिया प्रथम सत्र तक ही रही जिससे और सत्र में मंच पर बैठे अतिथियों के फोटो नहीं खींच सके .... शास्त्री जी के साथ जो हुआ सच ही दुर्भाग्य पूर्ण था ॥लेकिन अपनी नम्रता के कारण उन्होने शायद पुरस्कार लेना उचित समझा होगा ... वैसे यहाँ मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि शास्त्रीजी को पुरस्कार नहीं लेना चाहिए था ।

    बहुत जगह इस समारोह के बाद लिखी पोस्ट पढ़ी हैं और टिप्पणियाँ भी ... बेनामी द्वारा हर जगह एक ही बात कहना उनकी कुंठा को ज़ाहिर कर रहा है .... मुझे भी इस ब्लॉग जगत में 5 साल होने को आए .... और इन सालों में मैंने बहुत ब्लोगस पढे हैं ...लोगों के लेखन से पहचान सकती हूँ कि यह किसकी पोस्ट होगी ... या किसकी टिप्पणी ... मन की भड़ास निकालने के लिए बेनामी का सहारा उचित नहीं ...
    जिनको सम्मान मिला सबको आप कैसे एक लाठी से हांक सकते हैं ?
    जो कार्यक्रम होना था हो चुका .... अब लकीर पीटने से क्या होगा ?

    कार्यक्रम में होने वाली अव्यवस्था को दूर करने की सलाह देनी चाहिए न की इस तरह छीछालेदारी की जानी चाहिए ...आपकी इस पोस्ट पर कुछ बातें हैं जो विचारणीय हैं पर आप भी निष्पक्ष नहीं रह सके ...इसका खेद है ... आभार

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    1. संगीता दी, मैं कभी भी पूर्वाग्रह होकर कुछ भी नहीं लिखता हूं। मैंने जो बात की है एक एक बात तर्क पर आधारित है।
      फिर भी आपने मेरे लिए कुछ बातें की हैं, मैं आत्ममंथन करुगा कि कैसे मैं आपके भरोसे पर कायम रह सकूं..
      आपका ये आरोप कि मैं निष्पक्ष नहीं रह सका, ये मुझे पीड़ा देने वाला है, फिर भी मैं सिर्फ यही कहूंगा कि मैं आत्ममंथन करुंगा..
      लेकिन अभी भी मैं विश्वास के साथ अपनी लिखी हर पंक्ति पर गंभीर हूं और जिम्मेदारी के साथ उस पर अडिग हूं...

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    2. मुझे लगता है शिखा निर्दोष हैं, इसी प्रकार रश्मि ब्लॉग जगत में निर्विवादित और सुलझी हुई रही हैं आशा है आप पूरे प्रकरण पर एक बार इनकी भूमिका पर और गौर करेंगे...

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  23. महेंद्र जी आपने जो लिखा शायद ठीक हो ,मगर जो छींटाकसी का दौर शुरू हुआ उससे मन खिन्न हो गया. कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है आपके ब्लॉग पर इसका ध्यान आपको रखना चाहिए न की अपनी बात को सही करने के लिए उसे बढ़ावा देना उचित होगा .शास्त्री जी का अपमान हुआ अनुचित बात है .. इस पर रवींद्र और जाकिर जी की और से स्पस्तीकरण दिया जाना चाहिए मगर एक बात और भी ध्यान देने की है ही शास्त्री जी के "उच्चारण" पर लगे सम्मान लेते रवीद्र और जाकिर जी के चित्र का अगर कोई और पहलू है तो शास्त्री जी को भी बात को कहने का औचित्य बताना चाहिए .रही शिखा जी पर आपकी बात अनुचित लगती है.

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    1. मैं आपकी बातों से सहमत हूं,
      शिखा जी के बारे में मेरी तो एक सामान्य टिप्पणी है, जो मै महसूस करता हूं। और अपनी बात मैने माफी मांगते हुए कही है।

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  24. आदरणीय महेन्द्र श्रीवास्तव जी ! एक नेक राह दिखाती हुई पोस्ट का स्वागत है. रवीन्द्र प्रभात जी से या उनके सहयोगियों और सरपरस्तों से हमें कोई निजी बैर नहीं है. हम उन सबका सम्मान करते हैं लेकिन अच्छा काम सही तरीक़े से किया जान चाहिए. यह बात उनके लिए भी सही है, आपके लिए भी और हमारे लिए भी.

    आपकी पोस्ट और सभी टिप्पणियाँ पढ़ीं.
    आपने यह बिलकुल सही कहा है -
    "हम जो सही समझते हैं अगर वो भी हम ना कह पाएं तो मैं समझता हूं कि मुझे नहीं आप सबको ब्लागिंग करने का अधिकार नहीं है। हमारे अंदर इतनी हिम्मत होनी ही चाहिए कि हम चोर को चोर और ईमानदार को ईमानदार डंके की चोट पर कह सकें..."

    हमारा नज़रिया भी यही है. यह पोस्ट लिख कर जो काम आपने किया है, आप से पहले यही काम हम करते थे. सच कहने का साहस रखने वाला एक और आया, यह ख़ुशी की बात है.
    सच कहने वाले का कोई गुट या निजी हित नहीं होता लेकिन फिर भी उसका अपमान करके, उसका मज़ाक़ उड़ा कर उसका हौसला पस्त करने की कोशिशें की जाती हैं. हमारे साथ यही हुआ है और अब आपके साथ होते देख रहे हैं. हम अपनी राह से आज तक न डिगे और मालिक से दुआ है कि आप भी हमेशा सच पर क़ायम रहें.
    इस बार सम्मान समारोह पर हम कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं. सब कुछ सामने है. इसीलये हम इस सम्मान समारोह पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं. इस बार हम कुछ भी नहीं कह रहे हैं कि किसका सम्मान या अपमान क्यों ग़लत हुआ ?
    ज़्यादातर लोग अभी तक ब्लॉगिंग को समझ नहीं पाए हैं. वे बार बार इसकी तुलना अख़बार या प्रकाशित साहित्य से करते हैं और फिर 'उम्दा या घटिया' तय करने लगते हैं. हिंदी ब्लॉगिंग की मुख्यधारा यही है.
    मुख्यधारा में कुछ बातें और भी है जो एक सच्चे ब्लॉगर की चिंता का विषय हैं.

    जानिए बड़े ब्लॉगर्स के ब्लॉग पर बहती मुख्यधारा

    आपकी यह पोस्ट अपने कमेन्ट के साथ यहाँ भी सहेज दी गयी है.
    http://commentsgarden.blogspot.in/2012/09/award-fixing.html

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    1. आप हमारी बातों से सहमत हैं, बहुत बहुत आभार.
      मेरा हमेशा ही प्रयास रहता है कि सीधी सच्ची बात हो..

