बाबा रामदेव योग गुरु के रुप में देश दुनिया में जाने जाते हैं, पर इन दिनों वो योग को छोड़ कई दूसरे मामलों में अपनी टांग फंसा चुके हैं। इसलिए वह आए दिन किसी न किसी विवाद में उलझे ही रहते हैं। वो कालेधन का विरोध करते और स्वदेशी की बात भर करते तो किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन स्वदेशी की आड़ में वो अपने खुद के उत्पादों की मार्केटिंग कर रहे हैं। अच्छा रामदेव नियम कायदे से इन कंपनियों का संचालन करते तो शायद इतना ज्यादा विरोध नहीं होता, लेकिन वो भी बाजार की उसी गोरखधंधे का हिस्सा है जो दूसरे लोग कर रहे हैं। यानि अधिक धन की लालसा में टैक्स की चोरी समेत तमाम गैरकानूनी हथकंडे अपनाने के आरोप उनकी कंपनियों पर लगते रहे हैं। बाबा दूसरी कंपनियों के उत्पादों को घटिया और अपने उत्पादों को शुद्ध बताने के साथ सस्ता भी कहते हैं, पर इसमें उतनी सच्चाई बिल्कुल नहीं, जितना दावा किया जा रहा है।
कुछ समय पहले मेरे एक लेख पर बाबा के कुछ समर्थकों ने यहां अभद्र टिप्पणी से वातावरण को दूषित किया। लेकिन मेरा मानना है कि सच को दबाने का ये तरीका सही नहीं है। इसलिए मैने कोशिश की है कुछ और प्रमाणिक तथ्यों के साथ आप सबके पास आऊं। 11 हजार करोड़ से अधिक कारोबारी साम्राज्य के ‘मालिक’ रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव आज विवादों में हैं। केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) उनकी संस्थाओं द्वारा विदेशी लेन-देन की जांच कर रही है, तो उत्तराखंड का बिक्रीकर विभाग उनके विभिन्न ट्रस्टों के खिलाफ टैक्स चोरी की तहकीकात कर रहा है। अब आए दिन दवाओं से लदे उनके ट्रक पकड़े जा रहे हैं। जब इसकी जांच की जाती है तो, भारी टैक्स चोरी का पता चलता है। सबको पता है कि उनका महर्षि पतंजलि आश्रम भी कई तरह के विवादों में घिरा रहा है। बाबा की व्यावसायिकता से परेशान हो उनके तमाम पुराने सहयोगियों ने यहां से किनारा कर लिया है।
हंसी आती है, जब हम बाबा की पुरानी बातों को सुनते हैं। वो कैंसर व एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों को जड़ी-बूटियों से ठीक कर दिए जाने के ‘उल्टे-सीधे’ दावे किया करते थे। इसके खिलाफ मेडिकल काउंसिल भी बाबा रामदेव को कठघरे में खड़ा करने के लिए एकजुट होने लगा था। इसके संभावित खतरे को बाबा भी भांप गए। इसलिए अपने बचाव में उन्होंने हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया है। वे कभी अखिलेश यादव-मुलायम सिंह यादव के दरबार में मत्था टेक रहे हैं। यदि वे अखिलेश सरकार के साथ ही उत्तराखंड सरकार का भी गुणगान करते नजर आएं, तो हैरानी की बात नहीं होगी। सवाल भी तो हजारों करोड़ के साम्राज्य को बचाने का है। वैसे इस बात में कोई दो राय नहीं कि योग को व्यावहारिक बनाने और जन-जन तक पहुंचाने में रामदेव का परिश्रम बेजोड़ है। लेकिन काले धन के सवाल पर केंद्र सरकार को मुश्किल में डालने वाला योग गुरु बाबा रामदेव खुद भी बड़ी मुश्किल में फंसते नजर आ रहे हैं। उनके खिलाफ जांच कर रही केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट में रामदेव की ट्रस्ट की ओर से संचालित कंपनियों के विदेशी लेन देन में गड़बड़झाले की बू सूंघ ली है।
