Saturday, 28 January 2012

नहीं चल रहा युवराज का जादू ...

मैं जानता हूं कि राहुल गांधी को युवराज लिखने पर हमारे मित्रों को आपत्ति हो सकती है, फिर भी मैं लिखूंगा, उसकी एक वजह है। भाई इस लेख को कांग्रेस के लोग भी पढ़ते हैं, वो तो इन्हें इसी नाम से जानते हैं, बहुत रिस्पेक्ट करते हैं, कई बार तो कांग्रेसी  राहुल गांधी का चित्र भर देखकर कुर्सी छोड़ कर खड़े हो जाते हैं। इस युवराज के दरबार में हर कोई मत्था टेकता है, चाहे वो कांग्रेस पार्टी का नेता हो या फिर सरकार का मंत्री। सरकार के सरदार को भी खड़े होकर राहुल की आगवानी करनी पड़ती है।
बहरहाल इस युवराज ने जब यूपी चुनाव में पार्टी की कमान संभाली तो कांग्रेसियों को लगा कि अब तो उनकी सत्ता में वापसी तय है। युवराज ने भी आम आदमी खासतौर पर दलितों के यहां भोजन करके के ये बताने की कोशिश की कि वो भले युवराज हों, लेकिन दलितों के प्रति उनके मन में आदर है और वो उन्हें बराबरी का दर्जा देते हैं। इसलिए वो उनके साथ जमीन पर बैठ कर भोजन करते हैं। मैं कई बार सोचता हूं कि दलितों को ज्यादा खुशी युवराज के साथ दिल्ली में डाईनिगं टेबिल पर बैठ कर खाने से होगी या फिर युवराज को जमीन पर बैठाकर भोजन कराने से। मेरा तो मानना है कि बेचारे दलित तो रोज ही जमीन  पर बैठकर खाना खाते हैं, एक दिन अगर कुर्सी मेज मिल जाए तो क्या कहने। पर ये बात राहुल के समझ में नहीं आएगी, क्योंकि अपने को नीचे झुकाना आसान है, पर सामने वाले  को ऊपर उठाना मुश्किल ही नहीं  राजनीति में तो नामुमकिन है।

खैर छोड़िये बेकार की बातों में भला क्यों उलझा जाए, बात चुनाव की करते हैं और  वो भी बिना लाग लपेट के। यूपी में बाराबंकी से शुरु हुए हमारे चुनावी सफर को आज एक हफ्ता हो गया। इस  दौरान हम बाराबंकी, फैजाबाद, बहराइच, बलरामपुर और कपिलवस्तु यानि सिद्धार्थनगर में चुनावी दंगल का आयोजन कर चुके हैं, और आज पहुंच गए गोरखपुर। सफर के दौरान हमारी बात बहुत सारे नेताओं से तो हो ही रही है, मतदाताओं से भी  हम रुबरू होते हैं। बातचीत में मैं देख रहा हूं कि मतदाता बहुत जागरुक है और बहुत ही सावधानी से सभी बातों का जवाब दे रहा है। अब मतदाताओं को बरगला कर वोट लेना आसान नहीं है। मैं यहां एक ग्राम प्रधान का नाम और गांव नहीं बता सकता, पर उसने बहुत ही सहजता से कहा कि " ये ससुरा नेता लोग चुनाव के बाद गायब हो जाता है, अभी आ रहा है और खूब लालच दे रहा है। का करना है अगर ई सब हमको पइसा दे रहे हैं तो हमको लेने में का हरज है। हमने गांव भर को बता दिया है कि अब तक हमको चार पार्टी के उम्मीदवार माल दे चुके हैं, पूरे गांव से कहा हूं कि आप सब भोट जिसको मन हो उसको दें, चुनाव के बाद हम इस पइसवा से गांव में जोरदार पार्टी करेंगे। "

