Friday, 16 March 2012

यूपी : चेहरा बदला चरित्र नहीं ...

मैं हमेशा से इसी मत का हूं कि चेहरा बदलने से चरित्र नहीं बदल सकता। हां अगर कोई चरित्र में बदलाव कर ले, तो चेहरा खुद बखुद बदला बदला सा लगता है। ताजा उदाहरण है उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली समाजवादी पार्टी का। चुनाव के दौरान मैं यूपी में 50 से ज्यादा जिलों में गया, वहां लोग मायावती की सरकार से बुरी तरह नाराज थे और इससे छुटकारा चाहते थे। इसका विकल्प उन्हें समाजवादी पार्टी में दिखाई दे रहा था। लेकिन ये क्या.. पहले दूसरे चरण में समाजवादी पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया तो शहरी इलाकों में खौफ का माहौल बन गया। पूछने पर पता चला कि मायावती तो सरकारी पैसे की लूट में शामिल है, पर समाजवादी पार्टी के आने का मतलब गुंडों का सरकार में आना होगा और इस पार्टी की सरकार में तो रास्ते पर चलना मुश्किल हो जाएगा।
इसकी पहली झांकी तो चुनाव के नतीजे आने के बाद सूबे के कई जिलों में शुरू हुई मारा मारी से दिखाई दे गई। शोर शराबा हुआ तो समाजवादी पार्टी ने सफाई दी कि अभी हमारी सरकार नहीं है, शपथ ग्रहण के बाद ही हमारी सरकार होगी। बहरहाल समाजवादी पार्टी पर आज भी सबसे बडा यही आरोप है कि ये गुंडों की पार्टी है। शायद इस छवि को धोने के लिए ही मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश की ताजपोशी करने का फैसला किया। अखिलेश ने जब बाहुबलि नेता डी पी यादव को पार्टी में शामिल करने से इनकार कर दिया तो सच में एक बार ऐसा लगा कि अखिलेश के आगे किसी की नहीं चलेगी, फैसला लेने में अखिलेश का जवाब नहीं है। मीडिया ने अखिलेश के इस फैसले को हाथो हाथ लिया और अखिलेश का ग्राफ एकदम से ऊपर पहुंच गया।
अखिलेश की इसी छवि के बीच जब उन्हें मुख्यमंत्री की कमान सौंपे जाने की बात शुरू हुई तो लोगों की उम्मीद बढ गई। सब को लगने लगा कि कम से कम पहली दफा मंत्रिमंडल में गुंडे बदमाश नहीं होंगे। दागी छवि का कोई भी नेता इस मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाएगा। चूंकि प्रदेश के अब तक के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री हैं अखिलेश.. तो लोगों को लगा कि उनके मंत्री भी कम उम्र वाले ही होंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, मंत्रिमंडल में एक दो को छोड़ दें तो सभी मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल के ही सदस्य हैं। यानि चाचाओं के मंत्रिमंडल में बेचारा भतीजा मुख्यमंत्री बन कर फंस गया। इस मंत्रिमंडल को सबसे ज्यादा बदसूरत बनाया रघुराजराज प्रताप सिंह यानि राजा भइया ने। राजा भइया की छवि भी बाहुबलि नेताओं की है। अच्छा फिर जिन लोगों को प्रचार के दौरान दूर रखे जाने की वजह से पार्टी को पूर्ण बहुमत में आई, अब इन सभी नेताओं को मंत्री बना दिया गया। आजम खां और शिवपाल यादव को प्रचार से दूर रखना बहुत कारगर रहा है, लेकिन अब ये मंत्री हैं।
अच्छा आइये क्षेत्रीय असंतुलन की बात करें,  यूपी के प्रमुख शहरों में इलाहाबाद भी शामिल हैं। यहां से समाजवादी पार्टी के आठ विधायक जीत कर लखनऊ पहुंचे। लेकिन इनमें से किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया। इसके पास का ही जिला है प्रतापगढ वहां से दो लोगों को मंत्री बनाया गया, राजा भइया और राजाराम पांडेय, जबकि ये दोनों दागी है। राजाराम पांडेय पर कई तरह के गंभीर आरोप हैं। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मंत्रिमंडल में कई ऐसे लोगों को शामिल किया गया है, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले आज भी विचाराधीन हैं। सवाल उठता है कि दागी और अपराधी को मंत्रिमंडल में शामिल करने की आखिर मजबूरी क्या है। मेरा मानना है कि कोई मजबूरी नहीं है। पूर्ण बहुमत की सरकार है, दागी और अपराधी  में इतना नैतिक बल नहीं होता कि वो सरकार के सामने सिर उठा कर बात कर सके। लेकिन समाजवादी पार्टी  की सरकार मे गुंडे, दागी, अपराधी शामिल ना हों तो पता कैसे चलेगा कि ये समाजवादी पार्टी की सरकार है। गुंडागर्दी ही तो पार्टी की यूएसपी है।
अब देखिए ना जिस मंच पर शपथ लेकर अखिलेश मुख्यमंत्री बने, उसी मंच पर अगले ही क्षण समाजवादी गुंडो ने उपद्रव मचाकर दिखाया कि आगे राज्य में क्या होने वाला है। घंटो समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता मंच पर नंगानाच करते रहे, यहां तक की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी भी उनके साथ डांस करते दिखाई दिए।
बहरहाल समाजवादी पार्टी का इसमें कोई दोष नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश के लोगों की किस्मत खराब है। उन्हें दागी और बदबूदार नेताओं से ही बेहतरी की उम्मीद करनी होगी। अखिलेश का नाम मुख्यमंत्री के लिए सामने आया तो युवाओं में एक उम्मीद जगी थी, कि अब यूपी में भी कुछ बेहतर होगा, लेकिन मुलायम सिंह ने बेचारे अभिमन्यू को जानबूझ कर चक्रव्यूह में फंसा दिया है। जो चेहरे सामने हैं, इनसे अखिलेश क्या काम ले पाएंगे,जब उनके पिताश्री काम नहीं पाए। शिवपाल यादव जी शुरू हो जाइये जो आप करते रहे हैं, सूबे में जो आपकी शोहरत है। जब आप पर आपके बड़े भाई अंकुश नहीं लगा पाए तो अखिलेश किस खेत की मूली है। आजम भाई आप मंत्री नहीं रहे तो रामपुर में ट्रैफिक क्या हाल हो गया है, देख रहे है ना। लगिए ट्रैफिक सुधारने में, यहां जब आप लोगों को कान पकड़ कर उठक बैठक कराते हैं,तभी लोगों की समझ में आता है। राजाराम पांडेय जी लूट खसोट करिए ना कौन रोकने वाला है। अब इस सरकार से बेहतरी की कोई उम्मीद करना बेईमानी होगी।

