Thursday, 14 March 2013

किसके मामा हैं इटली में ?


ज सबकी जुबान पर एक ही सवाल है, आखिर इटली में किसके मामा रहते हैं जो उसने इतनी जुर्रत की। इटली के राजदूत  ने सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दायर किया था कि उनके देश में चुनाव चल  रहा है और वहां के दो नागरिकों पर भारत में हत्या का मुकदमा चल रहा है ।  उन्हें वोट डालने के लिए देश जाने की अनुमति दी जाए। वोट डालने के बाद दोनों अभियुक्त भारत वापस आ जाएंगे। राजदूत के हलफनामें और इटली के साथ पुरानी दोस्ती को देखते हुए दोनों अभियुक्तों को इटली जाकर वोट डालने की छूट दे दी गई। लेकिन कोर्ट का यह आदेश अब उल्टा पड़ गया है। इटली सरकार ने साफ कर दिया है कि समुद्र में जिस स्थान पर ये घटना हुई, दरअसल वो भारतीय सीमा क्षेत्र में नहीं है। अगर भारत को कोई आपत्ति है तो इस मामले में वो अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में जा सकता है। अब देश खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

आइये, पहले आपको पूरी घटना बता दें। दरअसल केरल के पास भारत की समुद्री सीमा से एक जहाज गुज़र जा रहा था। उस जहाज के दो नाविकों ने पास में मछली मार रहे एक नाव की तरफ गोली चला दी। इस गोलीबारी में भारत के दो मछुआरों की मौत हो गई। इस मामले में इटली निवासी मासिमिलानो और जिरोन को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा शुरू हुआ । यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन गड़बड़ हो गई 22 फरवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने इटली के चुनाव में वोट देने के नाम पर दोनों को ज़मानत दे दी, वह भी 4 हफ्ते के लिए, अब तीन हफ्ते की मौज़ के बाद इटली ने कहा कि हम हत्यारों को वापस नहीं भजेंगे। सरकार तो खामोशी से पूरे मामले को देखती रही, लेकिन जब संसद में विपक्ष ने इस मामले को जोर शोर से उठाया तो सरकार के पांव तले जमीन खिसक गई।

मैं जानता हूं कि सुप्रीम कोर्ट ने इटली के साथ बेहतर रिश्ते को देखते हुए ही उन्हें वोट डालने की छूट दी होगी। कोई वजह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर किसी तरह का शक  जाहिर किया जाए। लेकिन एक सवाल तो खड़ा होता ही है। क्या किसी भारतीय हत्याभियुक्त को सुप्रीम कोर्ट ये छूट दे सकती है कि वो जेल से अपने गृहनगर जाकर वोट दे। अगर ये सुविधा भारतीय अभियुक्तों के लिए नहीं है तो फिर विदेशियों पर ऐसी मेहरबानी क्यों की गई ? देश में जब ऐसा समय आता है तो ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों और कैदियों को "पोस्टल बैलेट " की सुविधा दी जाती है, मतलब वो जहां है वहीं से अपना वोट डाल सकते हैं। ये सुविधा इटली में भी है। अगर दोनों को वोट डालना इतना ही जरूरी था तो वो यहां अपने दूतावास के जरिए अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे। ये ऐसी ठोस वजह नहीं थी जिसके लिए उन्हें इटली जाने की इजाजत दी जाती।

हमारी गिनती भले ही दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र में होती हो, हम खुद को 'सुपर पावर' कहलाने की हसरत रखते हों, लेकिन इटली ने खुलेआम चौराहे पर ऐसा तमाचा जड़ा है कि गाल पर पड़े ये निशान आसानी से मिटने वाले नहीं है। सच कहूं तो इटली ने भारत को इतना मजबूर बना दिया है कि विदेश मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक कसमसाकर रह गया है। सवाल उठता है कि आखिरकार 6 करोड़ लोगों के देश ने सवा सौ करोड़ आबादी वाले हिंदुस्तान को बेवक़ूफ और बेचारे की हालत में कैसे खड़ा कर दिया। आपको ये भी बता दूं इसके पहले दिसंबर में मछुआरों के ये दोनों हत्यारे क्रिसमस का केक काटने के लिए भी इटली गए थे, लेकिन तब ये केक काटकर वापस लौट आए थे, लेकिन वोट डालने गए, तो वहीं के होकर रह गए. इस महादेश के महानुभावों को मूर्ख बनाकर रोम के हत्यारे उड़ गए और हम कुछ नहीं कर सके।

