Wednesday, 21 November 2012

देश अभी शर्मिंदा है, अफजल गुरु जिंदा है !


आज बात तो करने आया था महाराष्ट्र सरकार के उस शर्मनाक फैसले की, जिससे उसने देश के एक बड़े तपके के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। यानि शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे का निधन हो जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से किए जाने का ऐलान कर। इस पर विस्तार से बात होगी लेकिन पहले बात करते हैं आतंकी अजमल कसाब की, जिसे फांसी देकर केंद्र सरकार ने दुनिया को दिखाया कि आतंकवाद से लड़ने की मजबूत इच्छाशक्ति सरकार मे हैं। वहीं संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु के मामले में आज तक फैसला ना होने से राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय को जनता कटघरे में खड़ा कर रही है। तीसरी मौत के बारे मे शायद उत्तर प्रदेश के बाहर रहने वाले ना जाने, लेकिन राजनेताओं को उंगली पर नचाने वाला शराबमाफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति विवाद में गोली से उड़ा दिया।

चार साल पहले पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से 10 आतंकी समुद्री मार्ग से मुंबई पहुंचे और उन्होंने खून की होली खेलनी शुरू कर दी। इन आतंकियों ने किस तरह मुंबई को हिलाया ये सब आपने टीवी पर देखा है। आपको  पता है कि नौ आतंकियों को हमारे जवानों मे मार गिराया था, जबकि एक आतंकी अजमल कसाब को जिंदा पकड़ने में हमारी फौज कामयाब रही। कसाब का ट्रायल शुरू हुआ, पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि वो पाकिस्तानी है और उसने जो पता बताया वहां भी स्थानीय लोगों ने स्वीकार किया कि कसाब इसी गांव का रहने वाला है। इन सबके बावजूद पाकिस्तान सरकार ने साफ इनकार कर दिया कि कसाब पाकिस्तानी है। बहरहाल पड़ोसी मुल्क का होने के बाद भी कसाब के मामले की अदालत में सुनवाई हुई और जिस तरह एक भारतीय को अपना बचाव करने का हक है, वो सारी सहूलियतें कसाब को दी गई। निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा मिलने के बाद आखिर में राष्ट्रपति के यहां कसाब ने दया याचिका पेश किया। इसी 5 नवंबर को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उसकी याचिका खारिज कर दी और आज यानि 21 नवंबर को सुबह 7.36 पर उसे फांसी पर लटका दिया गया।

आतंकवादियों के इस हमले में मुंबई में 166 लोगों ने जान गवांई थी। इस आतंकी घटना के बाद से ही हमले में मारे गए लोगों के परिजन लगातार मांग कर रहे थे कि कसाब को फांसी दी जाए, लेकिन सरकार कोई भी फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं करना चाहती थी, उसने न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए उसे फांसी पर लटकाया। पहले से तय था कि कसाब को फांसी देने के बाद देश में एक बड़ा सवाल उठेगा कि कसाब तो सिर्फ एक मोहरा था, उसे कब फांसी होगी जो ऐसी घटनाओं का मास्टर माइंड है। इशारा साफ है कि संसद पर हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू को फांसी कब होगी ? ये सवाल पहले भी उठता रहा है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट से भी अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, फिर अफजल कैसे जिंदा है। आपको पता है कि अफजल की दया याचिका भी राष्ट्रपति के पास लंबित है।

कसाब को फांसी के मामले में केंद्र महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह से तालमेल दिखाया, देश में अपनी तरह की ये पहली ही कार्रवाई है। 19 अक्टूबर को गृहमंत्रालय ने कसाब की फाइल राष्ट्रपति के यहां भेजी, राष्ट्रपति ने महज 15 दिन यानि पांच नवंबर को दया याचिका खारिज करते हुए फाइल गृहमंत्रालय को वापस भेज दी, सात नवंबर को गृहमंत्रालय ने इस पर फांसी की मुहर लगा दी और आठ नवंबर को ये फाइल महाराष्ट्र भेजी गई। इस फाइल में 21 नवंबर को फांसी देने की तारीख तय कर दी गई थी। 19 नवंबर को कसाब को मुंबई से पुणे ले जाया गया और आज यानि 21 को फांसी दे दी गई। इस मामले में पूरी तरह गोपनीयता बरतने के लिए इसे आपरेशन X नाम दिया गया। यहां तक की अफसर कसाब को मेहमान के संबोधन से आपस में बात कर रहे थे, जिससे किसी को कानोंकान खबर ना हो कि किस मामले में बात हो रही है।

