Sunday, 2 July 2017

हिंदी ब्लागिंग के कलंक !

ल से ही सोच रहा हूं कि कम से कम अंतर्रराष्ट्रीय हिंदी ब्लागिंग दिवस पर कुछ तो लिखा जाए,  मित्र भी लगातार याद दिला रहे हैं, पूछ रहे हैं  कहां गायब है, इन दिनों दिखाई नहीं दे रहे , न ही ब्लाग पर पहले की तरह सक्रिय है । मैने भी महसूस किया कि तीन चार सालों में ही ब्लागिंग में एक अच्छा खासा परिवार बन गया था, उन दिनों हफ्ते दो हफ्ते में ब्लागर मित्रों से बात न हो तो कुछ खालीपन सा महससू होता था, पर बीच में अपनी व्यस्तता, इसके अलावा  ब्लागिंग के प्रति कुछ  ब्लागरों के नकारात्मक रवैये से मन खिन्न हुआ और यहां से थोड़ी दूरी बन गई । वैसे एक बात बताऊं  ये सच है कि काफी समय से ब्लाग पर सक्रिय नही रहा, लेकिन ऐसा भी नहीं रहा कि मैने आप लोगों को पढ़ा नहीं । आप सब जानते हैं कि इन दिनों ज्यादातर ब्लागर अपने नए लेख का लिंक ट्विटर या फेसबुक पर जरूर  शेयर करते है, इससे आसानी से उनके ब्लाग तक पहुंचा जा सकता है, हां ये  अलग बात है कि मोबाइल पर पढने से कमेंट करनें में जरूर असुविधा होती
है।

अब बात शुरू ही हो गई है तो पुरानी बात याद करना भी जरूरी है । आपको पता है कि हिंदी ब्लागिंग के दुश्मन कोई और नहीं कुछ हिंदी के ही अल्प जानकार ब्लागर रहे हैं । वो खुद ही ब्लागिंग के शिरोमणि बन बैठे और यहां अपनी नकली सरकार चलाने लगे। इतना ही नहीं वो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का सम्मान समारोह भी आयोजित करने लग गए । हैरानी तब हुई जब मैने देखा कि इस सम्मान समारोह के आयोजन के नाम पर धनउगाही शुरू हो गई । बेचारे नए ब्लागर जो इस आभासी दुनिया की  हकीकत को नहीं जानते थे, वो इनके जालसाजी में फंस गए। पहले तो इन तथाकथित ब्लागिंग शिरोमणियों ने उन ब्लागरों को छांटना शुरू किया जिन्हें आसानी से जाल में फंसाया जा सकता है, इन नामों की सूची तैयार करने के बाद साजिश के तहत एक माहौल बनाया जाता था कि सम्मान के लिए विजेताओं के नाम जल्दी घोषित किए जाएंगे। यही बातें ब्लागिंग शिरोमणि के चेले चापड भी अपने ब्लाग पर लिख कर पूरा जाल बिछाया करते थे। बाद में सम्मान के लिए कुछ लोगों के नाम का बहुत ही धूमधाम ऐलान किया जाता था । मजेदार बात तो ये है कि इस सम्मान सूची में कई ऐसे ब्लागर की जिक्र होता था, जिसके ब्लाग पर एक भी लेख नहीं होते थे । मुझे याद है कि एक बार मैने सवाल उठाया कि सम्मान के लिए जिन लोगों के  नाम तय किए गए है, आखिर उसकी क्राइट एरिया क्या है ? इस सवाल पर ब्लागिग जगत  में तूफान मच गया, लेकिन किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। ऐसे में हमें हिंदी ब्लागिंग के कलंक को पहचानना होगा ।

