Tuesday, 7 June 2011

बाबा रामदेव- ना बाबा ना


 बाबा रामदेव पर दो लेख लिखने के बाद सोचा था कि अब बस करते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि चार जून के बाद के घटनाक्रम पर अगर अपनी राय न रखूं तो कुछ अधूरा सा लग रहा है। मित्रों मैं इस बात से सहमत हूं कि देर रात में पुलिस की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी, एक तरफ तो केंद्र सरकार उसी दिन रात 11.30 बजे बाबा को लिखित मसौदा भेज रही है और उसके घंटे भर बाद ही पुलिस कार्रवाई। बाबा के जवाब आने का भी इंतजार नहीं किया गया, यहां मैं सरकार की कारगुजारी से पूरी तरह असहमत हूं। अब हर मुद्दे पर छोटी छोटी बात रखता हूं, जिससे आपको पूरे घटनाक्रम को समझने में आसानी होगी।

दिल्ली में सरकार है ना
बाबा के साथ किए गए दुर्व्यवहार के बारे में मित्रों से बात हो रही थी। सबके अलग अलग विचार थे। मेरी भी राय पूछी गई। मैने साफ कहा कि दिल्ली में मुझे पहली बार लगा कि यहां कोई सरकार काम करती है। सत्याग्रह के नाम यहां जमें नौटंकीबाजों को देर रात में हटाना सही है, या गलत ये बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन मैं सरकार के इस साहस की तारीफ करुंगा कि उन्होंने इतनी बड़ी भीड़ को बलपूर्वक हटाने का फैसला किया। इससे उन लोगों को सबक मिलेगा जो भीड़ को आगे कर सरकार को बंधक बनाने की कोशिश करते हैं। इस फैसले के बाद अब बीजेपी कमजोर सरकार और कमजोर पीएम का राग अलापना तो बंद कर ही देगी।  
 संतों ने बाबा से किया किनारा.
 अनशन के पहले सिर्फ एक धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर जी बाबा का समर्थन कर रहे थे, लेकिन बाबा की हरकत देख बाद में उन्होंने भी किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके अलावा देश में तमाम धर्मगुरु हैं, पर कोई भी धर्मगुरु बाबा के साथ खड़ा क्यों नहीं हो रहा है। क्या बाबा के साधु धर्म की असलियत की जानकारी सभी धर्मगुरुओं को हो गई है। एक डाक्टर पिट जाता है, देश भर के डाक्टर एक जुट हो जाते हैं, एक इंजीनियर की पिटाई होती है, सभी इंजीनियर हड़ताल पर चले जाते हैं, पत्रकार की पिटाई के खिलाफ पत्रकार एकजुट हो जाते हैं। लेकिन ये बात बाबा को सोचनी चाहिए क्यों आज उनके साथ धर्मगुरू नहीं हैं।
बाबा की कारस्तानी..
