Saturday, 8 September 2012

अन्ना मैं हूं और मैं ही रहूंगा ...


जी हां, आज अन्ना ने बता दिया कि मैं अन्ना हूं और मैं ही अन्ना रहूंगा। अरविंद केजरीवाल आप कभी मेरी जगह लेनी की मत सोचिए। अगर मैं समर्थन देकर आंदोलन खड़ा  कर सकता हूं तो एक अपील कर सब कुछ खत्म भी कर सकता हूं। कुछ दिनों से अन्ना अपने गांव रालेगन से कुछ ऐसा कर रहे हैं कि दिल्ली वालों के पसीने छूट जाते हैं और अगले ही दिन इन्हें मत्था टेकने अन्ना के यहां जाना पड़ता है। पहले दिल्ली वालों को विश्वास में लिए बगैर उन्होंने  टीम अन्ना को भंग कर दिया और कहाकि अब इसकी जरूरत नहीं रही, क्योंकि जनलोकपाल आंदोलन के लिए टीम अन्ना बनी थी, अब इसकी कोई जरूरत नहीं है। टीम भंग हुई तो सभी ने खुद को अन्ना का सहयोगी कहना शुरू कर दिया। अन्ना खामोश रहे, लेकिन पिछले दिनों आंदोलन के दौरान जब कुछ लोगों ने मैं अरविंद केजरीवाल हूं कि टोपी लगाई और अरविंद ने इसे रोका नहीं तो अन्ना का नाराज होना स्वाभाविक था। बस फिर क्या, उन्होंने ऐलान कर दिया कि राजनीतिक पार्टी बनाने का कोई मतलब नहीं है, वो ना दल मे शामिल होंगे और ना ही किसी का प्रचार करने जाएंगे। इससे दिल्ली फिर हिल गई और घुटने के बल केजरीवाल फिर पहुंच गए अन्ना के गांव रालेगन। खैर अन्ना ने थोड़ी नरमी दिखाई और कहा कि राजनीति में आने के लिए जनता से पूछो, मुझसे नहीं। अब टीम जनता के दरबार मे जाएगी..... हा हा हा हा. अन्ना से पंगा, सोचना भी नहीं। अन्ना तो अन्ना ही रहेंगे।   

सामाजिक न्याय का सिद्धांत यही है कि जब आप दूसरी संस्था पर उंगली उठाते हैं तो अपने बीच भी क्या चल रहा है, उस पर भी अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए। पत्रकारिता की बुराइयों पर तो मैं समय-समय पर बिना लाग लपेट के बात करता ही रहता हूं। हफ्ते भर पहले ब्लागरों के गोरखधंधे में भी झांकने की कोशिश की। जो कुछ देखा, वो तो आपको बता चुका हूं, खैर उसकी बदबू उसी शहर तक रहे तो ज्यादा बेहतर है। ये बुराई दूसरे शहर और समाज तक ना फैले, ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा।

वैसे तो आपको पता है इस समय देश में क्या चल रहा है। कोयला ब्लाक के आवंटन में धांधली को लेकर संसद का मानसून सत्र एक दिन भी नहीं चल सका। कालेधन के खिलाफ आग उगल रहे बाबा (बेचारे) रामदेव बुरी तरह फंस गए हैं, जांच पड़ताल में उनके यहां तमाम खामियां मिली हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर और फैसले लेने में अक्षम बताया है अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने। खेल की दुनिया से बड़ी खबर ये है कि कैंसर के आपरेशन के बाद क्रिकेटर युवराज ने फिर टीम में वापसी की है। बहरहाल इन सब विषय पर भी जरूर लिखूंगा, पर आज बात टीम अन्ना में टकराव की।

एक समय में ईमानदारी की ऐसी-ऐसी बातें टीम अन्ना कर रही थी जैसे देश में इन पांच लोगों के अलावा कोई दूसरा आदमी ईमानदार है ही नहीं। इतना ही नहीं मैं बहुत से चोरों को जानता हूं जो सरकारी महकमें की ठेकेदारी में दलाली करते हैं या फिर आरटीओ विभाग में दलाली करते फिरते हैं, लेकिन जंतर मंतर पर सबसे ज्यादा सफेद टोपी उन्हीं की चमकती दिखाई देती थी। फेसबुक की प्रोफाइल पर कुछ अफसरों की बीबीयों ने "मैं अन्ना हूं" की टोपी वाली तस्वीर लगा ली। जबकि उनके अफसर पति पूरे दिन तिकड़म और घूसखोरी के नए नए फार्मूले इजाद करने में लगे रहते हैं। यानि एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि जो टीम अन्ना के साथ है वही ईमानदार बाकी सब चोर।