यानि मतदाता नेता जी का पइसवो सटा दे रहा है और भोटवो देने की बात नहीं कर रहा है। अब युवराज को कौन समझाए कि ये मतदाता जिससे पैसे ले रहे हैं, उसे भी वोट नहीं दे रहे है, सोच समझकर वोट देने की बात कर रहे हैं, तो भला  कांग्रेस को वोट क्यों देंगे। बेचारे दलितों ने युवराज का कुछ खाया नहीं है, उल्टे खिलाया ही है। बेवजह राहुल को गुस्सा आ जाता है, और ये बेचारे राहुल के गुस्से का भी सामना करते हैं। खैर इस पूरे इलाके में पार्टी के तीन बड़े नेता हैं, बेनी प्रसाद वर्मा, जगदंबिका पाल, और पी एल पुनिया हैं। वैसे चुनाव में टिकट के बटवारे में बेनी बाबू ही बाजी मार पाए, उन्होंने अपने बेटे समेत 60 से ज्यादा टिकट अपने चहेतों को दिलवाए, पाल साहब की भी नहीं चली, पर वो अपने बेटे को टिकट दिलवाने में कामयाब हो गए। सबसे बेचारे की हालत रही पूनिया की, उनके किसी भी चहेते को टिकट नहीं मिला। अब हालत ये है कि कांग्रेस उम्मीदवारों को कांग्रेसी ही हराने में लगे हैं। इतना लंबा सफर तय कर चुका हूं, लेकिन सच तो ये है कि मैं दावे के साथ कांग्रेस के किसी एक उम्मीदवार को भी नहीं कह सकता कि वो जीत सकता हैं। यहां तक की बेनी बाबू  और पाल साहब को अपने बेटों को भी चुनाव में जीताने में पसीने बहाने पड़ रहे हैं।
मुझे लगता है कि आज राहुल राजनीति के सलमान खान हैं, जिन्हें लोग देखने आते हैं। वैसे आपको पता होगा कि आज भी पिछड़े गांव में आप कार से चले जाएं तो गांव में भीड़ लग जाती है, कार देखकर बच्चे ताली बजाते हैं, तो महिलाएं दरवाजे के पास खड़ी होकर  देखती हैं कि कार किसके दरवाजे पर रुक रही है और अगर आपने किसी आदमी से रास्ता पूछ लिया तो एक साथ आठ आदमी कार वाले को रास्ता बताते हैं। बच्चे तो कार के आगे आगे दौड़ लगाकर जहां जाना होता है, वहां तक जाते हैं। ऐसे में जब युवराज पैदल चल रहे हों और उनकी एक  नहीं कई गाड़ियां उनके पीछे पीछे चल रही हों तो भला लोग इन्हें नही देखने आएंगे। ऐसी भीड़ में दिल्ली के पत्रकारों को दिखाई देता है कि राहुल क्या से क्या करने जा रहे हैं। सच तो ये है कि जितनी जगह से होकर आया हूं अभी तक कहीं भी कांग्रेस का कोई उम्मीदवार कांटे के संघर्ष में नहीं दिखाई दे रहा है। लेकिन टेलीविजन  में इस चौथे नंबर की पार्टी की चर्चा सबसे पहले होती है और सबसे ज्यादा होती है।

वैसे अभी कुछ कहना जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन इस सियासी सफर पर जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे हैं, मैं समाजवादी पार्टी को और पार्टी के मुकाबले बेहतर हालत में पा रहा हूं।  जिस तरह लगातार समाजवादी पार्टी का ग्राफ बढ रहा है, उससे तो लगता है कि पिछले चुनाव में जिस तरह बसपा को अप्रत्याशित समर्थन मिला है, वैसा ही कुछ अगर इस बार समाजवादी पार्टी के साथ हो सकता है। कुछ सीटें अगर कम रह भी गईं तो मुलायम सिंह कांग्रेस और आरएलडी के साथ मिलकर सरकार भी  बनाने  में कामयाब हो सकते हैं। बहरहाल जब तक नौबत यहां तक पहुंचेगी, तबतक को काफी देर हो चुकी होगी। लेकिन एक बात तो है, यूपी कांग्रेस के नेता हैं बहुत चालू, सब राहुल को नेता बता रहे हैं,  ऐसे में अगर पार्टी की हार भी होती है तो सब जिम्मेदारी राहुल पर डालकर किनारे हो जाएंगे।


