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Tuesday, 19 February 2013

आतंकवादी की पैरोकारी का सच !

संसद हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने के बाद तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक तबका रोज नए-नए तर्कों के साथ ये बताने की कोशिश कर रहा है कि उसे फांसी गलत दी गई है। कुछ लोग कह रहे हैं कि ट्रायल सही नहीं हुआ, कुछ कह रहे हैं फांसी के पहले उसके परिवार से मिलने नहीं दिया गया, कुछ कह रहे हैं कि शव तो उसके परिवार को सौंपना ही चाहिए। सबसे बड़ी बात तो ये कि कुछ लोग फांसी की सजा पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं, कह रहे हैं कि फांसी की सजा सभ्य समाज के लिए अभिशाप है। अब एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है कि आखिर एक आतंकवादी की इतनी हिमायत के मायने क्या है ? मुझे तो इस मामले में टीवी चैनलों का रवैया भी बचकाना लग रहा है। चलिए पहले मैं अपना नजरिया साफ कर दूं उसके बाद बात को  आगे बढ़ाता हूं। मुझे भी लगता है कि फांसी के मामले में एक बहुत बड़ी गलती सरकार ने की है। इसके लिए सरकार की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। गलती ये कि सुप्रीम कोर्ट से जब 2004 में ही फांसी की सजा सुना दी गई तो अफजल को सूली पर टलकाने में आठ साल क्यों लगे ? क्यों नहीं उसी समय फांसी दी गई ? हम सब जानते हैं कि संसद पर हमले से पूरे देश में गुस्सा था, खुद अफजल ने अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। उस वक्त फांसी दी जाती तो देश में सकारात्मक संदेश जाता और इस मुद्दे पर सियासत नहीं होती। आज अफजल का मुद्दा सियासी बन गया है, जिसके लिए सरकार का रवैया जिम्मेदार है।

मैं बात राष्ट्रपति के अधिकार यानि दया याचिकाओं के निस्तारण की भी करुंगा, लेकिन पहले छोटी सी बात अफजल गुरु की फांसी और उसके शव को लेकर हो रही सियासत की भी कर ली जाए। आजकल देख रहा हूं कि तमाम न्यूज चैनलों पर रंगीन खादी का कुर्ता, सदरी और टेढ़ी मेढ़ी दाड़ी रखे कुछ मानवाधिकार की बात करने वाले समाजसेवी डेरा जमाए रहते हैं और वो एक अलग ही राग अलापते फिर रहे हैं। खुद को ये साबित करने के लिए कि वो बड़े भारी चिंतक हैं, इसलिए हाथ में पेंसिल भी घुमाते रहते हैं, जबकि उनके सामने कागज या कापी तक नहीं होती है। कहते क्या हैं, जानते हैं ? इन्हें बहुत पीड़ा है कि अफजल को फांसी देने के पहले उसे उसके परिवार से नहीं मिलाया गया। व्यक्तिगत रूप से मेरी राय भी है कि मिला दिया जाता तो अच्छा था, लेकिन नहीं मिलाया तो जितनी हाय तौबा मची हुई है, उसकी जरूरत नहीं है। ये आतंकवादियों का मास्टर माइंड था, जब हम इसका चेहरा देखते हैं तो हमें संसद हमले में शहीद हुए जांबाज सैनिकों और उनके परिवारों की सूरतें भी याद आती हैं। क्या इस आतंकवादियों की मास्टरमाइंड ने पहले सबको बताया था कि आज संसद पर हमला होगा और इतने लोग मारे जाएंगे, सब लोग अपने घर वालों से मिलकर ड्यूटी पर आना। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कुछ ऐसा कर दिया गया कि इतना गला फाड़ कर चिल्लाया जाए।

