Friday, 28 December 2012

शिरड़ी : बाबा के वीआईपी ...


बात बड़े दिन यानि इसी 25 दिसंबर की है। बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी,  मुझे भी आफिस से छुट्टी मिल गई, सोचा चलो बड़े दिन पर कुछ बड़ा करते हैं, शिरड़ी चल कर बाबा का दर्शन कर आते हैं। कार्यक्रम ये बना कि 23 दिसंबर की रात कर्नाटक एक्सप्रेस से दिल्ली से चलें  अगले दिन दोपहर तीन बजे के करीब वहां पहुंच जाऊंगा। चूंकि 25 दिसंबर को बड़ा दिन होने की वजह से बाबा का दर्शन आसान नहीं होगा, लिहाजा 24 को ही बाबा का दर्शन कर रात्रि विश्राम किया जाए और अगले दिन शनि महाराज के यहां हाजिरी लगाकर शाम को वापसी की ट्रेन पकड़ी जाए। पर ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि कुहरे की वजह से हमारी ट्रेन लगभग आठ घंटे लेट हो गई। लिहाजा अब 24 तारीख को तो कुछ होना नहीं था, 25 को दर्शन और वापसी भी थी। क्या करता, पूरा सफर मैने वीआईपी दर्शन के इंतजाम में काट दिया।

वैसे मैं शिरड़ी पहले भी कई बार गया हूं और हर बार वीआईपी रास्ते से ही दर्शन करता रहा हूं। सच कहूं तो मुझे पता भी नहीं था कि यहां लाइन में लगकर दर्शन किया कैसे जाता है। जब भी दर्शन करने गया तो कोई ना कोई साथ होता था, दो तीन कमरो से होता हुआ ना जाने कहां से वो सीधे बाबा के दाहिनी ओर लाकर खड़ा कर देते थे, पलक झपकते दर्शन और मंदिर परिसर से रवाना हो जाता था। इस बार जैसे-जैसे ट्रेन लेट हो रही थी, मेरी धड़कने बढ़ती जा रहीं थीं, मैं सोच रहा था कि कैसे बाबा के और शनि महाराज के दर्शन हो पाएंगे। आप यकीन करें, मै पूरे रास्ते फोन पर लगा रहा कि किसी तरह वीआईपी दर्शन का इंतजाम हो जाए। वैसे ये बड़ा काम नहीं है, हमारे चैनल के रिपोर्टर ही आसानी से पास बनवा देते हैं। लेकिन इस बार दर्शन की तारीख "बड़े दिन" यानि 25 दिसंबर को पड़ गई। इस समय शिरड़ी में बहुत ज्यादा भीड़ है,  इसलिए वहां पास बनाने पर ही रोक लगी हुई थी।

अब मैं जिससे भी बात करुं, सभी हांथ खड़े कर देते कि इस वक्त तो बहुत मुश्किल है। किसी का पास नहीं बन रहा है। बताया गया कि जहां से पास बनते हैं वो आफिस ही बंद कर दिया गया है, इसलिेए पास बनना तो संभव नहीं है। मेरा मन ये मानने को तैयार ही नहीं था कि वीआईपी  दर्शन पूरी तरह बंद होगा। मुझे लगा कि हो सकता है कि हिंदी पत्रकारों की यहां ज्यादा ना चलती हो, लिहाजा मैने मराठी चैनल के भी कुछ पत्रकारों से बात की, पर सबने हाथ खड़े कर दिए। हां मराठी चैनल के एक बंदे ने ये जरूर कहा कि " भाई साहब मुश्किल है, पर हम कोशिश करेंगे, कुछ ना कुछ इंतजाम जरूर होगा "। उसने तो ये बात बड़े ही विश्वास से की, लेकिन मुझे ही भरोसा नहीं हुआ।