  

Thursday, 26 January 2012

चुनाव में ईमानदारी ... ना बाबा ना

त्तर प्रदेश के चुनावी सफर पर निकला तो कुछ उत्साहित था, मुझे लग रहा था कि ईमानदारी को लेकर अन्ना ने इतनी तो जागरुकता फैला ही दी होगी कि गांव गांव में लोग ईमानदारी की बात करते होंगे और चुनाव में इस बार दागी उम्मीदवारों से दूरी बनाकर ईमानदार और साफ सुथरी छवि वाले उम्मीदवार के साथ खड़े होंगे। सच बताऊं मेरा सोचना गलत था, चुनावों में कुछ भी नहीं बदला है। चोर, उचक्के, बदमाश, भ्रष्टबेईमान सब तो हैं इस चुनावी दंगल में। टीम अन्ना का यूपी  में कितना भी दौरा कर ले, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यहां वो ईमानदारी को मुद्दा नहीं बना पाएंगे। यहां लोगों की छोटी छोटी जरूरते हैं, उम्मीदवार उनके पास आते हैं तो वो उनसे हैंडपंप और गांव  गली की सड़कों की बात ही कर करते हैं। इसके अलावा  समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने  तो वाकई लोगों की नब्ज पकड़ ली है।  हालांकि उन्होंने ये बात कही तो मजाक में ही कि जब शाम की दवा  यानि दारू मंहगी हो जाए तो  समझ लेना चाहिए कि सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। वाकई इस बात का ग्रामीण अंचलों में असर देखा जा रहा है। आप यकीन माने यूपी में चुनाव के दौरान शराब की कीमतों में भारी कटौती की गई है।

बाराबंकी के बाद कल फैजाबाद यानि राम लला की नगरी अयोध्या में था। बाराबंकी में तो हमें पता बाद में पता चला जहां हमारा कार्यक्रम तय था, वहां के आसपास  की जमीन पर बीएसपी के उम्मीदवार संग्राम सिंह ने कब्जा कर लिया है। शापिंग काम्पलेक्स के लिए काम भी शुरू हो गया था, लेकिन कुछ लोग हिम्मत करके कोर्ट चले गए और काम रुक गया। यहां अब पुलिस तैनात है। संग्राम सिंह लगातार कहते रहे कि हां मैं जनता की अदालत में शामिल होऊंगा, पर कार्यक्रम वाले दिन उन्होने बताया कि परिवार में किसी ने खुद को गोली मार ली है और वो अब नहीं आ सकते। मुझे लगा कि हो सकता है कोई हादसा हो गया होगा, लेकिन हैरान तब हुआ मैं जब कल फैजाबाद में कार्यक्रम शुरू होने के 10 मिनट पहले बीएसपी के उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता ने कहा कि उनके घर मिट्टी हो गई है। मिट्टी हो जाने का मतलब किसी की मौत हो गई है, लिहाजा वो नहीं आ सकते। मुझे हंसी आईऔर एक कहानी याद आ गई।