 

Wednesday, 7 March 2012

टीम अन्ना भी करे आत्ममंथन ....

यूपी समेत देश के पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया खत्म हो गई। इस चुनाव मे कौन जीता कौन हारा ये बात तो सामने आ गई। लेकिन चुनाव के नतीजों से कई सवाल खड़े हो गए हैं। बड़ा सवाल ये कि टीम अन्ना की जनता में कितनी विश्वसनीयता बची है। अगर रिजल्ट के हिसाब से देखें तो मुझे लगता है कि ये अन्ना गैंग जबर्दस्ती का भौकाल टाइट किए हुए है, जनता में अब इनकी दो पैसे की पूछ नहीं है। आप कह सकते हैं कि ऐसा क्यों ? मैं बताता हूं कि ये बात में किस आधार पर कह रहा हूं।

अन्ना के जनलोकपाल बिल का अगर कोई राजनीतिक दल खुलकर विरोध कर रहा था, तो वह है मुलायम सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी। सपा मुखिया ने साफ कहा था कि वो अन्ना के जनलोकपाल बिल से कत्तई सहमत नहीं हैं। क्योंकि ये जनलोकपाल बिल देश के संघीय ढांचे को खत्म करने वाला तो है ही साथ ही राज्य सरकार के समानांतर एक और ताकतवर संस्था को खड़ा कर राज्य के सामान्य कामकाज में अडंगा डालने वाला भी है। अन्ना के जनलोकपाल का खुला विरोध करने के बावजूद समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक सफलता हासिल की। यूपी में कई साल बाद ऐसा हुआ है कि किसी एक पार्टी को इतनी बडी संख्या विधानसभा में मिली है।