मीडिया भी बौरा सी गई। दरअसल इलैक्ट्रानिक मीडिया देश में जब से सक्रिय हुई है, उसके बाद ये पहला जन आंदोलन था। आंदोलन में मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए, ये बात  मीडिया समझ नहीं पाई। उसने इस आंदोलन को भी अपनी टीआरपी का मैदान भर माना। यही वजह है कि न्यूज चैनलों पर कुछ भी चलता रहा, मंच की ओर कैमरा लगाकर लोगों ने चैनल को समर्पित कर दिया आँदोलन के नाम। ये भी मानीटर करने की जहमत नहीं उठाई गई कि आखिर यहां चल क्या रहा है, इसे दिखाया जाना चाहिए या नहीं। यही वजह है कि ओमपुरी, किरन बेदी क्या अरविंद केजरीवाल तक कुछ भी बोलते रहे। हालत ये हुई ओमपुरी को माफी मांगनी पड़ी और दूसरे लोगों का मामला संसद की विशेषाधिकार समिति के पास विचाराधीन है।

खैर ये तो हुई पुरानी बात। चलिए आज की बात की जाए। जंतर मंतर पर टीम अन्ना ने अपना अनशन खत्म करते हुए ऐलान किया कि अब देश में राजनीतिक विकल्प खड़ा किया जाएगा। अब खाना छोड़कर नहीं बल्कि खा पीकर आंदोलन किया जाएगा। इन्होंने सरकार को असंवेदनशील बताया और कहा कि इनके सामने उपवास करना बेकार है क्योंकि ये उपवास की भाषा नहीं समझते हैं। अन्ना ने कहाकि अब हम राजनीतिक दल बनाएंगे, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि वो इस राजनीतिक दल में शामिल नहीं  होंगे, हां जरूरत महसूस हुई तो देश भर में पार्टी उम्मीदवार के लिए प्रचार करेंगे।  बस अब क्या, टीम बेलगाम हो गई, उसे लगने लगा कि कल को हम ही एक मजबूत विकल्प होंगे।

अगर आप हमारे पुराने लेखों को पढ़े तो मै पहले से कहता रहा हूं कि जो लोग भी टीम में हैं, सबकी महत्वाकांक्षा बहुत अधिक है। इन सबको लग रहा है कि कल देश की कमान उनके ही हाथ में आने वाली है। आपको बताऊं अभी पार्टी बनी नहीं, लेकिन ये तो मंत्रालय तक तय करने लगे हैं कि 2014 में किसे कौन सा मंत्रालय दिया जाएगा। अच्छा मैं महत्वाकांक्षा को बिल्कुल अन्यथा नहीं लेता हूं, मेरा मानना है कि आदमी को महत्वाकाक्षी होना चाहिए। लेकिन महत्वाकांक्षा जब लालच में बदल जाए तो समझ लिया जाना चाहिए आपकी उलटी गिनती शुरू हो गई। टीम अन्ना के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा। वैसे मैं बार बार कहता रहा हूं  कि देश में भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त हैं, इसलिए लोग जंतर मंतर पर जमा होते रहे, उन्हें लग रहा था कि हो सकता है कि इस आंदोलन से कुछ बदलाव हो। पर हम ही नहीं लोग भी खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं।

देखिए टीम की असलियत सबके सामने आ चुकी थी। हवाई जहाज के किराए की सामाजिक संस्था से वसूली में किरन बेदी पकडी गईं। अब आप सोच सकते हैं आखिर किराए में कितने पैसे की गड़बडी की जा सकती है। लेकिन इससे ये साफ हो गया कि मौका हाथ लगने पर बेदी चूकतीं नहीं है। केजरीवाल सरकार का पैसा दवाए पड़े थे, जब शोर मचा तो अपनी झेंप मिटाने के लिए प्रधानमंत्री के यहां नौ लाख रुपये का चेक भेज दिया। अब केजरीवाल कौन समझाए कि प्रधानमंत्री के यहां कोई बकाया जमा करने का काउंटर है क्या ? लेकिन इससे पता चल गया कि इस आंदमी का अहमं किस जगह पहुंच चुका है। भूषण बंधुओं का मामला किसी से छिपा नहीं रहा। उन्होंने भी राजस्व की चोरी की और मामला तूल पकड़ा तो पैसे जमा करना पड़ा। हां मैं अन्ना को बेईमान तो नहीं कह सकता, लेकिन वो रालेगन से लेकर दिल्ली तक जिनके साथ रहते हैं, उनकी ईमानदारी शक के दायरे में हैं।