साहब हुआ ये मेरे एक मित्र के घर अचानक कुछ मेहमान आ गए, ठंड का दिन है लिहाजा किसी को जमीन पर सुलाना ठीक नहीं था। बेचारे मित्र पड़ोसी के यहां चारपाई मांगने चले गए। एक पड़ोसी के यहां जब उन्होंने चारपाई की मांग की तो पड़ोसी ने बडे ही भोलेपन से कहा " भाई क्या बताएं, मेरे यहां तो सिर्फ दो चारपाई है, एक पर मैं और मेरे पिता जी सोते हैं, दूसरी चारपाई पर मेरी मां और मेरी बीबी सो जाती है। इसलिए मैं चारपाई नहीं दे पाऊगा। मित्र बोले कोई बात नहीं, चारपाई आप दें या ना दें, पर आपको मेरी एक सलाह है कि आप लोग सोया तो ठीक से करें। बीएसपी के नेताओं को भी मेरी यही सलाह है कि आप कार्यक्रम में आएं या ना आएं, पर मौत का बहाना  थोडा  ज्यादा हो जाता है। वैसे भी यूपी में जो माहौल है उससे तो पार्टी की नानी तो मरनी ही है, फिर पहले ही क्यों मरने लगे।

अयोध्या पहुंच कर थोड़ा मन दुखी हुआ, हमारे कार्यक्रम का आयोजन स्थल गुफ्तार घाट था। कहते हैं कि भगवान राम ने यहीं पर जल समाधि ले ली थी। यानि यहीं सरयू के तट पर भगवान का शरीर अंतिम बार लोगों ने देखा था। भगवान राम मर्यादा को मानने वाले थे, और कुछ लोगों ने सारी मर्यादाओं को ताख पर रख कर भगवान का मंदिर बनाने की कोशिश कर रहे थे। हालत ये हो गई  जो उनकी ठीक ठाक  छत थी, वो भी नहीं रही। दूर दराज से आने वाले भक्त रामलला से ज्यादा यहां हुई तोड़फोड़ की चर्चा करते हैं। बहरहाल एक अच्छी बात है कि चुनाव में फिलहाल राम मंदिर का मुद्दा गायब है। कई बार यहां से बीजेपी के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन उन्होंने किया क्या है, इसका जवाब उनके पास नहीं है। लिहाजा यहां से ख़डी  एक किन्नर  उम्मीदवार गुलशन बिंदू के पीछे  पूरा शहर पागल हुआ पड़ा है। राजनीतिक  दलों से ज्यादा भरोसा ना जाने क्यों लोगों को इस किन्नर पर है। बिहार की रहने वाली ये किन्नर लोगों को समझाती है कि वो सीता माता जो बिहार में जन्मी थीं, वो उनके यहां  से भगवान राम के पास यानि माता सीता के ससुराल आई है। चुनाव के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन किन्नर ने इस कड़ाके की ठंड में राजनीतिक दलों के पसीने तो छुड़ा ही दिए हैं।

दिल्ली मैं बैठकर अखबार और चैनल पूरी तरह राहुल गांधी पर फोकस किए हुए हैं। यहां लोगों से राहुल के बारे में बात करो तो लोग हंसने लगते हैं। कहते हैं कि राहुल फैक्टर की जब कोई बात करता है तो हम समझ जाते  हैं कि  ये लोग यहां के रहने वाले नहीं है, दिल्ली या फिर किसी और प्रदेश से आए हैं। फैजाबाद के सुदूर इलाके में मैं सीधे साधे ग्रामीणों की ये बात सुनकर हैरान रह गया। बहरहाल दोस्तों आज हम पहुंच चुके हैं बहराइच। तैयारियां चल रही हैं रात के चुनावी दंगल की। आप भी जुड़िए हमारे साथ आईबीएन 7 पर रोजाना रात आठ बजे.. हर रोज नए शहर से।

नोट.. मित्रों मैं लगातार सफर  में हूं, हर रात एक नए शहर में बीतती है, फिर वहां शुरू होता है चुनानी दंगल। यही वजह है कि मैं आप सबके ब्लाग पर आ नहीं पा रहा हूं, लेकिन जब ये कारवां गोरखपुर पहुंचेगा तो हमें एक दिन पूरा वहां आराम करना है। कोशिश होगी कि उस दिन हम आप सबके साथ  कुछ देर जरूर रहूं।

Monday, 23 January 2012

चलिए ! मिल कर करें नेताओं का हिसाब ...