पत्रकार बिरादरी, नेता, अफसर सबको  फोन खटखटा चुका तो मुझे ध्यान आया कि अरे मेरा  सहपाठी ही बहुत बड़ा साईं भक्त है। वो साईं संस्थान के ट्रस्टियों में भी शामिल है, ये काम तो उनके लिए बहुत आसान होगा। मैने उन्हें फोन मिलाया, काफी देर तक तो उनका  फोन ही बंद रहा, लेकिन हमारी ट्रेन शिरड़ी पहुंचती, उसके घंटे भर पहले मेरी बात हो गई। उन्होंने कहाकि मैं पांच मिनट में आपको दोबारा फोन करता हूं। मुझे लगा कि अब बाबा ने हमारी बात सुन ली और बेहतर इंतजाम हो ही जाएगा। थोड़ी देर बाद उनका फोन आया, बोले आपको वहां एक यादव जी मिलेंगे, वो आपका सारा इंतजाम करा देंगे। उनका फोन नंबर भी उन्होंने दिया और कहा कि आप एक बार बात कर लें।

दरअसल जिस यादव को मेरे हवाले किया गया था, मै उनसे पहले मिल चुका था, वो वहां बिजली विभाग के कर्मचारी थे और वाकई उन्होंने मुझे एक बार बहुत बढिया दर्शन कराया भी था। लेकिन साल भर पहले हार्ड अटैक से वो नहीं रहे, अब उनकी जगह पर उनका बेटा नौकरी कर रहा है। बेटे से मेरी बात हुई, उसने दर्शन की बात बाद में की, पहले एक होटल की बात की और कहा कि मैने होटल ओके कर दिया है। हालांकि  मैं दिल्ली से चलने के पहले ही नेट के जरिए होटल बुक करा चुका था, उसका कन्फर्मेशन भी मेरे पास आ चुका  था। लेकिन मुझे लगा कि होटल लेने पर ये बंदा और मन से जुटेगा। इसलिए मैने मना नहीं किया और उसके बुक कराए होटल में ही जाने का इरादा कर लिया। ट्रेन रात 10.30 बजे कोपरगांव पहुंची और टैक्सी से लगभग 11 बजे हम शिरड़ी पहुंच गए। यादव जी का बेटा मुझे होटल में मिला, हम कमरे में पहुंचे तो मैने उसे बताया कि मुझे कल ही बाबा और शनि महाराज के दर्शन करने हैं, शाम को वापसी भी है। वापसी की ट्रेन मनमाड़ से है, लिहाजा हमें दोपहर दो बजे के बाद शिरड़ी को छोड़ना होगा। उसने कहा कि "सर मैने तो कुछ दिन पहले ही यहां ज्वाइन किया है, मैं तो दर्शन कराने में कोई मदद नहीं कर सकता, मुझे लगा कि आपको रात में होटल बुक कराने में दिक्कत होगी, लिहाजा मैने ये इंतजाम कर दिया " उसकी बात सुनकर मैं सन्न रह गया।

बहरहाल हम लगभग 26 घंटे ट्रेन का सफर तय करके वहां पहुंचे थे, ट्रेन के एसी 2 बोगी में हमारी बर्थ थी, इसलिए यात्रा आरामदेय ही रही है, लेकिन लंबे सफर से थकान तो स्वाभाविक है। फिर भी मैने बच्चों से कहा कि अब एक ही चारा है, हम सब अभी यानि रात में ही स्नान ध्यान करें और रात में ही 12 बजे लाइन में लग जाते हैं। बाबा के दर्शन को लेकर सभी में उत्साह था, लिहाजा सबने कहा कि ये ठीक है। हम ये बात कर ही रहे थे कि हमारी छोटी बेटी तो स्नान भी कर आईं और बताया कि बाथरूम में गरम पानी नहीं आ रहा है, लेकिन पानी ठीक ठीक है, नहाया जा सकता है। बहरहाल हम सब घंटे भर में ही तैयार होकर नंगे पांव मंदिर की ओर रवाना हो गए। होटल से पैदल मात्र 10 मिनट का रास्ता था मंदिर का, वहां पहुंचे तो दूसरे दर्शनार्थियों का उत्साह देखकर हमारे अँदर भी ऊर्जा का संचार होने लगा।

