Saturday, 17 September 2011

बहाना है उपवास, मंजिल पीएम निवास


सोचा तो था कि कुछ दिन राजनीति से दूर रह कर बाकी बातें करुंगा। वैसे भी मेरा मानना है कि आज देश में राजनीति जिस स्तर पर पहुंच गई है, उसकी चर्चा सिर्फ पैसेंजर ट्रेन की थर्ड क्लास बोगी में मूंगफली खाते हुए टाइम पास करने भर के लिए ही की जानी चाहिए। इसके लिए किसी को भी अपना कीमती वक्त जाया करने की बिल्कुल जरूरत नही है। लेकिन आज जरूरी हो गया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीन दिन के उपवास पर दो चार बातें कर ली जाएं। 
मोदी के उपवास पर आज सियासी गलियारे में तरह तरह की चर्चा हो रही है। आमतौर पर मोदी जब भी मुंह खोलते हैं तो आग उगलते हैं, पर आज उपवास मंच से मोदी बहुत संयम में दिखे। जबकि वो चाहते तो केंद्र सरकार को फिर कटघरे में खड़ा कर सकते थे, क्योंकि बिना उनकी सलाह के गुजरात में लोकायुक्त की तैनाती का मुद्दा आज भी उन्हें कचोट रहा है। अपने व्यक्तित्व से बिल्कुल अलग मोदी ने पूरे भाषण के दौरान सिर्फ विकास की बात की। पहली दफा उनके मुंह से ये भी सुना गया कि जब तक गुजरात में समाज के हर तबके का विकास नहीं होगा, तब तक विकास की बात करना बेमानी है।
मतलब साफ है, मोदी अपने ऊपर लगे उस दाग को धोना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुजरात में अल्पसंख्यकों को कत्लेआम किया गया। बडा सवाल ये है कि आखिर कौन सी मजबूरी है, जिससे मोदी को ये दाग धोने की जरूरत पड़ रही है। इस दाग की वजह से ही तो वो गुजरात में राज कर रहे हैं। सच ये है कि मोदी अब गुजरात के बजाए देश की बागडोर संभालने की तैयारी कर रहे हैं। वो जानते हैं कि अगर उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुंचना है तो अपने ऊपर लगे इस दाग को धोना ही पडेगा। आपको याद होगा कि बिहार के चुनाव के दौरान वहां के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने बीजेपी आलाकमान को साफ कर दिया था कि नरेन्द्र मोदी को प्रचार के लिए बिहार ना आने दें। चलिए नीतिश की पार्टी अलग है, उनका नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को साफ कर दिया कि वो विकास के नाम पर चुनाव लडेगें और अगर यहां मोदी को प्रचार के लिए भेजा गया तो इसका जनता में गलत संदेश जाएगा और पार्टी को नुकसान होगा। देश के बाकी हिस्सों से अलग थलग पड़ रहे मोदी के लिए जरूरी हो गया है कि वो इस दाग को साफ करें और इसके लिए उन्हें खुद ही पहल करनी पडेगी। 
मेरा मानना है कि मोदी के लिए एक अच्छा मौका था कि वो उपवास के मंच से अल्पसंख्यक समुदाय से माफी मांग लेते और उस घटना की जिम्मेदारी लेते। शायद इससे उनका पाप कुछ जरूर कम हो जाता। लेकिन उन्होंने इस दंगे की तुलना गुजरात में आए भूकंप से करके गमगीन अल्पसंख्यक परिवारों के घाव को फिर हरा कर दिया। ये सच है कि अभी तक इस दंगे में सीधे सीधे कहीं मोदी का नाम सामने नहीं आया है, लेकिन उतना ही सच ये भी है कि कहीं ना कहीं इस दंगे में मोदी सरकार की भूमिका रही है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उसी समय मोदी को राजधर्म का पालन करने की नसीहत दी थी।  

