Thursday, 16 June 2011

गांव गया था,गांव से भागा..


मित्रों एक ऐसे आदमी को लेकर 20 दिन से हम सभी उलझे हुए थे, जो बात ईमानदारी की कर रहा था, लेकिन खुद इससे काफी दूर था। अब पिछले 20 दिन को देखता हूं तो लगता है कि बेवजह समय बर्बाद कर रहा था। खैर आप लोग भी ऊब गए होंगे। आइये आज आपको इलाहाबाद के जाने माने की कवि स्व. कैलाश गौतम की एक रचना से रुबरू कराता हूं। मुझे उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 रामराज का हाल देखकर
 पंचायत की चाल देखकर
 आँगन में दीवाल देखकर
 सिर पर आती डाल देखकर
 नदी का पानी लाल देखकर
 और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 सरकारी स्कीम देखकर
 बालू में से क्रीम देखकर
 देह बनाती टीम देखकर
 हवा में उड़ता भीम देखकर
 सौ-सौ नीम हक़ीम देखकर
 गिरवी राम-रहीम देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 जला हुआ खलिहान देखकर
 नेता का दालान देखकर
 मुस्काता शैतान देखकर
 घिघियाता इंसान देखकर
 कहीं नहीं ईमान देखकर
 बोझ हुआ मेहमान देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 नए धनी का रंग देखकर
 रंग हुआ बदरंग देखकर
 बातचीत का ढंग देखकर
 कुएँ-कुएँ में भंग देखकर
 झूठी शान उमंग देखकर
 पुलिस चोर के संग देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 बिना टिकट बारात देखकर
 टाट देखकर भात देखकर
 वही ढाक के पात देखकर
 पोखर में नवजात देखकर
 पड़ी पेट पर लात देखकर
 मैं अपनी औकात देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 नए नए हथियार देखकर
 लहू-लहू त्योहार देखकर
 झूठ की जै-जैकार देखकर
 सच पर पड़ती मार देखकर
 भगतिन का शृंगार देखकर
 गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

गाँव गया था
गाँव से भागा ।
 मुठ्ठी में कानून देखकर
 किचकिच दोनों जून देखकर
 सिर पर चढ़ा ज़ुनून देखकर
 गंजे को नाख़ून देखकर
 उज़बक अफ़लातून देखकर
 पंडित का सैलून देखकर
गाँव गया था
गाँव से भागा ।

10 comments:

  1. किचकिच दोनों जून देखकर
    लहू-लहू त्योहार देखकर............
    पोखर में नवजात देखकर.........
    kamal hai bahut bahut sunder .lajavab
    rachana

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  2. कहीं मत भागिये, बराबर की पीड़ा मिलेगी हर जगह।

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  3. परंतु.... यह किस ने कहा कि वह इमानदारी से कोसों दूर था! अफ़्वाहों पर मत जाइये... वेबसाइट पर जाइये॥

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  4. किचकिच दोनों जून देखकर
    लहू-लहू त्योहार देखकर............
    पोखर में नवजात देखकर.........बहुत सुन्दर शब्दों से अपने भाव को बाँधा है ..

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  5. जला हुआ खलिहान देखकर
    नेता का दालान देखकर
    मुस्काता शैतान देखकर
    घिघियाता इंसान देखकर
    कहीं नहीं ईमान देखकर
    बोझ हुआ मेहमान देखकर
    गाँव गया था
    गाँव से भागा ।
    क्या कहूँ एक एक शब्द पर निशब्द हूँ\ सच कहूँ आज तक जितनी रचनायें गाँव के हालात पर पढी हैं ये सब से उत्कृष्ट रचना है। और बडी इमानदारी से लिखी है।जिन लोगो की बात कर रहे हैं वो तो केवल दिखावे के इमानदार हैं शायद उन से कहीं अधिक आज आम जनता इमानदार है बस भोली है भगवाँ देखे नही कि भाग पडी पीछे। इन लोगों का सच मरने के बाद ही सामने आता है। शुभकामनायें।

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  6. बहुत सुन्दर रचना।

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  7. बहुत ही सुन्दर कविता ! आप और कैलाश जी को हार्दिक बधाई !

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  8. अच्छा पोस्ट है !मेरे ब्लॉग पर आ कर मेरा होंसला बढाए !
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  9. ऐसा जंगल राज शहर में भी मिलेगा ... वहाँ से भाग कर कहाँ जायेंगे ... कुछ सवाल खड़े करती है रचना ..

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  10. हर बिंदु को सुन्दरता के साथ छूती रचना .सोच को भगाती हुई .आभार

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।