हमें हाल नंबर तीन में जगह मिली। मतलब हमसे पहले हाल नंबर एक और दो में लोग पहुंच कर लाइन में लग चुके थे। एक हाल में लगभग सात आठ सौ लोग तो जरूर होते होंगे। अनुमान के मुताबिक हमारे आगे लगभग दो हजार लोग होंगे। बारह सवा बाहर बजे रात हम लाइन में लग चुके थे, मंदिर खुलने का समय था सुबह साढे चार बजे। मंदिर  खुलते  ही कांकड आरती होती है ये आप सब जानते हैं। अब मैं इत्मीनान में था कि आरती यहां हाल में लगे टीवी स्क्रिन पर देखेंगे, सुबह छह सात बजे तक हमें दर्शन भी मिल जाएगा। लेकिन बाबा हमारा बहुत इम्तिहान ले चुके थे, जैसे ही मंदिर खुला, लोगों को कांकड़ आरती के लिए मुख्य हाल में जाने की इजाजत मिली, हाल नंबर एक और दो के बाद मेरे हाल का नंबर भी आ गया और हम भी पूरे परिवार के साथ बाबा के सामने मौजूद हो गए और कांकड़ आरती में मैं पहली बार शामिल हुआ।

सुबह के छह नहीं बजे होंगे और हम कांकड आरती, दर्शन, मंदिर का प्रसाद वगैरह लेकर बाहर आ चुके थे। स्वाभाविक है कि पूरी रात के बाद जब भव्य दर्शन करने में कामयाबी मिली थी, तो उत्साह तो था ही। बच्चों से बात होने लगी तो मन से एक बात निकली कि इसके पहले भी कई बार बाबा ने यहां बुलाया तो जरूर, मगर इतना भव्य दर्शन पहली बार दिया है।  फिर मैने वहीं मंदिर में कान पकड़ कर तय किया कि अब आगे से कभी वीआईपी दर्शन के लिए मारा मारी नहीं करुंगा। जब इतनी भीड़ के बाद भी बाबा इतनी सहजता से दर्शन दिए हैं तो सामान्य दिनों में तो क्या कहने। तब तो और आसानी से दर्शन होंगे। यही बात करते हुए हम होटल पहुंचे और देखिए सबकी हिम्मत,  रात भर जागने के बाद भी सबकी यही राय थी कि अभी इसी वक्त शनि महाराज का दर्शन करने निकल पड़ते हैं।

मुझे भी लगा कि बात तो सही है, अगर बिस्तर पर गए तो आलस होगा और जल्दी उठना  मुश्किल हो जाएगा। बस हम सबने एक चाय पी और तुरंत होटल से बाहर आ गए। बाहर निकलते ही एक टैक्सी पर सवार हुए और निकल पड़े शनि महाराज के यहां हाजिरी लगाने। सवा घंटे के सफर के बाद यानि लगभग साढे आठ बजे हम शनि महाराज का भी दर्शन कर खाली हो गए। अब मन में जो शुकून था, उसका अंदाज आप सहज ही लगा सकते हैं। कहां मुझे लग रहा था कि दोनों जगह दर्शन कर पाऊंगा या नहीं, कहां सुबह साढे आठ बजे दर्शन कर हम खाली हो चुके थे। यहीं चाय नाश्ता करने के बाद हम आराम से शिरडी वापस आए और हमने सोचा जब समय है तो क्यों ना साईं बाबा के प्रसादालय में भोजन कर लिया जाए। हम यहां बने नए प्रसादालय पहुंचे, हजारों लोगों की भीड़, लेकिन क्या इंतजाम है, किसी को इंतजार करने की जरूरत नहीं। बमुश्किल यहां 45 मिनट लगे होंगे, हम कूपन लेकर प्रसाद ग्रहण कर चुके थे।