भारतीय मूर्खता कि एक कहानी बता देता हूं। पता चला है कि वहां चुनाव के दौरान कई नेताओं ने ये मुद्दा उठाया था कि भारत की जेल में बंद अपने नागरिकों को वो हर कीमत पर वापस लाएंगे। अरे भाई जब चुनाव में खुलेआम ये भाषण दिए जा रहे हों, तो सरकार को भी एक बार इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था ना। सरकारी वकील को इस बात की जानकारी कोर्ट को भी देनी चाहिए थी कि ये संवेदनशील मामला है और इस पर बहुत सतर्क होकर निर्णय लेने की जरूरत है। खैर अब डैमेज कंट्रोल की तैयारी है। इसके लिए इटली के राजदूत को तलब किया गया और उन्हें बताया गया कि 22 मार्च तक हत्याभियुक्तों को भारत वापस लाएं, वरना इटली के साथ राजनयिक संबंध बनाए रखना मुश्किल होगा। मतलब साफ है कि इटली के राजदूत को यहां से वापस भेज दिया जाएगा। बहरहाल अब पीएम कुछ भी कहें और सरकार कुछ भी करे, लेकिन दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र के तौर पर इटली ने हमारी हैसियत को तो हवा में उड़ा ही दी है।

कुछ कडवी बात कह दी जाए। दरअसल जब भी किसी मामले में इटली का नाम आता है, हमारे नेताओं और हुक्मरानों के कान खड़े हो जाते हैं। अब मैं ये नहीं कह रहा कि इटली के नाम का असर सुप्रीम कोर्ट पर भी रहा है। लेकिन आम जनता में कुछ इसी तरह का संदेश है। चाहे क्वोत्रोची का मामला हो या फिर हेलीकाप्टर खरीद मे धांधली की बात हो। हर मामले में इटली का नाम जुड़ा है और ये भी कि हम इटली के प्रति साफ्ट हैं। अब ऐसा क्यों है ? ये मैं क्या देश का बच्चा बच्चा जानता है।

सच कहूं तो जब आज संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इटली को खरी खरी सुना रहे थे तो कानों को भरोसा ही नहीं हो रहा था। प्रधानमंत्री भला इटली को कैसे ऐसा कह सकते  हैं। मैं ही नहीं बहुत सारे लोग इसे " जोक आफ द डे " बता रहें थे, क्योंकि संसद से बाहर निकलने के बाद विपक्ष के नेता ही नहीं कांग्रेसी भी खिलखिलाकर हस रहे थे। वैसे मुझे पता  है कि सरकार लाख प्रयास कर ले, कोर्ट भी तमाम प्रयास कर लें, लेकिन हत्याभियुक्तों को लाना उतना आसान नहीं है। मुझे लगता है कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इटली से अपने व्यक्तिगत रिश्तों की बात करते हुए हत्याभियुक्तों की मांग करें तो बात बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त ..

सुप्रीम कोर्ट के रुख को भांजे ने भांप लिया है। मुझे लगता है कि अब कोर्ट कचहरी के बजाए मामा-भांजे ही इस मामले को सलटा लेगें। सच बताऊं तो मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि इटली ने आखिर किसके दम पर ऐसा ऐलान किया है। जाहिर है अपनी ताकत के बल पर तो कत्तई नहीं। क्या इटली को लेकर हमारी नीति में कुछ खोट है, या फिर देश में कांग्रेस की सरकार होने की वजह से वो खुद को बहुत सहज समझता है। उसे लगता है कि जब तक ये सरकार है तब तक कुछ नहीं हो सकता। हालाकि इटली की सरकार अगर ऐसा सोचती है, तो उसके पीछे मजबूत कारण भी है। लेकिन इटली कांग्रेस को भले ही समझ ले, कि वहां उनके शुभचिंतक है, लेकिन "मामा जी " ये मामला मनमोहन को नहीं कोर्ट को देखना है। कोर्ट की हालत ये है कि उसने कोल ब्लाक आवंटन में सीबीआई को फटकार लगाने के साथ ही कहा है कि वो अपनी जांच रिपोर्ट सरकार के साथ साझा ना करे। मतलब समझे, सरकार की नीयत पर ही कोर्ट को शक है।

अब प्रधानमंत्री तो सख्त कदम के नाम पर इटली के राजदूत को ही यहां से वापस भेजने वाले थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सही कदम उठाया। साफ कर दिया कि जब तक कोर्ट इजाजत ना दे, जब तक वो देश के बाहर नहीं जा सकते। मतलब साफ है कि इटली के राजदूत की मुश्किल बढ़ सकती है। दरअसल राजदूतों को कुछ विशेष अधिकार हासिल हैं। लेकिन इटली के राजदूत का मामला अब अलग है। क्योंकि उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि इन दोनों हत्याभियुक्तों को वोट डालने के लिए इटली जाने की इजाजत दी जाए। मैं अगर ये कहूं कि उन्होंने वापसी की गारंटी ली थी, तो गलत नहीं होगा। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने  इटली के राजदूत को भारत छोड़ने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने राजदूत को नोटिस जारी कर 18 मार्च तक जवाब देने को कहा है। मुझे लगता है कि इटली को समय रहते बुद्धि आ जानी चाहिए, क्योंकि ये डरपोक भी हैं।