राष्ट्रपति भवन पर सवाल ! अफजल गुरु की दया याचिका का निस्तारण ना होने से आम जनता  में तो हैरानी है ही, राजनीतिक दल भी लगातार इस मामले में केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। कुछ समय पहले कहा गया राष्ट्रपति भवन में अफजल गुरु के मामले में फैसला लेने से पहले 17 और दया याचिकाओं का निस्तारण किया जाना है। खुलकर तो ये बात नहीं कही गई थी, लेकिन इशारा यही था कि जब अफजल की बारी आएगी तो उसके मामले में भी फैसला लिया जाएगा। इसके बाद लोग निराश थे, क्योंकि सभी को लग रहा था कि जब अफजल गुरु को कई साल पहले  फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है और उसे आज तक फांसी नहीं दी जा सकी है तो भला कसाब को कैसे फांसी दी जा सकती है ? लेकिन कसाब की फांसी पर इतनी जल्दी फैसला लिया गया और बिना देरी उसे फांसी पर लटका भी दिया गया, इससे तो साफ हैं कि अगर सरकार की इच्छाशक्ति मजबूत हो तो, फैसला लेने में कोई मुश्किल नहीं है। यही वजह है कि आज कसाब को फांसी दिए जाने के बाद संसद पर आतंकी हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को फांसी देने की मांग जोर पकड़ रही है। हालाकि देखा जा रहा है कि गुरु को फांसी देने का मामला आसान नहीं है, वजह साफ है, ये मामला सियासी ज्यादा हो गया है।

 कसाब को फांसी के बाद क्या ? मुझे लगता है कि पाकिस्तान और आतंकवादियों में इसकी प्रतिक्रिया स्वाभविक है। पहला तो जो संदेश आ रहा है, उससे तो लगता है कि पाकिस्तान में भारतीय बंदी सरबजीत की रिहाई कुछ दिन लटक सकती है। अगर वो सरबजीत के साथ कुछ ऐसा वैसा भी करें तो मुझे हैरानी नहीं होगी। इसके अलावा हमें आपको पहले से ज्यादा सावधान रहने की भी जरूरत होगी, क्योंकि आतंकवादी भी प्रतिक्रिया में कुछ बड़ी घटनाओं को अंजाम देने की साजिश कर सकते हैं। इसके अलावा मुझे लगता है कि पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का भारत दौरा एक बार फिर लटक सकता है। वैसे भी जब दिल में एक दूसरे मुल्क के प्रति नफरत भरी हो तो क्रिकेट तो होना भी नहीं चाहिए। बहरहाल कसाब को फांसी दिए जाने के बाद अगर पड़ोसी मुल्क ने प्रतिक्रिया के तौर पर कुछ भी किया तो निश्चित ही इसका परिणाम गंभीर होने वाला है।

हां-अब बात बाल ठाकरे की :  मेरा महाराष्ट्र की सरकार से एक सवाल है। शिवसेना सुप्रीमों का कोई एक ऐसा काम बताएं जो उल्लेखनीय हो, राष्ट्रहित में हो। फिर ठाकरे किसी पद पर भी नहीं रहे, ऐसे में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से करने का ऐलान क्यों किया गया ? क्या महाराष्ट्र की सरकार को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं था ? क्या सरकार डरी हुई थी कि ठाकरे की मौत के बाद मुंबई के हालात को काबू में करना मुश्किल होगा ? मैं बहुत गंभीरता से कहना चाहता हूं कि जिन शिवसैनिकों ने मुंबई की कानून व्यवस्था को लेकर सरकार की नाक में दम कर दिया हो, उसकी अगुवाई करने वाले को आखिर तिरंगे में कैसे लपेटा जा सकता है ? मुंबई आने वाले उत्तर भारतीयों की जो लोग पिटाई का ऐलान करते हो, जो निर्दोष आटो चालकों पर हमला कर उनके पैसे छीन लेते हों। ऐसे लोगों के साथ सरकार की इतनी सहानिभूति आखिर क्यों ?

