Saturday, 26 May 2012

शाम होते ही टल्ली हो जाता है अन्ना का गांव ... ( पार्ट 1)


मुझे लगता था कि अब अन्ना के बारे में मैं बहुत लिख चुका हूंबंद किया जाए ये सब, क्योंकि अन्ना और उनकी टीम की असलियत लगभग सामने आ चुकी है, भ्रष्टाचार को लेकर बड़ी बड़ी बातें करने वाली इस टीम पर भी वैसे ही गंभीर आरोप हैं जैसे नेताओं और नौकरशाहों पर। अच्छा चोरी चोरी होती है, इसमें ये कहना कि वो तो 1.76 लाख करोड़ डकार गया, इस बेचारी ने तो हवाई जहाज के किराए में ही चोरी की है, या ये कहें कि फलां सदस्य ने तो सरकार के महज कुछ लाख रुपये दबाए थे, वो भी जमा कर दिए। सवाल ये नहीं है, बड़ा और अहम सवाल ये है कि हमारी नियत कैसी है ? ऐसे में मैं ये कहूं कि चोर चोर मौसेरे भाई तो बिल्कुल गलत नहीं होगा।

खैर छोड़िए ये बातें बहुत हो गईं, आज मैं आपके लिए कुछ नई जानकारी लेकर आया हूं। दरअसल अन्ना के गांव के बारे में इतनी बड़ी बड़ी बातें सुनकर मैं हैरान था, कि क्या वाकई  जिस गांव में अन्ना रहते हैं, वहां कोई शराब नही पीता, तंबाकू पान की दुकाने तक नहीं हैं। गांव में सबके बीच भाईचारा है। मुझे लगा जिस जगह भगवान राम पैदा हुए या फिर भगवान श्रीकृष्ण पैदा हुए वहां तो इतना भाईचारा देखने को नहीं मिलता, अगर अन्ना के गांव रालेगनसिद्दि में ये सब है तो वाकई उनका गांव किसी भगवान का गांव होगा। अच्छा आपको मालूम हो कि घर में कोई मेहमान  बता कर आएगा तो आप घर को साफ सुथरा तो करके रखते ही हैं, घर के बिगडैल बच्चे को भी समझा देते हैं कि देखो कुछ मेहमान आ रहे हैं, बिल्कुल शरारत मत करना, चुपचाप शांत होकर बैठना, जो पूछा जाए बस उसी का जवाब देना, लेकिन मेहमान अचानक  आ जाए तो.. हाहाहहाहा...।

उसी तरह जब कहीं हम अपनी टीम के साथ होते हैं तो कैमरा देखते सब खुद अनुशासित हो जाते हैं और कैमरे के सामने बनावटी बातें शुरू कर देते हैं। लिहाजा मेरे मन में आया कि मैं एक बार जब गांव में कोई ऐसी हलचल ना हो कि मीडिया का वहां डेरा हो तब उनके गांव खाली हाथ जाता हूं और यूं ही घूमकर लोगों से बातचीत कर सच जानने की कोशिश करुंगा। यही सोचकर मैं पुणे पहुंच गया। एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी वाले से बात कर रहा था कि अन्ना के गांव चलना है और रात वहां या आसपास कोई होटल होगा तो वहां रुकूंगा और अगले दिन यहीं एयरपोर्ट पर छोड़ देना। ड्राईवर ने कहा कि चार हजार रुपये लूंगा, लेकिन आपने बिल अधिक पैसे का लिया, जो 30 प्रतिशत मुझे और देना होगा। बिल अधिक का मतलब पूछा तो उसने बताया कि अन्ना आंदोलन जब से शुरु हुआ है बहुत सारी टीमें आती हैं, जो पैसे देते हैं उससे कई गुना ज्यादा का बिल बनवाते हैं। सच पूछो तो पहला झटका एयरपोर्ट पर ही लगा और मैने इसी ड्राईवर को साथ ले लिया कि इस कुछ ज्यादा मालूम होगा।

अब एयरपोर्ट से हम अन्ना के गांव के लिए रवाना हो गए, शहर से बाहर निकले तो ड्राईवर ने पूछा आप मीडिया से हैं। मैने मना किया नहीं, मैं तो दिल्ली से आया हूं, बस यूं ही अन्ना का गांव देखने का मन हो गया। ड्राईवर के बाडी लंग्वेज से मुझे साफ लगा कि वो मेरी बात  से सहमत नहीं है, फिर भी खामोश रहा। थोड़ी देर बाद बोला सर आप चलते समय ही पहले होटल बुक करा लें, वरना कई बार रात में दिक्कत हो जाती है। गांव से पहले शिरूर में होटल सारंग पैलेस है, (होटल का नाम जानबूझ कर बदला हूं) रात बिताने के लिए ठीक है। मैंने भी कहा ठीक है। होटल पहुंचे और कमरे के बारे में जानकारी कर ही रहा था, तो उसने सबसे पहले मैनेजर ने ये बताया कि भाईसाहब मैं आपको होटल का बिल सादे कागज पर दे पाऊंगा, क्योंकि दो महीने में मीडिया के इतने लोग आए और लोगों ने बिल बुक से रसीदें फाड़ लीं। एक कमरे मे कई लोग रुकते थे और कई कई बिल फाड़ ले जाते थे, अब बिल छपने को गए हैं, लिहाजा हम बिल नहीं दे पाएंगे।