सूत्रों के मुताबिक ईडी ने कुछ ऐसे लेन देन पकड़े हैं, जिनमें उसे घपले-घोटाले का अंदेशा है। रिपोर्ट में ये भी बताया जा रहा है कि बाबा की कई सस्थाएं कालेधन के खेल में शामिल हो सकती हैं। इतना ही नहीं, उत्तराखंड के बिक्री कर विभाग ने भी बाबा की कंपनियों के खिलाफ कई मामले दर्ज किए हैं। बाबा की कहानी शुरू करने से पहले यहां यह बताना जरूरी है कि कुल 34 कंपनियों के किसी भी निदेशक मंडल में बाबा रामदेव नहीं हैं। इसी तकनीकी पहलू का लाभ उठाते हुए वे छाती ठोक कर कहते हैं कि उनके पास ब्लैकमनी का एक भी पैसा नहीं है। जो भी जांच चल रही है, उसे बाबा और उनके समर्थक राजनीति से प्रेरित बताते हैं। पिछले दिनों कुछ ब्लाग को पढने के दौरान मेरी नजर पड़ी
"हमवतन" पर। यहां मुझे इसी विषय पर कई तथ्यपरक जानकारी मिली। लीजिए आप भी देखिए।
ईडी का कसता शिकंजा
प्रवर्तन निदेशालय की एक ताजा गोपनीय रिपोर्ट में रामदेव के विदेशों में किए गए करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन का खुलासा किया गया है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक जांच के दायरे में 64.49 करोड़ की राशि है। बाबा के लगभग 11,000 करोड़ रुपये के साम्राज्य में पांच ट्रस्ट हैं। इनमें तीन ट्रस्ट भारत में हैं, जबकि एक-एक अमेरिका व ब्रिटेन में हैं। कंपनियों की जांच के दौरान ईडी को इतने सारे संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली है कि जांच एजेंसी को अपनी जांच का दायरा बढ़ाना पड़ा है। जांच के दायरे में रामदेव के पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड और दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट की अनेक सहायक कंपनियों के जरिए किए गए निर्यात शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि सहायक कंपनियों का इस्तेमाल भी शक के दायरे में है। इन सहायक कंपनियों में दिव्य फार्मेसी, दिव्य योग साधना और दिव्य प्रकाशन शामिल हैं। ये सभी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के तहत काम करती हैं। आरंभिक जांच में यह भी पता चला है कि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड ने 2009 से 2011 के बीच 20 करोड़ का सामान आयात किया था। जांच के दायरे में दो और लेन-देन हैं। इनमें ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के रूप में एक लाख 50,000 अमेरिकी डॉलर (74.98 लाख रु .) और 2 लाख 42,000 ब्रिटिश पाउंड (1.9 करोड़ रु .) रेमिटेंस शामिल है। निदेशालय के नोट में पांच ऐसे संदिग्ध लेन-देन का खुलासा हुआ है। सभी में फेमा के उल्लंघन की जांच की जा रही है।
जांच में यह भी पता चला है कि पतंजलि आयुर्वेद ने भारतीय निवेश परामर्श और पंजीयन शुल्क नाम से अमेरिका में 6 लाख 10,000 डॉलर (3.04 करोड़ रुपये) भेजे थे। यही नहीं, ‘आस्था’ नाम के चैनल का संचालन करने वाली कंपनी वैदिक ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड ने भी करीब 2 लाख 75000 पाउंड (2.15 करोड़) और 3 लाख 79000 डॉलर (1.89 करोड़ रुपये) विदेश भेजे थे। यह सारी राशि पेशेवर तकनीकी शुल्क के नाम से भेजी गई थी। वैदिक ब्रॉडकास्टिंग उन 34 कंपनियों में शामिल है, जिनका संचालन रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण करते हैं।
