Monday, 4 June 2012

इस अन्ना से बहुत बड़ा है वो अन्ना ... ( पार्ट 2 )


रालेगन सिद्दि में एक अन्ना नहीं है बल्कि अन्ना ही अन्ना हैं। जब तक मैं रालेगन सिद्दि नहीं गया था तो मुझे तो लगता था कि अन्ना गांधीवादी हैं इसलिए टोपी पहनते हैं, पर ऐसा नहीं हैं। उनके गांव में 90 फीसदी लोग टोपी पहनते हैं। टोपी वहां के पहनावे में शामिल है। वैसे आपको बता दूं कि इन टोपी वालो से दूरी बनाए रखना ही ज्यादा बेहतर हैं, क्योंकि मौका मिलते ही ये दूसरों को टोपी पहनाने से नहीं चूकते। मसलन अगर आप ने किसी टोपी वाले से गांव के बारे मे कुछ बात कर ली और उसने आपको पांच दस मिनट गांव के बारे में बताया तो अगले ही पल वो आप से पैसे की मांग करेगा। आप हैरान होकर उसे देखते रह जाएगे।
छोटा सा वाकया बताता हूं, मुझे रालेगन सिद्दि के बगल वाले गांव में एक सामाजिक कार्यकर्ता से मिलना था, मैने टोपी वालों से रास्ता पूछा तो तीन टोपीवाले मेरी कार में सवार हो गए और कहा चलिए मैं पहुंचा देता हूं। मुझे लगा कि ये कितने शरीफ लोग हैं, इतनी मदद कर रहे हैं, खुद वहां पहुंचा रहे हैं। बहरहाल मैं उनके घर पहुंचा, वो घर पर थे नहीं थे, हम वापस रालेगन सिद्धि आ गए। बगल वाले गांव की दूरी पांच किलोमीटर से भी कम रही होगी। हम आधे घंटे से भी कम समय में वापस आ गए, पर जब ये टोपी वाले कार से उतरे तो तीनों ने सौ सौ रुपये की मांग की। मैं हैरान हो गया कि ये क्या कह रहे हैं ये लोग, पर उन्होंने कहाकि हम फोकट यानि बिना पैसे के क्यों आपके साथ दूसरे गांव जाएंगे। बहरहाल मैं दो सौ रुपये उन्हें थमाकर चलता किया।
सदाशिव महापारी
आइये अब बात करते हैं किशन बापट बापूराव हजारे यानि अन्ना की। अन्ना का शुरुआती जीवन बहुत ही विवादित रहा है। गरीबी के चलते अन्ना की पढाई अपने पिता के साथ महज चौथी क्लास तक हुई, बाद में अन्ना को उनकी बुआ ने गोद ले लिया और अन्ना मुंबई आ गए। बुआ के घर रहकर अन्ना ने सातवीं तक पढाई की। बुआ का परिवार भी अभावग्रस्त था, लिहाजा अन्ना दादर के पास फूल बेचने लगे। इससे वो 40-50 रुपये महीने कमाने लगे। लेकिन इस दौरान वो गलत संगत में पड़ गए और युवा अवस्था की जितनी बुराइयां होती है, वो सब अन्ना के अंदर आ गई। सच तो ये है कि अन्ना की इमेज एक गलीछाप गुडे की बन गई। लड़ाई, झगड़ा मारपीट, सिनेमा हाल के बाहर टिकट की ब्लैकमेलिंग इन्हीं सब में अन्ना का समय बीतता रहा। 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान देश में नवजवानों से अपील गई कि वो सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करें। उसी दौरान अन्ना सेना में भर्ती हो गए पर उन्हें ट्रक ड्राईवर का काम मिला। अन्ना की सेना से वापसी कैसे हुई ? इसे लेकर विवाद है, कुछ लोग अन्ना को सेना का भगोड़ा बताते हैं, कुछ का कहना है कि उन्होंने पूरी नौकरी की और उसके बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। बहरहाल सच तो अन्ना ही जानें, लेकिन ज्यादा लोगों का कहना है कि अन्ना सेना से भाग कर ही यहां आए। अन्ना लगातार विवादों में रहे हैं। नौकरी के पहले के तमाम मामलों की छानबीन करती हुई पुलिस अक्सर अन्ना को तलाशती हुई इनके गांव आ जाती थी, बताया गया कि आर आर पाटिल से अच्छे संबंध होने के कारण इनके सभी मामलों का निस्तारण हो गया।