चलिए हम मानते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो हम उसे भूला नहीं कहते। अगर मोदी अपना दाग धोने और आगे से सबको साथ लेकर चलने की बात कर रहे हैं तो उन्हें मौका देने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन कांग्रेस को क्या हो गया है। इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों आ रही है। गुजरात के एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि अगर तीन दिन उपवास करने से मोदी का दाग धुल सकता है तो फिर मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब भी तीन दिन उपवास करके अपना दाग साफ कर सकता है। कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता ने कहा कि उपवास करके गोडसे कभी गांधी नहीं बन सकता, जबकि कांग्रेस के मित्रों आप को खुश होने की जरूरत नहीं है, सच ये है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह कांग्रेस नेताओं की अगुवाई में देश भर में खुलेआम सिखों का कत्लेआम किया गया, ये दाग उतना गहरा है कि कभी साफ नहीं हो सकता।
एक ओर देश में सिखों का कत्लेआम हो रहा था, उसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी का बेतुका बयान आया कि जब बरगद का पेड़ गिरता है तो छोटे छोटे पौधे नीचे दब ही जाते हैं। जो नेता सड़कों पर निकल कर लोगों की हत्या करा रहे थे, उन्हें कांग्रेस ने काफी समय तक मंत्री बनाए रखा। जनता का दबाव ना होता तो कांग्रेस ने तो पिछले चुनाव में भी  हत्याकांड के आरोपियों को उम्मीदवार बनाने के लिए टिकट दे दिया था, जिसे बाद में वापस लेना पडा। पार्टी का जनाधार खिसकता देख 23 साल बाद पार्टी ने सिखों से सार्वजनिक रुप से माफी मांगी, लेकिन गांधी परिवार ने आज तक माफी नहीं मांगी।

इस पूरे घटनाक्रम में अगर मीडिया की चर्चा ना की जाए तो बेमानी होगी। दिल्ली से पत्रकारों का पूरा हुजूम इस समय अहमदाबाद में जमा है। हालांकि लोगों को बहुत मुश्किल हो रही है। उसकी वजह गुजरात का ड्राई स्टेट होना है, वहां शाम को पीने पिलाने का इंतजाम हो तो जाता है, पर जरा मुश्किल होती है। देख रहा हूं कि आज भी सभी लोग वही गुलबर्ग सोसाइटी, उसी पुराने दंगे का अनुभव सुना रहे हैं। एक छोटी सी बात सुनाता हूं, इंदिरा जी की हत्या के बाद बिग बी अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव दिग्गज नेता स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ लड़ रहे थे। अमिताभ अपनी हर सभा में एक ही बात दुहराते थे कि 31 अक्टूबर मुझे नहीं भूलता, उस दिन मैने मां इंदिरा की हत्या देखी और सिर में कफन बांध कर राजनीति में कूद पडा। बहुगुणा जी अपनी सभा में इसका जवाब कुछ इस अंदाज में देते थे, वो कभी अमिताभ का नाम नहीं लेते थे।  कहते थे, कोई लड़का मुंबई से यहां आया है, उसने एक हत्या देख ली है, और राजनीति में कूद पडा़, भाई समझाओ उसे, एक हत्या देखकर राजनीति में कूद पडा, कहीं सौ पचास हत्या देख कर कुंए में ना कूद जाए। कुछ ऐसा ही माहौल दो दिन से गुजरात का है, वहां ज्यादातर मीडियाकर्मियों ने गुजरात का दंगा देख लिया है और वो उससे बाहर निकलने को तैयार ही नहीं हैं। सच ये है कि जिस गुजरात की तस्वीर पेश की जा रही है, वह असली तस्वीर नहीं है, ये वो तस्वीर है जो समय समय पर सियासियों द्वारा क्रिएट की जाती है। 

हां चलते चलते एक लाइन शंकर सिंह बाधेला के लिए भी जरूर कहना चाहूंगा। सब जानते हैं कि बाधेला जी मुख्यमंत्री मोदी के राजनीतिक गुरु हैं। मैं तो जानता था कि जब कोई शिष्य आगे बढता है तो गुरु का मान बढता है। कलयुग में ही ऐसे गुरु हो सकते हैं कि अगर कोई आत्मशुद्दि के लिए उपवास करे, तो उसके खिलाफ उपवास करने गुरु खुद सडक पर बैठ जाए।  