अच्छा हैरान करने वाली बात ये है कि मुलायम सिंह यादव ने जनलोकबाल बिल का विरोध किया तो उन्हें जनता ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूडी ने जनलोकपाल बिल का समर्थन किया और जैसा जनलोकपाल बिल अन्ना टीम चाहती थी, वैसा ही बिल उन्होंने विधानसभा में पास करा दिया, नतीजा क्या हुआ कि बीजेपी तो सत्ता से बाहर हुई ही, बेचारे खंडूडी खुद भी चुनाव हार गए। कम ही ऐसा होता है जब कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारता हो। आपको याद होगा कि उत्तराखंड के लोकपाल बिल का टीम अन्ना बहुत समर्थन कर रही थी, वो दूसरे राज्यों के साथ ही केंद्र सरकार को भी नसीहत दे रही थी कि अगर जनलोकपाल बिल पास करना है तो उत्तराखंड राज्य के माडल पर पास किया जाए। अब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बेवकूफ हैं, जो उत्तराखंड माडल पर बिल पास कराएं और चुनाव में सत्ता से हाथ धो बैठें।

चलिए साहब चुनाव में हार के लिए कांग्रेस में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और खुद दिग्विजय सिंह ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा कि पार्टी इस चुनाव परिणामों का मंथन करेगी और जरूरी बदलाव किया जाएगा। बीजेपी ने भी साफ कर दिया कि हां यूपी में जो नतीजे आए हैं, उससे उन्हें धक्का लगा है, पार्टी आत्ममंथन करेगी। लेकिन पंजाब, गोवा में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है और उत्तराखंड में भी उतना खराब प्रदर्शन नहीं रहा है। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी समीक्षा कर ली, सभी ने अपनी गल्ती स्वीकार ली और आत्ममंथन की बात कर दी।

सवाल ये उठता है कि टीम अन्ना खासतौर पर अरविंद केजरीवाल कब आत्ममंथन करेंगे ? क्या आपको अभी भी लगता है कि जनता आपको सुनती है, आप जो चाहोगे वही होगा। उत्तर प्रदेश में जिले जिले घूमते फिर रहे थे, लोगों को यही समझा रहे थे ना कि जनलोकपाल का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों से दूर रहें, उन्हें वोट ना दें। आपने किसी राजनीतिक दल का नाम भले ना लिया हो, लेकिन इशारा तो समाजवादी पार्टी की ओर था ही ना। लेकिन हुआ क्या, जनता ने तो सपा को एतिहासिक जीत दर्ज कराई। उत्तराखंड का मांडल आप देश में स्वीकार करने की बात कर रहे थे, वहां सरकार भी गई और बेचारे मुख्मंत्री खंडूडी खुद भी चुनाव हार गए। मेरा सवाल है कि क्या टीम अन्ना भी आत्ममंथन करने को तैयार है ? मुझे तो कई बार लगता है कि वो जनलोकपाल बिल की आड़ में कुछ बड़ा खेल खेल रहे हैं। बेअंदाज इतने हो गए हैं कि एक नेता के चुनावी दौरे का हिसाब मांग रहे हैं। अब सोचिए कि पूरी अन्ना टीम लगातार हवा में उड़ रही है, टीम के किसी भी सदस्य का पैर जमीन पर नहीं है, कहीं भी जाने के लिए हवाई यात्राएं की जा रही हैं, अरे तुम भी किसी को हिसाब दोगे। आखिर भाई आपके पास इतना पैसा कहां से आ रहा है। कहा तो यही जा रहा है कि कुछ बाहरी संगठनों से टीम अन्ना को फंडिग हो रही है, इस मामले में सब कुछ साफ होना ही चाहिए।

और हां, अब तो केजरीवाल की हकीकत भी सामने आ गई है। दूसरों को नसीहत देने वाले का असली चेहरा क्या है ? ये देश ने देख लिया।  उत्तर प्रदेश में चुनाव के दौरान सभा की अनुमति मांगी गई मतदाता जागरूकता के नाम पर। यानि टीम अन्ना लोगों को मतदान के महत्व के बारे में जानकारी देगी। मसलन आपका एक वोट कितना कीमती है। लेकिन खुद भूल गए कि वो भी इसी देश के नागरिक हैं और वोट देना उनका भी अधिकार है। मतदाता सूची में आपका नाम शामिल है या नहीं ये चेक करना भी खुद मतदाता की जिम्मेदारी है। केजरीवाल इतने गंभीर है कि मतदाता सूची में नाम है या नहीं ये जानने की भी उन्हें फुरसत नहीं, फिर वोट वाले दिन बिना वोट डाले ही गोवा जाने के लिए एयरपोर्ट रवाना हो गए, जबकि पत्रकारों ने बताया कि आपको पहले वोट डालना चाहिए, कहने लगे कि मैं गोवा जाने में लेट हो जाऊंगा। लेकिन जब मीडिया ने टीवी पर उनकी क्लास लगानी शुरू की तो उल्टे पांव लौट आए, यहां आकर उन्हें और शर्मिंदगी उठानी पड़ी, क्योंकि सूची में नाम ही नहीं था। मसलन बातें आप भले बड़ी बड़ी कर लो, लेकिन असल जिंदगी में आप मतदान को लेकर कितने गैरजिम्मेदार है, ये साफ हो गया। यानि हांथी के दांत खाने के और दिखाने के और।