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  25. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज रविवार (02-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गयी है!
    सूचनार्थ!

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  26. जब आधा सच ये है तो पूरा सच क्या होगा..?

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  27. 150 pravishthiyan 40-50 samman..lekin inme bhi kai nam ek se adhik catagory me aaye hai..mein abhi bhi 5000 hindi bloggers ke nam ki list dekhane ko betab hu....

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  28. 150 pravishtiyan 40-50 samman..inme bhi kai nam ek se adhik catagory me shamil hue hai..mein abhi bhi 5000 hindi bloggers ki list dekhane ki ichchhuk hu..

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    1. सही कह रहा हूं ढूंढती रह जाइयेगा..

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  29. MUJHE SAB KAHTE HAIN KI "MERI TO SOCH HI AJEEB HAI " MAGAR FIR BHI LIKH RAHI HOON ...SAMY NIKAAL KAR KOI HUMRA LIKHA PADHE AUR TIPPANI KARE TO HUM TO USI KO APNA SAMMAAN SAMJH LETE HAIN ...VAISE SAMMELANO ME SIRF MILNA-JULNA AUR VICHAARON KA ADAAN PRADAAN HO TO ATI UTTAM,SARVOTTAM :)

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  30. पता नहीं क्यों हम अभी तक सम्मान अपमान से ऊपर नही उठ पाये ? शायद हमारा थोडा सा लालच ही गलतियाँ करवा देता है। आपकी काफ़ी बातें काफ़ी हद तक सही हैं और जो आपने कहना चाहा वो भी समझ मे आ गया फिर भी शिखा वाली बात हजम नही हो रही क्योंकि ऐसा होता है कि आयोजक ने जहाँ बैठा दिया तो इंसान वहाँ बैठ जाता है और इतने लोगों से मिल जुल रहा होता है कि ये बात उसके दिमाग मे नही आती और हो सकता है शिखा के साथ भी ऐसा ही हुआ हो जिसे ज्यादा तूल नही दिया जाना चाहिये दूसरी बात शास्त्री जी के साथ जो हुआ वो बहुत गलत हुआ और मेरे ख्याल से तो उन्हे आयोजकों को सूचित भी नही करना चाहिये था और चुपचाप आ जाना चाहिये था तब उन्हे अपनी गलती का अहसास होता और शास्त्री जी का कद और ऊँचा हो जाता । बहरहाल ये सब होता रहा है होता रहेगा महेन्द्र जी आप और हम कितना ही कुछ कह लें क्योंकि आखिर हम सभी है तो इसी देश की जनता ना …………जिसे आदत है सब सहने की और कुछ ना कहने की :))))))))
    फिर भी आपने इतना कहने की हिम्मत की उसके लिये आप बधाई के पात्र हैं।

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    1. मैं बहुत आदर के साथ अपनी बात कह रहा हूं, अगर आप मेरे ब्लाग को पढें तो साफ हो जाएगा कि मैने शिखा जी के बारे में ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा है। मैने लिखा है कि मेरी थोड़ी सी शिकायत उनसे है... देखिए यही लिखा है ना..

      अगर ये बात आप सबको इतनी बुरी लग रही है तो बंद कर दीजिए ब्लागर्स को एक परिवार कहना। ब्लाग परिवार कह कर हम सब अपनी नाक ऊंची करते हैं.. यहां हम एक दूसरे से इतने आदर से बात करते हैं। सबके नाम के साथ" जी "का इस्तेमाल करते हैं।

      और अगर कोई कहीं हमारे परिवार के वरिष्ठ सदस्य के साथ सम्मानजनक व्यवहार ना करे, तो हम इस बात को बोल भी नहीं सकते। मैं बार बार एक बात दुहरा रहा हूं कि शिखा जी का जितना आप आदर करती हैं मैं भी उससे कम नहीं करता। लेकिन वो अगर बुजुर्ग शास्त्री जी के सम्मान में कुछ पहल करतीं तो उनका सम्मान और बढ़ जाता ।

      देखिए अगर मुझे लगता है कि मैने कोई गलत बात की है तो मैं तुरंत खेद व्यक्त करता हूं, इसमें मुझे अपमान महसूस नहीं होता है। लेकिन मैं अभी जिम्मेदारी के साथ अपने लेख में लिखे हर बात के साथ खड़ा हू...

      हर शख्स अपनी तस्वीर को बचा कर निकले,
      ना जाने किस मोड पर किस हाथ से पत्थर निकले।

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  31. मैं खुद इस समहारोह में उपस्थिती नहीं थी तो मैं पूरी तरह नहीं कह सकती कि क्या सच क्या झूठ, मगर इतना ज़रूर कहना चाहूंगी कि बहुत से लोगों ने इस अवसर पर जो आपत्ति जाती है वो भी पूरी तरह सही नहीं है। क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है कि यदि लोगों को इस सम्मान के मिलने या ना मिलने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है, तो फिर लोग उन लोगों को इसकी आलोचना करने का भी कोई अधिकार नहीं, उन्हें तो neutral रहना चाहिए "जो दे उसका भी भला जो ना दे उसका भी भला" टाइप मगर ऐसा मुझे कहीं देखने को नहीं मिला। रही शिखा जी वाली बात तो उस मामले में मुझे ऐसा लगता है कि शिखा जी कि उसमें कोई गलती नहीं इस बात पर मैं आशीष राय जी कि बात से सहमत हूँ कि वहाँ उस दिन शिखा जी के अलावा भी कई और वरिष्ठ ब्लॉगर स्टेज पर मौजूद थे तो फिर केवल शिखा जी पर उस बात के लिए दोषा रोपण किया जाना सरा सर गलत है। यदि आपके द्वारा लिखी गयी बातों को मद्दे नज़र रखते हुए देखा जाये तो इस शिखा जी वाली बात पर बस इतना कहूँगी कि इस मामले में शिखा जी नहीं बल्कि organizers की गलती है कि उनहों ने रूपचन्द्र जी को वहाँ स्थान नहीं दिया। ऐसा मुझे लगता है और यह मेरा अपना मत है हो सकता है आप भी मेरी बातों से शामत न हो किन्तु आपका और आँय कई ब्लोग्गेर्स का इस विषय पर लिखा पढ़ने के बाद जो मुझे लगा वही मैंने लिखा इसलिए मेरी बातों को कृपया अन्यथा न लें।
    सादर पल्लवी

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  32. मुझे सच में हैरानी हो रही है आपकी बातें सुनकर। कुछ लोगों की वजह से सोशल मीडिया में कुछ भी होता रहे और हम खामोश रहें। आप ये कहना चाहती हैं। जिंदा कौम की ये निशानी नहीं है। जहां गलत हो उसके खिलाफ अगर आप आवाज नहीं उठा सकते तो .... मैं क्या कहूं।