21 comments:

  1. सर, सही बात है... मोदी के पाप नहीं धुल सकते और न ही कांग्रेस के

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  2. http://premchand-sahitya.blogspot.com/

    यदि आप को प्रेमचन्द की कहानियाँ पसन्द हैं तो यह ब्लॉग आप के ही लिये है |

    यदि यह प्रयास अच्छा लगे तो कृपया फालोअर बनकर उत्साहवर्धन करें तथा अपनी बहुमूल्य राय से अवगत करायें |

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  3. आपके विचारों से सहमत।

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  4. राजनीति की मुझे बहुत कम समझ है,महेंद्र जी.
    आपकी प्रस्तुति सार्थक व जानकारीपूर्ण है.
    आभार.

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  5. उपवास का सुवास हो, और अधिक पास हो,
    आस भरा विश्वास हो, दंगा वह भूलिए |

    भागलपुर भागते, देहली दहलात के ??
    घात पे प्रतिघात के, पाप पूरे धो लिए ??

    अंगुलिमाल-वाल्मीकि, भूलो मत यह सीख
    गांधीजी की क्षमा नीति, घोलकर पी लिये |

    प्रयास का उपहास, कांगरेस है निराश
    गिरेबान देख झांक, चौरासी भी खोलिए ||

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  6. ऐसा नहीं है कि दंगे गुजरात में ही हुए है, पर चूंकि यह विरोधी पक्ष के राज्य में हुआ, सत्ता पक्ष को पगडी उछालने का अवसर मिल गया। वैसे तो, यह वैमनस्य उन्हीं की देन है॥

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  7. सपनों को उन्मक्त उड़ान मिले।

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  8. jab tak logon ko nyaay nahi milega sadbhaavna kaise banegi??

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  9. राजनीति को प्रबुद्ध जनों द्वारा गैर अक्लमंदों के लिए खुला छोड़ देना का ही परिणाम हैं ऐसी नौटंकियाँ । मोदी न पी एम के काबिल हैं न ही बन पाएंगे।

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  10. इस ब्लाग पर महिलाओं की कम उपस्थिति कई सवाल खडे़ कर रही है। एक तो ये कि उन्हें राजनीति मे कोई रुचि नहीं है, दूसरा ये कि मोदी से महिलाए डरती हैं, तीसरा ये कि वो इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहती।

    लेकिन मेरा एक सवाल है कि देश की संसद मे बराबर की भागेदारी के लिए कई साल से महिला आरक्षण बिल लाया जाना प्रस्तावित है, कहीं वो गैरजरूरी तो नहीं।

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  11. मुझे तो आपको पढ़ना बहुत अच्छा लगता है साथ ही क्षमा के कुछ शब्द कि समयाभाव के कारण मैं किसी भी ब्लॉग पर सही समय पर नहीं पहुँच पाती हूँ . हाँ ! आराम से पढ़ा करती हूँ . मुझे लगता है कि सबसे मिल भी जाती है..क्षमा.

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  12. सारे राजनेता एक्से ही होते हैं |
    आपने बहुत सही आकलन किया है |अच्छा लेख |
    आशा

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  13. राजनीती में मेरी तो रूचि बिलकुल कम है !
    पर आपका विमर्श अच्छा लगा !

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  14. राजनीति मेरे पल्ले नहीं पड़ती ... यूँ कहें उबाऊ लगती है , हाँ - कुछ चेहरे जोर से ये गीत सुना जाते हैं - 'गोलमाल है भाई सब गोलमाल है ...'

