Friday, 30 December 2011

अन्ना की आग में मीडिया का घी ...


लोकपाल बिल का हश्र यही होना था, अन्ना की लगाई आग में मीडिया ने घी डालने का काम किया और सब कुछ जलकर स्वाहा हो गया। यानि हम कहें कि अप्रैल में जब अभियान की शुरुआत अऩ्ना ने की, नौ महीने बाद अब लग रहा था कि हम लोकपाल बिल के बहुत करीब आ चुके हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अयोग्य, दागी, अकुशल और विवादित नेतृत्व के चलते लोकपाल बिल का मामला खटाई में पड़ गया है। सच तो ये है कि ये लड़ाई जहां से शुरू हुई थी वहीं फिर पहुंच गई है। अब हमें जिम्मेदारी तय करनी हो कि आखिर क्यों नहीं पास हो सका लोकपाल बिल। मैं बहुत ही जिम्मेदारी से कहता हूं कि लोकपाल बिल ना पास हो पाने के लिए मुख्य रूप से दो लोग जिम्मेदार हैं। पहली टीम अन्ना खुद और दूसरी मीडिया। यानि टीम अन्ना ने आग लगाया तो मीडिया ने उस आग में घी डालने का काम किया।

दरअसल बेलगाम और बदजुबान टीम अन्ना घमंड में चूर है। उनकी बातचीत का तौर तरीका बहुत ही भद्दा और सामान्य आचरण के खिलाफ है। ये बात ठीक है सरकार जनता की सेवक है और मतदाता मालिक है। लेकिन ये भी सही है कि सरकार कोई भी काम देश के हर मालिक से राय लेकर करे तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि गांव में एक हैंडपंप तक नहीं लग सकता। किसी गांव के लिए एक हैंडपंप मंजूर होता है, तो विवाद शुरू हो जाता है कि इसे कहां लगाया जाए ? हर आदमी चाहता है कि हैंडपंप उसके घर के करीब लगे। भला ये कैसे संभव हो सकता है, हालत ये होती है कि यही मालिक बनी जनता आपस में जूतम पैजार कर लेती है। बाद में कमजोरों की लड़ाई का फायदा दबंग को मिलता है, और कहा जाता है कि उसके दरवाजे पर हैंडपंप लगने से किसी को एतराज नहीं होगा।

  अन्ना के आँदोलन के मामले में अगर आप शुरू से मेरे लेख को देंखे तो साफ हो जाएगा कि मैने पहले ही कह दिया था कि अन्ना का मुद्दा बिल्कुल सही है, लेकिन उनका तरीका गलत है। मंच से नेताओं को चोर कहना, ऐलान करना की लोकपाल बन गया तो आधे से ज्यादा मंत्री जेल में होगे, 180 भ्रष्ट सांसद हैं, बिल का समर्थन ना करने वालों के घर के बाहर धरना देंगे। अन्ना और अऩ्ना की टीम ने जिस असभ्य तरीके से संसद और सांसदों पर हमला बोला, उससे पहले ही साफ हो गया कि अब इस बिल का कुछ नहीं होने वाला है। गांव में कहावत है कि सूप बोले तो बोले चलनियों बोले, जिसमें 72 छेद। वैसे अन्ना हजारे अगर कुछ कहते हैं तो लोग उन्हें सुनते और स्वीकारते भी हैं, पर टीम अन्ना के  अग्रिम पंक्ति के ज्यादातर लोग विवादित छवि के हैं। इन पर भी गंभीर आरोप लगे हुए हैं। इसके बावजूद किरन बेदी ने जिस फूहड़ अंदाज में रामलीला मैदान में प्रदर्शन किया, वो संसदीय प्रणाली को शर्मशार करने वाला है। बहरहाल लोगों को लगा कि रामलीला में जब लोग उबने लगते हैं तो एक जोकर को आगे किया जाता है, जिसके हल्के फुल्के मनोरंजन से श्रोता खुश होकर ताली देते हैं।
अब आप बताएं कि जहां से आपको कानू्न बनवाना है, उसी संस्था पर आप कीचड़ उछाल रहे हैं। जिन नेताओं का समर्थन चाहिए उन्हें चोर बता रहे हो। एक खास पार्टी को टारगेट कर रहे हो। अगर आप संसदीय प्रणाली की एबीसीडी भी जानते हैं तो आपको समझ लेना चाहिए कि ऐसा नहीं हो सकता कि जिस पार्टी की सरकार हो, वो जो बिल चाहे पास करा सकती है। खासतौर पर  गंठबंधन की सरकार से तो ऐसी उम्मीद करना बेमानी ही है। अगर ऐसा होता तो रिटेल सेक्टर में एफडीआई को कांग्रेस संसद से पास करा लेती। लेकिन चाहते हुए भी वो ये बिल पास नहीं करा पाई। फिर लोकपाल बिल जिस पर उसकी पार्टी के नेताओं में ही मतभेद हैं। राजनीतिक दल उस पर राजनीति कर रहे हैं।

अगर मैं ये कहूं कि अन्ना एक कानून के लिए आंदोलन नहीं चला रहे हैं, बल्कि उनके और उनकी टीम के आचरण से ऐसा लग रहा था कि वो केंद्र की सरकार और नौकरशाही को भ्रष्ट मानते हैं और उन्हीं के खिलाफ लोकपाल लाने की मुहिम चला रहे है। अन्ना और उनके चेलों की बयानबाजी से लगने लगा कि ये आंदोलन किसी सिविल सोसायटी का नहीं बल्कि इनके पीछे कुछ राजनीतिक दलों का हाथ है। चोर उचक्के सब अन्ना टोपी पहन कर ईमानदार हो गए। अच्छा ये भाषा तो किसी तानाशाह शासक जैसा इस्तेमाल करने लगे। अन्ना ने जब राहुल गांधी पर हमला बोला और पत्रकारों ने इस सिलसिले में पूछा तो कहने लगे कि कई बार मुंह खुलवाने की लिए नाक दवानी पड़ती है।
कांग्रेस का जो राजकुमार पार्टी नेताओं के दिलों पर राज करता है, जिसे कांग्रेसी भविष्य का प्रधानमंत्री बता रहे हैं, उस पर हमला करके, अन्ना को लगता है कि सरकार उनकी सभी मांगे मान लेंगी। भला ये कैसे संभव है। फिर टीम अन्ना ने जब ये कहा कि वो सरकार पर दबाव बनाए रखने के लिए अपना आंदोलन जारी रखेंगी, तो साफ हो गया कि ये चुनाव का लोकपाल है। सरकार कुछ भी कर ले, खामोश बैठने वाले नहीं हैं, ये एक के बाद एक अपना अभियान चलाएंगे  और  इन लोगों के निशाने पर कांग्रेस सरकार ही रहेगी।

अच्छा अनशन का मंच हो, सामने हजारों लोगों की भीड़ तो कई बार वक्ता भावनाओं में बह जाते हैं और कुछ भी ऊटपंटांग बोलते हैं। मीडिया ने अनशन की खबरे लोगों तक पहुंचाने की आड़ में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देश में तमाम सामाजिक संस्थाओं की ओर से सैकडों सामाजिक सरोकारों से जुड़े आंदोलन हुए हैं। लेकिन मीडिया ने कभी इस तरह उनका साथ नहीं दिया। इस आंदोलन में आखिर ऐसा क्या था कि मीडिया ने इसे हाथो हाथ लिया। सच तो ये है कि मीडिया ने ऐसी बातों को भी सार्वजनिक किया, जिससे नेताओं को लगा कि कुछ लोग एक  साजिश के तहत देश की सबसे बडी पंचायत संसद की मर्यादा को तार तार कर रहे हैं। यही सब  बातें  सुन कर नेताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जिसका नतीजा ये हुआ कि सिविल सोसायटी नेताओं की आंखो की किरकिरी बन गई।
दरअसल कुछ शहरी मानसिकता के लोगों को लगता है कि ये तीन चार महानगर में जमा होने वाली भीड़ ही असली भारत है। सच तो ये है कि यू ट्यूब पत्रकारों को ना ही गांवों के बारे में जानकारी है और ना ही इनमें गांव को जानने समझने की कोई ललक है। हो भी क्यों, इन्हें लगता है कि गांव का आदमी उनका दर्शक ही नहीं है, क्योंकि वहां तक केबिल नेटवर्क की पहुंच नहीं है। फिर गांव को जानने समझने की माथापच्ची आखिर क्यों की जाए। मीडिया को भी लग रहा था कि ये आंदोलन इतिहास में दर्ज होने जा रहा है और इसके जरिए ऐसा बदलाव हो जाएगा कि देश की सूरत बदल जाएगी। ऐसे में जब नए भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो मीडिया की अनदेखी करने की कोई हिमाकत नहीं कर पाएगा। बस फिर क्या था, शुरू हो गया खेल। टीम अन्ना आग लगाती रही और मीडिया उसमें घी डालकर खुद  ही खुश होती रही।

सच कहूं तो ये आंदोलन अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण वेदी की वजह से अपने रास्ते से भटक चुका है। आंदोलन में आप 10 मांगे रखते हैं और सम्मानजनक तरीके से पांच मांगे पूरी करके आंदोलन को वापस लेने की अपील हो तो उसे मान लेना चाहिए। अच्छा ऐसा भला क्यों होता, अनशन पर बैठे हैं अन्ना हजारे और सरकार से बातचीत और न्यूज चैनलों में ज्ञान दे रहे हैं दूसरे लोग। इन्हें क्या पता कि जो आदमी भूखा बैठा है, उसके बारे में भी सोचना चाहिए। ये तो बस एक  जिद्द करके चलते हैं। हां मुंबई की भी चर्चा कर ली जाए। मुंबई में बीमार तो सिर्फ अन्ना थे, केजरीवाल और किरन बेदी ने तीन दिन का अनशन आगे क्यों नहीं चलाया। अन्ना के साथ उन्होंने ना सिर्फ अनशन तोड़ दिया, बल्कि अगले चरण के आंदोलन को भी वापस ले लिया।
गिरफ्तारी भी पहले अन्ना देगें तो बाकी लोग देंगे, वरना सब मलाई काटेंगे। आपने  दवाब बनाया था सरकार पर कि तीन अनशन फिर तीन दिन देश भर में जेल भरो आँदोलन। ये सब आंदोलन चलाने के लिए खूब रसीदें कट रही हैं। कार्यक्रम सब स्थगित कर दिए गए हैं। टीम अऩ्ना के पैर जमीन पर हैं नहीं हैं, सब हवा में उड़ रहे हैं।
 मै दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर टीम अन्ना ने थोडा संयम और सभ्यता के दायरे में रहकर काम किया होता तो आज उनकी हालत ये नहीं होती। ये भले दावा करते रहें कि आंदोलन तेज करेंगे, पर जनता समझ गई कि ये भी बहुरुपिए हैं। जिद्द कर रहे हैं कि मैया मै तो चंद्र खिलौना लैहों, जहियों लोटी धरन पर कबहू तोरी गोद ना अइहों.... अन्ना जी अब चंद्र खिलौना तो नहीं ही मिल सकता, जमीन पर लेटें या कुछ भी कर लें। हालाकि मेरी राय मायने नहीं रखती, पर आप इस टीम से मुक्ति पाकर नए लोगों के साथ आंदोलन की शुरुआत करें। ये चेहरे सियासी लोगों से कहीं ज्यादा गंदे दिखाई दे रहे हैं।

Saturday, 24 December 2011

हां ब्लागर होने पर मैं हूं शर्मिंदा ...

ई दिन से एक बात बहुत परेशान कर रही है, सोचता हूं कि आखिर मैं यहां यानि ब्लाग जगत में क्या करने आया था और जो करने आया था वो कर रहा हूं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्लाग पर आकर सिर्फ अपना समय खराब कर रहा हूं। यदा कदा लिखना और घंटो साथी ब्लागर्स के ब्लाग पर जाकर उन्हें पढ़ना। क्या इसे ही ब्लागिंग कहते हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं नहीं, ये तो ब्लागिंग नहीं हो सकती। दरअसल दिल्ली में मीडिया से जुड़े होने की वजह से सियासत के हर रंग को काफी करीब से देखने का मौका मिलता है। मीडिया संस्थानों की अपनी सीमाएं होती है, उसी दायरे में रहकर आपको अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। मुझे लगा कि मैं इस ब्लाग के जरिए उन बातों का यहां जिक्र करुंगा जो खेल पर्दे के पीछे चलता है।
मीडिया आजाद है, आपके साथ मैने भी सुना है, पर मीडिया रहते हुए मैने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। खैर आज मैं मीडिया पर नहीं ब्लाग परिवार पर बात करने आया हूं। मित्रों मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि जब हम सभी ब्लागर्स को दिल पर हाथ रखकर सोचना होगा कि क्या हम जो कर रहे हैं, यही सोच कर हमने ब्लागिंग की शुरुआत की थी। क्या वाकई हमारा मकसद सिर्फ ये था कि यदा कदा हम कुछ लिख दें और दूसरे साथियों के ब्लाग पढ़ें, उन पर कमेंट करें, फिर उनसे भी यही अपेक्षा करें। ब्लागिंग बस इतनी ही है क्या ?