मैं हैरान था कि ईमानदारी के आंदोलन को कवर करने आए थे और बेईमानी करते रहे मीडिया वाले। यहां अब मीडिया की चर्चा की जाए तो सच में पूरी किताब लिखी जा सकती है। बेचारे बहुत मुश्किल में थे, यहां की सही तस्वीर दें तो दिल्ली में बैठे बास नाराज होते थे, यहां कुछ ज्यादा बोले तो गांव वाले विफर जाते  थे। गांव के दुकानदार ने बताया कि दिल्ली में अन्ना का अनशन शुरू हुआ तो रालेगनसिद्धि मे बैठे रिपोर्टर क्या करें ? झट से सौ पचास आदमी गांव के पकड़े और बैठा दिया पद्मावती मंदिर परिसर में, और  शोर मचाने लगे कि यहां भी अनशन शुरू हो गया। पहले दिन तो टीवी पर दिखने के लिए तमाम लोग जमा हो गए, पर अगले दिन क्या करे, कोई आदमी बैठने को तैयार ही नहीं। रिपोर्टरों ने फैसला किया कि चलो आज गांव के स्कूली बच्चों को पकड़ लाते हैं, बेचारे बच्चे फंस गए। पर ये ज्यादा दिन तो चल नहीं सकता था, क्योंकि अगले दिन जब गांव वालों से बैठने की बात हुई तो उन्होंने पद्मावती मंदिर परिसर में बैठने के लिए रिपोर्टरों से पैसे की मांग कर दी। लोगों  का कहना था कि आप तो यहां  मलाई काट रहे  हैं, हम क्यों आपके मोहरे बनें। रिपोर्टर बेचारे क्या करते, उन्होंने चैनलों में फोन करके बता दिया कि आज कोई अनशन पर नहीं बैठा है।

गांव की हकीकत एक एक कर मेरे सामने आ रही थी। यहां मेरी मुलाकात एक नौजवान से हुई। वैसे मैं उसका नाम भी लिख सकता हूं, पर उनके गांव वाले जान गए तो उस बंदे की खैर नहीं। लिहाजा इशारा कर देता हूं कि इसके एक पैर में थोड़ी दिक्कत है, जिससे चलने मे इसे परेशानी होती है। अगर इसके अंदर लालच को निकाल दें तो वाकई ये एक अच्छा नौजवान है। थोड़ी देर तक गांव के बारे में बताने के बाद इसने मुझसे  दस रुपये मांगे, मैने कहा क्या हो गया? बोला गुटका खाना है, मैने कहा कि गुटका तो गांव में मिलता ही नहीं, इसके पहले की वो सनक जाता, मैने 50 रुपये का नोट उसे थमा दिया। थोड़ी देर में वो वापस आया और ईमानदारी से 40 रुपये मुझे वापस कर दिए और बताया भाईसाहब दारु तो गुजरात में भी बंद है, फिर तो वहां नहीं मिलनी चाहिए, पर मिलती है ना। रालेगांवसिद्धि में भी नशे का कोई सामान ऐसा नहीं है जो नहीं मिलता है, बस कीमत कुछ अधिक चुकानी पड़ती है। वैसे मैने देखा कि पूरे गांव में जगह जगह गुटके  के पाउच मिल जाएगे। इतना ही नहीं शाम होते ही आधा से ज्यादा गांव टल्ली होकर घूमता फिरता है। हैरानी की बात तो ये है कि नाम सिर्फ लोग टल्ली होकर गांव में घूमते हैं, बल्कि अन्ना जहां रहते हैं पद्मावती मंदिर के आस पास भी ठरकी बंदे आपको मिल जाएंगे। मुझे ताज्जुब होता है कि जब गांव में नशाखोरी का सभी सामान आसानी से मिलता है तो किस आधार पर अन्ना कहते कि उनके गांव में कुछ नहीं होता ?

बात नशाखोरी  की चल रही है तो एक सच्ची घटना भी आपको  बताते चलें। अन्ना की एक आदत है वो गांव के हर अच्छे काम का श्रेय खुद ले लेते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और होती है। इस गांव के 30 साल से भी ज्यादा समय तक सरपंच रहे हैं सदाशिव महापारी। आज भी सरपंच इनके ही बेटे जय सिंह हैं। 1982 में नशामुक्ति की बात चली तो सदाशिव महापारी ने गांव वालों के साथ ये फैसला किया कि यहां अब नशे का सामान नहीं बिकेगा। उन्होने सभी दुकानदारों से कहा कि वो पान, बीड़ी, सिगरेट और तंकाबू सभी चीजें लेकर पंचायत में आएं। सभी दुकानदारों ने सरपंच के सामने पान, बीड़ी सब चीजें जमा कर दीं। दुकानदारों से पूछा गया कि उन्हें कितने पैसे का नुकसान हुआ तो सभी के मिलाकर 2300 रुपये का नुकसान बताया। उस  समय मरापारी ने अपने पैसे से इन सबका भुगतान किया और दुकानदारों को हिदायत दी गई कि अब ये सामान यहां नहीं बिकना चाहिए।

अब मजेदार वाकया सुनिये। पंचायत में कहा गया कि जमा  हुए सिगरेट,  बीड़ी, तंबाकू का आखिर किया  क्या जाए ? तो आज देश भर में ईमानदारी की अलख जगाने निकले हैं,  इस अन्ना ने कहा कि ये सब बगल वाले गांव में बेच दिया जाए। लोग अन्ना की बात सुनकर हंस पड़े,  बेचारे अन्ना  झेंप गए। बाद  मे सरपंच ने फैसला सुनाया कि इसे यहीं सबके सामने जला दिया जाए, ये बात सबकी समझ में आई और पंचायत की  बैठक के दौरान ही इसे जला दिया गया।
इस गांव में एक भ्रष्ट्राचार विरोधी जन आंदोलन न्यास नामक संस्था है। इसकी अगुवाई अन्ना ही करते हैं। कहा जा रहा है कि अगर ईमानदारी से इस संगठन की जांच हो जाए, तो  यहां काम करने वाले तमाम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ेगी। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का एक खास अड्डा है ये दफ्तर। यहां एक साहब हैं, उनके पास बहुत थोड़ी से जमीन है, उनकी मासिक पगार भी महज पांच हजार है, लेकिन उनका रहन सहन देखिए तो आप हैरान हो जाएगा। हाथ में 70 हजार रुपये के मोबाइल पर लगातार वो उंगली फेरते रहते हैं। हालत ये है कि इस आफिस के बारे में खुद रालेगनसिद्दि के लोग तरह तरह की टिप्पणी करते रहते हैं।
 