वैसे इस बार कुछ चीजें आंखो में खटकीं भी। बाबा फक्कड़ी स्वभाव के थे, उन्होंने कभी संचय नहीं किया, दिन में भोजन ग्रहण किया तो रात के इंतजाम में नहीं लगे। अब फकीर बाबा के आजू बाजू इतना सोना चांदी जड़ दिया गया है कि वो आंखो में खटकता है। बाबा के बारे में जो कुछ पढ़ा जाता है, वहां का माहौल उससे बिल्कुल अलग होता जा रहा है। कई बार से बाबा के चरण को छूता आ रहा हूं, संगमरमर का वो चरण आज भी आंखों में बसा हुआ है। जब भी बाबा के चरणों को याद करता हूं तो वही संगमरमर का चरण और उस पर पीले रंग का चंदन दो फूल याद आता है। इस बार वहां पहुंचा तो देखा अब पहले वाले चरण को भी बदल दिया गया है, यहां अब सोने के चरण मौजूद हैं, जो इतनी दूर है कि उस पर आप हाथ नहीं लगा सकते। खैर ये तो साईं संस्थान का विषय है, लेकिन मेरा मानना है कि बाबा को साधारण ही रहने दिया जाना चाहिए। इससे लोगों को एक सबक भी मिलता है।

मुझे एक बात बहुत अच्छी लगी। आप भी सुनिए। प्रसादालय में भोजन ग्रहण करने पहुंचा तो काउंटर पर लिखा था, बड़ों का कूपन 40 रुपये का और बच्चों का 20 रुपये। मैने पैसे आगे बढ़ाया तो काउंटर पर पैसे लेने से मना कर दिया। बिना पैसे के कूपन, मुझे बार- बार लग रहा था कि जब काउंटर पर लिखा हुआ है तो आखिर पैसे क्यों नहीं लिए। मैने वहां एक स्टाफ से पूछ ही लिया कि मुझसे पैसे नहीं लिए, तो उसने बताया कि आज का प्रसाद किसी सज्जन की ओर से है। मैने जानना चाहा कि आखिर वो कौन साहब हैं ? पता चला कि उसे भी नाम नहीं पता था, यहां तक की उन सज्जन ने अपना नाम जाहिर करने से मना किया था। आप के साथ भी ऐसा होता होगा कि इलाके में कोई छोटा मोटा धार्मिक आयोजन होता है तो जो कार्ड आपके पास आते हैं, उसमें दो सौ लोगों के नाम दर्ज होते हैं। ये भी लिखा होता है कि पंजीरी का प्रसाद राम प्रसाद की ओर से, चरणामृत का प्रसाद घनश्याम की ओर से, केले का प्रसाद राज कुमार की ओर से, सेब का प्रसाद, जुगुल किशोर और धनिया की पंजीरी करुणा माता की ओर से। आखिर कार्ड पर ये लिखने का क्या मकसद है यही ना कि लोग जान लें की जो प्रसाद वो खा रहे हैं वो भगवान का नहीं घनश्याम का है।

चलते - चलते

मैं एक बार फिर वही बात दुहराना चाहता हूं कि मैने तो वहां कान पकड़ कर तय कर लिया कि अब वीआईपी दर्शन की कभी कोशिश नहीं करुंगा, चाहता हूं कि आप भी एक बार ऐसा करके देखिए। आप खुद महसूस करेंगे कि वीआईपी दर्शन से कहीं ज्यादा शुकून सच्चे श्रद्धालु बनकर दर्शन करने में हैं। वैसे भी अब तो सौ रुपये फीस है, फीस दीजिए वीआईपी बन  जाइये, लेकिन भाइयों बाबा को ही वीआईपी  रहने दीजिए। जय साईं राम !