आप मेरी बात से सहमत होंगे कि सोशल नेटवर्किंग साइट को अब अपनी ताकत को साबित करने की जरूरत नहीं है। इजिप्ट आंदोलन में सोशल नेटवर्किंग ने लोगों को जागरूक करने में एक अहम भूमिका निभाई। अन्ना का आंदोलन सही है या गलत है, इस पर विवाद हो सकता है, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अन्ना को सोशल नेटवर्किंग साइट का भारी समर्थन रहा है। इसी की बदौलत एक बड़ा तूफान सड़कों पर दिखाई देता है। ऐसे में मुझे लगता है कि ब्लागिंग में जो बिखराव है, इसे समेटने की जरूरत है।

हमें सोचना होगा कि कैसे हम समाज की अनिवार्य जरूरतों में शामिल हो सकते हैं। मसलन जिस तरह लोग अगर एक दिन समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके दिन की शुरुआत ही नहीं हुई। मैं देखता हूं कि एक ही अखबार को ट्रेन में कितने लोग पढ़ते रहते हैं। बोगी में अखबार का हर पन्ना एक दूसरे में बट जाता है। क्रिकेट का मैच हम टीवी पर पूरा लाइव देखते हैं, फिर भी  अगले दिन अखबार का इंतजार रहता है। वो क्यों ? इसलिए कि टीवी पर सिर्फ वो दिखाई देता है,जो मैदान पर हो रहा है, लेकिन मैदान के बाहर जो खेल हो रहा है, वो अखबार ही बता पाएगा। कहने का मतलब ये है कि लोग अखबार पढ़ने के लिए जब इतना आतुर हो सकते हैं तो ब्लाग पर क्यों नहीं। हम ब्लाग को भी लोगों से जोड़ सकते हैं, पर इसके लिए पहले हमें लोगों का भरोसा जीतना होगा। हमें साबित करना होगा कि हम भी ईमानदारी से लेखन करते हैं।

आज बड़ा सवाल ये है कि हम कब तक चूं चूं करती आई चिड़िया, दाल  का दाना लाई चिड़िया लिखकर लोगों की झूठी वाहवाही लूटते रहेगें। हम जिम्मेदार कब बनेगें ? जिम्मेदार कोई एक दिन में नहीं बन सकता, सवाल ये है कि हम इसकी पहल कब करेंगे ? अच्छा ऐसा भी नहीं है कि इसके लिए हमें हिमालय पर्वत पड़ चढना है, हमें सिर्फ सामाजिक सरोकारों से जुडना होगा। समाज के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। मै ये नहीं कहता कि हम अभी सामाजिक बुराइयों को लेकर संवेदनशील नहीं है, हम संवेदनशील हैं, लेकिन बिखरे हुए हैं। हम किसी बुराई को देखते हैं, एक लेख या फिर कविता के जरिए दो आंसू बहाकर आगे बढ़ जाते हैं। मुझे लगता है कि इतने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता। ये समझ लें, इससे तो हम किसी भी मुद्दे की शुरुआत भर करते हैं।

मित्रों अब वक्त आ गया है कि जब हमें लगे कि ये काम ठीक नहीं है, फला राज्य की  सरकार मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है। तो हम सब को मिलकर आंदोलन छेड़ देना होगा। मैं दो एक मसले की चर्चा करना चाहता हूं। ब्लाग परिवार में महिलाओं की अच्छी संख्या है। राजस्थान  के एक मंत्री ने वहां की नर्स भंवरी देवी के साथ पहले अवैध संबंध बनाया, अब वो महिला गायब है। अभी तक उसका कोई सुराग नहीं मिला। मंत्री की कुर्सी चली गई, जांच सीबीआई कर रही है। क्या आपको लगता है कि इतना ही काफी है ? क्यों नहीं ब्लाग पर महिलाओं की आग दिखाई दी..। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा था कि महिलाओं के साथ हम सब ब्लाग को भंवरी देवी से रंग कर लाल कर देते।

हम 21 वीं सदी की बात करते हैं, गोरखपुर में अज्ञात बीमारी से सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। आज तक सूबे की सरकार ये नहीं बता पा रही है कि मौत की वजह क्या थी। क्या हमारे भीतर इतनी संवेदनशीलत नहीं है, कि हम इसे एक मुद्दा बनाकर ब्लाग को रंग देते। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ विभाग का भ्रष्टाचार किसी से छिपा नही हैं। यूपी के ब्लागर्स ने कितनी बार इस मुद्दे पर अपनी  कलम चलाई। आज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। आए दिन सुनते रहते हैं कि उन्हें  यूपी सरकार के बेईमानी पर गुस्सा आता है। कोई उनसे पूछ सकता है कि राहुल आपको केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार पर आज तक गुस्सा क्यों नहीं आया ? जिस पार्टी की वजह से (डीएमके) केंद्र की सरकार बदनाम हो रही है, उससे किनारा क्यों नही कर लेते। क्या  सरकार में बने रहने के लिए बेईमान पार्टियों का सहयोग लेने से परहेज नहीं है कांग्रेस को। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए।

हम सब भारतीय संविधान में आस्था रखते हैं। हम जानते हैं कि हमारे देश की खूबसूरती हमारा लोकतंत्र है। पडोसी देशों में लोकतंत्र कमजोर हुआ तो उसका हश्र देख रहे हैं। मैं बार बार कहता रहा हूं कि अन्ना का मुद्दा सही हो सकता है, पर तरीका गलत है। आप संसद को बंधक बनाकर काम नहीं ले सकते। देश में भ्रष्टाचार गंभीर समस्या है, भ्रष्टाचारियों को सख्त सजा होनी ही चाहिए। लेकिन मित्रों लोकपाल भी तभी काम कर पाएगा, जब देश में लोकतंत्र होगा। बताइये जिस सरकार से टीम अन्ना दो दो हाथ करने निकली है, उन्हीं से अनशन के लिए मैदान का शुल्क माफ करने की भीख मांग रहे हैं। मेरा मानना है कि जनता की ताकत और जनता के पैसे को उन्होंने दो कौड़ी के नेताओं के पैरों में डाल दिया। मुझे इस बात की तकलीफ है कि जब भी आंदोलन अन्ना ने आंदोलन किया है, जंतर मंतर पर या रामलीला मैदान पर, वहां जितना खर्च हुआ, उससे कई गुना ज्यादा पैसा जनता ने उन्हें चंदा दे दिया, फिर ये फीस माफी के लिए क्यों अर्जी देते हैं ? यही वजह की मुंबई हाईकोर्ट से भी अन्ना को खरी खरी सुननी पड़ी।

खैर अब वो समय आ गया है जब लोगों को एक सूत्र में बंधना ही होगा। हमें सरकार से ये आवाज भी उठानी होगी कि जो सहूलियते इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया को दी जाती हैं, वो सहूलियतें ब्लागर्स को भी दी जानी चाहिए। क्योंकि हम भी तो लोगों की आवाज हैं, हम भी तो सूचनाओं का आदान प्रदान करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ब्लागर साथी हमें माफ करें तो मैं कुछ लोगों के नाम लेना चाहता हूं, जिनसे मैं कहना चाहता हूं कि वो ब्लाग परिवार में काफी वरिष्ठ हैं और उन्हें इसकी अगुवाई हाथ में लेनी ही चाहिए। चूंकि मेरी जानकारी कम है तो हो सकता है कुछ नाम छूट जाएं, लेकिन मै डा. रूपचंद्र शास्त्री, रश्मि प्रभा, पूर्णिमा वर्मन, रवींद्र प्रभात, ललित शर्मा, अविनाश वाचस्पति, वंदना गुप्ता, हरीश सिंह, डा. अनवर जमाल, राज भाटिया, यशवंत माथुर, राकेश कुमार, अनुपमा त्रिपाठी, विजय माथुर, आशुतोष, अंजू चौधरी, कविता वर्मा, चंद्रभूषण मिश्र गाफिल, दिनेश कुमार उर्फ रविकर, प्रवीण कुमार, सुमन, डा. मोनिका शर्मा का नाम लेना चाहता हूं जो ब्लाग परिवार से काफी समय से जुडे हैं और ये ब्लाग परिवार को नेतृत्व भी दे सकते हैं।

शुरुआत में दिक्कत हो सकती है, लेकिन हम अगर एक सूत्र में बंध गए और बुनियादी सवालों पर चट्टान की तरह खड़े हो गए, तो कोई ताकत नहीं, जो हमारी एकता के आगे नतमस्तक ना हो जाए। इससे दो फायदा होगा, पहला हमारी ताकत को लोग नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे और दूसरा आम जनता की जरूरतों की कोई अनदेखी करने की हिमाकत नहीं कर सकेगा। बडा सवाल ये है कि क्या हम ऐसा करने के लिए तैयार हैं और हमारे वरिष्ठ ब्लागर साथी क्या नेतृत्व देने के लिए आगे आएंगे ? अगर ऐसा नहीं  होता है, तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि हां मैं ब्लागर होने पर शर्मिंदा हूं..।
  

Tuesday, 20 December 2011

बेचारे मजबूर प्रधानमंत्री ...

सेवा में
प्रधानमंत्री जी
भारत सरकार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, मैं पिछले कई दिनों से नहीं बल्कि महीनों से देख रहा हूं कि गल्ती कोई और कर रहा है, लेकिन निशाने पर आप हैं। इसके कारणों पर नजर डालें, तो लगता है कि है इन सबके लिए जिम्मेदार भी आप खुद ही हैं। दरअसल आप देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जो आज तक खुद स्वीकार ही नहीं कर पाया है कि वो देश का प्रधानमंत्री है। आपकी कार्यशैली से लगता है, जैसे "प्रधानमंत्री" एक सरकारी पद है, जिस पर आपको तैनात किया गया और आप प्रधानमंत्री का महज कामकाज निपटा रहे हैं। आपको डर भी लगा रहता है कि कहीं कोई गल्ती ना हो जाए। इसलिए कदम इतना ज्यादा फूंक फूंक कर रख रहे हैं कि आपके अधीनस्थ आपको डरपोक कहने लगे हैं।

प्रधानमंत्री जी आपकी कुछ मजबूरियों को मैं समझ सकता हूं, जिसकी वजह से आप पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। आपके हाव भाव से ये लगता है कि आप इस बात का हमेशा ध्यान रखते हैं कि आपको देश ने तो प्रधानमंत्री बनाया नहीं, प्रधानमंत्री तो सोनिया गाधी ने बनाया है। इसीलिए आप देश से कहीं ज्यादा सोनिया के प्रति वफादार रहते हैं। देखता हूं कि जब आप सोनिया गांधी के साथ होते हैं तो बिल्कुल निरीह दिखाई देते हैं। कई बार तो सच में ऐसा लगता है कि आपसे प्रधानमंत्री का काम जबर्दस्ती लिया जा रहा है। वैसे भी आपको मुश्किल तो होती ही होगी, क्योंकि जो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आज आपके मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, कभी आप उनके अधीन काम कर चुके हैं। इस सच्चाई को भले आप स्वीकार ना करें, लेकिन मुश्किल तो होती ही है। मुझे तो लगता है कि इन्हीं सब वजहों से आप मजबूत नहीं हो पा रहे हैं और देश को मजबूर प्रधानमंत्री से काम चलाना पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री जी अन्ना की अगुवाई में कुछ लोग सड़कों पर आकर देश में आराजकता की स्थिति पैदा कर रहे हैं। आपको पता है ना कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है, जिनको हम सब पूजते हैं। मर्यादा को मानने वाला भगवान राम से बढ़कर मुझे कोई और नजर नहीं आता। लेकिन भगवान राम को ही अगर हम उदाहरण मान लें तो हम देखते हैं कि वो भी तानाशाही को ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाए। लंका पर चढाई करने जा रहे भगवान श्रीराम ने समुंद्र से रास्ता मांगा, भगवान राम को लगा कि शायद मैं समुद्र से प्रार्थना करुं तो वो मान जाएं और हमें खुद ही रास्ता दे दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ..