बाबा रामदेव सरकार से कुछ बातें करते रहे और लोगों को दूसरी बात बता रहे थे। हुआ ये कि एयरपोर्ट पर जब मंत्रियों के ग्रुप से बाबा की बातचीत हुई, तभी ज्यादातर मामले में सहमति बन गई थी। लेकिन बाबा सभी मामलों में लिखित आश्वासन चाहते थे, लिहाजा तय हुआ कि तीन जून को फिर मिलते हैं और सभी बिंदुओं पर लिखित आश्वासन दे दिया जाएगा। अगले दिन सरकार की ओर से बाबा को फोन कर बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया तो, बाबा कुछ बेअंदाज लहजे में बात कर रहे थे। जैसे मैं नार्थ ब्लाक में बात नहीं करुंगा। नार्थ ब्लाक या साउथ ब्लाक  में केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण आफिस हैं। यहां बातचीत की एक अलग गरिमा होती है। बहरहाल बाद में बाबा बात के लिए होटल में मिलने को तैयार हो गए। यहां बातचीत से बाबा पूरी तरह समहत हो गए और सहमति का पत्र भी कपिल सिब्बल को तीन जून को ही थमा दिया और सरकार से बाबा ने आग्रह किया कि अब वो अनशन नहीं करेंगे, लेकिन उन्हें एक दिन तप करने की अनुमति दी जाए। चार जून को दोपहर ढाई बजे तक मैं सब समाप्त कर दूंगा।
वादे से पलटे बाबा 
वादे के मुताबिक बाबा को दोपहर ढाई बजे तप खत्म करना था। इस दौरान भी उनकी लगातार सरकार से फोन पर बातचीत होती रही। और वो अब तब करते रहे। आखिर में बाबा को चेतावनी दी गई कि अगर वो तप खत्म नहीं करते हैं तो सरकार के साथ जो समझौता उन्होंने तीन जून को किया है, उसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा। इस पर बाबा रामदेव हिल गए और उन्होंने शाम को लगभग सात बजे ऐलान किया कि उनकी सभी मांगे मान ली गई हैं, बस कुछ चीजें लिखित में आनी है और उसके बाद हम अपनी जीत मनाएंगे। यहां तक की बाबा समेत सभी लोग मंच पर जयकारा भी करने लगे थे। 
सरकार का रुख सख्त
एयरपोर्ट पर बाबा से मंत्रियों के मिलने से सरकार की काफी छीछालेदर हो चुकी थी। दरअसल मीडिया और बीजेपी ने इस मुलाकात को ऐसे पेश किया जैसे सरकार बाबा के आगे नतमस्तक हो गई है। बाबा को सम्मान देने को जब सरकार की कमजोरी समझी जाने लगी तो सरकार सख्त हो गई और तय किया गया कि अब कोई मुरव्वत नहीं बरती जाएगी। जो बात बाबा से लगातार हो रही है, अगर वो उसे मानते हुए तप खत्म नहीं करते हैं, तो सख्ती बरती जाएगी। बाबा को ये बात पहले बताई भी गई थी। लेकिन बाबा भीड़ देख बेअंदाज थे, उन्हें लग रहा था कि इतनी बडी संख्या में लोग यहां है, पुलिस उनका कुछ नहीं कर पाएगी।