उत्तर प्रदेश में चल रहे सत्ता के संघर्ष एक छोटी सी भूमिका निभाने के लिए मैने भी अपना रुख कर दिया है यूपी की ओर। महीने भर से ज्यादा समय तक के लिए रविवार को सुबह छह बजे हम सभी ने दिल्ली छोड़ दिया और कल ही शाम को हम पहुंच वहां जहां अपना दबदबा जमाने के लिए सभी राजनीतिक दल एक दूसरे से आगे निकलने की फिराक में जी जान से लगे हैं यानि प्रदेश की राजधानी लखनऊ।

अपने चैनल यानि आईबीएन 7 के जरिए तो हम आपको कल 23 जनवरी से रोजाना रात आठ बजे किसी ना किसी शहर में चल रहे इस घमासान की हकीकत से तो वाकिफ कराएंगे ही, अगर इस भागमभाग में मैं अपने ब्लाग परिवार के लिए समय निकाल पाया तो कोशिश होगी कि इस चुनाव के भीतर चल रही आबोहवा की जानकारी आपको यहां भी दूं।

हमारे सफर की शुरुआत भले ही लखनऊ से हो रही हो, लेकिन हमारी कोशिश है कि हम हर गांव हर कस्बे और हर जिले तक पहुंचे और लोगों से जाने उनकी राय। मसलन जिन्हें आपने चुना था वो आपकी कसौटी पर खरे उतरे या नहीं, जिन्हें चुनने जा रहे हैं, उनमें आप क्या देख रहे हैं। मुझे देखना चाहता हूं कि पांच साल के शासन में मायावती उत्तर प्रदेश को तरक्की की राह पर कितना आगे बढा पाई हैं, मुझे ये भी देखना है कि मुख्य विपक्षी दल होने के नाते समाजवादी पार्टी यानि मुलायम सिंह यादव जनता के हितों को लेकर कितना गंभीर रहे हैं। वैसे तो प्रदेश में अब बीजेपी के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, फिर मैं देखना चाहता हूं कि उनकी फायर ब्रांड नेता उमा भारती क्या मध्यप्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का झंडा बुलंद कर पाती हैं या नहीं। कांग्रेस की राहुल गांधी दलितों के यहां लगातार रोटी तोड़कर उन्हें लुभाने में किस हद तक कामयाब रहे हैं।

मुझे लग रहा है कि मैं आपको अपने चुनावी सफर की जानकारी दे दूं, जिससे कहीं मौका मिला तो हम आप आमने सामने रुबरू भी हो सकेंगे। हम 23 जनवरी को बाराबंकी, 24 को फैजाबाद (अयोध्या), 25 बहराइच, 26 को बलरामपुर, 27 जनवरी कपिलवस्तु (नेपाल बार्डर), 28 जनवरी गोरखपुर, 30, जनवरी आजमगढ, 31 जनवरी बलिया, 1 फरवरी वाराणसी, 2 फरवरी इलाहाबाद, तीन फरवरी अमेठी, 4 फरवरी जौनपुर, 6 फरवरी रायबरेली, 7 फरवरी प्रतापगढ, 8 फरवरी लखनऊ, 9 फरवरी फतेहपुर, 10 को उन्नाव, 11 फरवरी कानपुर में हैं।

ये कारवां यहीं थमने वाला नहीं है। इसके बाद 13 फरवरी को हम आपसे फर्ऱखाबाद में मिलेगे। इसी तरह 13 को इटावा, 14 आगरा, 16 को मथुरा, 17, नोएडा, 18 फरवरी, मेरठ, 20 को मुजफ्फर नगर, ,21 को बिजनौर, 22 को मुरादाबाद, 23 को रामपुर, 24 को बरेली, 25 को पीलीभीत, 26 को सहारनपुर और 28 को लखीमपुर (गोला) मैं हम आप सबके साथ चौपाल लगाएंगे।