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होत ना प्रीत ।। 

मतलब साफ है कि विनय यानि प्रार्थना से काम नहीं बनने वाला है, ये सोच कर जब भगवान राम ने चेतावनी दी अगर अब रास्ता नहीं दिया तो एक वाण चलाकर पूरे समुद्र को सुखा दूंगा। जैसे ही भगवान ने क्रोध धारण किया, समुद्र देव प्रगट हुए और भगवान राम से माफी मांगने के साथ ही तुरंत रास्ता देने को तैयार हो गए। मेरा सवाल प्रधानमंत्री जी आप से ये है कि भगवान राम को तीन दिन में गुस्सा आ गया और आप को तेरह दिन में गुस्सा नहीं आया। कुछ लोग देश में आराजकता का माहौल बनाए हुए हैं, आप उनसे सख्ती से क्यों नहीं निपट पा रहे हैं। अगर आपने  शुरू  में ही सख्त रुख अपनाया होता, तो ये नौबत ना आती। आपकी पार्टी के एक युवा सांसद जब भी जनता के बीच में होते हैं, वो गुस्से की बात करते हैं, उन्हें देश की हालात पर गुस्सा आता है, लेकिन जिस बात पर गुस्सा आता है , उसका निराकरण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती।
प्रधानमंत्री जी देश में ऐसा संदेश जा रहा है कि ये सरकार भ्रष्ट तो है ही, कमजोर भी है। कुछ लोगों की बंदरघुड़की से पूरा मंत्रिमंडल घुटनों पर नजर आता है। आप प्रधानमंत्री हैं और आपकी छवि साफ सुथरी है, आप पर किसी को शक भी नहीं है, फिर आप किस दबाव में हैं जो सही गलत का फैसला नहीं कर पा रहे हैं। अब समय आ गया है कि आप इस पर ध्यान ना दें कि कौन सड़क पर उतर रहा है, कौन जेल भर रहा है, इससे निपटने के लिए कानून में व्यवस्था है, वो अपना काम करेगी। आप सिर्फ ये देखें की कौन सा कानून देश के हित मे है। मैं तो इस बात के भी खिलाफ हूं कि देश के प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाया जाए।

प्रधानमंत्री जी दरअसल आपका काफिला जब सड़क पर आता है तो लोगों से रास्ता खाली करा लिया जाता है, इसलिए आपको पता नहीं है, जनता क्या चाहती है। जो जनता  रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर आती है, उसमें ज्यादातर लोग तफरी के लिए आते हैं। ये ऐसे लोग है, जो वोटिंग का महत्व भी नहीं जानते और चुनाव के दौरान दिल्ली से बाहर घूमने चले जाते हैं। देश के लोग भ्रष्टाचार से ज्यादा मंहगाई से परेशान हैं। आज जरूरत है मंहगाई को कैसे नियंत्रित किया जाए।

प्रधानमंत्री जी पूरा मंत्रिमंडल चार ऐसे लोगों को मनाने में जुटा है, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। वो एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। विपक्षी दल खासतौर पर बीजेपी की इस पूरे आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका है। जब सरकार लोकपाल  बिल पर काम करती नजर आ रही थी, उस समय भी टीम अन्ना एक राजनीति के तहत कांग्रेस का विरोध करती रही। इस टीम की स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जा रही है, इसलिए आप टीम को संतुष्ट करने के बजाए देश को संतुष्ट करने के लिए काम करें।

प्रधानमंत्री जी आपको तो पता है ना टीम अन्ना संघर्ष तेज करने और जब तक शरीर में जान है, तब तक लड़ने की बात करती हैं। लेकिन दिल्ली से महज इसलिए भाग खड़े हुए कि यहां ठंड बहुत है। जो लड़ाके ठंड़ से डरते हों, वो जान की बाजी की बात करते हैं तो हंसी ही आती है।  लोग संघर्ष की शुरुआत अपने गांव से करते हैं, फिर जिले, राज्य से  होते हुए केंद्र यानि दिल्ली आते हैं। अन्ना की लड़ाई उल्टी शुरू हुई। सीधे दिल्ली आ गए, यहां से अब अपने राज्य महाराष्ट्र वापस चले गए, अब जिले में जेल भरते हुए अपने गांव पहुंच जाएंगे। देश की जनता भी इस टीम की हकीकत को समझने लगी है। मैं गारंटी के साथ आपको बताना चाहता हूं कि लोकपाल के मामले में इनकी पूरी बातें मान भी ली जाएं तो ये दूसरी मांग को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर रहेंगे।

चलते चलते एक गुजारिश है प्रधानमंत्री जी,  आप लोकपाल बिल में एनजीओ को जरूर शामिल करें। क्योंकि देश में एक बड़ा तपका खासतौर पर सफेद पोश लोग एनजीओ की आड़ में गोरखधधा कर रहे हैं। ये कुछ विदेशी संस्थाओं से जुड़ कर बाहर से पैसे लाते हैं और उनका दुरुपयोग किया जाता है। इसी पैसे से ये राजनेताओं, सरकारी तंत्र को कमजोर करते हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि इस मामले में भी एक ग्रुप आफ मीनिस्टर का गठन कर देशहित में आप सही निर्णय लेंगे। आज बस इतना ही।

धन्यवाद

महेन्द्र श्रीवास्तव
दिल्ली 

Friday, 16 December 2011

सोनिया को नहीं जानती मुनिया ...

स लड़की को नहीं पता कि देश की राजधानी दिल्ली में आज कल किस बात की जंग अन्ना छेड़े हुए हैं। इसे तो सिर्फ ये पता है कि अगर शाम तक उसकी लकड़ी ना बिकी तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा। पूरे शरीर पर लकडी की बोझ तले दबी इस लड़की की कहानी वाकई मन को हिला देने वाली है। मुझे लगता है कि देश की तरक्की को मापने का जो पैमाना दिल्ली में अपनाया जा रहा है, उसे सिरे से बदलने की जरूरत है। जंगल की जो तस्वीर मैने देखी है, उसे आसानी से भुला पाना मेरे लिए कत्तई संभव नहीं है। 
ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, मैं आफिस के टूर पर उत्तराखंड गया हुआ था। घने जंगलों के बीच गुजरते हुए मैने देखा कि जंगल में कुछ लड़कियां पेड़ की छोटी छोटी डालियां काट रहीं थी और वो इन्हें इकठ्ठा कर कुछ इस तरह समेट रहीं थीं, जिससे वो उसे आसानी से अपनी पीठ पर रख कर घर ले जा सकें। दिल्ली से काफी लंबा सफर तय कर चुका था, तो वैसे भी कुछ देर गाड़ी रोक कर टहलने की इच्छा थी, जिससे थोड़ा थकान कम हो सके।
हमने यहीं गाड़ी रुकवा दी, गाड़ी रुकते ही ये लड़कियां जंगल में कहां गायब हो गईं, पता नहीं चला। बहरहाल मैं गाड़ी से उतरा और जंगल की ओर कुछ आगे बढ़ा। हमारे कैमरा मैन ने जंगल की कुछ तस्वीरें लेनी शुरू कीं, तो इन लड़कियों को समझ में आ गया कि हम कोई वन विभाग के अफसर नहीं, बल्कि टूरिस्ट हैं। दरअसल लकड़ी काटने पर इन लड़कियों को वन विभाग के अधिकारी परेशान करते हैं। इसके लिए इनसे पैसे की तो मांग की ही जाती है, कई बार दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है। लिहाजा ये कोई भी गाड़ी देख जंगल में ही छिप जाती हैं।
हमें थोडा वक्त यहां गुजारना था, लिहाजा मैं इन लड़कियों के पास गया और उनसे सामान्य बातचीत शुरू की। बातचीत में इन लड़कियों ने बताया कि उन्होंने दिल्ली का नाम तो सुना है, पर कभी गई नहीं हैं। बात नेताओं की चली तो वो सोनिया, राहुल या फिर आडवाणी किसी को नहीं जानती। हां इनमें से एक लड़की मुनिया है जो उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का नाम जानती है, पर वो क्या थे, नहीं पता। मैने सोचा आज कल अन्ना का आंदोलन देश दुनिया में छाया हुआ है, शायद ये अन्ना के बारे में कुछ जानती हों। मैने अन्ना के बारे में बात की, ये एक दूसरे की शकल देखने लगीं।
खैर इनसे मेरी बात चल ही रही थी कि जेब में रखे मेरे मोबाइल पर घर से फोन आ गया, मै फोन पर बातें करने लगा। इस बीच मैं देख रहा था कि ये लड़कियां हैरान थीं कि मैं कर क्या रहा हूं। मेरी बात खत्म हुई तो मैने पूछा कि तुम लोग नहीं जानते कि मेरे हाथ में ये क्या है, उन सभी ने नहीं में सिर हिलाया। बहरहाल अब मुझे आगे बढना था, लेकिन मैने सोचा कि अगर इन्हें मोबाइल के बारे में थोड़ी जानकारी दे दूं, तो शायद इन्हें अच्छा लगेगा। मैने बताया कि ये मोबाइल फोन है, हम कहीं भी रहें, मुझसे जो चाहे मेरा नंबर मिलाकर बात कर सकता है। मैं भी जिससे चाहूं बात कर सकता हूं। मैने उन्हें कहा कि तुम लोगों की बात मैं अपनी बेटी से कराता हूं, ठीक है।
मैने घर का नंबर मिलाया और बेटी से कहा कि तुम इन लड़कियों से बात करो, फिर मैं बाद में तुम्हें बताऊंगा कि किससे तुम्हारी बात हो रही थी। बहरहाल फोन से बेटी की आवाज सुन कर ये लड़कियां हैरान थीं। हालाकि ये लड़कियां कुछ बातें तो नहीं कर रही थीं, लेकिन दूसरी ओर से मेरी बेटी के हैलो हैलो ही सुनकर खुश हो रही थीं।
अब मुझे आगे बढना था, लेकिन मैने देखा कि इन लड़कियों ने लकड़ी के जो गट्ठे तैयार किए हैं, वो बहुत भारी हैं। मैने पूछा कि ये लकड़ी का गट्ठर तुम अकेले उठा लोगी, उन सभी ने हां में सिर हिलाया। भारी गट्ठर देख मैने भी इसे उठाने की कोशिश की, मैं देखना चाहता था कि इसे मैं उठा सकता हूं या नहीं। काफी कोशिश के बाद भी मैं तो इसे नहीं उठा पाया। इसके पहले कि मै इन सबसे विदा लेता, मेरी गाड़ी में खाने पीने के बहुत सारे सामान थे, जो मैं इनके हवाले करके आगे बढ गया।
मैं इन्हें पीछे छोड़ आगे तो बढ गया, पर सच ये है कि इनके साथ हुई बातें मेरा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। मैं बार बार ये सोच रहा हूं कि पहाड़ों पर रहने वाली एक बड़ी आवादी किस सूरत-ए-हाल में रह रही है। ये बाकी देश से कितना पीछे हैं। इन्हें नहीं पता देश कौन चला रहा है, इन्हें नहीं पता देश में किस पार्टी की सरकार है। राहुल गांधी और केंद्र सरकार अपनी सरकारी योजना नरेगा की कितनी प्रशंसा कर खुद ही वाहवाही लूटने की कोशिश करें, पर हकीकत ये है कि जरूरतमंदो से जितनी दूरी नेताओं की है, उससे बहुत दूर सरकारी योजनाएं भी हैं।
अन्ना के साथ ही उनकी टीम अपने आंदोलन को शहर में मिल रहे समर्थन से भले ही गदगद हो और खुद ही अपनी पीठ भी थपथपाए, पर असल लड़ाई जो लड़ी जानी चाहिए, उससे हम सब अभी बहुत दूर हैं। हम 21 सदी की बात करें और गांव गांव मोबाइल फोन पहुंचाने का दावा भी करते हैं, लेकिन रास्ते में हुए अनुभव ये बताने  के लिए काफी हैं कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही मजबूत हैं। घर वापस आकर जब मैने बेटी को बताया कि रास्ते में कुछ ऐसी लड़कियों से मुलाकात हुई जो कभी दिल्ली नहीं आई हैं, उन्हें नहीं पता कि यहां किसकी सरकार है। यहां तक कि ये लड़कियों मोबाइल फोन देखकर भी हैरान थीं, तो बच्चों को भी यकीन नहीं हो रहा है, पर सच ये है कि तस्वीर खुद बोलती है।     

Wednesday, 14 December 2011

कौन लिख रहा अन्ना की स्क्रिप्ट ...

