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Friday, 27 December 2013

ईमानदार ही नहीं गंभीर भी हो सरकार !

बहुत बुलंद फजाँ में तेरी पतंग सही,
मगर ये सोच जरा डोर किसके हाथ में है ।

मुझे लगता है कि इन दो लाइनों से अरविंद केजरीवाल को समझ लेना चाहिए कि उनके बारे में आम जनता की राय क्या है ? हम सब जानते हैं कि केजरीवाल ने अन्ना के मंच से जोर शोर से दावा किया था कि कभी राजनीति में नहीं जाऊंगा, पर राजनीति में आ गए। राजनीति में आने के लिए इस कदर उतावले रहे कि उन्होंने अन्ना को भी किनारे कर दिया। यहां तक आंदोलन में उनकी सहयोगी देश की पहली महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी से भी नाता तोड़ लिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई, बाद में
बच्चे की कसम खाई कि ना बीजेपी और कांग्रेस से समर्थन लूंगा और ना ही दूंगा, ये भी बात झूठी निकली, कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने जा रहे हैं। कह रहे थे कि सरकार में आते ही दिल्ली में रामराज ला दूंगा, अब कह रहे हैं कि हमारे हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है। बहरहाल जैसा दूसरे दलों में मंत्री पद के लालची होते हैं, वो चेहरा केजरीवाल की पार्टी में भी दिखाई दिया। उनकी पार्टी का एक विधायक मंत्री ना बनाए जाने से नाराज हो गया, महज नाराज होता तो भी गनीमत थी, वो तो कहने लगा कि प्रेस कान्फ्रेंस करके केजरीवाल की पोल खोल दूंगा। खैर रात भर मेहनत करके उस विधायक को मना तो लिया गया, लेकिन ये सवाल जनता में जरूर रह गया कि आखिर ये विधायक अरविंद केजरीवाल की कौन सी पोल खोलने की धमकी दे रहा था।


केजरीवाल कहते रहे कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी बीजेपी को निभानी चाहिए थी, क्योंकि उनके पास 32 विधायक हैं। अरे भाई केजरीवाल साहब वो सरकार बना लेते, पहले आप कहते तो कि " मैं बीजेपी को समर्थन देने को तैयार हूं"। जब बीजेपी को कोई समर्थन नहीं दे रहा है, तो उनकी सरकार भला कैसे बन सकती थी ? आप रोजना उनकी आलोचना कर रहे हैं, मैं पूछता हूं कि आप तो इन राजनीतिज्ञों से हट कर हैं, आपको तो कुर्सी की कोई लालच भी नहीं है, आप हमेशा कहते रहे हैं कि अगर सरकार जन लोकपाल लाने का वादा करे, तो वो चुनाव के मैदान से भी हट जाएंगे। मेरा सवाल है कि आपने खुद शर्तों के साथ समर्थन देने की पहल क्यों नहीं की ? भाई केजरीवाल साहब समर्थन देने के मामले में तो आप ये कहते हैं कि उनका जनता से वादा है कि किसी को समर्थन नहीं दूंगा। मित्र केजरीवाल जनता से तो आपका ये भी वादा था कि किसी से समर्थन लूंगा भी नहीं, फिर ये वादा तो आपने तोड़ दिया। उस कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना रहे हैं, जिससे चुनाव में आपकी सीधी लड़ाई थी, जिसके खिलाफ जनता ने आपको वोट दिया।


कांग्रेस  से जनता कितनी त्रस्त थी, ये बताने की जरूरत नहीं है। क्योंकि आपको  भी ये उम्मीद नहीं थी कि उनकी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी चुनाव में हार जाएंगी। ईमानदारी की बात तो ये है कि आप को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि आप चुनाव जीत सकते हैं। लेकिन जनता का गुस्सा ऐसा था कि कांग्रेस  के तमाम दिग्गजों को चुनाव हरा दिया। अब जिनको आप गाली देते रहे, उन्हीं की मदद से कुर्सी पर बैठ रहे हैं। वैसे तो आप पहले कुर्सी संभालिए, फिर जनता देखेगी कि कांग्रेस के बारे में आप की अब क्या राय है ? कांग्रेस के जिन मंत्रियों को आप गाली देते रहे, जिन पर गंभीर आरोप थे, जब आप विधानसभा में बहुमत साबित करेंगे तो वो आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। चलिए एक आखिर बात कहकर इस विषय को यहीं खत्म करते हैं। चुनाव के दौरान 20 करोड़ रुपये चंदा आ गया तो आप ने कहाकि अब आपको पैसे की जरूरत नहीं है, लोग चंदा ना दें। यहां आप नैतिकता की बात कर रहे थे। अब विधानसभा में संख्या कम हो गई तो वही चोर, उचक्के, भ्रष्ट (ये सब  आप कहते रहे हैं) उनका साथ लेने से आपको कोई परहेज नहीं है। भाई अब नैतिकता की बात कभी मत कीजिएगा.. आपके मुंह से ये शब्द सुनना बेईमानी है।