और जरूरी बात तो रह गई, रोजाना आठ बजे आप आईबीएन 7 पर हमारा ये विशेष चुनाव बुलेटिन यानि चौपाल लाइव देख सकेगे। हम आपको निराश भी नहीं करेंगे, क्योंकि इस शो को एंकर करेंगे हमारे स्टार एंकर भाई संदीप चौधरी। तो मित्रों मुझे लगता है कि आज से 28 फरवरी तक आप हमारे साथ रोज रात को आठ बजे टेलीविजन पर जरूर हमारे साथ होंगे। यहां मैं आपसे कुछ मदद भी चाहता हूं, अगर आप इन इलाको के निवासी है तो आप हमें स्थानीय मुद्दे, नेताओं से अपेक्षा, उम्मीदवार से आप क्या पूछना चाहते हैं, ये सभी बातें हमें मेल के जरिए बता सकते हैं और हम वादा करते हैं कि आपका सवाल कितना भी तीखा क्यों ना हों, हम उसे रखेंगे जनता की सबसे बड़ी पंचायत में, जहां आप होगे, नेता होंगे और जहां आप दोनों हैं तो भला हम क्यों नहीं होगे ?
Srivastava.mahendra1965@gmail.com

Thursday, 19 January 2012

जरूरी है बेवकूफी की सजा ...


चुनाव निशान हाथी को लेकर जिस तरह की बातें हो रही हैं वो मुझे हैरान करती हैं। मुझे लगता है कि वाकई ये देश चल कैसे रहा है। यहां जो लोग बड़ी बड़ी कुर्सियों की जिम्मेदारी संभालते हैं, अगर वो कोई गलत फैसला करते हैं और उससे देश को नुकसान होता है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है, जिम्मेदारी अगर तय भी हो जाए तो नुकसान की भरपाई कैसे होगी ? मैं तो इस मत का हूं कि अगर किसी हुक्मरान के किसी गलत फैसले से सरकारी खर्च बढता है तो वो रकम उस हुक्मरान से ही वसूली जानी चाहिए, क्योंकि देश के जो हालात हैं, हम किसी एक व्यक्ति की गलती का खामियाजा देश को भुगतने के लिए नहीं छोड़ सकते।
भला हो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन का जिसने अपनी सख्त कार्यप्रणाली से लोगों को बताया कि देश में एक भारत निर्वाचन आयोग जैसी स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था भी है, जो निष्पक्ष चुनाव के लिए कड़े से कडे़ फैसले कर सकती है। ये सब करके दिखाया भी टी एन शेषऩ ने। सच कहूं तो आप किसी से भी बात कर लें और पूछें कि शेषन के पहले भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त कौन था, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई उनका नाम नहीं बता पाएगा, क्योंकि उसके पहले ये आयोग में तैनात होने वाले अफसर किसी तरह समय काटते थे और सेवानिवृत्त होकर घर बैठ जाते थे। खैर शेषन के बाद 10 साल तो ठीक से चला, लेकिन उसके बाद फिर उसी ढर्रे पर आयोग लौट रहा है। अब निष्पक्ष होकर कड़ा फैसला लेने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।
ताजा मामला लेते हैं बीएसपी यानि मायावती की पार्टी के चुनाव निशान हाथी का। मायावती ने सरकारी धन का दुरुपयोग कर पूरे प्रदेश में कई पार्क बनवा दिए। पार्क का नाम दलित नेताओं के नाम पर रखा। मुख्यमंत्री मायावती इस कदर बेलगाम हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी के संस्थापक कांशीराम और खुद अपनी मूर्तियां तो पार्क में लगवाई हीं, पार्टी के चुनाव निशान हाथी को भी खूब इस्तेमाल किया। पार्क में एक दो जगह पर हाथी की प्रतिमा रख दी जाती, तो किसी को कोई परहेज नहीं था, लेकिन हजारों मूर्तियां रखे जाने से बवाल होना ही था।
बवाल हुआ और ये मामला निर्वाचन आयोग पहुंच गया। लेकिन इस गल्ती के लिए आयोग को सजा सुनाना चाहिए था बीएसपी सुप्रीमों के खिलाफ, लेकिन आयोग ने सजा सुनाया सरकारी खजाने के खिलाफ। आयोग का फैसला तो मायावती के फैसले से भी ज्यादा खराब है। मुख्य चुनाव  आयुक्त ने कहा कि चुनाव तक सभी मूर्तियों को ढक दिया जाए। बताया जा रहा है कि एक अनुमान के मुताबिक केवल लखनऊ और नोएडा में ही मूर्तियों को ढकने में पांच करोड रुपये से ज्यादा खर्च किए गए हैं। अभी इन मूर्तियों को ढकने में खर्च हुआ और चुनाव बाद इसे हटाने में खर्च किया जाएगा। मैं एक सवाल पूछता हूं ये मूर्तियां अगर आज गलत हैं, तो कल भी गलत होंगी। ऐसे में क्या अब हर चुनाव में मूर्तियों को ढकना और उतारऩा होगा। इस पर जो खर्च आएगा, उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा, फिर अगर ऐसा है तब तो इसके लिए सरकार को एक स्थाई फंड बनाना होगा। मुझे नहीं लगता कि इसका कोई जवाब निर्वाचन आयोग के पास होगा। जिस देश में जिंदा हाथियों के रखरखाव का मुकम्मल इंतजाम ना हो, उस देश में पत्थर की मूर्तियों को ढकने और उतारने पर करोडों रुपये पानी की तरह बहाने को क्या जायज ठहराया जा सकता है। मेरा मानना है कि कोई भी इसे सही फैसला नहीं मानेगा।