एक बात मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं। आज मांग हो रही है कि अफजल का शव उसके परिवार वालों को सौपा जाए। ये मांग कश्मीर की सरकार से लेकर वहां की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां तक कर रही हैं। अगर किसी वजह से सरकार ने लचीला रुख अपनाया और ऐसा किया तो सरकार  कश्मीर के मामले में अब तक की सबसे बड़ी गलती करेगी। कश्मीर के नेताओं के जिस तरह से बयान आ रहे हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि जैसे  अफजल गुरु आतंकवादियों का मास्टर माइंड ना होकर कोई इनका धर्मगुरू था। फिर देश की दो कौडी की राजनीति और राजनेताओं का कोई भरोसा नहीं है, ये कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। पता चला कि कोई मुख्यमंत्री शपथ लेते ही अफजल गुरू को शहीद का दर्जा दे और उसकी कब्र पर जाकर फूल माला चढ़ाए। अफजल की कब्र पर सियासत शुरू हो सकती है। हमें अमेरिका की कुछ चीजें याद रखनी चाहिए। ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद अमेरिका ने उसके शव को समुद्र में दफन कर दिया। उसने ये विवाद ही खड़ा नहीं होने दिया कि शव कौन दफनाएगा ? कहां दफनाया जाएगा? शव उसके परिवार को सौंपा जाएगा या नहीं? शव को समुद्र में दफन कर सभी विषय एक ही रात में खत्म कर दिया। यहां क्या हो रहा है पूरा देश देख रहा है। हमें लगता है कि आतंकवादियों के मामले में अगर कोई भी व्यक्ति, संस्था या समाज उसकी पैरोकारी करे और एक साजिश के तहत विवाद खड़े करे, तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

मुझे महामहिम लोगों से भी शिकायत है। बहुत बड़ी-बड़ी बहस हुआ करती है कि देश की अदालतों में लाखों मामले लंबित है। मुकदमों की सुनवाई नहीं हो पा रही है। देश के लोगों को कोर्ट कचहरी का कई-कई साल चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। लेकिन इस बात पर कभी बहस नहीं होती कि आखिर ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अपना कीमती वक्त जाया कर मामलों की सुनवाई करता है, और सजा सुनाता है। फिर खुंखार अपराधी एक दया याचिका लगाकर सरकार पर, देश पर और जेल पर बोझ बना रहता है। आखिर महामहिम लोगों के पास ऐसे कौन से काम होते हैं जो दया याचिकाओं का निस्तारण नहीं कर पाते हैं। वैसे भी इस मामले में ज्यादातर तो सरकार के फैसले पर ही राष्ट्रपति को मुहर लगानी होती है, फिर ये बात समझ से परे है कि दया याचिका कई साल तक लंबित रहे। अफजल गुरू का मामला राजनीति में तब्दील हो जाने की एक बड़ी वजह पूर्व महामहिम भी रहे हैं। इस मामले का समय से निस्तारण हो जाता तो बीजेपी इसे मुद्दा ना बना पाती। अब अफजल को फांसी देकर सरकार और कांग्रेस नेता जिस तरह सीना तान रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि उन्होंने आतंकवादियों को संदेश देने की नहीं बल्कि बीजेपी को संदेश देने की कोशिश की है।

अच्छा ये एक संवेदनशील मामला था, इस पर फूंक फूंक कर कदम रखने की जरूरत थी और है। लेकिन इन खबरिया चैनलों का क्या किया जाए ? यहां कुछ भी अलंतराणी चलती रहती है। टीवी चैनलों पर जिस तरह हर मुद्दे पर बहस हो रही है, उससे लगता है कि चैनलों में " महाज्ञानी " बैठे हैं, जिन्हें सब कुछ पता है। अच्छा चैनलों की भीड़ की वजह से अब पढ़े लिखे और समझदार नेताओं ने टीवी से किनारा कर लिया है, घिसे पिटे नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और रिटायर पत्रकार चैनल के माध्यम से एक विचार थोपने की कोशिश करते हैं। मेरा मानना है कि अधकचरे विचार आतंववाद और आतंकवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। अब आज कल देश में बुद्धिजीवियों की बुद्धि मापने का कोई निर्धारित पैमाना तो है नहीं। तमाम सामाजिक संस्थाओं की कमान चोट्टों के हाथ में है। लेकिन हमारी आपकी मजबूरी है कि उनके नाम सामाजिक संस्था का पंजीकरण है, तो उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता तो कहना ही पड़ेगा। बहरहाल बिना मांगी राय का कोई मतलब नहीं है, लेकिन मैं न्यूज चैनल के रहनुमाओं से कहना चाहता हूं कि " वो टाक शो " तत्काल प्रभाव से बंद कर दें। इसका कोई सकारात्मक प्रभाव ना चैनल पर पडता है और न ही समाज पर कोई असर होता है। फुंके हुए कारतूस दोबारा नहीं चलाए जा सकते, इन पर दांव लगाना बेमानी है और जनता के साथ धोखा भी। न्यूजरूम को नेता और सामाजिक कार्यकर्ता बनाने का काम छोड़ना होगा।     