आज आप इस गांव की हालत सुनेगें तो चौंक जाएंगे। हां मैं इस बात की तारीफ  करता हूं  कि गांव  की ऊसर भूमि (बंजर जमीन) को उपजाऊ बना दिया गया है, आधुनिक संसाधनों  का इस्तेमाल सिचाई की मुकम्मल व्यवस्था की गई है। पैदावार के मामले में गांव के किसान रिकार्ड पैदावार कर रहे हैं। यहां से बड़ी मात्रा मे सब्जी और अन्य सामानों को बड़े शहरों मे भेजा जाता है। इन सबके बाद भी हम ये नहीं कह सकते कि गांव बहुत खुशहाल है। गांव के लोग बहुत नाराज हैं, उन्हें लगता है कि अपने गांव का भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो रहा, भ्रष्टाचारियों के साथ अन्ना देश का भ्रमण कर रहे हैं, बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं। इस गांव में करीब 22 घटे हमने बिताए, मैने देखा कि गांव का आदमी इतना निकम्मा हो चुका है कि अगर उससे आपने किसी के घर का पता भी पूछ लिया तो उसके एवज में वो पैसे मांगता है। इस गांव में जो भी आदमी आपसे थोड़ी देर भी बात करेगा, उसका मीटर शुरू हो जाता है और वो आपसे पैसे की मांग करेगा। सच बताऊं तो आप गांव में अगर तीन घंटा बिताने का मन बनाकर गए हैं तो आधे घंटे में आप के सामने गांव  की जो असल तस्वीर सामने आएगी, उसके बाद आप पांच मिनट यहां रुकना पसंद नहीं करेंगे।    क्रमश......

( अगली किस्त में मैं आपको बताऊंगा कौन है असली अन्ना, अन्ना की असल सच्चाई,  अन्ना के रहन सहन का राज, क्यों डरते हैं  लोग अन्ना से, अन्ना के पीए सुरेश पढारे की हकीकत, बताऊंगा नहीं है अन्ना संत,  मंदिर की कुटिया  मे रहने का दावे मे कितनी सच्चाई.. ये सब जानने के लिए इंतजार कीजिए अगली किस्त.... )

Thursday, 24 May 2012

ऊंचे लोग ऊंची पसंद ....

जी हां, आज यही कहानी सुन लीजिए, ऊंचे लोग ऊंची पसंद । मेरी तरह आपने  भी महसूस किया होगा  कि एयरपोर्ट पर लोग अपने घर या मित्रों से अच्छा खासा अपनी बोलचाल की भाषा में बात करते रहते हैं, लेकिन जैसे ही हवाई जहाज जमीन छोड़ता है, इसमें सवार यात्री भी जमीन से कट जाते हैं और ऊंची ऊंची छोड़ने लगते हैं। मुझे आज भी याद है साल भर पहले मैं  इंडियन एयर लाइंस की फ्लाइट में दिल्ली से  गुवाहाटी जा रहा था । साथ वाली सीट पर  बैठे सज्जन  कोट टाई में थे, मैं तो ज्यादातर जींस टीशर्ट में रही रहता हूं। मैंने उन्हें कुछ देर पहले एयरपोर्ट पर अपने घर वालों से बात करते सुना था, बढिया राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे। लेकिन हवाई जहाज के भीतर कुछ अलग अंदाज में दिखाई देने लगे। सीट पर बैठते ही एयर होस्टेज को कई बार बुलाकर तरह तरह की डिमांड कर दी उन्होंने । खैर मैं समझ गया,  ये टिपिकल केस है । बहरहाल थोड़ी देर बाद ही वो  मेरी तरफ मुखातिब हो गए ।

सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजी में मेरा नाम पूछा तो  मैने उन्हें  बताया कि गुवाहाटी  जा रहा हूं । उन्होंने  फिर दोहराया मैं तो आपका नाम जानना चाहता था, मैने फिर गुवाहाटी ही बताया। उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा,  तो  मैने उन्हें बताया कि मैं  थोडा कम सुनता  हूं और  हां अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं जानता हूं । इस समय उनका  चेहरा देखने लायक था । बहरहाल दो बार गुवाहाटी बताने पर उन्हें मेरा नाम जानने में कोई इंट्रेस्ट नहीं रह गया । कुछ देर बाद उन्होंने कहा कि आप काम  क्या करते हैं। मैने कहा दूध बेचता हूं । दूध बेचते हैं ? वो  घबरा से गए, मैने कहा क्यों ? दूध बेचना गलत है क्या ?  नहीं नहीं  गलत नहीं है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप क्या कह रहे हैं,  मतलब आपकी डेयरी है ? मैने कहा बिल्कुल नहीं  दो भैंस  हैं, दोनो से 12 किलो दूध होता है, 2 किलो घर के इस्तेमाल  के लिए रखते हैं और बाकी  बेच देता हूं।