यही वो मंदिर है जहां अन्ना रहते हैं....
सच ये है कि अन्ना पुलिस से बचने के लिए ही मंदिर में शरण लिए हुए थे। पुलिस आती थी तो गांव के लोग इनका बचाव किया करते थे कि वो तो मंदिर में पड़ा रहता है, मंदिर में ही सेवाकार्य करता है। ये कहकर अन्ना को पुलिस से बचा लिया करते थे। खैर अब ये सब बातें पुरानी हो चुकी है। आइये अब मैं आपको मिलवाता हूं गांव के उस अन्ना से जिसकी सब आज भी बहुत रिस्पेक्ट करते हैं और गांव के विकास में जिनका अन्ना से कई गुना हाथ है। इनका नाम है सदाशिव महापारी। सदाशिव 1964 से लगातार 1995 तक गांव के सरपंच रहे हैं। गांव का कोई भी काम हो, सदाशिव सबसे आगे रहे हैं या फिर कहें कि गांव का विकास इन्हीं की देन है तो गलत नहीं होगा। कुछ मामलों का जिक्र करते हैं। गांव में स्कूल बनाने की बात हुई तो सदाशिव ने अपनी जमीन तो दी ही, लोगों को भी इसके लिए तैयार किया। बिल्डिंग बनाने का खर्च भी सदाशिव ने उठाया। शुरुआत में स्कूल में बहुत कम बच्चे थे, तो 50 बच्चों और 10 शिक्षकों को गांव में ही रखकर सदाशिव ने अपने घर से इनके खाने पीने का इंतजाम कई साल तक किया। जब छात्रावास की बात हुई तो अन्ना ने कहाकि पैसे कहां से आएंगे, ये कहकर वो इसका विरोध करते रहे। इन सबके बाद भी सदाशिव ने स्कूल मे पूरा फर्नीचर और बिल्डिंग बनवाने में सरकारी मदद से कई गुना ज्यादा पैसा अपने घर से लगाया। स्कूल को कुछ समय बाद मान्यता मिल गई, लेकिन थोड़े से पैसे सरकार की ओर से मिलते थे, जबकि कागजी खानापूरी इतनी ज्यादा करनी होती थी कि ऊब कर सदाशिव ने मान्यता ही वापस कर दी। नशावंदी के मामले में पहले ही बता चुका हूं कि सदाशिव ने इसमें अहम भूमिका निभाई।
गांव के लोग तो सदाशिव को ही असली अन्ना कहते हैं। लगभग 32 साल से भी ज्यादा समय तक गांव के सरपंच रहने की वजह से हर काम की शुरुआत वही किया करते थे। इस परिवार की इतनी मान्यता है कि आज भी गांव के सरपंच उनके बेटे जयसिंह महापारी हैं। अन्ना पहले जब भी किसी जनसभा या मीटिंग में बोलते थे तो गांव के विकास का पूरा श्रेय  सदाशिव महापारी को दिया करते थे। लेकिन अब अन्ना ऐसा नहीं करते। अब वो अपनी प्रशंसा सुनने के आदि हो गए हैं। हालाकि गांव में अभी भी ये हालत है अगर अन्ना श्रमदान की अपील करते हैं तो 40-50 लोग जमा होते हैं,जबकि महापारी की अपील पर छह सात सौ लोग जमा हो जाते हैं। सदाशिव के सरपंच रहने के दौरान कभी कोई मामला थाने में पंजीकृत नहीं हुआ, लेकिन अब किसी विवाद को लेकर लोग अन्ना के पास जाते हैं, तो वो मामला सुलझाने के बजाए वो लोगों को पुलिस के पास भेज देते हैं।
रालेगन सिद्दि में बना स्कूल 