 बाबा और सलवार सूट
 बाबा शाम को काफी देर तक आक्रामक तेवर में बात कर रहे थे। वो शिवाजी और भगत सिंह की बात कर रहे थे। लेकिन पुलिस को देख 15 फीट ऊंचे मंच से बाबा महिलाओं के बीच में कूद गए। उन्हें लगा कि महिलाओं की आड़ लेकर वो यहां से चंपत हो सकते हैं। लेकिन लगातार कैमरे उन्हें कवर किए हुए थे, इसलिए भाग नहीं पाए। लेकिन जैसे ही अंधेरे का आड मिला, बाबा अपना भगवा त्याग कर एक महिला के पहने हुए सलवार सूट को पहन कर भागने की कोशिश की। बाबा जी आप तो मरने से नहीं डरते, लेकिन पुलिस को देखते ही आपने अपना भगवा धर्म तो भंग किया ही, सत्याग्रहियों को उनके हालत पर छोड़ भागने की कोशिश की।
बाबा ने पिटवाया सत्याग्रहियों को
बाबा के पास जव पुलिस पहुंची और उन्हें बताया कि रामलीला मैदान में योग कार्यक्रम की अनुमति रद्द कर दी गई है तो बाबा अगर पुलिस को सहयोग करते तो यहां कोई उपद्रव नहीं होता। पुलिस अधिकारी चाहते थे कि बाबा लोगों को खुद संदेश दें की वो यहां शांति बनाए रखें और पुलिस जैसा कहती है वैसा ही करें, क्योंकि पुलिस ने तमाम बसों का इंतजाम किया था जिससे लोगों को रेलवे स्टेशन या बस अड्डे तक पहुंचाया जा सके। लेकिन बाबा जब महिलाओं के बीच में कूद गए, तब पुलिस को हरकत में आना मजबूरी हो गई। इस तरह से बाबा के सहयोग ना करने के कारण ही वहां लाठी चली, और हां जिस तरह से बाबा ने उतनी ऊंचाई से छलांग लगाई वो कोई साधु संत तो नहीं लग सकता। 
अनशन की हकीकत
हालाकि ये बात बहुत ही भरोसे से नहीं कही जा सकती, लेकिन बाबा के करीबियों में ही कुछ लोग बाबा के बचकानी हरकतों से खफा हैं। उनका कहना है कि बाबा खुद मंच से कहते रहे कि 99 फीसदी मांगे मान ली गई हैं, तो फिर इन्हें तप नहीं करना चाहिए था। वैसे तप करने के पीछे एक वजह करोडों के चेक थे। बताते हैं कि दानदाताओं ने चेक अनशन के लिए दिया था। जब अनशन होता ही नहीं तो बाबा को डर था कि लोग चेक को बैंक से स्टाप पेमेंट ना करा दें। 
झूठ दर झूठ बोलते रहे बाबा
मुझे लगता है कि कम से कम साधु संतो से इतनी अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए कि वो झूठ नहीं बोलेगें, लेकिन ये बाबा तो झूठ का पुलिंदा है। अनशन शुरु करने से पहले ही सरकार से सभी बातें कर चुके थे, लेकिन अपने ही भक्तों को इस बात की जानकारी नहीं दी। लोगों को उकसाने के लिए सत्याग्रहियों से कहते रहे, मुझे दबाने की कोशिश की जा रही है। मेरी हत्या की साजिश की जा रही थी। मेरा एनकाउंटर होने वाला था। डुपट्टे से मेरा गला घोंटने की तैयारी थी। वाह रे बाबा जी..
मुंबई में राजा दिल्ली में बाबा तड़ीपार
एक्टर राजा चौधरी सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा था, लिहाजा मुंबई पुलिस ने उसे मुंबई से तड़ीपार कर दिया। इसी तरह बाबा ने दिल्ली में उपद्रव मचा रखा था। सरकार से बातचीत में सब कुछ ठीक रहता था, बाद में उन्हें कोई पंप कर देता था और वो फिर अड़ जाते थे। आखिर दिल्ली पुलिस ने उन्हें रास्ते पर लाने का फैसला किया और तमाम गंभीर धाराओं में मुकदमें दर्ज करने के बाद दिल्ली से तड़ीपार कर दिया। मुझे लगता है इतने बडे साधु संत को पहली बार किसी शहर से तड़ीपार किया गया है।
 राजघाट को शर्मशार किया
जब सब नाटक में व्यस्त हों तो बीजेपी भला क्यों पीछे रहती। उसे लगा कि बाबा के मामले को देश भर में गरमाने से सरकार के खिलाफ एक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। बाबा के खिलाफ कार्रवाई के गम में नहीं अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ने की खुशी में भाजपाई 24 घंटे के सत्याग्रह पर राजघाट पहुंच गए। यहां जिस तरह से पार्टी के बडे नेताओं ने ठुमके लगाए, उससे कई सवाल खड़े कर दिए। सबसे बड़ा सवाल आखिर ये ठुमका किस खुशी में था । 