पूछने  लगे  गुवाहाटी  क्यों  जा रहे हैं.. मैने कहा कि एक भैंस  और खरीदने का इरादा है, जा रहा हूं माता कामाख्या देवी का आशीर्वाद लेने । मित्रों इसके बाद  तो उन सज्जन के यात्रा की ऐसी बाट  लगी कि मैं  क्या बताऊं । दो घंटे की  उडान के दौरान बेचारे अपनी सीट में ऐसा सिमटे रहे कि कहीं वो  हमसे छू ना जाएं । उनकी मानसिकता मैं  समझ रहा  था । उन्हें लग रहा था कि बताओ  वो एक  दूध बेचने वाले  के साथ सफर कर रहे हैं । हालत ये हो गई मित्रों की पूरी यात्रा में वो अपने दोनों हाथ समेट कर अपने पेट पर ही रखे रहे । मैं बेफिक्र था और  आराम  से सफर का लुत्फ उठा रहा था।

मजेदार बात तो यह रही कि शादी के जिस समारोह में मुझे जाना था, वेचारे वे भी वहीं आमंत्रित थे । यूपी कैडर के एक बहुत पुराने आईपीएस वहां तैनात हैं । उनके बेटी की शादी में हमदोनों ही आमंत्रित थे । अब शादी समारोह में मैने भी शूट के अंदर अपने को  दबा रखा था, यहां मुलाकात हुई, तो बेचारे खुद में ना जाने क्यों  शर्मिंदा महसूस कर रहे थे ।  वैसे उनसे रहा नहीं  गया और चलते चलते उनसे हमारा परिचय भी हुआ और फिर काफी देर बात भी । वो  राजस्थान कैडर के आईएएस थे, उन्होंने मुझे अपने प्रदेश में आने का न्यौता भी दिया, हालाकि  मेरी उसके  बाद से फिर बात नहीं हुई।


नोट... वैसे आप ये लेख एक बार पढ़ चुके हैं, लेकिन मुझे सच्ची घटना पर आधारित ये लेख बहुत पसंद है और मैं जब भी मित्रों के बीच होता हूं और हमारे रोचक सफर की बात होती है, तो  मैं इसकी चर्चा जरूर करता हूं। मुझे लगा कि पिछले कुछ समय से विवादों वाले पोस्ट पढकर हम सबका मन खराब है, तो लीजिए जायकेदार पोस्ट ....

Sunday, 20 May 2012

सम्मान से बहुत बड़ा है आत्म सम्मान ...


च कहूं तो इस समय देश की ही ग्रह दशा ही खराब है। हर जगह गंदगी और बेईमानी का का बोलबाला है। लगता है कि सच्चाई और ईमानदारी आज कल किसी हिल स्टेशन  पर बैठकर देश में हो रहे तमाशे को देख रही हैं। बात करें राजनीति की  तो जेल में बंद राजा छूटते ही संसद भवन पहुंच गए और सबसे पहले उन्होंने कलमाड़ी से हाथ मिलाया, आंखो आंखो में कुशल मंगल पूछ लिया। खेल के मैदान में जो हो रहा है वो भी किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में शाहरुख खान के कपड़े उतरवा कर सुरक्षाकर्मियों ने जांच की तो वहां ये जनाब गीद़ड बने रहे, मुंबई में सुरक्षाकर्मी ने कुछ कहा तो जिंदा गाड़ने की बात करने लगे। अब रही सही कसर माल्या टीम के आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ल्यूक पामर्शबैक ने अमेरिकी लड़की के साथ दुर्व्यवहार कर पूरी कर दी। राष्ट्रपति चुनाव में भी कुत्ता फजीहत शुरू हो गई है, शर्मिंदगी की बात ये है कि एक पढ़ा लिखा आदमी कह रहा है कि इस बार किसी आदिवासी को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। अब राष्ट्रपति जैसे अहम पदों पर भी जात पात की बात खुल कर करके शर्मनाक हालात पैदा किए जा रहे हैं। कल को कोई कहेगा कि विकलांग कभी राष्ट्रपति नहीं बना तो क्या विकलांग को बना देंगे। सेना में सबसे ज्यादा ईमानदारी की बात होती थी, बेचारे ईमानदार सेनाध्यक्ष के पीछे आर्म्स दलाल पड़ गए और उन्हें साल भर पहले ही रिटायर होने के लिए मजबूर कर दिया गया। बाजार की रौनक भी गायब है, डालर के मुकाबले रुपया अब तक के न्यूनतम स्तर यानि एक डालर की कीमत आज 54.54 रुपये हो गई है। चलिए भूमिका बहुत हो गई, विषय पर आते हैं।

राजनीति में सौ सौ जूते खाने पड़ते हैं,
कदम कदम पर सौ सौ बाप बनाने पड़ते हैं।

हाहाहाह... जब सब जगह गिरावट और अवमूल्यन हो रहा हो तो बेचारा ब्लाग जगत अपनी अस्मिता कैसे बचाए रख सकता है। ऐसा तो है नहीं कि ये किसी मजबूत आधार पर टिका है, यहां कोई ऐसा है, जिसकी सब रिस्पेक्ट करते हों। दूसरों की तो बात ही अलग है, खुद अभी क्या कह रहे हैं, थोड़ी देर बाद क्या कहेंगे, ये कहना भी मुश्किल है। अब ग्रह और नक्षत्रों के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, हां बहन संगीता पुरी अगर कुछ मदद कर सकें तो वाकई कुछ सकारात्मक हल निकल सकता है। रास्ते से भटके लोगों को ज्योतिष ज्ञान के जरिए कम से कम सही रास्ता तो पुरी दीदी बता ही सकती हैं, मानना और ना मानना उनके हाथ में तो है नहीं। अगर लोगों ने उनके रास्ते को अपनाया तो हो सकता है कि कुछ परिवर्तन देखने को मिले,  वरना क्या है, जैसे चल रहा है, चलता रहेगा।