पगलाई इलेक्ट्रानिक मीडिया टीआरपी के चक्कर में आपके आस पास चिपकी हुई है। दिन भर में आप और आपकी टीम भी कई बार कैमरे के सामने आती है। एक बार कहते हैं कि लाल बत्ती नहीं लूंगा, दो घंटे बाद फिर बाहर आते हैं अब कहते हैं गाड़ी नहीं लूंगा। केजरीवाल साहब लालबत्ती नहीं लूंगा का मतलब ही ये है कि आप गाड़ी भी नहीं लेगें। अब बताइये गाड़ी नहीं लेगें तो क्या लाल बत्ती हाथ में लेकर चलेंगे ? बात यहीं खत्म नहीं हुई, मीडिया में आप छाये रहें इसके लिए कुछ चाहिए ना.. इसलिए कुछ देर बाद आप फिर कैमरे के सामने आए और कहा कि शपथ लेने मेट्रो से जाएंगे। चलिए जनता  को मालूम हो आपकी हकीकत, इसलिए बताना जरूरी है कि रामलीला मैदान तक मेट्रो नही जाती है, ऐसे में केजरीवाल मैट्रो से बाराखंभा रोड तक मेट्रो से आएंगे, उसके बाद अपनी कार से रामलीला मैदान जाएंगे। आपकी कार बाराखंभा रोड पर तो रहती नहीं है, मतलब ये कि आप कार को घर से बाराखंभा तक खाली भेजेंगे, फिर यहां से उस पर सवार होंगे। ऐसे में मेरा सवाल है कि आप इस कार पर घर से ही क्यों नहीं सवार हो जाते ? ये हलकी  फुलकी  बातों से सरकार नहीं चलती केजरीवाल साहब ! ये सब करके आप  दिल्ली और मेट्रो यात्रियों को केवल डिस्टर्ब ही करेंगे। शहर में आराजकता के हालात पैदा करेंगे।


केजरीवाल कितने दिनों से गिना रहे हैं कि वो आटो पर चलेगे, मेट्रो का सफर  करेंगे, लाल बत्ती नहीं लेगें, बंगला और गाड़ी नहीं लेगें। आपने कभी गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर के मुंह से ये सब सुना है। वो काफी समय से गोवा के मुख्यमंत्री हैं। उनके पास भी  सरकारी गाड़ी, बंगला, लालबत्ती कुछ नहीं है। स्कूटी से दफ्तर जाते हैं, कई बार तो रास्ते में खड़े होकर किसी से  लिफ्ट लेते भी दिखाई दे जाते  हैं। और  हां केजरीवाल की पत्नी तो लालबत्ती की गाडी में ऑफिस जाती है जबकि गोवा के CM की पत्नी आज भी रिक्शे में बैठकर बाजार से खुद सामान लाती हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता  बनर्जी को ही ले लीजिए। रेलमंत्री रहने के दौरान कभी वो दिल्ली में लालबत्ती की कार पर नहीं चढ़ीं, मंत्रालय में अपनी टूटही जेन कार पर सवार होकर जाती हैं और सूती साड़ी के साथ हवाई चप्पल पहनती हैं। एक बार ममता ने देखा कि एक स्कूटर सवार सड़क पर अचानक गिर पड़ा , तो वो अपने कार से उतरी और घायल  को उसी कार से अस्पताल भेज दिया और खुद आटो लेकर संसद गईं। लेकिन उन्होने अपने मुंह से ये सब कभी नहीं कहा।


त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी साफ छवि वाले राजनेता हैं। गरीबी में पले-बढ़े माणिक सरकार की कुल चल और अचल संपति ढाई लाख रुपए से भी कम आंकी गई है। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र के अनुसार, 64 साल के माणिक सरकार के पास 1,080 रुपए कैश और बैंक में 9,720 रुपए हैं। केजरीवाल तो फिर भी लाखों  रूपये के मालिक हैं। माणिक तो अपनी सैलरी और भत्ते भी पार्टी फंड में देते हैं। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी सादगी पसंद इंसान हैं। वह किराये के सरकारी मकान में रहते हैं। चुनाव आयोग को सौंपे शपथ पत्र में उन्होंने जानकारी दी थी कि उनके पास न ही कोई मकान है और न ही गाड़ी। कैश के नाम पर उनके पास केवल पांच हजार रुपए हैं। ऐसा नहीं  है कि गाड़ी, बंगला ना लेने वाले आप कोई पहले नेता हैं, बहुत सारे लोग ऐसे रहे हैं।  लेकिन हां आप इस मामले में जरूर पहले नेता हैं जो अपने मुंह से पूरे दिन मीडिया के सामने गाते रहते हैं कि मैं ये नहीं लूंगा वो नहीं लूंगा। दूसरे नेताओं ने कभी अपने मुंह से कहा नहीं।