चलते - चलते :
बहुत बात हो रही है कि अफजल और कसाब को फांसी हो गई, लेकिन अब क्या होगा ?  मित्रों माफ कीजिएगा प्रसंगवश मुझे ये बात कहना पड़ रहा है कि दो मुसलमानों को फांसी देने के बाद अब सरकार की औकात नहीं है कि तीसरी फांसी भी किसी मुसलमान को दी जाए। अब कुछ हिंदुओं को फांसी पर लटकाया जाएगा और वो भी जल्दी। इंतजार कीजिए, जल्दी मिलेगी खबर।


Wednesday, 21 November 2012

देश अभी शर्मिंदा है, अफजल गुरु जिंदा है !


आज बात तो करने आया था महाराष्ट्र सरकार के उस शर्मनाक फैसले की, जिससे उसने देश के एक बड़े तपके के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। यानि शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे का निधन हो जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से किए जाने का ऐलान कर। इस पर विस्तार से बात होगी लेकिन पहले बात करते हैं आतंकी अजमल कसाब की, जिसे फांसी देकर केंद्र सरकार ने दुनिया को दिखाया कि आतंकवाद से लड़ने की मजबूत इच्छाशक्ति सरकार मे हैं। वहीं संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु के मामले में आज तक फैसला ना होने से राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय को जनता कटघरे में खड़ा कर रही है। तीसरी मौत के बारे मे शायद उत्तर प्रदेश के बाहर रहने वाले ना जाने, लेकिन राजनेताओं को उंगली पर नचाने वाला शराबमाफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति विवाद में गोली से उड़ा दिया।

चार साल पहले पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से 10 आतंकी समुद्री मार्ग से मुंबई पहुंचे और उन्होंने खून की होली खेलनी शुरू कर दी। इन आतंकियों ने किस तरह मुंबई को हिलाया ये सब आपने टीवी पर देखा है। आपको  पता है कि नौ आतंकियों को हमारे जवानों मे मार गिराया था, जबकि एक आतंकी अजमल कसाब को जिंदा पकड़ने में हमारी फौज कामयाब रही। कसाब का ट्रायल शुरू हुआ, पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि वो पाकिस्तानी है और उसने जो पता बताया वहां भी स्थानीय लोगों ने स्वीकार किया कि कसाब इसी गांव का रहने वाला है। इन सबके बावजूद पाकिस्तान सरकार ने साफ इनकार कर दिया कि कसाब पाकिस्तानी है। बहरहाल पड़ोसी मुल्क का होने के बाद भी कसाब के मामले की अदालत में सुनवाई हुई और जिस तरह एक भारतीय को अपना बचाव करने का हक है, वो सारी सहूलियतें कसाब को दी गई। निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा मिलने के बाद आखिर में राष्ट्रपति के यहां कसाब ने दया याचिका पेश किया। इसी 5 नवंबर को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उसकी याचिका खारिज कर दी और आज यानि 21 नवंबर को सुबह 7.36 पर उसे फांसी पर लटका दिया गया।

आतंकवादियों के इस हमले में मुंबई में 166 लोगों ने जान गवांई थी। इस आतंकी घटना के बाद से ही हमले में मारे गए लोगों के परिजन लगातार मांग कर रहे थे कि कसाब को फांसी दी जाए, लेकिन सरकार कोई भी फैसला भावनाओं के आधार पर नहीं करना चाहती थी, उसने न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए उसे फांसी पर लटकाया। पहले से तय था कि कसाब को फांसी देने के बाद देश में एक बड़ा सवाल उठेगा कि कसाब तो सिर्फ एक मोहरा था, उसे कब फांसी होगी जो ऐसी घटनाओं का मास्टर माइंड है। इशारा साफ है कि संसद पर हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू को फांसी कब होगी ? ये सवाल पहले भी उठता रहा है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट से भी अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, फिर अफजल कैसे जिंदा है। आपको पता है कि अफजल की दया याचिका भी राष्ट्रपति के पास लंबित है।