भव्य प्रसादालय















भक्तों का इंतजार 












( मेरे दूसरे ब्लाग tv स्टेशनhttp://tvstationlive.blogspot.in ) पर भी एक नजर जरूर डालें।  मैने कोशिश की है अपने अंदर झांकने की, यानि ऐसी गंभीर घटनाओं के बाद मीडिया का क्या रोल होना चाहिए, क्या मीडिया को महज भीड़ का हिस्सा बना रहना चाहिए। पढिए. गैंगरेप : मीडिया जिम्मेदार कब होगी ! )

25 comments:

  1. यह तो सही कहा...वी आइ पी दर्शन, दर्शन को निपटाने जैसा लगता है जबकि लाइन में लगकर दर्शन करने में ज्यादा संतुष्टि मिलती है...मैं भी बैंगलोर के इस्कॉन मंदिर में दोनों तरह के दर्शनों का लाभ उठा चुकी हूँ|

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    1. जी मैं बिल्कुल सहमत हूं आपकी बातों से

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  2. हम तो एक बार गये थे, उसके बाद वाकई वहाँ की व्यवसायिकता देखकर दोबारा जाने का कभी मन ही नहीं बना पाये, आप वृन्दावन में ठाकुर जी के सहज दर्शन कर सकते हैं, पर साँई बाबा के नहीं ।

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    1. नहीं विवेक जी ऐसी बात नहीं है, हम तो जाते हैं बाबा के दर्शन करने, खूब जाइये। वहां की चीजों से दूर रहिए और क्या। वैसे वृंदावन में ठाकुर जी का दर्शन भी आसान नहीं है..

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  3. Jai Sai Nath Ki, sundar prastuti वीआईपी दर्शन से कहीं ज्यादा शुकून सच्चे श्रद्धालु बनकर दर्शन करने में हैं

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  4. बाप रे...
    बाबा भी वी आई पी बनाने के रस्ते पर हैं :)

    बचपन से,ही रहा खोजता
    ऐसे , निर्मम, साईं को !
    काश कहीं मिल जाएँ मुझे
    मैं करूँ निरुत्तर,माधव को !
    अब न कोई वरदान चाहिए,सिर्फ शिकायत मेरे मीत !
    विश्व नियंता के दरवाजे , कभी ना जाएँ , मेरे गीत ! ११

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    1. नहीं रास्ता तो हमारा गलत है, बाबा तो अपने श्रद्धालुओं को खाली हाथ बुलाते हैं और हाथ भरकर वापस भेजते हैं...

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  5. सबसे पहले , ओम साईं राम !
    आपके इस लेख ने मुझे वो हिम्मत दी है जिसकी मुझे शायद इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी | असल में आज रात को मुझे कानपुर से शिरडी के लिए निकलना है और यहाँ ठण्ड इतनी पड़ रही है कि घर से निकलने की ही हिम्मत नहीं हो रही | सोचा था कि बाबा सब ठीक करेंगे और अब लग रहा है आपकी पोस्ट के जरिये वो ही मुझसे बात कर रहे हैं |
    अब आपकी पोस्ट की बात | आपकी यात्रा सुखद रही , जानकर बहुत खुशी हुई और उतनी ही खुशी हुई ये जानकर कि आपने बाबा के दरबार में एक आम नागरिक के रूप में अपनी अर्जी लगाई न कि किसी वी.आई.पी. के रूप में | जैसा कि आपने ही लिखा है कि वि.आई.पी. सिर्फ साईं को ही रहने दिया जाये तो ठीक है |
    और उसका आनंद भी आपने लिया |
    मुझे तो हजारों की उस भीड़ में जोर से बाबा का नाम लेना , जयकारे , उद्घोष आदि ये सब बहुत पसंद है और फिर कांकण आरती की तो बात ही निराली है , आपने खुद अनुभव किया होगा | मेरी माँ की वजह से मेरा इतना भी सौभाग्य रहा है कि एक दफा हम सभी लोगों ने कांकण आरती ठीक साईं की दिव्य मूरत के सम्मुख खड़े हो के की | मैं पिछले साल ही माँ-पिता जी और भाई के साथ पहली बार बाबा के दर्शन को गया था , तीन दिन वहाँ रूककर हर रोज बाबा के दर्शन किये , सभी आरती में शामिल हुए (सिर्फ दोपहर वाली आरती को छोड़कर), द्वारिका मई से उठने वाली बाबा की पालकी के भी दर्शन किये |
    आपने शिरडी का जितना भी वर्णन किया है मैं सब से पूरी तरह सहमत हूँ चाहे वो बाबा की कृपा हो या फ़कीर बाबा की मूरत पर बेवजह लादा जाने वाला सोना |
    वैसे वी.आई.पी. दर्शन का मेरा भी एक बहुत बेकार अनुभव रहा है , वैष्णो देवी से आगे शिवखोड़ी की गुफा में एक बार सभी दोस्तों की वजह से मजबूरी में मुझे बैकडोर एंट्री मारनी पड़ी , यकीन मानिये आज भी इस बात का अफ़सोस है |