खैर आप मुख्यमंत्री बनिए, हमारी  भी शुभकामनाएं हैं। हम भी चाहते हैं कि दिल्ली मे एक ईमानदार सरकार  ही न हो, बल्कि वो ईमानदारी से काम भी करे। लेकिन जिस सरकार की बुनियाद में बेईमान हों, उससे बहुत ज्यादा ईमानदारी की उम्मीद रखना, मेरे ख्याल से  बेईमानी होगी। मैं चाहता हूं कि दिल्ली में ना सिर्फ एक ईमानदार बल्कि गंभीर सरकार होनी  चाहिए। दिल्ली की सड़कों पर जिस तरह से टोपी लगाए गुमराह नौजवान घूम रहे हैं, इन्हें आपको ही नियंत्रित करना होगा, वरना कल ये आपके लिए ही सबसे बड़ा खतरा  बन जाएंगे।




Saturday, 26 May 2012

शाम होते ही टल्ली हो जाता है अन्ना का गांव ... ( पार्ट 1)


मुझे लगता था कि अब अन्ना के बारे में मैं बहुत लिख चुका हूंबंद किया जाए ये सब, क्योंकि अन्ना और उनकी टीम की असलियत लगभग सामने आ चुकी है, भ्रष्टाचार को लेकर बड़ी बड़ी बातें करने वाली इस टीम पर भी वैसे ही गंभीर आरोप हैं जैसे नेताओं और नौकरशाहों पर। अच्छा चोरी चोरी होती है, इसमें ये कहना कि वो तो 1.76 लाख करोड़ डकार गया, इस बेचारी ने तो हवाई जहाज के किराए में ही चोरी की है, या ये कहें कि फलां सदस्य ने तो सरकार के महज कुछ लाख रुपये दबाए थे, वो भी जमा कर दिए। सवाल ये नहीं है, बड़ा और अहम सवाल ये है कि हमारी नियत कैसी है ? ऐसे में मैं ये कहूं कि चोर चोर मौसेरे भाई तो बिल्कुल गलत नहीं होगा।

खैर छोड़िए ये बातें बहुत हो गईं, आज मैं आपके लिए कुछ नई जानकारी लेकर आया हूं। दरअसल अन्ना के गांव के बारे में इतनी बड़ी बड़ी बातें सुनकर मैं हैरान था, कि क्या वाकई  जिस गांव में अन्ना रहते हैं, वहां कोई शराब नही पीता, तंबाकू पान की दुकाने तक नहीं हैं। गांव में सबके बीच भाईचारा है। मुझे लगा जिस जगह भगवान राम पैदा हुए या फिर भगवान श्रीकृष्ण पैदा हुए वहां तो इतना भाईचारा देखने को नहीं मिलता, अगर अन्ना के गांव रालेगनसिद्दि में ये सब है तो वाकई उनका गांव किसी भगवान का गांव होगा। अच्छा आपको मालूम हो कि घर में कोई मेहमान  बता कर आएगा तो आप घर को साफ सुथरा तो करके रखते ही हैं, घर के बिगडैल बच्चे को भी समझा देते हैं कि देखो कुछ मेहमान आ रहे हैं, बिल्कुल शरारत मत करना, चुपचाप शांत होकर बैठना, जो पूछा जाए बस उसी का जवाब देना, लेकिन मेहमान अचानक  आ जाए तो.. हाहाहहाहा...।

उसी तरह जब कहीं हम अपनी टीम के साथ होते हैं तो कैमरा देखते सब खुद अनुशासित हो जाते हैं और कैमरे के सामने बनावटी बातें शुरू कर देते हैं। लिहाजा मेरे मन में आया कि मैं एक बार जब गांव में कोई ऐसी हलचल ना हो कि मीडिया का वहां डेरा हो तब उनके गांव खाली हाथ जाता हूं और यूं ही घूमकर लोगों से बातचीत कर सच जानने की कोशिश करुंगा। यही सोचकर मैं पुणे पहुंच गया। एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी वाले से बात कर रहा था कि अन्ना के गांव चलना है और रात वहां या आसपास कोई होटल होगा तो वहां रुकूंगा और अगले दिन यहीं एयरपोर्ट पर छोड़ देना। ड्राईवर ने कहा कि चार हजार रुपये लूंगा, लेकिन आपने बिल अधिक पैसे का लिया, जो 30 प्रतिशत मुझे और देना होगा। बिल अधिक का मतलब पूछा तो उसने बताया कि अन्ना आंदोलन जब से शुरु हुआ है बहुत सारी टीमें आती हैं, जो पैसे देते हैं उससे कई गुना ज्यादा का बिल बनवाते हैं। सच पूछो तो पहला झटका एयरपोर्ट पर ही लगा और मैने इसी ड्राईवर को साथ ले लिया कि इस कुछ ज्यादा मालूम होगा।