पिछले साल अप्रैल माह में रामदेव ने घोषणा की थी कि पतंजलि एक अमेरिकी फर्म को खरीदने वाली है। इसके बाद रांची के निकट बनने जा रहे झारखंड मेगा फूड पार्क की 107 करोड़ रुपये की लागत वाली एक परियोजना में पतंजलि ने 25 फीसदी निवेश किया है। बालकृष्ण और बाबा के एक अन्य सहयोगी स्वामी मुक्तानंद को इस पार्क का निदेशक बनाया गया है। प्रवर्तन निदेशालय के नोट में इस बात का भी जिक्र है कि कंपनी को इक्विटी के रूप में दुबई से भी भारी भरकम निवेश हासिल हुआ था।
ट्रस्ट द्वारा संचालित 34 कंपनियों में से रामदेव खुद किसी भी कंपनी के बोर्ड में शामिल नहीं हैं। वे सीधे तौर पर लाभान्वितों में भी नहीं हैं। सभी कंपनियों में बालकृष्ण का दखल है। वे या तो उनमें प्रबंध निदेशक हैं या फिर निदेशक की हैसियत से हैं, जबकि मुक्तानंद 11 फर्मों में निदेशक हैं। सूत्र बताते हैं कि योग गुरु का सारा कारोबार उनके सहयोगी चला रहे हैं, इसलिए निदेशालय ने अब तक एक बार भी रामदेव को पूछताछ के लिए नहीं बुलाया है।
करोड़ों की सेल्स टैक्स चोरी
ताजा मामला गत 27 मार्च का है। राज्य बिक्री कर विभाग ने बाबा रामदेव की लक्जर स्थित पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से दवाओं से भरे ट्रक पकड़े जिन पर तेरह लाख रुपये मूल्य की दवाएं लदी थीं। बगैर टैक्स चुकाए ये दवाएं ले जाई जा रही थीं। पकड़े जाने पर कंपनी के अधिकारियों ने कहा कि दवाएं गरीबों में बांटने के लिए ले जाई जा रही थीं। इससे पहले भी बाबा रामदेव के कई ट्रस्टों पर सेल्स टैक्स चोरी के आरोप लग चुके हैं। सूत्रों ने बताया कि दिव्य फार्मेसी पर पांच करोड़ रुपये के टैक्स चोरी का आरोप है। जांच के दौरान उत्तराखंड के बिक्री कर विभाग ने बाबा के दिव्य फार्मेसी पर छापा भी मारा था। छापामार टीम का नेतृत्व विभाग के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा ने किया था। सूत्र बताते हैं कि छापे के बाद सरकार में हड़कंप मच गया था। उत्तराखंड के तत्कालीन राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल बेहद खफा हो गए थे। उन्होंने इस संबंध में सरकार से पूरी रिपोर्ट तलब की थी। अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन प्रिंसिपल सेक्रेटरी इंदु कुमार पांडे ने छापे की कार्रवाई को सही व निष्पक्ष करार दिया था। गौर करने योग्य तथ्य यह भी है कि छापा मारने वाले डिप्टी कमिश्नर जगदीश राणा पर दबाव इस कदर पड़ा कि उन्हें चार साल पहले ही रिटायरमेंट लेना पड़ा था।
बाबा स्वदेशी, मदद विदेशी
रामदेव ने अपनी छवि मल्टीनेशनल कंपनियों के विरोधी, स्वदेशी अभियान के कट्टर समर्थक और विकास के देशी रोडमैप तैयार करने वाले के रूप में बनाई है। वे कहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए मैं स्वदेशीकरण का हिमायती हूं। शायद यह काफी कम लोग जानते होंगे कि स्वदेशीकरण के हिमायती बाबा रामदेव ने अपने रेडी-टू-ड्रिंक सॉफ्ट ड्रिंक्स बेचने के लिए अमेरिकी मल्टीनेशनल पैकेजिंग कंपनी टेट्रा से हाथ मिलाया है। आने वाले समय में पतंजलि फलों के करीब 30 नए पेय पदार्थ ऐसी ही पैकिंग में पेश करने की योजना बना रहा है। पहले जूस पूरी तरह कांच व प्लास्टिक की बोतलों में बेचा जाता था। धीरे-धीरे इसकी जगह टेट्रा पैक ले रहा है। इतना ही नहीं बाबा के ट्रस्ट ने अमेरिका में आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी हर्बों बेद का अधिग्रहण कर लिया है। कितने में, यह एक रहस्य है। कुछ साल पहले दिव्य फार्मेसी के 113 मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन छेड़ने पर हमेशा के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था। रामदेव के कारोबारी कदम बहुराष्टÑीय कंपनियों के विरोध में उनके बयानों का समर्थन करते प्रतीत नहीं होते हैं।