    हां लेख ठीक से पढिए सम्मान किसे मिला किसे नहीं ये तो विषय ही नहीं है। इसके तौर तरीके पर बात हो रही है। आप ये सोचती हैं दो चार लोग इस माध्यम की आड़ में कुछ भी करें और लोग मूक दर्शक बने रहेंगे।

    शिखा की बात इसलिए मैने की क्योंकि मुझे उनसे उम्मीद थी कि शायद उनमें बड़े छोटे का सम्मान बरकरार होगा। रही बात आयोजकों से तो उनसे इसकी उम्मीद करना बेमानी है।

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  33. यहाँ मैं देख रहा हूँ कि नाते-रिश्ते निभाये जा रहे हैं. बाकायदा अपने हितैषियों से कमेंट्स करवाए जा रहे हैं. मेरा कहना है कि बेनामी के कमेंट्स क्यों हटाये जाएँ ? क्या ये बेनामी एलियंस हैं ? ये बेनामी भी कोई ब्लॉगर ही होंगे. कोई अगर सामने नहीं आना चाहता तो क्या फर्क पड़ता है ? इससे मुद्दा ख़त्म तो नहीं हो जाता न ? महेंद्र जी की पोस्ट बहुत ही सटीक है और बहुत संयमित तरह से लिखी गई है वरना खुले तौर पे तो बहुत कुछ लिखा जा सकता था. ये लम्पटई तरीके का एवार्ड बांटना और अपने लोगों को सम्मानित करना बंद होना चाहिए. हर एक ब्लॉगर अपने में नायाब है. हर ब्लॉगर की अपनी एक विशेषता है.

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    1. मैं आपकी बातों से सहमत हूं.. बेनामी के तौर पर भी आप प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन बात कहने के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखना जरूरी है।
      मैने यहां से सिर्फ एक कमेंट को हटाया है, जिसमें सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि साथी ब्लागर्स भी समझते हैं कि यहां मर्यादा का उलंघन हुआ है।

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  34. आपकी बात सच है मगर आधी है। दो चार ने पूछा भी है कि पूरा सच कैसा होगा ?
    पूरा सच कड़वा होगा।
    कड़वा बोलने में शेख़चिल्ली की मां का कोई सानी नहीं है। बेगम कहती हैं कि औरत का काम ख़र्चा और मर्द का काम कमाना है। शादी के बाद कमाने के दबाद में मर्द के तो अरमान ही मर जाते हैं, कुछ के ज़मीर भी मर जाते हों तो कोई ताज्जुब नहीं है। मुर्दा ज़मीर शख्स कुछ थोड़ा बहुत ग़लत कर भी जाए तो दूसरे मर्द को ज़ेबा नहीं कि उसे मलामत करे। मर्द के दर्द को कोई औरत न समझे तो न सही, कम से कम आप तो समझिए न !
    ...और यहां मुर्दा ज़मीर एक ढूंढो तो हज़ार मिलते हैं।

    औरत हमेशा ठीक होती है। हमारी बेगम ने यह बात हमारे दिलो दिमाग़ में बैठा रखी है लिहाज़ा शिखा जी का बैठना दुरूस्त ही रहा होगा। अपने क़द से वह मुतमइन हैं तो आप भी जाने दें।

    80 ब्लॉगर्स की बोलती बंद करना एक बड़ा हुनर है। जो कि दाद के क़ाबिल है। 80 के अलावा भी बहुत से चुप हैं कि ब्लॉग पीठ के पुरस्कार में किसी भी साल उनका नाम आ सकता है।

    ईनाम की उम्मीद भी ब्लॉगर्स की बोलती बंद कर सकती है। इससे उम्मीद जगती है कि भारत में कभी टयूनेशिया की तरह पलटा न आएगा।

    अंग्रेज़ी सरकार राय बहादुर और ख़ान बहादुर के खि़ताब दिया करती थी। हिन्दुस्तानी सरकार भी हर साल सौ पचास ब्लॉगर्स को ‘ब्लॉग बहादुर‘ के खि़ताब दे दिया करे तो सब अपनी सिटटी पिटटी गुम और बोलती बंद करके ख़ुद ही बैठ जाएंगे।
    इंडी ब्लॉगर एग्रीगेटर तो ब्लॉगर्स से सामान भी बिकवाता है। आप कहते हैं कि ब्लॉगिंग का अधिकार नहीं है।
    अधिकार कैसे नहीं है जी ?
    फिर कंपनियों का सौदा कौन बेचेगा ?

    शास्त्री जी पैसे नहीं देते, न पिछली बार पैसे दिए और न ही इस बार। बस यही बात है उनका नाम न बोलने के पीछे। अपना माल मुफ़्त में भला कैसे लुटा दे कोई ?

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    1. मुझे लगता है कि आपकी बात तो सही है, लहजा कुछ ज्यादा सख्त हो गया है। ये बात थोडा सहज तरीके से भी कही जा सकती थी..
      बहरहाल स्वागत है आपका..

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  35. मित्रों,

    मुझे तब ज्यादा अच्छा लगता जब मैं आप सभी की प्रतिक्रिया को यहां पब्लिश कर
    पाता। लेकिन मुझे अब तक 54 कमेंट को रोकना पड़ा है, इसमें मुझे लगा कि भाषा की मर्यादा का पालन नहीं किया गया है। देखिए मैं इस बात पर गर्व करता हूं कि मैं इस ब्लाग परिवार का सदस्य हूं। और यहां बहुत से काबिल लोग हैं, जिनका साथ, स्नेह और आशीर्वाद मुझे मिला है।

    मैने यहां अपना विचार व्यक्त किया है, मैं जानता हूं कि यही अंतिम सत्य नहीं हो सकता। हो सकता है कि मेरी बात से आप सहमत ना हों, इस पर आप अपनी बेबाक राय रखें, मैं उन्हें यहां पब्लिश करुंगां, पर गाली गलौच की भाषा होने पर मुझे उसे रोकने के लिए मजबूर होना पडता है।

    मै देखता हूं कि यहां बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो वैसे तो क्रांति वांति की बात करते हैं, पर शिष्ट भाषा में दी गई टिप्पणी को भी इसलिए प्रकाशित नहीं करते क्योंकि उन्हें डर होता है कि वो कहीं इस परिवार में कमजोर ना पड़ जाएं। खैर उनकी बात वो जानें..

    लेकिन मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप अपनी बात तीखे से तीखे रूप में रखें, पर इस बात का जरूर ध्यान रखें कि ये टिप्पणी अगर आपके परिवार के लोग पढ़ रहें हो तो कहीं उन्हें शर्मिंदा ना होना पड़े। बाकी आप खुद समझदार हैं..