अब एयरपोर्ट से हम अन्ना के गांव के लिए रवाना हो गए, शहर से बाहर निकले तो ड्राईवर ने पूछा आप मीडिया से हैं। मैने मना किया नहीं, मैं तो दिल्ली से आया हूं, बस यूं ही अन्ना का गांव देखने का मन हो गया। ड्राईवर के बाडी लंग्वेज से मुझे साफ लगा कि वो मेरी बात  से सहमत नहीं है, फिर भी खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बोला सर आप चलते समय ही पहले होटल बुक करा लें, वरना कई बार रात में दिक्कत हो जाती है। गांव से पहले शिरूर में होटल सारंग पैलेस है, (होटल का नाम जानबूझ कर बदला हूं) रात बिताने के लिए ठीक है। मैंने भी कहा ठीक है। होटल पहुंचे और कमरे के बारे में जानकारी कर ही रहा था, तो उसने सबसे पहले मैनेजर ने ये बताया कि भाईसाहब मैं आपको होटल का बिल सादे कागज पर दे पाऊंगा, क्योंकि दो महीने में मीडिया के इतने लोग आए और लोगों ने बिल बुक से रसीदें फाड़ लीं। एक कमरे मे कई लोग रुकते थे और कई कई बिल फाड़ ले जाते थे, अब बिल छपने को गए हैं, लिहाजा हम बिल नहीं दे पाएंगे।

मैं हैरान था कि ईमानदारी के आंदोलन को कवर करने आए थे और बेईमानी करते रहे मीडिया वाले। यहां अब मीडिया की चर्चा की जाए तो सच में पूरी किताब लिखी जा सकती है। बेचारे बहुत मुश्किल में थे, यहां की सही तस्वीर दें तो दिल्ली में बैठे बास नाराज होते थे, यहां कुछ ज्यादा बोले तो गांव वाले विफर जाते  थे। गांव के दुकानदार ने बताया कि दिल्ली में अन्ना का अनशन शुरू हुआ तो रालेगनसिद्धि मे बैठे रिपोर्टर क्या करें ? झट से सौ पचास आदमी गांव के पकड़े और बैठा दिया पद्मावती मंदिर परिसर में, और  शोर मचाने लगे कि यहां भी अनशन शुरू हो गया। पहले दिन तो टीवी पर दिखने के लिए तमाम लोग जमा हो गए, पर अगले दिन क्या करे, कोई आदमी बैठने को तैयार ही नहीं। रिपोर्टरों ने फैसला किया कि चलो आज गांव के स्कूली बच्चों को पकड़ लाते हैं, बेचारे बच्चे फंस गए। पर ये ज्यादा दिन तो चल नहीं सकता था, क्योंकि अगले दिन जब गांव वालों से बैठने की बात हुई तो उन्होंने पद्मावती मंदिर परिसर में बैठने के लिए रिपोर्टरों से पैसे की मांग कर दी। लोगों  का कहना था कि आप तो यहां  मलाई काट रहे  हैं, हम क्यों आपके मोहरे बनें। रिपोर्टर बेचारे क्या करते, उन्होंने चैनलों में फोन करके बता दिया कि आज कोई अनशन पर नहीं बैठा है।

गांव की हकीकत एक एक कर मेरे सामने आ रही थी। यहां मेरी मुलाकात एक नौजवान से हुई। वैसे मैं उसका नाम भी लिख सकता हूं, पर उनके गांव वाले जान गए तो उस बंदे की खैर नहीं। लिहाजा इशारा कर देता हूं कि इसके एक पैर में थोड़ी दिक्कत है, जिससे चलने मे इसे परेशानी होती है। अगर इसके अंदर लालच को निकाल दें तो वाकई ये एक अच्छा नौजवान है। थोड़ी देर तक गांव के बारे में बताने के बाद इसने मुझसे  दस रुपये मांगे, मैने कहा क्या हो गया? बोला गुटका खाना है, मैने कहा कि गुटका तो गांव में मिलता ही नहीं, इसके पहले की वो सनक जाता, मैने 50 रुपये का नोट उसे थमा दिया। थोड़ी देर में वो वापस आया और ईमानदारी से 40 रुपये मुझे वापस कर दिए और बताया भाईसाहब दारु तो गुजरात में भी बंद है, फिर तो वहां नहीं मिलनी चाहिए, पर मिलती है ना। रालेगांवसिद्धि में भी नशे का कोई सामान ऐसा नहीं है जो नहीं मिलता है, बस कीमत कुछ अधिक चुकानी पड़ती है। वैसे मैने देखा कि पूरे गांव में जगह जगह गुटके  के पाउच मिल जाएगे। इतना ही नहीं शाम होते ही आधा से ज्यादा गांव टल्ली होकर घूमता फिरता है। हैरानी की बात तो ये है कि नाम सिर्फ लोग टल्ली होकर गांव में घूमते हैं, बल्कि अन्ना जहां रहते हैं पद्मावती मंदिर के आस पास भी ठरकी बंदे आपको मिल जाएंगे। मुझे ताज्जुब होता है कि जब गांव में नशाखोरी का सभी सामान आसानी से मिलता है तो किस आधार पर अन्ना कहते कि उनके गांव में कुछ नहीं होता ?