Saturday, 4 June 2011

बाबा रे बाबा... ऐसा सत्याग्रह ?




मित्रों ,
बाबा रामदेव ने देश को धोखा दिया। तीन जून को ही बाबा ने सरकार के साथ समझौता कर लिया था। रामदेव कल तक ड्रामा कर रहे थे कि 90 फीसदी बात मान ली गई है, कुछ ही रह गई है। लेकिन सच्चाई ये है कि कपिल सिब्बल के साथ मीटिंग में एक दिन पहले ही वो समझौता कर चुके थे, और बाबा ने लिखित में समझौता भी कर लिया था। सरकार से सिर्फ छह घंटे के लिए तप करने की अनुमति मांगी और कहाकि चार जून को दोपहर ढाई बजे तक सब खत्म कर दूंगा। ये समझौता करने के बाद भी बाबा सुबह मंच से चंदा वसूल रहे थे। क्या सब ड्रामा चंदे के पैसे के लिए था। ये बाबा भी हमाम में ...... है। अब आगे लेख पढिए।

चलिए सबसे पहले असली सत्याग्रह को समझ लिया जाए। 
"सत्याग्रह' का मूल अर्थ है सत्य के प्रति आग्रह (सत्य अ आग्रह) सत्य को पकड़े रहना। अन्याय का सर्वथा विरोध करते हुए अन्यायी के प्रति भी वैरभाव न रखना, सत्याग्रह का मूल लक्षण है। हमें सत्य का पालन करते हुए निर्भयतापूर्वक मृत्य का वरण करना चाहिए और मरते मरते भी जिसके विरुद्ध सत्याग्रह कर रहे हैं, उसके प्रति वैरभाव या क्रोध नहीं करना चाहिए।'
ये एक परिभाषा है, लेकिन आप सोचें की क्या बाबा रामदेव ऐसा कर रहे हैं। वो सरकार में बैठे लोगों पर लगातार हमले कर रहे हैं। उनका कहना है कि हमें जो मंत्री अनशन करने से रोकने में नाकाम रहा है, उसे शीर्षाशन करना पड़ रहा है। ये बाबा नहीं उनका घमंड बोल रहा है। आइये एक और परिभाषा देखते हैं।
"सत्याग्रह' में अपने विरोधी के प्रति हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। धैर्य एवं सहानुभूति से विरोधी को उसकी गलती से मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जो एक को सत्य प्रतीत होता है, वहीं दूसरे को गलत दिखाई दे सकता है। धैर्य का तात्पर्य कष्ट सहन से है। इसलिए इस सिद्धांत का अर्थ हो गया, "विरोधी को कष्ट अथवा पीड़ा देकर नहीं, बल्कि स्वयं कष्ट उठाकर सत्य का रक्षण।'
मतलब साफ है कि आप खुद को कष्ट देकर सत्याग्रह करें। लेकिन बाबा तो अपने और अपने साथ लाए समर्थकों को सुविधा देने के लिए करोडों रुपये का चंदा मांग रहे हैं। बताते हैं कि अब तक देश भर से 50 करोड रुपये से ज्यादा चंदा जमा कर चुके हैं। बाबा पैसे की बर्बादी की खूब बात करते हैं। रामलीला मैदान मे लगभग ढाई करोड की लागत से आरओ लगाया गया है, जिससे पीने के पानी को ठंडा किया जा सके। बाबा जी ये कैसा सत्याग्रह है। एक और परिभाषा देखिए..
सत्याग्रह में स्वयं कष्ट उठाने की बात है। सत्य का पालन करते हुए मृत्यु के वरण की बात है। सत्य और अहिंसा के पुजारी के शस्त्रागार में "उपवास' सबसे शक्तिशाली शस्त्र है। जिसे किसी रूप में हिंसा का आश्रय नहीं लेता है, उसके लिए उपवास अनिवार्य है। मृत्यु पर्यंत कष्ट सहन और इसलिए मृत्यु पर्यत उपवास भी, सत्याग्रही का अंतिम अस्त्र है।' परंतु अगर उपवास दूसरों को मजबूर करने के लिए आत्मपीड़न का रूप ग्रहण करे तो वह त्याज्य है।