आप सब जानते हैं कि शरीर में अगर सबसे महत्वपूर्ण कोई हड्डी है तो उसे रीढ़ की हड़डी कहते हैं। इस हड्डी के बिना शरीऱ की कल्पना करने भर से मन घबरा जाता है। लेकिन मुझे हैरानी होती है कि इस हड्डी के रहते हुए भी तमाम ब्लागर्स का व्यवहार ऐसा दिखाई दे रहा है जैसे उनके शरीर में इस हडडी ने काम करना ही बंद कर दिया है या फिर ये हड्डी उनके शरीर में है ही नहीं। सच्चाई ये है कि जब आप गलत होते हैं, तो आप कितना भी खुद को मजबूत दिखने की कोशिश करें, आपकी कमजोरी बार बार आपके सामने आकर खड़ी हो जाती है और चेताती है कि ये गलत कर रहे है। आमतौर पर लोग यहीं अपनी गल्तियों को सुधार लेते हैं, लेकिन अपने मन की न सुनकर भी जब लोग गल्तियां करने पर अमादा रहते हैं तो ऐसे लोग ईमानदार भी नहीं रह जाते। वजह साफ है कि जो आदमी अपने मन की सुनकर भी खुद को दुरुस्त नहीं करता, वो दूसरों की सुनकर भला खुद को क्यों दुरुस्त करेगा। क्योंकि फिर तो उसमें अहम आ जाता है कि ये हैं कौन जो मुझे सलाह दे रहे हैं।

ये वो स्थिति होती है, जहां आदमी के खुद का विवेक शून्य हो जाता है, अब वो कोशिश करता है जनसमर्थन जुटाने का। आप जानते ही हैं कि जनसमर्थन के लिए नीति नियम तो कोई मायने रखते नहीं। क्योंकि इसकी भी सुननी पड़ेगी और उसकी भी। इन  दोनों  के बीच में हालत ये होती है कि बस बेचारी सच्चाई और ईमानदारी पिसती रहती है। आप जानते हैं ईश्वर को पता है कि आदमी ज्यादा ज्ञानी हुआ तो वो ईश्वरीय सत्ता को भी चुनौती दे सकता है, लिहाजा उन्होंने दो अधिकार अपने पास रखे। आदमी का जन्म और मृत्यु। मतलब हम चाहें या ना चाहें जन्म लेगें ही और न चाहते हुए भी मृत्यु भी तय है। अब हमारे पास जन्म से मृत्यु के बीच जो समय है, उसी के दायरे में रहकर अपने जीवन कर्तव्य का निर्वहन करना होगा। देखिए ऐसा नहीं है मैं ज्ञान की कोई ऐसी बातें कर रहा हूं जो आपको नहीं पता है, बल्कि आप सब हमसे ज्यादा जानने वाले लोग हैं। बस फर्क इतना है कि मेरी रीढ़ की हड्डी बहुत मजबूत है, लिहाजा मैं स्वाभिमान से कत्तई समझौता नहीं करता। फिर मैं जिस प्रोफेशन में हू, यहां मेरी रोजाना तरह तरह के लोगों से मुलाकात होती है। इस दौरान मैं देखता हूं कि नेता या नौकरशाह कितना भी बड़ा क्यों ना हो, अगर वो ईमानदार नहीं है तो उसमें नैतिक साहस भी नहीं होता है और दो तीन सवालों के बाद ही वो डगमगा जाता है।

कुछ ऐसी ही हालत आज परिकल्पना परिवार की देख रहा हूं। दशक के ब्लागर के बारे में मेरी एक सहज टिप्पणी थी कि ये मतदान की प्रक्रिया वाकई ठीक नहीं है। इसमें ब्लाग के वरिष्ठ लोगों को चाहिए कि वो कुछ लोगों का नाम शामिल कर दें। हम सब  यहां सीनियर्स की रिस्पेक्ट करते हैं, वही नाम अंतिम हो जाएंगे। लेकिन जब किसी व्यक्ति का अहम पूरे सिस्टम पर भारी होता है तो वो खुद को ज्ञानवान और सामने वाले को मूर्ख समझता है। फिर ये अहम उसका उस समय साथ छोड़ देता जब उसकी  उसे बहुत ज्यादा जरूरत होती है। आज हमारे आदरणीय का अहम कहां चला गया ? लोकतंत्र की बड़ी बड़ी बातें हांकने वाले आज समझौतावादी कैसे हो गए ? हैरान करने वाली बात ये है कि एक दूसरे ब्लागर साथी ने जब कहा कि ये मतदान तो वाकई ठीक नहीं है तो 48 घंटे बाद के रुझान में भाई का नाम शामिल हो गया।  अब देखिए एक साहब का सुझाव आया कि  आपने एक भी दलित ब्लागर का नाम शामिल नहीं किया। इस सुझाव देने वाले का तो भगवान ही मालिक है, पर इस सुझाव को स्वागत योग्य बताकर हमारे आदरणीय भाई ने सम्मान की मर्यादा ही खत्म कर दी। अरे हम दशक का ब्लागर चुनने जा रहे हैं या यहां दलित, पिछडा, अल्पसंख्यक, विकलांग, सीनियर सिटिजन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कैसर और एड्स रोगी का कोटा थोडे ही भरने जा रहे हैं ?