देश संकट के दौर से गुजर रहा है, ये वक्त है जब नेताओं को अपने दल से ऊपर देश को रखना होगा, उन्हें मिलकर सोचना होगा कि आखिर गल्ती कहां हुई, क्यों लोग सड़कों पर जमा हो रहे हैं ? सरकार के प्रति लोगों में इतनी नफरत क्यों है? इस समस्या का समाधान भी जल्दी तलाशना होगा। अगर सभी दलों के नेता आपस में ही झगड़ते रहे, तो उनका नुकसान तो ज्यादा नहीं होगा, लेकिन देश की जो दुर्गति होगी, उसकी भरपाई बिल्कुल आसान नहीं होगी। वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल खुद ही भ्रष्टाचार से देश को बाहर निकालने का ऐसा रास्ता तलाशें, जिस पर लोगों को यकीन हो। सच्चाई ये है कि देश में महंगाई एक समस्या है, भ्रष्टाचार उससे भी बड़ी समस्या है, लेकिन सियासी दल जनता का भरोसा खोते जा रहे हैं ये सबसे बड़ी समस्या है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में अगर राजनीतिक दलों से जनता का भरोसा खत्म होने लगे तो समझ लिया जाना चाहिए कि लोकतंत्र खतरे में हैं। इसी का फायदा उठा रही है टीम अन्ना।

मै मानता हूं कि देश में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में गुस्सा है। इसे रोकने के लिए पहले ही ठोस प्रयास किया जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ, गल्ती किसकी है, इस पर जाना बेमानी है। देश में वोट की राजनीति ने कानून को भी जाति धर्म के आधार पर बांट दिया है। आतंकवादियों से निपटने के लिए देश में बीजेपी की सरकार ने पोटा कानून बनाया, कांग्रेस ने महज एक तपके के वोट की लालच में इस कानून को खत्म कर दिया। मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ एक बात कहना  चाहता हूं कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून की बात की जा रही है। मैं कहता हूं कि कानून सख्त बन भी गया, लेकिन उस पद पर आदमी ढीला बैठ गया तो सख्त कानून का माखौल भर उड़ना है। मुझे लगता है कि कानून कैसा भी हो,आदमी सख्त हो तो वो सूरत बदलने में सक्षम होगा। आपको याद होगा निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को लोग गैरजरूरी समझते थे, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर तैनात हुए टीएन शेषन ने कानून के दायरे में रहकर बता दिया कि पद की मर्यादा कैसे कामय रखी जाती है।

बहरहाल मैं आज भी इस बात पर कायम हूं कि अन्ना की मांग सही है, परंतु तरीका बिल्कुल गलत। अन्ना का आंदोलन देश के लोकतांत्रिक ढांचे को तार तार करने वाला है, सच कहें तो ये आंदोलन संसद पर हमला है। संसद पर दस साल पहले पांच आंतकवादियों ने हमला किया था, लेकिन उनका मकसद कुछ लोगों की हत्या करना था, पर सिविल सोसायटी के पांच लोग संसद पर जो हमला कर रहे हैं वो उस आतंकी हमले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि इनका मकसद देश के लोकतंत्र की हत्या करना दिखाई दे रहा है। जब भी मैं ऐसा कहता हूं तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी मोर्चा संभाल लेते हैं और मुझ पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगाकर गंभीर मसले से जनता का ध्यान हटाने की साजिश करते हैं। अब आप ही बताएं कि सांसदों पर दबाव बनाया जा रहा है कि जो अन्ना कहें, संसद के भीतर उन्हें वही बोलना है, अगर वैसा नहीं बोला गया तो उस सांसद के घर के बाहर धरना शुरू हो जाएगा। यानि सांसद को देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में टीम अन्ना का बंधक बना रहना होगा।

मैं हैरान हूं आज तमाम बुद्धिजीवी अन्ना के आँदोलन  की तुलना उन देशों से कर रहे है, जहां किसी तानाशाह शासक का राज चल रहा है, वहां ना चुनाव होते हैं ना लोगों के नागरिक अधिकारों की रक्षा होती है। 30- 40 साल से कोई एक शख्स ताकत और पैसे के बल पर राज कर रहा है, ऐसे में एक ना एक दिन जनता का गुस्सा सड़कों पर आना ही था। अन्ना के सम्मान में तर्क दे रहे है कि ये आंदोलन कितना शांतिपूर्ण है, एक भी पत्थर नहीं चला। जबकि दूसरे मुल्कों के आंदोलन में कितना खून खराबा हुआ। अब इन्हें कौन बताए दूसरे मुल्कों में तानाशाह शासक हैं जो अपने ही देश के लोगों पर गोली बारी करा रहे थे, इसके जवाब में आंदोलनकारियों ने भी पत्थरबाजी और गोलीबारी की। यहां सरकार ने भी तो संयम बरता है, वरना जिस तरह से मंच से भड़काऊ भाषण देकर जनता को उकसाने की कोशिश हो रही है, अगर सरकार सख्ती करे, तो आंदोलन की सूरत यहां भी बदल सकती है। आंदोलन के शांतिपूर्ण होने का क्रेडिट अन्ना से ज्यादा सरकार को दिया जाना चाहिए। अन्ना के मुकाबले जेपी आंदोलन पर भी कीचड़ उछालने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि उनके आंदोलन के दौरान देश में हिंसा हुई। मुझे लगता  है कि उस  दौरान आंदोलन को ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश हुई,  जिससे जनता में भी आक्रोश भड़का और कई जगह हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की वारदातें हुईं।

जेपी आंदोलन आखिर में एक राजनैतिक आंदोलन बन चुका था, उन्हें लगने लगा था कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के लिए जरूरी है कि राजनैतिक विकल्प भी खड़ा किया जाए। इसके बाद लोकनायक ने एक मजबूत विकल्प भी दिया। आज अन्ना कहां खड़े हैं अभी तक साफ नहीं है। यानि " ना ही में, ना सी मैं, फिर भी, पांचो उंगली घी में "। पर्दे के पीछे  से सियासी लड़ाई नहीं लड़ी जाती। अगर वाकई मैदान में हैं और राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सरकार को घेरना चाहते हैं, साफ कहना चाहिए। जिस जंतर मंतर से कुछ महीने पहले  राजनेताओं को खदेडा गया, फिर उन्हें उसी मंच पर स्थान देने के लिए टीम अन्ना क्यों इतनी उतावली दिखी। क्या देश  के लोगों पर से उसका भरोसा खत्म हो गया है। वैसे टीम अन्ना को पता था कि उनके मंच पर यूपीए के घटक दलों से तो कोई शामिल होगा नहीं, अच्छा मौका है जंतर मंतर पर विपक्ष को बुलाकर सरकार की किरकिरी कराई जाए, लेकिन ये दांव भी उल्टा पड़ गया। यहां बीजेपी नेता अरुण जैटली ने भले ही अन्ना की मांगो का समर्थन किया, लेकिन लेफ्ट नेता ए वी वर्धन ने टीम अन्ना को  खूब खरी खरी सुनाई।

बहरहाल बीजेपी और उनके सहयोगी दलों को ये बताना चाहता हूं कि आप राजनीति तब करेंगे जब देश बचेगा, जब संसद और उसकी मर्यादा बची रहेगी। आज संसद की सर्वोच्चता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है। क्या हम मान लें कि कुछ लोग सड़क पर मसौदा तैयार कर सरकार पर दबाव बनाएं कि इसे इसी रूप में कानून बनाया जाना चाहिए, क्या सरकार को ऐसी मांगे मान लेनी  चाहिए। मुझे लगता है कि ये तरीका तो अनुचित है ही, अगर ऐसा होता है तो देश में एक ऐसा गलत रास्ता खुल जाएगा, जिसे बाद में बंद करना मुश्किल होगा।
मेरा मानना है कि कमजोर नेतृत्व के चलते  सरकार हर गंभीर मसले पर घुटनों पर आ जाती है। अन्ना के आंदोलन से निपटने में सरकार फेल रही है। वैसे भी टीम अन्ना पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ये जो बातें करते हैं उस पर कायम नहीं रहते। इसलिए अगर सरकार सख्त रहती, तो रास्ता ये निकलता कि सिविल सोसायटी के ही कुछ लोग बातचीत का प्रस्ताव लेकर  सरकार के पास आते। सच तो ये भी है कि जिन लोगों से सरकार की बात हो रही थी, वो इसके काबिल नहीं थे। वरना प्रधानमंत्री के पत्र के बाद पहले तो अन्ना ने अनशन खत्म किया, फिर पूरे देश में जीत का जश्न मनाया गया। इस बीच ऐसा क्या हो गया जिससे टीम अन्ना लोकसभा उप चुनाव में हिसार जाकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध करने लगी। यूपी के कई शहरों में जाकर कांग्रेस के खिलाफ बात की गई।

इस सवाल पर  टीम अन्ना का जवाब होता है कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में ही सरकार चल रही है, वो चाहे तो जनलोकपाल बिल पास करा सकती है। टीम अन्ना को कौन समझाए कि  खुदरा व्यापार में प्रधानमंत्री एफडीआई के पक्ष में थे, लेकिन उनके सहयोगी और विपक्ष के तीखे विरोध के चलते ये बिल संसद में पास नहीं हो सका। हमारे देश के लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। अगर सरकार चाह कर भी एफडीआई नही पास करा पाई तो वो जनलोकपाल बिल कैसे पास करा सकती है ? तमाम घटनाक्रम को देखने से साफ हो जाता है कि टीम अन्ना इस  ड्रामें की पात्र भर है, इनकी स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जाती है। टीम अन्ना लोगों को किस कदर गुमराह करती है, इसे भी  समझना जरूरी है। स्थाई समिति की रिपोर्ट का माखौल उड़ाते हुए कहा गया कि कमेटी में कुल 30 लोग हैं, जिसमें दो सदस्य कभी आए नहीं। 17 लोगों ने विरोध किया, जबकि सात कांग्रेस  के अलावा लालू यादव और अमर सिंह जैसे 11 लोगों ने मिलकर देश के कानून का मसौदा तैयार कर दिया। टीम ने कहा कि सिर्फ 11 लोग देश का कानून कैसे बना सकते हैं? मैं पूछता हूं, कि चलो वो तो 11 लोग थे, लेकिन आप तो सिर्फ पांच लोग ही हैं जो 121 करोड़ जनता के लिए कानून अपने मनमाफिक बनवाने पर आमादा हैं।
बहरहाल मैं चाहता हूं कि स्थाई समिति की प्रक्रिया की संक्षेप में जानकारी लोगों को होनी ही चाहिए। इस मसौदे में कुल लगभग 24 प्रस्ताव हैं। जिन 17  लोगों ने डिसेंट नोट (असहमति पत्र) दिया है,  उसका ये मतलब नहीं है कि उन्होंने कमेटी के पूरे मसौदे को ही खारिज कर दिया है। आमतौर पर कोई सदस्य किसी एक प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, किसी को दो पर आपत्ति होती है, कुछ को तीन चार पर भी आपत्ति हो सकती। इससे ये नहीं समझना चाहिए कि सदस्यों  ने पूरा मसौदा ही खारिज कर दिया, चूंकि इस मामले में गलत संदेश लोगों को देने की कोशिश हो रही है, लिहाजा इस पर चर्चा जरूरी थी। एक बात और की जा रही है कि प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया था कि निचले स्तर के अधिकारियों कर्मचारियों को लोकपाल  के दायरे में लाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अब टीम अन्ना लोगों मै कैसे जहर घोलती है, ये देखें। प्रधानमंत्री के पत्र में साफ किया गया था कि निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों को उपयुक्त तंत्र के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास किया जाएगा। अब सरकार ने सीवीसी को उपयुक्त तंत्र माना है, तो ये कैसे कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जो आश्वासन दिया था, उसे पूरा नहीं किया।

टीम अन्ना की मांगे बेतुकी भी हैं। वो कह रहे हैं सीबीआई को जनलोकपाल के अधीन कर दिया जाए। अब आप बताएं सीबीआई क्या केवल भ्रष्टाचार की ही जांच करती है? अरे सीबीआई के दायरे में दुनिया भर के अपराध शामिल हैं। कई बार हत्या और  बलात्कार जैसी घटनाओं की भी जांच सीबीआई करती है। ऐसे में जनलोकपाल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कैसे केंद्रित हो सकता है। जब ये सवाल उठा तो कहा गया कि पूरी सीबीआई को ना दें, आर्थिक मामलों  की जांच करने वाली टीम को लोकपाल के दायरे में कर दिया जाए। अब टीम अन्ना की ऐसी बातों से लगता है कि वो महज विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। मैं एक वाकया बताता हूं, यूपी के स्वास्थ्य विभाग में करोडो का घोटाला हुआ, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। इसमें गिरफ्तार एक स्वास्थ्य महकमें  के अफसर को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जहां बाद में उसकी संदिग्ध हालातों में मौत हो गई। अब क्या एक ही मामले में आधी जांच लोकपाल और आधी जांच कोई अन्य विभाग करेगा ?