निर्वाचन आयोग के पास किसी भी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न जब्त करने और उसे बदलने का अधिकार है। मैं जानना चाहता हूं कि आखिर आयोग ने अपने इस अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। हैरानी तो इस बात पर होती है कि बीएसपी सुप्रीमों मायावती इतने पर भी नहीं मानतीं कि उन्होंने कुछ गलत किया है। उनका तर्क है कि उनके चुनाव निशान में जो हाथी है, उसका सूंड नीचे है जबकि पार्कों में लगे हाथियों का सूंड ऊपर है। इसलिए ये कहना कि चुनाव निशान का दुरुपयोग किया गया है, वो गलत है। अब मुझे लगता है कि आयोग को मुझे समझाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, अगर मायावती मानती हैं कि उनके चुनाव निशान और पार्क के हाथियों में अंतर है, वो एक जैसे नहीं है, तो आयोग को उनकी बात मानते हुए सूबे के निर्दलीय उम्मीदवारों को सूड ऊपर किए हाथी चुनाव निशान आवंटित कर दिया जाना चाहिए, फिर मैं देखता हूं कि मायावती को आपत्ति होती या नहीं। लेकिन आयोग ने जो फैसला सुनाया, उससे तो सरकारी खजाने पर ही बोझ बढ़ा है।
भारत निर्वाचन आयोग के फैसले को मैं तो सही नहीं ठहरा सकता, बल्कि मुझे लगता है कि इस मामले को न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए कि आयोग का फैसला गलत है, क्योंकि ये सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने वाला है। इतना ही नहीं इस गलत फैसले जो नुकसान  हुआ है, उसकी भरपाई भी मुख्य चुनाव आयुक्त से ही की जानी चाहिए। कड़ाके की इस ठंड में इंसान के शरीर पर एक कपडा नहीं है, किसी तरह वो आग के पास बैठ कर रात गुजार रहे हैं और पत्थर की इन मूर्तियों को मंहगे कपडों से ढका गया है। आखिर इस बेवकूफी की सजा तो मिलनी ही चाहिए ना।