    जिन लोगों के प्रतिक्रिया मुझे रोकनी पडी है, मैं उनसे माफी मांगता हूं, मै चाहता हूं कि वो उस प्रतिक्रिया से गाली गलौच को संपादित कर दोबारा भेज दें, जिससे उनकी राय भी सभी तर पहुंच सके।

    महेन्द्र

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  36. महेंद्र भाई साहब यहाँ किसी का भी किसी से जर--जोरू--जमीन का बैर नहीं है.
    किसी ने गलत कहा, गलत लिखा या गलत किया तो चुप क्यूँ रहा जाए ?
    कोई यहाँ किसी का वेतन भोगी कर्मचारी है ?
    महेंद्र जी आपकी ये पोस्ट अच्छी है तो लोग सराह रहे हैं
    लेकिन कल को आप भी कुछ गलत कहेंगे तो
    यही लोग बेनामी बनकर आपका भी ऐसे ही विरोध करेंगे :)

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    1. प्रकाश जी,
      मैं स्वागत करुंगा जब कोई मेरी आलोचना करेगा, और हां मेरी आलोचना करने के लिए किसी को मुंह छिपा कर बात करने की जरूरत नही है, वो खुल कर मेरे बारे में बात करे। मुझे अच्छा लगेगा।

      प्रकाश जी आप मेरे ब्लाग पर जरा गौर कर लीजिए, यहां चाहे बीजेपी हो,कांग्रेस हो या फिर चूरन चटनी वाले बाबा हों, सबके बारे मे साफ साफ राय रखता हूं। किसी के गुणगान नहीं कर पाता।

      यही वजह है कि ठोक कर लिखता हूं। सर बेईमान तो आंखे ही नहीं मिला सकते, ये मेरा दावा है....

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  37. आपमें अगर ये खूबी न होती तो मैं आपका रेगुलर रीडर क्यों होता ?
    आपकी साफगोई ... बेलाग बातें दिल को भाती हैं !
    बहुत ख़ुशी होती है ये देखकर कि कम से कम कोई तो है जो भीड़ से अलग अपना नजरिया रखता है ! कोई तो है जो किसी की परवाह किये बिना सच बोल सकता है !
    आप अपना ये अंदाज कभी नहीं छोड़ियेगा !

    सादर

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    1. आप सबका यही विश्वास ताकत देता है सच लिखने का।,
      विश्वास रखिए, जिस दिन लगेगा कि सच लिखना संभव नहीं है, उस दिन ब्लाग खत्म कर दूंगा, पर गलत लिखूं तो उसी दिन ईश्वर हाथ की उंगलियों को गला दे, जिससे लेपटाप पर काम करने लायक ही ना रहूं।

      आप मेरे लेख को पसंद करते हैं आपका बहुत बहुत आभार

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  38. महेन्द्र श्रीवास्तव जी पोस्ट की तमाम बातों से सहमत हूँ....!!!!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया संजय जी

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  39. इस छोटे से दिमाग से बहुत कुछ बाहर ही रह जाता है ..वैसे सच्चाई को कोई नहीं दबा सकता है..एक दिन वही सच रहता है ..

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  40. ...आपका आधा सच डर-असल पूरा झूठ है.मुझे काल्पनिक और अतार्किक बातों का जवाब नहीं देना है.मैं खुद वहाँ रहा हूँ.बात का बतंगड जान-बूझकर बनाया जा रहा है.एक तरफ आप परिकल्पना-सम्मान को महत्त्व भी नहीं देना चाहते,दूसरी ओर उसकी आलोचना भी साथी कारणों से कर रहे हैं.

    ...आपने जिक्र किया है कि अनर्गल टीपों को नहीं छापा है जबकि 'शेख चिल्ली का बाप" आपको वास्तविक प्रोफाइल लगती है और उसका कहा वेद-वाक्य.आपका यही आचरण बताता है कि आप भी नकारात्मकता के शिकार हैं.

    ...परिकल्पना अब रुकने वाली नहीं है.दुःख होता है कि इसके उजले पक्ष को न देखकर ऐसे लोगों के सम्मान की तरफदारी की बात की गई है जिन्होंने अतीत में इससे बुरा अपमान झेला है.शास्त्रीजी का जील के यहाँ बाप बनाने के बाद भी अपमान हुआ था और अब यही लोग उनके सम्मान की बात कर रहे हैं.
    ...

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    1. सच कहूं तो इसी तरह की प्रतिक्रियाओं का इंतजार था। इससे लगता है कि मेरा निशाना सही जगह लगा है।

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    2. आपके ऐतराज़ के मददेनज़र जब शेख़चिल्ली से राय मांगी तो वह बोला कि जो प्रोफ़ाइल फ़र्ज़ी न हो वह असली होता है। जो हक़ीक़त में ब्लॉगर होता है। वह फ़र्ज़ी और छदम प्रोफ़ाइल के फ़र्क़ को बख़ूबी जानता है और छदम प्रोफ़ाइल पर कभी ऐतराज़ नहीं करता। मुंशी प्रेमचंद से लेकर दूसरे बहुत से मुसन्निफ़ों ने छदम नाम से लिखा है।
      आपके ब्लाग की और परिकल्पना ब्लाग की टीपों को देखने के लिए शेख़चिल्ली को भेजा था। वह अभी ऑनलाइन है और फ़ेसबुक चैट पर बता रहा है कि दोनों ही ब्लागों पर छदम प्रोफ़ाइल वालों की टीपें दिख रही हैं।
      जो बात वहां जायज़ है, उसे यहां सिर्फ़ इसलिए रोक देना ठीक नहीं होगा कि मैं शेख़चिल्ली का बाप हूं।
      मैं किसका बाप हूं ?
      यह मत देखिए.
      जो मैं कह रहा हूं, उसे देखिए.
      जो मैं कह रहा हूं उसमें मैं आज़ाद हूं और जो मेरे घर में पैदा हुआ उसमें मैं मजबूर था।

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    3. बेचारे नब्बे फ़ीसदी पर नाहक़ नाराज़ हो रहे हो, नब्बे फ़ीसदी तो चुप हैं.
      कहने सुनने का नाम ही ब्लागिंग है. सही बात आप बता दीजिए.