टीम अन्ना के तो हर सदस्य का असली चेहरा सामने आ चुका है, लिहाजा अब बात सीधे अन्ना से करना चाहूंगा। अन्ना दा आप अगले आंदोलन के पहले अपना घर जरूर ठीक कर लें। दिल्ली में तो मैने देख लिया कि आप कैसे लोगों के बीच में हैं, मै ही क्या देश भर ने देख लिया। लेकिन अब दिल्ली आएं तो पहले अपने गांव रालेगनसिद्धी को भी करीब से देख लें, क्योंकि हम मानकर चल रहे थे कि आपका गांव एक आदर्श गांव होगा, यहां सब एक दूसरे से बहुत मिल जुल कर रहते होंगे, नशाखोरी का तो नामोनिशान नहीं होगा। पर मुझे दुख है कि आपके गांव में पान गुटका, सिगरेट तो छोड़िए हर ब्रांड की शराब तक आसानी से मिल जाती है, बस पैसे दोगुने से ज्यादा देने होते हैं। आप तो अब गांव से इतना कट चुके हैं कि आपको अपना गांव दिखाई नहीं देता, शाम होते ही तमाम लोग टल्ली होकर गांव में घूमते दिखाई दिए तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। खैर छोड़िए आपके गांव के बारे में मैं जल्दी आपको विस्तार से जानकारी दूंगा। होली है होली मनाइये, हैप्पी होली।


नोट.. कृपया मेरे दूसरे ब्लाग रोजनामचा पर दस्तक दें...

http://dailyreportsonline.blogspot.in/search?updated-min=2012-01-01T00:00:00-08:00&updated-max=2013-01-01T00:00:00-08:00&max-results=6

Tuesday, 6 March 2012

ये है जंगल का राजा बंदर ....

त्तर प्रदेश के नतीजे सामने आ गए हैं। नतीजों को लेकर कोई हैरानी नहीं है, क्योंकि ये तो पहले ही माना जा रहा था कि समाजवादी पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में सामने आएगी और आई भी। हां ये सच है कि मैं भी ये अंदाज नहीं लगा पाया कि समाजवादी पार्टी इतनी बड़ी संख्या में सीटें जीत रही है। इस चुनाव में तरह तरह के नेता अपना किरदार निभा रहे थे। एक ऐसा राष्ट्रीय पार्टी के नेता का ऐसा भी किरदार था कि उसे बात बात पर गुस्सा आ जाता था।

मैं हैरान था कि यूपी की हालत खराब है, यहां जनता परेशान है,युवओं के हाथ में रोजगार नहीं है, किसानों को उनकी पैदावार का उचित दाम नहीं मिल रहा है, मंहगाई के चलते लोगों के घर में दोनों टाइम चूल्हे नहीं जल रहे हैं और चुनाव के दौरान लोगों के इस घाव पर मरहम लगाने के बजाए इस नेता को बात बात पर गुस्सा आ जाता है। मैं यूपी में 40 दिन तक लगातार घूमता रहा, लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि गुस्सा करके आखिर इस समस्या का समाधान कैसे निकल सकता है।

बार बार जब एक ही बात सुनता रहा तो मैने एक बुजुर्गवार से पूछा दादा क्या किसी समस्या का समाधान गुस्से से भी हो सकता है। उन्होंने कहा बिल्कुल नहीं। फिर मैने उन्हें इस नेता के बारे में उन्हें बताया कि इसे तो बात बात पर गुस्सा आता है। यहां की समस्याओं को देखकर ये कहता है कि मुझे तो भारतीय होने पर शर्म आती है। पहले तो बुजुर्गवार ने कहा कि बच्चा है, कोई बात नहीं, सुधर जाएगा। बाद में उन्होने एक कहानी सुनाई।