क्या होना चाहिए, क्या नहीं, ये सब जानते हैं। सभी को पता है कि देश में 121 करोड़ की आबादी को किसी कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। जब तक लोग खुद नैतिक नहीं होंगे,  तब तक ईमानदारी की बात करना बेमानी है। अन्ना का आंदोलन पूरी तरह राजनैतिक आंदोलन  है और इससे राजनैतिक आंदोलन की तरह ही निपटा जाना चाहिए। सरकार जितना घुटना टेकेगी, टीम अन्ना एक के बाद एक मुद्दे पर ऐसे  ही सरकार को घुटनों पर लाने की कोशिश करेगी, क्योंकि इस आंदोलन के पीछे की कहानी कुछ और ही है।

Saturday, 10 December 2011

जर्नलिस्ट तो ठीक है, पर करते क्या हैं ?

मौका खुशी का है, सोच रहा हूं कि आज अपने ब्लाग परिवार से खुल कर बातें करूं। आमतौर पर हमेशा दूसरों की बातें करता रहा हूं, लेकिन आज सिर्फ अपनी ही करुंगा। हां ये बता दूं कि जो बातें मैं आज करुंगा उसे आप कत्तई आधा सच न समझे, ये पूरा सच है। मित्रों कल सु बह यानि 11 दिसंबर मेरे लिए क्या परिवार के लिए खास दिन है, क्योंकि 17 साल पहले आज ही के दिन लखनऊ में हम विवाह बंधन में बंध गए थे। 17 साल पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता ही नहीं कि हम कितना सफर तय कर चुके हैं, सच कहूं तो लगता है कि सब कुछ कल ही की तो बात है।

मेरी शादी जिस दौर में हुई सच बताऊं तो उस समय किसी भी माता-पिता को अपनी बेटी की शादी किसी पत्रकार से करने में वो खुशी नहीं होती थी, जो खुशी उन्हें सरकारी महकमें के बाबू से करने में मिलती थी। या ये कह लें कि हाईस्कूल के बाद पालिटेक्नीक किया लड़का जो जेई हो जाता था, या फिर हाईस्कूल पास रेलवे में टिकट कलेक्टर बन जाते थे, पत्रकारों के मुकाबले लड़की वाले जेई और टीसी को ज्यादा बेहतर मानते थे। एक वाकया बताता हूं। 1991-92 में लोग मेरी शादी के लिए घर आने लगे थे। एक साहब वाराणसी से मेरी शादी के लिए पापा के पास आए, बातचीत शुरू हुई। उन्होंने पहला ही सवाल पापा से पूछ लिया " जी लड़का करता क्या है ? पापा ने जवाब दिया कि वो जर्नलिस्ट है। वो बोले ये तो ठीक है, पर करता क्या हैं। मतलब उस दौरान जर्नलिज्म को कुछ करना माना ही नहीं जाता था। लोगों को ये भी पता नहीं था कि भाई पत्रकार भी नौकरी करते हैं और उन्हें भी हर महीने वेतन मिलता है।

हकीकत ये है कि उस दौरान लोग बहुत ज्यादा घूमने फिरने में भरोसा नहीं रखते थे, लोगो को अपने जिले और आस पास के अलावा कोई खास जानकारी भी नहीं होती थी। हमलोग मिर्जापुर के रहने वाले हैं, यहां दैनिक जागरण और आज अखबार का बोल बाला था।  अब साल तो मुझे ठीक ठीक नहीं याद है, पर मुझे लगता है कि ये बात 1992 की होगी। मैं बरेली में दैनिक जागरण अखबार में उप संपादक/ संवाददाता के पद पर तैनात था। मेरी शादी भी लगभग पक्की हो चुकी थी। इसी बीच मुझे अमर उजाला अखबार में बेहतर पैकेज मिला तो मैने वहां ज्वाइन कर लिया।  इसका नतीजा ये हुआ कि  मेरी तय हुई शादी सिर्फ इसलिए टूट गई, क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को अमर उजाला अखबार के बारे में जानकारी ही नहीं थी। उन्हें लगा कि पता नहीं किस अखबार में चला गया,  दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग अमर उजाला अखबार को जानते ही नहीं थे। मुझे और मेरे मित्रों को जब इस बात की जानकारी हुई तो हम बहुत हंसे..।

चलिए अब सीधे 11 दिसंबर 1994 पर आ जाते हैं। उस दौरान मैं अमर उजाला मुरादाबाद में तैनात था। हमारे ससुर जी सिचाई विभाग में इंजीनियर और सासू मां सरकारी स्कूल में टीचर। वैसे ससुर जी  तो पहले एक कस्टम इंस्पेक्टर से शादी की बात चला रहे थे। उनकी कई दौर की बात हो चुकी थी, पर शादी मंहगी पड़ रही थी। मुझे तो शादी के बाद मैडम ने ही बताया कि लड़के वालों ने सभी बारातियों के लिए अंगूठी की मांग रख दी, और इस मांग से वो पीछे नहीं हटे, लिहाजा बात आगे नहीं बढ पाई। फिर घर में सोचा गया कि चलो जर्नलिस्ट को ही टटोल लेते हैं। अब 17  साल पुरानी बात हो गई, इसलिए कोई इस बात से सहमत नहीं होगा, पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरी शादी इसलिए तो बिल्कुल ही नहीं हुई कि लड़का जर्नलिस्ट है। अगर ऐसा होता तो मैं जहां काम कर रहा था, वहां एक बार कोई ना कोई ससुराल से जरूर आता। हां एक दिन जब मैं शाम को आफिस पहुंचा तो मुझे गेटमैन ने जरूर बताया कि भाईसाहब आज एक सिचाई विभाग से कोई आदमी आया था, जो आपके बारे में बहुत जानकारी कर रहा था। मैने उसे सब बढिया बढिया बताया है। उसी ने कहाकि शायद आपकी शादी के लिए पूछताछ कर रहा होगा।  वैसे ये बात  तो यहीं खत्म हो गई,  पर शादी के बाद पता चला कि मुरादाबाद में मेरे ससुर के एक सहायक थे, जिन्होंने मेरे बारे में प्राथमिक जानकारी उन्हें मुहैया कराई थी।

खैर मुझे तो लगता है कि वो यहां सिर्फ ये जानना चाहते होंगे, जिस लड़के से शादी के बारे में बातचीत चल रही है, वो वाकई मुरादाबाद में है भी या नहीं। इतना ही मतलब रहा होगा। मेरा मानना है कि मेरी शादी की दो वजहें थीं, एक तो ये  कि मेरे जीजा जी के छोटे भाई की शादी मेरी मैडम की बड़ी बहन से हुई है। इससे दोनों परिवार एक दूसरे को ठीक ठीक जानते समझते थे। दूसरा ये कि हमारे यहां खेती बारी ठीक ठाक है।  वैसे अच्छा तो ये है कि  इस बात को यहीं खत्म कर दिया जाए, बेवजह मैं मैडम को नाराज नहीं करना चाहता, क्योंकि हमारे विवाह की सालगिरह 11 दिसंबर को और  अगले ही दिन यानि 12 दिसंबर को  मैडम का जन्मदिन भी है, बेहतर ये होगा  कि सबकुछ  ठीक ठाक रहे जिससे दोनों दिन हम साथ साथ कहीं बाहर जाकर डिनर कर सकें।

  अच्छा फिल्मों ने भी पत्रकारों की इमेज कुछ इसी तरह की बना रखी थी। पत्रकार का नाम सुनते ही लोगों के मन में जो तस्वीर बनती थी वो बहुत डरावनी होती थी। यानि एक ऐसे  युवक की जो महीनों बिना नहाए, चेहरे पर उलझी दाढ़ी़, बेतरतीब बाल, एक उद्धत हो चुकी जींस, गंदा कुर्ता, लंबा झोला और कुल्हापुरी चप्पल पहन कर साईकिल से चला जा रहा है, लेकिन उसे जाना कहां ये भी इस नौजवान को पता नहीं हैं। हां मैं ये नहीं कहता की जो तस्वीर बनाई गई थी वो गलत थी, सच्चाई ये थी कि जींस और कुर्ते में हम खुद को कम्फरटेबिल समझते थे। दरअसल कल और आज मे फर्क भी बहुत है। उस दौर में पत्रकारों को पड़ी लकड़ी उठाने की आदत होती थी। यानि हम अगर सरकारी अस्पताल पहुंच गए और देख लिया कि कोई मरीज कराह रहा है और उसे देखने वाला कोई नहीं है। तो हम पूरे अस्पताल की चूलें हिला दिया करते थे। एक एक्टिविस्ट की तरह हम काम करते थे, पहले मरीज के बेहतर इलाज के लिए संघर्ष फिर दफ्तर पहुंच कर रिपोर्ट लिखते थे। अब ऐसा नहीं है, अब तो पत्रकार महज रिपोर्टर बनकर रह गए हैं। वो सिर्फ रिपोर्ट लिखते हैं।

वैसे पत्रकारों का पहनावा ठीक होने की एक बडी वजह महिलाएं भी हैं। मै अखबार का जिक्र नहीं करूंगा, लेकिन बताऊं कि मेरे  आफिस में रिसेप्सनिस्ट के पद पर एक लड़की की तैनाती हो गई। हफ्ते भर के भीतर ही आधे से ज्यादा लोगों ने शेविंग करनी शुरू कर दी। हम पत्रकारों में नए कपड़े खरीदने का चलन ही नहीं था। हम तीन चार दोस्त एक कमरे में रहते थे, कुछ कपडे़ खरीदे जाते थे, और ये कपडे किसी एक के नहीं होते थे। जिसे जो जी में आया पहन कर चला जाता था। पर इस लड़की ने हमें ब्रीफकेश खरीदने को मजबूर कर दिया, क्योंकि फिर सबके अपने अपने कपड़े हो गए जो ताले वाले ब्रीफकेश में रखे जाने लगे। एक बार अखबार के डायरेक्टर यानि मालिक का आना हुआ, वो लोगों का बदला हुआ ये रूप देखकर हैरान रह गए। उन्होंने मैनेजर से पूछा ये माजरा क्या है, सब के सब अप टू डेट कैसे हो गए। जवाब आया रिसेप्सन पर लड़की की तैनाती इसकी मुख्य वजह है। मैनेजर इस बात से भी परेशान थे के लोग एक बार मैनेजर से हैलो हाय भले ना करें, पर रिसेप्शन पर जरूर करते थे।