बात नशाखोरी  की चल रही है तो एक सच्ची घटना भी आपको  बताते चलें। अन्ना की एक आदत है वो गांव के हर अच्छे काम का श्रेय खुद ले लेते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और होती है। इस गांव के 30 साल से भी ज्यादा समय तक सरपंच रहे हैं सदाशिव महापारी। आज भी सरपंच इनके ही बेटे जय सिंह हैं। 1982 में नशामुक्ति की बात चली तो सदाशिव महापारी ने गांव वालों के साथ ये फैसला किया कि यहां अब नशे का सामान नहीं बिकेगा। उन्होने सभी दुकानदारों से कहा कि वो पान, बीड़ी, सिगरेट और तंकाबू सभी चीजें लेकर पंचायत में आएं। सभी दुकानदारों ने सरपंच के सामने पान, बीड़ी सब चीजें जमा कर दीं। दुकानदारों से पूछा गया कि उन्हें कितने पैसे का नुकसान हुआ तो सभी के मिलाकर 2300 रुपये का नुकसान बताया। उस  समय मरापारी ने अपने पैसे से इन सबका भुगतान किया और दुकानदारों को हिदायत दी गई कि अब ये सामान यहां नहीं बिकना चाहिए।

अब मजेदार वाकया सुनिये। पंचायत में कहा गया कि जमा  हुए सिगरेट,  बीड़ी, तंबाकू का आखिर किया  क्या जाए ? तो आज देश भर में ईमानदारी की अलख जगाने निकले हैं,  इस अन्ना ने कहा कि ये सब बगल वाले गांव में बेच दिया जाए। लोग अन्ना की बात सुनकर हंस पड़े,  बेचारे अन्ना  झेंप गए। बाद  मे सरपंच ने फैसला सुनाया कि इसे यहीं सबके सामने जला दिया जाए, ये बात सबकी समझ में आई और पंचायत की  बैठक के दौरान ही इसे जला दिया गया।
इस गांव में एक भ्रष्ट्राचार विरोधी जन आंदोलन न्यास नामक संस्था है। इसकी अगुवाई अन्ना ही करते हैं। कहा जा रहा है कि अगर ईमानदारी से इस संगठन की जांच हो जाए, तो  यहां काम करने वाले तमाम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ेगी। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का एक खास अड्डा है ये दफ्तर। यहां एक साहब हैं, उनके पास बहुत थोड़ी से जमीन है, उनकी मासिक पगार भी महज पांच हजार है, लेकिन उनका रहन सहन देखिए तो आप हैरान हो जाएगा। हाथ में 70 हजार रुपये के मोबाइल पर लगातार वो उंगली फेरते रहते हैं। हालत ये है कि इस आफिस के बारे में खुद रालेगनसिद्दि के लोग तरह तरह की टिप्पणी करते रहते हैं।
 
आज आप इस गांव की हालत सुनेगें तो चौंक जाएंगे। हां मैं इस बात की तारीफ  करता हूं  कि गांव  की ऊसर भूमि (बंजर जमीन) को उपजाऊ बना दिया गया है, आधुनिक संसाधनों  का इस्तेमाल सिचाई की मुकम्मल व्यवस्था की गई है। पैदावार के मामले में गांव के किसान रिकार्ड पैदावार कर रहे हैं। यहां से बड़ी मात्रा मे सब्जी और अन्य सामानों को बड़े शहरों मे भेजा जाता है। इन सबके बाद भी हम ये नहीं कह सकते कि गांव बहुत खुशहाल है। गांव के लोग बहुत नाराज हैं, उन्हें लगता है कि अपने गांव का भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो रहा, भ्रष्टाचारियों के साथ अन्ना देश का भ्रमण कर रहे हैं, बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं। इस गांव में करीब 22 घटे हमने बिताए, मैने देखा कि गांव का आदमी इतना निकम्मा हो चुका है कि अगर उससे आपने किसी के घर का पता भी पूछ लिया तो उसके एवज में वो पैसे मांगता है। इस गांव में जो भी आदमी आपसे थोड़ी देर भी बात करेगा, उसका मीटर शुरू हो जाता है और वो आपसे पैसे की मांग करेगा। सच बताऊं तो आप गांव में अगर तीन घंटा बिताने का मन बनाकर गए हैं तो आधे घंटे में आप के सामने गांव  की जो असल तस्वीर सामने आएगी, उसके बाद आप पांच मिनट यहां रुकना पसंद नहीं करेंगे।    क्रमश......