कसाब को फांसी के मामले में केंद्र महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह से तालमेल दिखाया, देश में अपनी तरह की ये पहली ही कार्रवाई है। 19 अक्टूबर को गृहमंत्रालय ने कसाब की फाइल राष्ट्रपति के यहां भेजी, राष्ट्रपति ने महज 15 दिन यानि पांच नवंबर को दया याचिका खारिज करते हुए फाइल गृहमंत्रालय को वापस भेज दी, सात नवंबर को गृहमंत्रालय ने इस पर फांसी की मुहर लगा दी और आठ नवंबर को ये फाइल महाराष्ट्र भेजी गई। इस फाइल में 21 नवंबर को फांसी देने की तारीख तय कर दी गई थी। 19 नवंबर को कसाब को मुंबई से पुणे ले जाया गया और आज यानि 21 को फांसी दे दी गई। इस मामले में पूरी तरह गोपनीयता बरतने के लिए इसे आपरेशन X नाम दिया गया। यहां तक की अफसर कसाब को मेहमान के संबोधन से आपस में बात कर रहे थे, जिससे किसी को कानोंकान खबर ना हो कि किस मामले में बात हो रही है।

राष्ट्रपति भवन पर सवाल ! अफजल गुरु की दया याचिका का निस्तारण ना होने से आम जनता  में तो हैरानी है ही, राजनीतिक दल भी लगातार इस मामले में केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। कुछ समय पहले कहा गया राष्ट्रपति भवन में अफजल गुरु के मामले में फैसला लेने से पहले 17 और दया याचिकाओं का निस्तारण किया जाना है। खुलकर तो ये बात नहीं कही गई थी, लेकिन इशारा यही था कि जब अफजल की बारी आएगी तो उसके मामले में भी फैसला लिया जाएगा। इसके बाद लोग निराश थे, क्योंकि सभी को लग रहा था कि जब अफजल गुरु को कई साल पहले  फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है और उसे आज तक फांसी नहीं दी जा सकी है तो भला कसाब को कैसे फांसी दी जा सकती है ? लेकिन कसाब की फांसी पर इतनी जल्दी फैसला लिया गया और बिना देरी उसे फांसी पर लटका भी दिया गया, इससे तो साफ हैं कि अगर सरकार की इच्छाशक्ति मजबूत हो तो, फैसला लेने में कोई मुश्किल नहीं है। यही वजह है कि आज कसाब को फांसी दिए जाने के बाद संसद पर आतंकी हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को फांसी देने की मांग जोर पकड़ रही है। हालाकि देखा जा रहा है कि गुरु को फांसी देने का मामला आसान नहीं है, वजह साफ है, ये मामला सियासी ज्यादा हो गया है।

 कसाब को फांसी के बाद क्या ? मुझे लगता है कि पाकिस्तान और आतंकवादियों में इसकी प्रतिक्रिया स्वाभविक है। पहला तो जो संदेश आ रहा है, उससे तो लगता है कि पाकिस्तान में भारतीय बंदी सरबजीत की रिहाई कुछ दिन लटक सकती है। अगर वो सरबजीत के साथ कुछ ऐसा वैसा भी करें तो मुझे हैरानी नहीं होगी। इसके अलावा हमें आपको पहले से ज्यादा सावधान रहने की भी जरूरत होगी, क्योंकि आतंकवादी भी प्रतिक्रिया में कुछ बड़ी घटनाओं को अंजाम देने की साजिश कर सकते हैं। इसके अलावा मुझे लगता है कि पाकिस्तान की क्रिकेट टीम का भारत दौरा एक बार फिर लटक सकता है। वैसे भी जब दिल में एक दूसरे मुल्क के प्रति नफरत भरी हो तो क्रिकेट तो होना भी नहीं चाहिए। बहरहाल कसाब को फांसी दिए जाने के बाद अगर पड़ोसी मुल्क ने प्रतिक्रिया के तौर पर कुछ भी किया तो निश्चित ही इसका परिणाम गंभीर होने वाला है।