बहरहाल हमारे डायरेक्टर खुश हुए और उन्होंने सभी स्टाफ को रेमंड का कोट गिफ्ट किया, लेकिन इसके साथ ये शर्त रखी गई कि लोगों को आफिस कोट टाई में आना होगा। सभी ने कहा बिल्कुल, हम जरूर पहना करेंगे। लेकिन हमारे एक मित्र कौशल किशोर आफिस से देर रात घर के लिए निकले। कोट टाई पहने कौशल को मुहल्ले का कुत्ता पहचान नहीं पाया और काट लिया। बात मालिक तक पहुंची और कोट टाई की अनिवार्यता खत्म हो गई।
समय कैसे बदलता है, आज देखिए, जो जर्नलिस्ट कभी शादी के लिए लोगों की प्राथमिकता में नहीं थे, आज तमाम बडे बडे अफसर लाखों रुपये खर्च कर अपनी बेटी को जर्नलिज्म का कोर्स करा रहे हैं। देश में मास कम्यूनिकेशन हजारों कालेज खुल गए हैं। लगभग सभी विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढाई शुरू हो गई है, मेरिट इतना हाई है कि अच्छे संस्थान में लोगों को दाखिला नहीं मिल रहा है। अब अखबार का दफ्तर हो या फिर न्यूज चैनल, सभी जगह लड़कियों की अच्छी खासी संख्या है। सच तो ये है कि अब शादी के लिए जर्नलिस्ट भी लोगों की प्राथमिकता में आ गए हैं। बहरहाल पत्रकारों को समाज की स्वीकार्यता मिल गई, मुझे लगता है कि ये पत्रकारों की काम की वजह से हैं। बहरहाल बात बेवजह की लंबी हो गई, मैं तो बस अपनी शादी की सालगिरह को यादगार बनाने के लिए पुरानी बातों को याद करने लगा। एक एक बात याद इसीलिए है, कि मुझे लगता ही नहीं कि हमने लंबा सफर तय किया है, मेरे हिसाब से ये सब कुछ दिन पहले की बात है।


चलते - चलते
आखिर में एक बात और । जनवासे से बारात के रवाना होने के पहले मैने बैंड बाजा  के मास्टर को बुलाया और उसे समझाया कि देखो भाई मुझे दो गानों से बहुत परहेज है और आप इस बात का ध्यान रखें कि पूरे रास्ते ये गाना बजना  नहीं चाहिए। एक गाना है आज मेरे यार की शादी है और दूसरा ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का, इस देश के यारों.......। सब कुछ ठीक चल  रहा था, लेकिन जैसे ही बारात दरवाजे पर पहुंची और मैं कार से नीचे  उतर रहा था, तभी बैंडवालों  से रहा नहीं गया और ये गाना बजा ही दिया कि ये देश है वीर जवानों का....... । खैर अब मैं कुछ नहीं कर सकता था ।

 
 
   

Monday, 5 December 2011

ईमानदार आदमी समझदार भी हो जरूरी नहीं ...

न्ना एक बार  फिर सरकार से दो दो हाथ करने के मूड में हैं । धमकी दे रहे हैं कि अब की निर्णायक लड़ाई  होगी यानि  आर पार की । अब निर्णायक लड़ाई  का क्या मतलब है ? क्या जनलोकपाल  कानून  की अधिसूचना रामलीला मैदान  से  खुद जारी कर देगें ? कुछ बोलना है, क्या बोलना है, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है ।  दरअसल अन्ना ईमानदार है, उनकी ताकत भी यही ईमानदारी है । अब ये तो जरूरी नहीं है ना कि ईमानदार आदमी समझदार भी होगा । बस  समझदारी से काम ना लेना  यही उनकी  सबसे बडी कमजोरी है । 

अब देखिए सड़क पर उतरने वाली भीड़ को अन्ना अपना समर्थक मानते हैं,  उन्हें  लगता है कि उनकी आवाज पर  ये भीड़ सड़क पर  आ  जाती है, पर ऐसा है नहीं । दरअसल इस भीड़ का दुश्मन नंबर एक कौन है ? आप बता सकते हैं ? चलिए मैं बताया हूं। इस सवाल का सिर्फ एक जवाब है वो है राजनेता । क्योंकि  लोग जब देखते हैं पहला चुनाव लड़ने के दौरान जिस नेता की हैसियत महज एक 1974 माडल जीप की थी, आज वो कई एकड़ वाले रिसार्ट, आलीशान बंगला, फरारी, पजीरो और होंडा सिटी कार का मालिक कैसे बन गया । नेताओं के बच्चे कैसे विदेशों में पढाई करने के साथ ही मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ओहदे पा गए । जाहिर है नेताओं  के आचरण से नाराज जनता सड़कों पर  उतर रही है और  ये नाराजगी किसी एक  पार्टी से नहीं  है बल्कि पूरी व्यवस्था से है ।

वैसे मेरा सवाल अन्ना से भी है, क्योंकि मै जानता हूं कि एक संवेदनशील मुद्दे को आगे रख कर आंदोलन खडा करना आसान है, पर उसे समेटना बहुत मुश्किल , लोगों को सड़क पर लाना आसान है, वापस घर भेजना मुश्किल है, लोगों को एक बार भड़काना तो आसान है, पर भड़के लोगों को समझाना बहुत मुश्किल । अन्ना क्या मांग रहे हैं, जनलोकपाल कानून । यानि एक ऐसा कानून जिसमें भ्रष्ट्राचारियों को सख्त और जल्दी सजा मिले। जनलोकपाल  कानून मे  प्रधानमंत्री और सर्वोच्च  न्यायालय के जजों  को भी शामिल करना चाहते हैं ।  अन्ना अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सरकारी लोकपाल जिसे आप सड़कों पर फूंकते फिर रहे हैं, वो भी कम नही है । मै एक उदाहरण देता हूं आपको । सूचना के अधिकार कानून में पीएमओ समेत कई और मंत्रालयों को इससे अलग रखा गया है, तो क्या आपको लगता है कि सूचना का अधिकार कानून बेकार है ? बिल्कुल नहीं । ग्रुप सी  के कर्मचारियों को इसमें शामिल करने की बात की जा रही है ।  क्या आप मानते हैं कि नेता और अफसर ईमानदार होगा तो कर्मचारियों की इतनी हैसियत है कि वो बेईमानी कर सकते हैं । ऐसे  में  ग्रुप सी 57 लाख  कर्मचारियों को अगर इसके दायरे में लाया गया तो बेवजह  लोकपाल पर  काम का इतना बोझ  हो जाएगा कि इसकी गुणवत्ता प्रभावित होगी। 
 
अन्ना आए दिन  अनशन की धमकी देकर  संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं । मेरा मानना  है कि आपका मुद्दा तो एक बार सही हो सकता है, पर तरीका बिल्कुल गलत है ।  ये बात  तो टीम अन्ना भी जानती है कि  देश में कोई भी कानून जंतर मंतर या रामलीला मैदान में नहीं बन सकता । इसके लिए तो संसद की ही शरण लेनी होगी । अब आपने पहले तो नेताओं को जंतर मंतर से  खदेड़ दिया ।  उस  समय आपने सोचा कानून जंतर मंतर पर ही बन जाएगा ।  लेकिन इसके कुछ दिन बाद आप कांग्रेसियों के झांसे में आकर उनके साथ गलबहियां करने लगे । मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि  आज टीम अन्ना को  ये दिन नहीं देखना पडता अगर उन्होंने  थोडा  सूझ बूझ के साथ काम लिया होता । अब अन्ना को कौन बताए कि ये महाराष्ट्र नहीं दिल्ली है । यहां राज ठाकरे नहीं, उनके पिता जी बैठे हैं । अगर आपने ड्राप्टिंग कमेटी के गठन के दौरान व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को अलग कर देश हित में सोचा होता तो आज ये हालत ना होती । आपको सिर्फ इतना करना था कि कमेटी में सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को प्रतिनिधित्व देने की मांग करते, तो  यहीं सबके पत्ते खुल जाते और आपको एक एक नेता दरवाजे पर मत्था टेकना नहीं पडता, लेकिन ऐसा करने से आपके सहयोगियों की कीमत कैसे बढती, उन्हें तो सरकार के मंत्रियों के साथ मीटिंग कर  अपना कद बढ़ाना था ।

हम सब अन्ना में गांधी की तस्वीर देखते हैं । लेकिन जब अन्ना भ्रष्टाचारियों को  फांसी देने की मांग करते हैं  तो हमें लगता है कि ये गांधी  की गलत छवि  देश में प्रस्तुत कर रहे हैं ।  सच तो ये है कि  देश में  भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पर्याप्त कानून है, बशर्ते उस पर सख्ती से अमल हो । आप देखें कानून की वजह से ही तो ए राजा, सुरेश कलमाडी जेल में है । यहां तक की राजकुमारी की तरह जिंदगी जीने वाली कनिमोझी को भी  लगभग  छह महीने जेल की सलाखों के पीछे रहना पडा । बीजेपी के मुख्यमंत्री वी एस यदुरप्पा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्वाण को भ्रष्टाचार में शामिल होने की वजह से ही कुर्सी गंवानी पडी ।  कोई जनलोकपाल कानून की वजह से ये जेल नहीं  गए थे ।

मुझे तकलीफ होती है जब संसद की  गरिमा के खिलाफ कोई बात होती  है । देश की खूबसूरती  ही ये है कि यहां  संसदीय  परंपरा  आज भी मजबूत है और देशवासी इसका सम्मान करते हैं ।  मैं तो इस आंदोलन को संसद पर  हमला करने के बराबर  मानता हूं ।  मुझे लगता है कि आखिर कितने हमले झेलेगी ये पर्लियामेंट । एक बार 13 दिसंबर 2001 को पांच आतंकी सीमापार से हथियारों से लेस होकर यहां घुस आए । वो तो इस संसद को लहुलुहान कर देना चाहते थे और यहां एक ऐसी काली इबारत लिखना चाहते थे, जो धब्बा हम जीवन भर ना धो  सकें। लेकिन हमारे बहादुर सिपाहियों ने उन पांचो को मार गिराया और संसद भवन के भीतर भी घुसने नहीं दिया ।
आज 10 साल बाद एक बार फिर संसद पर हमला हो रहा है ।  हालाकि ये कोई आतंकी  हमला नहीं  है, लेकिन  मैं इस हमले  को आतंकी हमले से ज्यादा खतरनाक  मानता हूं ।  इस हमले में किसी एक व्यक्ति या नेता की हत्या करना मकसद नहीं है । बल्कि इनका मकसद संसदीय परंपराओं और मान्यताओं की हत्या करना है । आज तमाम लोग भावनाओं में बहकर शायद उन पांच आतंकियों को ज्यादा खतरनाक कहें जो  हथियार के साथ संसद भवन में घुसे थे, लेकिन मैं उनके मुकाबले सिविल सोसाइटी के पांच लोगों को  ज्यादा खतरनाक मानता हूं । बस दुख तो ये है कि ये सीमापार से नहीं आए हैं, हमारे ही भाई है । लोकतांत्रिक व्यवस्था से भली भांति परिचित भी हैं, फिर भी देश के लोकतंत्र को कमजोर और खत्म करने पर आमादा हैं । अब संसद  के भीतर  सांसद निष्पक्ष होकर अपनी राय न रख पाएं तो फिर संसदीय प्रणाली  कैसे चल सकती है । बराबर धमकी दी जा रही है कि जो सांसद जनलोकपाल बिल का समर्थन  ना  करे , उसके घर के बाहर  धरना देना है । आखिर  टीम अन्ना  देश  को किस ओर  ले  जाना  चाहती है, क्या इससे देश में आराजकता का माहौल नही पैदा हो जाएगा ।

मुझे तो कई बार लगता है कि टीम अन्ना  ही अन्ना की दुश्मन  बन गई है । आपको पता है कि  एक भुट्टे को पैदा करने के लिए एक दाने को शहीद होना  पड़ता है । यानि जब एक बीज जमीन में डाली जाती है, तभी एक पूरा भुट्टा पैदा होता है । तो क्या सिविल सोसाइटी अन्ना  को शहीद होने का दाना समझ रही है । मैं मानता हूं कि प्रधानमंत्री सच्चे आदमी हैं, वो  झूठी बात जनता के सामने नहीं कह सकते । वजह उनकी बातों की और पद की एक मर्यादा है । टीम  अन्ना तो  कुछ भी कह सकती हैं । बताइये जिस देश का प्रधानमंत्री कह रहा हो कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो एक दिन में इसे खत्म कर दें । लेकिन अन्ना और टीम जिस तरह से बात कर रही है उससे लगता है कि जनलोकपाल बनते ही भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा । मैं  पूरे दावे  के  साथ कह सकता हूं  कि 121  करोड़ की आबादी को एक कानून में नहीं  बांधा जा सकता ।  देश में आज किस अपराध के लिए सख्त कानून नहीं है, फिर भी कौन सा अपराध देश में नहीं हो रहा है । मित्रों मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को हम सजा नहीं दे पा रहे हैं । संसद पर हमला करने का षडयंत्र करने वाला अफजल गुरू जेल मे वीआईपी सुविधा ले रहा है । और हम चोरों को फांसी देने की बात कर रहे हैं, ये बात कैसे किसी के गले उतर सकती है ।  सच तो ये है कि  सरकार अपराधियों को न्यायालय से मिली सजा पर अमल भर करने लगे, तो लोगों में कानून के प्रति सम्मान और भय पैदा होगा। बडे बडे भ्रष्टाचारी जेल जाने लगें और उनकी संपत्ति जब्त होने लगे तो  छोटे  कर्मचारी खुद ही रास्ते पर आ जाएंगे।