बहरहाल अब टीम में बिखराव की खबरें आ रही हैं। किरन बेदी ने लगभग अपना रास्ता अलग कर लिया है। इस टीम से इसके पहले भी तमाम लोग बाहर हो चुके हैं। अब अन्ना  भी कह रहे हैं कि वो इस बात से सहमत नहीं है कि राजनीतिक दल बनाया जाए। सवाल ये है कि जब राजनीतिक दल बनाने के मामले में बात हो रही थी तो क्या अन्ना को भरोसे में नहीं लिया गया था ? अगर लिया गया था, तो फिर अन्ना कैसे कह रहे हैं कि राजनीतिक पार्टी बनाना गलत है। वो चुनाव प्रचार में भी नहीं जाएंगे। हंसी  इस बात  पर आती है कि अरविंद केजरीवाल बहुत दावा करते रहे थे कि हमारी पार्टी में हाईकमान नहीं होगा, सभी फैसले पार्टी फोरम पर तय होंगे, सब समान रहेगे, कोई बड़ा छोटा नहीं होगा। फिर ऐसी क्या बात है कि एक-एक कर सब आपसे दूर होते जा रहे हैं और जो भी बाहर जाता है उसकी वजह अरविंद केजरीवाल ही क्यों होते हैं?

टीम में विवाद के मूल में जाएं तो वही सबकुछ यहां भी है जो दूसरी जगह  देखने को मिलता है। आप जानते हैं कि जहां भी "पद और पैसा" इन्वाल्व होगा, वहां विवाद तय है। जनलोकपाल बिल के लिए चल रहे आंदोलन को जनता ने समर्थन दिया और इस आंदोलन को चलाने के लिए करोड़ों रुपये चंदे में दिए। सही मायने में देखा जाए तो जनता ने जो पैसा  दिया था वो इसलिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन मजबूत हो। ये पैसा इसलिए नहीं दिया गया था कि उससे राजनीति की जाए। बहुत ईमानदारी की बात करते हैं तो आंदोलन के नाम पर वसूले गए पैसे को वापस कर दिया जाना चाहिए। खैर इतनी नैतिकता कि उम्मीद मुझे तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल अभी तो कुछ दिन टीम में मान मनौव्वल चलेगा,  जो खबरें आ रहीं है, उससे तो यही लगता है कि टीम में अरविंद केजरवाल की तानाशाही है, जिसकी वजह से टीम बिखर रही है। लगता ये है कि अब अरविंद की कोशिश है कि अन्ना को रालेगन तक सीमित कर दिया जाए, वो वही अपना स्वास्थ्य लाभ करते रहें। अरविंद केजरीवाल उनका स्थान ले लें। इसका देश में कैसा रियेक्शन होगा ये देखने के लिए पिछले आंदोलन में कुछ कार्यकर्ताओं को मैं अरविंद केजरीवाल हूं की टोपी पहनाई गई। टोपी सामने आते ही मीडिया में इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, लिहाजा अब इस टोपी को हटा तो लिया गया है, लेकिन केजरीवाल ने इस मामलें में सफाई नहीं दी।  मैं एक बात तो दावे के साथ कह सकता हूं कि केजरीवाल ने इस आंदोलन और टीम को बहुत नुकसान पहुंचाया है। जब तक  टीम में सभी को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता है और अन्ना अपनी मीटिंग केजरीवाल के घर के बजाए कहीं और शिफ्ट नहीं करते हैं, तब तक ना टीम मजबूत होगी और ना ही आंदोलन।