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि मराठी मानुस की बात कर उत्तर भारतीयों को मुंबई छोड़कर जाने को कहने का ऐलान कर हिंसा फैलाने वालों को भला राजकीय सम्मान कैसे दिया जा सकता है ? सच्चाई तो ये है कि ठाकरे ना कभी लोकतंत्र के हिस्सा रहे और ना ही उनका लोकतंत्र में कभी भरोसा रहा है। वे खुद कहते थे कि वो शिवशाही पर विश्‍वास करते हैं, लोकशाही पर नहीं। वो एक ऐसे व्‍यक्ति थे जो ऐक्‍शन की बात करते थे। हम कहते हैं कि हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन कोई व्‍यक्ति जिसने कभी लोकतंत्र को माना ही नहीं उसके बारे में आप क्‍या कहेंगे। अब किसी के लाखों अनुयायी होने का मतलब यह नहीं कि व्‍यक्ति के शरीर को हम तिरंगे में लपेट दे। उनकी राजनीति ही देश को तोड़ने वाली रही है। मसलन हमारा संविधान कहता है कि हर व्‍यक्ति को देश के किसी भी स्‍थान पर रहने और काम करने का अधिकार है, जबकि ठाकरे हमेशा संविधान की इस धारा के विरोध में रहे। उन्‍होंने मुंबई में बाहरी लोगों का हमेशा विरोध किया। उनकी राजनीति की शुरुआत कम्‍युनिस्‍टों को मुंबई से खदेड़ने से हुई और फिर उन्‍होंने उत्तर भारतीयों का मुंबई में जीना मुहाल कर दिया।

ठाकरे की मौत के बाद महाराष्ट्र सरकार को घुटनों पर देखकर वहां लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। डर का आलम ये कि लोगों ने अपनी दुकानें तक नहीं खोलीं। अब इस बंद को लेकर सोशल साइट फेसबुक पर एक बेटी ने बंद का औचित्य पूछ लिया तो उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मुझे जानना है कि महाराष्ट्र में ये कौन सी सरकार काम कर रही है। आतंकी सिर्फ वही नहीं है जो पाकिस्तान से आया हो, आतंकी वो भी है, जिसकी वजह से लोग शांति से रह ना पाएं। शिवसैनिक भी किसी आतंकी से कम नहीं है। वो सभी आतंक के मास्टर माइंड हैं तो इन्हें गुमराह करते हैं।

आखिर मे मैं केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और कांग्रेस से जानना चाहता हूं कि अगर उन्होंने शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे को राजकीय सम्मान देकर पुलिस की सलामी दिलाई है तो क्या ये माना जाए कि आप सब उनकी सोच और विचारधारा का भी समर्थन करते हैं। आप सबका भी यही मानना है कि मुंबई से उत्तर भारतीयो को खदेड़ दिया जाना चाहिए । इस मामले में अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए।

चलते - चलते
इसी हफ्ते एक और गंभीर घटना हुई। उत्तर प्रदेश के एक बड़े शराब माफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति के विवाद में गोलियों से छलनी कर दिया, हालाकि पांटी के लोगों ने वहीं उसके भाई की भी  हत्या कर दी। पांटी चढ्ढा का जिक्र इसलिए करना जरूरी था कि ये वो सख्श है कि जिसके इशारे पर सूबे की सरकार नाचती है। सरकार चाहे किसी पार्टी की हो, सब पर पांटी बहुत भारी था। धीरे धीरे इसका प्रभाव उत्तराखंड और पंजाब में भी बढ़ता जा रहा था।





34 comments:

  1. कई अनसुलझे सवाल खड़े करती ... आपकी ये पोस्ट स्वागत योग्य है !!!