      ** आपने दूसरों के विषय में कमेंट करते हुए ख़ुद कभी सोचा है। दूसरों का कमेंट चुभता है ?

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  41. @ महेन्‍द्र श्रीवास्‍तव, जानकारी जरा नहीं और पूरी तरह कन्‍फ्यूज्‍ड हैं, मान भी रहे हैं और लिख रहे हैं आधा सच। प्रत्‍येक तर्क का यही जवाब कि 'मुझे नहीं मालूम, मैं नहीं जानता, माफ कर दीजिए'। वास्‍तव में बहादुरी की मिसाल है यह कारनामा। आपको भूल न सकेगा जमाना। कल्‍पनाओं को वास्‍तविकता का जामा पहनाना कोई आपसे सीखे। महेन्‍द्र नाम से कोई इन्‍द्र का समकक्ष नहीं हो जाता कि मह या नेह की बरसात करेगा। जब विचारों की बुनियाद ही दिग्‍भ्रमित होने पर टिकी हो तो और कुछ हो नहीं सकता। एक औरत ही ऐसा करती है कि पड़ोसिन की निंदा करती है और उसी से जीवन पाती है। आप भी लगता है कुछ कम नहीं और निंदा रस तो सबको भाता है। उसी का पान करने सब यहां आ रहे हैं तो किम आश्‍चर्यम्। और कुछ न सही रीडरशिप तो बढ़ेगी ही। वरना तो अपना कोई रचनात्‍मक परिचय दीजिए। कोई तो हो जो यह साबित करे कि उसने पुस्‍तक में शामिल होने के लिए पैसे दिए हैं। अच्‍छा लिखोगे तो जरूर शामिल होगा। पर यह लेखन नहीं है जिसे आप अपनी बहुत बड़ी तीरंदाजी समझ कर खुश हो रहे हैं। झूठ को आधा सच का नाम देने से भी झूठ सदा झूठ ही रहता है, सच का उसमें एक प्रतिशत भी नहीं बन सकता है। पूरा सच तो यह है कि 'हिंदी ब्‍लॉगिंग में 90 प्रतिशत लोग अब ऐसे हैं जिन्‍होंने हिंदी ब्‍लॉगिंग में प्रचार पाने के लिए पुरस्‍कारों की आलोचना और छिछालेदारी को अपना धर्म बना लिया है और अन्‍यों का भी किसी तरह धर्म परिवर्तन करने की जुगाड़ में जुटे हैं।' जुटे रहिए लेकिन इससे किसी सच्‍चाई को कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम जानते हैं कि हम क्‍या कर रहे हैं इसलिए तनिक अंतर नहीं पड़ता कि कोई क्‍या सोच रहा है ? सोचने का सबको अधिकार है और अब उस मुई सोच को अभिव्‍यक्ति देने का भी अधिकार है। जानते नहीं पूर्णिमा जी को तो अमावस की ही बातें करोगे महेन्‍द्र जी। पहले जानिए उसके बाद लिखने की कोशिश कीजिए किंतु तब उतने पाठक नहीं मिलेंगे और न टिप्‍पणियां और न ही कोई आपको बहादुर कहकर बेरी की झाड़ी पर बिठाएगा। इतना ही बहुत है लिखा तो बहुत जा सकता है किंतु मैं इस प्रकार के विवादों को न तो पढ़ता हूं और न इस बारे में लिखता हूं। कहीं से लिंक आया तो आधे सच की वास्‍तविकता कहे बिना रह न सका। खैर .... फिर मिलेंगे आप अपने निंदा रस का जमालगोटा बनाकर खुद पीते रहिए और अपने हिमायतियों का स्‍वाद बिगाड़ते रहिए बाद में यही जायका कायम रहेगा। क्‍या हुआ जो यम पास में रहेगा। सच तो यह है कि सिर्फ सच की जय होती है, जीरो प्‍वाइंट भी कम हो तो वह झूठ ही होता है और उसकी जय मैं नहीं कर सकता। आधे सच के पराजित होने का दुख तो बहुत होगा आपको किंतु इससे सबक लेंगे तो जिंदगी को और बेहतर ढंग से समझ कर अपना विकास कर सकेंगे। कुविचारों के इस जंजाल से खुद को बाहर निकालिए। सच मानिए दुनिया बहुत सुंदर है और आपको भी सुंदर लगने लगेगी।

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    1. सच कडुवा होता है, ये तो मैं जानता था,
      इतना कड़ुवा होता ये हम सबने देख लिया।

      आपने जिस टोन में बात की है, उससे मेरा भ्रम दूर हो गया। इसलिए आपकी बातों पर कुछ कहना बेमानी है।

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  42. और अंत में एक बात और :

    चाहूं तो सबकी एक एक बखिया पूरे सच के बूते पर उधेड़ सकता हूं किंतु यह मेरा स्‍वभाव नहीं है क्‍योंकि मैं तो बुनने में यकीन रखता हूं।

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    1. हाहाहहाहहा

      ये पुण्य का काम तो आपको तुरंत करना चाहिए।

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    2. पहले अपने बखि़ए सी लो मियां, अपना गरेबान रफ़ू कर लो। इसी में उम्र तमाम हो जाएगी।

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  43. कोई व्यक्ति कला, संगीत और साहित्य की उत्कृष्ठ कृतियों में भी दोष निकाल लेता है,पर उनकी मनोहरता और महिमा का आनंद नहीं ले पाता । किसी ने ठीक ही कहा है कि "उजाला और अंधेरा जीवन के दो पहलू हैं, क्योंकि सापेक्षता का यह संसार प्रकाश और छाया की रचना है । यदि तुम अपने विचारों को बुराई पर जाने दोगे तो तुम स्वयं कुरूप हो जाओगे । प्रत्येक वस्तु में केवल अच्छाई को ही देखो ताकि तुम सौन्दर्य के गुण को आत्मसात कर सको ।"
    आलोचना यदि स्वस्थ हो तो उसका अपना एक अलग आनंद है । करने वाले को भी मजा आता है और पढ़ने-सुनने वाले को भी । यदि आप दूसरे से कुछ अपेक्षा नहीं रखते तो दूसरों के कार्य आपकी इच्छा के विपरीत हो ही नहीं सकते ।
    मुझे लगता है कि ब्लॉग जगत में अनूप शुक्ल के बाद महेंद्र श्रीवास्तव के रूप में एक नए आलोचक पैदा हुये हैं , जिन्हें कभी भी पूरा सच कहने की हिम्मत नहीं रही, हमेशा आधा सच से काम चला लेते हैं । जिन्हें अपनी आलोचना में इस बात का भी भान नहीं होता कि महिलाओं के बारे में कैसी टिप्पणी की जाये ? एक तरफ तो रश्मि जी को रश्मि दीदी कहते हैं और दूसरी तरफ उन्हे प्राप्त सम्मान पर उंगली उठाते हैं । महेंद्र जी को मैंने हमेशा बहुत सुलझा हुआ पाया है .... पर इस बार परिकल्पना सम्मान समारोह के बारे में इनहोने जो कुछ लिखा उसमें कोई भी बात बिलकुल भी मनाने योग्य नहीं हैं ....! शास्त्री जी की पीड़ा अपनी जगह पर एकदम सही है . समारोह की उपलब्धिया और अपल्ब्धियाँ के बारे में चर्चा तो ठीक है, लेकिन जहां तक मेरी जानकारी में है कि रश्मि जी ने यह कभी नहीं कहा होगा कि जिसको सम्मान मिला वो ही काबिल थे ... ? फिर बात का बतंगड़ क्यों बनाया जा रहा है । शिखा जी के मंच पर विराजने को भी मुद्दा बनाया जा रहा है, कितनी शर्म की बात है । हमें अफसोस है कि हम उन ब्लॉगरों के बीच हैं जिनके मन में महिलाओं के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं ।
    रवीन्द्र जी का क्या उन्होने तो यह कार्यक्रम पहली बार किया नहीं और उन्हें आप जैसे आधा सच कहने वालों से कभी पाला नहीं पड़ा होगा । खूब पड़ा होगा । वे तो अपने धुन के धनी हैं । आगे भी उनका यह अभियान चलेगा, ऐसा उन्होने आपने पोस्ट पर घोषणा भी कर रखी है । हिन्दी ब्लोगिंग पर उनकी दो-दो किताबें आ चुकी है । वर्ष-2007 से वे हिन्दी ब्लोगिंग का विश्लेषण कर रहे हैं । इस बार हिन्दी ब्लोगिंग दशक पर उनकी और रश्मि जी की पत्रिका का विशेषान आया है । मुझे क्या आप बताएँगे कि हिन्दी ब्लोगिंग में आपका योगदान क्या है ?