( अगली किस्त में मैं आपको बताऊंगा कौन है असली अन्ना, अन्ना की असल सच्चाई,  अन्ना के रहन सहन का राज, क्यों डरते हैं  लोग अन्ना से, अन्ना के पीए सुरेश पढारे की हकीकत, बताऊंगा नहीं है अन्ना संत,  मंदिर की कुटिया  मे रहने का दावे मे कितनी सच्चाई.. ये सब जानने के लिए इंतजार कीजिए अगली किस्त.... )

Thursday, 26 January 2012

चुनाव में ईमानदारी ... ना बाबा ना

त्तर प्रदेश के चुनावी सफर पर निकला तो कुछ उत्साहित था, मुझे लग रहा था कि ईमानदारी को लेकर अन्ना ने इतनी तो जागरुकता फैला ही दी होगी कि गांव गांव में लोग ईमानदारी की बात करते होंगे और चुनाव में इस बार दागी उम्मीदवारों से दूरी बनाकर ईमानदार और साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवार के साथ खड़े होंगे। सच बताऊं मेरा सोचना गलत था, चुनावों में कुछ भी नहीं बदला है। चोर, उचक्के, बदमाश, भ्रष्टबेईमान सब तो हैं इस चुनावी दंगल में। टीम अन्ना का यूपी  में कितना भी दौरा कर ले, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यहां वो ईमानदारी को मुद्दा नहीं बना पाएंगे। यहां लोगों की छोटी छोटी जरूरते हैं, उम्मीदवार उनके पास आते हैं तो वो उनसे हैंडपंप और गांव  गली की सड़कों की बात ही कर करते हैं। इसके अलावा  समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  तो वाकई लोगों की नब्ज पकड़ ली है।  हालांकि उन्होंने ये बात कही तो मजाक में ही कि जब शाम की दवा  यानि दारू मंहगी हो जाए तो  समझ लेना चाहिए कि सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। वाकई इस बात का ग्रामीण अंचलों में असर देखा जा रहा है। आप यकीन माने यूपी में चुनाव के दौरान शराब की कीमतों में भारी कटौती की गई है।

बाराबंकी के बाद कल फैजाबाद यानि राम लला की नगरी अयोध्या में था। बाराबंकी में तो हमें पता बाद में पता चला जहां हमारा कार्यक्रम तय था, वहां के आसपास  की जमीन पर बीएसपी के उम्मीदवार संग्राम सिंह ने कब्जा कर लिया है। शापिंग काम्पलेक्स के लिए काम भी शुरू हो गया था, लेकिन कुछ लोग हिम्मत करके कोर्ट चले गए और काम रुक गया। यहां अब पुलिस तैनात है। संग्राम सिंह लगातार कहते रहे कि हां मैं जनता की अदालत में शामिल होऊंगा, पर कार्यक्रम वाले दिन उन्होने बताया कि परिवार में किसी ने खुद को गोली मार ली है और वो अब नहीं आ सकते। मुझे लगा कि हो सकता है कोई हादसा हो गया होगा, लेकिन हैरान तब हुआ मैं जब कल फैजाबाद में कार्यक्रम शुरू होने के 10 मिनट पहले बीएसपी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता ने कहा कि उनके घर मिट्टी हो गई है। मिट्टी हो जाने का मतलब किसी की मौत हो गई है, लिहाजा वो नहीं आ सकते। मुझे हंसी आईऔर एक कहानी याद आ गई।

साहब हुआ ये मेरे एक मित्र के घर अचानक कुछ मेहमान आ गए, ठंड का दिन है लिहाजा किसी को जमीन पर सुलाना ठीक नहीं था। बेचारे मित्र पड़ोसी के यहां चारपाई मांगने चले गए। एक पड़ोसी के यहां जब उन्होंने चारपाई की मांग की तो पड़ोसी ने बडे ही भोलेपन से कहा " भाई क्या बताएं, मेरे यहां तो सिर्फ दो चारपाई है, एक पर मैं और मेरे पिता जी सोते हैं, दूसरी चारपाई पर मेरी मां और मेरी बीबी सो जाती है। इसलिए मैं चारपाई नहीं दे पाऊगा। मित्र बोले कोई बात नहीं, चारपाई आप दें या ना दें, पर आपको मेरी एक सलाह है कि आप लोग सोया तो ठीक से करें। बीएसपी के नेताओं को भी मेरी यही सलाह है कि आप कार्यक्रम में आएं या ना आएं, पर मौत का बहाना  थोडा  ज्यादा हो जाता है। वैसे भी यूपी में जो माहौल है उससे तो पार्टी की नानी तो मरनी ही है, फिर पहले ही क्यों मरने लगे।