आज देश को  सोचना  होगा कि हम लोकतंत्र को कैसे मजबूत बनाए रखें ।  पडो़सी देश पाकिस्तान को ले लें, आज उसकी जो दशा है, इसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वहां आराजकता की मुख्य वजह ही  लोकतंत्र का कमजोर  होना । उसका रिमोट कंट्रोल पूरी तरह अमेरिका के हाथ में है । लोकतंत्र कमजोर होने से ही  नेपाल की अस्थिरता भी किसी से छिपी नहीं है । आज अन्ना का आंदोलन भी कहीं ना कहीं लोकतंत्र के लिए सबसे बडा खतरा है । संसद की सर्वोच्चता को  किसी भी सूरत में बरकरार  रखना ही होगा ।  यही   देश  के मजबूत  लोकतंत्र  की खूबसूरती रही है । मैं ये  नहीं कहता कि जनता को अपनी आवाज उठाने का हक नहीं है, जरूर उठाना चाहिए। लेकिन हमें ये भी देखना है कि कहीं संवैधानिक संस्थाओं का अस्तित्व खतरे में ना पड़ जाए। मैं फिर दावे के साथ कहता हूं कि भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए हमारे पास कानून की कमी नहीं है । उसका कड़ाई से पालन भर किया जाए तो बहुत कुछ समस्या का समाधान हो सकता है ।

मुझे इस बात पर भी आपत्ति है कि इस आंदोलन को आजादी की दूसरी लडाई कहा जाए । समझ लीजिए ये कह कर हम आजादी के लिए दी गई कुर्बानी और शहीद हुए लोगों को गाली दे रहे हैं । अन्ना खुद को गांधी कहे जाने पर गर्व जरूर महसूस करें, लेकिन मैं उन्हें गांधीवादी तो कह सकता हूं, पर दूसरा गांधी नहीं । जो लोग उन्हें दूसरा गांधी बोल रहे हैं, वो पहले गांधी को गाली दे रहे हैं । मुझे लगता है कि ये जिम्मेदारी अन्ना की है कि उन्हें दूसरा गांधी कहने वालों को रोकें ।  वैसे अगर देश आपको आपको गांधी कह रहा है, तो  आपकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ जाती  है, क्योंकि  आपने कुछ भी ऐसा वैसा किया, जो नहीं होना चाहिए तो आपका  कुछ नहीं होगा, हां गांधी के बारे में बच्चों  के बीच  गलत राय बनेगी । पिछले दिनों अन्ना ने भ्रष्ट लोगों को  फांसी देने की बात की, उन्होंने ये भी कहा कि गांधी के रास्ते बात ना बने तो शिवाजी का रास्ता अपनाना होगा। अन्ना को  तो पता होना चाहिए कि गांधी जी कहते थे कि कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा सामने कर दो ।  99  अपराधी  भले ही छूट जाएं, पर  एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी  चाहिए। पर आप तो कुछ भी बोल रहे हैं । इससे बच्चों में गलत संदेश जा रहा है ।
 अंदर की बात तो ये है कि भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की अऩ्ना की मांग पूरी हो जाए तो, कम से कम 10 हजार जल्लादों की भर्ती तत्काल करनी होगी, और इन्हें देश भर मैं तैनात करना होगा । इसके बाद हर जिले में कम से कम दो सौ लोगों को अगर रोजाना फांसी पर लटकाया जाए, और ये प्रक्रिया साल भर चलती  रहे, फिर भी हम देश को सौ फीसदी भ्रष्टाचारियों से मुक्त नहीं कर सकेंगे । देश में ऱिश्वतखोरों की पैठ बहुत गहरी है । जिस देश में मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए बाबू को पैसे देने पडें, जिस मुल्क में शहीदों के लिए खरीदे जाने वाले ताबूत में दलाली ली जाती हो, जिस मुल्क में सैनिकों को घटिया किस्म का बुलेट प्रूफ जैकेट देकर सीमा पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता हो, जिस देश में डाक्टर चोरी से मरीज की किडनी निकाल लेते हों, जिस देश शहीदों की विधवाओं के लिए बने फ्लैट पर सेना के अफसर और नेता कब्जा जमा लेते हों, उस देश को पूरी तरह  ईमानदार बना देना इतना आसान है क्या?

आइये  थोड़ी चर्चा  संसदीय कार्यप्रणाली की भी कर लें । क्योंकि सब कुछ जानते हुए भी देश की आंख में धूल झोंका जा रहा है ।  यहां यह बताना जरूरी है कि जब किसी मसले पर एक बिल संसद में पेश किया जा चुका हो, तो फिर उस पर संसद में किसी तरह की चर्चा नहीं की जा सकती । इससे स्थाई समिति जो एक संवैधानिक संस्था है, उसकी गरिमा गिरती है । गरिमा को छोड भी दें तो ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है । क्योंकि बिल को अंतिम रूप देने का अधिकार स्थाई समिति को ही है । बहरहाल संसद  में जनलोकपाल बिल के प्रस्ताव पर  एक  दिन की पूरी बहस में ये तो साफ हो गया कि ज्यादातर लोग जनलोकपाल बिल का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन प्रस्ताव का समर्थन करने का यह मतलब कत्तई नहीं की, ये लोकपाल बिल का भी समर्थन करेंगे । चर्चा के दौरान लालू यादव के बयान पर ध्यान देना जरूरी  है, उन्होंने साफ कहा था कि सभी दल  संविधान के तहत काम  करने की बात कर  रहे हैं,  लेकिन  ये जवाब कौन देगा कि संविधान  के तहत तो ये चर्चा  हो ही नही सकती, क्योंकि इससे संबंधित  बिल स्थाई समिति में विचाराधीन है ।
वैसे सरकार और सिविल सोसायटी दोनों ही जानते थे कि संसद में जो चर्चा हो रही है, उसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि स्थाई समिति में इससे जु़डे चार बिल पहले से ही विचाराधीन हैं, और स्थाई  समिति को सभी बिलों को चर्चा के लिए सामने रखना  ही होगा । इसके अलावा स्थाई समिति में आम आदमी भी अपना सुझाव दे सकता है । यहां सभी सुझावों पर गुण दोष के आधार पर फैसला होता है । ऐसे में सदन में हुई चर्चा  सदन की समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ  नहीं थी ।  बस रामलीला मैदान में उपजे जनाक्रोश को शांत करने भर के लिए ये किया गया । स्वामी अग्निवेश की एक बात से तो मैं भी सहमत हूं कि जिस दिन संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर अन्ना से अनशन समाप्त करने की अपील की थी, उन्हें सदन की गरिमा का ध्यान रखते हुए अनशन  खत्म  करना चाहिए था । लेकिन अन्ना की टीम ने उन्हें समझाया कि प्रधानमंत्री के सैल्यूट से काम  नहीं बनने वाला है, सरकार को कुछ ठोस पहल करनी  ही होगी । दरअसल अन्ना को तीन दिन तक उनकी टीम ने सिर्फ अपनी "फेस सेविंग" के लिए भूखा रखा  और  संसद की गरिमा को भी तार  तार किया गया।  
रामलीला मैदान में अनशन कर रहे  अन्ना क्या मांग कर रहे थे । वो कह रहे थे कि संसद में जनलोकपाल बिल पेश किया जाए और उसे पास कर 30 अगस्त तक कानून बनाया जाए । उनकी ये बात पूरी नहीं हुई। फिर अन्ना ने 30 अगस्त तक कानून बनाने की बात छोड दी और कहा कि उनके बिल पर संसद में चर्चा की जाए और उस पर मतदान कराया जाए। लेकिन सरकार ने बिना किसी नियम के संसद में महज एक बयान देकर चर्चा की और कोई प्रस्ताव  भी पास नहीं किया । संसद में हुई चर्चा को एक तरह से सेंस आफ हाउस माना गया । इसके अलावा अन्ना ने कहा कि संसद मे सर्वसम्मति से बिल पास हो जाने पर वो अनशन तो तोड़ देगें लेकिन रामलीला मैदान में धरना जारी रहेगा । लेकिन हुआ क्या.. संसद में चर्चा के बाद अन्ना के पास कोई प्रस्ताव भेजने के बजाए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पत्र लेकर विलासराव देशमुख पहुंचे और अन्ना को अनशन खत्म  कर दिया ।  उसके बाद  पूरा मामला स्थाई समिति को देखना था ।

सवाल ये है कि अन्ना खुद अपना जनलोकपाल बिल संसद की स्थाई समिति को सौंप आए थे । बाद में प्रधानमंत्री ने भी इसे स्थाई समिति को भेज दिया था । उस दौरान टीम अन्ना से कहा गया कि अब वो अपनी बात स्थाई समिति से करें । इसमें ऐसा क्या मिल गया था कि अन्ना और  उनकी टीम ने अनशन खत्म करते हुए इसे आधी जीत बताया । हालाकि आधी  जीत के मायने क्या हैं, ये अन्ना ही बता सकते हैं । मेरा मानना कि ना आधी  जीत होती है और ना आधी हार । लेकिन कुछ भी  हासिल  ना होने के बावजदू देश  भर में जीत का जश्न  मनाया गया ।  फिर  जीत के जश्न की खुमारी उतरी भी नहीं कि   इस टीम ने कांग्रेस से दो दो हाथ करने का ऐलान  कर दिया । हिसार में लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार में उतर आए । धमकी दी जा रही है कि उनके मुताबिक बिल पास  ना हुआ तो पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करेंगे । टीम का कहना था कि कांग्रेस  चाहे  तो बिल पास करा सकती है, इसलिए उसका विरोध किया जा रहा है । अगर ऐसा होता तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुदरा व्यापार के मामले एफडीआई को पास ना करा लेते । देश का  लोकतंत्र इसीलिए मजबूत है ।  फिर  एक ओर सरकार लगातार कहती रही कि शीतकालीन सत्र में बिल पेश  किया जाएगा, लेकिन सत्र का इंतजार किए बगैर सरकार के खिलाफ टीम अन्ना सड़कों पर आ गई । इससे इतना तो साफ हो गया कि टीम अन्ना के पीछे कुछ और  ताकतें भी काम कर रही हैं।

ईमानदारी की बात करने वाली  टीम अन्ना भी गंभीर आरोपों में घिर चुकी  है । प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल  भ्रष्टाचार के खिलाफ मिल  रहे जनसमर्थन को अपना समर्थन समझने लगे हैं । उनकी हालत ये है कि सरकारी बकाए के भुगतान का चेक वो प्रधानमंत्री को  भेज रहे हैं । उन्हें लगता है कि पीएमओ में बकाए का भुगतान करने का काउंटर  खुला  है । दूसरी  सहयोगी  किरन बेदी पर  जिस तरह से एनजीओ के नाम पर पैसों की हेराफेरी के आरोप लगे हैं, वो  वाकई गंभीर है । मुझे लगता है कि एनजीओ को लोकपाल  के दायरे से बाहर रखने  की बात शायद इसीलिए की जा रही है,  कि ऐसे लोगों की दुकान चलती रहे ।        
बहरहाल मेरा  तो मानना है कि 121 करोड की आवादी वाले देश को किसी भी कानून में नहीं बांधा जा सकता । ईमानदारी के लिए लोगों में नैतिकता की जरूरत है और आज देश में कोई नैतिक नहीं रह गया । अन्ना खुद कहते हैं कि अगर जनलोकपाल बन गया तो आधे मंत्री जेल में होगे, ये सुनकर आप हैरत में पड जाएंगे कि अगर ईमानदारी से बेईमानों की पहचना की  गई तो सेना के आधे से ज्यादा बडे अफसरों को जेल भेजना होगा । आज जितनी भ्रष्ट हमारे देश की सेना है, उसका किसी दूसरे महकमें से कोई मुकाबला नहीं है । वैसे अन्ना  जी आपने लोगों से एक हफ्ते की छुट्टी लेकर आंदोलन में शामिल होने को कहा था । सरकारी कर्मचारियों ने तो छुट्टी नहीं ली, सब काम पर रहे, पर मेरे  घर की बाई जरूर छुट्टी चली गई । इसलिए आपको लेकर घर में भी बहुत नाराजगी है । अन्ना पर  हंसी  भी आती है क्योंकि आज वो देश में ग्रुप  सी के 57 लाख कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग पर अड़े हैं और उन्हीं से छुट्टी लेकर  आंदोलन में शरीक होने की बात भी कह रहे हैं । ऐसी अपील तो अन्ना ही कर सकते हैं ।

इसी बीच अन्ना शराब बंदी का एक  नया राग अलापने लगे हैं । दिसंबर का महीना, ठंड भी  है । पुराने साल की बिदाई और नए साल की आगवानी देशवासी बिना शराब के कैसे करेंगे  ? सच में ये तो मुझे भी देखना है । वैसे मेरा  सुझाव है अन्ना को कि दिल्ली में शराब वगैरह की बात ना करें, यहां रामलीला मैदान में रोनक की एक खास वजह शराब भी है । ये बातें अपने गांव में ही  करें, यहां लेने के देने पड़ सकते हैं, पता लगा कि रात में आप और टेंट वाले ही मैदान में बचे  हैं ।  

Friday, 2 December 2011

राम तेरी गंगा मैली हो गई...