    ReplyDelete
  2. आधा सच नहीं पूरा सच है इस पोस्ट में!

    ReplyDelete
  3. bilkul sahi,acchi aur tarkyukt vyakhya,kabile gaur

    ReplyDelete
  4. बुरे काम का बुरा नतीजा |
    चच्चा बाकी, चला भतीजा ||

    गुरु-घंटालों मौज हो चुकी-
    जल्दी ही तेरा भी तीजा ||

    गाल बजाया चार साल तक -
    आज खून से तख्ता भीजा ||

    लगा एक का भोग अकेला-
    महाकाल हाथों को मींजा |

    चौसठ लोगों का शठ खूनी -
    रविकर ठंडा आज कलेजा ||

    ReplyDelete
    Replies
    1. क्या बात है, बहुत सुंदर
      बहुत बहुत आभार

      Delete
  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    ReplyDelete
  6. कसाब को फांसी के बाद क्या ?
    bahut aham sawal hai.


    मेरा महाराष्ट्र की सरकार से एक सवाल है। शिवसेना सुप्रीमों का कोई एक ऐसा काम बताएं जो उल्लेखनीय हो, राष्ट्रहित में हो। फिर ठाकरे किसी पद पर भी नहीं रहे, ऐसे में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से करने का ऐलान क्यों किया गया ? क्या महाराष्ट्र की सरकार को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं था ? क्या सरकार डरी हुई थी कि ठाकरे की मौत के बाद मुंबई के हालात को काबू में करना मुश्किल होगा ? मैं बहुत गंभीरता से कहना चाहता हूं कि जिन शिवसैनिकों ने मुंबई की कानून व्यवस्था को लेकर सरकार की नाक में दम कर दिया हो, उसकी अगुवाई करने वाले को आखिर तिरंगे में कैसे लपेटा जा सकता है ? मुंबई आने वाले उत्तर भारतीयों की जो लोग पिटाई का ऐलान करते हो, जो निर्दोष आटो चालकों पर हमला कर उनके पैसे छीन लेते हों। ऐसे लोगों के साथ सरकार की इतनी सहानिभूति आखिर क्यों ?

    mai aapki baat se poorntaya sehmat hun.


    shubhkamnayen

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत बहुत आभार
      शुक्रिया

      Delete
  7. विचारणीय प्रश्न हैं !

    ReplyDelete
  8. बहुत अच्छी पोस्ट......आज हमारे देश की सभी समस्याएं और उनका समाधान दोनों ही राजनेताओं की संगिनी बन बैठी हैं....

    ReplyDelete
  9. बढ़िया विश्लेषण....

    ReplyDelete
  10. हमेशा की तरह ... सार्थकता लिये सशक्‍त लेखन ...

    ReplyDelete
  11. आप की निर्भीकता को सलाम!

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी अल्पना मेम आपका बहुत बहुत आभार

      Delete
  12. आपका निर्भीकता से लिखना मुझे बहुत भाता है,,
    निसंदेह अफजल गुरू को शीघ्र फांसी होनी चाहिए,,,

    recent post : प्यार न भूले,,,

    ReplyDelete
  13. प्रसंशनीय लेख..........
    अपने बड़ी बेबाकी से
    सभी मुद्दों की तह तक जाकर लिखा है ।

    ReplyDelete
  14. मेरा कमेन्ट कहाँ गया ,....बहुत बड़ा कमेन्ट किया था ...पहले spam में देखो फिर और कमेन्ट करुँगी

    ReplyDelete
    Replies
    1. हाहाहहाहा, स्पैम में नहीं है।
      बताइये इतना बड़ा कमेंट खो गया...

      Delete
  15. बहुत खूब ...बेबाक लेखन ....विचारणीय भी और दमदार भी

    ReplyDelete

जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।