हर शख्स अपनी तस्वीर को बचाकर निकले,
ना जाने किस मोड़ पर किस हाथ से पत्थर निकले।



दरअसल मैने कहा ना कि जब आदमी ईमानदार ना हो तो वह क्या कह रहा है, क्या कर रहा है, खुद नहीं समझ पाता। अगर ऐसा होता तो जो बातें डा. दिव्या की हमारे भाई को आसानी से समझ में आ गईं वही बातें मैने कहीं थी तो उन्हें समझ में क्यों नहीं आई ? मैने कहा तो मुझसे कुतर्क करते रहे। तब मुझे लगा कि भगवान राम ने ठीक ही कहा था कि "भय बिन होय ना प्रीत"। क्योंकि सभी को पता है कि मैं अपनी बातें बहुत ही संयम तरीके से कहता हूं, आप माने ना माने मेरी बला से। लेकिन डा. दिव्या बहन आयरऩ लेडी है, वो पहले आराम से बात समझाने की कोशिश करतीं है, अच्छा हो कि लोग बात यहीं आसानी से समझ जाएं, वरना फिर तो उसकी खैर नहीं। क्योंकि सब जानते  हैं कि परिकल्पना से कहीं ज्यादा उनकी पाठक संख्या है। वो कुछ कहतीं है तो समझ लेना चाहिए कि ब्लाग का एक बडा तपका ये बात कह रहा है। परिकल्पना से कई गुना उनकी पाठक संख्या भी है। ऐसे में जब उन्होंने ये मु्ददा उठाया तो परिकल्पना परिवार में हडकंप मच गया। उन्हें लगा कि विरोधियों की ताकत बढ़ रही है, बस उन्हें अपने खेमें में करने की साजिश शुरू हो गई। लेकिन उनके आड़ मे जो कुछ किया जा रहा है, उससे बदबू आ रही है।

वैसे मैं बहुत ही अदब के साथ आप सबसे कहना चाहता हू कि डैमेज कंट्रोल का सबसे बेहतर तरीका यही था कि परिकल्पना परिवार आपस में बैठता और लोगों की राय जो  ब्लाग पर आ चुकी है, उसके आधार पर कुछ अहम फैसला करता। लेकिन उन्हें  लगता  है कि ब्लाग पर उनके खिलाफ कोई आंदोलन चल रहा है, लिहाजा अपनी संख्या में इजाफा करने की रणनीति बनाई जा रही है, उनका पूरा समय इसी रणनीति पर काम करने में जाया हो रहा है। वैसे इसके लिए जो कुछ किया जा रहा है, वो साहित्य समाज पर ऐसा काला धब्बा है, जिसका दाग कभी मिटने वाला नहीं। नाराज लोगों के मुंह बंद कराने के लिए उनका नाम सम्मान सूची में डाला जा रहा है। ज्यादा नाराजगी हुई तो हो सकता है कि उन्हें दिल्ली आने जाने के लिए हवाई जहाज का टिकट और यहां पांच सितारा होटल का प्रबंध कर दिया जाए। वैसे ये सबके लिए तो संभव नहीं है, गुड लिस्ट वाले ही इसका लाभ उठा पाएंगे। बहरहाल अब कौन समझाए आयोजकों को ? वे कुछ लोगों को तो पांच सितारा होटल और हवाई जहाज का टिकट दे सकते हैं, पर 41 को देना तो मुझे नहीं लगता कि इनके लिए संभव होगा। फिर जिन लोगों का नाम मजबूरी मे रखा गया है, उन्हें तो तारीख बता दी जाएगी और कहा जाएगा कि वो खुद ट्रेन से पहुंचे। खैर डैमेज कंट्रोल का जो तरीका अपनाया जा रहा है उससे तो मुझे लगता है कि ये आयोजक या तो बेचारे बहुत सीधे हैं या फिर 24 कैरेट के मूर्ख। क्योंकि कोई भी ब्लागर दशक के पांच ब्लागर में नहीं चुना जाता है, तो उसे ज्यादा तकलीफ नहीं होगी, उसे लगेगा कि पांच लोगों को ही तो चुनना था, नहीं आया होगा मेरा नाम। पर अब 41 में नाम नही आया तब तो खैर नहीं। उसे लगेगा कि जरूर कुछ गडबड़झाला है। यहां मैं आपको लालू यादव का उदाहरण देना जरूरी समझ रहा हूं। बेचारे लालू ने सोचा कि अपने निर्वाचन क्षेत्र के हर गांव से एक युवा बेरोजगार को रेलवे में नौकरी दे दें। सोचा तो उन्होंने खराब नहीं था, और नौकरी दे भी दी, पर इससे पूरा निर्वाचन क्षेत्र नाराज हो गया कि इतने बड़े गांव से एक को ही नौकरी दी, पूरे गांव को लगा कि मेरे बेटे को नही दी। हालत ये हो गई कि वो अपने पुराने निर्वाचन क्षेत्र यानि जहां उन्होंने नौकरी दी थी वहां से चुनाव हार गए। लालू अगर इस बार दो जगह से चुनाव न लड़े होते तो बेचारे संसद भी न पहुंच पाते।