ज बात करुंगा भगवा पर लग रहे दाग की और वो ऐसे वैसे दाग की नहीं, बल्कि यौनाचार जैसे घिनौने कृत्य से लगे उस दाग की जिसे आसानी से धो पाना संभव नहीं है। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है स्वामी नित्यानंद की एक सीडी ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। इस सीडी में स्वामी नित्यानंद दक्षिण भारत की ही एक अभिनेत्री के साथ अश्लील हरकतें करते हुए कैमरे पर कैद हो गए थे। नित्यानंद की इस करतूतों से कई इलाकों में गुस्सा भड़का और लोग सड़कों पर आ गए। नित्यानंद आश्रम छोड़कर भाग निकले बाद में उन्हें हिमाचल से गिरफ्तार किया गया।

लेकिन इस ताजा मामले में कोई सीडी नहीं है, पर स्वामी की शिष्या ने ही थाने में जो रिपोर्ट दर्ज कराई है। उसमें स्वामी पर बलात्कार, अपहरण और गला दबाकर जान से मारने की बात कही गई है। अब इस स्वामी को भी जान लें, ये स्वामी कोई और नहीं बल्कि बीजेपी नेता, पूर्व गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद हैं। इन पर गंभीर आरोप लगाने वाली इनकी ही शिष्या हैं, जिनका नाम है साध्वी चिदर्पिता। साध्वी बनने से पहले इनका नाम कोमल गुप्ता था। कोमल की बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। ये मां के साथ लगभग हर शाम मंदिर जाती थी। इसी बीच मां की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया और इन्हें भी वहां मां के साथ जाने का अवसर मिला। उसी समय कोमल गुप्ता का स्वामी चिन्मयानन्द से परिचय हुआ। स्वामी जी उस समय जौनपुर से सांसद थे। तब कोमल की उम्र लगभग बीस वर्ष थी। स्वामी को ना जाने कोमल में क्या बात नजर आई कि वे कोमल को संन्यास के लिये मानसिक रूप से तैयार करने लगे। मैं कह नहीं सकता कि कोमल नासमझ थी या वो सन्यास लेकर नई दुनिया में खो जाना चाहती थी। बहरहाल कुछ भी हो कोमल ने स्वामी की बातों में हामी भरी और सन्यास के लिए राजी हो गई। स्वामी चिन्मयानंद ने कोमल को दीक्षा देने के साथ ही उसका नाम बदल कर साध्वी चितर्पिता कर दिया। दीक्षा के बाद साध्वी का नया ठिकाना बना शाहजहांपुर का मुमुक्ष आश्रम। चिन्मयानंद ने साध्वी को दीक्षा तो दी पर उसके सन्यास की बात को टालते रहे। ऐसा क्यों, इस रहस्य से स्वामी और साध्वी ही पर्दा हटा सकते हैं।
वैसे स्वामी और साध्वी में अंदरखाने क्या संबध थे, इस पर तो ये दोनों ही बात करें तो ज्यादा बेहतर है। पर मैं कुछ बाते आप सबके साथ साझा करना चाहता हूं। पिछले साल की बात है, मेरे सास स्वसुर ने हरिद्वार में स्वामी जी के आश्रम में ही भागवत कथा का आयोजन कराया था। इस दौरान पूरे सप्ताह भर मैं भी परिवार के साथ इसी आश्रम में रहा। आश्रम खूबसूरत है, देवी देवाताओं की मूर्तियां से तो अटा पड़ा है, आश्रम के सामने से गंगा बह रही है। यहां स्वामी और साध्वी दोनों एक साथ निकलते हैं, तो लोग उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने को आतुर दिखाई देते हैं। देर रात में भी स्वामी इसी साध्वी के साथ टहलते दिखाई देते हैं। सप्ताह पर के प्रवास के दौरान कई बार उनके टहलने के दौरान मेरा आमना सामना हुआ। सर तो मैने भी झुकाया, पर इस जोड़ी के सामने सिर झुकाने में कभी श्रद्धा का भाव मन में नहीं आया। गंगा आरती के दौरान ये दोनों वहां मौजूद रहते थे, दोनों की आंखों में होनी वाली शरारत को कोई भी आसानी से पकड़ सकता था। बहरहाल ये सब मैं सिर्फ इसलिए कह रहा हूं कि मैने दोनों के आखों में होने वाली शरारत को कई बार पकडा।
साध्वी लगभग 10 साल से भी ज्यादा समय से स्वामी जी के साथ हैं, वो केवल उनकी आश्रम की ही साथी नहीं रही हैं, बल्कि स्वामी जी जब मंत्री थे तो ये उनकी पीए थीं और दिल्ली में ही रहीं थीं। साध्वी 24 घंटे स्वामी जी के साथ परछाई तरह रहती थीं। एक दुर्घटना के बाद स्वामी जी दिल्ली में भर्ती थे तो साध्वी ही उनकी सेवा में लगी थीं । सच तो ये है कि खुद स्वामी जी ने कभी ये नहीं सोचा होगा कि उन्हें अपनी इस शिष्या से अलग होना पड़ सकता है, क्योंकि स्वामी जी कि अगर कोई कमजोरी है तो वो है सिर्फ यही साध्वी। स्वामी ने उन्हें हरिद्वार, शाहजहांपुर और बद्रीनाथ के आश्रमों की व्यवस्था की पूरी  जिम्मेदारी सौंपी थी। शाहजहांपुर के कालेज की भी जिम्मेदारी खुद साध्वी उठा रही थीं।

ऐसे में बडा सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या कुछ हुआ जिससे साध्वी ने बलात्कार, अपहरण और हत्या का प्रयास जैसे संगीन धाराओं में स्वामी जी के खिलाफ मामला दर्ज कराया दिया। कितने समय से साध्वी आश्रम में हैं उनके ऊपर किसी और का ऐसा नियंत्रण भी नहीं है कि वो कहीं जाना चाहें तो ना जा सकें। ऐसे में अपहरण की बात कहना तो मुझे लगता है कि बेमानी है। सवाल उठता है कि अगर स्वामी ने उनकी मर्जी के खिलाफ उनके साथ शारीरिक संबंध बनाया तो उन्होंने ये बात पहले क्यों नहीं की। फिर साध्वी पहले अचानक आश्रम से भाग निकलीं, और उन्होंने शादी कर ली। अब तीन महीने गुजारने के बाद शाहजहांपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई। सवाल तो ये भी खड़ा हो सकता है कि जिस तरह से उन्होंने प्रेम विवाह किया है, इससे इतना तो साफ है कि आश्रम में रहते हुए भी उनका बाहरी दुनिया में कुछ चल रहा था, वरना शादी एक दिन में तो होती नहीं।

मैं चिन्मयानंद को कोई साफ सुथरा होने का सर्टिफिकेट नहीं दे रहा हूं। बल्कि मेरा तो मानना है कि इन जैसों को साधु, संत, स्वामी कहना ही गलत है। चिन्मयानंद स्वामी क्यों हैं ? स्वामी वाली उनमें क्या बात है?  सैकडों करोड की संपत्ति के स्वामी हैं, क्या कोई साधु संपत्ति जमा करता है ? चुनाव के दौरान हाथ जोड़कर लोगों से वोट मांगना ये साधु संतों का काम है। फिर स्वामी पर वैसे ही तमाम आरोप लगते रहे हैं, अब उनकी ही शिष्या ने स्वामी जी के चरित्र पर जिस तरह से सवाल उठाए हैं उससे तो उनकी रही सही भी खत्म हो गई है। स्वामी जी मैं तो आपसे यही कहूंगा कि फिलहाल ऐसा कुछ कीजिए जिससे भगवा वस्त्र की गरिमा बनी रहे। जिस तरह के सवाल आज आपसे किए जा रहे हैं उसके बारे में खुद मनन करें। देश के लोगों की आज भी आश्रमों, साधु, संतों में बडी आस्था है, इस आस्था को तार तार ना होने दें। ऐसा ना हो कि गंगा किनारे स्थित आपके आश्रम से ये गंगा मैली हो जाए।

साध्वी चिदर्पिता का भी साध्वी जीवन विवादों से भरा रहा है। कहा जा रहा है कि आपकी नजर स्वामी जी के करोड़ों के साम्राज्य पर थी। इसे ही हथियाने के लिए आपने ये छोटा रास्ता चुना और स्वामी जी के करीब आईं। यहां आपने साध्वी धर्म का कितना पालन किया ये तो आप ही बेहतर बता सकती हैं लेकिन आपकी रिपोर्ट से साफ हो गया है स्वामी ने आपके साथ बलात्कार किया। इससे जाहिर है कि आपके साध्वी होने पर प्रश्न खड़ा हो गया है। फिर मेरी एक बात समझ में नहीं आ रही है कि एक ओर आप स्वामी जी से सन्यास लेने की बात कर रही थीं, दूसरी ओर आपके मन में प्रेम भी पनप रहा था। ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हो सकती हैं। आपके साध्वी होने के बावजूद प्रेम का पक्ष इतना मजबूत था कि आपने आश्रम से भागकर शादी कर ली,जाहिर है कि आश्रम में रहने के दौरान आपका कुछ चल रहा था, वरना शादी तो एक दिन में नहीं होती है। ये तो खुद साध्वी कहती हैं कि मुझे स्वामी जी मारते पीटते रहे, लेकिन किस बात पर इसका खुलासा नहीं किया गया।
कहा ये जा रहा है कि अब साध्वी को लगने लगा था कि स्वामी जी को उसकी जरूरत है। स्वामी जी की तमाम इच्छाएं साध्वी के बगैर पूरी नहीं हो सकतीं थीं, साध्वी इसी का फायदा उठा रही थीं। उनकी महत्वाकांक्षा लगातार बढती जा रही थी । पहले तो उनका दबाव था कि स्वामी जी अपना उत्तराधिकारी उन्हें घोषित करें। उत्तराधिकारी भी सिर्फ आश्रम या स्कूल कालेज का ही नही बल्कि राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बनना चाहतीं थीं। उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा भी चिन्मयानंद से जाहिर की। इस पर स्वामी जी भड़क गए। उन्हें लगा कि ये साध्वी अब उन पर हावी होने की कोशिश कर रही है, लिहाजा उन्होंने जमकर फटकार लगा दी।
कहा तो यही जा रहा है कि इसके बाद ही साध्वी ने अलग रास्ता चुना। स्वामी के गुस्से से साफ हो गया था कि यहां से उनके हाथ कुछ लगने वाला नहीं है। उन्हें लगा होगा कि शायद यौन उत्पीड़न के आरोप से स्वामी जी घबरा कर उन्हें बुलाएंगे और कुछ समझौता होगा। पर स्वामी जी ने अभी तक नरमी के कोई संकेत नहीं दिए हैं और पूरी घटना को एक साजिश भर बता कर पल्ला झाड ले रहे हैं।
बहरहाल साधु संतों पर आए दिन अब यौनाचार जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। संतो को समझना होगा कि ऐसा वो क्या करें जिससे और कुछ ना सही लेकिन चरित्र पर धब्बा ना लगे। ये भगवा भी अगर दागदार हो गया तो समाज में लोगों का साधु संतो पर से भी भरोसा डिग जाएगा।