कहने लगे कि जंगल के राजा शेर से जानवर परेशान हो गए। बाद में सभी जानवरों ने फैसला किया कि इस बार चुनाव में जंगल के राजा को हराना है और हम अपना नेता किसी और को चुन लेते हैं। सभी जानवरों ने हां में सिर हिलाया और कहाकि ये ठीक है। हम सब एक हैं और अब अपना नया राजा चुन लेगें। लेकिन मुश्किल ये कि शेर के सामने चुनाव लड़ने की किसी की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। बहरहाल काफी विचार के बाद एक बंदर खड़ा  हुआ और बोला कि अगर आप सब साथ देने को तैयार हैं तो हम शेर के खिलाफ चुनाव लडे़गें। सभी ने हां में सिर हिलाया और बंदर चुनाव को तैयार हो गया। इतना ही नहीं वो चुनाव जीत भी गया।

बंदर राजा बन गया, खूब जश्न मना जंगल में। लेकिन एक दिन गजब हो गया। शेर ने एक बकरी के बच्चे को अपने पंजे में जकड़ लिया, घबराई बकरी तुरंत जंगल के राजा बंदर के पास पहुंची और कहा कि देखो शेर ने मेरे बच्चे को जकड़ रखा है और वो उसे खा जाएगा। बंदर तेजी से गुर्राया, ऐसा कैसे हो सकता है, मेरे राज में ये सब बिल्कुल नहीं चलेगा। बकरी बोली तुम चलो साथ और उसे छुड़ाओ। बंदर बोला हां हां क्यों नहीं। बंदर कूदता फांदता बकरी के साथ निकल पड़ा। बकरी ने उसे वो दिखाया कि उस पेड़ के नीचे देखो वहां शेर मेरे बच्चे को जकड़े बैठा है। बंदर दौड़कर गया और पेड पर चढ़ गया, कभी वो इस पेड पर कूदता, कभी दूसरे पेड़ पर, कभी यहां भागता, कभी वहां भागता। काफी देर तक वो ऐसे ही दौड़ भाग करता रहा, लेकिन बकरी का बच्चा यूं ही शेर के पंजे में जकड़ा रहा। बकरी नाराज हो गई, बोली अरे मेरे बच्चे को छुडाओगे भी या बस ऐसे ही कूदते फांदते रहोगे।

बंदर बोला देखो जी आपने मुझे राजा बनाया है, मैं तो आपके काम के लिए भागदौड़ करने से पीछे नहीं रहूंगा, अगर मेरी कोशिश में कोई कभी हो तो बताओ, अगर वो नहीं छोड़ रहा है तो मैं क्या कर सकता हूं, आखिर वो शेर है और मै हूं तो बंदर ही ना। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सकता अब तुम्हारा बच्चा छूटे या ना छूटे। कुछ ऐसा ही किरदार निभाया यूपी के चुनाव में एक नेता ने। उसे भी बहुत गुस्सा आता रहा, लेकिन समस्या का समाधान नहीं था उसके पास। खैर नया नया मामला है सीखते सीखते सीखेगा ना।

Saturday, 3 March 2012

राहुल फ्लाप, मुसीबत में माया भी ...


पूरे 40 दिन यूपी का कोना कोना छानने के बाद आज दिल्ली वापस आ चुका हूं। इस दौरान मैं अपने ब्लाग से ज्यादा नहीं जुड़ पाया, वजह नेट की समस्या रही। जब भी किसी बड़े शहर में रात बिताने का मौका मिला तो आप सब को यूपी के चुनाव संबंधित कुछ जानकारी देता रहा। इस दौरान मेरे बहुत से मित्रों ने मुझे फोन कर कहा कि आप चुनाव की कुछ सटीक  जानकारी दीजिए, कुछ लोग हमारे सफर को लेकर बहुत उत्साहित थे, वे जानना चाहते थे कि कैसे एक टीम रोज नए शहर में पूरा सेट लगाती है और फिर प्रोग्राम खत्म होते ही सेट को समेटती है और अगले शहर के लिए रवाना हो जाती है। मैं चाहता हूं कि आज आपको चुनाव के बारे में जानकारी देने के साथ ही कुछ अपने सफर के बारे में भी जानकारी दें।