पढा आपने, सत्याग्रह में आप स्वयं को कष्ट देते हुए सत्य का पालन मृत्यु तक करना होता है। अरे बाबा जी आप और आपके चेले सत्याग्रह कर रहे हैं ना,  इसमें तो उन्हें कष्ट उठाना है, तब आप खुलेआम लोगों से चंदा रूपी भीख क्यों मांग रहे हो। यहां तो आप शरीर को तपाने आए हो. या मौज करने। यहां आप और आपके चेलों के लिए ठंडी हवा और पानी के लिए करोडो रुपये क्यों खर्च किए जा रहे हैं। आप तो पैसे के बेहतर इस्तेमाल की बड़ी बड़ी बातें करते हो। क्या बाबा जी आपको नहीं लगता कि जिस तरह आप ये पैसा बहा रहे हैं इससे पतंजलि योग पीठ के ही आसपास के कई गांवों में बेहतर सड़क और पानी का इंतजाम किया जा सकता था।
मित्रों सत्याग्रह के असली रुप के बारे में इसलिए भी जानकारी दी जानी जरूरी है कि कल ये कान्वेंट में पढ़ने वाले बच्चें सवाल पूछेगें कि क्या ऐसा ही सत्याग्रह करके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमें आजादी दिलाई थी। क्या बाबा की तरह गांधी जी का भी भव्य मंच बनता था और वहां एसी लगाकर गांधी जी बैठा करते थे और उनके साथ जो लोग होते थे उन्हें पंखे और कूलर की सुविधा दी जाती थी।
क्या गांधी जी भी बाबा की तरह सत्याग्रह के लिए चार्टर्ड प्लेन से आते थे और फिर 35 लाख की कार से सत्याग्रह के स्थान पर सुख सुविधाओं का इंतजाम देखने के लिए तीन दिन पहले पहुंचते थे। जिस मंच पर सत्याग्रह किया जाता था, उसी मंच से क्या गांधी जी भी चंदा वसूलते थे। मित्रों आज आप भावनावश कुछ भी कहें, पर कल आपके बच्चे बड़े होकर पूछेंगे कि गांधी और बाबा के सत्याग्रह में क्या फर्क था। तो क्या आप ये बात नहीं बताएंगे।
सत्याग्रह में दूसरों को तकलीफ दिए बगैर खुद को पीड़ा पहुंचाना होता है। बाबा दूसरों को पीडा पहुंचाने के साथ ही सत्याग्रह से  लोगों के लिए  भी मौत ही तो मांग रहे हैं। वो चाहते हैं कि देश में बेईमानों को फांसी की सजा हो। मित्रों दरअसल देश का यही दुर्भाग्य है कि जिसका जो काम है, वो न करके दूसरा काम कर रहा है। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री स्व. इंदिरागांधी के दो बेटे थे। राजीव गांधी और संजय गांधी। राजीव पायलट थे और संजय राजनीति में थे। दोनों अपना काम कर रहे होते तो आज भी देश की सेवा कर रहे होते। लेकिन संजय ने पायलट बनने की कोशिश की वो हेलीकाप्टर दुर्घटना में मारे गए और राजीव राजनीति में आकर मारे गए। ये सिर्फ एक उदाहरण भर है। मैं फिर कहता हूं कि जिसका जो काम है वो करे, देश को ज्यादा फायदा होगा।

 वैसे भी बाबा जी जिसके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फैंकते। जिस दिन देश की जनता हिसाब मांगेगी कि स्वदेशी के नाम पर पांच रुपये का चूरन 50 रुपये में बेचते हो, तो जवाब नहीं दे पाएंगे। और बाबा जी आपके मंच से गाना बजाना से लेकर उगाही जो सब चल रहा है, उस मंच पर सत्याग्रह को बैनर अच्छा नहीं लग रहा है, कृपया अपने आंदोलन का नाम कुछ और कर लें। प्लीज गांधी जी को बख्श दें। 

अंत में हुल्लड मुरादाबादी की दो लाइनें
गणपति बप्पा मौरिया, गणपति बप्पा मोरिया,

राजघाट में गांधी बाबा, सुबुक सुबुक कर रो रिया।

Thursday, 2 June 2011

बाबा मांगे मौत !