    सादर

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    1. ओम साईं राम
      बिल्कुल जाइये, आराम से दर्शन होगा, बस रात में लाइन में लग जाइये और सुबह कांकड आरती में शामिल हो जाइये..

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  6. लेकिन भाइयों बाबा को ही वीआईपी रहने दीजिए
    सही कहा है ....बढ़िया लेख !
    बेहिसाब भीड़ को देखकर कभी किसी मंदिर जाने की मुझे
    हिम्मत नहीं होती और लोग समझते है मै नास्तिक हूँ !

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    1. जी ये तो है, भीड़ से थोड़ी घबराहट होती है। लेकिन ऐसा नहीं है, श्रद्धालुओं के अपने अनुभव होते हैं, उसका आनंद लीजिए..

      अब हो ही आइये सांई धाम

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  7. "बाबा को ही वीआईपी रहने दीजिए"
    सही कहा है आपने...बेवजह का सोना लादकर भगवान को भक्तों से दूर करना सर्वथा अनुचित है ...बढ़िया विवरण...नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

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    1. आभार संध्या जी,
      आपको भी नववर्ष की शुभकामनाएं

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  8. om sai ram
    meine pahli bar baba ke darshan kareeb 27 sal pahle kiye the..aaj bhi yad hai dharmshala se nikal kar tahlte hue ham mandir pahunche the sadak kinare ek teen shed ke neeche baba virajman the..unki do karunamayee aankhe aaj bhi unka dhayn karte khud ko dekhti mahsoos hoti hai. jitane chahe der vaha ruko jitani chahe bar darshan karo..na pande na pujari na suraksha..sab sral sulabh..fir kareeb 5 sal bad darshan karne gayee thi 5 ghante ki line aur 1 min ka darshan tab se man me hi dhyan kar leti hu...om sai ram..

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    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने, लगता नहीं कि हम किसी बाबा के मंदिर में हैं। ये सोना चांदी वाकई अखरता है..

      खैर हमें तो बाबा से मतलब, क्या करना है

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  9. बहुत सुन्दर.

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  10. महेंद्र भाई,जो आनंद २-३ घंटे लाइन में लगकर सांई बाबा के दर्शन करने में आता है वो वी०आई०पी० दर्शन करने में कहाँ,,,

    recent post : नववर्ष की बधाई

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-12-2012) के चर्चा मंच-1102 (बिटिया देश को जगाकर सो गई) पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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    1. बहुत बहुत आभार शास्त्री जी
      जय साईं राम

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  12. वीआईपी दर्शन से कहीं ज्यादा शुकून सच्चे श्रद्धालु बनकर दर्शन करने में हैं..........आपकी ये बात बिलकुल सही है

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  13. दिव्य दर्शन हुआ..

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जी, अब बारी है अपनी प्रतिक्रिया देने की। वैसे तो आप खुद इस बात को जानते हैं, लेकिन फिर भी निवेदन करना चाहता हूं कि प्रतिक्रिया संयत और मर्यादित भाषा में हो तो मुझे खुशी होगी।