रहस्यमय है पतंजलि योगपीठ
पतंजलि योगपीठ शुरू से ही संदेह व सवालों के घेरे में रही है। खोजबीन बताती है कि वर्ष 2006 में इस योगपीठ की स्थापना रामदेव, शंकरदेव, कमला साध्वी, स्वामी कर्मवीर, भूपेंद्र सिंह ठक्कर, जीव राज पटेल और बालकृष्ण ने मिलकर की थी। सपना था पतंजलि को जन-जन तक पहुंचाना और लक्ष्य था, योग को घर-घर तक पहुंचाना। हरिद्वार के आश्रम की पूरी संपत्ति आचार्य शंकरदेव की थी। वर्षों से यह आश्रम गरीब-बेसहारा लोगों का सहारा था। रामदेव ने येन-केन-प्रकारेण यह जगह खाली करवाई थी। मामला कोर्ट तक गया था। लेकिन गरीबों की किसी ने नहीं सुनी। पतंजलि ने और भी बहुत सी जमीनें हासिल कीं और साम्राज्य फैल गया। इन्हीं दिनों रामदेव के भाई रामभरत व बहनोई यशदेव शास्त्री जो शंकरदेव के चेले थे, ने भी पतंजलि में घुसपैठ कर ली थी। इस तरह योगपीठ परिवारवाद से अछूता नहीं रह सका। रामदेव इसके मुखिया बन बैठे।
बाबा के कई साथी लापता
मुखिया बनने व नाम फैलने के साथ ही रामदेव बाबा के व्यवहार में भी बदलाव आया। उनके इस बदलते आचरण से ट्रस्ट के सदस्यों में गुटबाजी शुरू हो गई थी और वे अलग-अलग खेमों में बंट गए। रामदेव की कथित दादागीरी से क्षुब्ध होकर उनके परम मित्र पीठ के उपाध्यक्ष आचार्य कर्मवीर ने त्यागपत्र दे दिया था। ट्रस्ट के सबसे पुराने सदस्यों में से एक साध्वी कमला, जिन्हें आश्रम वाले माता कहकर बुलाते थे, को जबरन आश्रम से निकाल दिया गया था। रहस्यमय तरीके से गायब हुए बाबा रामदेव के गुरु शंकरदेव का आज तक पता नहीं चला है। इसी तरह कई पुराने लोगों ने भी बाबा रामदेव व बालकृष्ण जैसे उनके सहयोगियों के व्यवहार से खफा हो आश्रम से अपना नाता तोड़ लिया। भ्रष्टाचार के कई आरोपों से घिरे आजादी बचाओ आंदोलन के पूर्व संचालक राजीव राधेश्याम दीक्षित पर भी बाबा रामदेव की मेहरबानी हुई थी। काफी कम समय में बाबा ने दीक्षित को भारत स्वाभिमान का राष्टÑीय सचिव व ट्रस्टी बना दिया था, जबकि राजीव दीक्षित को कार्यकर्ताओं के विरोधस्वरूप आजादी बचाओ आंदोलन नामक संस्था छोड़नी पड़ी थी। 30 नवंबर 2010 को रहस्यमय परिस्थितियों में भिलाई में राजीव दीक्षित की मौत हो गई थी। उनकी मौत आज भी एक रहस्य है। क्या देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाले बाबा रामदेव स्वयं भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? क्या योग गुरु की तस्वीर कॉरपोरेट बाबा के रूप में तब्दील नहीं हो गई है? यहां सवाल खड़ा होता है कि क्या बाबा रामदेव की मुहिम के बाद स्विस बैंकों में जमा काला धन स्वदेश लौट आया? क्या मल्टीनेशनल कंपनियों पर किसी तरह की कोई लगाम लगाई जा सकी? देश विदेश में लगातार महंगी संपत्तियों की खरीद फरोख्त, आश्रम के पुराने व अनुभवी लोगों के साथ दुर्व्यवहार, बालकृष्ण जैसे विवादास्पद व्यक्ति को अपनी छत्रछाया में पालना, योग शिविरों के महंगे पैकेज, परिजनों को लाभान्वित कर व्यावसायिक साम्राज्य का विस्तार जैसी घटनाएं साफ संकेत कर रही हैं कि बाबा रामदेव भी पूंजीवाद व बाजारवाद की गिरफ्त में आ गए हैं।
कौन हैं बाबा रामदेव ?