चलिए सबसे पहले चुनाव की बातें कर लेते हैं। दिन में यूपी के किसी इलाके में घूमने और शाम को चुनावी चौपाल खत्म करने के बाद जब हम होटल के कमरे में टीवी खोलते थे तो उस समय हम सबको लगता था कि ऐसा कार्यक्रम देखा जाए,  जिससे कुछ मनोरंजन हो। इसके लिए हम सब अपने कमरे में कोई ना कोई न्यूज चैनल लगाकर बैठ जाते थे, क्योंकि इससे बेहतर मनोरंजन कुछ था ही नहीं। आप पूछेगें कि मनोरंजन के लिए न्यूज चैनल ? इसका क्या मतलब है। मैं बताता हूं इस  चुनाव में जो कहीं नहीं था, जिसकी कोई चर्चा नहीं थी, जिसकी बातों का कोई असर नहीं था, दलितों के घर भोजन करने की कोई चर्चा तक नहीं कर रहा था, बांह चढाए राहुल गांधी के बारे में कहीं चर्चा करने पर लोग बिना बताए जान जाते थे कि हम दिल्ली से आए हैं। ऐसे राहुल गांधी की खबर चैनल की हेडलाइन बनती थी, तो आप समझ सकते हैं कि इससे बड़ा मनोरंजन आखिर क्या हो सकता है।

आइये एक उदाहरण देते हैं राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में प्रियंका गांधी डा. संजय सिंह की पत्नी अमिता सिंह के लिए वोट मांगती फिर रहीं थीं। एक जगह प्रियंका के काफिले को ग्रामीणों ने रोक लिया और पूछा कि आप किसके लिए वोट मांग रहीं हैं। प्रियंका ने कहा कि अमिता के लिए। ग्रामीणों  हांथ जोड़कर कहाकि हम आपकी ये बात नहीं मानेंगे, हम अमिता को वोट नहीं दे सकते। बाद में प्रियंका बोली हम तो राहुल की मदद कर रहे हैं, ग्रामीणों ने कहा कि आप अभी जाइये, वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव  में राहुल गांधी के लिए आपको वोट मांगने यहां नहीं आना पडेगा, हम सब राहुल गांधी के साथ हैं।  ये बात मैं सिर्फ इसलिए बता रहा हूं कि राहुल जब अपने इलाके में विधानसभा उम्मीदवार को वोट नहीं दिला पा रहे हैं, तो दूसरे इलाके की बात करना ही बेमानी है।

हां लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कुछ उम्मीदवार चुनाव लड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। 2007 में महज 22 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार उससे बेहतर प्रदर्शन करती नजर आ रही है, हालांकि मैं कांग्रेस को अपनी ओर से पांच सीटें ज्यादा दे रहा हूं, यानि वो इस बार 40 सीटें जीत सकती है, वैसे तो मेरा आंकलन 35 ही है। आरएलडी के लिए मैं अलग से पूरा पैराग्राफ नहीं लिख सकता, क्योंकि वो इतना बेहतर प्रदर्शन नहीं कर रही है। जाट आमतौर पर कांग्रेस के खिलाफ ही रहते हैं, ये चौधरी साहब ने कांग्रेस से ही हांथ मिला लिया, ऐसे में जाट कितना उनका साथ देगा, ये तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे, लेकिन विपरीत हालातों में भी चौधरी साहब के खाते में 12 से 15 सीटें आ सकती हैं।

आइये अब बात कर लेते हैं बहन जी यानि मायावती की। 2007 में विधानसभा के नतीजे अप्रत्याशित थे। सच ये है कि खुद मायावती को भी ये उम्मीद नहीं रही होगी कि वो इतनी भारी जीत जीतने जा रही हैं। दरअसल देखा जाए तो वो मायावती की जीत नहीं थी, बल्कि मुलायम के गुंडाराज का खात्मा था। लोग मुलायम सरकार की गुंडागर्दी से त्रस्त थे, उन्हें लगता था कि मायावती सरकारी खजाने को लूटती है, लूटती रहे, लेकिन जनता तो सुख में रहती है। ये सोचकर मायावती को जिताया था। पर इस बार मायावती की सरकार में कोई काम होना तो दूर, भ्रष्टाचार का बोलबाला था। अफसर बेलगाम थे, घूसखोरी, बेईमानी, लूट, अपराध को बोलबाला रहा, लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया। लिहाजा पूरे प्रदेश मे लोग सरकार के खिलाफ वोट देने के लिए आगे आ रहे हैं। जनता का जो गुस्सा देखने को मिला है, उससे मेरा मानना है कि बीएसपी इस बार तीन अंको में नहीं पहुंचने वाली है। उसकी संख्या 80 से 90 पर ही सिमट कर रह जाएगी।