सम्मान की सूची में महिलाओं खासतौर पर ऐसी महिलाओं को शामिल किया जाता था जो घरेलू हुआ करती थीं, और इस आभासी दुनिया के मुहाने पर खड़ी होती थी । इन्हें तरह तरह के लालच दिए जाते थे, बेचारी महिलाएं इन ढोगी ब्लागरों का  दुपट्टा ओढने के चक्कर मे अपना दुपट्टा घर छोड़ आती थी। तीन चार साल तो ये बाजार खूब चला, लेकिन महिलाएँ उतना मूर्ख नहीं जितना इन्हें समझा जा रहा था। कुछ समय बीता तो इस सम्मान समारोह के खिलाफ कई महिला ब्लागर ही मुखर हो गईं। अच्छा एक बात और मजेदार होती थी, ब्लागरों में भी कुछ गुंडे ब्लागर है, जिन्हें खेल बिगाडने में महारत हासिल है। ऐसे ब्लागरों को साधने के लिए ब्लाग शिरोमणि पहले ही जाल बिछा लेते थे। उन्हें कुछ ऐसा साहित्यिक सम्मान देने का ऐलान किया जाता था जो सम्मान पद्मश्री टाइप लगता था। इन्हें बताया जाता था कि उन्हें कोई धनराशि नहीं देनी है,  सिर्फ समारोह में शामिल  होने की सहमति भर दे दें।  उनके लिए आने जाने का किराया ही नहीं होटल खाना पानी सब फ्री रहेगा। इसके अलावा उनका आसन भी मंच पर रहेगा।  ये बेचारे इसी में खुश हो जाते थे। अच्छा ऐसा भी नहीं है कि ये बातें मैं आज याद कर रहा हूं, जी नहीं ! पहले भी लोगों को इस दुकान के बारे में आगाह करता रहा हूं, लेकिन होता ये था कि ब्लागर शिरोमणि के चंपू मुझे गाली गलौज करते थे, कुछ लोग मेरा भी समर्थन करते थे । कुछ लोग फोन करके के सलाह देते थे  कि इन नंगों के मुंह लगने से क्या फायदा ? यहां सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।

बहरहाल आज अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लागिंग दिवस पर आप सभी को शुभकामनाएं देना महज औपचारिकता होगी। मुझे लगता है कि  कुछ नहीं तो आत्ममंथन करना जरूरी है । हम सभी ब्लागरों को सोचना होगा कि हमने इस ब्लागिंग के सफर की शुरुआत कहां से की थी और आज कहां पहुंचे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं जाना कहां हैं, ये तय किए बगैर ही सफर की शुरुआत कर दी और चले जा रहे हैं, मंजिल का कोई अता पता ही नहीं। फिलहाल  मित्रों की सलाह को मानते हुए एक बार फिर ब्लाग पर वापसी कर रहा हूं, कोशिश होगी कि यहां नियमित रहूं। आधा सच के साथ ही मेरे दो अन्य ब्लाग रोजनामचा और TV स्टेशन को भी अपने जेहन में याद रखें। प्लीज ।



महेन्द्र श्रीवास्तव

Wednesday, 14 June 2017

राष्ट्रपति चुनाव के बाद "शिव" राज का फैसला !


क लाइन की खबर  ये है कि राष्ट्रपति के चुनाव के बाद मध्यप्रदेश सरकार में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना काफी बढ़ गई है। इस मसले पर बाकी बातें बाद में लेकिन बता दूं कि मूर्खाना हरकतों से हमेशा सुर्खियों में रहने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर चर्चा में हैं । दूसरे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को मंदसौर जाने पर रोक लगाने वाले सीएम खुद वहां पहुंच गए और फुल ड्रामा किया । पहले तो जाते ही कुर्सी के बजाए वो जमीन पर बैठ गए , बाद में तथाकथित मृतक किसान के चार  साल के बेटे को गोद मे बैठाया उसके पिता से आत्मीयता दिखाते हुए उनके दुख में खुद को शामिल बताया । सच्चाई ये है कि अब सूबे की जनता ही नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व का शिवराज से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है,  उनकी सरकार पर बेईमानी के कई गंभीर आरोप है, इन गंभीर आरोपों में कई के तार उनके परिवार - रिश्तेदारों से भी जुड़े हुए हैं। लिहाजा अब शिवराज की पूरी कोशिश यही  हैं कि वो क्या करें, जिससे अगले साल होने वाला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाए, जबकि पार्टी आलाकमान पूरी तरह बदलाव का मन बना चुका है।