बाबा रामदेव का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के गांव नारनौल में हुआ था। बचपन में उनका नाम रामकिशन यादव था। उन्होंने केवल 8वीं कक्षा तक पढ़ाई की और बाद में घर से भाग गए थे। घर से भागने से लेकर ‘बाबा रामदेव’ बनने तक के उनके सफर के बारे में सिवाय उनके और कोई भी यकीन से कुछ नहीं कह सकता। बताया जाता है कि घर से भागने के बाद वे काफी दिनों तक हरिद्वार के आसपास साइकिल में पंक्चर लगाया करते थे। कोेई कहता है कि 1990 के दशक में वे साइकिल पर आंवला, अदरख आदि बेचा करते थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात किसी ऐसे व्यक्ति से हुई, जो उन्हें गुरुकुल में ले गया। वहीं उन्होंने योग आदि की शिक्षा ली और एक दिन दुनिया के सामने ‘बाबा रामदेव’ बन कर अवतरित हुए।
जांच के दायरे में संदिग्ध लेन-देन
झारखंड मेगा फूड पार्क में निवेश 26.75 करोड़
विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश 2.64 करोड़
2009-11 के बीच सामानों का आयात 20.00 करोड़
अमेरिका की एक कंपनी में निवेश 8.04 करोड़
विदेश से प्राप्त धन 7.06 करोड़
कुल 64.49 करोड़
बाबा पर आरोप
कथित टैक्स चोरी में बाबा रामदेव के कई ट्रस्ट लिप्त।
कई प्रतिबंधित जड़ी-बूटियों का प्रयोग दवा बनाने में।
डोनेशन के तौर पर कालाधन लेना।
सहयोगी बालकृष्ण का पासपोर्ट फर्जी।
बालकृष्ण है नेपाली भगोड़ा।
बालकृष्ण ने किया है अस्त्र-शस्त्र नियमों का उल्लंघन।
फैक्ट्रियों में लेबर लॉ का उल्लंघन।
एड्स व कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को ठीक करने का झूठा दावा।
कारोबारी साम्राज्य
सालाना अनुमानित टर्नओवर 1,100 करोड़
योग कैंप से सालाना 50 करोड़ से अधिक की आमदनी
दवा बिक्री से सालाना 50 करोड़ की आमदनी
पुस्तक व सीडी बिक्री से 2.3 करोड़ सालाना आय
निवेश व अचल संपत्ति
17 करोड़ : विदेश में आइलैंड की कीमत (गिफ्टेड)
1,115 करोड़ : हरिद्वार में एक हजार एकड़ जमीन की कीमत
500 करोड़ : फूड पार्क, हरिद्वार में निवेश
44 करोड़ : झारखंड के फूड पार्क में 40 प्रतिशत स्टेक
100 करोड़ : पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
90 करोड़ : सोलन, हिमाचल प्रदेश में 38 एकड़ जमीन
(कीमत अनुमानित है, हमवतन से साभार)