मैं चाहता हूं कि आप सबको जब भी मौका मिले एक बार अन्ना के गांव जरूर जाएं। अन्ना हर सभा में दावा करते हैं कि वो तो एक मंदिर में रहते हैं, खाने के लिए प्लेट है, एक बिस्तर है। जब ये सुनता हूं तो हंसी आती है। इस मंदिर परिसर में आम लोगों के आने जाने पर रोक है। इसमें सात आठ बहुत ही आलीशान कमरे बने हैं। हर तरह की सुख सुविधा यहां उपलब्ध है। इस पद्मावती मंदिर के भीतर हुए निर्माण पर सरकार के डेढ करोड़ से ज्यादा खर्च हुए हैं, और अभी भी तमाम तरह का निर्माण चल रहा है। अन्ना जिस तरह से मुंह बनाकर कहते हैं कि मैं तो एक मंदिर में रहता हूं, ऐसा लगता है कि वो किसी सड़क छाप मंदिर के बरामदे मे पड़े रहते हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि ये अन्ना बनावटी ज्यादा है, इनका रहन सहन बहुत शानदार है।
अन्ना गांव के ईमानदार लोगों के साथ उठना बैठना पसंद नहीं करते। वो जिस सुरेश पढारे के साथ रहते हैं, हालत ये है कि गांव का एक भी आदमी उसे देखना नहीं चाहता। दरअसल सुरेश एक ठेकेदार रहा है। गांव के स्कूल के नाम पर दो हजार से ज्यादा ट्रक रेत उसने खुले बाजार में बेच दिया। इस पर ग्राम सभा की मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में सुरेश पढारे पर लगे आरोपों को सही पाया गया और सर्वसम्मत से तय किया गया कि आज से कोई भी काम सुरेश पढारे से नहीं कराया जाएगा। इस मीटिंग में अन्ना खुद मौजूद थे। अब सुरेश से काम वापस ले लिया गया, लेकिन अन्ना अगले ही दिन ही उसे गले लगा लिया। आज भी अन्ना का वो सबसे करीबी है। ना ज्यादा खेतीबाडी और ना ही कोई काम। टीम अन्ना दुनिया भर से हिसाब मांगती रहती है, कभी सुरेश पढारे से भी हिसाब मांगे कि उसके हाथ इतने मंहगे मोबाइल एक मजबूत बैंक बैलेंस कहां से है। गांव में एक भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन न्यास है। कहने को तो ये भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई करता है। लेकिन इसकी गतिविधियों पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। आरोप तो यहां तक है कि ये महज ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा बनकर रह गया है। इसके एक पदाधिकारी हैं अनिल शर्मा, ये भी अकूत संपत्ति के मालिक हैं। ये भी पूरे गांव वालों की आंखो की किरकिरी बने हुए हैं, पर अन्ना जी का आशीर्वाद है।
बहरहाल अन्ना के बारे में जिस तरह से हवा बनाई गई, ऐसे में किसी भी जीवंत आदमी के मन में सवाल उठना लाजिमी हैं, इन्हीं सवालों को तलाशता हुआ मैं पहुंचा था रालेगाव सिद्धि। आप हैरान होंगे ये जान कर कि गांव के लोग अन्ना से डरते हैं। नाम का खुलासा करुंगा तो उस आदमी की मुसीबत हो जाएगी, लेकिन उसने बताया कि यहां जो लोग सिर उठाने की कोशिश करते हैं, उन्हें पुलिस से पिटवाया जाता है। इतना ही नहीं अन्ना ने गांव में जिस तरह का विवाद पैसा कर रखा है, ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दे, लेकिन सच यही है कि उनके ना रहने पर इस गांव में खून खराबे को कोई नहीं रोक सकता। इन सबके पीछे वजह सम्पत्ति पर कब्जे की होगी। मुझे लगता है कि अन्ना हजारे को इस मामले को बहुत ही गंभीरता से लेनी चाहिए, जिससे ऐसा ना हो कि उनके बाद गांव में खून की होली होती रहे। फिर ऐसा भी नहीं है कि विवादों के बारे में अन्ना को जानकारी नहीं है, उन्हें सब जानकारी है, लेकिन मुश्किल ये है कि उन्हें निष्पक्ष और ईमानदार होना पड़ेगा।