चलिए दूसरों की बातें बहुत हो गईं। अपनी बात की जाए और मेरा मानना है कि आत्मसम्मान से बढ़कर कोई सम्मान नहीं हो सकता। फिर जब मैं देख रहा हूं कि सम्मान देने वाला ही अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख चुका है तो ये सम्मान महज छलावा, जालसाजी, डैमेज कंट्रोल से ज्यादा कुछ हो ही नहीं सकता। मैं एक बार फिर डा. दिव्या का आभारी हूं कि उन्होंने मेरे नाम का जिक्र सम्मान के लिए किया, पर मैं दिल से जानता हूं कि मैं इसके काबिल नहीं हूं, क्योंकि मेरा आत्मसम्मान अभी जिंदा है। लिहाजा मेरे नाम पर कत्तई विचार ना किया जाए। हां आयोजकों को एक सलाह और कि वो इसी तरह के शिगूफे छोड़ते रहें, जिससे लोग कम से कम खामोश रहेंगे, उनमें उम्मीद होगी कि हो सकता है उनकी भी लाटरी लग जाए। अगर आपने आयोजन के पहले ही सम्मान सूची घोषित कर दी, फिर तो भइया खैर नहीं। वैसे सच में इतना गंदा खेल पहले नहीं देखा था।

नोट.. मित्रों आप सब मेरी ताकत है, इसके बाद भी मेरी सलाह है कि अगर आप सम्मान पाना चाहते हैं तो प्लीज यहां बिल्कुल कमेंट मत कीजिए। यहां सिर्फ वो कमेंट कर सकते हैं जिनके लिए सम्मान से बढ़कर आत्मसम्मान है। मैं आपको सम्मान भले ना दिला सकूं, पर आत्मसम्मान की वो ऊंचाई जरूर दे सकता हूं, जहां से आपको ये सब जो हो रहा है बहुत छोटा और बौना लगेगा।

कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ,
जो घर फूकै आपनो, चले हमारे साथ।


 

Wednesday, 16 May 2012

ये है साजिश का सम्मान ...


 दो दिन में ब्लागर्स के 40 से ज्यादा फोन अंटैंड कर चुका हूं, फोन रिसीव करते ही दूसरी ओर से आवाज आती हैश्रीवास्तव जी बोल रहे हैं, हां बोल रहा हूं, बहुत बहुत मुबारकबाद। फिर वो अपना परिचय देते हैं, बात आगे बढ़ती है। मैने पहले दो चार फोन अटैड किए और दूसरी ओर से मुझे मुबारकबाद दी गई तो मैं हैरान हो गया कि आखिर ऐसी कौन से खुशी है, जो मुझे नहीं मालूम और हमारे ब्लागर बंधुओं को इसकी जानकारी हो गई। बहरहाल बात-चीत में पता चला कि परिकल्पना के चुनाव के तरीकों पर मेरा जो संवाद रविंद्र प्रभात से टिप्पणी के जरिए हुआ ये इनके भी दिल की आवाज थी, लेकिन इनमें से कुछ लोग डरते हैं और कुछ लोग इस टीम से बात करना ही पसंद नहीं करते। अच्छा मैं यहां कोई मोर्चा लेने तो आया नहीं हूं, मैने तो रवींद्र जी की सूचना पर मन में उठी एक स्वाभाविक टिप्पणी की थी । लेकिन अगले दिन खुद रवींद्र जी आक्रामक हो गए और उन्होंने अपने दूसरे लेख में ये बताने की कोशिश की कि मैं लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास ही नहीं करता। दुनिया भर में चुनाव को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, और मैं इस चुनाव का विरोध कर रहा हूं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं था और ना है। बस प्रभात जी अपनी गलत और बात को सही साबित करने के लिए कुतर्क करते रहे और सच की हत्या न हो जाए, इसलिए मुझे उनकी बातों का मजबूरी में जवाब देना पड़ता रहा।
दरअसल कुछ लोगों की आदत होती है या कहें एक तपका ऐसा है जो एक झूठ को तब तक दोहराता रहता है, जब तक वो लोगों को सही ना लगने लगे। अगर आप पहले से आमादा हैं कि आपको कुछ खास लोगों को सम्मानित करना है तो उसके लिए बेवजह का ड्रामा क्यों किया जा रहा है। आप साफ सुथरे तरीके से कहिए कि हमारे निर्णायक मंडल ने इन पांच लोगों को 2012 के सम्मान के लिए चुनाव है। अरे आप कौन सा पदमश्री देने जा रहे हैं कि कोई ऊंगली उठाएगा। तकलीफ तब होती है जब आप बड़ी बड़ी बातें करते हैं और असल तस्वीर कुछ और ही होती है। हम सब जानते हैं कि परिकल्पना सम्मान के लिए कुछ लोगों ने पहले तो 41 लोगों के नाम तय किए। इसकी क्राइट एरिया क्या थी, ये साफ नहीं है। अच्छा आपने अगर 41 लोगों का नाम चुन ही लिया था तो ये वोटिंग में "अन्य" का कालम क्यों दिया ? क्या आपको अपनी इस टीम पर भरोसा नहीं था। अच्छा अगर आप पारदर्शिता दिखाते हुए ये अधिकार ब्लागर को देना चाहते थे कि उनके वोटों के आधार पर पांच नाम तय होंगे, तो क्या आपने जो 41 नाम घोषित किए हैं, उससे ऐसा नहीं लगता है कि ये उन लोगों के साथ बेईमानी है जिनके नाम आपने नहीं दिए।
ईमानदारी तो तब होती जब एक पांच या उससे अधिक लोगों की टीम बनाकर पूरी जिम्मेदारी उनके हवाले कर देते। ये टीम लोगों से आवेदन मांगती, वो जांच पड़ताल करती कि क्या ब्लाग पर जो सामग्री है, वो उनकी अपनी है, क्योंकि बहुत सारे ब्लाग में दूसरों की रचनाएं होती हैं। बहुत सारे ब्लाग में चोरी की रचनाएं होती हैं। बहुत सारे ब्लाग कई मामलों को लेकर विवादित हैं, क्योंकि परिकल्पना एक साहित्यिक मंच है और यहां साफ सुथरे नामांकन जरूरी है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया, फिर ये भी तय होता कि वोट कौन दे सकता है, कम से कम इतना तो किया ही जा सकता था कि जिनके ब्लाग कम से कम साल या छह महीने पुराने हों, वही वोट दे सकते हैं। इससे फर्जी वोटिंग पर रोक लगती। यानि अभी लोग आज ब्लाग बनाकर वोट नहीं डाल सकते थे। अब इन बातों की ओर मैने ध्यान आकृष्ट किया मुझे कहा गया कि मेरा चुनाव और लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं है।
               