खैर अन्ना को भी ये आभास है कि उनकी टीम के लोग ही उन्हें हाशिए पर रखना चाहते हैं।  दरअसल सच्चाई ये है कि अन्ना की जरूरत उनकी टीम को बहुत ज्यादा नहीं है। टीम चाहती है कि अन्ना भले ही रालेगन मे ही रहें, देश में सभाएं भी ना करें, लेकिन टीम के खिलाफ कुछ ना बोलें, टीम उनके चित्र वाले पोस्टर को इस्तेमाल करके ही अपना काम चला लेगी। लेकिन ये अन्ना है, आंदोलन से ही आज यहां तक पहुंचे हैं, कोई उन्हें हाशिए पर कर दे, ऐसा संभव नहीं है। सच तो ये है कि आंदोलन ही उनकी वजह से खड़ा हो पाया है। उन्होंने देखा कि लोग ज्यादा उड़ने लगे हैं तो रालेगन मे  एक बयान जारी किया कि टीम अन्ना को भंग कर दिया गया है, अब टीम अन्ना नाम की कोई टीम नहीं रही। दिल्ली के उनके  सहयोगी हिल गए, आखिर क्या हो गया। अब अन्ना के सहयोगी के रूप में टीम काम कर रही है। अभी अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने को गैरजरूरी बता दिया तो टीम के सदस्यों के पसीने छूट गए, क्योंकि यहां तो लोग चुनाव जीता हुआ माने बैठे हैं और मशक्कत तो दो साल बाद सरकार बनाने की हो रही है, मंत्री पद बांटे जा रहे हैं।

इस बीच अन्ना ने टीम को बैकफुट पर ला दिया और कहा है कि जाइये पहले जनता के बीच और पूछिए कि राजनीतिक दल बनाना चाहिए या नहीं। मुझे कई बार हंसी आती  है अन्ना और उनके सहयोगियों का देश कितना छोटा है। सप्ताह भर में उनके पास रिपोर्ट  आ जाएगी कि राजनीतिक दल बनाया जाए या नहीं। इसके अलावा क्या-क्या फैसला हुआ है ये भी सुन लीजिए..

1. अभी राजनीतिक दल बने या ना बने, इसका फैसला नहीं हुआ है। इसके लिए जनता के बीच में जाएंगे।
2. पर उम्मीदवार कैसा होगा, ये तय हो गया।
3. चुनाव जीता नहीं है, पर जीतने के बाद वो क्या करेगा, ये भी तय हो गया। मसलन सरकारी आवास में नहीं रहेगा, छोटे से घर में रहेगा,  वेतन 25 हजार से ज्यादा नहीं लेगा, सांसद निधि का इस्तेमाल नहीं करेगा, सुरक्षा नहीं लेगा।
4. उम्मीदवार इसी तरह के तमाम  बिंदुओं वाले हलफनामें पर साइन करना होगा।

चलिए लेख ज्यादा लंबा हो रहा है, बस थोडा नियम बता दूं। ये राजनीतिक दल बना भी लें तो उसे राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर की मान्यता तुरंत नहीं मिलेगी। उम्मीदवार को मिलने वाले वोट के आधार पर बाद में तय होता है कि आपके दल को मान्यता मिले या नहीं। इससे जो भी उम्मीदवार हैं उनके सबके चुनाव निशान अलग अलग  होंगे और उन्हें एक तरह से निर्दलीय उम्मीदवार ही माना जाएगा। ऐसे में अगर वो आपके हलफनामें पर हस्ताक्षर करे और बाद में मुकर जाएं तो आप कुछ नहीं कर सकते। बहरहाल मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने से भला किसी को कैसे रोक सकते हैं।



26 comments:

  1. चुनाव लड़ने चल दिए,बन के मुगेंरी लाल
    दरकिनार कर अन्ना को,नेता कजरी वाल,,,,,,

    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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    1. हाहहाहाहाह
      बिल्कुल सही
      बढिया

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  2. अन्ना का जन आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसने एक आम आदमी में असह जगाई थी कि दिनचर्या का हिस्सा बने भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कोई तो आगे आया है .मिडिया ने भी इस अवसर को खूब भुनाया.
    दूसरे आंदोलन के समय सरकार अनदेखा करते हुए भी सचेत रही मीडिया पर लगाम कसी और नतीजा सब के सामने !

    इस में सब से बुरी तरह प्रभावित जो हुआ वह था एक आम आदमी.
    अन्ना के जन लोकपाल के लिए बनी कमेटी को भंग कर दिए जाने के बाद जब आम आदमी ने खुद को ठगा सा महसूस किया तो अब लगता है उसका विश्वास फिर से किसी अन्ना या अन्ना जैसे आन्दोलनकर्ता पर कभी नहीं लौटेगा .
    मुझे भी समझ नहीं आता कि इतने विवादों और साथियों के असहयोग के बीच अरविन्द केजरीवाल अपनी एक मजबूत पार्टी कैसे बना सकेंगे.