अयोध्या पहुंच कर थोड़ा मन दुखी हुआ, हमारे कार्यक्रम का आयोजन स्थल गुफ्तार घाट था। कहते हैं कि भगवान राम ने यहीं पर जल समाधि ले ली थी। यानि यहीं सरयू के तट पर भगवान का शरीर अंतिम बार लोगों ने देखा था। भगवान राम मर्यादा को मानने वाले थे, और कुछ लोगों ने सारी मर्यादाओं को ताख पर रख कर भगवान का मंदिर बनाने की कोशिश कर रहे थे। हालत ये हो गई  जो उनकी ठीक ठाक  छत थी, वो भी नहीं रही। दूर दराज से आने वाले भक्त रामलला से ज्यादा यहां हुई तोड़फोड़ की चर्चा करते हैं। बहरहाल एक अच्छी बात है कि चुनाव में फिलहाल राम मंदिर का मुद्दा गायब है। कई बार यहां से बीजेपी के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन उन्होंने किया क्या है, इसका जवाब उनके पास नहीं है। लिहाजा यहां से ख़डी  एक किन्नर  उम्मीदवार गुलशन बिंदू के पीछे  पूरा शहर पागल हुआ पड़ा है। राजनीतिक  दलों से ज्यादा भरोसा ना जाने क्यों लोगों को इस किन्नर पर है। बिहार की रहने वाली ये किन्नर लोगों को समझाती है कि वो सीता माता जो बिहार में जन्मी थीं, वो उनके यहां  से भगवान राम के पास यानि माता सीता के ससुराल आई है। चुनाव के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन किन्नर ने इस कड़ाके की ठंड में राजनीतिक दलों के पसीने तो छुड़ा ही दिए हैं।

दिल्ली मैं बैठकर अखबार और चैनल पूरी तरह राहुल गांधी पर फोकस किए हुए हैं। यहां लोगों से राहुल के बारे में बात करो तो लोग हंसने लगते हैं। कहते हैं कि राहुल फैक्टर की जब कोई बात करता है तो हम समझ जाते  हैं कि  ये लोग यहां के रहने वाले नहीं है, दिल्ली या फिर किसी और प्रदेश से आए हैं। फैजाबाद के सुदूर इलाके में मैं सीधे साधे ग्रामीणों की ये बात सुनकर हैरान रह गया। बहरहाल दोस्तों आज हम पहुंच चुके हैं बहराइच। तैयारियां चल रही हैं रात के चुनावी दंगल की। आप भी जुड़िए हमारे साथ आईबीएन 7 पर रोजाना रात आठ बजे.. हर रोज नए शहर से।

नोट.. मित्रों मैं लगातार सफर  में हूं, हर रात एक नए शहर में बीतती है, फिर वहां शुरू होता है चुनानी दंगल। यही वजह है कि मैं आप सबके ब्लाग पर आ नहीं पा रहा हूं, लेकिन जब ये कारवां गोरखपुर पहुंचेगा तो हमें एक दिन पूरा वहां आराम करना है। कोशिश होगी कि उस दिन हम आप सबके साथ  कुछ देर जरूर रहूं।

Wednesday, 30 November 2011

ईमानदारी की बात में भी ईमानदारी नहीं...

अब टीम  अन्ना ईमानदारी की नई परिभाषा गढ़ रही है । लोकपाल में एनजीओ को शामिल किए जाने से ना जाने क्यों उनकी परेशानी बढ़ गई है । लोकपाल में और किसे किसे शामिल किया जाए, इससे ज्यादा जोर टीम  अन्ना का इस पर है कि कैसे एनजीओ को इससे  बाहर किया जाए । अब आंदोलन की हकीकत इसी बात से सामने आती है । मेरा मानना है कि आप ये मांग तो कर सकते हैं कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री, जजों को भी शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन आप ये मांग भला कैसे कर सकते हैं कि एनजीओ को इसके दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए ।
मेरी समझ में तो नहीं आ रहा है, आप अगर समझ रहे हैं तो मुझे भी बताएं । इस मांग का मतलब तो यही है ना  कि " ए "  को चोरी करने की छूट होनी चाहिए, लेकिन   " बी " को चोरी करने का बिल्कुल हक नहीं होना चाहिए । एनजीओ को लोकपाल में लाने की खबर से टीम अन्ना की हवाइयां उड़ गईं । टीम के सबसे ईमानदार और मजबूत सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने तो आनन फानन में  सरकार को रास्ता भी सुझा दिया, उनका कहना है कि चलो अगर एनजीओ को लोकपाल के दायरे में लाया ही जाना है तो सबको ना लाया जाए, सिर्फ उसे ही लाएं जो एनजीओ सरकारी पैसों की मदद लेते हैं । हाहाहाहहाहा हंसी आती इस ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता पर ।
अरे केजरीवाल साहब हम एनजीओ से तो ये उम्मीद करते हैं ना कि वो ईमानदारी से काम करते होंगे । फिर आपकी छटपटाहट की वजह क्या है ? अन्ना जी तो बेचारे हर जांच खुद अपने से शुरू करने की मांग करते हैं ।  वो कहते हैं कि सबसे पहले उनकी ही जांच हो , लेकिन आपको ऐसा करने में दिक्कत क्यों है । मैं दूसरे एनजीओ की चर्चा नहीं करुंगा,  पहले आपकी दूसरी सहयोगी किरन बेदी की बात कर लेते हैं । उनके एनजीओ को सरकार से पैसा मिला या नहीं, मै ये तो नहीं जानता , लेकिन पुलिस कर्मियों के बच्चों को कम्प्युटर और कम्प्युटर ट्रेनिंग के लिए माइक्रोसाप्ट कंपनी ने 50 लाख रुपये लिए गए । अब आरोप लग रहा है कि उन्होंने इस पैसे का दुरुपयोग किया । ये सरकारी पैसा भले ही ना हो, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के नाम पर लिया गया पैसा था, अगर इसमें बेईमानी  हुई है तो शर्मनाक है और दोषी लोगों को सख्त सजा होनी ही चाहिए । आप  चाहते  हैं कि ऐसे लोगों  को हाथ  में तिरंगा लेकर ईमानदारी की बात करने की छूट होनी  चाहिए ।