 
तालीबान में युवक युवतियां एक साथ दिखाई दिए तो उन पर सरेआम पत्थर बरसाए जाते हैं, लड़की ने कुछ अनैतिक कर्म किया तो उस पर सरेआम कोडे बरसाए जाते हैं। कई बार तो प्यार करने वाले लड़के लड़कों को सरेआम गोलियों से भून दिया जाता है। तब टीवी चैनलों का एंकर सुबह से ही चीखना शुरू करता है तालीबानी आतंक की कहानी। 15 से 20 सेकेंड के बिजुअल को कई एंगिल से स्लो और फास्ट करके दिखाया जाता है। चैनल फरमान सुना देते हैं कि ये सब गलत हो रहा है और शाम तक तो चैनल के लोग अपनी अपनी तरह से किसी नतीजे पर पहुंच जाते हैं और सजा तक सुनाने पीछे नहीं हटते।
आइये हम सिर्फ एक लाइन में कसाब की बात कर लेते हैं। अगर हम मानते हैं कि मुंबई हमला एक तरह से देश पर हमला था और पकड़ा गया अपराधी छोटा मोटा अपराधी नहीं आतंकवादी है तो उसे मौत की सजा देने के लिए कोई जल्दबाजी में क्यों नहीं है। चलिए टीवी चैनल को छोड़ दीजिए, देश की सबसे ज्यादा फिक्र करने वाले बाबा रामदेव को ही ले लीजिए। कसाब को फांसी दी जाए, इस मामले में बाबा ने अभी तक कुछ नहीं कहा। रामदेव ही क्या उनके जैसे और लोग भी इस मुद्दे पर खामोश ही रहते हैं। ये मसला आता है तो कहते हैं सियासी मसलों पर हम नहीं बात करेंगे।
आइये बताता हूं कि बाबा क्या चाहते हैं। बाबा जी तीन बड़ी चीज मांग रहे हैं। पहला विदेशों में जमा काले धन को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित की जाए और इसे देश में लाया जाए। मैं समझता हूं कि पूरा देश उनकी इस बात का समर्थन करेगा। दूसरी बात वो कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार करने वाले को फांसी पर चढा दिया जाए। इस मामले में मैं ही नहीं देश के ज्यादातर लोग उनके खिलाफ होंगे। आपको पता होगा कि दुनिया भर के दूसरे देश इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि फांसी की सजा को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये अमानवीय है। लेकिन बाबा मौत के हिमायती है। बाबा का ये रूप मेरी समझ के परे है। बाबा की तीसरी बात से भी मैं सहमत नहीं हूं। कह रहे हैं कि देश का प्रधानमंत्री सीधे जनता से चुना जाए।
संसद की गरिमा को नमन करते हुए सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं कि कई बार लफंगे चुनाव जीत कर लोकसभा और विधानसभाओं में पहुंचे हैं। ऐसे ऐसे लोग चुनाव जीत कर आएं हैं, जिन पर हत्या, डकैती, चोरी, बलात्कार जैसे तमाम संगीन मामले चल रहे होते हैं। बाबा जी चुनावी सिस्टम में दोष है और अगर कभी कोई गुंडा प्रधानमंत्री चुन लिया गया तो.....। पांच साल देश कैसे बर्दाश्त करेगा। वैसे भी देश के प्रधानमंत्रियों पर कभी कभार कुछ आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई ऐसा आदमी प्रधानमंत्री नहीं बना है जो इतना भ्रष्ट हो कि जनता त्राहि त्राहि कर रही हो। सवाल उठता है कि इस मांग के पीछे बाबा क्या देख रहे हैं.. कहीं ऐसा तो उनकी भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर हो। उन्हें लग रहा हो कि देश भर में उनके योग के अनुयायी हैं और उनके जरिए कभी वो भी चुनाव जीत कर देश पर राज कर सकते हैं। कहीं बाबा का इस आंदोलन के पीछे कोई छिपा एजेंडा तो नहीं।
वैसे बाबा जी जब मौत की बात करते हैं तो हैरत होती है। मुझे लगता है कि उनकी बात को अगर मान ली जाए, तो देश में बडे राजनेताओं से लेकर छोटे कर्मचारियों तक को मिलाकर कम से कम एक करोड से ज्यादा लोगों को तो तुरंत फांसी पर चढाना होगा। वीआईपी भ्रष्ट ए राजा, सुरेश कलमाडी टाइप लोगों को बाबा के हवाले कर दिया जाए,वही इन्हें फांसी पर चढाएं और अपने इस पुनीत मांग की शुरुआत करें। सच कहूं तो जब से बाबा ने मौत की मांग की है, लग रहा है कि इस बाबा को हो क्या गया है।