महसूस होता है ये दौर-ए तबाही है
शीशे की अदालत है, पत्थर की गवाही है.
दुनिया में कहीं ऐसी तहरीर नहीं मिलती.
कातिल ही मुंसिफ है कातिल ही सिपाही है

जब सम्मान के लिए ब्लाग का नामांकन आपने किया, वोट देने की अपील भी आप कर रहे हैं, वोटों की गिनती भी आप करेंगे  और रिजल्ट आप ही घोषित करेंगे। ये लोकतंत्र है। इसे ही आप कहते हैं कि लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है। और अगर मुझे आप पर शक हो, तो इसकी शिकायत का कोई फोरम है ? बहरहाल आपकी परिकल्पना है, आप सम्मान दे रहे हैं, आप अपने लोगों को चुनें, उन्हें बडे़ से बडा पदक दें, इन सबसे किसी को कोई शिकायत नहीं है। शिकायत ये है कि आप उस पर हम सबका ठप्पा लगवाने की कोशिश ना करें। फिर मैने ही नहीं अगर किसी का कोई सुझाव है तो उसे आइना मत दिखाइये। आप अपने को बुद्धिमान समझे, मुझे लगता है कि किसी को इससे शिकायत नहीं होगी। लेकिन आप सामने वाले को मूर्ख समझें तो मेरे जैसे स्वाभिमानी आदमी को तो जरूर होगी।

हां एक सवाल और बहुत लोगों ने उठाया है कि ब्लागिंग के दस वर्ष हुए हैं या नहीं। नेट पर देखने से इस मामले में साफ तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है। लेकिन ब्लागिंग खासतौर पर इगलिश ब्लागिंग 1993 के आसपास शुरू हो चुकी थी। ये अलग बात है। मैं कहता हूं कि अगर मुझे कोई संदेह है और मैं इस मामले में एक टिप्पणी करता हूं, और आपको लगता है कि मैं गलत कह रहा हूं, तो आप तथ्यों के साथ मेरी जानकारी दुरुस्त कर सकते हैं। अदा जी से मेरी कोई मुलाकात नहीं है, लेकिन मैं उन्हें पढता रहा हूं और उनका प्रशंसक हूं। अगर उन्होंने एक कमेंट में कहा कि ब्लागिंग को अभी दस वर्ष नहीं हुए तो आप जिनका सम्मान कर चुके हैं, उसे ही नसीहत दे रहे हैं कि आप अपने ब्लाग का वर्ष ना बताएं। मैं तो इस जवाब से भी हैरान हूं।
बहरहाल मै पहले भी बता चुका हूं कि मैने अपने मन में उठी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। मैं यहां किसी गुट का सक्रिय सदस्य नहीं हूं। लेकिन मेरी टिप्पणी पर जिस तरह की प्रतिक्रिया आई वो तथ्यात्मक रुप से तो बिल्कुल गलत थी ही, असभ्य भी थी। मैने जितनी बातें की सभ्यता की लक्ष्मण रेखा के दायरे में रह कर ही की। मेरा ये स्पष्ट मत है कि अगर आप किसी काम की अगुवाई नहीं कर सकते और कोई दूसरा व्यक्ति कर रहा है तो उसमें नुक्ताचीनी करने का हक नहीं है। इसलिए मेरा कोई नुक्ताचीनी का मकसद ही नहीं था, बस अगर मेरे मन में सवाल है, तो उसे उठाने में हर्ज क्या है ? इतना ही मेरा मकसद था। 
लेकिन मैं परिकल्पना और वटवृक्ष से जुडे साथियों को बता देना चाहता हूं कि यहां लोग बहुत धैर्यवान हैं। दो दिनों में जितने फोन मैने अटेंड किए और जिस तरह की बातें सामने आईं, मै समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या साहित्य जगत में ऐसा भी होता है। मीडिया से जुडे होने की वजह से मीडिया और राजनीति की गंदगी से तो बखूबी वाकिफ हूं, पर मुझे लगता था कि साहित्य में अभी सुचिता बनी होगी। लेकिन यहां तो तस्वीर और भयावह है। और देखिए लोग पीड़ित भी हैं, फिर भी बेचारे बोल भी नहीं पा रहे हैं। कहते हैं फिर लोग मुझे बिल्कुल अलग थलग कर देगें। कहावत है कि मारे  और रोने भी ना दे। मैने अपनी पहली टिप्पणी में आगाह किया था चुनाव के जरिए कहीं लालू, राजा, कलमाडी जैसे लोग वोटों का जुगाड़ ना कर लें। मसलन गलत लोगों को यहं आने से रोकना चाहिए। पर मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे ये लाइन नहीं लिखनी चाहिए थी, हां मैं गलत था. क्योंकि यहां राजा, कलमाडी, कनिमोझी सब तो पहले से ही मौजूद हैं, फिर मैं क्यों उन्हें कोस रहा हूं। आखिर में

ना समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों ।
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।।