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  15. सब नेता एक से ही है .....आप मीडिया से जुड़े है इस लिए अन्दर का सच क्या है आप ज्यादा अच्छे से जानते है

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  16. मन तो बोहोत कुछ लिखने का था किन्तु आपसे बहस करने का कोई फायदा नहीं है जिसको केवल बीजेपी, मोदी, बाबा के गुनाह तो दीखते है किन्तु कांग्रेसियों के एक भी गुनाह नजर नहीं आते. वैसे शायद कभी आपने कांग्रेसियों के गुनाह भी देखे होते क्या निम्न लिखित दंगो में भी मोदी का हाँथ है ??

    (1) 1964 Communal riots in Rourkela & Jamshedpur | 2000 Killed | Ruling party CONGRESS
    (2) 1947 Communal riots in Bengal | 5000 Killed | Ruling party happened to be CONGRESS
    (3) August 1967 | 200 Killed | Communal riots in Ranchi | Party ruling again CONGRESS
    ... (4) 1969 | Communal riots in Ahmedabad | More than 512 Killed | Ruling party happened to be CONGRESS
    (5) 1970 | Bhiwandi communal riots in Maharashtra | Around 80 killed | Ruling party CONGRESS
    (6) April 1979 | Communal riots in Jamshedpur , West Bengal | More than 125 killed | Ruling party CPIM (Communist Party)
    (7) August 1980 | Moradabad Communal riots | Approx 2000 Killed | Ruling Party CONGRESS
    (8) May 1984 | Communal riots in Bhiwandi | 146 Killed , 611 Inj | Ruling party CONGRESS | CM – Vasandada Patil
    (9) Oct 1984 | Communal riots in Delhi | 2733 Killed | Ruling party CONGRESS
    (10) April 1985 | Communal riots inAhmedabad | 300 Killed | Ruling party CONGRESS
    (11) July 1986 | Communal violence in Ahmedabad | 59 Killed | Ruling party CONGRESS
    (12) Apr-May 1987 | Communal violence in Meerut , UP | 81 killed | Ruling party CONGRESS
    (13) Feb 1983 | Communal violence in Nallie, Assam | 2000 killed | PM – Indira Gandhi (CONGRESS)

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  17. भाई अभिषेक जी,
    आपको क्यों ऐसा लग रहा है कि इस लेख में मोदी को किसी तरह का गुनाहगार बताया गया है। आप अगर इसे ध्यान से पढें तो कांग्रेस की कहीं ज्यादा खिंचाई की गई है।
    इतना ही नहीं मीडिया से जुडे होने के बाद भी इसमें मीडिया की खामियों को भी बताया गया है।
    हां आपका रिसर्च अच्छा है, आगे कभी लिखूंगा तो आपके रिसर्च का फायदा मिलेगा।

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  18. मतलब साफ है, मोदी अपने ऊपर लगे उस दाग को धोना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुजरात में अल्पसंख्यकों को कत्लेआम किया गया। बडा सवाल ये है कि आखिर कौन सी मजबूरी है, जिससे मोदी को ये दाग धोने की जरूरत पड़ रही है। इस दाग की वजह से ही तो वो गुजरात में राज कर रहे हैं। सच ये है कि मोदी अब गुजरात के बजाए देश की बागडोर संभालने की तैयारी कर रहे हैं। वो जानते हैं कि अगर उन्हें पीएम की कुर्सी तक पहुंचना है तो अपने ऊपर लगे इस दाग को धोना ही पडेगा।

    मोदी के दाग ........ मोदी के दाग ........ मोदी के दाग ........ आधे से जादा लेख में आप यही गुनगुना रहे है मोदी जिम्मेदारी ले तो उनके पाप कम हो जायेंगे ये भी आपका ही कहना है. और कह रहे है कांग्रेस की खिचाई की है. मोदी के कार्यकाल में हुए एक दंगे को मिर्च मसाला लगाके आप जैसे महान सेकुलर लोग जब तब अपने लेख में उठाते ही रहते है. मैंने दंगो की इतनी लम्बी लिस्ट दी है उनमें से किसी पर कभी किसी सेकुलर लेखक का ध्यान क्यूँ नहीं जाता है बस इतनी सी बात मेरे पल्ले नहीं पड़ती है.

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।