सूबे के हालात को नियंत्रित करने में पूरी तरह फेल रहे शिवराज कर क्या रहे हैं ये वो खुद ही नहीं जानते । सवाल ये है कि पुलिस की गोली में छह किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है, इस पूरे मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं और ये जांच शुरू भी हो गई है। सब ने देखा कि सड़कों पर उपद्रवियों ने सैकडों वाहनों में आग लगाई। पुलिस पर पथराव किया,कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर पुलिस ने सख्त कार्रवाई यानि गोली न चलाई होती तो कई पुलिस वाले भी मारे जाते। खुद मुख्यमंत्री ने कहाकि किसानों के आंदोलन के नाम पर विपक्ष और उपद्रवी तत्वों ने हालात बिगाड़े। अगर ऐसा है तो फिर सरकारी खजाने को क्यों लुटाया जा रहा है। जो लोग मारे गए हैं वो सड़क पर खेती करने नहीं उतरे थे, वो हिंसा भडका रहे थे, ऐसे लोगों की मौत पर सूबे की सरकार आँसू क्यों बहा रही है ये भी जांच का विषय हो सकता है।

अब देखिए जब राज्य में आग लगी है, जब मुख्यमंत्री को लगातार कानून व्यवस्था पर नजर रखनी चाहिए, सख्त फैसले लेने चाहिए , अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ मीटिंग कर शांति बहाली की रणनीति पर काम करना चाहिए, कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लगातार हालात की समीक्षा की जानी चाहिए, उस समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पत्नी के साथ फाइव स्टार  उपवास पर बैठ गए।  24 घंटे के उपवास के लिए सरकारी खजाने से करोडो रुपये पानी की तरह बहा दिए, समझ में अभी तक नहीं आया कि आखिर इससे हल क्या निकला। उपवास से किसे पिघलाना चाहते थे।  सच तो ये है चौहान साहब आपको किसान, किसानी और उनके गुस्से का अँदाजा ही नहीं था। आप पूरी तरह फेल रहे हैं , इसलिए नैतिक रूप से आपको सरकार में रहने का हक नहीं है। वैसे राष्ट्रपति चुनाव के बाद आप की कुर्सी पर खतरा है।





Tuesday, 6 June 2017

स्वच्छता सर्वे या बिहार की मेरिट लिस्ट !

स्वच्छता रिपोर्ट के कवर पेज से इंदौर गायब ! 
च्चाई ये है कि अगर भारत सरकार की स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट की बारीकी से निष्पक्ष जांच कराई जाए तो  ये बिहार की मेरिट लिस्ट से कम नहीं निकलने वाली है। मुझे ये कहने में भी कत्तई हिचक  नहीं है कि जिस तरह बिहार में जांच के बा
द मेरिट में आए छात्र और उस स्कूल के प्राचार्य को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है , ठीक उसी तरह अगर इस स्वच्छता रिपोर्ट की निष्पक्ष जांच हो जाए तो ना सिर्फ इंदौर की हकीकत सामने आएगी, बल्कि यहां भी कई अफसरों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। दो साल इंदौर में रहा हूं, इसलिए ना सिर्फ यहां की सफाई से वाकिफ हूं बल्कि अफसरों की फितरत को भी भली भांति समझता हूं।

जान लीजिए लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन यहां से  सांसद है, इसलिए इंदौर के सामले  में सभी राजनीतिक दल खामोश रहते हैं। ताई का ना सिर्फ इंदौर बल्कि देश भर में एक अलग  सम्मान है। केंद्र सरकार की जो भी योजना होती है, सभी में इंदौर का नाम शामिल हो जाता है ,जबकि यहां तैनात ज्यादातर अफसर नाकाबिल है, लेकिन अपनी मार्केटिंग और जी हजूरी अच्छी कर लेते हैं। यहा हर उस अफसर को मुख्यमंत्री की ताकत मिलती है जो यहां के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय का विरोधी है । खैर अभी बात सिर्फ सफाई की ।
इंदौर शहर को खान नदी दो हिस्सों मे बांटती है। गंदगी से अटी पड़ी ये नदी अब नाला बन चुकी है । इसके दोनों ओर भारी गंदगी है और इसके आप पास रहना मुश्किल है। जो इलाका साफ सुथरा दिखाई भी दे रहा था, मसलन विजयनगर, स्कील 54 वगैरह । यहां निगम अफसरों ने सड़क पर फूहड तरीके से टाँयलेट बनवा दिए है और उस पर गांव गिरांव की तरह लिखा है मूत्रालय । जैसा टाँयलेट इंदौर निगम ने बनवाया है वो टाँयलेट यूपी के गांव में बने टायलेट से भी घटिया है। चूंकि ताई की वजह से इंदौर को ना सिर्फ स्मार्ट सिटी स्कीम में शामिल किया गया बल्कि पहले 20 स्मार्ट सिटी में शामिल किए जाने से केंद्र सरकार से करोडों रुपये साफ सफाई के लिए मिल गए । अब अनाप शनाप पैसे मिल रहे हैं और अधिकारी मौज ले रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी  का गोंडा शहर सबसे गंदा है, मैं हैरान हूं कि भारत सरकार को ये रिपोर्ट जारी करने में शर्म भी महसूस नहीं हुई । अरे पता तो करते गोंडा को साफ सफाई के लिए कितना पैसा दिया गया है । इंदौर में तो माहौल बनाने के लिए एक दिन में अफसरों ने 10 लाख रुपये के गुब्बारे हवा में उ़डा दिए, गोडा मे सफाई के लिए साल में 10 लाख नहीं मिले  होंगे । इस रिपोर्ट में  स्वच्छता का जो क्राइट  है, वो भी दोषपूर्ण है।