वैसे वहां की आर्म्स लाबी भी भारत के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहेगी, क्योंकि भारत वहां से बड़ी संख्या में आर्म्स की खरीद करता है। वो भारत को मजबूत बाजार भी समझते हैं। इसलिए वहां के आर्म्स लाबी भी सरकार हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश करेगीय़। उनका भी मानना होगा कि दो नाविकों के चक्कर में भारत के साथ रिश्ते खराब करना ठीक नहीं होगा। वैसे यहां से भी काफी चीजें इटली को निर्यात की जाती हैं। अगर दोनों देशों के रिश्तों में दरार आई तो मुझे लगता है कि इटली को इसकी भारी कीमत चुकानी पडेगी। अभी तो आप सब जानते हैं कि देश में इटली का एक खास दर्जा है। बहरहाल देखना ये है कि इटली आसानी से बात मानकर अपने खास दर्जे को बरकरार रखता है, या फिर दो- दो हाथ करने को मैदान में उतरता है। 







28 comments:

  1. अगर वे यहाँ से जाने में सफल हो गए तो उन्हें लाने में तो हमारी असफलता निश्चित है... कुछ नहीं होने वाला

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    1. कोशिश तो हो रही है.. पर इटली मे अब मामा जी पर कितना जोर चलेगा..

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  2. मामा देता है बना, फिर मामा का बाप |
    बैठो बेटा मातु संग, बिरथा वार्तालाप ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  4. सब गोलमाल है ....सब गोल माल है
    ऐसा लगता है जैसे सोनिया की ही चाल है :)))

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    1. अच्छा सब लोग वहीं समझते हैं, जो मैं समझता हूं।
      मतलब मैने लिखा कि बच्चा बच्चा जानता है, तो गलत नही है।

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    2. आप जो लिख रहें है ...यहाँ सब को बता रहें हैं ...बहुत हद तक सब आप पर बहुत भरोसा करते हैं ...इस लिए हम सब की ये ही गुज़ारिश है कि आप हमेशा की तरह सच ही लिखे....जैसा कि अब तक लिखते आ रहें है

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  5. देखना है कि आधुनिक कृष्ण मामा कंस पर क्या कार्यवाही करेगा!

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    1. हां, ये इंतजार तो हमें भी है सर

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  6. वे भारत में ही रहकर वोट डाल सकते थे .....
    जो भी हो सुप्रीम कोर्ट का इटली के राजदूत को रोकने का फैसला जरुर कुछ आशा दिखा रहा है ,,,
    देखते हैं आगे क्या होता है ....
    सार्थक लेख
    साभार !

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    1. सरकार से तो कोई उम्मीद नहीं है, देखते हैं कोर्ट कितना सख्त हो पाती है..

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  7. दूसरे देशों की सरकारें जानती है हमारी अन्दरूनी राजनीति !

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    1. जी ये बात तो बिल्कुल सही है..

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  8. यह इटली वाला गठजोड़ भारत पर भारी पड़ता जा रहा है ! इन नौसेनिकों वाले मामले पर शुरू से गौर किया जाए और समाचार माध्यमों में आई ख़बरों पर यकीन किया जाए तो माजरा समझ में आ जाएगा ! केरल के मुख्यमंत्री ओमान अगर अपने कड़े रुख पर अडिग नहीं रहते तो केन्द्र सरकार तो इनको कभी का इनको स्वदेश भेज देती !!

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    1. पूरी तरह सहमत हूं..
      अब तो इंतजार ही करना है कि क्या होता है..

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  9. दुखद और शर्मनाक. संसद में बहुमत है ही हम अपने देश को चलाने और इसका" पूरा कल्याण" करने के लिए इसे इटली को ४-५ साल के लिए ठेके पर क्यों नहीं दे देते

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    1. सच मुझे तो डर लग रहा है, कहीं ये सुझाव कांग्रेस को पसंद ना आ जाए..

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    2. राजेश जी , ऐसा हम सोचते हैं कि देश को हमारे लोग चला रहे हैं , देश पिछले ९ सालों से इटली के ठेके पर ही है :)

      सादर

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  10. महेन्द्र जी .सारी कहानी पढने के बाद अपनी मंद-बुधि में तो एक ही बात बैठती है ....
    जमानती को बंधक बना लो ??
    ऐसे हो सके तो उनको डरा लो ....

    खुश रहिये !

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    1. बिल्कुल सहमत हूं सर
      तुरंत हल निकल जाएगा, अगर ऐसा हो..

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  11. शकुनि मामा याद आ गए !

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    1. हां भांजा तो खैर मूर्ख है... लेकिन बदमाशी तो मामा ही कर रहा है...

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  12. bahut khoob likha hai..ji haan jaante hain kyun italy ke prati ye naram raviayya hai... par kya karein ham logon ko to aadat hai na sab sar chadh kar baithe aur tamache jadein vo italy ki beti aur nati...natan aur uska pati apni sena ke saath yahi to kar rhi hai khule aam...

    sunder lekhan jari rakhein... apko padhkar mere samajik gyan mein vridhdhi hoti hai jismein main budhdhu hun :)

    shubhkamnayen

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  13. परेशान मत होइए , हम इतने ढीठ हैं कि हम इस तमाचे के निशान को भी क्रीम-पाउडर से दबा देंगे और रही इटली की बात तो भई इटली के साथ सम्बन्ध उन दो नाविकों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं (जैसे पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध दो सैनिकों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थे), उन संबंधों को हम कैसे बिगड़ने दे सकते हैं | :(

    सादर

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।