हां समाजवादी पार्टी के लिए अच्छी खबर है और अच्छी खबर की दो वजहें हैं। पहला पूरे चुनाव प्रक्रिया यानि उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक में मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव को हाशिए पर रखा जाना। दूसरा सूबे की कमान को अखिलेश के हाथ में देना और अखिलेश ने बाहुबली नेता डीपी यादव को जिस तरह से पार्टी में शामिल करने से इनकार किया, इससे जनता में संदेश गया कि समाजवादी पार्टी गुंडो से दूरी बनाने की कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि आजम खां पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में हैं, लेकिन उन्हें इस चुनाव में उतनी तवज्जों नहीं मिली जो आमतौर पर मिला करती थी। अखिलेश ने भी अपने पूरे प्रयास से ये साफ कर दिया है कि उनमें नेतृत्व की क्षमता है और वो मुलायम सिंह के बाद पार्टी की जिम्मेदारी बखूबी निभा सकते हैं।
जहां तक विधानसभा चुनाव में सीटों के जीतने का सवाल है। मैं एक कदम आगे बढकर कह सकता हूं कि यूपी में सरकार तो समाजवादी पार्टी ही बनाने जा रही है। बस देखना ये है कि इस सरकार की चाभी कांग्रेस आरएलडी गठबंधन के पास होती है या नहीं। मेरा मानना है कि समाजवादी पार्टी 180 से अधिक सीटें जीत सकती है। बहुमत के लिए उसे 25 से 30 विधायकों की जरूरत होगी, जो इंतजाम करना कोई मुश्किल नहीं होगा, क्योंकि टूटने और बिकने के लिए सबसे मुफीद पार्टी बीएसपी है। यहां नेता बहुत ही प्रोफेसनल हैं, वो पैसा देकर टिकट लेते हैं, तो उन्हें पार्टी छोड़ने में भी कोई खास दिक्कत नहीं होती है।

यूपी के चुनाव को जो लोग ज्यादा करीब से जानते हैं, उन्हें पता है कि यहां अगर समाजवादी पार्टी बेहतर प्रदर्शन करती है तो बीजेपी का प्रदर्शन खुद ही बेहतर हो जाता है। वैसे ही अगर बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर हो तो समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा होगा ही। हो सकता है कि राजनीति के जानकार मेरी बातों से सहमत ना हों, पर यूपी का पूरा चक्कर लगाने और लोगों से बात चीत के आधार पर मेरा मानना है कि सूबे  में दूसरे नंबर की पार्टी बीजेपी ही होगी। यूपी में कुल 75 जिले हैं, मुझे ऐसा कोई जिला नहीं मिला जहां बीजेपी के तीन चार उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में ना हों। ऐसे में अगर बीजेपी 100 से अधिक सीटे जीत ले, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिेए। हालाकि पार्टी नेताओं में इतने बिखराव  के बाद अगर भाजपा बेहतर प्रदर्शन करती है तो उसे एक बार फिर मंथन करने की जरूरत है कि अगर पार्टी के बड़े नेता अनुशासित हो जाएं तो आज भी पार्टी सूबे में सरकार बना सकती है।

फैसला जिसका भी हो पर सच ये है कि बाबू सिंह कुशवाह के मामले में पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। इस मामले में पार्टी नेताओं के पास कोई ठोस जवाब नहीं था, और खुद को दूसरों से अलग कहने वाली पार्टी इस चुनाव में वाकई अलग दिखाई दे रही थी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की हालत ये है कि कई उम्मीदवारों ने मुझे भाईचारे में बताया कि ऊपर से निर्देश आ रहे हैं कि बड़े नेताओं की जनसभा कराऊं। वो इसके लिए तैयार नहीं है, क्योंकि अब पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है, जिसकी वोट की अपील का जनता में कुछ असर होता हो। बल्कि जनसभा की तैयारी में पैसा और समय जरूर बर्बाद होता है। बहरहाल पार्टी नेताओं की ये हालत होने के बाद भी पार्टी का प्रदर्शन इस बार बेहतर होगा।