कुल 2000 अंको में शहरों को नंबर दिए गए हैं । इसमें 900 अंक स्थानीय निकायों के डाक्यूमेंटेशन का है, जबकि सिटीजन फीडबैक पर 600 और निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए महज 500 अंक है। अब अगर डाक्यूमेंटेशन में इँदौर को   875 अंक मिलते हैं और गोंडा को सिर्फ 52 तो इसमें शहर या शहरियों की क्या गलती है ? जिन अफसरों ने डाक्यूमेंटेशन ठीक नहीं किया, उन्हें अब तक  निलंबित हो जाना चाहिए था। इसी तरह  सिटीजन फीडबैक को ले लें , इसके 600 अंकों में से इंदौर को मिले हैं 467 और गोंडा के खाते में आए 192 अंक । यहां ये जानना जरूरी है कि इंदौर की आबादी गोंडा के मुकाबले चार गुना है, इंदौर संपन्न शहर है, ज्यादातर लोग मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, जबकि गोंडा एक पिछडा शहर है। बता चुका हू कि इँदौर मे माहौल बनाने के लिए सिर्फ एक दिन में 10 लाख गुब्बारे हवा मे उडाए गए। अच्छा इसके बाद भी अंबिकापुर ने 501 अंक हासिल कर इंदौर को दूसरे नंबर पर धकेल दिया है। सबसे महत्वपूर्ण निष्पक्ष आब्जर्वेशन का है, जो  सिर्फ 500  अंकों का है। इसमें इंदौर को 435 अंक मिले हैं, जबकि कई दूसरे शहरों को इंदौर से अधिक अंक मिले हैं।

साफ है कि भारत सरकार ने पूरी तरह गलत तथ्यों पर आधारित रिजल्ट घोषित किया था, यही वजह है कि कल यानि 5 जून को जनता का  धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए प्रणाम इंदौर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में लाखों रूपये पानी की तरह बहाए गए। भगवान को ये मंजूर नहीं था और उन्होंने अपना रौद्र रूप दिखाया, आंधी तूफान में सारे पांडाल उडा दिए , वीआईपी भी मुश्किल से यहां से निकल पाए । मैं चुनौती देता हूं कि अगर कोई निष्पक्ष टीम  इंदौर का निरीक्षण करेगी तो ना सिर्फ यहां की हकीकत सामने आएगी, बल्कि बेईमान अफसरों को भी  जेल  जाना होगा ।

भगवान को मंजूर नहीं झूठ  !














इंदौर की असल तस्वीर !

इंदौर की असल तस्वीर !

इंदौर की असल तस्वीर !



Monday, 8 February 2016

निदा फाजली : हम तुम्हें मरने ना देंगे !