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    1. हाहाहहाहा

      मतलब ये कि अगर मैं राजनीति पर लेख लिखूं तो पहले मुझे राजनीति करके वहां कोई योगदान देना होगा।

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  44. इस लेख को कई दिन पहले लिखा था, अब मैं यहां कम आता हूं। पर आज मैं यहां दोपहर बाद आया तो कुछ कमेंट स्पैंम में थे। मैं वाकई हैरान था कि अभी तक सक्रिय सदस्य कहां गायब हैं? बहरहाल मेरा इंतजार खत्म हो गया। मेरा मानना है कि ये लेख इस मामले में भी सार्थक हो गया कि इसे लिखने के सप्ताह भर बाद एक टीम एक साथ यहां आई और लगभग एक तरह की बात की। मैं सोचने लगा कि आखिर अब इसमें ऐसी नई बात क्या हो गई। खैर इन्हें ऐसा करना जरूरी था, इससे इन्होंने अपना फर्ज भी निभा दिया और सच कहूं तो कर्ज की अदायगी भी कर दी।

    वैसे इसमें एक ब्लागर को मैं व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद करता था, पर मेरा भ्रम समय रहते दूर हो गया, क्योंकि मेरा मानना है कि जो आदमी बेहतर इंसान नहीं हो सकता, वो बेहतर लेखक तो कत्तई नहीं हो सकता। हालाकि ये तो मेरा मानना है ना, इससे भला क्या होगा, जिस टीम के ये सभी मेंबर हैं, वहां जो चलता होगा, वही सही होगा इनके लिए तो।

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  45. आप हा हा हा करते रहिए
    लोगों से वाह वाह लेते रहिए
    किंतु हिंदी ब्‍लॉगिंग सिर्फ
    यहीं तक नहीं है
    तेरी तारीफ
    मेरी तारीफ
    इसे इन सब कुचक्रों से
    निकालना है बाहर
    अच्‍छा होता आप भी
    इसमें सच के बूते
    अपनी सक्रिय भूमिका निभाते
    मुझे तो बुरे लोग भी सच में
    खूब पसंद हैं आते
    क्‍योंकि वही तो सच्‍चे मार्ग पर
    चलने की राह बतलाते हैं कि
    किस तरह सावधान रहकर
    समाज में जिया जा सकता है।

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  46. पहले ही कहा था न यहाँ नाते-रिश्ते निभाये जा रहे हैं, बाकायदा अपने हितैषियों से कमेंट्स करवाए जा रहे हैं, नमक का क़र्ज़ अदा किया जा रहा है, आदर्श-सिद्धांत गया तेल लेने :))))

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  47. आज एक दिन में मुझे 29 कमेंट प्राप्त हुए हैं। इसमें ज्यादातर कमेंट के बारे में मैं आपको खुद बता दे रहा हूं क्योंकि उनकी भाषा गैरमर्यादित है। इसलिए उन्हें प्रकाशित करना संभव नहीं है। पर उनके आरोप मैं यहां बता दे रहा हूं।

    . मेरे ऊपर आरोप है कि मैं महिलाओं की रिस्पेक्ट करना नहीं जानता..
    . जब मैं ब्लागर्स के लिए कोई काम कर नहीं सकता तो मुझे लिखने का हक नहीं.
    . मेरी जानकारी आधी अधूरी है
    . मैं इस आयोजन के खिलाफ जानबूझ कर लिख रहा हूं.
    . यहां कुछ बेनामी टिप्पणी है, आरोप लगाया जा रहा है कि वो भी मैं ही हूं.
    . ऐसी ही तमाम बातें और भी हैं।


    दरअसल इस लेख को जितना समर्थन मिला है, उससे कुछ लोगों का परेशान होना स्वाभाविक है। इस परेशानी को अगर सकारात्मक नजरिए से देंखे तो साफ हो जाएगा कि अभी उनमें मान सम्मान को लेकर चिंता है। इसी लिए इतना परेशान हैं। ये अच्छी बात है। वैसे तो कुछ लोग होते हैं उनके लिए कुछ भी लिखते रहो, रिएक्ट ही नहीं करते। मतलब साफ है कि उनके लिए मान सम्मान का कोई स्थान नहीं है।
    हां पर सच्चाई सामने आने से कुछ लोग बौखला से गए हैं, यही वजह है कि गैर मर्यादित भाषा में यहां बातें रख रहे हैं। आप अगर लेख को दुबारा पढें तो मैने जिनके काम पर नाराजगी जताई है, उनके लिए भी सम्मान के शब्द इस्तेमाल किए हैं। खैर इनसे मैं अपनी तुलना नहीं करना चाहता है, क्योंकि ये खुद को ब्लागर का पितामह समझते हैं। अच्छा ऐसे लोगों को लगता है कि गुस्सा तभी जाहिर होता है जब अनाप शनाप भाषा का इस्तेमाल हो। मैने तो ऐसी भाषा इस्तेमाल नहीं की है, फिर भी लोग उछल गए।

    नोट. बहरहाल मैं यहां मर्यादित भाषा में ही टिप्पणी स्वीकार करुंगा। शुरु में एक दो टिप्पणी जल्दबाजी में चली गई,जिस पर मेरा ध्यान आकृष्ट कराया गया। उसके बाद मैने टिप्पणी डिलीट की। वैसे एक सुझाव है यहां गंदगी फैलाने से अच्छा है कि आपके पास भी ब्लाग है और पूरा स्पेस भी तो वहीं गंदगी कीजिए, यहीं क्यों ?