शाम होते ही टल्ली हो जाता है अन्ना का गांव ... ( पार्ट 1)
 

34 comments:

  1. अन्ना जी हमेशा विवादित रहें और आज भी है,रालेगन सिद्दि गाँव की बृहद जानकारी देने के लिये बहुत२ आभार,,,,,

    RECENT POST .... काव्यान्जलि ...: अकेलापन,,,,,

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  2. दुःख तो इस बात का है कि इस देश में जब भी कुछ ऐसा होता है तो लोग आँख मूंद कर उसके पीछे चल पड़ते हैं और जब पढ़े लिखे व्यक्ति ऐसे लोगों का अनुसरण करते हैं तो बात और भी गंभीर हो जाती है ...आपके लेखन का कोई जबाब नहीं .....!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया भाई केवल राम जी

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  3. "आपको बता दूं कि इन टोपी वालो से दूरी बनाए रखना ही ज्यादा बेहतर हैं, क्योंकि मौका मिलते ही ये दूसरों को टोपी पहनाने से नहीं चूकते।"
    वाह...
    क्या बात है...!

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    1. शास्त्री जी आप बिल्कुल अन्यथा मत लीजिएगा, पर रालेगन के टोपी वालों से बचे रहना ही ठीक है....

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  4. समझ नही आता क्या कहूँ........????

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    1. जी,
      सच है, जब ऐसे आदमी की हकीकत सामने आती है, जिस पर देश भरोसा करता है तो कुछ भी कहना आसान नहीं होता।

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    1. ब्लाग बुलेटिन में शामिल कर इस लेख को औरों तक पहुंचाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

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  6. आँखों देखी रिपोर्ट पढ़ अब किसी पर विश्वास करने का मन नहीं ..... गज़ब की पोस्ट

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  7. कई पर्दों के पीछे का सच खोजना और हम तक पहुंचाना ... आभार...

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  8. हम तो भाई आँखों देखी आपकी कलम से ही देख लेते हैं ...

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    1. जी प्रणाम, बहुत बहुत आभार

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  9. Kafi achchi jankaari di aapne.... Anna ke baare me, lekin ek sawal aapse bhi hai ki jab aaj ke daur me ek kalam ka sipahi dhang se apni rozi_Roti nahi chala pata to aap ek swatantra ptrakar hote huye itna lamba kharch utha kar raale ganv gaye.... Kuch samajh me nahi aata.... ek Repoter ke pass itna paisa, jabki salary ke naam par kuch gine chune hi paise haath aate hain... Aap sanka ka Niwaran jarur karen....

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    1. दरअसल आप लोगों की पढ़ने लिखने की आदत ही छूट गई है लगता है। मित्र आपको ये किसने कहा कि मैं स्वतंत्र पत्रकार हूं। आप अगर मेरे प्रोफाइल को ही पढ़ लेते तो ऐसे सवाल नहीं करते......।

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  10. बहुत सही कहा है आपने इस प्रस्‍तुति में ...