बाबा आरामदेव
चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली पहुंचे बाबा सीधे उस रामलीला मैदान गए, जहां उन्हें अनशन पर बैठना है। रामलीला मैदान में पांच सितारा सुविधाओं की तैयारी चल रही है। बाबा को कोई दिक्कत न हो इसके लिए यहां उनके पेड कार्यकर्ता पूरी शिद्दत से लगे हैं। आम कार्यकर्ताओं के लिए पंखे का इंतजाम और बाबा के लिए एसी का। कार्यकर्ता निगम के टैंकर का पानी पीएंगे और बाबा ठंडा पानी।

भीड़ जुटाने का नायाब तरीका
बाबा ने भीड़ जुटाने का नायाब तरीका इस्तेमाल किया। दिल्ली और आसपास करोडों पर्चे बांट कर कहा गया है कि चार जून से रामलीला मैदान में निशुल्क योग शिविर का आयोजन किया गया है। अब योग शिविर के नाम पर तो दिल्ली क्या देश के किसी कोने से लोगों को बुलाया जा सकता है।

और अंत में
बाबा जी आपको पता होगा, देश में चुनाव के दौरान बूथ लूटने वालों को देखते ही गोली मारने का कानून है। चुनाव के दौरान हर जिले का डीएम ये आदेश जारी भी करता है। यूपी, बिहार समेत देश के कई हिस्सों में बूथ लूटे जाते हैं, किसने गोली मार दी। ऐसा कभी नहीं हुआ। बाबा जी कुछ चीजें कानून से नहीं आत्मचिंतन से ठीक होंगी। इसके लिए लोगों को नैतिक रूप से मजूबत करना होगा।