आप खुद सोचें कि जो ईमानदारी की बडी बड़ी बातें कर रहे हैं, उनके दामन साफ नहीं है,  कोर्ट ने सुनवाई के बाद उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए हैं, तो फिर और एनजीओ का क्या हाल होगा । आखिर अरविंद केजरीवाल को  इससे दिक्कत  क्यों है ? वो किसे बचाना चाहते हैं ? मेरा अनुभव रहा है कि बहुत सारे सामाजिक संगठन विदेशों  से पैसे लेते हैं, मकसद होता है का गरीबों को मुफ्त इलाज, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा,  गांव का विकास, बाल श्रम पर रोक, महिला सशक्तिकरण,  पर  क्या ईमानदारी से सामाजिक संगठन ये काम करते हैं, दावे के साथ कह सकता हूं.. नहीं । ऐसे में अगर इन्हें  लोकपाल के दायरे में लाने की बात हो रही है तो आखिर इसमे बुराई क्या है, क्यों केजरीवाल आग बबूला हैं  ?

मित्रों वैसे भी  एनजीओ पर शिकंजा कसना जरूरी  है,  क्योंकि यहां बडे पैमाने  पर धांधली हो रही है । मैं इस बात का जवाब टीम अन्ना  से चाहता हूं  कि तमाम लोग आयकर  में छूट पाने के लिए सामाजिक संगठनों को चंदा देते हैं और यहां से रसीद हासिल करके आयकर रिटर्न में उसे दर्ज करते हैं । जब आयकर में एनजीओ की रसीद महत्वपूर्ण अभिलेख है तो क्यों नहीं एनजीओ को लोकपाल  के दायरे में आना चाहिए । मैं देखता हूं कि कारपोरेट जगत ही नहीं बडे बडे नेताओं और फिल्म कलाकार अपने पूर्वजों के नाम पर सामाजिक संस्था बनाते हैं और पैसे को काला सफेद करते रहते हैं ।

यहां एक शर्मनाक वाकये की  भी चर्चा कर दूं । देश में बड़े बड़े साधु संत धर्मार्थ संगठन के नाम पर धोखाधड़ी  कर रहे हैं । साल भर पहले आईबीएन 7 के कैमरे पर कई बडे नामचीन साधु पकड़े गए थे, जो कालेधन को सफेद करने के लिए सौदेबाजी कर रहे थे । वो दस लाख रुपये लेकर 50 रुपये की रसीद दिया करते थे । धर्मार्थ संगठन गौशाला,  पौशाला, धर्मशाला, पाठशाला समेत कई अलग अलग काम के लिए सामाजिक संस्था बनाए हुए हैं । मेरा मानना है कि सामाजिक संस्थाओं  को सरकारी और गैरसरकारी जितनी मदद मिलती  है, अगर इसका ईमानदारी से उपयोग किया जाता तो आज देश  के गांव  गिरांव की सूरत बदल जाती । ये चोरी का एक आसान रास्ता  है, इसलिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सेवा में रहते हुए एक  एनजीओ जरूर बना लेते हैं और सेवाकाल  के दौरान पद का दुरुपयोग करके इसे आगे बढाने में लगे रहते हैं, जिससे  सेवानिवृत्ति के बाद इसका स्वाद उन्हें मिलता रहे ।

अच्छा हास्यास्पद लगता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल  के दायरे में लाने की बात की जा रही है, जबकि देश में आज तक  कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं  हुआ है, जिसके लूट खसोट से जनता परेशान हो गई हो । अब आज की केंद्र सरकार को ही ले लें, सब कहते हैं कि आजाद भारत की ये सबसे भ्रष्ट्र सरकार है, लेकिन प्रधानमंत्री को सभी  ईमानदार बताते हैं । इसलिए अगर  लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को  एक बार ना भी शामिल किया जाए तो कोई पहाड़ टूटने वाला नहीं है, लेकिन जब सामाजिक  संगठनों की करतूतें सामने आने लगी हैं तो कोई कारण नहीं जो इन्हें लोकपाल  से अलग रखा  जाए । टीम अन्ना  से बस इतना ही कहूंगा  कि जनता देख रही है, कम से कम ईमानदारी की बात तो ईमानदारी से करो ।