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  48. अच्छा हुआ जो आपने सच आधा ही लिखा और आपको पूरा सच पता भी नहीं है कि इस आयोजन में हिंदी की सेवा में लगे हुए कुछ सरकारी अधिकारी भी थे। जो कि हिंदी की सेवा के लिए सरकारी धन आवंटित करने के लिए जाने जाते हैं।
    अन्ना भी एनजीओ की टोह लेने के खिलाफ हैं। परंतु यह स्पष्ट है कि जब तक पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट एनजीओ मिलकर काम नहीं करेंगे तब तक हिंदी का ढंग से भला नहीं हो पाएगा। अपने पैसे को विदेश जाने से रोकने का तरीका यही है कि किसी भी बहाने सरकारी पैसे को सरकारी खजाने से निकाल कर देश के बाजार में चलता कर दो।
    इससे रामदेव बाबा की परेशानी कम हो जाएगी।
    सम्मान समारोह के आयोजक हिंदी के साथ देश की सेवा कर रहे हैं। उनके प्रयास प्रशंसनीय हैं।

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    1. ओह ऐसा भी होता है....
      चलिए जी और ब्लागर तो जान लें असल सच्चाई

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  49. सम्मान बांटने की होल-सोल एजेंसी वाले तो इस तरह खौरिया रहे हैं जैसे किसी ने इनकी दुम पर पैर रख दिया हो. ये लोग क्यूँ नहीं सोच पा रहे हैं कि अगर दस-बीस लोग मुखर विरोध कर रहे हैं तो पचासों ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो रिश्ते बिगड़ने के डर से मौन हैं. वैसे भी आम जन मानस चुप ही रहना बेहतर समझता है लेकिन जो गलत है वो गलत ही रहेगा.
    फुरसतिया जी ने जिन मुद्दों को उठाया था, उसका जवाब किसी भी मठाधीश ने आज तक क्यों नहीं दिया? मैं तो कहता हूँ कि अभी भी क्या देर हुयी है? जो सामान्य प्रश्न हैं कम से कम उनके जवाब तो प्रस्तुत किये जाएँ :
    १- इस सम्मान समारोह में कितने रुपये खर्च हुए?
    २- जो रुपये खर्च हुए उनका स्रोत क्या था?
    ३- एवार्ड के लिए कितने ब्लागों का आकलन किया गया था?
    ४- एवार्ड तय करने वाले निर्णायक कौन-कौन थे?
    ५- किस ब्लॉगर को कितने वोट मिले ?
    ६- पुरस्कार चयन के मामले में पारदर्शिता क्यों नहीं रखी गई?
    ७- अचानक ही 'परिकल्पना सम्मान' से 'तस्लीम परिकल्पना सम्मान' होने का कारण क्या था?
    ८- स्वयं आयोजक होते हुए भी स्वयं को ही सम्मान देने का भोंडा मजाक क्यों?
    ९- सम्मान के लिए अपने ही ख़ास लोग क्यों चुने गए?
    १०- कुछ अपने लोगों के विशेष केटेगरी क्यों बनायी गई?
    ११- सम्मान समारोह में ब्लॉगर की प्रतिष्ठा, योग्यता, अनुभव, उम्र जैसी बातों का
    ख्याल क्यों नहीं रखा गया?
    १२- आप अंतर्राष्ट्रीय समारोह कर रहे हैं लेकिन व्यवस्था के नाम पर कुछ भी नहीं?
    दूर-दराज से ब्लॉगर आयेंगे वो कहाँ रुकेंगे, कहाँ-क्या खायेंगे-पियेंगे? इसके बारे
    में क्यों नहीं सोचा गया?

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    1. जी बात बेनामी के तौर पर की गई है, इसलिए इसका मतलब ये नहीं कि इस पर भरोसा ना किया जाए..
      पर बात में दम हैं, लगता तो यही है कि बेनामी के तौर पर जो भी सज्जन ये हैं, उनके पास अच्छी जानकारी है,पर ये दो कौडी के लोगों के साथ बहस में नहीं पड़ना चाहते...

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    2. वाह,महेंद्र भाई !क्या हमारी क़ीमत लगाई है...दो कौड़ी ! क्या इसी से आपका बड़प्पन पता नहीं चलता ?

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    3. संतोष जी मैने आपके लिए ऐसा नहीं कहा...क्यों हर जगह खुद को फिट करने की कोशिश करते हैं।

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  50. आदरणीय महेंद्र श्रीवास्तव जी और पक्षी-विपक्षी सभी अन्य कमेंटकारी ब्लॉगर्स से विनती है कि काफ़ी सारी बोझिल बातों के बाद हमें थोड़ी हल्की फुल्की बातें भी कर लेनी चाहिएं ताकि हम सबका मन भी बहल जाए और वह उपाय भी सामने आ जाए, जिसके ज़रिये विश्वासहीनता के इस दौर में भी बड़े ब्लॉगर आपसी विश्वास को क़ायम रखे हुए हैं।

    कृप्या देखिए हमारी नई पोस्ट और कमेंट अवश्य दें-
    ‘लंगोटिया ब्लॉगिंग‘: परिभाषा, उपयोग और सावधानियां Hindi Blogging
    http://tobeabigblogger.blogspot.in/2012/09/hindi-blogging.html

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    1. हां बात तो आपकी भी सही है,
      लेकिन ये बात कुछ दूसरों की भी समझ में आ जाए तो क्या कहने

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  51. I believe Bloggers either of Hindi or English are intellectuals who keep an eye on the happenings around themselves. Spirit of competition is always there as it is a part of humane nature, but when recognition is added to competition , it tends to turn in a dirty game. As far as organisers are concerned they have to put their moral at bay to make their programme success or they have to lighten their pockets and the easier one is the ultimate choice. Who cares of people after the show !!!! (Sorry for my comment in English as I am still in a learning stage of Hindi typing.)

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    1. होती रहती है बड़े बडे लोगों में छोटी छोटी बातें..

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  52. जी चाहता है तोड़ दूं शीशा फरेब का......

    -सबःइ का यही जी चाहता है मगर एक समाजिक बंधन और मर्यादा नाम की चीज होती है सो कोई तोड़ता नहीं....


    कितनी महीन और बारीक रेखा है...तर्क और कुतर्क के बीच....लगभग अदृष्य!!

    है न!!