Saturday, 28 May 2011

अंग्रेजों को गांधी ने नहीं गर्मी ने भगाया



आजकल ऑफिस का माहौल ही बदला हुआ है। आमतौर पर जो लोग देर से ऑफिस आते थे और जल्दी चले जाते थे, आजकल समय से पहले आते हैं और ऑफिस का समय खत्म हो जाने के भी काफी देर बाद जाते हैं। ये सब वो लोग हैं, जिन्हें समय से ऑफिस आने और जाने के लिए प्रबंधन ने कई हथकंडे अपनाए, पर वो कामयाब नहीं हो पाए। लेकिन अचानक ये बदलाव देख प्रबंधन के साथ हम सब भी हैरत में है। सच कहूं तो अंदरखाने ये कवायद भी चल रही है कि पता किया जाए कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो ऑफिस पूरे दिन ही भरा भरा रहता है।
अचानक एक दिन सुबह सुबह बॉस का मैसेज मिला, ऑफिस आते ही चैंबर में मुझसे मुलाकात करें। मैं घबरा गया, दो दिन पहले ही तो बॉस से मुलाकात हुई थी, उन्होंने ठीक-ठाक बात की, अब दो दिनों में ऐसा क्या हो गया कि ऑफिस आते ही काम शुरू करने के बजाए पहले उनसे बात करने जाना है। वैसे भी ब्लड प्रेशर का मरीज रहा हूं, काफी मार्निंग वॉक वगैरह करके किसी तरह सबकुछ पटरी पर लाया हूं  अब ये नया बवाल क्या है। कार ड्राइव करने के दौरान तरह तरह के ख्याल दिमाग में आते रहे। खैर जो होगा देखा जाएगा कह कर मन को दिलासा दिलाया और कुछ देर में मैं ऑफिस आ गया। जल्दबाजी में लंच बॉक्स गाडी़ में ही छूट गया।
ऑफिस के अंदर देखा बॉस अपने लैपटाप पर बिजी हैं, बॉडी लैंग्वेज पढ़ने की कोशिश की, सब कुछ सामान्य लग रहा था, खैर मैं उनके चैंबर में घुसा और बोला जी आपने बुलाया था। हां, हां...बैठिए। वो बोले, अरे मुझे कुछ जानना था आपसे, ये आजकल लोगों को क्या हो गया है, समय से पहले ऑफिस आ रहे हैं और समय के बाद भी ऑफिस में काम करते दिखाई दे रहे हैं। मैने कहा कुछ नहीं सालाना इन्क्रींमेंट का समय है, जाहिर है आपकी नजर में थोड़ा नंबर बढा़ना चाहते होंगे। वो बोले, ना ना ऐसा नहीं है। आप पता करके बताइये।
खैर मैं वापस आया और मित्रों से बातचीत शुरू हो गई। अब क्या बताऊं कि, मुझे बॉस ने क्या काम सौंपा है, और किससे पूछें कि भाई आप ऑफिस जल्दी क्यों आते हैं और देर तक क्यों रहते हैं। बॉस का ये सवाल मेरे मन में घूमता रहा। इस बीच लंच टाइम हो गया, हम सभी कैंटीन की ओर रवाना हुए। मुझे ध्यान आया कि मेरा लंच बॉक्स तो गाडी़ में ही रह गया है। गाड़ी से लंच बॉक्स लेकर आया, लेकिन गर्मी की वजह से ये खाना खराब हो चुका था। मित्रों को बताया भाई खाना गर्मी की वजह से खराब हो गया।
लोगों ने ऑफर किया, आइये यहीं बैठिए, हमारे साथ शेयर कीजिए ना। खाना खाने के दौरान बात गर्मी की शुरू हो गई। एक ने कहा गर्मी ने जान निकाल दिया है, मैं तो इसीलिए जल्दी ऑफिस आ जाता हूं और शाम को भी देर तक रहता हूं। सभी मित्रों ने उसकी हां में हां मिलाया और कहा सच है, मैं भी धूप निकलने के पहले ही ऑफिस पहुंच जाता हूं और जब तक मौसम ठीक नहीं हो जाता तब तक घर के लिए नहीं निकलता। हद तब हो गई जब एक मित्र ने ठंडा पानी पीने के बाद कहा कि भाई मुझे तो लगता है कि अंग्रेजों को गांधी ने नहीं गर्मी ने यहां से भगाया। वरना वो कहां दिल्ली छोड़ने वाले थे। सभी ने जोर का ठहाका लगाया और सहमति भी जताई।
लंच के साथ मेरा काम भी बन गया था। आप जानते ही हैं कि बॉस आपको कोई काम दे और आप उसे बिना देरी के कर दें तो आपके नंबर उनकी नजर में बढ़ेंगे ही। बस फिर क्या था लंच के तुरंत बाद उन्हें बताया कि सर दिल्ली की गर्मी से सब बेचैन हैं और इसी लिए जल्दी आते हैं और देर तक ऑफिस में बने रहते हैं। बॉस को सही बात बता तो दिया हूं, लेकिन डरा हुआ मैं भी हूं पता नहीं अब वो कैसे हंटर चलाएं, पता चला लपेटे में मैं भी आ गया।