हां-अब बात बाल ठाकरे की :  मेरा महाराष्ट्र की सरकार से एक सवाल है। शिवसेना सुप्रीमों का कोई एक ऐसा काम बताएं जो उल्लेखनीय हो, राष्ट्रहित में हो। फिर ठाकरे किसी पद पर भी नहीं रहे, ऐसे में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से करने का ऐलान क्यों किया गया ? क्या महाराष्ट्र की सरकार को अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं था ? क्या सरकार डरी हुई थी कि ठाकरे की मौत के बाद मुंबई के हालात को काबू में करना मुश्किल होगा ? मैं बहुत गंभीरता से कहना चाहता हूं कि जिन शिवसैनिकों ने मुंबई की कानून व्यवस्था को लेकर सरकार की नाक में दम कर दिया हो, उसकी अगुवाई करने वाले को आखिर तिरंगे में कैसे लपेटा जा सकता है ? मुंबई आने वाले उत्तर भारतीयों की जो लोग पिटाई का ऐलान करते हो, जो निर्दोष आटो चालकों पर हमला कर उनके पैसे छीन लेते हों। ऐसे लोगों के साथ सरकार की इतनी सहानिभूति आखिर क्यों ?

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि मराठी मानुस की बात कर उत्तर भारतीयों को मुंबई छोड़कर जाने को कहने का ऐलान कर हिंसा फैलाने वालों को भला राजकीय सम्मान कैसे दिया जा सकता है ? सच्चाई तो ये है कि ठाकरे ना कभी लोकतंत्र के हिस्सा रहे और ना ही उनका लोकतंत्र में कभी भरोसा रहा है। वे खुद कहते थे कि वो शिवशाही पर विश्‍वास करते हैं, लोकशाही पर नहीं। वो एक ऐसे व्‍यक्ति थे जो ऐक्‍शन की बात करते थे। हम कहते हैं कि हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन कोई व्‍यक्ति जिसने कभी लोकतंत्र को माना ही नहीं उसके बारे में आप क्‍या कहेंगे। अब किसी के लाखों अनुयायी होने का मतलब यह नहीं कि व्‍यक्ति के शरीर को हम तिरंगे में लपेट दे। उनकी राजनीति ही देश को तोड़ने वाली रही है। मसलन हमारा संविधान कहता है कि हर व्‍यक्ति को देश के किसी भी स्‍थान पर रहने और काम करने का अधिकार है, जबकि ठाकरे हमेशा संविधान की इस धारा के विरोध में रहे। उन्‍होंने मुंबई में बाहरी लोगों का हमेशा विरोध किया। उनकी राजनीति की शुरुआत कम्‍युनिस्‍टों को मुंबई से खदेड़ने से हुई और फिर उन्‍होंने उत्तर भारतीयों का मुंबई में जीना मुहाल कर दिया।

ठाकरे की मौत के बाद महाराष्ट्र सरकार को घुटनों पर देखकर वहां लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। डर का आलम ये कि लोगों ने अपनी दुकानें तक नहीं खोलीं। अब इस बंद को लेकर सोशल साइट फेसबुक पर एक बेटी ने बंद का औचित्य पूछ लिया तो उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मुझे जानना है कि महाराष्ट्र में ये कौन सी सरकार काम कर रही है। आतंकी सिर्फ वही नहीं है जो पाकिस्तान से आया हो, आतंकी वो भी है, जिसकी वजह से लोग शांति से रह ना पाएं। शिवसैनिक भी किसी आतंकी से कम नहीं है। वो सभी आतंक के मास्टर माइंड हैं तो इन्हें गुमराह करते हैं।

आखिर मे मैं केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और कांग्रेस से जानना चाहता हूं कि अगर उन्होंने शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे को राजकीय सम्मान देकर पुलिस की सलामी दिलाई है तो क्या ये माना जाए कि आप सब उनकी सोच और विचारधारा का भी समर्थन करते हैं। आप सबका भी यही मानना है कि मुंबई से उत्तर भारतीयो को खदेड़ दिया जाना चाहिए । इस मामले में अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए।

चलते - चलते
इसी हफ्ते एक और गंभीर घटना हुई। उत्तर प्रदेश के एक बड़े शराब माफिया पांटी चढ्ढा को उसके ही भाई ने संपत्ति के विवाद में गोलियों से छलनी कर दिया, हालाकि पांटी के लोगों ने वहीं उसके भाई की भी  हत्या कर दी। पांटी चढ्ढा का जिक्र इसलिए करना जरूरी था कि ये वो सख्श है कि जिसके इशारे पर सूबे की सरकार नाचती है। सरकार चाहे किसी पार्टी की हो, सब पर पांटी बहुत भारी था। धीरे धीरे इसका प्रभाव उत्तराखंड और पंजाब में भी बढ़ता जा रहा था।