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    1. आप जो भी कहिए..
      बहुत वरिष्ठ ब्लागर है आप, कुछ नहीं कहना मुझे
      आपकी बात को मैं हू ब हू स्वीकर कर लेता हूं

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  53. हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...हिन्दी में ही!! :)

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    1. आपको भी बहुत बहुत मुबारक हो सर

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  54. 121 कमेंट्स मिलना एक ऐसी ख़बर बन गई है जिसका चर्चा ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर आ चुका है।
    देखें-
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/09/121-comments.html

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    1. ओके डाक्टर साहब..
      शुक्रिया

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  55. आधा सच या आधा झूठ और दूसरी बात सिर्फ़ ये कि ब्लॉगिंग का ब्लैक डे रहा या नहीं ये तो खुद वक्त तय कर देगा मगर बेनामी सुनामी टिप्पणियों के बाद इसे ब्लैक पोस्ट के रूप में जरूर याद रखा जाएगा । शेष समय साक्षी रहा है यहां सबके शब्दों और विचारों का । सम्मान...... ब्लैक डे तो यकीनन किसी दिन अपमान से इसे व्हाइट डे में जरूर तब्दील किया जाएगा ।

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    1. हाहाहहाहाहहा

      चलिए अच्छा है, आपने भी अपने कर्ज और फर्ज की अदायगी कर दी। वरना एक 18 दिन बाद पोस्ट पर आने का क्या मतलब था.. भेजा गया है ना आपको... लेकिन स्वागत है...

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  56. कभी ये लखनऊ ब्लॉगर एसोशियेशन के कंधे पर बन्दुक रख कर अपना उल्लू शीधा करते रहे हैं, अब उनकी समस्या है कैसे भी वो ब्लॉग के बेताज बने रहे... जनाब ब्लॉग किसी की बपौती नहीं...
    इतना बड़ा सम्मान हुआ... हा हा हा ! उसे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सामान टाईप का नाम दिया गया अखबार (अभी कहो तो मैं भी कल अपने ऑफिस में चन्द ब्लोगर जोड़ के "अन्तराष्ट्रीय की अम्माँ ब्लोगर सम्मान" नाम दे दूं और खबर में छपवा दूं) में अपने नज़दीकी लोग से ये खबर छपवा दूं... सलीम के बिना लखनऊ में ब्लोगर सम्मान !!! और वोही लोग इसमें हैं जो मेरे अभिन्न साथी थे... शर्म आती है...!

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    1. हाहाहहाहाहाह
      सही कहा आपने, ऐसा भी होता है

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  57. पता नही किस ब्लॉग के कौन से लिंक को क्लिक करक्र यहा तक पहुंच गया , जो भी हो मगर आप सब के कॉमेंट्स को पढ कर लगता है बड़ी जोरदार कॉमेडी का सा सीन क्रियेट हो रहा है .... कुछ पुरानी कहावते याद आ रही है पेश-ए-खिदमत है ...नोश फरमाइये
    1) मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त :)) जिन रूपचन्द्र शास्त्री जी के सम्मान को लेकर मुद्दा उठाया गया है ...काश आयोजन के विरोध मे उनका एक (फकत एक) कॉमेंट भी कही दिख जाता तो कलेजे को ठंडक पड जाती :))
    2) सूट ना कपास जुलाहो मे लट्ठम लट्ठा :)) ...भाई आप लोग तो ऐसे तलवारे भांज रहे हो मानो मामला ऑस्कर अवॉर्ड का हो :))
    3) जंगल मे जब आग लगती है तो सबसे पहले चूहे भागते है (जो जमीन के भीतर बिल मे रहते है :)) .... ब्लॉग जगत की जितनी भी कशमकश वाली खबरे देखने मे आई उसमे "अनिवार्य रूप से" सालीम-जमाल ब्रदर्स के मालिकाना हक वाली लखनौ ब्लॉगर्स असोसियेशन के दीदार जरूर हुए :))
    4-चलते-2 अपनी राय ....पहला आयोजन तमाम खूबीयो-खामियो के बावजूद हमेशा आगे के सफल आयोजनो की बुनियाद होहा है आगे से ऐसा कोई भी आयोजन कीजिये तो सम्मानित होनेवाले ब्लॉगर को चुनने के नियमो मे स्पष्टता लायेंगे तो सभी के लिये बेहतर होगा...आप सब हिन्दी ब्लॉग्गिंग के क्षेत्र मे बिना कोई पैसा लिये अपना समय और एनर्जी देते है जो काबिले तारीफ है इसे आपसी टू-टू मे-मे मे खर्च मत कीजिये.:)
    5-अंत मे मोरल ऑफ दा स्टोरी ....हमारा नाम शरद् है और आप सब के मधुर वचनो को पढ कर हमे अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि आज तक अपना खुद का एक भी ब्लॉग ना लिख कर हमने कोई गलती नही की है :)) फिलहाल नवभारत टाईमेस पर शरद ओन एन बी टी के नाम से आप सरीखे ब्लॉगर्स बुढ़िजीवीयो के दिल बहलाव की अवेटनिक सेवाये दे रहे है ...सभी को शुभकामनाये

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  58. hahaha
    पढ़कर बहुत मजा आया और याद आ गया मुझे भी एक इसी तरह के टॉपिक पर लिखना था समय के आभाव के कारण नहीं लिख पाई एक और सम्मान समारोह जिसमें मुझे शामिल होने का मौका मिला जल्दी ही पहुंचाती हूँ आप सब तक
    आपकी post के बारे में इतने सारे comments पढ़कर यही समझ आया कि आपने एक सही मुद्दा उठाया ,चाहे आधा ही सच सामने लाये ,बाकि मेरा यही कहना है कि हरेक की अपनी राय है जो बखूबी हरेक ने आप तक पहुंचाई ,इसमें शास्त्री जी को या शिखा जी को मुद्दा न बना कर सही बात कह दी जाती तो बहुत बढ़िया होता

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    1. ये पोस्ट पिछले साल एक सितंबर को लगाई गई है और नौ महीने बाद आप तक पहुंच पाई।
      इन नौ महीनों में तो बहुत सारे चेहरों की असलियत मेरे सामने है। रही बात शास्त्री जी और शिखा जी का मामला, ये कोई मुद्दा नहीं था। कुछ चंपू टाइप के ब्लागर्स ने इसे तूल दे दिया।
      मैने तो सिर्फ इतना कहा कि शास्त्री जी एक उम्रदराज, अनुभवी ऐसे ब्लागर हैं जिनका हम सब सम्मान करते हैं। शिखा उनसे बहुत छोटी हैं, अगर वो उन्हें सम्मान देती तो उनका कद और बढ़ जाता। इसमें मैने शिखा को कैसे अपमानित कर दिया। खैर अब ये बात बहुत पुरानी हो गई है।
      लेकिन आप मेरी बातों से सहमत हैं, ये मेरे लिए अच्छी बात है। आपका बहुत बहुत आभार..

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।