च कहूं तो निदा फाजली की शायरी बड़ी सरलता के साथ अपनी बात कह जाती है। वह जमाने के शायर या यूं कहूं कि वो आम आदमी की रहनुमाई करने वाले इकलौते शायर थे। कबीर ने जिस रहस्यवाद और फक्कड़पन का तानाबाना बुना, निदा उसी परंपरा में खड़े नजर आते हैं। हा ये जरूर है कि दुनियावी रिश्तों में भी वे समरस हो जाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, लेकिन उनके अंतर्मन में कोई ऐसी लहर उठती रही है कि वह फिर अपनी राह पर आगे बढ जाते हैं। फिर लगने लगता है कि भले वह कहें कि

"अपनी मर्जी से कहां, अपने सफर के हम हैं,
हवाओं का रुख जिधर है उधर के हम हैं "

वैसे करीब से महसूस करने पर वे मतवाले ही लगते हैं। जिंदगी को अपनी तरह से जीने वाले। जिंदगी को जिस तरह जी लिया, उसी से वह अनगिनत मोती समेट लाए हैं। निदा यानी आवाज। उनका पुकारना कई तरह से सुना जाता है। कभी स्कूल जाते हुए बच्चों को देखकर, कभी मां की अनुभूतियों को याद कर,कभी अपनों की तलाश करते हुए उनकी भावुकता पन्नों पर उतर आती है। वह कबीर की परंपरा से भी इसलिए जुड़ जाते हैं कि वह कह सकते हैं,
"सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर।"

न जाने उनसे कितनी बार सुना गया...

"जादू टोना रोज का, बच्चों का व्यवहार,
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार। "
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान,
अल्ला तेरे एक को इतना ब़ड़ा मकान।"

निदा आवाज देते हैं तो उसे गौर से सुना जाता है। उन्हें जब भी पाया, गहरी आत्मीयता से भरा हुआ पाया। जो उनसे छूटा, उसे उन्होंने अपनी जतन से जोड़ी हुई दुनिया से पाने की कोशिश की। जब भी मन भीगा, कोई पंक्ति निकल आई। वह न तो पूरी तरह सूफी हैं, न पूरी तरह सांसारिक। मगर गूढ़ा खूब है। जीवन की संवेदनाओं को उन्होंने ऐसे शब्द दिए हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ा और सुना जाता है। जीवन को देखने का उनका तजुर्बा वाकई अलग है, तभी वह कह पाए हैं,

"सीधा साधा डाकिया जादू करे महान,
एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान।"

साहित्य की धूनी रमाने वाले तमाम साथी उनकी खूब चर्चा किया करते है, हालाकि निदा साहब काफी दिलचस्प व्यक्ति थे, जिनसे मिलना शुकून देने वाला होता है । उनके करीबी बताते हैं कि उनकी महफिलों का मतलब है किस्से, चर्चे, साहित्य की बातें, कुछ गॉसिप, चुहुलबाजी, सामयिक विषयों पर चर्चाएं, राजनीति की भी बातें और घर में ही मशीन पर बनते सोडा के साथ कांच के सुंदर गिलासों में भरती शराब, उनकी खुद की तैयार की हुई कोई नानवेज डिश और रोटी बनाने की मशक्कत से बचने के लिए पास की ब्रेकरी से मंगाए हुए पाव। उनके घर में निंदा रस की भी गुंजाइश रहती थी। इसकी चपेट में कवि, समीक्षक, साहित्यकार फिल्म जगत और अखबारी लोग ही आते थे। या फिर कथित सांप्रदायिक आचरण वाले लोगों पर उनका गुस्सा बरसता था। गीत संगीत साथ-साथ चलता और जब उनकी इच्छा हो तो राजनीति पर भी बातें हो जाती थीं।

निदाजी का जीवन, दुनिया को देखने, समझने की तहजीब देता है। लोगों तक पहुंचने के लिए वे आवरण नहीं बनाते, लेकिन थोड़ी-सी परख हो तो निदा समझ में आने लगते हैं। सुना है शायरी-गजल लिखने के लिए शायद ही कभी वह अपना खास मिजा़ज बनाते हों। कब लिखते हैं, पता नहीं चलता । जब भी कुछ नया लेकर आते, उस दिन कुछ देर की संगत के बाद उसे धीरे-धीरे तर्ज में यार दोस्तों को सुनाने लगते। लोग वाह ! वाह ! ही करते। दूसरों को भी खूब सुनते हैं। युवाओं की कविता-कहानी, गीत,गजल को वह बहुत दिलचस्पी से सुनते थे। निदा जी के चले जाने की खबर वाकई पीडादायक है, लेकिन एक कलमकार यही कह सकता है कि निदाजी .. हम तुम्हें मरने ना देंगे, जब तलक जिंदा कलम है।