    कल 06/06/2012 को आपके ब्‍लॉग की प्रथम पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' क्‍या क्‍या छूट गया ''

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  11. महेंद्र जी आपकी मेहनत और खोज के लिए बहुत-बहुत बधाई। मैं तो शुरू से ही लगातार अन्ना हज़ारे की पोल अपने ब्लाग मे खोलता रहा हूँ तब महामहिम मनोज कुमार जी,डॉ दराल साहब,जैसे वरिष्ठ ब्लागर्स ने खुल कर मेरी निंदा की थी। एक ब्लागर ने तो मुझे बंगाल की खाड़ी मे डुबो देने की धम्की दी थी। आपने लोगों को सही राह समझा दी ,आप धन्यवाद के पात्र हैं।

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    1. हाहाहहाहाहहा यानि अगर मैं सबकी पसंद की बात ना करके सच्चाई लिखू तो यहां ऐसे लोग भी हैं जो बंगाल की खाड़ी में डुबो देगें।

      खैर ऐसा कहने वालों की सोच को देखकर उन्हें माफ कर दीजिए। मेरा मानना है कि ऐसे लोगों की अज्ञानता दूर करने के लिए उन्हे सच के करीब आना तो होगा। अगर मुझे बंगाल की खाड़ी में डुबोने की बात करे, तो मैं उसके साथ दिल्ली से बंगाल की खाड़ी जाने को तैयार हो जाऊंगा, क्योंकि मुझे पक्का यकीन है कि रास्ते में वो मेरी सच्चाई से वाकिफ होकर अपना इरादा बदल देगा।

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  12. बहुत बहुत साधुवाद... लीक से हट कर आपने जो किया.

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  13. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी लगाई जा रही है!
    सूचनार्थ!

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  14. साधारण शब्दों में लिखा गया अन्ना का कड़वा सच ...एक आम इंसान को महान बनाने में हम जैसी मूर्ख जनता सबसे आगे हैं ...एक क्या १०० अन्ना और आ जाएंगे ...ऐसी ही जनता के बल पर ...उनका विश्वास छलने को .....

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  15. अन्ना और रालेगन सिद्धि का सच पढकर हतप्रभ हूँ. अन्ना के आंदोलन का कुछ सच तो मैं भी जंतर मंतर में देख कर आयी थी. यूँ लगा जैसे सिर्फ अन्ना के समर्थक और गैर कांग्रेसी ही ईमानदार हैं, बाकी सब भ्रष्ट हैं. आना का आंदोलन सिर्फ कांग्रेस विरोधी ही रह गया है, इन्हें भ्रष्टाचार से कोई मतलब नहीं है और न देश से. बहुत दुखद है कि अन्ना इतनो को धोखा दे रहे, फिर भी लोग कुछ नहीं कर रहे बल्कि समर्थन में जाकर धरना पर बैठ रहे. अन्ना का सारा सच आपने बता दिया है, कम से कम इतना तो होगा कि एक नए भ्रष्टाचारी को और पनपने से कुछ तो रोका जा सकेगा. तथ्यपरक आलेख के लिए धन्यवाद.

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  16. जो है नामवाला वही तो बदनाम है ।

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  17. शुभकामनायें देश को ...

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  18. महेंद्र जी , इस खोजी लेख के लिए धन्यवाद् , मगर एक बात समझ में नही आई ! अगर अन्ना नौकरी से पहले इतने उपद्रवी थे (जैसा आपने बताया ) तो किरण वेदी , केजरीवाल , बालकृष्ण आदि के मामले खोज खोज कर लाने वाली यूपीए सरकार अन्ना के इन मामलो को क्यों उजागर नही कर पाई ? जबकि अखबारों से पता चला की सरकार ने तो अन्ना की नौकरी का रिकार्ड भी छाना था . महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ जब अन्ना ने अनशन रखा था , तो तब भी वे अन्ना के खिलाफ कुछ नही खोज पाए ?

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    1. लेख को पूरी तरह पढे, उसमें साफ है कि आर आर पाटिल ने इनके सभी मामलों को रफा दफा करा दिया। वरना गांव में अक्सर पुलिस आती थी इन्हें पकड़ने के लिए।

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।