    जनता के बीच जाने से पहले उनका विश्वास फिर से जीतना होगा .राजनीति से दूर रहने वाले अन्ना का विवादों के चलते कमेटी भंग कर देना भी जनता के विश्वास टूटने का बड़ा कारण है.
    समय बताएगा कि आगे इन सब की क्या स्ट्रेटेजी रहेगी.
    यह तय है कि इस बार सभी उम्मीदवारों के लिए चुनाव जीतना आसान कतई नहीं होगा.एक पार्टी को बहुमत तो मिलने से रहा.इस का कारण भी हाल की घटनाएँ होंगी.अन्ना का आंदोलन और घोटाले प्रमुख रोल निभाएँगे.

    देखेंगे २०१४ में कि देश की तकदीर में क्या है.

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    1. आत्मचिंतन करना होगा अन्ना के सहयोगियों को

      लालच भी छोडना होगा

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. बहुत बहुत आभार शास्त्री जी

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  4. काफी विस्तृत सटीक और अच्छा लेख !

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  5. चतुर शिकारी सा करे, गर सेवक व्यवहार |
    हार हमेशा होयगी, हार स्वप्न बेकार |
    हार स्वप्न बेकार, बुराई चले मिटाने |
    अपने में सौ छेद, बिके जब दो दो आने |
    पहले आत्म सुधार, करो फिर मारामारी |
    जग जाहिर है लक्ष्य, बड़े ही चतुर शिकारी ||

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    1. चार लाइनों में आपने पूरे लेख का सार रख दिया
      आभार

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  6. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  7. गहन विश्लेषण ...... जन भावना को छोड़ हर कोई अपनी महत्वाकान्क्षाओं की ही सोचने लगता है......

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  8. यथा स्थिति के पोषक ही इस प्रकार के लेख लिख सकतें हैं .लेफ्टिए तो अब काल शेष हो चुकें हैं लेकिन आदत न गई रिमोटिया सरकार के पिछलग्गू पन की .

    रैडवाइन कर सकती है ब्लड प्रेशर कम न हो एल्कोहल तब

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  9. कहते सुना था कि कुर्सी का लालच इंसान से क्या क्या नहीं करवाता इसका एक उदाहरण भी इस अन्ना मंच पर खूब देखने को मिला जब पहले अन्ना जंग छिड़ी थी तब हम साथ देने पहुंचे थे लगा था कि चलो हमारे देश में कुछ लोग तो हैं जिनके साथ चलकर देश का उद्धार हो जायेगा पर किसके अंदर क्या चल रहा था इसका भान तो बाद में हुआ |चलो राजनीति का खेल है आगे आगे देखो होता है क्या | बहुत अच्छी पोस्ट बहुत सी जानकारियों का खुलासा करती बहुत सुन्दर |

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    1. अब आंदोलन पटरी से उतर चुका है, सबकी महत्वकांक्षा आंदोलन पर भारी पड़ रही है। जनता के साथ इन्होंने धोखा किया है...

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  10. अभी अन्ना ने राजनीतिक दल बनाने को गैरजरूरी बता दिया तो टीम के सदस्यों के पसीने छूट गए, क्योंकि यहां तो लोग चुनाव जीता हुआ माने बैठे हैं और मशक्कत तो दो साल बाद सरकार बनाने की हो रही है, मंत्री पद बांटे जा रहे हैं।

    राजनीती में तो हमारी दिलचस्पी नहीं ...पर इन मुंगेरी सपनों की जानकारी का ज्ञान आपकी पोस्ट से मिला ....

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    1. जी देखते रहिए टीम की असलियत धीरे धीरे सामने आ रही है।

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  11. आपका विश्लेषण तो ‘पूरा सच‘ है।

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  12. सपना देखने की मनाही तो नहीं है न.. बढ़िया कहा है..

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    1. जी क्यों नहीं
      वो भी मुंगेरी लाल के हसीन सपने

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  13. इस वक्त देश की राजनीति की जो हालत हैं वो किसी से भी नहीं छिपी हुई ...
    कोई भी पार्टी बेदाग़ नहीं हैं ...अन्ना से लेकर केजरीवाल तक ...
    मनमोहन जी से लेकर सोनिया गांधी तक ....सब के सब इस देश की जनता को मूर्ख बनाने और लूटने में जुटे हुए हैं ....हर तरफ तानाशाही जैसा मौहल हैं ||

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    1. बिल्कुल सहमत हू आपकी बात से,
      जरूरत है हमें ऐसे लोगों को पहचानने की

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।