सांसद अमर सिंह और फिल्म अभिनेत्री सांसद जया प्रदा भी उत्तर प्रदेश के तूफानी दौरे पर थे, पर क्यों थे इस बात का जवाब नहीं मिल रहा है। लोकमंच की खबरें दो बार मीडिया में आईँ, एक बार अमर सिंह हेलीकाप्टर से उतरते समय गिर पड़े तब खबर आई कि अमर सिंह गिर गए, दूसरी खबर तब आई जब जया प्रदा हेलीपैड पर फिसल  गईँ और जमीन पर गिर गईं। इसके अलावा तो इन दोनों की कोई खबर सुनने को नहीं मिली। एक लाइन में कह दूं कि इनके सभी उम्मीदवारों को मिले वोट को जोड़ दिया जाए तो भी किसी एक उम्मीदवार की जमानत नहीं बचेगी। हाहाहहाहाहाहाह.. चलिए कोई बात नहीं।

हां पीसपार्टी अपने लिए नहीं बीजेपी के लिए तुरुप का पत्ता हो सकती है। कई जगहों पर देखा गया है कि मुस्लिम वोट पीसपार्टी उम्मीदवार के साथ भी खड़े दिखाई दिए। अगर पार्टी का ये टैंम्पो आखिरी समय तक बना रहा तो निश्चित ही मुस्लिम वोटों के कटने का नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा, फिर फायदा तो बीजेपी को ही मिलना है। हालाकि सच क्या है ये तो पीसपार्टी के नेता जाने. पर कहा जा रहा है कि पीस पार्टी को बीजेपी और बीएसपी दोनों ने सौ सौ करोड़ से ज्यादा की मदद की है, और हां दो तीन सीटों पर पीसपार्टी का कब्जा हो जाए तो हैरानी की बात नहीं है।

जी एक टीम और यूपी के कुछ इलाकों में घूम रही थी, वो टीम अन्ना। मुझे नहीं पता कि चुनाव आयोग ने इन्हें कैसे सभाएं करने की इजाजत दी। क्योंकि आयोग में इन्होंने कहा कि वो मतदाता जागरूकता के लिए निकले हैं, पर सभा के दौरान वो कांग्रेस के विरोध की बात कर रहे थे, हां ये अलग बात कि वो इशारों में ये बात कह रहे थे। पर इनकी बात का कोई असर वसर कुछ नहीं। पूरे चुनाव में ईमानदारी कहीं मुद्दा ही नहीं  है। अन्ना और बाबा रामदेव पर कोई चर्चा करने को तैयार ही नहीं हैं।

बहुत हो गई चुनाव की बात। आइये अब हम अपने सफर की कुछ तस्वीरें आपको दिखाते हैं। कैसा रहा हमारा 40 दिन का सफर। मित्रों मैं चाहता तो राजनीति के इस लेख में नेताओं की तस्वीरें लगाकर आपके सामने कर देता। पर मुझे लगा कि आपको कुछ लाइट मूड में रखा जाए, देखिए इतना लंबा सफर आसान नहीं  होता है, बहुत सी मुश्किलें आती हैं, उनको निपटाना और अपने कार्यक्रम को कामयाब बना लेने के बाद कुछ ऐसा ही आनंद मिलता है। 























ये वो टीम है जो पूरे 40 दिन एक साथ रही


कुछ इस तरह चलता रहा हमारा सफर। बस की मौज मस्ती..


लोकेशन पर कुछ विमर्श
लोकेशन पर विचार विमर्श 




















अयोध्या का गुफ्तार घाट, चल रही है तैयारी

















ये हमारे गेस्ट नहीं है, चेहरे पर लाइट चेक हो रहा 










काम खत्म, अगले लोकेशन पर  जाने की तैयारी..
कोई बात नहीं दोस्तों....


















ये रात की मस्ती









































जी रात को ढाई बजे होटल में हमारे साथी मुझे डांस के स्टेप बता रहे हैं। अब क्या करें, सीखना ही पडेगा ना....



आगरा गए तो ताजमहल भला क्यों ना जाता














भूख लगी तो ढावे पर खाना बनाने में जुट गए







एक रात सड़क पर ही हो गया धमाल....................